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Wednesday, February 20, 2013

अफजल को सजा जुर्म नहीं, उसके पहचान की मिली



afzal_guru_reutersयह सच है कि अफजल गुरु को देश के सर्वोच्च न्यायालय से सजा हुई थी। लेकिन इसी सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में माना है कि पिछले दिनों कम से कम 14 मामले ऐसे रहे जिनमें फांसी की गलत सजा सुनाई गई। देश के 14 महत्वपूर्ण जजों ने इसीलिए बाकायदा पत्र लिखकर राष्ट्रपति से अपील की कि इन फैसलों को उम्रकैद में बदला जाए।
अफजल के मामले में ऐसी कोई अपील नहीं हुई हालांकि उसके मामले की असंगतियां सबसे प्रखरता से दिखती रहीं। अदालत ने भी माना कि पुलिस ने मामले की ठीक से जांच नहीं की। इंदिरा जयसिंह और नंदिता हक्सर जैसी वकीलों ने कहा कि अगर अफजल को कायदे का वकील मिल गया होता तो उसे फांसी नहीं होती। उसे वकील तक नहीं मिला क्योंकि वकीलों ने तय कर रखा था कि संसद पर हमले के आरोपितों को वे कोई कानूनी मदद नहीं देंगे। एक तरह से यह पुलिस के लिए सुनहरा मौका था कि वह जिसे चाहती उसे संसद भवन का आरोपित बना डालती। इन सबके बावजूद सरकार ने राष्ट्रपति को यही सलाह दी कि वे उसकी माफी याचिका खारिज कर दें। जाहिर है, अफजल को सजा उस जुर्म की नहीं मिली जो उसने किया, उस पहचान की मिली जो उस पर थोप दी गई- एक आतंकवादी की पहचान, जिसने देश की संप्रभुता पर हमला किया। यह पहचान उस पर चिपकाना इसलिए भी आसान हो गया कि वह मुसलमान था, कश्मीरी था और ऐसा भटका हुआ नौजवान था जिसने आत्मसमर्पण किया था।

यह सवाल बेमानी नहीं है कि अफजल गुरु को लेकर नफरत भरी जो राष्ट्रवादी आंधी दिखती रही, क्या उसके पीछे उसकी इस पहचान का भी हाथ था। वरना जो बीजेपी यह मासूम तर्क देती है कि आतंकवादियों से बिल्कुल आतंकवादियों की तरह निपटा जाना चाहिए, उनका मजहब नहीं देखा जाना चाहिए, वही पंजाब में अदालत द्वारा सजायाफ्ता एक ऐसे आतंकवादी को बचाने के काम में अकाली दल के साथ शामिल होती है जो खुलेआम कहता है कि वह न भारतीय लोकतंत्र पर भरोसा करता है और न भारतीय न्यायतंत्र पर। यह मामला बलवंत सिंह राजोआना का है जो बेअंत सिंह की हत्या का मुख्य अभियुक्त है। उसे न अपने किए पर कोई पछतावा है और न ही अपने रवैये पर कोई संदेह। लेकिन अफजल के मामले में देरी की शिकायत कर रही बीजेपी राजोआना के मामले में जैसे आंखें मूंदे बैठी है।

इस मामले में सरकार का घुटनाटेकू या अवसरवादी रवैया ज्यादा अफसोसनाक रहा। जिस दौर में फांसी पर पुनर्विचार की बहस सबसे तीखी है, उस समय अफजल को फांसी पर चढ़ा दिया गया। क्या इसलिए कि सरकार को बीजेपी के उग्र राष्ट्रवाद का एक सटीक राजनीतिक जवाब देना था? या इसलिए कि 2014 के चुनाव आने से पहले उसे महंगाई, भ्रष्टाचार और गैरबराबरी का मुकाबला करने में अपनी नाकामी की तरफ से जनता का ध्यान खींचना था?

अफजल की फांसी से वे लोग पुनर्जीवित नहीं होने वाले हैं जिन्हें 13 दिसंबर, 2001 की सुबह संसद परिसर पर हमले के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी। मृत्यु अंततः सब कुछ हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर देती है। लेकिन राजनीति मातम की भी दुकान लगा लेती है। जो परिवार आतंकवाद या ऐसे किसी भी हादसे के शिकार होते हैं, उनके दिमाग में प्रतिशोध कूट-कूट कर भरा जाता है, इस प्रतिशोध में दिखने वाली अमानवीयता को देशभक्ति के मुलम्मे से ढका जाता है, उनके जख्मों को हरा रखा जाता है ताकि उनका राजनीतिक इस्तेमाल हो सके।

अंततः इन सबसे एक ऐसे अंधराष्ट्रवाद का निर्माण होता है जो बेईमान और तानाशाह प्रवृत्तियों को सबसे ज्यादा रास आता है क्योंकि इसके बाद हर असुविधाजनक सवाल गद्दारी में बदल जाता है, हर संशय को देशद्रोह करार दिया जाता है और हर असहमति पर एक सजा नियत कर दी जाती है, जिसे कोई भी सड़कछाप संगठन अमल में लाने को तैयार रहता है और व्यवस्था उसके संरक्षण में जुटी रहती है।

अफजल के मामले में भी यही होता दिख रहा है। जिन लोगों ने इस फांसी का विरोध करने की लोकतांत्रिक कोशिश की, उनके चेहरों पर पुलिस की मौजूदगी में कालिख पोती गई। अमन-चैन कायम रखने के नाम पर नागरिकों को नजरबंद किया गया, एक पूरे राज्य का केबल-मोबाइल नेटवर्क ठप कर दिया गया, वहां कर्फ्यू लगा दिया गया। कैसे कोई यह पूछने की हिम्मत दिखाए कि इस फैसले से कश्मीर करीब आया या कुछ और दूर चला गया? कैसे कोई इस दावे पर सवाल उठाए कि यह आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ी जीत है? कैसे कोई याद दिलाए कि हमारे लोकतंत्र में न्याय के वास्तविक तकाजे अभी बाकी हैं? कैसे कोई पूछे कि 1984 की सिख विरोधी हिंसा में मारे गए 3000 लोगों और 2002 के गुजरात में मारे गए 2000 लोगों की मौत का भी कोई इंसाफ होगा या नहीं?

यह सब पूछना देशद्रोह है- यह बताना भी कि अपने आप को सख्त राज्य साबित करने में जुटी सरकार दरअसल अपनी असली चुनौतियों से आंख चुरा रही है। आतंकवाद से लड़ने के लिए पुलिस तंत्र, खुफिया तंत्र और न्याय तंत्र में जो बदलाव जरूरी हैं उनका दूर-दूर तक कुछ अता-पता नहीं है। हम एक तार-तार सुरक्षा वाली व्यवस्था में रह रहे हैं जिसका फायदा कोई भी उठा सकता है। इस व्यवस्था को सुधारने की जगह, उसे अचूक और अभेद्य बनाने की जगह, सरकार अफजल को फांसी पर चढ़ाकर वाहवाही लूटने में लगी है।

हकीकत यह है कि भारत न सख्त राज्य है न नरम राज्य, यह एक नाकाबिल राज्य है जो अपना निकम्मापन ढकने के लिए फांसी का इस्तेमाल कर रहा है।

(प्रियदर्शन एनडीटीवी इंडिया में वरिष्‍ठ संपादक। जनसत्ता में सहायक संपादक रहे। कहानियां और कविताएं लिखते हैं। अखबारों में यदा-कदा वैचारिक टिप्‍पणियां भी। तहलका में नियमित स्‍तंभ लेखन । यह लेख तहलका हिंदी से साभार। उनसे priyadarshan.parag@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Thursday, February 14, 2013

अफज़ल गुरु से एक मुलाकात



हिंदी मीडिया में पहली बार प्रकाशित
तिहाड़ जेल से अफ़ज़ल गुरु का लिया गया पहला साक्षात्कार
अफज़ल गुरु से विनोद के जोसे की विशेष बातचीत

आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि मेरा बेटा एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है...अनुवाद- अजय प्रकाश और विश्वदीपक

तिहाड़ जेल में करीब 4.30 बजे मेरी मुलाकात की बारी आई. एक वर्दीधारी ने मेरा ऊपर से नीचे तक परीक्षण किया. जब मेटल डिटेक्टर चीं-चीं की आवाज करने लगा तब मुझे बेल्ट, स्टील की घड़ी और चाबियों को निकालने के लिए कहा गया. उस वक्त ड्यूटी में तैनात तामिलनाडु स्पेशल पुलिस का वह जवान मेरी जाँच के बाद संतुष्ट लग रहा था. अब मुझे अंदर जाने की इजाजत दे दी गई थी. ये चौथी बार था जब तिहाड़ सेंट्र्ल जेल के अति खतरनाक वार्ड के जेल नंबर तीन में जाने के लिए सुरक्षा जांच की गई थी. मैं उस वक्त मोहम्मद अफजल से मिलने जा रहा था, जो उस दौर की चर्चाओं में सर्वाधिक था.
मैं एक ऐसे कमरे में दाखिल हुआ, जहां कई क्यूबिकल बने हुए थे. एक मोटा कांच और लोहे की सलाखें कैदियों को मुलाकातियों से अलग करती थीं. दीवार पर चस्पां एक माइक्रोफोन के जरिए मुलाकाती और कैदी एक दूसरे के संपर्क में आते थे. हालांकि माइक्रोफोन की आवाज घटिया थी. मुलाकाती और कैदी को एक दूसरे की बात समझने के लिए दीवार से कान लगाना पड़ता था. मैंने देखा कि क्यूबिकल से दूसरी ओर मोहम्मद अफजल पहले से ही खड़ा था. उसके चेहरे पर गरिमा और शांति की झलक थी. दुबली पतली काया, नाटे कद और जेब में रेनाल्ड का पेन रखे हुए अफजल की उम्र उस वक्त पैंतीस के आसपास रही होगी.

अफजल ने उस दिन सफेद कुर्ता पायजामा पहन रखा था.बेहद विनम्रता से भरी हुए एक स्पष्ट आवाज ने मेरा स्वागत किया- 'कैसे हैं श्रीमान.'मैंने कहा, “अच्छा हूं”. क्या मुझे बदले में मौत के दरवाजे पर खड़े उस इंसान से भी यही सवाल पूछना चाहिए. कुछ देर के लिए मैं सोच में पड़ गया, लेकिन अगले ही पल मैंने पूछ ही लिया. “शुक्रिया! मैं एकदम ठीक हूं”-- उसने जवाब दिया. अफजल से मेरी ये मुलाकात उस दिन करीब एक घंटा और (पंद्रह दिन के अंतराल के बाद) दूसरी मुलाकात तक चली. हम दोनों को पूछने और जानने की जल्दी थी. मैं लगातार अपनी छोटी डायरी में लिखता रहता था. उसे देखकर ऐसा लगा जैसे वो दुनिया से बहुत कुछ कहना चाहता था. लेकिन बारंबार वो लोगों से अपनी बात न कह पाने की असहायता जाहिर करता था. पेश है उससे बातचीत के अंश -
afzal-guru
एक अफजल के कई चेहरे हैं. मैं किस अफजल से मिल रहा हूं?
क्या वाकई ऐसा है. जहां तक मेरा सवाल है मैं एक ही अफजल को जानता हूं. और वो मैं ही हूं. दूसरा अफजल कौन है. (थोड़ी चुप्पी के बाद) अफजल एक युवा है, उत्साह से भरा हुआ है, बुद्धिमान और आदर्शवादी युवक है.नब्बे के दशक में जैसा कि कश्मीर घाटी के हजारों युवक उस दौर की राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित हो रहे थे वो (अफजल) भी हुआ. वो जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का सदस्य था और सीमा पर दूसरी ओर चला गया था. लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद वो भ्रम का शिकार हो गया और उसने सीमा पार की और वापस इस तरफ आ गया. और एक सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करने लगा, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. वो मुझे बार-बार उठाते रहे. प्रताड़ित करके मेरा भुर्ता बना दिया, बिजली के झटके दिए गए, ठंडे पानी में जमा दिया गया, मिर्च सुंघाया गया...और एक फर्जी केस में फंसा दिया गया. मुझे न तो वकील मिला, न ही निष्पक्ष तरीके से मेरा ट्रायल किया गया. और आखिर में मुझे मौत की सजा सुना दी गई. पुलिस के झूठे दावों को मीडिया ने खूब प्रचारित किया और सुप्रीम कोर्ट की भाषा में जिसे देश की सामूहिक चेतना कहते हैं वो मीडिया की ही तैयार की हुई है. देश की उसी सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने के लिए मुझे मौत की सजा सुनाई गई. मैं वही मोहम्मद अफजल हूं, जिससे आप मुलाकात कर रहे हैं.
(फिर थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोलना जारी) मुझे शक है कि बाहर की दुनिया को इस अफजल के बारे में कुछ भी पता है या नहीं. मैं आपसे ही पूछना चाहता हूं कि क्या मुझे मेरी कहानी कहने का मौका दिया गया? क्या आपको भी लगता है कि न्याय हुआ है? क्या आप एक इंसान को बिना वकील दिए हुए ही फांसी पर टांगना पसंद करेंगे?बिना निष्पक्ष कार्रवाई के, बिना ये जाने हुए कि उसकी जिंदगी में क्या कुछ हुआ? क्या लोकतंत्र का यही मतलब है?

क्या हम आपकी उस जिंदगी के बारे में बात करें जो केस शुरू होने से पहले थी?
वो दौर कश्मीर में भयानक उथल पुथल का था, जब मैं बड़ा हो रहा था. मकबूब भट्ट को सूली पर चढ़ाया जा चुका था. स्थिति काफी विस्फोटक थी. कश्मीर के लोगों ने शांति के रास्ते से चुनाव लड़कर कश्मीर का मसला सुलझाने की कोशिश की थी. कश्मीर मसले के अंतिम समाधान के लिए, कश्मीर के लोगों की भावनाओं को बयान करने के लिए मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट बनाया गया था. लेकिन दिल्ली में बैठी सरकार एमयूएफ को मिल रहे समर्थन से भयभीत हो गई थी. और इसका अंजाम ये हुआ कि लोगों ने चुनाव में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन जिन नेताओं ने चुनाव में भारी मतों से जीत हासिल की उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उनका अपमान किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया. इसी घटना के बाद उन्हीं नेताओं ने हथियार बंद संघर्ष का आह्वान किया. हजारों युवाओं ने हथियार बंद विद्रोह का रास्ता चुना. झेलम मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर में मैंने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ दी. मैं उन लोगों में से भी था, जिन्होंने जेकेएलएफ के सदस्य के तौर पर सीमा पार की थी, लेकिन जब मैंने देखा कि पाकिस्तान के नेता भी कश्मीर के मसले पर उसी तरह का (दोहरा) रवैया रखते हैं जैसे भारत के तो मैं भ्रम का शिकार हो गया. कुछ सप्ताह बाद मैं वापस आ गया. मैंने सुरक्षा कर्मियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. मुझे बीएसएफ ने आत्मसमर्पण किए हुए आतंकी का सर्टिफिकेट भी दिया. मैंने अपनी सामान्य जिंदगी शुरू कर दी. मैं डॉक्टर तो नहीं बन सका लेकिन मैं दवाओं का डीलर जरूर बन गया. इसके बदले में मुझे कमीशन मिलता था. (हंसी)
अपनी छोटी सी ही कमाई के सहारे मैंने एक स्कूटर खरीद ली और मैंने शादी भी कर ली. इस दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब राष्ट्रीय राइफल्स और एसटीएफ के जवानों ने मुझे प्रताड़ित न किया हो. अगर कश्मीर में कहीं भी आंतकी हमला होता तो वो नागरिकों को पकड़ते और उन्हें प्रताड़ित करते. मुझ जैसे आतंकवादियों ने जिसने समर्पण कर दिया था, उनकी स्थिति तो और भी खराब थी. वो हमें कई हफ्तों के लिए बंद कर देते, झूठे केस में फंसा देने की धमकी देते और हम तभी छूटते जब हम उन्हें घूस के रूप में मोटी रकम देते. मेरे साथ तो ऐसा कई बार हुआ है. 22 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर राम मोहन रॉय ने तो मेरे गुप्तांगों तक में करंट लगवाया. कई बार मुझसे वो लोग उनके पखाने और कैंपस तक साफ करवाते थे. हुमहामा में मौजूद एसटीएफ के प्रताड़ना शिविर से बचने के लिए तो मैंने बकायदा एक बार सुरक्षा कर्मियों को घूस तक दिया था. डीएसपी विनय गुप्ता और दविंदर सिंह की देख रेख में मुझे प्रताड़ित किया गया. प्रताड़ित करने में माहिर इंस्पेक्टर शांति सिंह ने एक बार मुझे तीन घंटे तक प्रताड़ित किया. और वो तब तक ऐसा करता रहा जब तक मैं एक लाख बतौर घूस देने के लिए तैयार नहीं हो गया. रकम पूरी करने के लिए मेरी पत्नी ने अपने जेवर बेच दिए. मुझे अपनी स्कूटर भी बेचनी पड़ी. जब मैं प्रताड़ना शिविर से बाहर निकला तब तक मैं मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुका था. छह महीने तक मैं घर के बाहर नहीं निकल सका क्योंकि मैं अंग भंग हो गया था. मैं अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर भी नहीं जा सकता था क्योंकि मेरे गुप्तांगों को बिजली के झटके दिए गए थे. इसके इलाज के लिए मुझे दवाईयां खानी पड़ी...
(जब अफजल ये सब बता रहा था तो उसके चेहरे की शांति भंग हो चुकी थी. ऐसा लगता था जैसे उसके पास मुझे बताने के लिए ज्यादा से ज्यादा बातें हैं, लेकिन मेरे टैक्स के पैसे से चलने वाली सुरक्षा एजेंसियों की प्रताड़ना की इतनी कहानियां सुनने मैं असमर्थ था. मैंने बीच में ही उसे टोक दिया...)

अगर आप केस के बारे में बात कर सकें तो बताएं...वो कौन सी घटनाएं थीं, जिनके बाद संसद पर हमला हुआ ?
आखिरकार एसटीएफ कैंप में (प्रताड़ना के बाद) मैं ये सीख चुका था कि आप चाहे एसटीएफ का सहयोग करें या विरोध आप या आपके परिवार वालों को परेशान होना ही है. मेरे पास शायद ही कोई विकल्प था. डीसीपी दविंदर सिंह ने मुझसे कश्मीर में कहा कि तुम्हें दिल्ली में एक छोटा सा काम करना है. ये उसके लिए "छोटा सा काम" था. दविंदर सिंह ने मुझे कहा कि मुझे एक आदमी को दिल्ली लेकर जाना है और उसके लिए किराए का ठिकाना खोजना था. मैं उस आदमी से पहली बार मिला था. चूंकि वो कश्मीरी नहीं बोल रहा था, इसलिए मुझे लगा कि वो आदमी बाहरी था. उसी ने मुझे बताया कि उसका नाम मोहम्मद था. (पुलिस ने मोहम्मद की पहचान संसद पर हमला करने वाले पांचों आतंकिवादियों के नेता के अगुवा के तौर पर की है. पांचों आतंकवादी हमले में मारे गए थे.) जब हम दिल्ली में थे, तब मुझे और मोहम्मद दोनों को दविंदर सिंह फोन करता था. मैंने नोटिस किया कि मोहम्मद दिल्ली में कई लोगों से मिलता था. जब उसने एक कार खरीद ली तब उसने मुझे उपहार के तौर पर 35 हजार रुपये दिए. इसके बाद मैं ईद का त्यौहार मनाने कश्मीर चला गया. जब मैं श्री नगर बस स्टैंड से सोपोर रवाना होने वाला था, तब मुझे गिरफ्तार कर लिया गया और परिमपोरा थाने ले जाया गया. वहां मुझे प्रताड़ित किया गया. इसके बाद वो लोग मुझे एसटीएफ हेडक्वार्टर ले गए और वहां से मुझे दिल्ली लाए. दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के प्रताड़ना शिविर में मैंने उन लोगों को वो सब कुछ बताया जो मोहम्मद के बारे में मुझे पता था. लेकिन वो लोग मुझे ये मनवाने पर अड़े थे कि मेरा चचेरा भाई शौकत, उसकी पत्नी नवजोत और एसएआर गिलानी के साथ मैं ही संसद हमले का जिम्मेदार था.
वो चाहते थे कि ये बात मैं पूरी दृढ़ता से मीडिया के सामने कहूं. हालांकि मैंने इसका विरोध किया. लेकिन मेरे पास कोई विकल्प ही नहीं था. मेरा परिवार उन लोगों की गिरफ्त में था. मुझसे सादे कागज में दस्तखत कराए गए और कहा गया कि मुझे मीडिया से बात करनी है. मुझसे जबरन वही बातें कहलवाई गईं जो पुलिस मुझे पहले से ही रटा चुकी थी. इसमें संसद पर हमले की जिम्मेदारी लेना भी शामिल था. जब एक पत्रकार ने मुझसे एसएआर गिलानी के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि वो निर्दोष है. तब एसीपी राजबीर सिंह भरी मीडिया के सामने चिल्ला उठा. वो लोग मुझसे इस बात के लिए नाराज थे कि मैंने उनकी सिखाई हुई बातों से अलग भी कुछ कह दिया था. उस वक्त राजबीर सिंह ने पत्रकारों से गिलानी को निर्दोष ठहराने वाली मेरी बाइट न चलाने के लिए भी कहा था.
अगले दिन राजबीर सिंह ने मुझे मेरी बीबी से बात करने की इजाजत दी. साथ ही उन्होंने धमकी भी दी कि अगर तुम अपनी बीबी का जीवित देखना चाहते हो तो हम जैसा कहते हैं वैसा करो. ऐसे में मेरे सामने एक ही विकल्प था कि मुझपर लगाये गये आरोपों को मैं स्वीकार कर लूं. दिल्ली स्पेशल सेल की टीम ने मुझसे यह भी कहा कि जैसा हम चाहते हैं तुम आरोपों को उसी तरह स्वीकार कर लेते हो तो तुम्हारे मुकदमे को हम कमजोर कर देंगे और मुझे जल्द ही रिहा कर दिया जायेगा. उसके बाद वे मुझे कई उन जगहों और बाजारों में ले गये जहां से मोहम्मद ने सामान खरीदे थे. इन सबको बाद में पुलिस ने सबूत बतौर पर पेश किया.
मैं कह सकता हूं कि जब दिल्ली पुलिस संसद हमले के मुख्य साजिशकर्ता को पकड़ने में नाकाम रही, तो उसने अपना मुंह छुपाने के लिए मेरा इस्तेमाल किया और मैं बलि का बकरा बना. पुलिस ने लोगों को मूर्ख बनाया. लोगों को आज भी नहीं पता कि संसद पर हमले की योजना किसकी थी. मैं पहले एक मामले में कश्मीर एसटीएफ की जाल में फंसाया गया और फिर उसी का दोहराव दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने किया.
मीडिया लगातार उस टेप को प्रसारित कर रहा है, पुलिस अधिकारी पुरस्कृत हो रहे हैं और मैं मौत का सजायाफ्ता.

आपको अबतक कानूनी मदद क्यों नहीं मिल सकी?
मुझे कभी मौका मिलता तब तो. मैंने ट्रायल के छह महीने तक अपने परिवार वालों को नहीं देखा. और जब एक बार सुनवाई के दौरान पटियाला कोर्ट में देखा भी, तो बहुत कम समय के लिए. मुझे कोई नहीं मिला जो मेरे लिए एक अदद वकील का इंतजाम करता. इस देश में किसी को भी कानूनी अधिकार पाने का मौलिक हक है, इस उम्मीद से मैंने चार वकीलों को नाम बताया, जिनसे मुझे उम्मीद थी कि वह मेरा केस लड़ सकते हैं. लेकिन एसएन ढिंगरा ने बताया कि सभी चार वकीलों ने मेरा मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया है. मेरे लिए अदालत ने जो वकील नियुक्त किया, वह मुकदमे की सुनवाई के दौरान कुछ पेंचीदे दस्तावेज पेश करने लगीं, वह भी मुझसे पूछे बिना कि मामले का सच क्या है? उन्होंने मेरे मुकदमे की ठीक से पैरवी नहीं की और मेरी पैरवी छोड़ इस मामले के दूसरे आरोपी का मुकदमा लड़ने लगीं. फिर अदालत ने एक एमीकस क्यूरी (अदालत का मददगार) की नियुक्ति की, जो मेरा बचाव नहीं करते थे, बल्कि इस मामले में अदालत को मदद देते थे. मेरे लिए नियुक्त एमीकस क्यूरी मुझसे कभी नहीं मिले. उन्होंने मुझसे हमेशा एक दुश्मन की तरह बर्ताव किया, वे बेहद सांप्रदायिक थे. मैं कह सकता हूं कि ट्रायल की स्थिति में मेरा पक्ष सिरे से रखा ही नहीं गया.
इस मामले की सच्चाई यही है कि ऐसे संवदेनशील केस में पैरवी के लिए एक वकील नहीं था. किसी मुकदमे में वकील के न होने का क्या मतलब होता है, यह कोई भी समझ सकता है. अगर सरकार मुझे फांसी पर ही लटकाना चाहती है तो ऐसे लंबी उबाऊ कानूनी प्रक्रिया का मेरे लिए कोई मतलब नहीं है.

आप दुनिया से क्या अपील करना चाहते हैं?
मेरे पास कुछ खास अपील करने को नहीं है. मुझे जो कहना है वह भारत के राष्ट्रपति को भेजी याचिका में कह दिया है. मैं सिर्फ सीधी सी बात यह कहना चाहता हूं कि अंधराष्ट्रवाद और गलत समझदारी के फेर में पड़कर अपने ही देश के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को नहीं छीनना चाहिए. इस मामले के दूसरे आरोपी एसएआर गिलानी (अब बरी) की उस बात को मैं याद दिलाना चाहता हूं, जब उन्हें ट्रायल कोर्ट ने फांसी की सजा मुकर्रर की. उन्होंने कहा था, शांति, न्याय से बहाल होती है. जहां न्याय नहीं है वहां शांति नहीं होगी.’ कुल मिलाकर मैं भी यही कहना चाहता हूं. अगर वह चाहते हैं तो मुझे फांसी पर लटका दें, लेकिन याद रखें कि यह भारतीय न्यायिक और राजनीतिक तंत्र पर एक काला धब्बा होगा.

जेल में आपकी क्या स्थिति है?
मुझे अत्यधिक निगरानी के बीच अकेले एक कालकोठरी में रखा गया है. मैं अपनी कालकोठरी से दोहपर में बहुत कम समय के लिए बाहर आ पाता हूं. रेडियो, टेलीविजन की मेरे लिए मनाही है. यहां तक कि मुझे अखबार फाड़कर पढ़ने को दिया जाता है. अखबारों में मेरे बारे में जो खबर छपती है, उसे पूरे तौर पर फाड़ दिया जाता है.

भविष्य की अनिश्चितता के बीच समाज को लेकर आपकी मुख्य चिंताएं क्या हैं?
हां, बहुत सारी चीजों से मेरे सरोकार जुड़े हुए हैं. भारत की विभिन्न जेलों में कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले लोग बिना वकीलों के, बगैर ट्रायल के बंद हैं. उन्हें कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है. कश्मीरी नागरिकों की हालत भी इससे अलग नहीं है. घाटी अपने आप में एक खुली जेल है. हर रोज फर्जी मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं, लेकिन यह सिर्फ कुछेक उदाहरण भर हैं. कश्मीर के पास सबकुछ है, मगर आप उसे एक शिष्ट समाज के रूप में देखना ही नहीं चाहते. कश्मीरी नागरिक यंत्रणाओं-प्रताड़नाओं के बीच जीते हैं, उन्हें मुश्किल से न्याय मिल पाता है.
इन सबके अलावा और भी बहुत सारी बातें मेरे दिगाम में आती हैं. विस्थापित हो रहे किसानों की समस्या और दिल्ली में सील कर दिये गये दुकानदारों की हालत भी मुझे परेशानन करती हैं. देश में बहुत तरीके से अन्याय हो रहे हैं, जिन्हें देखा जा सकता है, चिन्हित किया जा सकता है, लेकिन इसके खिलाफ कुछ किया नहीं जा सकता. कल्पना नहीं कर सकते कि कितने हजारों लोगों की जिन्दगी, उनके परिवार इसकी जद में आ रहे हैं. ये तमाम चीजें मुझे परेशान करती हैं.
थोड़ा सोचते हुए-
दुनिया में हो रहे भूमंडलीय विकास के बारे में भी मैं सोचता हूं. मैंने सद्दाम की फांसी के बारे में सुना तो मुझे बहुत दुख हुआ. ये सोचकर स्तब्ध रह गया कि क्या अन्याय इतना सरेआम और बेशर्मी से किया जा सकता है. दुनिया की महान सभ्यता ‘मेसोपोटामिया’ की भूमि ईराक, जिसने हमें साठ मिनट का घंटा दिया, चौबीस घंटे और 360 डिग्री का ज्ञान दिया उसे अमेरिका ने धूल-धूसरित कर दिया. अमेरिका तमाम सभ्यताओं और मूल्यों को नष्ट कर रहा है. आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का यह तथाकथित युद्ध सिर्फ नफरत फैलाने और तबाही के लिए है.

आजकल आप कौन सी किताबों को पढ़ रहे हैं?
मैंने हाल ही में अरूंधति रॉय की किताब पढ़ी हैं. अब में सात्र का अस्तित्ववाद का सिद्धांत पढ़ रहा हूं. जेल की लाइब्रेरी में बहुत कम और साधारण किताबें हैं. इसलिए मैंने एसपीडीपीआर (सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ़ डिटेंनिज एंड प्रिजनर्स राइट) के सदस्यों से किताबों के लिए अपील की है.

एसपीडीआर आपके समर्थन में एक अभियान है न?
जी हाँ. उन हजारों लोगों का मैं तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जो मुझ पर हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़े हैं. इनमें वकील, छात्र, लेखक, बुद्धिजीवी और समाज के अन्य तबकों के तमाम लोग शामिल हैं. मेरी गिरफ्तारी दिसंबर 2001 के कई महीनों बाद तक मुझे लगता रहा कि शायद मेरे मामले में न्यायप्रिय लोग खड़े नहीं होंगे. लेकिन जब एसएआर गिलानी को इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बरी कर दिया तो लोगों ने पुलिसिया कहानी पर सवाल उठाने शुरू कर दिये. जैसे-जैसे लोगों को इस कहानी का झूठ पता चला वे न्याय के पक्ष में खड़े हो आवाज उठाने लगे. अब लोग मेरे पक्ष में खुलकर आ रहे हैं और कह रहे हैं कि अफजल के साथ अन्याय हुआ है. यही सच भी है.

आपके परिजन मुकदमे को लेकर विरोधाभासी बयान दे रहे हैं?
मेरी बीबी लगातार कह रही है कि मुझे गलत ढंग से फंसाया गया है. उसने बहुत नजदीक से देखा है कि एसटीएफ मुझे किस तरह यंत्रणा देती थी. एसटीएफ ने मुझे कभी चैन से जीने नहीं दिया. मेरी बीबी यह भी अच्छी तरह जानती है कि इस मामले में मुझे किस तरह फंसाया गया. वह चाहती है कि मैं अपने बेटे गालिब को अपनी आंखों के सामने बढ़ते हुए देखूं. मेरे एक बड़े भाई भी हैं जो बखूबी जानते हैं कि एसटीएफ ने किस तरह मुझे दबाव में रखा और वे लगातार इसका विरोध करते रहे हैं. लेकिन अब वो मेरे मामले में कोई अलग बयान दें तो मैं क्या कह सकता हूं?
देखिये, कश्मीर में जो काउंटर इनसर्जेंसी के नाम पर ऑपरेशन किये जा रहे हैं उसने बहुत गंदा स्वरूप ले लिया है, जो भाई को भाई और पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ खड़ा कर रहा है. अपने गंदे इरादों से वे एक समाज को तोड़ रहे हैं. जहां तक मेरे समर्थन में किये जा रहे अभियानों का सवाल है तो मैंने सिर्फ एसपीडीपीआर से ही सहयोग की अपील की है और उन्हें ही अधिकृत मानता हूं. यह संस्था एसएआर गिलानी और कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा चलायी जाती है.

अपनी बीबी तबस्सुम और बेटे गालिब के बारे में सोचते हैं तो दिमाग में क्या ख्याल आते हैं?
हमारी शादी का यह दसवां साल है, जिसमें से आधा मैंने जेल में बिताया है. इससे पहले भी कई बार भारतीय सुरक्षाबलों ने कश्मीर में मुझे उठाया और पीड़ित किया. तबस्सुम मेरी शारीरिक और मानसिक यंत्रणाओं से बखूबी वाकिफ है. यंत्रणा कैंपों से लौटने के बाद कई बार मेरी हालत खड़े होने लायक नहीं रहती थी. शारीरिक प्रताड़ना के दौरन मेरे लिंग पर तक बिजली के झटके दिये जाते थे. तबस्सुम ने हमेशा मुझे जीने का साहस दिया. हम लोग एक दिन भी चैन से नहीं रहते थे. हालांकि यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, तमाम कश्मीरी जोड़ों की है. कश्मीरी घरों में भय का बने रहना जीवन का सबसे प्रभावी अहसास है. बच्चा हुआ तो हम बहुत खुश थे. हमने अपने बच्चे का नाम महान गजलकार मिर्जा गालिब के नाम पर रखा. हमारा सपना था कि हम गालिब को बढ़ता हुआ देखें. मैं बहुत कम समय उसके साथ बिता पाया. गालिब के दूसरे जन्मदिन के बाद मुझे पुलिस ने फंसा लिया.

अपने बेटे को आप किस रूप में बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं?
अगर आप पेशेवर रूप से पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि वो एक डॉक्टर बने, क्योंकि यह मेरा अधूरा सपना है. लेकिन मैं अपने बच्चे के लिए जो सबसे जरूरी मानता हूं वो यह कि वो निर्भय हो. मैं चाहता हूं कि वो अन्याय के खिलाफ बोले और मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा करेगा. आखिर मेरे बेटे और बीबी से बेहतर अन्याय को कौन जान सकता है.

अगर कश्मीर समस्या के बारे में पूछें तो आप इसका क्या हल देखते हैं?
सबसे पहले सरकार को कश्मीरी आवाम के प्रति संवेदनशील होना होगा और कश्मीर का वास्तविक प्रतिनिधित्व करने वालों के साथ वार्ता करनी चाहिए. भरोसा कीजिये कश्मीर का वाजिब प्रतिनिधित्व करने वाले ही समस्या का हल निकाल सकते हैं. लेकिन अगर सरकार काउंटर इनसर्जेंसी के टैक्टिस के तौर पर शांति वार्ता का नाटक करेगी तो इस समस्या का कोई समाधान नहीं है. अब समय आ गया है कि इस मामले को गंभीरता से लिया जाये.

कौन हैं कश्मीर के वास्तविक प्रतिनिधि?
मैं किसी एक का नाम नहीं लेना चाहता. इनका चुनाव कश्मीरी आवाम की भावनाओं के मद्देनजर किया जा सकता है. साथ ही मैं भारतीय मीडिया से अपील करना चाहता हूं कि वो इस मामले में दुष्प्रचार न करे, आवाम को सच से परिचित कराये. गलत तथ्य, आधी-अधूरी खबरें, राजनीतिक प्रभाव वाले समाचार ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो क’मीर में कट्टरपंथी और आतंकी ताकतों को खड़ा कर रहे हैं. इस तरह के पत्रकार खुफिया एजेंसियों के खेल में आसानी से शामिल हो जाते हैं और ऐसी असंवेदनशील पत्रकारिता आखिरकार समस्याओं को बढाती ही है. इसलिए सबसे जरूरी है कि मीडिया कश्मीर के बारे में गलत सूचनायें देनी बंद करे. भारतीय नागरिकों को कश्मीरी संघर्ष का इतिहास का सच जानने दिया जाये जिससे वे वहां की जमीनी हकीकत से रू-ब-रू हो सकें. अगर भारत सरकार कश्मीरी आवाम की इच्छा अनुरूप समस्याओं के हल की पहल नहीं करती है तो यह क्षेत्र हमेशा संघर्षों के हवाले रहेगा.
दूसरा, जब भारतीय न्यायतंत्र जेलों में बंद सैकड़ों कश्मीरियों को बिना वकील और बगैर फेयर ट्रायल के फांसी देने पर आमादा है तो कश्मीरी आवाम के बीच इसका क्या संदेश जायेगा. बुनियादी हकों को बहाल किये बगैर कश्मीर समस्या का समाधान कैसे संभव है? इसका एकमात्र उपाय है कि भारत-पाकिस्तान दोनों की ही लोकतांत्रिक संस्थायें मसलन संसद, न्यायपालिका, मीडिया, बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ इस मसले पर गंभीरता से पेश आयें.

संसद हमले में नौ सुरक्षाबलों के जवान मारे गये, आप उनके परिजनों से क्या कहना चाहेंगे?
जिन्होंने अपने परिजनों को गंवाया है, मैं उनकी तकलीफ को महसूस कर सकता हूं. लेकिन मैं यह भी महसूस करता हूं कि उन्हें बहकाकर मुझ जैसे एक निर्दोष आदमी की फांसी से संतुष्ट करने की कोशिश की जा रही है. मुझे एक मोहरे के बतौर राष्ट्रवाद के नाम पर बलि का बकरा बनाया जा रहा है. मैं अपील करूंगा कि वे इससे बाहर निकलें और मेरे नजरिये से भी सोचें.

आप अपने जीवन में अब तक की क्या उपलब्धि देखते हैं?
मेरी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे मुकदमे से जुड़े अन्याय के खिलाफ चले अभियान की है, जिसके जरिये एसटीएफ का खौफ उजागर हो पाया. मुझे ख़ुशी है कि सुरक्षाबलों द्वारा नागरिकों पर किये जा रहे अत्याचार, फर्जी मुठभेड़ों, उनके गायब होने, उन्हें प्रताडि़त किये जाने आदि पर अब लोगों के बीच चर्चा हो रही है. कश्मीरी इन्हीं सब सच्चाइयों के बीच बढ़े-पले हैं. कश्मीर के बाहर के लोगों को कतई नहीं मालूम है कि भारतीय सुरक्षाबल वहां क्या कहर ढाते हैं. अगर बिना अपराध के वो हमें मार भी दें तो यह कोई सवाल नहीं है. एक क’मीरी को बिना वकील की पैरवी के फांसी पर भी लटका दिया जाये तो यह कोई बड़ी बात नहीं होगी.

आप खुद को किस रूप में याद किया जाना पसंद करेंगे?
कुछ देर सोचने के बाद-
अफजल के रूप में, मोहम्मद अफजल के रूप में. मैं कश्मीरी आवाम के लिए भी अफजल हूं और भारतीयों के लिए भी, लेकिन दोनों की निगाह में अलग-अलग. मैं कश्मीरी लोगों के न्याय पर पर सहज विश्वास कर सकता हूं. सिर्फ इसलिए नहीं की मैं उनके बीच से हूं बल्कि इसलिए कि वे सच से बखूबी वाकिफ हैं. उन्हें कभी भी इतिहास या पुरातन में गलतबयानी के जरिये बहकाया नहीं जा सकता है.

विनोद के जोसे अंग्रेजी पत्रिका 'कारवां' के कार्यकारी संपादक हैं. वर्ष 2006 में अफज़ल गुरू का यह साक्षात्कार सबसे पहले रीडिफ़-कॉम में प्रकाशित हुआ था. अब आप इस साक्षात्कार को कारवां की वेबसाइट पर अंग्रेजी में देख सकते हैं.

Sunday, February 06, 2011

आतंकियों का दुस्साहस, भारत को युद्ध के लिए ललकारा


लाहौर. मुंबई में आतंकी हमले के मास्टरमाइंड और जमात उद दावा के प्रमुख हाफिज मुहम्मद सईद का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि उसने भारत को युद्ध के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे डाली है। यह चेतावनी उसने पाकिस्तान में कश्मीर एकता दिवस के मौके पर दी। उसने कहा कि इसके लिए उसकी तैयारी पूरी है।

लाहौर के मुख्य मार्ग द मॉल पर करीब 20 हजार समर्थकों की रैली में सईद ने शनिवार को कहा, ‘मैं मनमोहन सिंह को एक संदेश देना चाहता हूं। कश्मीर छोड़ दें या युद्ध झेलने को तैयार रहें।’ उसने इसे ही कश्मीर समस्या का हल बताया।सईद के दुस्साहस भरे शब्दों के साथ ही उसके समर्थकों ने नारे लगाए, ’कश्मीर हमारा है’, ‘कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी।’

आतंकी सरगना ने कहा, ‘अगर कश्मीर को आजादी नहीं मिली तो हम पूरे कश्मीर पर कब्जा कर लेंगे, हम गजवा-ए-हिंद (भारत से युद्ध) शुरू कर देंगे, इसके लिए हमारी पूरी तैयारी है।’प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्करे तैयबा के संस्थापक सईद ने दावा किया कि 80 हजार भारतीय सैनिकों को कश्मीर में अत्याचारों के लिए दोषी ठहराया जाएगा। उसने कहा कि ‘कश्मीर समस्या का हल करीब है और यह साल बहुत महत्वपूर्ण है। इस साल जैसे ही अमेरिका इराक और अफगानिस्तान से जाएगा हम कश्मीर पर कब्जा कर लेंगे।’हाफिज सईद को 2008 में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के सिलसिले में करीब छह महीने तक जेल में रखा गया था।

इस धौंस के बावजूद सईद ने दावा किया कि उसका ‘संगठन न तो आतंकी है न ही आत्मघाती हमलावर तैयार करता है। हम सिर्फ कश्मीर की आजादी के लिए लड़ रहे हैं।’ उसने कहा, अगर मिस्र के लोग सड़कों पर आ सकते हैं तो भारत और पाकिस्तान के लोग भी सड़कों पर आ सकते हैं। उसने आरोप लगाया कि भारत अमेरिका की मदद से बलूचिस्तान पर कब्जा करना चाहता है। उसने पाकिस्तान की वर्तमान सरकार पर भी भारत के दबाव में काम करने का आरोप लगाया।

आधे घंटे में आतंकी हमलावर तैयार: पाक तालिबान के सरगना कारी हुसैन ने दावा किया है कि वह आधे घंटे में किसी भी युवा को आत्मघाती हमलावर बना सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग ने पिछले हफ्ते ही कारी को आतंकियों की सूची में शामिल किया है। कारी ने बताया कि उसके फिदायीन दस्ते में पांच हजार युवा हैं। इनमें बच्चे भी शामिल हैं।

Monday, January 31, 2011

लाल चौक ही क्यों, मुज़फराबाद में क्यों न फहराएं तिरंगा?


लाल चौक ही क्यों, मुज़फराबाद में क्यों न फहराएं तिरंगा?
राष्ट्रीयध्वज के स्वाभिमान की आड़ में भारतीय जनता पार्टी द्वारा गत् दिनों एक बार फिर भारतवासियों की भावनाओं को झकझोरने का राजनैतिक प्रयास किया गया जो पूरी तरह न केवल असफल बल्कि हास्यास्पद भी रहा। कहने को तो भाजपा द्वारा निकाली गई राष्ट्रीय एकता नामक यह यात्रा कोलकाता से लेकर जम्मू-कश्मीर की सीमा तक 12 राज्यों से होकर गुज़री। परंतु यात्रा के पूरे मार्ग में यह देखा गया कि आम देशवासियों की इस यात्रा के प्रति कोई दिलचस्पी नज़र नहीं आई। हां इस यात्रा के बहाने अपना राजनैतिक भविष्य संवारने की होड़ में लगे शीर्ष नेताओं से लेकर पार्टी के छोटे कार्यकर्ताओं तक ने इसे अपना समर्थन अवश्य दिया। भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपना राजनैतिक जनाधार तलाश करने के लिए पहले भी इस प्रकार की कई ‘भावनात्मक यात्राएं निकाली जा चुकी हैं। लिहाज़ा जनता भी अब इन्हें पेशेवर यात्रा संचालक दल के रूप में ही देखती है। फिर भी भाजपा ने अपने कुछ कार्यकर्ताओं के बल पर निकाली गई इस यात्रा को जम्मू-कश्मीर व पंजाब राज्यों की सीमा अर्थात्  लखनपुर बार्डर पर जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा रोके जाने को इस प्रकार प्रचारित करने की कोशिश की गोया पार्टी के नेताओं ने राष्ट्रीयध्वज के लिए बहुत बड़ा बलिदान कर दिया हो अथवा इसकी आन-बान व शान के लिए अपनी शहादत पेश कर दी हो।
परंतु राजनैतिक विशेषक इस यात्रा को न तो ज़रूरी यात्रा के रूप में देख रहे थे न ही इसे भाजपा के चंद नेताओं की राष्ट्रभक्ति के रूप में देखा जा रहा था। बजाए इसके तिरंगा यात्रा अथवा राष्ट्रीय एकता यात्रा को भारतीय जनता पार्टी के भीतरी सत्ता संघर्ष के रूप में देखा जा रहा था। तमाम विशेषकों का मानना है कि भाजपा में नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव से भयभीत सुषमा स्वराज तथा अरुण जेटली जैसे बिना जनाधार वाले नेताओं ने स्वयं को मोदी से आगे ले जाने की गरज़ से इस यात्रा को अपना नेतृत्व प्रदान किया। जबकि कुछ का मत है कि इस सच्चाई के अलावा इस यात्रा से जुड़ी एक सच्चाई यह भी थी कि हिमाचल प्रदेश के मु यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र एवं सांसद अनुराग ठाकुर भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष होने के बाद स्वयं को राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करने की बुनियाद डालना चाह रहे थे। अत: तिरंगा यात्रा की आड़ में देशवासियों की भावनाओं को भड़काने तथा अपने नाम का राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार करने का इससे ‘बढिय़ा अवसर और क्या हो सकता था। यदि यह यात्रा भाजपा नेताओं की आपसी होड़ का परिणाम न होती तो पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह महात्मा गांधी की समाधि पर 26 जनवरी को जाकर धरने पर क्यों बैठते। भाजपा का अथवा भाजपा नेताओं का महात्मा गांधी या उनकी नीतियों से वैसे भी क्या लेना-देना।
परंतु भाजपा नेता अरुण जेटली व सुषमा स्वराज तथा नीरा राडिया टेप प्रकरण में चर्चा में आने वाले अनंत कुमार बार-बार देश को मीडिया के माध्यम से यह बताने की कोशिश करते रहे कि हमें लाल चौक पर तिरंगा फहराने से रोका गया। इनका आरोप है कि जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार ने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के इशारे पर हमें श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने से रोका है। इन नेताओं द्वारा यह भी कहा जा रहा है कि लाल चौक पर हमें झंडा फहराने से रोककर कश्मीर की उमर सरकार व केंद्र सरकार दोनों ही ने कश्मीर के अलगाववादियों तथा वहां सक्रिय आतंकवादियों के समक्ष अपने घुटने टेक दिए हैं। बड़ी अजीब सी बात है कि यह बात उस पार्टी के नेताओं द्वारा की जा रही है जिसके नेता जसवंत सिंह ने कंधार विमान अपहरण कांड के दौरान पूरी दुनिया के सामने तीन खूंखार आतंकवादियों को भारतीय जेलों से रिहा करवा कर कंधार ले जाकर तालिबानों की देख-रेख में आतंकवादियों  के आगे घुटने टेकते हुए उन्हें आतंकियों के हवाले कर दिया। जिनके शासन काल में ही देश की अब तक की सबसे बड़ी आतंकी घुसपैठ कारगिल घुसपैठ के रूप में हुई। देश के इतिहास में पहली बार हुआ संसद पर आतंकी हमला इन्हीं के शासन में हुआ। परंतु अब भी यह स्वयं को राष्ट्र का सबसे बड़ा पुरोधा व राष्ट्रभक्त बताने से नहीं हिचकिचाते।
जिस उमर अब्दुल्ला की राष्ट्रभक्ति पर आज यह संदेह जता रहे हैं वही अब्दुल्ला परिवार जब इनके साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का सहयोगी दल हो तो वही परिवार राष्ट्रभक्त हो जाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे कि 24 अप्रैल 1984 को भारतीय संविधान को फाड़ कर फेंकने वाले प्रकाश सिंह बादल आज इनकी नज़रों में सबसे बड़े राष्ट्रभक्त बने हुए हैं। जैसे कि उत्तर भारतीयों को मुंबई से भगाने का बीड़ा उठाने वाले बाल ठाकरे जैसे अलगाववादी प्रवृति के राजनीतिज्ञ इनके परम सहयोगी बने हुए हैं। मु यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भाजपा की तिरंगा यात्रा को लाल चौक पर तिरंगा फहराने से रोकने का प्रयास इसलिए किया था कि उनके अनुसार वे नहीं चाहते थे कि भाजपा की इस यात्रा से प्रदेश के हालात बिगड़ जाएं। अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं जबकि लगभग पूरी कश्मीर घाटी कश्मीरी अलगाववादी ताकतों की चपेट में आकर पत्थरबाज़ी का शिकार हो रही थी। इस घटना में सैकड़ों कश्मीरी तथा कई सुरक्षाकर्मी आहत भी हुए। इससे पूर्व अमरनाथ यात्रा को ज़मीन आबंटित किए जाने के मामले को लेकर जम्मू में जिस प्रकार तनाव फैला था तथा पूरी घाटी शेष भारत से कई दिनों तक कट गई थी यह भी पूरे देश ने देखा था। ऐसे में एक ओर भाजपा ने जि़द की शक्ल अि तयार करते हुए जहां श्रीनगर के लाल चौक  पर गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने की घोषणा की थी वहीं कुछ अलगाववादी नेताओं ने भी यह चुनौती दे डाली था कि भाजपा नेताओं में यदि हि मत है तो वे लाल चौक पर तिरंगा फहराकर दिखाएं। ऐसे में पार्टी के कई शीर्ष नेताओं सहित भाजपा की यात्रा में शामिल सभी कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की जि़ मेदारी भी राज्य सरकार की हो जाती है। लिहाज़ा यदि राज्य के वातावरण को सामान्य रखने तथा भाजपा नेताओं की सुरक्षा के मद्देनज़र उनकी जि़द पूरी नहीं की गई तो इसमें स्वयं को अधिक राष्ट्रभक्त व राष्ट्रीय ध्वज का प्रेमी बताना तथा दूसरे को राष्ट्रद्रोही या तिरंगे को अपमानित करने वाला प्रचारित करना भी राजनैतिक स्टंट मात्र ही है।
हम भारतवासी होने के नाते बेशक यह मानते हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। परंतु यह भी एक कड़वा सच है कि हमारा यह कथन न तो पाकिस्तान के गले से नीचे उतरता है न ही पाकिस्तान से नैतिक,राजनैतिक तथा पिछले दरवाज़े से अन्य कई प्रकार का समर्थन पाने वाले कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के गले से। यदि मसल-ए-कश्मीर इतना ही आसान मसला होता तो हम आम भारतीयों की ही तरह भाजपा नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी यही कहा होता कि कश्मीर का मसला भारतीय संविधान के दायरे के अंतर्गत ही हल होना चाहिए। परंतु इसके बजाए उन्होंने भी यही कहना उचित समझा कि कश्मीर समस्या का समाधान इंसानियत के दायरे में किया जाना चाहिए। लिहाज़ा वर्तमान समय में इंसानियत का तक़ाज़ा यही था कि कश्मीर घाटी में बामुश्किल कायम हुई शांति को बरकरार रहने दिया जाए तथा उन कश्मीरी अवाम का दिल जीतने का प्रयास किया जाए जो मु_ीभर अलगाववादी नेताओं के बहकावे में आकर कभी हथियार उठा लेते हैं तो कभी पत्थरबाज़ी करने लग जाते हैं। बजाए इसके कि 2014 के संभावित लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र स्वयं को राष्ट्रभक्त,शहीद तथा देशप्रेमी प्रचारित करने के लिए लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की जि़द को पूरा किया जाए।
गौरतलब है कि आज ज मु-कश्मीर राज्य के सभी जि़ला मु यालयों पर भारतीय तिरंगा स्वतंत्रता  दिवस तथा गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष फहराया जाता है। राज्य के सभी सेना,पुलिस एवं सरकारी मु यालयों पर तिरंगा फहराया जाता है। हां यदि हम ज मु-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग मानते हैं तो समूचा कश्मीर भारतीय मानचित्र की परिधि में ही आता है। यही कारण है कि जिस कश्मीर को हम पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं पाकिस्तान कश्मीर के उसी भाग को आज़ाद कश्मीर के नाम से पुकार कर दुनिया को गुमराह करता है।
तनवीर जाफरी लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं संपर्क tjafri1@gmail.कॉम tanveerjafriamb@gmail.
कितना बेहतर हो कि केवल भाजपा ही नहीं बल्कि देश के सभी राजनैतिक दल, देश में विशेषकर जम्मू-कश्मीर राज्य में ऐसा वातावरण पैदा करें कि जम्मू-कश्मीर की अवाम स्वयं अपने हाथों में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज लेकर मुजफराबाद की ओर कूच करें तथा मुज़फराबाद पर झंडा लहराने जैसे दूरगामी एवं अति आवश्यक मिशन पर कार्य करें। परंतु लाल चौक पर तिरंगा लहराने की जि़द पूरी करने के पहले तो भाजपा को नक्सल,आतंकवाद तथा अलगाववाद से  प्रभावित तमाम ऐसे इलाकों की िफक्र करनी चाहिए जहां तिरंगा फहराना तो दूर की बात है भारतीय शासन या व्यवस्था को ही स्वीकार नहीं किया जाता।

-http://hastakshep.com/?p=2274

Friday, January 28, 2011

भगवा की तिरंगा राजनीति


भगवा की तिरंगा राजनीति
हार्डकोर वामपंथी छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये आनंद प्रधान का पत्रकारिता में भी महत्वपूर्ण स्थान है. छात्र राजनीति में रहकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में AISA के बैनर तले छात्र संघ अध्यक्ष बनकर इतिहास रचा. आजकल Indian Institute of Mass Communication में Associate Professor . पत्रकारों की एक पूरी पीढी उनसे शिक्षा लेकर पत्रकारिता को जनोन्मुखी बनाने में लगी है साभार--तीसरा रास्ता
आनंद प्रधान
इतिहास को दोहराने की कोशिश में मजाक बन गई है भाजपा की तिरंगा यात्रा
“ देशभक्ति, दुष्टों-लफंगों की आखिरी शरणस्थली होती है.”
- सैमुएल जॉन्सन

सैमुएल जॉन्सन की यह पंक्ति भारतीय जनता पार्टी और उसके युवा संगठन भारतीय जनता युवा मोर्चा की तिरंगा यात्रा पर बिल्कुल फिट बैठती है. ऐसे राजनीतिक तमाशे करने में भाजपा का कोई जवाब नहीं है. वैसे भी भाजपा के लिए ‘देशभक्ति’ हमेशा से आखिरी शरणस्थली रही है. एक बार फिर वह जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में ऐतिहासिक लाल चौक पर २६ जनवरी को तिरंगा फहराने के अभियान के जरिये खुद को सबसे बड़ा देशभक्त और बाकी सभी को देशद्रोही साबित करने की अपनी जानी-पहचानी राजनीति पर उतर आई है.
असल में, लोगों की भावनाएं भडकाकर राजनीति को सांप्रदायिक आधारों पर ध्रुवीकृत करने का भाजपा और संघ परिवार का यह खेल अब बहुत जाना-पहचाना हो चुका है. यह और बात है कि उसके ऐसे सभी अभियानों से हमेशा सबसे अधिक नुकसान देश को ही हुआ है. श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने का इससे भी बड़ा जज्बाती अभियान १९९२ में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी चला चुके हैं. उस समय केन्द्र में कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने फौज और अर्ध सैनिक बलों के घेरे में सुनसान लाल चौक पर डा. जोशी से तिरंगा फहरावाकर उनकी मनोकामना पूरी कर दी थी.
लेकिन १९९२ के बाद कश्मीर की स्थिति किसी से छुपी नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि डा. जोशी की तिरंगा यात्रा ने भी कश्मीर में स्थितियों को बिगाड़ने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई. लेकिन संघ परिवार को इसकी परवाह कहां रही है? उसके लिए तो हमेशा से देशहित से ऊपर संकीर्ण पार्टी हित रहा है. अगर ऐसा नहीं है तो क्या कोई भी संवेदनशील राजनीतिक पार्टी कश्मीर के मौजूदा हालात में ऐसी भडकाऊ यात्रा निकालता जिससे स्थितियों के और बिगड़ने का खतरा हो? लेकिन जो पार्टी तर्क के बजाय भावनाओं की राजनीति करने की चैम्पियन हो उसे तर्कों और यथार्थ की परवाह क्या होगी?
लेकिन कहते हैं न कि काठ की हांड़ी दोबारा नहीं चढ़ती है. भाजपा और संघ परिवार के ऐसे दुस्साहसी राजनीतिक ड्रामों से देश भली-भांति परिचित हो चुका है. भाजपा की देशभक्ति की पोल खुल चुकी है. तहलका रक्षा घोटाले से लेकर कारगिल ताबूत घोटाले के पर्दाफाश और बंगारू लक्ष्मन, दिलीप सिंह जूदेव से लेकर अब येदियुरप्पा तक भाजपा की असलियत लोगों के सामने आ चुकी है. जाहिर है कि भाजपा अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए तिरंगे का इस्तेमाल कर रही है.
अन्यथा देश को अच्छी तरह से पता है कि संघ परिवार तिरंगे को कितना प्यार करता है? भाजपा आखिर किसे धोखा दे रही है? सच यह है कि संघ परिवार और भाजपा तिरंगे से ज्यादा भगवे झंडे को प्यार करते हैं. हेडगेवार बहुत पहले तिरंगे को अशुभ बताकर भगवे की वकालत कर चुके हैं.
मार्क्स ने बहुत पहले कहा था कि इतिहास अपने को दोहराता है लेकिन जहां पहली बार वह एक त्रासदी होता है, वहीँ दूसरी बार प्रहसन या मजाक बन जाता है. भाजपा की यह दूसरी तिरंगा यात्रा एक मजाक से अधिक कुछ नहीं है.

Tuesday, January 25, 2011

आरएसएस ने 1948 में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था!


शेषजीश्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की बीजेपी की राजनीति पूरी तरह से उल्टी पड़ चुकी है. बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के संयोजक शरद यादव तो पहले ही इस झंडा यात्रा को गलत बता चुके हैं, अब बिहार के मुख्यमंत्री और बीजेपी के महत्वपूर्ण सहयोगी नीतीश कुमार ने श्रीनगर में जाकर झंडा फहराने की जिद का विरोध किया है. शरद यादव ने तो साफ़ कहा है कि जम्मू कश्मीर में जो शान्ति स्थापित हो रही है उसको कमज़ोर करने के लिए की जा रही बीजेपी की झंडा यात्रा का फायदा उन लोगों को होगा जो भारत की एकता का विरोध करते हैं.
नीतीश कुमार ने बीजेपी से अपील की है कि इस फालतू यात्रा को फ़ौरन रोक दे. सूचना क्रान्ति के चलते अब देश के बहुत बड़े मध्य वर्ग को मालूम चल चुका है कि झंडा फहराना बीजेपी की राजनीति का स्थायी भाव नहीं है, वह तो सुविधा के हिसाब से झंडा फहराती रहती है. बीजेपी की मालिक आरएसएस के मुख्यालय पर 2003 तक कभी भी तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया था. वो तो जब 2004 में तत्कालीन बीजेपी की नेता उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं तो लोगों ने अखबारों में लिखा कि हुबली में झंडा फहराने के साथ-साथ उमा भारती को नागपुर के आरएसएस के मुख्यालय में भी झंडा फहरा लेना चाहिए. तब जाकर आरएसएस ने अपने दफ्तर पर झंडा फहराया. 2004 के विवाद के दौरान भी उतनी ही हड़कंप मची थी जितनी आज मची हुई है, लेकिन तब टेलीविज़न की खबरें इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए बीजेपी की धुलाई उतनी नहीं हुई थी जितनी आजकल हो रही है.
तिरंगा फहराने के बहाने बहुत सारे सवाल भी बीजेपी वालों से पूछे जा रहे हैं. अभी कुछ साल पहले कुछ कांग्रेसी तिरंगा लेकर चल पड़े थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वे आरएसएस के नागपुर मुख्यालय पर भी तिरंगा झंडा फहरा देगें. रास्ते में उन पर लाठियां बरसाई गयी थी. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उस वक़्त के तिरंगे से क्यों चिढ़ी हुई थी बीजेपी जो महाराष्ट्र में अपनी सरकार का इस्तेमाल करके तिरंगा फहराने जा  रहे कांग्रेसियों को पिटवाया था. जब उमा भारती ने 2004 हुबली में झंडा फहराने के लिए यात्रा की थी तो विद्वान इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने प्रतिष्ठित अखबार द हिन्दू में एक बहुत ही दिलचस्प लेख लिखा था.
उन्होंने सवाल किया था कि बीजेपी आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है. खुद ही उन्होंने जवाब का भी अंदाज़ लगाया था कि शायद इसलिए कि बीजेपी की मातृ संस्‍था आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था. 1930 और 1940 के दशक में जब आज़ादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आरएसएस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था. यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया आरएसएस वालों ने कभी उसे सैल्यूट तक नहीं किया. आरएसएस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व दिया. 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गाँधी की हत्‍या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि  आरएसएस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे. यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं. आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आरएसएस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी. उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे. 24 फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी पीड़ा को व्यक्त किया था. उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आरएसएस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं. उन्हें मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं.
यह तिरंगा हमारी आज़ादी के लड़ाई का स्थायी साथी रहा है, जबकि आरएसएस वालों ने आज़ादी की लड़ाई में देश की जनता की भावनाओं का साथ नहीं दिया था. तिरंगे की अवधारणा पूरी तरह से कांग्रेस की देन है. तिरंगे झंडे की बात सबसे पहले आन्ध्र प्रदेश के मसुलीपट्टम के कांग्रेसी कार्यकर्ता पी वेंकय्या के दिमाग में उपजी थी. 1918 और 1921 के बीच हर कांग्रेस अधिवेशन में वे राष्ट्रीय झंडे को फहराने की बात करते थे. महात्मा गाँधी को यह विचार तो ठीक लगता था लेकिन उन्होंने वेंकय्या जी की डिजाइन में कुछ परिवर्तन सुझाए. गाँधी जी की बात को ध्यान में रखकर दिल्ली के देशभक्त लाला हंसराज ने सुझाव दिया कि बीच में चरखा लगा दिया जाए तो ज्यादा सही रहेगा. महात्मा गाँधी को लालाजी की बात अच्छी लगी और थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया. उसके बाद कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में तिरंगा फहराया जाने लगा. अगस्त 1931 में कांग्रेस की एक कमेटी बनायी गयी, जिसने झंडे में कुछ परिवर्तन का सुझाव दिया. वेंकय्या के झंडे में लाल रंग था. उसकी जगह पर भगवा पट्टी कर दी गयी. उसके बाद सफ़ेद पट्टी और सबसे नीचे हरा रंग किया गया. चरखा बीच में सफ़ेद पट्टी पर सुपर इम्पोज कर दिया गया. महात्मा गाँधी ने इस परिवर्तन को सही बताया और कहा कि राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है.
आज़ादी मिलने के बाद तिरंगे में कुछ परिवर्तन किया गया. संविधान सभा की एक कमेटी ने तय किया कि उस वक़्त तक तिरंगा कांग्रेस के हर कार्यक्रम में फहराया जाता रहा है लेकिन अब देश सब का है. उन लोगों का भी जो आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के मित्र के रूप में जाने जाते थे. इसलिए चरखे की जगह पर अशोक चक्र को लगाने का फैसला किया गया. जब महात्मा गाँधी को इसकी जानकारी दी गयी तो उन्हें ताज्जुब हुआ. बोले कि कांग्रेस तो हमेशा से ही राष्ट्रीय रही है. इसलिए इस तरह के बदलाव की कोई ज़रुरत नहीं है, लेकिन उन्हें नयी डिजाइन के बारे में राजी कर लिया गया. इस तिरंगे की यात्रा में बीजेपी या उसकी मालिक आरएसएस का कोई योगदान नहीं है, लेकिन वह उसी के बल पर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने में सफल होती नज़र आ रही है. अजीब बात यह है कि कांग्रेसी अपने इतिहास की बातें तक नहीं कर रहे हैं. अगर वे अपने इतिहास का हवाला देकर काम करें तो बीजेपी और आरएसएस को बहुत आसानी से घेरा जा सकता है और तिरंगे के नाम पर राजनीति करने से रोका जा सकता है.
लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने जर्नलिस्ट हैं.

Friday, January 21, 2011

Kashmir not to allow BJP's flag hoisting


By IANS,
Jammu: Ahead of Bharatiya Janata Party's (BJP) plan to hoist the national flag at the historic Lal Chowk in Srinagar on Republic Day Jan 26, the Jammu and Kashmir government said Thursday that it would not allow any "programme which has the potential of vitiating the peaceful atmosphere in the state".
The announcement was made after a meeting chaired by Chief Minister Omar Abdullah in Jammu, a day after his meeting with Congress president Sonia Gandhi and union Home Minister P. Chidambaram in New Delhi.
An official statement, without specifically referring to BJP's Rashtriya Ekta Yatra, or national unity march, aimed at hoisting the tricolour in Srinagar, said: "The state government has directed the civil and police authorities to ensure that all measures are taken to ensure that the law and order in the state is not disturbed in the run up to the Republic Day celebrations."
"In a high-level meeting chaired by the Chief Minister Omar Abdullah it was decided that no programme which has the potential of vitiating the peaceful atmosphere in the state will be allowed," the release said.
An official present in the meeting told IANS that it was felt in the meeting that the BJP's march had the dangerous potential of disturbing peace in the Valley and arousing passions across the state. "Therefore, it was necessary to stop it."
The government has decided to stop the BJP's march at Lakhanpur, the gateway of Jammu and Kashmir, 90 km south of Jammu, said a source.
This would also apply to the separatists who have given a call for march to Lal Chowk in Srinagar on the same day and planned hoisting black flags and staging street protests.
These calls have been given by the Jammu Kashmir Liberation Front and the moderate as well as hardline factions of the Hurriyat Conference.
"The meeting reviewed the arrangements and directed that while the Republic Day should be celebrated with full fervour and enthusiasm, the elements who were bent upon disturbing the law and order should be dealt with sternly and the directions to this effect should be passed on to the district authorities as well," the official release said.
Apart from ministers, the meeting was also attended by Director General of Police Kuldeep Khoda, Principal Secretary (Home) B.R. Sharma, Additional Director General of Police (Law and Order) K. Rajindra and other police officers.
Chief Secretary S.S. Kapur and Khoda briefed the meeting about the preparations made by the administration to ensure that Republic Day celebrations pass off peacefully, the official release said.