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Sunday, February 03, 2013

मैं खान हूं।



मैं कलाकार हूं। वक्त मेरे दिन को तय नहीं करता, जितनी दृढ़ता से छवियां करती हैं। छवियां मेरे जीवन पर राज करती हैं। घटनायें और यादें तस्वीर के रूप में खुद मेरे जेहन में अंकित हो जाती हैं। मेरी कला का मूल है- छवियां गढ़ने की क्षमता, जो देखनेवाले की भावनात्मक छवि के साथ मिल जाती है।
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मैं खान हूं। यह नाम ही मेरे जेहन में खुद कई प्रकार की छवियां उभारता है। जैसे घोड़े पर बैठा एक आदमी। सिर पर पगड़ी के नीचे से उसके बाल लहरा रहे हैं। एक सांचे में गढ़ दिया गया कट्टरपंथी। जो न नाचता है, न शराब पीता है, न ईशनिंदा करता है। शांत मोहक चेहरा। लेकिन जिसके अंदर हिंसक पागलपन सुलग रहा है। एक ऐसा पागलपन जो उसे ईश्वर के नाम पर खुद को खत्म कर देने को प्रेरित कर सकता है। तभी मेरे जेहन में अमेरिकी एयरपोर्ट के पीछे बने कमरे में मुझे ले जाने की तस्वीर उभरती है। कुछ कपड़े उतारना, जांच करना और बाद में कई सवाल। मुझे कुछ इस तरह का तर्क दिया गया कि आपका नाम हमारे सिस्टम में आ रहा है, इसके लिए माफी। फिर मेरे जेहन में अपने देश में खुद की छवि उभरती है। वहां मुझे मेगास्टार कहा जाता है। प्रशंसक प्यार और गर्व से मेरी प्रशंसा करते हैं।

मैं खान हूं। मैं कह सकता हूं कि इन सभी छवियों में मैं फिट हूं। सीमित ज्ञान और पहले से ज्ञात मानकों के आधार पर हम घटना, चीज और लोगों की परिभाषा तय करने में राहत महसूस करते हैं। इन परिभाषाओं से स्वाभाविक तौर पर उपजी संभावनाएं हमें अपनी सीमाओं के दायरे में सुरक्षित होने का आभास देती हैं। हम खुद-ब-खुद छवि का एक छोटा बक्सा बनाते हंै। ऐसा ही एक बक्सा मौजूदा समय में अपने ढक्कन को कस रहा है।

इसी बक्से में लाखों लोगों के जेहन में मेरे धर्म की छवि है। मेरे देश में मुस्लिम समाज को जब भी अपना पक्ष रखने की जरूरत होती है, मेरा सामना इससे होता है। जब कभी इस्लाम के नाम पर हिंसा की घटना होती है, मुझे मुसलिम होने के नाते इसकी भत्र्सना करने के लिए बुलाया जाता है। अपने समाज का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुझे एक आवाज के तौर पर चुना जाता है, ताकि दूसरे समाज को प्रतिक्रिया देने से रोका जा सके।

मैं कभी-कभार, जाने-अनजाने कुछ राजनेताओं द्वारा भारत में मुस्लिमों की देशभक्ति पर संदेह और अन्य दूसरी गलतियों का एक प्रतीक बनाने के लिए चुन लिया जाता हूं। ऐसे भी मौके आये जब मुझ पर अपने देश की बजाय पड़ोसी मुल्क के प्रति वफादार होने का आरोप लगाया गया। हालांकि मैं भारतीय हूं और मेरे पिता ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी।

मैंने अपने बेटे और बेटी का अखिल भारतीय और अखिल धार्मिक नाम रखा। आर्यन और सुहाना। खान विरासत में मेरे द्वारा दिया गया है और वे इससे बच नहीं सकते। कभी-कभार वे पूछते हैं कि उनका धर्म क्या है और मैं दार्शनिक अंदाज में उनसे कहता हूं कि आप पहले भारतीय हैं और आपका धर्म मानवता है या पुराना गाना कि ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा- इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’। अमेरिकी जमीन पर जहां मुझे कई बार सम्मानित करने के लिए बुलाया गया, मेरे जेहन में कई विचार उभरे, जो एक खास संदर्भ में होते थे। एयरपोर्ट पर रोकने की घटना मेरे साथ कई बार हो चुकी है।

आतंकवादियों के आखिरी नाम से मेरा नाम मिलने के कारण अपनी गलत पहचान से मैं इतना परेशान हो गया कि मैंने ‘माय नेम इज खान’ फिल्म बनायी ताकि अपनी बात साबित कर सकूं। मेरे आखिरी नाम को लेकर अमेरिकी एयरपोर्ट पर मुझसे घंटों पूछताछ की गयी। कभी-कभार मैं सोचता हूं कि क्या ऐसा ही सलूक सभी के साथ होता होगा, जिसका आखिरी नाम मैकवे या टिमोथी हो?

मैं किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाना चाहता। लेकिन, सच कहा जाना चाहिए। हमलावर और जिंदगी छीननेवाले अपने दिमाग का अनुसरण करते हैं। इसका किसी के नाम, उसके स्थान, उसके मजहब से कोई लेना-देना नहीं होता है।

मुझे मेरे धर्म की शिक्षा पेशावर के एक खूबसूरत पठान ‘पापा’ ने दी। जहां उनके और मेरे परिवार के लोग आज भी रहते हैं। वे अहिंसक पठान आंदोलन ‘खुदाई खिदमतगार’ के सदस्य रहे थे और खान अब्दुल गफ्फार खान और गांधीजी दोनों के ही अनुयायी थे। उनसे मैंने इसलाम की जो पहली सीख ली वह थी औरतों और बच्चों का सम्मान करना और हर इंसान की गरिमा को बनाये रखना।

मैंने सीखा कि दूसरों के गुण, उनकी मर्यादा, उनकी दृष्टि, उनके विश्वास और दर्शन का उसी तरह सम्मान करना चाहिए, जिस तरह से मैं अपना करता हूं और उन्हें खुले दिल से स्वीकार किया जाना चाहिए। मैंने अल्लाह की शक्ति और दयालुता पर यकीन करना सीखा। साथ ही इंसानों के साथ सौम्य और दयालु होना भी। हां, तो मैं एक खान हूं। लेकिन मुझमें मेरे अपने अस्तित्व को लेकर कोई बनी-बनायी धारणा नहीं है। मुझे लाखों-लाख भारतीयों की मोहब्बत मिली है। पिछले बीस वर्षों से मुझे यह स्नेह मिल रहा है, इस तथ्य के बावजूद कि मैं अल्पसंख्यक समुदाय से हूं। मुझे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक सरहदों के आर-पार लोगों की बेपनाह मोहब्बत मिली है। मेरे जीवन ने मुझमें यह गहरी समझ पैदा की है कि प्यार आपसदारी का मामला है। विचार की संकीर्णता इसके आड़े नहीं आती।

अपने सुपरस्टारडम के नीचे मैं एक साधारण इंसान हूं। मेरे मुसलमान होने का मेरी पत्नी के हिंदू होने से किसी किस्म का संघर्ष नहीं होता। हमारी एक बेटी है, जो घिरनी की तरह नाचती है और अपने नृत्य की खुद कोरियोग्राफी करती है। वह पश्चिमी गाने गाती है, जो मेरी समझ में नहीं आते। वह एक अदाकारा बनना चाहती है। किसी मुस्लिम देश में जहां सिर को ढकने की खूबसूरत, लेकिन अक्सर गलत समझी जानेवाली प्रथा का पालन किया जाता है, वह भी अपने सिर को ढंकने की जिद करती है।

मेरा मानना है कि हमारा धर्म नितांत व्यक्तिगत चयन का मामला है। न कि उसे सामाजिक रूप से अपनी पहचान के तौर पर घोषित करने का। आखिर क्यों न वह प्रेम जिसे हम साझा करते हैं, वही हमारी पहचान का आधार बने, बनिस्बत कि हमारे नाम के आखिरी हिस्से के। प्रेम देने के लिए किसी का सुपरस्टार होना जरूरी नहीं है। इसके लिए सिर्फ एक दिल होना चाहिए। और जहां तक मैं जानता हूं दुनिया में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो किसी को दिल से वंचित कर सके।

मैं एक खान हूं। और इसका मतलब सिर्फ ऐसा इंसान होने से ही है। भले ही मेरे इर्द-गिर्द एक बनी-बनायी छवि खड़ी कर दी गयी हो। एक खान होने का मतलब सिर्फ यही है कि प्रेम पाओ और बदले में प्रेम दो।

(‘आउटलुकः टर्निग प्वाइंट, द ग्लोबल एजेंडा 2013’ में छपे शाहरुख खान के लेख का अंश। इस लेख को आधार बना कर पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने 28 जनवरी को आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और फिर दोनों देशों की ओर से जो बयानबाजी हुई उसके बाद आपसी रिश्ते और तल्ख हो गये।)

Sunday, September 23, 2012

इस्लाम के दानवीकरण का दुष्चक्र



हम एक अजीब-से दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर विज्ञान, तकनीक और तार्किक सोच ने हमें मानवता की बेहतरी के लिए अनेक भौतिक और बौद्धिक उपाय दिए हैं वहीं हमारी दुनिया ने इन दिनों भड़काऊ बातें कहने का फैशन सा बन गया है। साहित्य और विशेषकर फिल्मों के जरिए एक धर्म विशेष – इस्लाम -का दानवीयकरण करने के प्रयास हो रहे हैं। मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा स्वयं को आतंकित और असुरक्षित महसूस कर रहा है और अपने धर्म के अपमान के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस भी जारी है परन्तु यह समझना मुश्किल है कि अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग हमेशा एक धर्म विशेष को अपमानित करने और उसका दानवीयकरण करने के लिए ही क्यों किया जाता है।

इन दिनों (सितम्बर 2012) दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अमेरिकी दूतावासों के सामने विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में हिंसा भी हुई है जिसमें राजदूत क्रिस स्टिवेंस सहित चार अमेरिकी राजनयिक बेन्गाजी में मारे गये हैं। कई देशो ने गूगल, जो कि यूट्यूब का मालिक है, से कहा है कि यूट्यूब से यह उत्तेजक और अपमानजनक विडियो क्लिप हटा दी जाए। अमेरीका अब तक “अभिव्यक्ति की आजादी” के नारे पर अटका हुआ है और  बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी देश की सड़कों पर अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं।

यह विडियो क्लिप लगभग 14 मिनट लम्बी है और एक फीचर फिल्म का हिस्सा है, जिसके निर्माता अमेरिका में रहने वाले एक ईसाई नकोला बेसीले हैं। फिल्म में इस्लाम का जम कर अपमान किया गया है। दाढ़ी वाले आधुनिक मुसलमानों की भीड़ को ईसाईयों पर हमला करते दिखाया गया है। फिल्म अपने दर्शकों को अतीत में भी ले जाती है जहां पैगंबर मोहम्मद के जीवनवृत्त को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म मे बताया गया है कि पैगंबर साहब का व्यक्तित्व व सोच, अत्यंत नकारात्मक और आक्रामक थी। इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नही है और इसे बनाने वालों के इरादे भी संदिग्ध हैं। मुसलमानों के एक तबके ने इस फिल्म पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले मे सभी मुसलमानों की प्रतिक्रिया एक सी नही रही है। कुछ धर्मगुरूओं ने मुसलमानो से धैर्य बनाये रखने के लिए कहा है। इन लोगों का कहना है कि इस्लाम शांति का धर्म है और इसलिए किसी भी प्रकार के हिंसक विरोध प्रदर्शन नही होने चाहिए। कुत्सित इरादों से बनाई गई इस घटिया फिल्म का सबसे अच्छा जवाब दिया है मुसलमानो के एक समूह ने, जो कि अमन के संदेशवाहक, पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर लिखी गई किताबें बांट रहे हैं।

पिछले कुछ सालों से पश्चिमी देशों और यहां भारत में भी, इस्लाम का दानवीकरण करने की परंपरा सी बन गई है। हम सब को वह डैनिश कार्टून याद है जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छुपाए एक आतंकवादी के रूप में दिखाया गया था। फ्लोरिडा के एक पास्टर ने यह घोषणा की थी कि चूंकि कुरान हिंसा सिखाती है इसलिए वे उसे सार्वजनिक रूप से जलाएंगे। अफगानिस्तान में कुछ अमेरिकी सैनिको ने भी यह कह कर कुरान की प्रतियां जलाईं थीं कि उनमें आतंकवादियों के कुछ गुप्त संदेश लिखे हुए हैं।

इस्लाम और मुसलमानों के दानवीकरण में हम एक प्रकार की योजना और एजेंडा देख सकते हैं। ये कार्टून और फिल्में, दरअसल, उस राजनैतिक प्रक्रिया की उपज हैं, जिसका उद्देश्य पश्चिम एशिया में तेल के कुओं पर कब्जा करना है। इरान में अमेरिका के पिट्ठू रज़ा पहलवी को हटा कर अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के बाद से ही, अमेरिका “इस्लाम-नया खतरा” का नारा बुलंद करता आ रहा है।  अमेरिका ने ही पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए ताकि मुस्लिम युवकों को अलकायदा और तालिबान के झंडे तले अफगानिस्तान पर काबिज़ सोवियत सेना से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इससे हालात और बिगड़े। इन मदरसों में काफिर और जिहाद जैसे शब्दो का अर्थ तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता था ताकि मुस्लिम युवको को धर्म के नाम पर हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद, अमेरिकी मीडिया ने बड़ी चालाकी से “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द गढ़ लिया। इस शब्द का अन्य देशों का मीडिया भी इस्तेमाल करने लगा और धीरे धीरे यह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। यह पूरा घटनाक्रम एक साम्राज्यवादी ताकत द्वारा अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए धर्म के दुरूपयोग का उदाहरण है। दरअसल, इस्लाम का दानवीकरण, अमेरिकी नीति का भाग है। इसके पीछे अमेरिका अपने असली उद्देश्य – अर्थात तेल संसाधनो पर कब्जा – को छिपाना चाहता है। नोयम चोमोस्की ने एक शब्द गढ़ा था “सहमति का उत्पादन”। अमेरिका ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द को इसलिए गढ़ा ताकि उसके, अफगानिस्तान और ईराक पर सैनिक आक्रमण करने के लिए “सहमति का उत्पादन” किया जा सके।

अमेरिका की इस नीति से दो अलग-अलग प्रक्रियाएं शुरू हुई हैं। एक ओर इस्लाम के खिलाफ घृणा फैलाने के अभियान ने हालिया फिल्म, डेनिश कार्टून और पास्टर द्वारा कुरान को जलाने जैसी घटनाओं को जन्म दिया है। अमेरिकी प्रचार को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए अमेरिका ने “सभ्यताओं का टकराव” के सिद्धांत का अविष्कार किया है। इस सिद्धांत के अनुसार, आधुनिक विश्व इतिहास, पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यताओं के विकसित पश्चिमी सभ्यताओं पर आक्रमण का इतिहास है। इसी तोड़ी-मरोड़ी हुई सोच और विचारधारा का इस्तेमाल पश्चिम एशिया मे अमेरिकी एजेंडे को लागू करने के लिए किया जाता है। इस सबसे पूरे विश्व के मुसलमानों की सोच में अंतर आया है। कुछ मुसलमान यह मानने लगे हैं कि अफगानिस्तान व इराक पर अमेरीकी हमले के बाद, वे इस दुनिया में सुरक्षित नहीं रह गये हैं। भारत में संघ परिवार की राजनीति ने इस समस्या को नया आयाम दिया। संघ ने राममंदिर का मुद्दा उठाकर मुसलमानो को कटघरे में खड़ा कर दिया। भारतीय मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को यह लगने लगा कि उसे आतंकित किया जा रहा है और सब ओर से घेर लिया गया है। इस परिस्थिति में पहचान से जुडे़ मुद्दो को लेकर मुसलमानों को एक करना आसान हो गया। जब भी कोई समुदाय स्वयं को हर तरफ से घिरा हुआ पाता है तब उसे उत्तेजित करना और किसी भी आक्रामक धार्मिक अभियान का हिस्सा बनाना, आसान हो जाता है।

यह एक तरह का दुष्चक्र है जिसमें इस्लाम का डर एक ओर है और घुटन महसूस कर रहा  आतंकित मुस्लिम समाज दूसरी ओर। इन परिस्थितियों में वे मुस्लिम धर्मगुरू ही समुदाय की प्रेरणा के स्त्रोत हो सकते हैं जो  शांति की बात कर रहे हैं। जो मुसलमान पैगम्बर मोहम्मद के जीवन पर आधारित पुस्तकें बांट रहे हैं, वे बधाई के हकदार है समुदाय की प्रतिक्रिया इसी प्रकार की होना चाहिए। अमेरिका के साम्राज्यवादी इरादों और उसके भारी भरकम प्रचार तंत्र से कैसे निपटा जाए, जिनके जरिए अमेरिका दुनिया के कई इलाकों में गड़बडियां फैला रहा है? क्या इस पर किसी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है?

जिन दिनो कोफी अन्नान संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव थे, एक उच्चस्तरीय समिति ने एक रपट तैयार की थी जिसका शीर्षक था “सभ्यताओं का गठजोड़”। परन्तु इस्लाम को बदनाम करने के अभियान की तुलना में इस रपट को समुचित प्रचार न मिल सका। अब समय आ गया है कि मानवता, उन मानवीय मूल्यों को अपनाए जो हमारी सभ्यता में सदियों के विचार-विनिमय के आधार पर उभरे हैं – उन मूल्यों को, जिनके कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सभी के लिए मूल मानवाधिकारों के घोषणापत्र जारी किये हैं और जिनके कारण “सभ्यताओं के गठजोड़” जैसी रपटें बनती हैं।

मुसलमानों का एक तबका ऐसा भी है जो अनुचित ढंग से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। दरअसल जो लोग या ताकतें इस्लाम के दानवीकरण और इस तरह की फिल्मों के निर्माण के पीछे हैं, वही कुछ मुसलमानों की हिंसक कार्यवाहियों के लिए भी जिम्मेदार हैं। क्या हम संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में पुनर्जीवित नही कर सकते जो यह सुनिश्चित करे कि विभिन्न राष्ट्रों और उनके मीडिया का आचार- व्यवहार ऐसा हो जिससे प्रजातंत्र और मानवीय गरिमा में अभिवृद्धि हो? क्या पूरा विश्व दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति के आक्रामक तेवरों से निपटने के लिए आगे नहीं आ सकता? अगर ऐसा हुआ तो इस तरह की फिल्मों पर हिंसक प्रतिक्रिया नहीं होगी। बल्कि शायद दूसरों के धर्म को अपमानित करने के प्रयासों ,में भी कमी आयेगी। अगर कुछ लोग इस तरह की फिल्म बनांएगे तो कुछ वैसी फिल्मे भी बनेंगी जो पैगंबर मोहम्मद के दुनिया को शांति के संदेश पर आधारित होंगी।

अंत में, हमें अभिव्यक्ति की आजादी को तो कायम रखना होगा। परन्तु इसकी कुछ सीमाएं भी तय करनी होंगी। हमे विरोध व्यक्त करने के ऐसे तरीकों का विकास करना होगा जिनसे उन्माद के स्थान पर मर्यादित व तार्किक ढंग से विरोध दर्ज कराया जा सके।

राम पुनियानी (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)
(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् २००७ के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

Sunday, December 04, 2011

ईरान को भी ईराक बनाने के फ़िराक़ में हैं अमरीका


 
अमरीका ने ईरान को घेरने की अपनी कोशिश तेज़ कर दी है इस बार परमाणु हथियारों के नाम पर वह ईरान को कटघरे में खड़ा करना चाहता है पश्चिम एशिया पर नज़र रखने वालों को भरोसा है कि अमरीका ने ईरान के खिलाफ इजरायल को इस्तेमाल करने का  मन बना लिया है हालांकि अमरीका फ्रांस सहित कई अन्य पश्चिमी देश मानते हैं कि इजरायल के राष्ट्रीय नेता हमेशा सच नहीं बोलते लेकिन इजरायल की ओर से मिली इंटेलिजेंस के आधार पर अमरीका ने ईरान को अलग थलग करने की कोशिश तेज़ कर दी है हर बार की तरह इस बार भी अमरीका संयुक्त राष्ट्र को अपने हित में इस्तेमाल करने की योजना बना चुका है अमरीकी अखबारों में पिछले एक हफ्ते से सनसनीखेज़ बनाकर खबरें छापी जा रही हैं कि अंतर राष्ट्रीय परमाणु एनर्जी एजेंसी के पास ऐसे दस्तावेजी सबूत हैं जिसके आधार पर साबित किया जा सके कि ईरान अब परमाणु हथियार विकसित कर सकता है  इस कथित इंटेलिजेंस में वही पुराने राग अलापे जा  रहे हैं मसलन यह कहा जा रहा है कि सोवियत संघ में हथियारों को बनाने वाले  वैज्ञानिकों की सेवाएँ ली जा रही हैं उत्तरी कोरिया वालों से मदद ली जा रही है और पाकिस्तानी परमाणु स्मगलर ए क्यू खां से भी इस प्रोजेक्ट में मदद ली गयी है ज़ाहिर है कि यह सब बहाने हैं  लेकिन इन सबके हवाले से अमरीका छुप कर हमला करने की  अपनी नीति को अंजाम तक पंहुचाने की कोशिश कर रहा है

ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने अमरीका की संयुक्त राष्ट्र के ज़रिये ईरान को बदनाम करने के नाटक को अनुचित बताया है अहमदीनेजाद ने संयुक्त राष्ट्र की  कथित रिपोर्ट की चर्चा शुरू होने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा  है कि अमरीका की कोशिश है कि वह ईरान सहित बाकी विकास शील देशों को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भर न बनने दे अहमदीनेजाद ने कहा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से बिलकुल पीछे नहीं हटेगा उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के बहाने अमरीका दुनिया को गुमराह कर रहा हैउन्होंने संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतर राष्ट्रीय परमाणु एनर्जी एजेंसी की भी आलोचना की और कहा कि उसे अमरीका के बेहूदा आरोपों को अपनी तरफ से प्रचारित करने से बचना चाहिए उन्होंने कहा कि ईरानी राष्ट्र शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के विकास करने के रास्ते से ज़रा सा भी विचलित नहीं होगा एक जनसभा को संबोधित करते हुए अहमदीनेजाद ने कहा कि अंतर राष्ट्रीय परमाणु एनर्जी एजेंसी को अमरीका के चक्कर में पड़कर अपनी विश्वसनीयता से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए ईरान ने संयुक्त राष्ट्र को आगाह किया है कि अमरीका के एजेंट के रूप में काम करने से वह बाकी दुनिया की नजर में बिलकुल नीचे गिर जाएगा अमरीका ने दावा किया है कि ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम २००३ में अंतर राष्ट्रीय दबाव के चलते बंद कर दिया था लेकिन अब वह फिरसे  चालू हो गया है

ईरान ने संयुक्त राष्ट्र की ईरानी  परमाणु कार्यक्रम को हथियारों का कार्यक्रम बताने की कोशिश को बहुत ही हलके से लिया हैईरान के परमाणु कार्यक्रम से बहुत  निकट से जुड़े  अधिकारी और मौजूदा ईरानी विदेश मंत्री अली अकबर सालेही ने कहा कि अगर संयुक्त राष्ट्र का यही रुख है तो उन्हें रिपोर्ट को प्रकाशित कर लेने दीजिये  सालेही ने कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर शुरू हुआ विवाद सौ फीसदी राजनीति से प्रेरित है उन्होंने आरोप लगाया कि अंतर राष्ट्रीय परमाणु एनर्जी एजेंसी (आई ई ए ई) पूरी तरह से विदेशी ताक़तों के दबाव में काम रही है आई ई ए ई वाले कई साल से ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर सवाल उठाते रहे हैं लेकिन इस बार उनका दावा  है कि इस बार जो सूचना मिली है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि अब ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से विकसित हो चुका है और अब उसमें रिसर्च को बहुत ही मह्त्व दिया जा रहा है

जिस तरह से इस बार आई ई ए ई ने दावा किया है और जिस तरह से भारत समेत पूरी दुनिया के अमरीका परस्त मीडिया संगठन इस खबर को ले उड़े हैं उस से लगता है कि अमरीका एक बार फिर वही करने के फ़िराक़ में है जो उसने ईराक में किया था दुनिया भर में फैले हुए अपने हमदर्द देशों और अखबारों की मदद से पहले ईराक के खिलाफ माहौल बनाया गया उसके बाद यह साबित करने की कोशिश की गयी कि ईराक के पास सामूहिक संहार के हथियार हैं फिर संयुक्त राष्ट्र का इस्तेमाल कारके इराक पर हमला कर दिया गया आज ईराक में अमरीकी कठपुतली सरकार है और अमरीका उनके पेट्रोल को अपने हित में इस्तेमाल कर रहा है अब यह बात भी सारी दुनिया को मालूम है कि इराक और उसेक राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को तबाह करने के बाद अमरीकी विदेश नीति के करता धरता मुंह छुपाते फिर रहे थे क्योंकि जब पूरे देश पर अमरीका का क़ब्ज़ा हो गया और उस से पूछा गया कि सामूहिक नरसंहार के हथियार कहाँ  हैं तो अमरीकी राजनयिकों के पास कोई जवाब नहीं था.

ऐसा लगता है कि अमरीका अपनी उसी नीति पर चल रहा है जिसके तहत उसने तय कर रखा है कि जो देश उसकी बात नहीं मानेगा उसे किसी न किसी तरीके से सैनिक कार्रवाई का विषय बना देगादिलचस्प बात यह है कि इस बार के अमरीका के ईरान विरोधी अभियान में भी वही व्यक्ति इस्तेमाल हो रहा है जो ईराक के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के अभियान में शामिल रह चुका है डेविड अल्ब्राईट नाम का यह पूर्व हथियार इन्स्पेक्टर अमरीका की नीतियों को संयुक्त राष्ट्र का मुखौटा पहनाने में माहिर बताया जाता है इसी अल्ब्राईट के हवाले से इस बार अमरीकी अखबारों में खबरें प्लांट की जा रही हैं इसने दावा किया है कि जब बाकी दुनिया को बताया गया था कि ईरान ने २००३ में परमाणु कार्यक्रम रोक दिया था उस वक़्त भी ईरान  ने कोई काम रोका नहीं था वास्तव में उसने परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहे अपने वैज्ञानिकों को अन्य क्षेत्रों में रिसर्च करने के काम में लगा दिया था  संयुक्त राष्ट्र से छुट्टी पाने के बाद  डेविड अल्ब्राईट अमरीका की राजधानी वाशिंगटन डी सी के एक संस्थान का अध्यक्ष है वहां भी यह अमरीकी हितों के काम में ही लगा हुआ है इंस्टीटयूट फार साइंस ऐंड इंटरनैशनल सिक्योरिटी नाम के इस संगठन का काम प्रकट में तो पूरी दुनिया के परमाणु कार्यक्रमों का विश्लेषण करना है लेकिन वास्तव यह अमरीकी विदेश नीति के हित साधन का एक फ्रंट मात्र है  इसी संस्थान में बैठकर अब डेविड अल्ब्राईट अमरीकी विदेश नीति का काम संभाल रहे हैं बताया जाता है कि सी आई ए ने अपने बहुत सारे गुप्त संगठनों की तरफ  से इस संस्थान को ग्रांट भी दिलवा रखी है डेविड आल्ब्राईट के इस संस्थान को अमरीकी विदेश और रक्षा विभाग से भी पैसा मिलता है इसी संस्थान के पास मौजूद तथाकथित दस्तावजों के आधार पर डेविड अल्ब्राईट ने अपने लाल बुझक्कड़ी अंदाज़ में दावा किया है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को चलाने वाले वाले वैज्ञानिकों को पुराने सोवियत  संघ के परमाणु वैज्ञानिकों ने पढ़ा लिखा कर हथियार बनाने की शिक्षा दी है
यह सारा प्रचार अभियान अभी ऐसे संगठनों और व्यक्तियों की तरफ से चलाया जा रहा है जिनका अमरीकी सरकार से डायरेक्ट समबन्ध नहीं है  यह सब या तो एन जी ओ हैं या थिंक टैंक का लबादा ओढ़े हुए हैं अमरीकी अधिकारियों  ने प्रकट रूप से यही कहा है कि अभी ईरान के नेताओं ने हथियार बनाने का फैसला नहीं किया है लेकिन उनके पास अब पूरी तकनीकी जानकारी है उनके पास सारा सामान भी उपलब्ध है वे जब चाहें परमाणु हथियार बहुत कम समय में तैयार कर सकते हैं अमरीकी अधिकारी यह भी कहते हैं कि ईरान का यह दावा कि वह परमाणु कार्यक्रम की मदद से बिजली पैदा करना चाहता है भरोसे के काबिल नहीं है ज़ाहिर है अमरीका की पूरी कोशिश है कि ईरान का भी वही हाल किया जाए जो उसने ईराक का किया था लेकिन लगता है कि ईरान से पंगा लेना इस बार  अमरीका को मुश्किल में डाल सकता है.

Monday, November 28, 2011

पाकिस्तान का साम्राज्यवादियों के साथ रहने का हश्र



पाकिस्तान के बनने के बाद से ही वह अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ रहा है। साम्राज्यवादियों ने पाकिस्तान के विकास को पूरी तरह से अवरुद्ध किया और आर्थिक रूप से अपना गुलाम बना लिया। अफगानिस्तान के बहाने अब वह पाकिस्तान की संप्रभुता को पूरी तरह से नष्ट करने पर तुला हुआ है। जिसकी परिणिति ओसामा के एनकाउन्टर के रूप में हुई है और हद तो तब हो गयी कि जब अभी नाटो सेनाओं ने 28 पाकिस्तानी सैनिको को मार गिराया। इस नाटो हमले में काफी सैनिक घायल भी हुए हैं। पाकिस्तान बेचारा कर भी क्या सकता है। विरोध जताया उधर से माफ़ी नामा तुरंत आ गया। ब्रिटिश भारत में भी जिस राजा को तुरंत परास्त नही किया जा सकता था। उसके साथ भी इसी तरह की हरकतें ब्रिटिश साम्राज्यवादी करते थे और जब राजा विरोध करता था तो माफ़ी मांग लेते थे और फिर उसके बाद ब्रिटिश सेनायें के ताकतवर होते ही उस राज्य को अपने में मिला लेते थे।
पाकिस्तान के पास अमेरिकियों व नाटो सेनाओं से बचने का कोई विकल्प बाकी है तो वह चीन के साथ दोस्ती ही है। चीन की दोस्ती से उसकी लाज शायद ही बच सके क्यूंकि चीन भी उसकी रक्षा करने के लिये युद्ध में जाना पसंद नही करेगा।
साम्राज्यवाद मगरमच्छ है प्रतिदिन उसको भोजन के लिये मगरमच्छ की तरह मांस की आवश्यकता है। साम्राज्यवाद प्राकृतिक स्रोत्रों के दोहन के लिये उसको दुनिया के अधिकांश देशों को गुलाम बनाना उसकी मजबूरी है। भोजन के लिये दोस्त और दुश्मन का फर्क यहीं ख़त्म हो जाता है।

Friday, October 21, 2011

आतंकी और बर्बर अमेरिका का एक और शिकार गद्दाफी मात्र दो बूंद तेल के लिए




जैसे दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी देश अमेरिका ने पहले बिना बात सद्दाम और उसके देश इराक से दो युद्ध किये और सद्दाम और उसके देश इराक को खत्म करके वहां का तेल पी गया। आपको याद होगा कि युद्ध के बाद इराक में कोई रसायनिक हथियार नहीं मिले थे, जिस बात को लेकर ही अमेरिका और उसकी रखेल संस्था यू.एन.ओ. ने इराक पर युद्ध किया गया था।

अब बिना कारण लीबिया को तबाह करके, झूँठे इल्जाम लगा करमुअम्मर गद्दाफी को व्यर्थ बदनाम किया और आज उसे मार डाला है और अब वो अमेरिका लीबिया का तेल पीयेगा, जिसका वो दशकों से प्यासा था।
मैं लीबिया में 12 वर्ष रहा हूँ। वहां नागरिको को संपूर्ण शिक्षा (जिसमें विदेश में जाकर शिक्षा लेना भी शामिल है), चिकित्सा (जिसमें विदेश में जाकर उपचार लेने का खर्चा  भी शामिल है) और लोगो को घर बना कर देना सब कुछ सरकार करती है। उसने पूरे देश में नई सड़कें (जिन पर कोई टोल नहीं लगता है), अस्पताल, स्कूल, मस्जिदें, बाजार बस कुछ नया बनवाया था। मुझसे भी  पूरे 12 वर्षो में  नल, बिजली, टेलीफोन का कोई पैसा नहीं लिया। मझे खाने पीने, पेट्रोल, सब्जी, फल, मीट, मुर्गे, गाड़ियां, फ्रीज, टीवी, बाकी घर की सुविधाएं, एयर ट्रेवल और सब कुछ सुविधाएँ मुफ्त में मिली हुई थी। उसने लीबिया जो एक रेगिस्तान है, को हरा भरा ग्रीन बना दिया था। एक बार हमारे भारत के राजदूत ने मेरे डायरेक्टर को कहा था कि हम भारतवासी हरे भारत को काट कर रेग्स्तान बना रहे हैं और मैं यहां आकर देखता हूँ कि आपने रेगिस्तान को हरा भरा बना दिया है।
गद्दाफी ने लीबिया में मेन मेड रीवर बनवाई थी जो दुनिया का सबसे मंहगा प्रोजेक्ट है, जिसके बारे में कहा गया था कि यह प्रोजेक्ट इतना अनाज पैदा कर सकता है जिससे पूरे अफ्रीका का पेट भर जाये, और जिसका ठेका कोरिया को दिया गया था। जब गद्दाफी यह ठेका देने कोरिया गया था तो उसके स्वागत में कोरिया ने चार दिन तक स्वागत समारोह किये थे और उसके स्वागत में चालीस किलोमीटर लंबा कालीन बिछाया था। इस ठेके से कोरिया ने इतना कमाया था कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था जापान जैसी हो गई थी। मुझ पर विश्वास नहीं हो तो गूगल की पुरानी गलियों में जाओ, आपको सारे सबूत मिल जायेंगे।
मैं उस महान शासक को श्रद्धांजलि देता हूँ और उसकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करता हूँ।  उसे मिस्र के जमाल अब्दुल नासर नें मात्र 28 वर्ष की उम्र में लीबिया का शासक बना दिया था। वह भारत का अच्छा मित्र था। मालूम हो कि गद्दाफी ने 41 साल तक लीबिया पर राज किया है।
गद्दाफी था महान नदी निर्माता
लीबीया और गद्दाफी का नाम आजकल हम सिर्फ इसलिए सुन रहे हैं क्योंकि गद्दाफी को गद्दी से हटाने के लिए अमेरिका बमबारी कर रहा है. लेकिन गद्दाफी के दौर में उनके  काम का जिक्र करना भी जरूरी है जो न केवल लीबीया बल्कि विश्व इतिहास में अनोखा है. गद्दाफी की नदी. अपने शासनकाल के शुरूआती दिनों में ही उन्होंने एक ऐसे नदी की परियोजना पर काम शुरू करवाया था जिसका अवतरण और जन्म जितना अनोखा था शायद इसका अंत उससे अनोखा होगा.
लीबिया की गिनती दुनिया के कुछ सबसे सूखे माने गए देशों में की जाती है। देश का क्षेत्रफल भी कोई कम नहीं। बगल में समुद्र, नीचे भूजल खूब खारा और ऊपर आकाश में बादल लगभग नहीं के बराबर। ऐसे देश में भी एक नई नदी अचानक बह गई। लीबिया में पहले कभी कोई नदी नहीं थी। लेकिन यह नई नदी दो हजार किलोमीटर लंबी है, और हमारे अपने समय में ही इसका अवतरण हुआ है! लेकिन यह नदी या कहें विशाल नद बहुत ही विचित्र है। इसके किनारे पर आप बैठकर इसे निहार नहीं सकते। इसका कलकल बहता पानी न आप देख सकते हैं और न उसकी ध्वनि सुन सकते हैं। इसका नामकरण लीबिया की भाषा में एक बहुत ही बड़े उत्सव के दौरान किया गया था। नाम का हिंदी अनुवाद करें तो वह कुछ ऐसा होगा- महा जन नद।
हमारी नदियां पुराण में मिलने वाले किस्सों से अवतरित हुई हैं। इस देश की धरती पर न जाने कितने त्याग, तपस्या, भगीरथ प्रयत्नों के बाद वे उतरी हैं। लेकिन लीबिया का यह महा जन नद सन् 1960 से पहले बहा ही नहीं था। लीबिया के नेता कर्नल  गद्दाफी ने सन् 1969 में सत्ता प्राप्त की थी। तभी उनको पता चला कि उनके विशाल रेगिस्तानी देश के एक सुदूर कोने में धरती के बहुत भीतर एक विशाल मीठे पानी की झील है। इसके ऊपर इतना तपता रेगिस्तान है कि कभी किसी ने यहां बसने की कोई कोशिश ही नहीं की थी। रहने-बसने की तो बात ही छोड़िए, इस क्षेत्र का उपयोग तो लोग आने-जाने के लिए भी नहीं करते थे। बिल्कुल निर्जन था यह सारा क्षेत्र।
नए क्रांतिकारी नेता को लगा कि जब यहां पानी मिल ही गया है तो जनता उनकी बात मानेगी और यदि इतना कीमती पानी यहां निकालकर उसे दे दिया जाए तो वह हजारों की संख्या में अपने-अपने गांव छोड़कर इस उजड़े रेगिस्तान में बसने आ जाएगी। जनता की मेहनत इस पीले रेगिस्तान को हरे उपजाऊ रंग में बदल देगी। अपने लोकप्रिय नेता की बात लोक ने मानी नहीं। पर नेता को तो अपने लोगों का उद्धार करना ही था। कर्नल गद्दाफी ने फैसला लिया कि यदि लोग अपने गांव छोड़कर रेगिस्तान में नहीं आएंगे तो रेगिस्तान के भीतर छिपा यह पानी उन लोगों तक पहुंचा दिया जाए। इस तरह शुरू हुई दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महंगी सिंचाई योजना। इस मीठे पानी की छिपी झील तक पहुंचने के लिए लगभग आधे मील की गहराई तक बड़े-बड़े पाईप जमीन से नीचे उतारे गए। भूजल ऊपर खींचने के लिए दुनिया के कुछ सबसे विशालकाय पंप बिठाए गए और इन्हें चलाने के लिए आधुनिकतम बिजलीघर से लगातार बिजली देने का प्रबंध किया गया।
तपते रेगिस्तान में हजारों लोगों की कड़ी मेहनत, सचमुच भगीरथ-प्रयत्नों के बाद आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिसका सबको इंतजार था। भूगर्भ में छिपा कोई दस लाख वर्ष पुराना यह जल आधुनिक यंत्रों, पंपों की मदद से ऊपर उठा, ऊपर आकर नौ दिन लंबी यात्रा को पूरा कर कर्नल की प्रिय जनता के खेतों में उतरा। इस पानी ने लगभग दस लाख साल बाद सूरज देखा था।
कहा जाता है कि इस नदी पर लीबिया ने अब तक 27 अरब डालर खर्च किए हैं। अपने पैट्रोल से हो रही आमदनी में से यह खर्च जुटाया गया है। एक तरह से देखें तो पैट्रोल बेच कर पानी लाया गया है। यों भी इस पानी की खोज पैट्रोल की खोज से ही जुड़ी थी। यहां गए थे तेल खोजने और हाथ लग गया इतना बड़ा, दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात भूजल भंडार।
बड़ा भारी उत्सव था। 1991 के उस भाग्यशाली दिन पूरे देश से, पड़ौसी देशों से, अफ्रीका में दूर-दूर से, अरब राज्यों से राज्याध्यक्ष, नेता, पत्रकार जनता- सबके सब जमा थे। बटन दबाकर उद्घाटन करते हुए कर्नल गद्दाफी ने इस आधुनिक नदी की तुलना रेगिस्तान में बने महान पिरामिडों से की थी। वे उस दिन अपने दो शत्रु देशों- अमेरिका और इंग्लैंड के खिलाफ भी जहर उगलने से नहीं चूके थे। उन्होंने इस नदी को एक क्रांतिकारी नदी की संज्ञा दी थी और एक ही सांस में कह डाला था कि क्रांतिकारी जनता ऐसे शत्रुओं को ठिकाने लगा देगी।
वे भला यह बात कैसे बता पाते कि इस क्रांतिकारी योजना का सारा काम उनके शत्रु देशों की कंपनियों ने ही किया है। दक्षिणी-पश्चिमी लंदन के एक कीमती मोहल्ले में बनी एक बहुमंजिली इमारत की चैथी मंजिल पर था, इस नई नदी को रेगिस्तान में उतारने वाली कंपनी का मुख्यालय। ‘अमेरिकी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन हैलीबर्टन’ की यूरोपी शाखा ‘ब्राउन एंड रूट्स’ नामक कंपनी इसी जगह से काम करती थी। ब्राउन एंड रूट्स ने ही इस महा जन नद की पूरी रूपरेखा तैयार की थी।
लेकिन आज यही सारा संसार लीबिया के इस लोकप्रिय बताए गए नेता के खिलाफ वहां की जनता का साथ देने में जुट गया है। तब भी पर्यावरण का हित देखते तो यह पूरी योजना, महा जन नद लोक विरोधी ही दिखती।
लोग बताते हैं कि इन नद से पैदा हो रहा गेहूं आज शायद दुनिया का सबसे कीमती गेहूं है। लाखों साल पुराना कीमती पानी हजारों-हजार रुपया बहाकर खेतों तक लाया गया है-तब कहीं उससे दो मुट्ठी अनाज पैदा हो रहा है। यह भी कब तक? लोगों को डर तो यह है कि यह महा जन नद जल्दी ही अनेक समस्याओं से घिर जाएगा और रेगिस्तान में सैकड़ों मीलों में फैले इसके पाईप जंग खाकर एक भिन्न किस्म का खंडहर, स्मारक अपने पीछे छोड़ जाएंगे।
Benghazi, Libya
लीबिया में इस बीच राज बदल भी गया तो नया लोकतंत्र इस नई नदी को बहुत लंबे समय तक बचा नहीं सकेगा। और देशों में तो बांधों के कारण, गलत योजनाओं के कारण, लालच के कारण नदियां प्रदूषित हो जाती हैं, सूख भी जाती हैं। पर यहां लीबिया में पाईपों में बह रही इस विशाल नदी में तो जंग लगेगी। इस नदी का अवतरण, जन्म तो अनोखा था ही, इसकी मृत्यु भी बड़ी ही विचित्र होगी।
(फ्रेड पीयर्स का यह लेख गांधी मार्ग में प्रकाशित हुआ है. प्रस्तुति अनुपम मिश्र.)

क्या आप अमेरिका के राष्ट्रपति की अय्याशियां भूल गये
Love Letter from Monica Lewinsky to Bill Clinton
A letter from Monica S. Lewinsky to President Clinton, dated June 29, 1997, which was part of the evidence gathered by Kenneth W. Starr.
29 June 1997
Dear Handsome,
I really need to discuss my situation with you. We have not had any contact for over five weeks. You leave on Sat. and I leave for Madrid with the SecDef on Monday returning the 14th of July. I am then heading out to Los Angeles for a few days. If I do not speak to you before I leave, when I return it will have been two months since we last spoke. Please do not do this. I feel disposable, used and insignificant. I understand your hands are tied but I want to talk to you and look at some options. I am begging you one last time to please let me visit briefly Tuesday evening. I will call Betty Tuesday afternoon to see if it is o.k. - M




Saturday, October 01, 2011

फलस्तीन को मान्यता से ही होगी शांति



संयुक्त राष्ट्र महासभा में बराक ओबामा का संबोधन अमेरिकी स्वार्थों को दिखाता है। उनका संबोधन यह बताता है कि किस तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद मुस्तैदी से इजरायल की पीठ पर अपना हाथ रखे हुए है।  इजरायल को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वह बड़ी बेशर्मी से संयुक्त राष्ट्र संघ के अनेकानेक प्रस्तावों का उल्लंघन कर फलस्तीनी भूभाग पर कब्जा किए हुए है। उस पर लगतार हमले कर रहा है और एक स्वतंत्र फलस्तीन देश के गठन का रास्ता रोके हुए है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रस्ताव संख्या-181 का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है, जिसमें इजरायल के साथ एक फलस्तीन देश के गठन का प्रावधान है।

संयुक्त राष्ट्र संघ में ही पिछले साल के अपने संबोधन में राष्ट्रपति ओबामा ने फलस्तीन देश के गठन की ओर बढ़ने के वायदे तथा संकल्प की बात कही थी, इसके ठीक उलट इस साल के अपने संबोधन में उन्होंने इसकी चर्चा की कि किस तरह ‘शांति कठिन है’ और इसकी कसम भी खाई कि अगर फलस्तीन मुल्क को मान्यता देने का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने आता है, तो अमेरिका उसे वीटो करेगा।
अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति के रूप में पहली बार किसी अफ्रीकी-अमेरिकी के राष्ट्रपति चुने जाने तथा उससे जुड़े जोशो-खरोश तथा दुनिया भर में पैदा हुई उम्मीदों को ध्यान में रखते हुए भी यह सवाल उठाया गया था कि क्या इसका उपयोग एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए किया जाएगा? हालांकि सवाल करने वालों ने उस वक्त यह भी कहा था, ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद का पिछला अनुभव यही बताता है कि वह कभी नहीं बदल सकता। अगर ऐसा है, तो अनुभव पर उम्मीद की जीत के लिए संघर्ष जारी रहना चाहिए।’
बहरहाल, जहां तक फलस्तीनियों का सवाल है, तो यह स्पष्ट है कि उनका संघर्ष न सिर्फ जारी रहेगा, बल्कि निश्चित रूप से इस संघर्ष में और तेजी आने जा रही है। इजरायल के सबसे लोकप्रिय दैनिक हारेत्ज  ने पिछले हफ्ते लिखा था: ‘इजरायल के खुश होने की वजहें हैं। राष्ट्रपति ओबामा के भाषण का स्वर पहले के किसी भी भाषण से कहीं ज्यादा यहूदीवादी लग रहा था। फलस्तीन अथॉरिटी का नेतृत्व अमेरिका के साथ टकराव के रास्ते पर है और फलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) के महासचिव यासिर आबेद रब्बो ने पिछले दिनों चैनल-2 से बात करते हुए कहा था कि अमेरिकी अब इजरायलियों और फलस्तीन अथारिटी के बीच मध्यस्थता नहीं कर सकेंगे।
पूरी भाषणबाजी तथा लफ्फाजी के बावजूद अपने ताजातरीन भाषण से ओबामा ताकतवर यहूदी लॉबी का वफादार बनकर सामने आए हैं और उन्होंने विश्व प्रभुत्व के अमेरिकी साम्राज्यवाद के मनसूबों को ही स्वर दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स इस बात का शोर मचा रहा था कि फलस्तीन की सदस्यता के पक्ष में संयुक्त राष्ट्र संघ में मतदान सत्यानाशी होगा। वॉल स्ट्रीट जर्नल  आरोप लगा रहा था कि फलस्तीनी इजरायल को परेशान करने, उसकी वैधता खत्म करने तथा अंतत: उसे नष्ट कर देने के अपने शाश्वत अभियान में एक और औजार का इस्तेमाल कर रहे हैं। कंजर्वेटिव दबदबे वाली अमेरिकी कांग्रेस ने धमकी दी थी कि अगर फलस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता जाती है, तो सरकार के महत्वपूर्ण कामों को रोक दिया जाएगा।
लगातार यह प्रचार किया जा रहा है कि फलस्तीन के लोग इजरायल को स्वीकार ही नहीं करना चाहते हैं, जबकि फलस्तीन अथॉरिटी के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून से यह अनुरोध किया था कि 1967 की सीमाओं में फलस्तीन देश को मान्यता दी जाए, जो शांति से इजरायल के साथ रहने के लिए तैयार है। यह मान्यता संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रस्ताव संख्या 181 के आधार पर दी जानी है, जिसमें पूर्वी-येरूशलम को फलस्तीन राज्य की राजधानी बनाए जाने का भी प्रावधान है।
पश्चिमी एजेंसियों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों के अनुसार, दुनिया भर में फैले 83 प्रतिशत फलस्तीनियों ने संयुक्त राष्ट्र संघ से मान्यता हासिल करने के प्रयास का उत्साह के साथ समर्थन किया है। उधर, द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, अनेक अरब देशों ने कड़ी चेतावनियां दी हैं कि अगर अमेरिका वीटो का प्रयोग करता है, तो अरब तथा मुस्लिम जगत के साथ संबंध सुधारने के उसके सारे प्रयास निर्थक हो जाएंगे।’ सऊदी खुफिया तंत्र के लंबे अरसे तक प्रमुख रहे शख्स का हवाला देते हुए इस पत्रिका ने लिखा है कि अगर अमेरिका फलस्तीन राज्य के दर्जे के खिलाफ वोट करता है, तो सऊदी अरब भविष्य में अमेरिका के साथ उस तरह से सहयोग नहीं कर पाएगा, जिस ऐतिहासिक रूप से अब तक करता आया है।
साफ है, वर्तमान गंभीर आर्थिक संकट व मंदी की पृष्ठभूमि में, जब यहूदी लॉबी द्वारा नियंत्रित वित्तीय पूंजी, अमेरिका की संकट में फंसी अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने की ओबामा की कोशिशों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, ओबामा ने उग्रपंथी स्वर अपना लिया है। आखिरकार, इन्हीं परिस्थितियों के बीच उन्हें अपने चुनाव का अभियान भी जो चलाना है। यह अमेरिकी साम्राज्यवाद की उस लगातार बनी हुई आक्रामकता के भी अनुरूप है, जो अफगानिस्तान में देखने को मिली है। वहां अमेरिका की अफ-पाक नीति ने संकट पैदा कर दिया है। नौबत यहां तक पहुंच गई है कि पाकिस्तान ने, जिसे लंबे अरसे से तथा पुराने जमाने से दक्षिण एशिया में अमेरिका की कठपुतली माना जाता रहा है, एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अपनी विदेश मंत्री को अमेरिका से यात्रा रद्द कर स्वदेश लौटने के लिए कहा।
इन हालात में अपने विश्व प्रभुत्व को और पुख्ता करने के अमेरिका के मनसूबे दुनिया की बहुमत आबादी की तकलीफें और बढ़ाने का ही काम करेंगे। इसी के हिस्से के तौर पर फलस्तीनियों को अपने देश के उनके मौलिक अधिकार से आगे भी वंचित रखा जाएगा। ज्यादा संभावना इसी बात की है कि जैसे ही अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फलस्तीन राज्य की मान्यता के खिलाफ अपना वीटो इस्तेमाल करने की धमकी देगा, सुरक्षा परिषद किसी निश्चित टाइम टेबल से मुक्त समीक्षा प्रक्रिया का गठन कर देगा। अमेरिका चाहेगा कि इससे उसे वह समय और मौका मिल जाए कि वह अपनी कथित चौकड़ी- अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस और संयुक्त राष्ट्र— के बीच बातचीत को आगे बढ़ाए। लेकिन यह चौकड़ी तो अब तक सीमाओं, सुरक्षा, शरणार्थी तथा येरूशलम जैसे प्रश्नों पर वार्ता के लिए दिशा-निर्देश तय करने पर भी सहमति नहीं बना पाई है।

पश्चिम एशिया में कोई स्थायी शांति तभी आ सकती है, जब 1967 से पहले की सीमाओं में तथा अवैध रूप से इजरायल द्वारा कब्जाए गए भूभाग को खाली कराने के बाद एक फलस्तीन देश का गठन हो जाए, जिसकी राजधानी पूर्वी-येरूशलम हो।
सीताराम येचुरी