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Thursday, February 18, 2016

देश में चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है, ऐसा पक्षपात क्यों, और कैसे ??

 महात्मा गांधी ने अक्तूबर, 1931 में डा. बीआर अंबेडकर के बारे में कहा था, “उनके पास नाराज़ होने, कटु होने की तमाम वजहें हैं. वे हमारा सिर नहीं फोड़ रहे हैं तो ये उनका आत्म संयम है.”

इस बयान से ज़ाहिर है कि अंबेडकर और उनके समुदाय के साथ हुए अत्याचारों की पृष्ठभूमि में उनके द्वारा कटु शब्दों के इस्तेमाल को महात्मा गांधी ग़लत नहीं मानते थे.
बहरहाल, मैं अभी सतारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ एक दूसरे विश्वविद्यालय में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बारे में सोच रहा हूं.
दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफ़ज़ल गुरू की बरसी के मौक़े पर हुई विरोध सभा के मुद्दे पर कुछ छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज कराया गया है.
देशद्रोह “वह अपराध है जिसके तहत कुछ कहने, लिखने और कुछ अन्य काम करने से सरकार की अवज्ञा करने को प्रोत्साहन मिलता है.’’

पूर्वी दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के सांसद महेश गिरी ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराई है. उन्होंने अपनी लिखित शिकायत में इन छात्रों को संविधान विरोधी और देशद्रोही तत्व कहा है.

गिरी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भी ख़त लिखकर, “इस तरह के शर्मनाक और भारत विरोधी गतिविधियों के दोबारा नहीं होने देने के लिए अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की अपील की थी.”

यह हैदराबाद में हुई घटना को दुहराने जैसा लग रहा है, जहां बीजेपी ने याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर सख़्त कार्रवाई की थी. इस मामले का दुखद पहलू ये रहा है कि एक छात्र ने आत्महत्या कर ली.

हालांकि जेएनयू ने कहा कि उसने इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और उसने मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है.

लेकिन इस कमेटी में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. छात्र संघों का कहना है कि जांच कमेटी में उपेक्षित और हाशिए पर रहे समुदायों का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया है.

मेरे ख़्याल से भारतीय जनता पार्टी के सामने इस मामले में विकल्प था, छात्रों पर आरोप लगाने के बदले, उसे इस मुद्दे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, जो सीधे जाति से जुड़ा पहलू है.

हैदराबाद में याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ दलित क्यों विरोध प्रदर्शन कर रहे थे? जेएनयू में मुस्लिमों पर इतना ध्यान क्यों है?

जब भी किसी कमेटी से जांच कराने की बात होती है तो छात्र हाशिए पर रहे समुदायों के प्रतिनिधियों की बात क्यों करते हैं? हक़ीक़त यही है कि भारत में दलितों और मुस्लिमों को ही सबसे ज़्यादा फांसी की सज़ा दी गई है.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़, मृत्युदंड पाने वालों में कुल 75 फ़ीसदी और चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है. ऐसे में पक्षपात का मुद्दा उभरता है.

मालेगांव धमाकों का उदाहरण देते हुए कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि अगर चरमपंथी गतिविधियों में सवर्ण हिंदुओं के शामिल होने का मामला हो तो सरकार सख़्ती नहीं दिखाती है.

बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी देने की जल्दी नहीं है. राजीव गांधी के हत्यारों की सज़ा कम कर उसे उम्रक़ैद में तब्दील कर दिया गया है.

इन लोगों को भी चरमपंथ का दोषी पाया गया था. लेकिन सबको समान क़ानून से कहां आंका जा रहा है?

इन सबमें मायाबेन कोडनानी को छोड़ ही दें, जिन्हें 95 गुजरातियों की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था, लेकिन वे जेल में भी नहीं हैं.

दूसरा मुद्दा आर्थिक है.
दलित और मुस्लिम ग़रीब लोग हैं. अदालत में सुनवाई के दौरान अफ़ज़ल गुरु को लगभग नहीं के बराबर क़ानूनी प्रतिनिधित्व मिल पाया था.

इन वास्तविकताओं को देखते हुए, इसमें बहुत अचरज नहीं होना चाहिए कि दलित, मुस्लिम और उनके समर्थक सरकार का विरोध कर रहे हैं. उन्हें नाराज़ होने का पूरा हक़ है.
सवर्ण इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि हर भारतीय को इस भ्रम में जीना चाहिए कि हम एक पूर्ण समाज हैं और हर किसी को इसके सामने झुकना चाहिए.

हिंदुत्व मध्यम वर्ग और उच्च वर्गों के लिए मसला है. यह आरक्षण से घृणा करता है क्योंकि उसे लगता है कि यह उनको मिल रही सुविधाओं में अतिक्रमण है.

यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण को पसंद नहीं करता और इस मुद्दे पर संघ के बयानों के चलते चुनावों में बीजेपी मुश्किल में आई थी.

प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया भी विपक्ष पर झूठ गढ़ने का आरोप रहा है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई बिलकुल साफ़ है.

दलित अपनी आवाज़ उठा रहे हैं और अपने हक़ के लिए खड़े हो रहे हैं. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. अगर उनकी भाषा में असंयम हो तो भी उन्हें अपराधी की तरह से नहीं देखा जा सकता.

सरकार के लिए अहम ये है कि उनसे जुड़े, उनकी बात सुने, उनके तर्क सुने, केवल उनके नारों पर नहीं जाए.

लेख की शुरुआत में मैंने गांधी जी की बुद्धिमता का उदाहरण दिया है. उसकी तुलना हिंदुत्व के नेताओं की पहले हैदाराबाद और फिर दिल्ली में की गई कार्रवाई से करके देखिए.

हमें इस मामले पर परिपक्व समझ दिखाना चाहिए, जब तक सरकार इस दिशा में कोशिश करती भी नहीं दिखेगी तब तक हमें इस बात पर अचरज नहीं होना चाहिए कि अब तक दबे और पीड़ित रहे लोग सरकार की अवज्ञा के लिए प्रोत्साहित करने वाले काम करते रहेंगे.

Wednesday, January 20, 2016

एक सिलाई मशीन, स्लेटी दीवारें और हैदराबाद यूनिवर्सिटी का वह स्टूडेंट रोहित वेमूला...

 
रोहित वेमूला ने 13 मार्च 2014 को फेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की। यह तस्वीर सिलाई मशीन की थी जिसके लिए उसने लिखा था- यह 'हमारे घर की रोजी रोटी का प्रमुख साधन' है। यूनिवर्सिटी से 25 हजार रुपए की जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिलने की शुरुआत होने से पहले की बात है। रोहित इसी 30 जनवरी को 27 साल का होने वाला था।
कुछ बिखरे बर्तन, स्लेटी दीवारें और पीली कुर्सी...
26 वर्षीय रोहित ने लिखा था- यह मेरी मां का पसंदीदा पेशा है... वह कहती थीं 'मशीन' एक औरत को ताकतवर बना सकती है... वह अब एक टीचर हैं, वह आसपास की महिलाओं को सिलाई-बुनाई करना सिखाती हैं...'
ये तस्वीरें जो इस खबर में हमने लगाई हैं, ऐसी ही कई तस्वीरें मिलकर गुंटूर में रोहित की जिन्दगी की सचाई पेश करती हैं जिन्हें उसने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर पोस्ट किया है। रोहित यहीं पला बढ़ा। बिना सफेदी/डिस्टम्बर की स्लेटी दीवारें, एक सिलाई मशीन जिसके आसपास प्लास्टिक के बैग रखे हैं जिनमें ठुंसे हुए हैं कपड़े। बिखरे हुए कुछ बर्तन, कपड़ों के ही यहां वहां इकट्ठा हुए ढेर, एक पीले रंग की प्लास्टिक की कुर्सी जिसके पास एक टीवी भी रखा है। इनके अलावा भी कुछ तस्वीरें हैं जो उसके जीवन का चलचित्र पेश करती हैं, एक यूनिफॉर्म टंगी दिखती है जिसकी तस्वीर के नीचे कैप्शन लिखा है- पापा की यूनिफॉर्म, जो एक हॉस्पिटल में सिक्यॉरिटी गार्ड हैं।

'चीजें जितना करीब दिखती हैं, उससे ज्यादा करीब (कभी नहीं) होती'
एक खस्ताहाल रेफ्रिजरेटर भी है, जिसके बारे में उसने लिखा है, इसके भीतर पड़ोसियों के लिए पानी की कुछ बोतलें रखी हैं। उसका फेसबुक प्रोफाइल दलित मसलों पर सक्रियता की पोस्ट्स से अटा पड़ा है लेकिन हाल के दिनों में वह इन मसलों से थोड़ा कट गया लगता है। अपनी आखिरी पोस्ट्स में से एक पोस्ट में वह लिखता है- Objects in the mirror are (never) closer than they appear. यानी, आईने में दिख रही चीजें जितना करीब दिखती हैं, उससे ज्यादा करीब (कभी नहीं) होती हैं।
'उन्होंने हमें बताया क्यों नहीं कि उसे क्यों निलंबित किया गया?'
रोहित के दोस्तों का कहना है कि उसका 'दिल टूट गया था'। उन्हें 21 दिसंबर को यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से बाहर 'फेंक' दिए जाने के बाद रोहित समेत पांच स्टूडेंट्स कैंपस गेट के बाहर तंबू लगाकर रह रहे थे। उन्हें मेस और दूसरी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था। एबीवीपी कार्यकर्ता से कथित झड़प के मसले पर यूनिवर्सिटी ने रोहित समेत सभी को प्राथमिक जांच में निर्दोष करार दिया था। लेकिन बाद में यूनिवर्सिटी ने अपना फैसला पलट लिया था। स्टूडेंट्स का कहना है कि आरोप लगा रहे हैं कि रोहित का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था।
रोहित की दादी का कहना है- मेरा बेटा कोमल दिल का था, उसे निलंबित कर दिया गया जिसके बाद वह तंबू में रहने को मजबूर था। उन्होंने हमें बताया क्यों नहीं कि उसे क्यों निलंबित किया गया? रोहित की दादी हैदराबाद यूनिवर्सिटी के परिसर में अपने परिवार के साथ मौजूद आई हुई थीं।

सात महीनों से फेलोशिप की रकम नहीं मिली थी...
पिछले सात महीनों से उसे फेलोशिप के पैसे नहीं मिले थे और जीना मुहाल हो चुका था। रविवार को जब उसके साथी प्रदर्शन को और कड़ा करने को लेकर चर्चा कर रहे थे, तब रोहित चुपचाप अपने हॉस्टल में चला गया था। कुछ घंटो बाद, रोहित ने कमरे में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली।

सूइसाइड नोट में रोहित ने लिखा है कि 'मेरी आत्मा और मेरे शरीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही है' उसने लिखा- मेरा पैदा होना भयंकर दुर्घटना थी। मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी नहीं उबर सकता। एक ऐसा बच्चा जिसे अतीत में किसी का प्यार नहीं मिला।

इस खत (सूइसाइड नोट) में प्रोटेस्ट का जिक्र नहीं किया है लेकिन लिखा है कि उसे महीने से फेलोशिप के पैसे नहीं मिले जोकि करीब 1.75 हजार रुपए के करीब बनते थे। ये पैसे जब मिल जाएं तो परिवार को सौंप दिए जाएं। उसने लिखा कि इसमें से 40 हजार रुपए की रकम उसके दोस्त रामजी को दे दी जाए।

Friday, January 15, 2016

सभ्य समाज व जंगली समाज का राँची से आँखों देखा हाल

पागल,
जी हाँ पागल ही जिसका जन्म ही राँची में हुआ हो वो पागलों की तरह ही सोचेगा, पापा का जॉब था Heavy Engineering Corporation Ltd., Ranchi में और हमारा जन्म भी उसी शहर में हुआ, जब होश संभाला तो देखा आदिवासियों से ऐसा बर्ताव किया जा रहा है जैसे वो जंगली जानवर हों, गाड़ियों में भर भर के जंगल में छोड़ दिया जाता था हमारे सभ्य समाज द्वारा, अब ऐसे माहौल में पला-बढ़ा व्यक्ति पागल के जैसा ही न सोचेगा ?

जब मासूमियत के साथ वो बच्चा पूछता था के ये कौन हैं ?? इनकी भाषा हमारी भाषा से क्यों नहीं मिलती नहीं है, तो बड़ों का जवाब मिलता था जंगली लोग हैं इसलिए हमसे अलग हैं। 

उसी शहरी सभ्य समाज के ऑटो से हर रोज ऐलान होता हुआ दिखाई पड़ता था रंग गोरा, सावंला, गेरुआ, उम्र 5-10 वर्ष पिछले 2-10 दिनों से ग़ायब है जिस किसी बंधू को दिखाई दे सूचित करें, अर्थात हर रोज बच्चे चोरी होते थे कौन करता था ?? पता नहीं पर यकीन के साथ कह सकता हूँ आदिवासी तो नहीं करते थे अपने ही सभ्य समाजी लोग होंगे। 

अधिकतर आदिवासी भी हमारे सभ्य समाज को अपना दुश्मन ही मानते थे और मानते भी क्यों नहीं दुश्मनों वाला ही व्यवहार तो करता था हमारा सभ्य समाज, वो अगल बात है कि आदिवासी केवल दुश्मन ही मानते थे कभी दुश्मनी निभाई नहीं क्योंके अधिकतर समय भात से बने शराब (शायद उसे हांड़ी बोलते थे) पी कर मस्त सोये रहते थे, कुछ हमारे सभ्य समाजी लोग तो यहाँ तक कहते थे ये आदिवासी आदमखोर भी होते हैं। 

खैर जो भी हो हमने देखा ऐसे विकट परिस्थित में भी इसाई मिसिनारियों ने गावं गावं, जंगल जंगल जा कर इन आदिवासियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था, मिसिनरी के सेवक, सेविका वर्षों वर्षों तक जंगल में पड़े रहते थे, आप कह सकतें हैं उनका उद्देश्य इसाई को फैलाना था और हो भी सकता है पर उन्होंने जो योगदान दिया और दे रहें हैं शिक्षा के क्षेत्र में आपके सभ्य समाज द्वारा ही घोषित जंगली लोगों के मेरी नज़र में केवल इसाई धर्म का प्रचार नहीं था, समाज सेवा भी था। 

अगर थोड़े देर के लिए मान भी लिया जाए कि आपका आरोप सत्य है कि उनका उदेश्य मात्र इसाई धर्म का प्रचार-प्रसार था तो आप क्यों नहीं गए उस विकट समय में अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए ?? 

आप कुछ भी कहिये आज जो भी आदिवासी अपने हक़ की लड़ाई के लिए दिल्ली तक पहुँच रहे हैं, इनको दिल्ली तक तक रास्ता समझाने में इसाई मिसिनारियों का बहुत बड़ा योगदान था। 

#काकावाणी

Sunday, January 10, 2016

देश सोया है, चलो इतिहास लिखें

‘बाजीराव-मस्तानी’ में इतिहास के साथ बलात्कार और मंत्र-मुग्ध दर्शक! समझ नहीं आ रहा कि देश में डंके की चोट पर इतिहास को कैसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है? बिल्कुल समझ नहीं आ रहा। ग़लती संजय लीला भंसाली की नहीं है। अंधेर नगरी है, कोई पूछने वाला तो है नहीं। जिसका जो जी चाहे लिखे, जैसी श्रद्धा और जैसी स्वार्थी ज़रुरत हो, वैसे इतिहास लिख दो। देश सोया है, सेंसर बोर्ड जाहिल है, इतिहासविद और जो कोई भी सरकारी, ग़ैर-सरकारी संस्थान हैं वे अपने एहसास-ए-कमतरी में इस क़दर डूबे हैं कि चूं भी नहीं कर सकते।
बाजीराव को नाचता देख कर कहीं शायद कुछ लोगों ने सिर धुना हो पर वो भाड़ में जाएं। कॉलेज की लड़कियां तो पागल हो गयी होंगी और ये पहली बार थोड़े ही हो रहा है। बाजीराव की जो भी असल बहादुरी रही होगी उसे दो संवादों में में दिखा दो। बाक़ी तो देवदास ही बनाना है। पैसा कमाना है। बड़े फ़िल्मकार की तरह नाम पैदा करना है। जो जी में आये करो अभी बताया था न कि देश सोया है, सेंसर बोर्ड जेम्स बॉन्ड को हिंदुस्तानी तहज़ीब सिखाने का देशभक्तिपूर्ण कारनामा अंजाम देने में मग्न है। शिवसेना ग़ुलाम अली को मुंबई आने से रोकने का सामाजिक कर्तव्य निभा कर थकी हुई होगी। बाक़ी ठहरे भक्त और भक्त-सुधारक, तो  वो अपनी सवाली-जवाबी क़व्वाली गाने में इतने व्यस्त हैं कि कहां दीगर मुद्दों पर ध्यान दे पायेंगे। तो फ़िल्म निर्माताओं रास्ता बिल्कुल खाली है। किसी तरह की पुलिस नहीं है, अपनी व्यापारिक गाड़ी जैसी चलानी है, चलायें। दो-चार ऐतिहासिक व्यक्तित्व इस गाड़ी के नीचे कुचल गए तो किसकी मां का क्या जाता है साहब? जनता तो वैसे भी साड़ियां और सेट्स देखने आती है!

‘जोधा-अकबर’ के ज़ख्म अभी तक नहीं भरे हैं। गज़ब की कल्पनाशीलता थी फ़िल्म में भई। हिंदुस्तान के एक अज़ीम शहंशाह को एक उल्लू का पट्ठा दिखाया गया है। वह उद्दात व्यक्तित्व जिसके साम्राज्य की सीमायें अभूतपूर्व दूरियों तक फैली थीं। उसे कितना लीचड़, छोटा बताया गया था। पर ऐश्वर्या के कपड़े क्या खूब थे, ऋतिक की मसल्स क्या चमक रही थीं। जनता फिर कितनी खुश थी। पूरा पैसा वसूल फ़िल्म थी।

और वह शाहरुख़ की ‘अशोका, द ग्रेट’ याद है? पहली बात तो नाम, ‘अशोक’ का नाम अशोका जिस भी बेवकूफ़ी के नाते किया गया हो उसे तो नज़रअंदाज़ हम कर ही देते हैं। ‘संतोषा सिवना’ ने फ़िल्म बनाई। उन्हें सिनेमेटोग्रफी करनी थी सो की। ‘शाहरुखा खाना’ को नाचना था तो वे नाचे। पर फिर वही बात। लेखक को तिलमिलाने की आदत है शायद फिल्मकार होने के नाते बड़े दिग्दर्शकों से ईर्ष्यावश बुरा-भला कह रहे होंगे। इस फिल्म पर भी जनता ने खूब वाह-वाहियां बरसाई थीं। अगर आप यू-ट्यूब पर सम्राट अशोक पर बनी फ़िल्म के अंश देखें तो किसी स्पूफ़ की तरह लगेंगे। इसे कॉमिडी-क्लिप की तरह ही देखा जाना चाहिए। ये बिज़नस आईडिया मैं उन्हें मुफ़्त में दे रहा हूं कि किसी हास्य कलाकार को सूत्रधार बना कर फिर से फिल्म एडिट की जाए और अब इसे एक स्पूफ़ / कॉमिडी की तरह रिलीज़ किया जाए तो देखना कितनी कमाई होती है।

अब कल्पना की नदी जब बह ही निकली है तो मैं सोचता हूं कि क्यों न लगे हाथों रानी लक्ष्मी बाई के बाल-प्रेम पर एक फ़िल्म बनाई जाए और अगर पटकथा कमज़ोर पड़ती है तो लॉर्ड डलहौज़ी की एक गोरी बहन बना दी जाए जो शादीशुदा होते हुए भी अकेलेपन की शिकार है, जिसे रानी झांसी के एक सिपहसालार से प्यार हो जाता है। इस सिपहसालार को रानी अपने भाई की तरह मानती है और अंत में जब रण में रानी का घोड़ा फंसता है तो उसी गोरी का पति अपनी टुकड़ी के साथ रानी को घेरता है। रानी घायल होने के बाद भी उस अंग्रेज़ को मौत के घाट उतारती है और मरने के पहले अपने भाई के हाथ में उसकी गोरी प्रेमिका का हाथ रखती है। जय हिन्द कहती है और इस मृत्युलोक से कूच कर जाती है।

ओफ़्फ़ो क्या क़िस्मत है मेरी। क्या प्लॉट हाथ लगा है, बस भई ये बेमानी लेख लिखना बंद करता हूं और भंसाली के पास जाता हूं। पारखी हैं, समझेंगे। वही मार्गदर्शन देंगे कि दरबार में एक 250 नर्तकों के साथ गाना कैसे डालना है। कैसे रानी की जलकुकड़ी चचेरी बहन का किरदार उकेरना है। कैसे लॉर्ड डलहौज़ी की (गैर-मौजूद) सीक्रेट सेक्स-लाइफ का भांडा फोड़ना है। हां, आप लोग मेरी फ़िल्म देखने ज़रूर आइयेगा!

Friday, December 11, 2015

बोलो खरीदोगे ?

Sunday, December 06, 2015

समाज पाखंडी होगा, तो तमाम संस्थाएं भी पाखंडी ही होंगी

Monday, November 30, 2015

बिहार में ग़रीब मुसलमानों की नुमाईंदगी अमीरों के हाथ में है