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Friday, May 29, 2015

हम कहां भाग कर जाएं


मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सब कुशल होंगे। पत्र लिखने का तरीका ज़रा पुराना है पर बात नई है। मुझे इस बात की खुशी है कि आप शिद्दत से अख़बार पढ़ते हैं और न्यूज़ चैनल देखते हैं। लोकतंत्र में सटीक जानकारी ही हम सबको बेहतर नागरिक बनाती है और चुनाव के वक्त मतदाता। नागरिक और मतदाता में फर्क होता है। मतदाता आप मतदान के दौरान ही होते हैं लेकिन नागरिक आप हर समय होते हैं। पत्र लिखने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि क्या आपके साथ भी वैसा ही हो रहा है, जैसा मेरे साथ हो रहा है। मेरा मतलब है कि क्या हम और आप सेम टू सेम फील कर रहे हैं।

क्या आप भी मेरी तरह अख़बारों और चैनलों से घबराए हुए हैं। सरकार के एक साल पूरे हुए हैं, लेकिन हमारे तो नहीं हुए हैं। इस एक साल पर इतना कुछ छप रहा है और टीवी पर दिखाया जा रहा है, उन सबको देखने-पढ़ने में ही दस साल निकल जाएंगे। पिछले दस दिनों से सरकार का एक साल चल रहा है और यही रवैया रहा तो मैं आपको सतर्क कर देता हूं कि दो दिन बाद यानी बुधवार से सरकार का दूसरा साल शुरू हो रहा है। दूसरे साल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्या-क्या चुनौतियां होंगी, इन चुनौतियों में दस बड़ी चुनौतियां क्या होंगी, दस-दस के हिसाब से विदेश नीति से लेकर अर्थ नीति को लेकर उनकी चुनौतियां क्या होंगी। उन सभी चुनौतियों की पहले साल की चुनौतियों से तुलना भी की जाएगी। तैयार रहिए हमारी आपकी भी चुनौतियां कम नहीं हैं।

ख़ैर जब दूसरा साल आएगा तब आएगा, लेकिन यह पहला साल पूरा हुआ है उसके चक्कर में हम पूरे हुए जा रहे हैं। लगता है सरकार और मीडिया हर नागरिक को पकड़ कर उपलब्धियां-नाकामियां बताने की ज़िद पर आ गए हैं। विपक्ष लगता है कि हर उपलब्धियों को खारिज करने पर आमादा है। जैसे सोसायटी कल्चर में बर्थ-डे पर होता है कि आपने गिफ्ट दिया नहीं कि उधर से रिटर्न गिफ्ट थमा दिया गया। जैसे ही सरकार प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है, विपक्ष का भी होने लगता है। हम एक हाथ में केक और एक हाथ में गिफ्ट लिए हिलते-डुलते रह जाते हैं।

आज सुबह दही लेने गया तो लगा कि दुकानदार भी प्रेस काॉन्फ्रेंस के अंदाज़ पर महंगाई पर बोल रहा है, बगल की दुकान से टिंडे वाला खंडन किए जा रहा है। हर आदमी में मुझे दो आदमी नज़र आ रहे हैं। एक दावा करने वाला और एक खंडन करने वाला। अभी तो प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियों का स्टॉक शुरू ही हुआ है। सुना है सरकार और बीजेपी 200 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाली है। 200 रैलियां की जाएंगी और इससे भी बच गए तो आप उन 5,000 सभाओं से तो बच ही नहीं सकते, जो सरकार के एक साल पूरे होने पर की जाने वाली हैं। इससे अच्छा था कि एक अध्यादेश लाकर हर नागरिक को कम से कम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस, एक सभा या एक बड़ी रैली में शामिल होना अनिवार्य कर देती। न्यूज़ चैनलों में तो प्रवक्ता और जानकार डेरा डालकर बैठ गए हैं। आप चैनल भले बदल लीजिए, लेकिन इन प्रवक्ताओं और जानकारों को नहीं बदल सकते। ये सर्वव्यापी हो गए हैं।

विपक्ष भी डाल-डाल तो पात-पात टाइप करने लगा है। विपक्ष वालों को कहीं जाना भी नहीं पड़ रहा है। सरकार घूम घूम कर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है, रैली कर रही है और ये हैं कि एक ही जगह से रोज़ उन दावों का खंडन कर देते हैं। जितना सरकार बोल रही है, उतना ये भी बोल रहे हैं। दोनों के बयान से सारे दावे और खंडन आपस में लड़-मर कर ढेर हो जा रहे हैं। और हम हैं कि वहीं गब्बू की तरह खड़े रोने लगते हैं कि अभी-अभी तो इस पर यकीन किया था और अभी-अभी फलाने ने यकीन तोड़ दिया। प्लीज़ यहां यकीन को खिलौना न समझें।

हम बहुत परेशान हैं। परेशान न होते तो आपको ख़त न लिखते। हमको बुझाता ही नहीं है कि कौन सा दावा जीता और कौन सा खंडन हारा। कोई ट्राइब्यूनल तो होना चाहिए, जहां सही गलत का फैसला हो। मंत्री को सुनकर लगता है कि वाह सरकार ने क्या-क्या कमाल कर दिया है। विपक्ष को सुनकर लगता है कि अरे वाह, जो बोला झूठ ही बोला है। ऐसे कैसे होगा। कुछ तो सही होगा और कुछ तो गलत होगा, लेकिन जो भी सही होगा वह गलत ही होगा या जो भी गलत है, वही सही है इससे तो मेरी आंतों में चक्कर आने लगे हैं।

मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों, आप कैसे झेल रहे हैं। अपना घर छोड़कर पड़ोसी के घर जाता हूं तो वहां भी वही अख़बार मिलता है। वही चैनल चल रहा होता है। इन लोगों ने तो हमें इम्तहान के दिनों की याद दिला दी है। दोनों हमें पकड़-पकड़ कर रटा रहे हैं। कितना याद रखें भाई। डर लगता है कि कहीं सरकार बहादुर ने टेस्ट ले लिया तो क्या होगा। भाई लोगों ने हम पाठकों और दर्शकों के लिए इतना मैटिरियल ठेल दिया है कि शिंकारा टॉनिक पीकर और च्यवनप्राश खाकर भी स्मरण शक्ति का बंटाधारा होने से कोई नहीं बचा सकता है।

सालगिरह सरकार की है और लाउडस्पीकर पड़ोसी झेल रहा है। हम किसी के जश्न में खलल क्यों डालें। सोचते हैं कि मना लेने दो भाई बस हमारी एक अर्ज़ी स्वीकार कर लें। हम इतना लेख नहीं पढ़ सकते हैं। इतना भाषण नहीं सुन सकते हैं। इतना प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं झेल सकते हैं। इतना मंत्रियों का इंटरव्यू नहीं झेल सकते। हमारी तरफ से आप भी प्रधानमंत्री मोदी से कहिये। हमने उनका हमेशा भला चाहा है, वह भी हमारा भला चाहें। वह टीवी वाले और अख़बार वालों को मना करें। अपनी पार्टी से भी कहें कि बस भाई बस। 5,000 सभाएं और 200 प्रेस कॉन्फ्रेंस। लोगों को रटवा-रटवा कर मार दोगे क्या।

हम दुआ करते हैं कि प्रधानमंत्री जी पांच साल पूरे करें और झमाझाम काम करें, लेकिन पहले साल पर ये हाल है तो मुझे डर है कि कहीं किसी ने यह सुझा दिया कि दूसरे साल पर सब दुगना होगा तो क्या होगा। यानी 400 प्रेस कॉन्फ्रेंस, 10,000 सभाएं। तीसरे साल पर 600 प्रेस कॉन्फ्रेंस और 15,000 सभाएं। हमारी उम्र भी तो हर साल बढ़ेगी। सोचिए हम पर क्या बीतेगी। हम कहां भाग कर जाएंगे।

मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों, एक ही बात को बार-बार सुनकर, अलग-अलग श्रीमुख से एक ही बात सुनकर मेरे दिमाग के हार्ड-डिस्क की कैपेसिटी कम हो गई है। ऐसा लगता है कि भारत में सालगिरह सेना तैयार हो गई है। एक सेना पक्ष में लिखती है और दूसरी विपक्ष में। कुछ संतुलन के लिए भी लिखते हैं। अच्छा है कि सरकार का सख्त इम्तहान हो रहा है, लेकिन उस इम्तहान का बोझ हम जैसे ग़रीब पाठकों और दर्शकों पर क्यों डाला जा रहा है।

अगर आपको भी ऐसा लगता है तो प्रधानमंत्री जी से गुज़ारिश कीजिए, लेकिन बधाई ज़रूर दीजिएगा। हमारी सरकार है ख़ूब काम करे। ख़ूब हिसाब हो लेकिन इतना भी बेहिसाब न हो कि हमारा ही हिसाब हो जाए। सोचा अपनी इस व्यथा को आपसे बांटू। भूल-चूक लेनी-देनी माफ़।

आपका
रवीश कुमार

Saturday, March 15, 2014

नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला


मुझे भाजपा के नंदू श्री नरेंद्र भाई मोदी से कोई दुश्मनी नहीं है। कांग्रेस मेरे लिए कोई दूध की धुली हुई पार्टी नहीं है। न ही बसपा से मायावती जी मेरा भला चाहती। लालू के डुप्लीकेट अरविन्द केजरीवाल तो सबसे महान है। मुझे तो हमाम में सारे नंगे लगते हैं। जैसे चोर-चोर मौसेरे भाई। ये बातें मेंने इसलिए कही कि ये लेख और बयानों को पढ़ने वाले मेरे भाई-बंधू और माताएं-बहनें ये न समझे कि मैं किसी विशेष राजनितिक दल या किसी नेता का अंदरखाने प्रचार कर रहा हूँ। क्योंकि ऐसे आरोप मेरे ऊपर हमेशा लगते रहे हैं। लेकिन सारी पार्टियां और नेता ये बात जान लें कि हम जिसे भी समर्थन करेंगे तो सीना ठोंक कर करेंगे।
इन सभी बातों से दूर चलो अब मुद्दे पर आते हैं। मैंने क्यों कहा "नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला". भाइयों-बहनों ये जुमला भी एक जीता-जागता सच है। इस जुमले पर तो मैं गीत भी लिखने वाला हूँ। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर और अपनी अंधभक्ति से ऊपर उठकर देखोगे तो ही आपको "असली चाय वाला" दिखेगा और चाय पीने में मज़ा भी आएगा। फिर आप किसी को मुफ्त में चाय पिलाओगे तो भी मज़ा ही आएगा। भाइयों-बहनों आगे पढ़ने से पहले अपने खुराफाती दिमाग को मोदी साहब से और अन्य किसी नेता से दूर ले जाना। एक पल के लिए आप किसी के कार्यकर्ता नहीं बल्कि एक "मानव" बनकर सोचना। क्या सच है और क्या गलत? 
हमारे भाजपा के "नंदू" श्री नरेंद्र भाई मोदी जी आजकल पुरे देश में चाय की "घुग्गी" लगाते हुए घूम रहे हैं। कहने को तो भाई साहब "रैली" करते हैं, लेकिन लगा रहे हैं "चाय की घुग्गी". अरे भई रेहडी लेकर गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर अगर चाय मुफ्त में पिलाते घूमते तो मैं समझता कि हाँ आपने चाय वालों का मान-सम्मान बढ़ाया है और महनत भी चौखी की है। पर क्या करें ये कहते हुए मुझे अतयंत दुःख हो रहा है कि "चाय मुफ्त में वो भी रेहड़ी लेकर अगर मोदी जी गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर घुमते तो कुड़ते-पजामे पर सलवटें नहीं पड़ जाती, इतना ही नहीं सर्दी के मौसम में पसीना सर से निकल कर निचे दरारों तक पहुँच जाता" उसे कहते हम कि भाई मोदी साहब तो महान हैं। लेकिन अब कैसे महान कहें मोदी साहब को। यहाँ तो गिरी हुई घटिया राजनीति हो रही है। चाय वालों का सरेआम मज़ाक बनाया जा रहा है और चाय वाले बंधू है कि कुछ बोल नहीं सकते। क्या मोदी जी ने गुजरात में किसी चाय वाले की गरीबी दूर करके उसे दूकान में बैठाया है? खामखां बेमतलब स्वार्थी रूप में चाय वालों का इस्तेमाल ही कर रहे नरेंद्र मोदी जी। अरे कोई तो बताये भाई क्या आज तक किसी चाय वाले का मोदी साहब ने कोई भला किया है? ये जो छुटभैये नेता मोदी की नमो चाय मुफ्त में बांटते घूम रहे, क्या वो सारी जिंदगी ऐसे मुफ्त चाय पिलाते रहेंगे? नहीं न। मोदी चुनाव हारे या चुनाव जीते, इससे भाई कोई मतलब नहीं है। सवाल तो ये है कि क्या मोदी जी और मोदी जी वाले छुटभैये चुनाव के बाद ऐसे मुफ्त चाय पिलायेंगे? हारने के बाद भी और जीतने के बाद भी। गुड़गांव में तो छुटभैये नेताओं ने तो "चाय पर चर्चा" कर डाली. कोई पूछे इन स्वार्थी भाजपाई घोड़ों से कि क्या ऐसे "चाय पर चर्चा" होती है भला? बेवकूफ बनाने का धंधा खोलकर बैठ गए हैं। बड़े-बड़े होटलों में और चौपालों पर चाय पर चर्चा करते नहीं थक रहे। किस बिरादरी की और किस गरीब के उद्धार की चर्चा कर रहे हो भाई? मोदी जी को कैसे लाल-किले तक पहुँचाया जाये। इसी का तो ठेका ले रखा है तुमने। इसी ठेके के आधार पर मुफ्त चाय की चुस्की लगाते हो और फ़ालतू की "चर्चा" करते हो। देश की मुंह फाड़े पड़ी समस्याओं के बारे में चर्चा की है कभी? क्या कभी किसी चाय वाले को गले से लगाया है आपने? चाय वाले से मुख्यमंत्री बने श्री मोदी जी ने क्या कभी चाय वालों की व्यथा सुनी? क्या कभी अपनी ही बिरादरी के चाय वालों से अपने फूटे मुह से बात की मोदी जी ने? नहीं न। तो क्यों फिर खामखां का ढोल पीटते घूम रहे हो? नमो चाय... नमो चाय...
सच तो ये है कि मोदी साहब और उनके गुर्गे छुटभैये नेताओं ने चाय वालों का तो रोज़गार भी छीन लिया है। बुरा मानो या भला, आपको अपने आप पता चल जायेगा। अपने भाई सतपाल तंवर को आगे-आगे पढ़ते जाओ...
मैं आपको एक दिन की घटना बताता हूँ। हुआ यूँ कि मैं रोड पर से गुजर रहा था। मुझे एक चाय वाला दिखा। कुछ अटपटा सा था। क्योंकि वहाँ मोदी साहेब के बैनर लगे हुए थे। उन बैनर पर गुड़गांव के एक छुटभैये नेता का फोटो भी लगा था। वो छुटभैया नेता गुड़गांव जिले की एक विधानसभा से भाजपा की टिकट मांगता है। मुझे थोडा ओर अच्छा लगा, मैंने ड्राईवर को बोलकर गाडी रुकवाई और ड्राईवर के साथ-साथ सभी साथियों को भी कह दिया कि आराम से पेड़ के निचे गाडी खड़ी कर आराम फरमाओ। मैं 10 मिनट में आता हूँ। बस फिर क्या था दोस्तों, मैं पहुँच गया उसी चाय वाले भैया के पास। पहले तो गरमागरम चाय का आर्डर दिया और फिर इत्मीनान से बैठकर स्थिति को भांपने लगा। बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया और चाय वाले भैया से घुलने-मिलने की कोशिश की। इस दौरान भाई हम तो चाय वाले भैया से घुल-मिल गए। लेकिन चाय वाला भैया थोडा परेशान सा लगा। बस मैं एक ही झटके में मुद्दे की बात पर आ गया। पूछ ही डाला चाय वाले भैया से, " कि भैया ये तो बताओ कि ये मोदी जी के बैनर लगाने से क्या आपकी बिक्री ज्यादा होती है?" मेरा ये दनदनाता हुआ सवाल सुनकर चाय वाला भैया सकपका गया। मैं भी यार खुलकर बोल रहा था। क्योंकि उसका चाय का खोखा सूना पड़ा था। वहाँ पर परिंदा भी पर नहीं मार रहा था। मेरे इस सवाल पर वो चौंका ज़रूर लेकिन इस बीच बात थम गयी। क्योंकि मेरी चाय बन गयी थी। मैंने भी चुपचाप चाय का गिलास पकड़ा और एक चुस्की ली। गला खांस कर मैंने फिर वही सवाल दोहरा दिया। उस चाय वाले ने इधर-उधर की बातें करके बात घुमा दी। मैं भी भाई राजनीति के दांव-पेंच जानता हूँ। मैं कहाँ चुप रहने वाला था। आ गया चाय वाला भाई मेरी बातों में और कह दिया सारा राज़ उस छुटभैये नेता और मोदी का। 
चाय वाला भैया बोला, "भाई साहब दिन में आराम से 500-1000 रूपये कमा लेता था लेकिन ये बैनर लगने के बाद 100 रुपए की बिक्री भी मुश्किल से होती है। इससे पहले मैं एक कम्पनी के बहार 12 साल खोखा लगाता था, इसके अलावा कम्पनी वाले भी एक दिन में 2200 रुपए तक की चाय मंगवा ही लेते थे, महीने की 10 तारीख तक उनका हिसाब हो जाता था। मेरा पूरा बचपन चाय बेचने में ही बीता है।" मैंने पूछा, "फिर वहाँ आप 12 साल से खोखा लगाते थे तो वहाँ से छोड़ कर यहाँ क्यूँ और कैसे आ गए?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब एक दिन कुछ लड़के आये और चाय पीकर गए. मैं 7 रुपए की एक चाय बेचता था। उन्होंने 7 रुपए के बदले 10 रुपए दिए। एक बार तो मैंने मना किया। लेकिन उन्होंने जबर्दस्ती मेरे हाथ में थमा दिए और कहा कि हम "फलां-फलां" नेता के आदमी हैं और मोदी जी के समर्थक हैं।"
मैंने भी गहरे रूप में ध्यानमग्न होकर पूछा कि, "भैया फिर क्या हुआ?" तो उस चाय वाले ने बताया कि, "भाई साहब ऐसे करके वो हर 2-4 दिन में चाय पीने के बहाने आने लगे और एक दिन कहा कि तुम हमारे साथ चलो वहाँ बिक्री भी ज्यादा होगी, किराया भी नहीं लेंगे, सेक्टर की मार्किट है, तुम्हारा खोखा खूब चलेगा और इस "फलां-फलां" नेता के पास लोग-बाग़ आते रहते हैं, सारी चाय तुमसे ही मंगवाया करेंगे।"
मुझे ओर भी बहुत कुछ जानने की इच्छा में समय का ही भान नहीं रहा। पीछे मुड़कर देखा तो मेरे साथी मेरे दैर होने की अवस्था में मेरे पीछे आकर खड़े हो गए थे। मैंने कहा, "मैं यहीं हूँ चिंता मत करो, आराम से बैठो।" उनके बताने पर मैंने अपना फोन देखा तो 8-10 मिस कॉल आयी हुई थी। साथी अपने फोन पर फोन कर रहे थे। जवाब नहीं मिलने पर ढूँढ़ते हुए चले आये। वैसे भी मोबाइल वाइब्रेशन पर था। दूसरा चाय वाले भैया की कहानी इतनी इंटरेस्टिंग थी कि कहाँ फोन का पता लगता। खैर मेरे कहने पर सभी लोग वापिस होकर दूर हट कर एकांत में खड़े हो गए।
मैं भी वापिस टॉपिक पर आ गया और पूछा, "हाँ भाई आगे क्या हुआ..."
चाय वाले भैया ने बताया कि उसने उन मोदी समर्थक लोगों पर विश्वास कर लिया और जगह देखने की इच्छा जाहिर की। नतीजन जहाँ अभी चाय वाला भैया बैठा है उसे वो जगह मोदी समर्थकों ने दिखा दी। जगह चाय वाले भैया को पसंद आ गयी। वहाँ से ज्यादा बिक्री होने पर भी विश्वास हो गया क्योंकि जगह गुड़गांव के एक पाश सेक्टर की मार्किट की थी। नतीजन इस सप्ताह के अंदर-अंदर चाय वाले ने अपना खोखा एक नामी कम्पनी के सामने से हटाकर उस नेता के घर के सामने लगा लिया। नेता का घर भी, मार्केट भी, नेता के पास आने वाले लोग भी सभी चाय पीने लगे।
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "ये तो अच्छी बात है, फिर क्या हुआ?"
चाय वाले ने बताया कि, "अच्छी बात क्या भाई साहब, पता नहीं कौन सी घडी थी जो मैं अपनी 12 साल पुरानी जगह छोड़ कर जो यहाँ आ गया।"
इतना कहते ही चाय वाला भाई रो पड़ा। मैंने उसको ढाढस बंधाया और कहा, "भाई बात बताओ कैसे? आखिर कैसे और किस रूप में आपके साथ बुरा हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब शुरू में 1 हफ्ता मैं निश्चिंत था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक सप्ताह बाद सामने वाले "नेता" ने अपने बैनर मेरे खोखे पर लगा दिए।"
मैंने पूछा फिर क्या हुआ?
चाय वाले भैया ने खखारकर थूक निगलते हुए जवाब दिया, "भाई साहब बैनर लगाने के बाद राह चलते ग्राहकों में कमी आ गयी। काफी लोग तो पास आकर, थोडा हंसकर दूर निकल जाते। उस समय मैंने समझा कुछ नहीं, नॉर्मल बात होगी। लेकिन मुझे तब सच्चाई का पता चला जब में पढ़ने वाले बच्चों से बात की। कुछ एक पढ़ने वाले बच्चे यहाँ पी०जी० में रहते हैं, 2-4 दिन से उन्होंने मेरे पास उनका आना शुरू हुआ था।
लेकिन ये बैनर लगाने के बाद उन्होंने आना बंद कर दिया। मैंने ये बात अपने दिमाग में रख ली। एक दिन वो बच्चे सामने से गुज़र रहे थे। तो मैंने उनसे पूछा कि बेटा अब चाय पीने क्यों नहीं आते तो उन्होंने कहा कि अंकल आप मोदी जी को चाय पिलाते हो उन्हें ही पिलाओ। हम नहीं पियेंगे। आपके यहाँ तो राजनीति होती है। हम क्यों शामिल हों आपकी राजनीति में? मैंने कहा मोदी के बैनर लगने से आपको क्या दिक्कत है? तो उन बच्चों ने कहा कि हम मोदी से नफरत करते हैं क्योंकि वो झूठे हैं। गुजरात में गरीबी की हद है, हम टूर पर गए थे तो देखा था। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मोदी टी०वी० पर सिर्फ झूठ का प्रचार करते हैं। हमें झूठे के बैनर तले बैठ कर चाय नहीं पीनी। थोडा आगे जाकर पी लेंगे। अपने रूम पर बनाकर पी लेंगे। लेकिन मोदी के बैनर नीचे बैठकर चाय नहीं पीयेंगे।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
तो चाय वाले भैया ने बताया कि उन्होंने बात आयी-गयी कर दी। कोई ज्यादा अफ़सोस नहीं जताया। लेकिन हद तो तब हो गयी जब भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये नेता ने अपनी गिरी हुई औकात दिखा दी। सुनिये चाय वाले भैया की ही जुबानी :-
 
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस 'फलां-फलां' नेता से उसका 4 रुपए प्रति चाय में सौदा तय हुआ। मेरे काफी प्राथना करने के बावजूद भी उसने इससे ज्यादा रुपए देने से मना कर दिया। परन्तु बहार भी ज्यादा बिक्री न होने के कारण मुझे बहार के रेट भी 7 रुपए से घटाकर 6 रुपए करने पड़े। यानि नेता जी 3 रुपए नुक्सान में और राह चलते लोगों को 1 रुपए नुक्सान में मुझे चाय पिलानी पड़ी। शुरू के 1 या सवा हफ्ते इस नेता ने चाय के नगद रुपए दिए। उसके बाद उधार करनी शुरू कर दी। मैंने कहा कि साहब 15-20 दिन में हिसाब हो जाये तो ठीक रहेगा। मुझे भी सामान लाना पड़ता है। इस पर उन्होंने कहा ठीक है कर देंगे। लेकिन महीना बीत गया। कोई हिसाब नहीं किया। आज-कल आज-कल करते करते दूसरा महीना भी बीत गया। मैंने पैसे मांगे तो नेता जी ने चुनाव के बाद हिसाब करने को बोला। मैं बहुत गिड़गिड़ाया लेकिन वो नहीं माना। इस दौरान नेता जी ने "चाय पर चर्चा" भी खूब की और इन महीनों में नेता जी ने खूब "मोदी टी स्टाल" लगवायी और "नमो चाय" मुफ्त में पिलाई। एक दिन में 5000-6000 रुपए की चाय मैं लोगों को पिलाने लगा। उसका रुपया नेता जी अपने खाते में चढ़वाते थे क्योंकि वो मोदी के नाम से "नमो चाय" जनता को मुफ्त पिलवाते थे।"
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस दौरान एक सरकारी विभाग वाले आकर मुझसे हफ्ता मांगने लगे। क्योंकि ये सरकारी जगह थी। ये जगह नेता जी की नहीं थी। इस पर मैंने नेता जी का नाम लिया तो उन्होंने कहा कि, "वो क्या करेगा? ये जगह उसके बाप की नहीं, सरकारी है।" नतीजन मैंने उनको 50 रुपया दिन का हफ्ता देना शुरू कर दिया।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया का गला भर आया। वो फूट-फूट कर रोने लगा। "भाई साहब मेरे साथ धोखा हुआ है। मैं तो लुट गया।" मैंने उसे गले लगाया और समझाया। इस पर उसे थोडा तसल्ली मिली। लेकिन 2 पल की तसल्ली फिर से गम में बदल गयी। अपने उबड़-खाबड़ हाथों से उसने अचानक अपना चेहरा ढंका और फिर उसका दुःख उसके गले और आँखों से फूट पड़ा। नाक बहने लगी। नाक भी निचे तलक लटक आयी। मैंने अपना रूमाल निकाला और चाय वाले भैया का नाक पोंछा।
मैंने कहा, "इत्मीनान से बैठो भाई। मैं आपके साथ हूँ।"
चहेरे पर उसके बदले की आग और गुस्से के भाव साफ़ झलक आये। चाय वाले भैया बोले :-
"चाय मेरी, चीनी मेरी, पत्ती मेरी, पतीला मेरा, अदरक मेरी, इलायची मेरी, दूध मेरा, छलनी मेरी, चम्मच मेरी, गिलास मेरा, कप मेरा, गैस मेरी, महनत मेरी, खून मेरा, पसीना मेरा। सब कुछ पी गया ये "फलां-फलां" नेता और जनता को भी पिलाया। क़र्ज़ चढ़ा मेरे सर पे और मुफ्त चाय पिला कर भला बन रहा है ये नेता। भाई साहब मेरा तो सब कुछ लूट लिया मोदी और मोदी के कुत्तों ने।" (नोट : "कुत्ता शब्द चाय वाले के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, जिसे आप तक पहुँचाना मेरा फ़र्ज़ है)
इस पर मैंने चाय वाले भैया से हिसाब-किताब पूछा। तो चाय वाले भाई ने अपनी पत्थर की बनी सीट पर पड़े एक मैले-कुचेले तकिये के निचे से एक फटी पुराणी कॉपी निकाल कर उसमें एक कपडे की कत्तर से बंधी हुई नेता के द्वारा लिखी गयी चाय की पर्चियां और कुल जोड़ा गया हिसाब मेरे सामने रख दिया।
बाप रे!
हिसाब देख कर तो मेरे पैरों तले की जमीन ही खिसक गयी। सवा 3 महीने का उधार 4 लाख 65 हज़ार 437 रुपया देख कर मेरे होंश उड़ गए।
बस मुझे तो मुद्दा चाहिए था और एक गरीब का भला करने का मौका। फर्क ये रहा कि मेरी आँख से आंसू निकले नहीं लेकिन कसर रही नहीं। लेकिन मेरी आँखों में भाजपा के उस छुटभैये नेता और मोदी के लिए गुस्से के लाल डोरे ज़रूर तैर रहे थे।
मैंने चाय वाले भैया की पीठ पर हाथ रखा और कहा आप चिंता मत करो मैं आपकी मदद करूँगा। ये मेरी जिम्मेवारी है।
इतना कह कर मैंने नेता जी के दरबार की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। इस दौरान चाय वाल भैया थोडा घबराया लेकिन मैंने उसको हाथ से इशारा करके तसल्ली रखने को कहा। मुझे देख कर दूर खड़े मेरे साथी भी मेरे पीछे-पीछे नेता जी के दरबार की तरफ चले आये।
सबसे पहले मेरा सामना नेता जी के यहाँ भाड़े के टट्टुओं से हुआ, नेता जी से मिलने की इच्छा जाहिर करने पर एक टट्टू बोला : कहाँ से आये हो, क्या नाम है, "भाई साहब" से क्यों मिलना है। इस पर मैंने बड़े इत्मीनान से कहा कि भाई जी मेरा नाम "सतपाल तंवर" है और मैं "भाई साहब" का ही एक चाहने वाला हूँ। इस पर वो बोले "भाई साहब" तो मीटिंग में हैं, समय लग जायेगा... वो भाड़े के छछूंदर इतना बोल ही रहे थे कि सामने की गैलरी में से अपने बाल संभालती हुई, दुप्पटा ठीक करती हुई और अपना लाल रंग का सूट निचे की तरफ खींच कर "सामने" से "फ्रंट" का उभरा हुआ बैलेंस सही करती हुई एक मोटी सी-काली सी औरत आती दिखाई पड़ी। थोडा बहार की तरफ नजदीक आयी तो देखा नेता जी के भाड़े के छछूंदर उसकी तरफ हल्का-हल्का मुस्कुराते हुए बढे। ओर थोडा नजदीक आयी। तो मुझे समझने में दैर नहीं लगी। ये तो वाही औरत थी जो कभी गुड़गांव के सरकारी हस्पताल और नगर निगम कार्यालय के आसपास, कभी झाड़सा रोड पर और कभी मोर चौक के आसपास सरेआम ग्राहकों को लुभाती देखी जा सकती है। काफी बार रोड पर से गुजरते हुए मैंने उसे देखा है। एक टैम्पू ड्राइवर ने बताया था कि ये गुड़गांव की सबसे पुराणी "सेक्स वर्कर" है। मेरी तरफ एक नज़र देख कर वो बहार पहले से ही खड़े रिक्शॉ में बैठ कर निकल गयी।
फिर नेता जी के टट्टुओं में से एक टट्टू की आवाज मेरे कानों में गूंजी। वो बोल रहा था कि "भाई साहब" फ्री हो गए हैं। मेरे हाथ में उस टट्टू ने एक पर्ची थमाते हुए कहा कि आप इस पर्ची पर अपना नाम लिख दो। मैं "भाई साहब" को देकर आता हूँ। मैंने वैसे ही किया जैसा उस टट्टू ने कहा। वो 5 मिनट बाद बाहर निकल कर आया। अबकी बार उसकी भाषा में कुछ अखड़पन नहीं बल्कि आदर झलक रहा था। वो बोला कि सर आपको भाई साहब अंदर बुला रहे हैं। हम भी उस टट्टू के बताये अनुसार नेता जी के घोंसले की तरफ चल पड़े। सोफे पर बैठे नेता जी बड़े ही विनम्र स्वभाव से हाथ जोड़कर गले लग गए। बदले में हमने भी थोडा सा प्यार दिखाया और बैठ गए सोफे पर। नेता जी ने चाय का ऑर्डर दिया। बहार से चाय बनकर आ गयी। इस दौरान चाय भी पी और नेता जी से पहली मुलाक़ात थी तो उन्होंने भी उस चाय की प्याली को "नमो चाय" कहकर ही सम्बोधित किया। हमने भी चुपचाप सुना। इधर-उधर की बातें होने के साथ-साथ चुनाव का ज़िक्र चल ही पड़ा। हम तो बनकर गए थे चाय वाले भैया की आवाज। नेता जी तो हमसे वोट और सपोर्ट ही मांगने लग गए। मुझे भी मुद्दे पर आना था। बस 4 रुपए के हिसाब से 7 लोगों के 28 रुपए सामने पड़ी मेज पर डाल दिए। ये देखकर नेता जी थोडा सकपकाया। मैंने कहा उठाओ "भाई साहब".
नेता जी चौंकते हुए बोले, "ये क्या है?"
तो मैंने भी नेता जी को मतलब समझा ही दिया। 4 रुपए के हिसाब से हम 7 लोगों के 28 रुपए हुए। उस गरीब चाय वाले भैया को अभी ये रुपए पहुंचाओ। नेता जी बोले नहीं तंवर साहब आप हमारे घर आये हैं। आप महमान हैं। हम आपको चाय पिलायेंगे और तंवर आपको कैसे पता कि हम एक चाय के 4 रुपए देते हैं। इस पर मैंने नेता जी को जवाब दिया कि "भाई साहब" मुझे तो बहुत कुछ पता है। ये पोल कहीं जनता में न खुल जाये। इसलिए सबसे पहले ये 28 रुपया उठाकर चाय वाले के पास पहुंचाओ। हम आपके पास किसी गरीब की बद्दुआ लेने नहीं आये। आगे की बात बाद में करेंगे। पहले ये 28 रुपया चाय वाले तक पहुंचाओ। 
नेता जी के चहेरा थोडा सफ़ेद पड़ गया और बहार से अपने एक भाड़े के छछूंदर को आवाज लगाकर 28 रुपया उस चाय वाले के पास उसने भिजवा दिया। मैं वहाँ बैठा मन ही मन सोच रहा था कि चाय वाले भैया का थोडा होंसला तो बढ़ेगा। इतनी देर में नेता जी बोले "क्या हुआ तंवर साहब, पहली बार आये और नाराज़गी में आये।"
बस फिर क्या था। जो मन में आया वो बका। नेता जी तो नेता जी ठहरे। विरोध कर नहीं सकते थे। वोटों का लालच जो था। अब इसी की आड़ में मैंने भी नेता जी का कोई बहाना नहीं सुना और चाय वाले भैया का हिसाब फाइनल करने की तारीख मांग ली। काफी कुर-कुर करने के बाद भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये कुकडूं नेता ने 9 दिन बाद हिसाब का दिन मुक्करर कर दिया। इसी के साथ हम भी उठ खड़े हुए और चेतावनी देकर निकल चले। इतना भी कह दिया कि चाय वाले भैया का ख्याल रखना इसे कुछ हुआ तो आप जिम्मेवार होंगे।

अब दोस्तों 9 दिन बाद का इंतज़ार है। यदि भाजपा के उस छुटभैये नेता ने तय समय के अनुसार चाय वाले भैया का रुपया नहीं दिया तो उसका नाम मीडिया में उजागर करके उसकी पोल खोलनी है। बस आप इंतज़ार करियेगा और पढ़ते रहिएगा हरियाणा की माटी के लाल अपने भाई सतपाल को।
 
लेखक "नवाब सतपाल तंवर" 

Thursday, October 25, 2012

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) का विदायी अभिभाषण


आपने पहले ईश्वर की प्रशंसा, स्तुति और गुणगान किया, मन-मस्तिष्क की बुरी उकसाहटों और बुरे कामों से अल्लाह की शरण चाही; इस्लाम के मूलाधार ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ की गवाही दी और फ़रमाया :
ऐ लोगो! अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है, वह एक ही है, कोई उसका साझी नहीं है। अल्लाह ने अपना वचन पूरा किया, उसने अपने बन्दे (रसूल) की सहायता की और अकेला ही अधर्म की सारी शक्ति को पराजित किया।
लोगो मेरी बात सुनो, मैं नहीं समझता कि अब कभी हम इस तरह एकत्र हो सकेंगें और संभवतः इस वर्ष के बाद मैं हज न कर सकूँगा।
लोगो, अल्लाह फ़रमाता है कि, इन्सानो, हम ने तुम सब को एक ही पुरुष व स्त्री से पैदा किया है और तुम्हें गिरोहों और क़बीलों में बाँट दिया गया कि तुम अलग-अलग पहचाने जा सको। अल्लाह की दृष्टि में तुम में सबसे अच्छा और आदर वाला वह है जो अल्लाह से ज़्यादा डरने वाला है। किसी अरबी को किसी ग़ैर-अरबी पर, किसी ग़ैर-अरबी को किसी अरबी पर कोई प्रतिष्ठा हासिल नहीं है। न काला गोरे से उत्तम है न गोरा काले से। हाँ आदर और प्रतिष्ठा का कोई मापदंड है तो वह ईशपरायणता है।
सारे मनुष्य आदम की संतान हैं और आदम मिट्टी से बनाए गए। अब प्रतिष्ठा एवं उत्तमता के सारे दावे, ख़ून एवं माल की सारी मांगें और शत्रुता के सारे बदले मेरे पाँव तले रौंदे जा चुके हैं। बस, काबा का प्रबंध और हाजियों को पानी पिलाने की सेवा का क्रम जारी रहेगा। कु़रैश के लोगो! ऐसा न हो कि अल्लाह के समक्ष तुम इस तरह आओ कि तुम्हारी गरदनों पर तो दुनिया का बोझ हो और दूसरे लोग परलोक का सामन लेकर आएँ, और अगर ऐसा हुआ तो मैं अल्लाह के सामने तुम्हारे कुछ काम न आ सकूंगा।
कु़रैश के लोगो, अल्लाह ने तुम्हारे झूठे घमंड को ख़त्म कर डाला, और बाप-दादा के कारनामों पर तुम्हारे गर्व की कोई गुंजाइश नहीं। लोगो, तुम्हारे ख़ून, माल व इज़्ज़त एक-दूसरे पर हराम कर दी गईं हमेशा के लिए। इन चीज़ों का महत्व ऐसा ही है जैसा तुम्हारे इस दिन का और इस मुबारक महीने का, विशेषतः इस शहर में। तुम सब अल्लाह के सामने जाओगे और वह तुम से तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछेगा।
देखो, कहीं मेरे बाद भटक न जाना कि आपस में एक-दूसरे का ख़ून बहाने लगो। अगर किसी के पास धरोहर (अमानत) रखी जाए तो वह इस बात का पाबन्द है कि अमानत रखवाने वाले को अमानत पहुँचा दे। लोगो, हर मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है और सारे मुसलमान आपस में भाई-भाई है। अपने गु़लामों का ख़्याल रखो, हां गु़लामों का ख़्याल रखो। इन्हें वही खिलाओ जो ख़ुद खाते हो, वैसा ही पहनाओ जैसा तुम पहनते हो।
जाहिलियत (अज्ञान) का सब कुछ मैंने अपने पैरों से कुचल दिया। जाहिलियत के समय के ख़ून के सारे बदले ख़त्म कर दिये गए। पहला बदला जिसे मैं क्षमा करता हूं मेरे अपने परिवार का है। रबीअ़-बिन-हारिस के दूध-पीते बेटे का ख़ून जिसे बनू-हज़ील ने मार डाला था, मैं क्षमा करता हूं। जाहिलियत के समय के ब्याज (सूद) अब कोई महत्व नहीं रखते, पहला सूद, जिसे मैं निरस्त कराता हूं, अब्बास-बिन-अब्दुल मुत्तलिब के परिवार का सूद है।
लोगो, अल्लाह ने हर हक़दार को उसका हक़ दे दिया, अब कोई किसी उत्तराधिकारी (वारिस) के हक़ में वसीयत न करे।
बच्चा उसी के तरफ़ मन्सूब किया जाएगा जिसके बिस्तर पर पैदा हुआ। जिस पर हरामकारी साबित हो उसकी सज़ा पत्थर है, सारे कर्मों का हिसाब-किताब अल्लाह के यहाँ होगा।
जो कोई अपना वंश (नसब) परिवर्तन करे या कोई गु़लाम अपने मालिक के बदले किसी और को मालिक ज़ाहिर करे उस पर ख़ुदा की फिटकार।
क़र्ज़ अदा कर दिया जाए, माँगी हुई वस्तु वापस करनी चाहिए, उपहार का बदला देना चाहिए और जो कोई किसी की ज़मानत ले वह दंड (तावान) अदा करे।
स किसी के लिए यह जायज़ नहीं कि वह अपने भाई से कुछ ले, सिवा उसके जिस पर उस का भाई राज़ी हो और ख़ुशी-ख़ुशी दे। स्वयं पर एवं दूसरों पर अत्याचार न करो।
औरत के लिए यह जायज़ नहीं है कि वह अपने पति का माल उसकी अनुमति के बिना किसी को दे।
देखो, तुम्हारे ऊपर तुम्हारी पत्नियों के कुछ अधिकार हैं। इसी तरह, उन पर तुम्हारे कुछ अधिकार हैं। औरतों पर तुम्हारा यह अधिकार है कि वे अपने पास किसी ऐसे व्यक्ति को न बुलाएँ, जिसे तुम पसन्द नहीं करते और कोई ख़्यानत (विश्वासघात) न करें, और अगर वह ऐसा करें तो अल्लाह की ओर से तुम्हें इसकी अनुमति है कि उन्हें हल्का शारीरिक दंड दो, और वह बाज़ आ जाएँ तो उन्हें अच्छी तरह खिलाओ, पहनाओ।
औरतों से सद्व्यवहार करो क्योंकि वह तुम्हारी पाबन्द हैं और स्वयं वह अपने लिए कुछ नहीं कर सकतीं। अतः इनके बारे में अल्लाह से डरो कि तुम ने इन्हें अल्लाह के नाम पर हासिल किया है और उसी के नाम पर वह तुम्हारे लिए हलाल हुईं। लोगो, मेरी बात समझ लो, मैंने तुम्हें अल्लाह का संदेश पहुँचा दिया।
मैं तुम्हारे बीच एक ऐसी चीज़ छोड़ जाता हूं कि तुम कभी नहीं भटकोगे, यदि उस पर क़ायम रहे, और वह अल्लाह की किताब (क़ुरआन) है और हाँ देखो, धर्म के (दीनी) मामलात में सीमा के आगे न बढ़ना कि तुम से पहले के लोग इन्हीं कारणों से नष्ट कर दिए गए।
शैतान को अब इस बात की कोई उम्मीद नहीं रह गई है कि अब उसकी इस शहर में इबादत की जाएगी किन्तु यह संभव है कि ऐसे मामलात में जिन्हें तुम कम महत्व देते हो, उसकी बात मान ली जाए और वह इस पर राज़ी है, इसलिए तुम उससे अपने धर्म (दीन) व विश्वास (ईमान) की रक्षा करना।
लोगो, अपने रब की इबादत करो, पाँच वक़्त की नमाज़ अदा करो, पूरे महीने के रोज़े रखो, अपने धन की ज़कात ख़ुशदिली के साथ देते रहो। अल्लाह के घर (काबा) का हज करो और अपने सरदार का आज्ञापालन करो तो अपने रब की जन्नत में दाख़िल हो जाओगे।
अब अपराधी स्वयं अपने अपराध का ज़िम्मेदार होगा और अब न बाप के बदले बेटा पकड़ा जाएगा न बेटे का बदला बाप से लिया जाएगा ।
सुनो, जो लोग यहाँ मौजूद हैं, उन्हें चाहिए कि ये आदेश और ये बातें उन लोगों को बताएँ जो यहाँ नहीं हैं, हो सकता है, कि कोई अनुपस्थित व्यक्ति तुम से ज़्यादा इन बातों को समझने और सुरक्षित रखने वाला हो। और लोगो, तुम से मेरे बारे में अल्लाह के यहाँ पूछा जाएगा, बताओ तुम क्या जवाब दोगे? लोगों ने जवाब दिया कि हम इस बात की गवाही देंगे कि आप (सल्ल॰) ने अमानत (दीन का संदेश) पहुँचा दिया और रिसालत (ईशदूतत्व) का हक़ अदा कर दिया, और हमें सत्य और भलाई का रास्ता दिखा दिया।
यह सुनकर मुहम्मद (सल्ल॰) ने अपनी शहादत की उँगुली आसमान की ओर उठाई और लोगों की ओर इशारा करते हुए तीन बार फ़रमाया, ऐ अल्लाह, गवाह रहना! ऐ अल्लाह, गवाह रहना! ऐ अल्लाह, गवाह रहना।

Saturday, August 11, 2012

यमुना एक्सप्रेसवे : गांवों के जबरदस्‍ती शहरीकरण की त्रासदी



आगरा से दिल्ली को जोड़नेवाली सड़क यमुना एक्सप्रेसवे को आम उपयोग के लिए खोल दिया गया है। छह लेन की इस 165 किलोमीटर सड़क के कारण आगरा से दिल्ली का सफर मात्र तीन घंटे में पूरा किया जा सकता है। लेकिन यह एक सड़क मात्र नहीं है। इसके साथ पांच-पांच सौ हेक्टेयर की पांच टाउनशिप भी विकसित की जा रही है। इसे दिल्ली-एनसीआर के विस्तार के एक नये अध्याय के बतौर देखा जा रहा है। इसके साथ ही पिछले साल इस परियोजना क्षेत्र में विस्थापित भट्टा पारसौल के ग्रामीणों के पक्ष में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के उत्सवी सत्याग्रह का भी पटाक्षेप हो जाएगा, जबकि गांवों के बलात शहरीकरण से जुड़े सवाल लंबे समय तक विकास की मौजूदा अवधारणा को मुंह चिढ़ाएंगे।

यह प्रसंग महज ग्रेटर नोएडा से आगरा तक सीमित नहीं बल्कि झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा जैसे राज्यों में हाल के दिनों में भूमि-अधिग्रहण को लेकर सरकार, रैयतों और कारपोरेट घरानों के बीच तीखे संघर्षों तथा विभिन्न हित-समूहों की भूमिका से भी जुड़ा है। झारखंड की राजधानी रांची के समीप पिठोरिया रोड पर नगड़ी गांव की लगभग 200 एकड़ जमीन तीन प्रतिष्‍ठित शिक्षण संस्थानों को देने को लेकर जारी तीखा विवाद भी एक देशव्यापी चिंता का एक अहम हिस्सा है।

यमुना एक्सप्रेसवे और नोएडा एक्सटेंशन को लेकर जारी विवाद हो या फिर सिंगूर-नंदीग्राम-झाड़ग्राम या फिर नगड़ी, इन मामलों ने अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1894 में बनाये गये भूमि-अधिग्रहण कानून की असलियत सामने ला दी है, जिसमें राज्य सरकार को किसी भी रैयत को उसकी भूमि से किसी भी क्षण बेदखल कर देने की निर्बाध ताकत प्राप्त है। अंग्रेजों के जमाने में बने औपनिवेशिक कानूनों को अब तक बनाये रखने का नतीजा खुद सरकार को ही नहीं, पूरे समाज और खासकर रैयतों को भुगतना पड़ रहा है।
भूमि-अधिग्रहण कानून की धारा चार के अनुसार अगर सरकार को किसी सार्वजनिक हित या किसी कंपनी के लिए जरूरत हो तो किसी भी जमीन का अधिग्रहण करने की सूचना जारी कर सकती है। ऐसी सूचना जारी होने के साथ ही तत्काल सरकारी अधिकारियों को उस जमीन में घुसकर कुछ भी करने का अधिकार मिल जाएगा। वे चाहें तो जमीन का सर्वेक्षण करें, या कोई खुदाई करें, यहां तक कि चहारदीवारी खड़ी कर लें या फिर खड़ी फसलों को काट डालें। अगर उस जमीन पर कोई घर हो तो सरकार महज एक सप्ताह का नोटिस देकर उस घर के अंदर भी घुस सकती है।

कानून की धारा पांच के मुताबिक अगर रैयत को कोई आपत्ति हो तो जिला मजिस्ट्रेट उसकी आपत्तियां सुनकर रिपोर्ट देगा। रैयत के पुनर्वास और मुआवजे के संबंध में कोई स्पष्‍ट प्रावधान नहीं होने के कारण रैयतों को आसानी से बेदखल करना संभव हो जाता है। झारखंड में नगड़ी के उदाहरण से समझा जा सकता है कि 1957 में महज सात रुपये डिसमिल पर जमीन छोड़ने को रैयत तैयार नहीं हुए, तो यह राशि कोषागार में जमा करके जमीन को अधिगृहीत मान लिया गया।

कानून की धारा 17 के दुरुपयोग ने इस समस्या को कुछ ज्यादा ही जटिल बना दिया है। इसके अनुसार किसी आपातकालीन स्थिति में रैयतों की आपत्ति मांगे बगैर ही किसी जमीन का अधिग्रहण कर लिया जाएगा। यह धारा किसी बाढ़ या आफत की स्थिति के लिए बनायी गयी थी। लेकिन उत्तरप्रदेश के उदाहरणों में देखा जा सकता है कि आवासीय कालोनियां बनाने और कारखाने लगाने के लिए इस धारा का कितना बेजा इस्तेमाल हुआ।

इस परिघटना को सभ्यताओं के टकराव के बतौर भी देखा जा सकता है, जहां शहरी परिवेश के लोगों की नजर में ग्रामीण परिवेश को अविकसित माना जाता है और जहां प्राकृतिक जंगलों के बजाय कंक्रीट के जंगल को विकास का पर्याय मान लिया जाता है। ग्रेटर नोएडा हो या गुड़गांव, हर जगह शहरीकरण के नाम पर हुए तथाकथित विकास में एक चीज सिरे से गायब है और वह है स्थानीय लोगों की सहभागिता। दिल्ली एनसीआर के फैलाव की महत्वाकांक्षी योजनाओं का महत्व समझा जा सकता है, लेकिन इसमें स्थानीय लोगों को पूरी तरह दरकिनार करके किसी जेपी ग्रुप जैसे कारपोरेट को विकास का पूरा जिम्मा देने से एक अपंग समाज का ही निर्माण होगा। वही हो भी रहा है। दिल्ली से आप बहादुरगढ़ की ओर जाएं या फिर गाजियाबाद की ओर, हर जगह आपको ग्रामीण परिवेश के सामने मौजूद अस्तित्व का संकट साफ दिख जाएगा। गगनचुंबी भवनों के बीच कहीं दबी-सहमी ग्रामीण बस्तियों और खेत-खलिहानों से जुड़े लोग सहसा विकास पर पैबंद जैसे दिखने लगेंगे। ऐसे लोगों का अपनी ही जमीन पर अचानक मिसफिट हो जाना इस तथाकथित विकास की सबसे बड़ी त्रासदी है।

दिल्ली की महायोजना ने समीपवर्ती राज्यों से सटे इलाकों को कृषि क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र हरित क्षेत्र सहित अन्य श्रेणियों में विभक्त कर रखा है। हुडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद इत्यादि प्राधिकारों ने भी अपने मास्टर प्लान बनाकर शहरीकरण की प्रक्रिया चला रखी है। ऐसे मास्टर प्लानों में इतनी कड़ाई के नियम रखे जाते हैं, जो किसी भी तरह के अनियंत्रित व अनियोजित निर्माण की इजाजत नहीं देते। लेकिन विडंबना है कि ऐसे ही प्रावधानों के कारण बेतरतीब विकास की गुंजाइश ज्यादा निकलती है। कारण यह कि अपने मास्टर प्लान के मुताबिक आवासीय घर या भूखंड आवंटित करने की प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी व महंगी है कि गरीब लोगों की बात तो दूर, मध्यवर्गीय लोगों के लिए भी अपनी छत एक सपना ही रह जाती है।

इसके कारण ऐसे लोगों को कानून के छिद्रों का सहारा लेकर या फिर गैरकानूनी तरीके से बेतरतीब निर्माण के लिए विवश होना पड़ता है। कानून के छिद्रों का सहारा लेने का उदाहरण दिल्ली में लाल डोरा की जमीनों में या फिर नोएडा में आबादी प्लाटों में होने वाले चालाकीपूर्ण उपयोग व निर्माण के बतौर देखा जा सकता है। यही बात कृषि जमीनों में तथाकथित फार्म हाउस के नाम पर चल रहे धंधे या फिर कारखानों के नाम पर इंडस्ट्रियल क्षेत्रों में आवंटित जमीनों के मनमाने उपयोग में निहित है।

दिलचस्प यह कि दिल्ली-एनसीआर व उसके विस्तारित क्षेत्रों में जमीन की बढ़ती कीमतों का फायदा भूस्वामियों के बजाय जमीन दलालों और बिल्डरों, कारपोरेट घरानों को ज्यादा मिल रहा है। जबकि गांव से अचानक शहर में बदलते इलाको में जमीन बेचकर या जमीन से विस्थापित होकर कम या ज्यादा रकम पाने वाले लोगों के पास जीवन-यापन या रोजगार का कोई दीर्घजीवी व मुकम्मल रास्ता नहीं होने के कारण उनकी वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए अस्तित्व का संकट तत्काल सामने नजर आता है। जमीन बिकने या मुआवजे से मिले रुपयों से चमचमाती स्कार्पियो में दौड़ने की होड़ में उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि उनके नीचे की जमीन किस तेजी से खिसक रही है। किसी सरकार ने किसी महायोजना में इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत नहीं समझी कि गांव से नगर में विकास की प्रक्रिया में आदमी की सदियों से चली आ रही जीवन-पद्धतियों और जीविकोपार्जन के तरीकों का भी ध्यान रखना जरूरी है।

यह प्रक्रिया न तो गुड़गांव को गांव रहने देती है और न ही नगड़ी को सचमुच किसी नगरी में बदलने देती है। गांव-नगर का यह द्वंद्व कहीं सभ्यताओं के संघर्ष में तो कहीं वर्गीय हितों के टकराव में नजर आता है। ऐसे में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब भट्टा पारसौल के लिए उत्सवी सत्याग्रह करते हैं, तो यह प्रहसन के सिवाय कुछ नहीं दिखता। ऐसे मामलों का राजनीतिकरण करने या किसी दल या सरकार को निशाना बनाने से कुछ नहीं होने वाला। मूल समस्या अंग्रेजों के बनाये औपनिवेशिक कानूनों और विकास की शहर-केंद्रित अवधारणा में निहित है। इन पर दूरगामी फैसलों से ही कोई हल निकलेगा, बशर्ते उसके केंद्र में आदमी की चिंता पहले हो।

(विष्‍णु राजगढ़िया। वरिष्‍ठ पत्रकार। सूचना के अधिकार को लेकर पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय। रांची में रहते हैं। उनसे vranchi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Friday, January 27, 2012

एक 'देशद्रोही' ने कैसे मनाया गणतंत्र दिवस



कितना अच्छा दिन है आज। हम गणतंत्र दिवस का जश्न मना रहे हैं। लाल किले से लेकर स्कूल-कॉलेजों में और मुहल्लों से लेकर अपार्टमेंटों तक में तिरंगा फहराया जा रहा है  बच्चों में मिठाइयां बांटी जा रही हैं। मेरे अपार्टमेंट में भी देशभक्ति से भरे गाने बज रहे हैं और मैंने उस शोर से बचने के लिए अपने फ्लैट के सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं। मैं नीचे झंडा फहराने के कार्यक्रम में भी नहीं जा रहा जहां अपार्टमेंट के सारे लोग प्रेज़िडेंट साहब और लोकल नेताजी का भाषण सुनने के लिए जमा हो रहे हैं। मैं इस छुट्टी का आनंद लेते हुए घर में बैठा बेटी के साथ टॉम ऐंड जेरी देख रहा हूं।
आप मुझे देशद्रोही कह सकते हैं। कह सकते हैं कि मुझे देश से प्यार नहीं है। मुझपर जूते-चप्पल फेंक सकते हैं। कोई ज़्यादा ही देशभक्त मुझपर पाकिस्तानी होने का आरोप भी लगा सकता है।
मैं मानता हूं कि मेरा यह काम शर्मनाक है  लेकिन मैं क्या करूं ? मैं जानता हूं कि जब मैं नीचे जाऊंगा और लोगों को बड़ी-बड़ी देशभक्तिपूर्ण बातें बोलते हुए देखूंगा तो मुझसे रहा नहीं जाएगा। वहां हमारे लोकल एमएलए होंगे जिनके भ्रष्टाचार के किस्से उनकी विशाल कोठी और बाहर लगीं चार-पांच कारें खोलती हैं  वह हमारे बच्चों को गांधीजी के त्याग और बलिदान की बात बताएंगे। वहां हमारे सेक्रेटरी साहब होंगे जिन्होंने मकान बनते समय लाखों का घपला किया और आज तक जबरदस्ती सेक्रेटरी बने हुए हैं, वह देश के लिए कुर्बानी देनेवाले शहीदों की याद में आंसू बहाएंगे। वहां अपार्टमेंट के वे तमाम सदस्य होंगे जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एक्स्ट्रा कमरे बनवा लिए हैं और कॉमन जगह दखल कर ली है ऐसे भी कई होंगे जिन्होंने बिजली के मीटर रुकवा दिए हैं। ये सारे लोग वहां तालियां बजाएंगे कि आज हम आज़ाद हैं।

क्या करूं अगर मुझे ऐसे लोगों को देशभक्ति की बात करते देख गुस्सा आ जाता है। इसलिए मैंने फैसला कर लिया है कि मैं वहां जाऊं ही नहीं। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं उनसे बच नहीं पाऊंगा। ये सारे लोग आज गणतंत्र दिवस का जश्न मनाने के बाद कल शहर की सड़कों पर निकलेंगे और हर गली  हर चौराहे  हर दफ्तर  हर रेस्तरां में होंगे। मैं उनसे बचकर कहां जाऊंगा ?

कल को जब मैं ऑफिस के लिए निकलूंगा और देखूंगा कि टंकी में तेल नहीं है तो मेरी पहली चिंता यही होगी कि तेल कहां से भराऊं  क्योंकि ज़्यादातर पेट्रोल पंपों में मिलावटी तेल मिलता है (पेट्रोल पंप का वह मालिक भी आज गणतंत्र दिवस का जश्न मना रहा होगा  अगर वह खुद नेता होगा तो शायद भाषण भी दे रहा होगा)। खैर  अपने एक विश्वसनीय पेट्रोल पंप तक मेरी गाड़ी चल ही जाएगी इस भरोसे के साथ मैं आगे बढ़ूंगा और चौराहे की लाल बत्ती पर रुकूंगा। रुकते ही सुनूंगा मेरे पीछे वाली गाड़ी का हॉर्न जिसका ड्राइवर इसलिए मुझपर बिगड़ रहा होगा कि मैं लाल बत्ती पर क्यों रुक रहा हूं। मेरे आसपास की सारी गाड़ियां  रिक्शे  बस सब लाल बत्ती को अनदेखा करते हुए आगे बढ़ जाएंगे  क्योंकि चौराहे पर कोई पुलिसवाला नहीं है। मैं एक देशद्रोही नागरिक जो आज गणतंत्र दिवस के समारोह में नहीं जा रहा कल उस चौराहे पर भी अकेला पड़ जाऊंगा  जबकि सारे देशभक्त अपनी मंज़िल की ओर बढ़ जाएंगे।

अगले चौराहे पर पुलिसवाला मौजूद होगा  इसलिए कुछ गाड़ियां लाल बत्ती पर रुकेंगी। लेकिन बसवाला नहीं। उसे पुलिसवाले का डर नहीं  क्योंकि या तो वह खुद उसी पुलिसवाले को हफ्ता देता है या फिर बस का मालिक खुद पुलिसवाला है  या कोई नेता है। नेताओं  पुलिसवालों और पैसेवालों के लिए इस आज़ाद देश में कानून न मानने की आज़ादी है। मैं देखूंगा कि मेरे बराबर में ही एक देशभक्त पुलिसवाला बिना हेल्मेट लगाए बाइक पर सवार है  लेकिन मैं उसे टोकने का खतरा नहीं मोल ले सकता  क्योंकि वह किसी भी बहाने मुझे रोक सकता है  मेरी पिटाई कर सकता है  मुझे गिरफ्तार कर सकता है। आप मुझे बचाने के लिए भी नहीं आएंगे क्योंकि मैं ठहरा देशद्रोही जो आज गणतंत्र दिवस का जश्न मनाने के बजाय कार्टून चैनल देख रहा है।

आगे चलते हुए मैं उन इलाकों से गुज़रूंगा जहां लोगों ने सड़कों पर घर बना दिए हैं  लेकिन उन घरों को तोड़ने की हिम्मत किसी को नहीं है  क्योंकि वे वोट देते हैं। वोट बेचकर वे सड़क को घेर लेने की आज़ादी खरीदते हैं  और वोट खरीदकर ये एमएलए-एमपी विधानसभा और संसद में पहुंचते हैं जहां एक तरफ उन्हें कानून बनाने का कानूनी अधिकार मिल जाता है  दूसरी तरफ कानून तोड़ने का गैरकानूनी अधिकार भी। कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता। इसलिए वे अपने वोटरों से कहते हैं  रूल्स आर फॉर फूल्स। मैं भी कानून तोड़ता हूं  तुम भी तोड़ो। मस्त रहो  बस मुझे वोट देते रहो  मैं तुम्हें बचाता रहूंगा।

इसको कहते हैं लोकतंत्र। लोग अपने वोट की ताकत से नाजायज़ अधिकार खरीदते हैं  अपनी आज़ादी खरीदते हैं - कानून तोड़ने की आज़ादी। यह तो मेरे जैसा देशद्रोही ही है जो लोकतंत्र का महत्व नहीं समझ रहा  जिसने अपने फ्लैट में एक इंच भी इधर-उधर नहीं किया  और उसी तंग दायरे में सिमटा रहा  जबकि देशभक्तों ने कमरे  मंजिलें सब बना दीं सिर्फ इस लोकतंत्र के बल पर। आज उसी लोकतांत्रिक देश की गणतंत्र होने की सालगिरह पर लोक और सत्ता के इस गठजोड़ को और मज़बूती देने के लिए जगह-जगह ऐसे ही कानूनतोड़क लोग अपने कानूनतोड़क नेता को बुला रहे है।

जनता के ये सेवक आज अपने-अपने इलाकों में तिरंगा फहराएंगे। एक एमएलए-एमपी और बीसियों जगह से आमंत्रण। लेकिन देशसेवा का व्रत लिया है तो जाना ही होगा। आखिरकार जब भाषण देते-देते थक जाएंगे तो रात को किसी बड़े व्यापारी-इंडस्ट्रियलिस्ट के सौजन्य से सुरा-सुंदरी का सहारा लेकर अपनी थकान मिटाएंगे। यह तो मेरे जैसे देशद्रोही ही होंगे जो अपने फ्लैट में दुबके बैठे है और जो रात को दाल-रोटी-सब्जी खाकर सो जाएंगे।

नीचे देशभक्ति के गाने बंद हो गए हैं  भाषण शुरू हो चुके हैं। जय हिंद के नारे लग रहे हैं। मेरा मन भी करता है कि यहीं से सही  मैं भी इस नारे में साथ दूं। दरवाज़ा खोलकर बालकनी में जाता हूं। नीचे खड़े लोगों के चेहरे देखता हूं। चौंक जाता हूं  अरे  यह मैं क्या सुन रहा हूं  ऊपर से हर कोई जय हिंद बोल रहा है लेकिन मुझे उनके दिल से निकलती यही आवाज़ सुनाई दे रही है - मेरी मर्ज़ी। मैं लाइन तोड़ आगे बढ़ जाऊं  मेरी मर्जी। मैं रिश्वत दे जमीन हथियाऊं  मेरी मर्ज़ी। मैं हर कानून को लात दिखाऊं  मेरी मर्ज़ी...

मैं बालकनी का दरवाज़ा बंद कर वापस कमरे में आ गया हूं। ड्रॉइंग रूम में बेटी ने टीवी के ऊपर प्लास्टिक का छोटा-सा झंडा लगा रखा है। मैं उसके सामने खड़ा हो जाता हूं। झंडे को चूमता हूं  और बोलने की कोशिश करता हूं - जय हिंद। लेकिन आवाज़ भर्रा जाती है। खुद को बहुत ही अकेला पाता हूं। सोचता हूं क्या और भी लोग होंगे मेरी तरह जो आज अकेले में गणतंत्र दिवस का यह त्यौहार मना रहे होंगे। वे लोग जो इस भीड़ का हिस्सा बनने से खुद को बचाये रख पाए होंगे ? वे लोग जो अपने फायदे के लिए इस देश के कानून को रौंदने में विश्वास नहीं करते ? वे लोग जो रिश्वत या ताकत के बल पर दूसरों का हक नहीं छीनते ?