Wednesday, October 05, 2011

बृजलाल जी अदालत के बाहर पुलिस गुंडागर्दी को तो रोकिये




उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्तिथ फास्ट ट्रेक कोर्ट नंबर ७ के सामने सरकार बनाम गुलजार अहमद वानी के गवाह शिबली बेग का अपहरण पुलिस विभाग के एक दरोगा व सिपाही ने कर लिया। आज सरकार बनाम गुलजार अहमद वानी के केस में गवाह शिबली बेग गवाही देने के लिये उपस्थित हुआ किन्तु पुलिस वालों की तरफ से झूठी गवाही न देने के लिये बात जैसे सामने आई वैसे ही अज्ञात पुलिस वालों ने उसका अपहरण कर लिया इससे कचेहरी परिसर में सनसनी फ़ेल गयी। मामला यह है कि 15 अगस्त 2000 में लखनऊ के सहकारिता भवन के पास बम विस्फोट कांड में पुलिस वालों ने शिबली बेग को गवाह रखा था। इसी मुक़दमे के अन्य अभियुक्त कलीम अख्तर के खिलाफ अभियोजन पक्ष ने उसको पेश किया तो वह पक्षद्रोही हो गया था और उसने कलीम अख्तर के खिलाफ झूठी गवाही देने से साफ़ मना कर दिया था और अब अभियोजन पक्ष ने उसी केस के अभियुक्त गुलजार अहमद वानी के खिलाफ झूठी गवाही देने के लिये बाध्य किया और उसके मना करने पर उसका अन्य पुलिस वालों द्वारा अपहरण करा दिया गया। गुलजार अहमद वानी अधिवक्ता मोहम्मद शोएब ने न्यायालय श्रीमान फास्ट ट्रक कोर्ट नंबर 7 को इस घटना का प्रार्थना पत्र दिया तो न्यायालय ने थाना कैसरबाग से रिपोर्ट मांगी है।

पुलिस महानिदेशक जी उत्तर प्रदेश में बिगडती हुई कानून व्यवस्था को कैसे पटरी पर लाओगे। अगर पुलिस बल ही नियमो और उपनियमो का पालन नही करेगी तो जनता का विश्वास कैसे हासिल करेगी। गवाह का अपहरण किये जाने की घटना कि बात से यह साबित हो रहा है की पुलिस विभाग का न्यायालयों के प्रति न तो सम्मान है और न ही उनके द्वारा किये जा रहे इन्साफ में विश्वास है।

Sunday, October 02, 2011

फैसला कीजिये : अडवाणी बड़े या मोदी??



हिन्दुवत्ववादी खेमे के सबसे बड़े राजीनीतिक दल में अडवाणी बड़े या मोदी को लेकर घमासान चल रहा है और हिन्दुवत्व वादी तत्व संशय की स्तिथि में हैं। अडवाणी जी ने पहले अपनी रथ यात्रा निकाल कर जनता दल की सरकार को ध्वस्त कर दिया था और फिर बाद में बाबरी मस्जिद ध्वंस करा कर पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे करवाए थे लेकिन पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना की मजार पर जाकर उनका गुणगान भी किया था वहीँ दूसरी तरफ टनाटन हिन्दुवत्व वादी नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं। गोधरा ट्रेन कांड के बाद पूरे गुजरात में भारतीय नागरिकों का कत्ले आम कराया था और अब उनके खिलाफ मुंह खोलने वाले आई.पी.एस अफसर संजीव भट्ट निलंबित होकर जेल की हवा खा रहे हैं। डी.डी बंजारा के समय गुजरात में आतंकवाद के नाम पर सरेआम नौजवानों को गोलियों से एनकाउंटर के नाम पर मार डाला गया था लेकिन हिन्दुवत्ववादी नरेंद्र मोदी जी का ह्रदय जरा सा भी नहीं पिघला। नरेंद्र मोदी साहब ने अभी कुछ दिन पूर्व सद्भावना उपवास किया था और एक चापलूस ने इस्लामी टोपी लगाने के लिये भेट की तो उन्होंने सख्ती से मना कर दिया। अडवाणी जी अगर होते तो टोपी अवश्य लगा लेते। अब फैसला हिन्दुवत्ववादी शक्तियों को करना है कि उनका नेता मोदी है या अडवाणी ?

Saturday, October 01, 2011

फलस्तीन को मान्यता से ही होगी शांति



संयुक्त राष्ट्र महासभा में बराक ओबामा का संबोधन अमेरिकी स्वार्थों को दिखाता है। उनका संबोधन यह बताता है कि किस तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद मुस्तैदी से इजरायल की पीठ पर अपना हाथ रखे हुए है।  इजरायल को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह बड़ी बेशर्मी से संयुक्त राष्ट्र संघ के अनेकानेक प्रस्तावों का उल्लंघन कर फलस्तीनी भूभाग पर कब्जा किए हुए है। उस पर लगतार हमले कर रहा है और एक स्वतंत्र फलस्तीन देश के गठन का रास्ता रोके हुए है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रस्ताव संख्या-181 का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है, जिसमें इजरायल के साथ एक फलस्तीन देश के गठन का प्रावधान है।

संयुक्त राष्ट्र संघ में ही पिछले साल के अपने संबोधन में राष्ट्रपति ओबामा ने फलस्तीन देश के गठन की ओर बढ़ने के वायदे तथा संकल्प की बात कही थी, इसके ठीक उलट इस साल के अपने संबोधन में उन्होंने इसकी चर्चा की कि किस तरह ‘शांति कठिन है’ और इसकी कसम भी खाई कि अगर फलस्तीन मुल्क को मान्यता देने का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने आता है, तो अमेरिका उसे वीटो करेगा।
अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति के रूप में पहली बार किसी अफ्रीकी-अमेरिकी के राष्ट्रपति चुने जाने तथा उससे जुड़े जोशो-खरोश तथा दुनिया भर में पैदा हुई उम्मीदों को ध्यान में रखते हुए भी यह सवाल उठाया गया था कि क्या इसका उपयोग एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए किया जाएगा? हालांकि सवाल करने वालों ने उस वक्त यह भी कहा था, ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद का पिछला अनुभव यही बताता है कि वह कभी नहीं बदल सकता। अगर ऐसा है, तो अनुभव पर उम्मीद की जीत के लिए संघर्ष जारी रहना चाहिए।’
बहरहाल, जहां तक फलस्तीनियों का सवाल है, तो यह स्पष्ट है कि उनका संघर्ष न सिर्फ जारी रहेगा, बल्कि निश्चित रूप से इस संघर्ष में और तेजी आने जा रही है। इजरायल के सबसे लोकप्रिय दैनिक हारेत्ज  ने पिछले हफ्ते लिखा था: ‘इजरायल के खुश होने की वजहें हैं। राष्ट्रपति ओबामा के भाषण का स्वर पहले के किसी भी भाषण से कहीं ज्यादा यहूदीवादी लग रहा था। फलस्तीन अथॉरिटी का नेतृत्व अमेरिका के साथ टकराव के रास्ते पर है और फलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) के महासचिव यासिर आबेद रब्बो ने पिछले दिनों चैनल-2 से बात करते हुए कहा था कि अमेरिकी अब इजरायलियों और फलस्तीन अथारिटी के बीच मध्यस्थता नहीं कर सकेंगे।
पूरी भाषणबाजी तथा लफ्फाजी के बावजूद अपने ताजातरीन भाषण से ओबामा ताकतवर यहूदी लॉबी का वफादार बनकर सामने आए हैं और उन्होंने विश्व प्रभुत्व के अमेरिकी साम्राज्यवाद के मनसूबों को ही स्वर दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स इस बात का शोर मचा रहा था कि फलस्तीन की सदस्यता के पक्ष में संयुक्त राष्ट्र संघ में मतदान सत्यानाशी होगा। वॉल स्ट्रीट जर्नल  आरोप लगा रहा था कि फलस्तीनी इजरायल को परेशान करने, उसकी वैधता खत्म करने तथा अंतत: उसे नष्ट कर देने के अपने शाश्वत अभियान में एक और औजार का इस्तेमाल कर रहे हैं। कंजर्वेटिव दबदबे वाली अमेरिकी कांग्रेस ने धमकी दी थी कि अगर फलस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता जाती है, तो सरकार के महत्वपूर्ण कामों को रोक दिया जाएगा।
लगातार यह प्रचार किया जा रहा है कि फलस्तीन के लोग इजरायल को स्वीकार ही नहीं करना चाहते हैं, जबकि फलस्तीन अथॉरिटी के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून से यह अनुरोध किया था कि 1967 की सीमाओं में फलस्तीन देश को मान्यता दी जाए, जो शांति से इजरायल के साथ रहने के लिए तैयार है। यह मान्यता संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रस्ताव संख्या 181 के आधार पर दी जानी है, जिसमें पूर्वी-येरूशलम को फलस्तीन राज्य की राजधानी बनाए जाने का भी प्रावधान है।
पश्चिमी एजेंसियों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों के अनुसार, दुनिया भर में फैले 83 प्रतिशत फलस्तीनियों ने संयुक्त राष्ट्र संघ से मान्यता हासिल करने के प्रयास का उत्साह के साथ समर्थन किया है। उधर, द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, अनेक अरब देशों ने कड़ी चेतावनियां दी हैं कि अगर अमेरिका वीटो का प्रयोग करता है, तो अरब तथा मुस्लिम जगत के साथ संबंध सुधारने के उसके सारे प्रयास निर्थक हो जाएंगे।’ सऊदी खुफिया तंत्र के लंबे अरसे तक प्रमुख रहे शख्स का हवाला देते हुए इस पत्रिका ने लिखा है कि अगर अमेरिका फलस्तीन राज्य के दर्जे के खिलाफ वोट करता है, तो सऊदी अरब भविष्य में अमेरिका के साथ उस तरह से सहयोग नहीं कर पाएगा, जिस ऐतिहासिक रूप से अब तक करता आया है।
साफ है, वर्तमान गंभीर आर्थिक संकट व मंदी की पृष्ठभूमि में, जब यहूदी लॉबी द्वारा नियंत्रित वित्तीय पूंजी, अमेरिका की संकट में फंसी अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने की ओबामा की कोशिशों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, ओबामा ने उग्रपंथी स्वर अपना लिया है। आखिरकार, इन्हीं परिस्थितियों के बीच उन्हें अपने चुनाव का अभियान भी जो चलाना है। यह अमेरिकी साम्राज्यवाद की उस लगातार बनी हुई आक्रामकता के भी अनुरूप है, जो अफगानिस्तान में देखने को मिली है। वहां अमेरिका की अफ-पाक नीति ने संकट पैदा कर दिया है। नौबत यहां तक पहुंच गई है कि पाकिस्तान ने, जिसे लंबे अरसे से तथा पुराने जमाने से दक्षिण एशिया में अमेरिका की कठपुतली माना जाता रहा है, एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अपनी विदेश मंत्री को अमेरिका से यात्रा रद्द कर स्वदेश लौटने के लिए कहा।
इन हालात में अपने विश्व प्रभुत्व को और पुख्ता करने के अमेरिका के मनसूबे दुनिया की बहुमत आबादी की तकलीफें और बढ़ाने का ही काम करेंगे। इसी के हिस्से के तौर पर फलस्तीनियों को अपने देश के उनके मौलिक अधिकार से आगे भी वंचित रखा जाएगा। ज्यादा संभावना इसी बात की है कि जैसे ही अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फलस्तीन राज्य की मान्यता के खिलाफ अपना वीटो इस्तेमाल करने की धमकी देगा, सुरक्षा परिषद किसी निश्चित टाइम टेबल से मुक्त समीक्षा प्रक्रिया का गठन कर देगा। अमेरिका चाहेगा कि इससे उसे वह समय और मौका मिल जाए कि वह अपनी कथित चौकड़ी- अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस और संयुक्त राष्ट्र— के बीच बातचीत को आगे बढ़ाए। लेकिन यह चौकड़ी तो अब तक सीमाओं, सुरक्षा, शरणार्थी तथा येरूशलम जैसे प्रश्नों पर वार्ता के लिए दिशा-निर्देश तय करने पर भी सहमति नहीं बना पाई है।

पश्चिम एशिया में कोई स्थायी शांति तभी आ सकती है, जब 1967 से पहले की सीमाओं में तथा अवैध रूप से इजरायल द्वारा कब्जाए गए भूभाग को खाली कराने के बाद एक फलस्तीन देश का गठन हो जाए, जिसकी राजधानी पूर्वी-येरूशलम हो।
सीताराम येचुरी

धरती पर बढ़ेंगे अभी और बलात्कार !!



शीर्षक पढ़कर चौंकिए नहीं क्योंकि तरह-तरह के अध्ययनों के अनुसार जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे दो बातें स्पष्टया साबित होती हैं, एक, धरती पर पुरुष-स्त्री का लिंगानुपात असामान्य रूप से असंतुलित होता जा रहा है, दूसरा, संचार के तमाम द्रुतगामी साधनों की बेतरह उपलब्धता के कारण आदमी जल्द ही व्यस्क होता जा रहा है, आदमी जहां पूर्व में इक्कीस-बाईस में, फिर सत्रह-अट्ठारह में, फिर पंद्रह-सोलह में और अब तेरह-चौदह वर्ष की उम्र में ही व्यस्क हो रहा है, जबकि लड़कियों में यह उम्र बारह-तेरह की निम्नतम स्तर को छु गयी है ! !
                इसका एक मात्र कारण आधुनिक युग के संचार के साधन हैं, जहां अब कुछ भी गोपन नहीं है, पहले जहां किसी प्रकार की कामुक सामग्री बहुत कठिनता से प्राप्त हुआ करती थी, वो भी छपी हुए रूप में, जिसे छिपाना अत्यंत असाध्य हुआ करता था, जिससे ऐसी सामग्री को घर में लाने से कोई किशोर डरा करता था, मगर अब किशोरों की तो क्या कहिये, बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाईल के रूप में चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाला ऐसा साधन उपलब्ध है, जिसके साथ कोई भी किस चीज़ का आदान-प्रदान कर रहा है, कोई नहीं जान सकता, क्योंकि देख-पढ़ लेने के बाद डीलीट करने के ऑप्शन के कारण आप कुछ भी चिन्हित नहीं कर सकते हो, दूसरी और किशोरों के हाथ में इंटरनेट नामक एक ऐसा हथियार आ चुका है, जिसे वो अपनी क्लास छोड़-छोड़ कर चाहे कितनी ही बार इस्तेमाल करने जा सकते हैं, जाते हैं.मगर अब तो यह मोबाईल में भी चौबीस घंटे उपलब्ध है ! ! आपने अपने बच्चों के हाथों में ऐसी चीज़ें उपलब्ध करवा दी हैं, जिसका उपयोग अब वो अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक अपना यौवन बढाने के लिए ही करते हैं, आप भी अब खुश हो जाईये कि अब आप अपने ही बच्चों का कुछ भी नहीं उखाड़सकते ! ! ऐसे शब्दों का उपयोग मैं इसी कारण कर रहा हूँ, क्यूंकि मैं देख पा रहा हूँ, कि आगे क्या तस्वीर उभर रही है, जिसे बदल पाना हमारे बस के बाहर है दोस्तों ! !
                धरती पर पुरुष-स्त्री के असंतुलित होते जाने के बरअक्श आप इस तस्वीर को सामने रखिये तो आपको इसकी भयावहता का अंदाजा लगेगा.एक तरफ कामुक होते किशोर तो दूसरी तरफ घटती स्त्री की आबादी, इन दोनों को एक साथ रखकर देखिये तो बात साफ़ हो जाती है.धरती पर पहले ही पुरुष द्वारा स्त्री पर जबरन किये जाने बलात्कारों की सीमा भयावहतम सीमा को पार कर चुकी है, जो अब रोजाना लाखों की संख्या में है, ऐसे में धरती पर आने वाले दिनों में स्त्री की अनुपलब्धता किस स्थिति को जन्म देने वाली है, इसकी कल्पना भी नहीं जा सकती ! ! बच्चे जब जल्द युवा होंगे तो उन्हें जल्द ही स्त्री भी चाहिए होगी, और क़ानून या समाज की उम्र की बंदिशें उन्हें यह करने से रोकेंगी, तब ऐसे में क्या होगा??
                  दोस्तों प्रकृति में जो भी कुछ है, वो एक-दुसरे के जीवन-यापन की ही एक भरपूर श्रृंखला है.इस श्रृंखला की अनेकानेक इकाईयों को आदमी अपनी कारस्तानियों के कारण मेट चुका है, मगर अब अपनी ही जाति की व्याप्त बुराईयों की वजह से स्त्री को माँ के पेट में ही नष्ट कर देता है, यह उसकी इस  थेथरई का ही परिचायक है, कि हम अपने भीतर की बुराईयों को नहीं मिटाएंगे, जिसके कारण हम स्त्री को अजन्मा ही मार डालते हैं, बल्कि स्त्री को ही मार डालेंगे! ! सच भी है, ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसूरी...! !
         मगर ओ पागल धरतीवासियों मगर इसी बांसूरी को बजाने के कारण ही तुम्हें सुख भी मिल रहा है, साथ ही धरती भी चल रही है, और तुर्रा यह कि यह सुख तुम्हें शायद चौबीसों घंटे भी मिले तो तुम अघा ना पाओ, तब तो ओ पागल लोगों इस बात को तुम समझो कि इस सुख को पाने के लिए, जिसके लिए ना जाने तुम कितने ही तरह के धत्त्करम करते चलते हो, ना जाने कितने झूठ बोलते हो, धूर्ततायें करते हो, जिस सुख की खातिर तुम्हारे मनीषी, साधू-पादरी और ना जाने कौन-कौन से महापुरुष अपना सम्मान विगलित कर गए! ! उसके अनिवार्य माध्यम को मिटा देना तुम्हारी कौन सी समझदारी है, यह तो बताओ ! ! ??
                 प्रकृति में हर-एक चीज़ के होने का कोई-ना-कोई कारण है, उसकी उपादेयता है तथा उसके ना होने से व्यापक हानि भी है, स्त्री के सम्मान-वम्माम को तो मारो गोली, वह तो पता नहीं आदमी कब सीख पायेगा, किन्तु एक जैविक तत्व होने के नाते भर से भी स्त्री की उपादेयता को आदमी अगर ईमानदारी-पूर्वक  समझ भर भी ले तो वह इस अपने लिए इस अनिवार्य जैविक के ना होने से होने वाले नुक्सान को समझ पाने में भी सक्षम नहीं है क्या यह सभ्य-सु-संस्कृत सु-शिक्षित आधुनिक इन्सान..??! ! अगर हाँ, तो समस्या का निदान नहीं ही है, ऐसा ही समझिये...मगर मैं तो यह जोड़ना चाहूंगा कि ऐसे आदमी को गधा कहना गधे का भी अपमान होगा....आप क्या कहते हैं दोस्तों....??कुछ आप भी कहिये ना..?? 

अमेरिका पोषित ‘इस्लाम’ का कहर



अमेरिका उन लोगों को खत्म करना चाहता है, जिन्होंने अफगानिस्तान से रूस को बाहर निकालने में उसकी मदद की थी। वह उस ‘इस्लाम’ से परेशान हो गया है, जो उसने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से अफगानिस्तान के बच्चों को घुट्टी में पिलाया था। जब उसका पढ़ाया इस्लाम उसका ही दुश्मन बन गया है, तो वह पाकिस्तान से कह रहा है कि वह हक्कानी नेटवर्क खत्म करने में उसकी मदद करे। पाकिस्तान ने भी अमेरिका को आंखें दिखाते हुए अमेरिका के फरमान को यह कहकर मानने से इंकार कर दिया है कि हक्कानी नेटवर्क उसका ही पाला-पोसा हुआ है। बात यहां तक बिगड़नी शुरू हो गई कि यदि अमेरिका स्वयं वजीरिस्तान में सैनिक कार्रवाई करता है, तो पाकिस्तान उसका जवाब देगा।
अमेरिका ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के लिए जिन लोगों को तैयार किया था, वे आज न केवल पाकिस्तान और अमेरिका के लिए, बल्कि भारत के लिए भी बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। जिस तरह से पाकिस्तान में आतंकवादी मसजिदों और जनाजों पर गोलियां और बम बरसाकर लोगों को हलाक कर हैं, ये हरकत किसी ऐसे गुट की नहीं हो सकती, जो अपने आप को इस्लाम का अनुयायी कहता है। ये सरासर गैरइसलामी हरकतें हैं। जो इस्लाम पड़ोसी के भूखा रहने पर खाना हराम बताता हो, इस्लाम शिक्षा के लिए चीन तक जाने की बात करता हो, औरतों की इज्जत करने की हिदायत देता है। सबसे बड़ी बात यह कि इस्लाम एक बेगुनाह के कत्ल को पूरी इंसानियत का कत्ल बताता है, उस इस्लाम के बारे में कुछ लोगों की करतूतों से पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि यह एक दकियानूसी और खून-खराबे वाला धर्म है। जेहाद के बारे में बता दिया गया है कि मानव बम बनकर लोगों को मारोगे, तो सीधे ‘जन्नत’ मिलेगी। उन मासूमों को क्या पता कि बेगुनाह लोगों का खून बहाओगे, तो जन्नत नहीं, ‘दोजख’ की आग मिलेगी। अमेरिका ने जो इस्लाम पढ़ाया, वह अब इतना ताकतवर हो गया है कि पाकिस्तानी फौज तो पस्त हो ही गई है, अमेरिका और यूरोप भी परेशान हैं। अफगानिस्तान से फारिग होने के बाद अमेरिका द्वारा तैयार किए आतंकवादियों का रुख वहां भी हुआ, जो यह समझते थे कि हम सात समंदर पार हैं, इसलिए महफूज हैं। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका का यह गुरूर भी टूटा।
इधर, जब नब्बे के दशक की शुरुआत में सोवियत यूनियन का मर्सिया पढ़ा जा रहा था, तो भारत में बाबरी-मसजिद और राममंदिर आंदोलन के चलते सांप्रदायिकता पूरे उभार पर थी, जिसकी परिणति बाबरी मसजिद विध्वंस और खूनी सांप्रदायिक दंगों के रूप में हुई। अमेरिकी पोषित आतंकवादियों का मुंह भारत की ओर हुआ और उन्हें खून खराबे करने के तर्क के रूप में बाबरी मसजिद विध्वंस और बाद में गुजरात दंगा मिल गया।
मुंबई के आतंकी हमलावरों ने जब ताज होटल में बेकसूरों को बंधक बनाया था, तो बंधकों में से एक ने हिम्मत करके पूछा था, ‘तुम लोग ऐसा क्यों कर रहे हो ?’ इस पर एक आतंकी ने कहा था, ‘क्या तुमने बाबरी मसजिद का नाम नहीं सुना? क्या तुमने गुजरात के बारे में नहीं सुना?’ दरअसल, आतंकी बाबरी मसजिद और गुजरात का हवाला देकर अपनी नापाक हरकत को पाक ठहराने का कुतर्क दे रहे थे। इन आतंकियों को पता होना चाहिए कि जिन बेकसूर को उन्होंने निशाना बनाया था, वे बाबरी मसजिद विध्वंस और गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार नहीं थे? भारतीय मुसलमानों की हमदर्दी का नाटक करने वाले आतंकी संगठन क्या इस तरह से फायरिंग करते हैं या बमों को प्लांट करते हैं, जिससे मुसलमान बच जाएं और दूसरे समुदाय के लोग मारे जाएं? मुंबई हमलों में ही 40 मुसलमानों ने अपनी जान गंवाई थी और 70 के लगभग घायल हुए थे। बेगुनाहों को निशाना बनाकर बाबरी मसजिद और गुजरात का कैसा बदला लिया जाता है, यह समझ से बाहर है। और यह भी कि कौन-सा इस्लाम इस बात की इजाजत देता है? पाकिस्तान में नमाजियों से भरी मसिजद को बमों से उड़ाकर कौन सी मसजिद विध्वंस का बदला लिया जाता है? आत्मघाती हमलों में बेकसूर लोगों की जान लेकर किस गुजरात का बदला लिया जाता है?
अब अमेरिका को समझ में आ रहा है कि जो भस्मासुर उसने सोवियत यूनियन के लिए तैयार किया था, उसका रुख अब पूरी दुनिया के ओर हो गया है। इस भस्मासुर को तैयार करने में मदद करने वाला पाकिस्तान भी अब दोराहे पर खड़ा है। उसके लिए ‘इधर कुआं, उधर खाई’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यदि वह हक्कानी गुट के सफाए के लिए आगे आता है, तो आतंकवादी उसका जीना हराम कर देंगे। नहीं करता है, तो अमेरिका आगे आने लिए तैयार है। बहुत दिनों से यह बात की जा रही है कि अमेरिका के निशाने पर अब पाकिस्तान है, लेकिन अमेरिका फिलहाल इराक और अफगानिस्तान में उलझा हुआ है, इसलिए पाकिस्तान उसे आंखें दिखा रहा है, लेकिन बकरे मां कब तक खैर मनाएगी?