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Tuesday, June 10, 2014

रिलायंस कथा: KG बेसिन, जानिए पर्दे के पीछे का सारा खेल…


कभी आपने सोचा है कि क्यों आप अभी गैस के लिए 4.2$ दे रहे हैं? गैस के कुएं अम्बानी को कैसे मिला? सरकार ने क्या किया? क्या है KG बेसिन? नहीं ना! तो आईए अब जान लीजिएक्योंकि यह गैस आपको और रूलाने वाला है. आपके घरेलू बजट पर ज़बरदस्त डाका डालने वाला है


KG D6 बेसिन आखिर है क्या बला?
दरअसल, KG का तात्पर्य कृष्णा गोदावरी बेसिन से है, जो आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र में कृष्णा और गोदावरी नदी किनारे करीब 50000 स्क्वायर किलोमीटर में फैला है. इन किनारों में एक जगह है, जिसे धीरुभाई-6 कहते हैं, यानी D6… यहीं पर रिलायंस इंडस्ट्री ने देश के सबसे बड़े गैस के भण्डार का पता लगाया.
सरकारी आंकड़ों की मानें तो 50000 में से 7645 स्क्वायर किलोमीटर के एरिया, जहां गैस का पता लगा, उस जगह को KG-DWN-98/1 कहा गया है.
जानिए पर्दे के पीछे का सारा खेल
1991 में भारत सरकार ने भारतीय निजी कंपनियों और विदेशी कंपनियों के साथ एक हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन (E&P) का काम शुरू किया. इसके तहत छोटे-छोटे ब्लॉक्स दिए गए कंपनियों को तेल और गैस के उत्पादन के लिए. पर 1999 में न्यू एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पालिसी (NELP) लाई गयी भारत सरकार द्वारा, जिससे सारे छोटे-छोटे ब्लॉक्स, जो अलग-अलग कंपनियों को दिए जा रहे थे, उसे बंद करके एक बड़ा ब्लाक जिसे धीरुभाई-6 D6 कहा गया, वो रिलायंस को दे दिया गया. अर्थात पॉलिसी बदली गयी, जिससे कई कम्पनियां इस काम में ना लगे और एक बड़ी कंपनी सारे बेसिन का गैस तेल आदि का उत्पादन करे.

अब सवाल ये है कि बेसिन तो रिलायंस को दे दिया गया, पर क्या सरकार का उस पर नियंत्रण है कि नहीं? क्योंकि कोई भी प्राकृतिक सम्पदा देश के जनता की होती है. इसीलिए सरकार इस एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन को मॉनिटर करती है. अब किसी भी प्राकृतिक सम्पदा को निजी कंपनी कैसे निकालती और बेचती है, इसे मॉनिटर करने के लिए सरकार ने प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) के तहत निजी कंपनियों के साथ समझौता करती है.
PSC दरअसल एक कॉन्ट्रैक्ट ही है, जिसमें खरीदार और बेचने वाली पार्टी के लिए नियम कानून तय किये गए हैं. इसमें ये बताया गया है कि प्राकृतिक सम्पदा की खोज करने से लेकर उस सम्पदा को निकाल कर बेचने तक कौन-कौन से प्रक्रियाओं को फॉलो करना हैसाथ ही इस कॉन्ट्रैक्ट में मुनाफे का बंटवारा कैसे होगाइसकी भी एक प्रक्रिया है. इस कॉन्ट्रैक्ट का उल्लंघन न हो, इस बात को तय करता है डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ हाइड्रोकार्बन (DGH).
इसी तरह का एक PAC यानी कॉन्ट्रैक्ट रिलायंस और भारत सरकार के बीच साईन किया गया. इस पुरे डील में रिलायंस की ही एक पार्टनर निको रिसोर्सेसभी शामिल थी, जिसका हिस्सा 10% था. यहाँ मैं आपको बताता चलूं कि ये उस समय की बात है, जब रिलायंस का बंटवारा नहीं हुआ था.
लेकिन इससे पहले कि KG D-6 बेसिन से उत्पादन शुरू हो पाता, दोनों भाइयों के बीच बंटवारा हो गया, जिसमें गैस का सारा बिज़नेस मुकेश अम्बानी के हिस्से आया. मज़े की बात ये है कि दोनों भाई जिस गैस के लिए झगड़ रहे थे, ये पूरी सम्पदा देश और उसके लोगों की थी न कि इन दोनों भाइयों कीफिर भी इन्होंने बेसिन का आपस में बंटवारा कर लिया. हालांकि PAC के कॉन्ट्रैक्ट में लिखा पहला वाक्य कहता है कि ‘by virtue of article 297 of constitution of India, Petroleum is a natural state in the territorial waters and the continental shelf of India is vested with the union of India’
यानी मोटे तौर पर देखा जाए तो भारतीय संविधान की धारा-297 के अनुसार भारत अधिकृत समुन्द्र में पाया गया पेट्रोलियम भारत की सम्पदा है.
जून 2004 में NTPC को 2600 मेगावाट अपने दो पॉवर प्लांट (कवास और गंधार में मौजूद है) के लिए गैस की ज़रुरत थी. इसके लिए NTPC ने बोली लगवाई. इस बोली में रिलायंस ने NTPC को 17 साल तक 2.34$ के हिसाब से 132 ट्रिलियन यूनिट गैस देने का ठेका लिया. इसी ठेके के आधार पर 2005 में बंटवारे के समय अनिल अम्बानी ने अपना दावा ठोंका और गैस सम्पदा का एक बड़ा हिस्सा RNRL के नाम से अपने पास रख लिया. ये कह कर कि क्योंकि NTPC को 17 साल तक 2.34$ के हिसाब से गैस देने का ठेका उनके पास है, इसीलिए इस गैस को निकालने के लिए उन्हें भी गैस का कुआं तो चाहिए ही. अपने पिता की संपत्ति का बंटवारा करते हुए दोनों भाइयों ने देश की अनमोल सम्पदा गैस का भी बंटवारा कर लिया और इस बात को सालों तक दबा के रखा गया. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में स्पष्ट तौर पर कहा है भारत सरकार गैस के उत्पादन से लेकर गैस के उपभोक्ता के पास पहुंचने तक उसकी मालिक है. कंपनियों को अपना मतभेद और बंटवारा सरकार के पॉलिसी के तहत करना चाहिए.
अब यहां सरकार पर ऊंगली उठती है. किसी मंत्रालय ने और न किसी मंत्री ने इस गैस के बंटवारे पर कुछ कहा. वो गैस जो देश की संपदा थी, अम्बानी परिवार की नहीं, फिर भी सरकार आँख मूंद कर धृतराष्ट्र की तरह भारतीय संपदा को लुटते देखती रही. प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने दबे स्वर में बस ये कह कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया कि दोनों भाई देश के हितों को ध्यान में रखते हुए झगड़ा न करें और सभी मतभेदों को जल्दी सुलझाएं.
लेकिन दिलचस्प मोड़ अभी आना बाकी है. बंटवारा होते ही रिलायंस ने NTPC को 2.34$ के हिसाब से गैस देने से मना कर दिया. जिस NTPC के ठेके के नाम पर अनिल अम्बानी ने RNRL के नाम से देश के कुएं के भण्डार का बहुत बड़ा हिस्सा अपने नाम कर लिया, उस हिस्से के अपने पास आते ही रिलायंस इंडस्ट्रीज ने NTPC के उस ठेके पर ही साईन करने से मना कर दिया. मतलब अनिल अम्बानी को गैस के कुएं का हिस्सा भी मिल गया और अब उसे NTPC को भी गैस नहीं देना था सारा गैस उनके पास.
NTPC ने रिलायंस को मुंबई कोर्ट में 20 दिसंबर 2005 में घसीटा, लेकिन वो केस आज 9 साल बाद भी ख़त्म नहीं हो पाया है. NTPC जैसी संस्था के साथ इतने बड़े धोके के बावजूद सरकार का मुंह में दही जमा के चुप बैठे रहना, अपने आप में एक अलग कहानी है.
2007 में जब NTPC और रिलायंस का झगड़ा कोर्ट में चल ही रहा रहा था, तब सरकार ने इस मामले को एमपावर्ड ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स (EGOM) के सुपुर्द कर दिया, जिसकी अध्यक्षता अभी के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी खुद कर रहे थे, जो उस समय वित्त मंत्री थे. EGOM ने 2.34$ की दर को बढ़ा कर 4.2$ कर देने का फैसला किया.
यहां सबसे मज़े की बात ये है कि ये सारा दाम बढ़ाने-घटाने कोर्ट कचहरी आदि का खेल तब हो रहा था, जब KG बेसिन से ज़रा सी भी गैस नहीं निकाली जा रही थी. बेसिन अब तक बंद था. लेकिन जैसे ही दाम 4.2$ किया गया, रिलायंस ने इस मौके को तुरंत लपक लिया. बयान दिया गया कि सरकार द्वारा गठित EGOM द्वारा तय किये गए दाम से कम में गैस सप्लाई नहीं किया जाएगा चाहे वो NTPC हो या कोई और.
अब सवाल यह है कि प्रणब मुखर्जी इस 4.2$ के आंकड़े पर पंहुचे कैसे? दरअसल, ये रिलायंस का ही एक फार्मूला था, जिसके तहत उन कंपनियों को एक दाम बताने को कहा गया. जो रिलायंस से गैस लेना चाहते थे. रिलायंस ने उन्हें 4.54$ और 4.75$ के बीच एक दाम बताने को कहा और इन कंपनियों के दाम बताने के बाद रिलायंस ने EGOM को दाम 4.59$ कर देने को कहा, जिसे बाद में रिलायंस ने कम करके 4.3$ कर दिया. इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने इसमें मामूली कटौती करके 4.2$ कर दिया और अपनी पीठ थपथपाई कि न उसकी चली, न इसकी चलेगी, चलेगी तो सिर्फ हमारी ही चलेगी.
इन सभी उठाये गए क़दमों पर भारत सरकार के ही पॉवर एंड एनर्जी विंग के प्रिंसिपल एडवाइजर सूर्या पी सेठी ने तत्कालीन कैबिनेट के सेक्रेटरी के साथ सवाल उठाया, जिसे नज़रंदाज़ कर दिया गया. सूर्या पी. सेठी का कहना था कि विश्व में कहीं भी गैस की कीमत 1.43$ से ज्यादा नहीं है, फिर अपने ही देश के कुएं से लोग 4.2$ में गैस क्यों लें?
2011 की कैग की रिपोर्ट के अनुसार बिना कोई कुआँ खोदे रिलायंस पेट्रोलियम मिलने के दावे करती रही. मतलब खुद रिलायंस को नहीं पता था कि कितना गैस कितने कुओं में है. रिलायंस को केवल 25% हिस्से पर काम करना था, लेकिन PSC के कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ जाकर रिलायंस ने समूचे बेसिन में काम शुरू कर दिया था और सरकार ने इसमें कोई टोका टाकी तक नहीं की.
रिलायंस के कहने पर 4.2$ चुकाने वाले देश की ये जनता अपने ही कुओं से महंगा गैस ले रही है. और अब भाजपा सरकार इसे बढ़ाकर 8$ करने जा रही है. इससे महंगाई बेतहाशा बढ़ेगी. अपने ही लोगों को गैस 8$ में जबकि बंगलादेश को यही गैस करीब 2$ में दिया जाता है. इस 8$ के पीछे की मंशा क्या है? और किस कारण इसे दोगुना किया जा रहा है, कोई बताने को तैयार नहीं है? कहा जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में महंगा है, पर यह बात गलत है. फिर 4.2$ कंपनियों से पूछ कर क्यों किये, जब दुनिया केवल 1.43$ में बेच रही थी?
ये कई ऐसे सवाल हैं जिससे बचने के लिए नेता, पत्रकार, टीवी चैनल और ना जाने क्या-क्या खरीद लिए जाते हैं. और जनता है कि दाम चुकाते-चुकाते थक जाती है. सो कॉल्ड युवाओं से ज़रा पूछिये कितना जानते है इस बारे में वो? बस युवा शक्ति का डंका पीटने से कुछ नहीं होता. शक्ल बनाने में व्यस्त युवाओं को अपने अक्ल पर काम करने की ज़रुरत है…!!

Amit Bhaskar for BeyondHeadlines

Saturday, August 11, 2012

यमुना एक्सप्रेसवे : गांवों के जबरदस्‍ती शहरीकरण की त्रासदी



आगरा से दिल्ली को जोड़नेवाली सड़क यमुना एक्सप्रेसवे को आम उपयोग के लिए खोल दिया गया है। छह लेन की इस 165 किलोमीटर सड़क के कारण आगरा से दिल्ली का सफर मात्र तीन घंटे में पूरा किया जा सकता है। लेकिन यह एक सड़क मात्र नहीं है। इसके साथ पांच-पांच सौ हेक्टेयर की पांच टाउनशिप भी विकसित की जा रही है। इसे दिल्ली-एनसीआर के विस्तार के एक नये अध्याय के बतौर देखा जा रहा है। इसके साथ ही पिछले साल इस परियोजना क्षेत्र में विस्थापित भट्टा पारसौल के ग्रामीणों के पक्ष में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के उत्सवी सत्याग्रह का भी पटाक्षेप हो जाएगा, जबकि गांवों के बलात शहरीकरण से जुड़े सवाल लंबे समय तक विकास की मौजूदा अवधारणा को मुंह चिढ़ाएंगे।

यह प्रसंग महज ग्रेटर नोएडा से आगरा तक सीमित नहीं बल्कि झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा जैसे राज्यों में हाल के दिनों में भूमि-अधिग्रहण को लेकर सरकार, रैयतों और कारपोरेट घरानों के बीच तीखे संघर्षों तथा विभिन्न हित-समूहों की भूमिका से भी जुड़ा है। झारखंड की राजधानी रांची के समीप पिठोरिया रोड पर नगड़ी गांव की लगभग 200 एकड़ जमीन तीन प्रतिष्‍ठित शिक्षण संस्थानों को देने को लेकर जारी तीखा विवाद भी एक देशव्यापी चिंता का एक अहम हिस्सा है।

यमुना एक्सप्रेसवे और नोएडा एक्सटेंशन को लेकर जारी विवाद हो या फिर सिंगूर-नंदीग्राम-झाड़ग्राम या फिर नगड़ी, इन मामलों ने अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1894 में बनाये गये भूमि-अधिग्रहण कानून की असलियत सामने ला दी है, जिसमें राज्य सरकार को किसी भी रैयत को उसकी भूमि से किसी भी क्षण बेदखल कर देने की निर्बाध ताकत प्राप्त है। अंग्रेजों के जमाने में बने औपनिवेशिक कानूनों को अब तक बनाये रखने का नतीजा खुद सरकार को ही नहीं, पूरे समाज और खासकर रैयतों को भुगतना पड़ रहा है।
भूमि-अधिग्रहण कानून की धारा चार के अनुसार अगर सरकार को किसी सार्वजनिक हित या किसी कंपनी के लिए जरूरत हो तो किसी भी जमीन का अधिग्रहण करने की सूचना जारी कर सकती है। ऐसी सूचना जारी होने के साथ ही तत्काल सरकारी अधिकारियों को उस जमीन में घुसकर कुछ भी करने का अधिकार मिल जाएगा। वे चाहें तो जमीन का सर्वेक्षण करें, या कोई खुदाई करें, यहां तक कि चहारदीवारी खड़ी कर लें या फिर खड़ी फसलों को काट डालें। अगर उस जमीन पर कोई घर हो तो सरकार महज एक सप्ताह का नोटिस देकर उस घर के अंदर भी घुस सकती है।

कानून की धारा पांच के मुताबिक अगर रैयत को कोई आपत्ति हो तो जिला मजिस्ट्रेट उसकी आपत्तियां सुनकर रिपोर्ट देगा। रैयत के पुनर्वास और मुआवजे के संबंध में कोई स्पष्‍ट प्रावधान नहीं होने के कारण रैयतों को आसानी से बेदखल करना संभव हो जाता है। झारखंड में नगड़ी के उदाहरण से समझा जा सकता है कि 1957 में महज सात रुपये डिसमिल पर जमीन छोड़ने को रैयत तैयार नहीं हुए, तो यह राशि कोषागार में जमा करके जमीन को अधिगृहीत मान लिया गया।

कानून की धारा 17 के दुरुपयोग ने इस समस्या को कुछ ज्यादा ही जटिल बना दिया है। इसके अनुसार किसी आपातकालीन स्थिति में रैयतों की आपत्ति मांगे बगैर ही किसी जमीन का अधिग्रहण कर लिया जाएगा। यह धारा किसी बाढ़ या आफत की स्थिति के लिए बनायी गयी थी। लेकिन उत्तरप्रदेश के उदाहरणों में देखा जा सकता है कि आवासीय कालोनियां बनाने और कारखाने लगाने के लिए इस धारा का कितना बेजा इस्तेमाल हुआ।

इस परिघटना को सभ्यताओं के टकराव के बतौर भी देखा जा सकता है, जहां शहरी परिवेश के लोगों की नजर में ग्रामीण परिवेश को अविकसित माना जाता है और जहां प्राकृतिक जंगलों के बजाय कंक्रीट के जंगल को विकास का पर्याय मान लिया जाता है। ग्रेटर नोएडा हो या गुड़गांव, हर जगह शहरीकरण के नाम पर हुए तथाकथित विकास में एक चीज सिरे से गायब है और वह है स्थानीय लोगों की सहभागिता। दिल्ली एनसीआर के फैलाव की महत्वाकांक्षी योजनाओं का महत्व समझा जा सकता है, लेकिन इसमें स्थानीय लोगों को पूरी तरह दरकिनार करके किसी जेपी ग्रुप जैसे कारपोरेट को विकास का पूरा जिम्मा देने से एक अपंग समाज का ही निर्माण होगा। वही हो भी रहा है। दिल्ली से आप बहादुरगढ़ की ओर जाएं या फिर गाजियाबाद की ओर, हर जगह आपको ग्रामीण परिवेश के सामने मौजूद अस्तित्व का संकट साफ दिख जाएगा। गगनचुंबी भवनों के बीच कहीं दबी-सहमी ग्रामीण बस्तियों और खेत-खलिहानों से जुड़े लोग सहसा विकास पर पैबंद जैसे दिखने लगेंगे। ऐसे लोगों का अपनी ही जमीन पर अचानक मिसफिट हो जाना इस तथाकथित विकास की सबसे बड़ी त्रासदी है।

दिल्ली की महायोजना ने समीपवर्ती राज्यों से सटे इलाकों को कृषि क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र हरित क्षेत्र सहित अन्य श्रेणियों में विभक्त कर रखा है। हुडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद इत्यादि प्राधिकारों ने भी अपने मास्टर प्लान बनाकर शहरीकरण की प्रक्रिया चला रखी है। ऐसे मास्टर प्लानों में इतनी कड़ाई के नियम रखे जाते हैं, जो किसी भी तरह के अनियंत्रित व अनियोजित निर्माण की इजाजत नहीं देते। लेकिन विडंबना है कि ऐसे ही प्रावधानों के कारण बेतरतीब विकास की गुंजाइश ज्यादा निकलती है। कारण यह कि अपने मास्टर प्लान के मुताबिक आवासीय घर या भूखंड आवंटित करने की प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी व महंगी है कि गरीब लोगों की बात तो दूर, मध्यवर्गीय लोगों के लिए भी अपनी छत एक सपना ही रह जाती है।

इसके कारण ऐसे लोगों को कानून के छिद्रों का सहारा लेकर या फिर गैरकानूनी तरीके से बेतरतीब निर्माण के लिए विवश होना पड़ता है। कानून के छिद्रों का सहारा लेने का उदाहरण दिल्ली में लाल डोरा की जमीनों में या फिर नोएडा में आबादी प्लाटों में होने वाले चालाकीपूर्ण उपयोग व निर्माण के बतौर देखा जा सकता है। यही बात कृषि जमीनों में तथाकथित फार्म हाउस के नाम पर चल रहे धंधे या फिर कारखानों के नाम पर इंडस्ट्रियल क्षेत्रों में आवंटित जमीनों के मनमाने उपयोग में निहित है।

दिलचस्प यह कि दिल्ली-एनसीआर व उसके विस्तारित क्षेत्रों में जमीन की बढ़ती कीमतों का फायदा भूस्वामियों के बजाय जमीन दलालों और बिल्डरों, कारपोरेट घरानों को ज्यादा मिल रहा है। जबकि गांव से अचानक शहर में बदलते इलाको में जमीन बेचकर या जमीन से विस्थापित होकर कम या ज्यादा रकम पाने वाले लोगों के पास जीवन-यापन या रोजगार का कोई दीर्घजीवी व मुकम्मल रास्ता नहीं होने के कारण उनकी वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए अस्तित्व का संकट तत्काल सामने नजर आता है। जमीन बिकने या मुआवजे से मिले रुपयों से चमचमाती स्कार्पियो में दौड़ने की होड़ में उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि उनके नीचे की जमीन किस तेजी से खिसक रही है। किसी सरकार ने किसी महायोजना में इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत नहीं समझी कि गांव से नगर में विकास की प्रक्रिया में आदमी की सदियों से चली आ रही जीवन-पद्धतियों और जीविकोपार्जन के तरीकों का भी ध्यान रखना जरूरी है।

यह प्रक्रिया न तो गुड़गांव को गांव रहने देती है और न ही नगड़ी को सचमुच किसी नगरी में बदलने देती है। गांव-नगर का यह द्वंद्व कहीं सभ्यताओं के संघर्ष में तो कहीं वर्गीय हितों के टकराव में नजर आता है। ऐसे में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब भट्टा पारसौल के लिए उत्सवी सत्याग्रह करते हैं, तो यह प्रहसन के सिवाय कुछ नहीं दिखता। ऐसे मामलों का राजनीतिकरण करने या किसी दल या सरकार को निशाना बनाने से कुछ नहीं होने वाला। मूल समस्या अंग्रेजों के बनाये औपनिवेशिक कानूनों और विकास की शहर-केंद्रित अवधारणा में निहित है। इन पर दूरगामी फैसलों से ही कोई हल निकलेगा, बशर्ते उसके केंद्र में आदमी की चिंता पहले हो।

(विष्‍णु राजगढ़िया। वरिष्‍ठ पत्रकार। सूचना के अधिकार को लेकर पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय। रांची में रहते हैं। उनसे vranchi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Saturday, August 04, 2012

असम हिंसा: खतरे की घंटी




असम के बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी जिलों कोकराझार और चिरांग में हुई व्यापक हिंसा (जुलाई 2012) ने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। प्रधानमंत्री स्वयं हिंसाग्रस्त क्षेत्र में पहुंचे और वहां के घटनाक्रम को देश के लिए कलंक बताया। उन्होंने हिंसा पर नियंत्रण करने में असफल रहने पर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री की जमकर खिंचाई भी की। क्षेत्र में सेना की तैनाती में अक्षम्य देरी हुई, जिससे हालात बिगड़ते चले गए। असम में जो कुछ घटा, उसमें बड़ी संख्या में लोगों की जानें तो गईं हीं, इससे भी अधिक त्रासद था लाखों लोगों का अपने घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाना। विशेषकर तब जबकि बुआई का मौसम शुरू ही हुआ था। इन लोगों को जिन राहत शिविरों में रखा गया है वहां सुविधाओं का भीषण अभाव है और इन शिविरों की संख्या भी जरूरत से बहुत कम है। एक अन्य दुःखद पहलू यह है कि इस हिंसा को बोडो और “अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों“, जिनमें से अधिकांश मुसलमान हैं, के बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह पहली बार नहीं है कि असम को जातीय हिंसा ने अपनी चपेट में लिया हो। परंतु हालिया हिंसा का व्यापक और दूरगामी प्रभाव पड़ने का अंदेशा है। इस क्षेत्र में स्थानीय जनजातीय समूहों और मुस्लिम अल्पसंख्यक, जिन्हें “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ कहा जाता है, के बीच कई दशकों से शत्रुतापूर्ण रिश्ते रहे हैं। सभी स्थानीय समस्याओं के लिए तथाकथित बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी बताया जाता रहा है। ऐसा प्रचार किया जाता रहा है कि असम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है। “असम असमियों के लिए है“, यह नारा भी उछाला जाता रहा है। यह नारा ठीक उसी तरह का है जैसा कि शिवसेना महाराष्ट्र में उछालती रही है। शिवसेना का भी कहना है कि महाराष्ट्र केवल मराठियों के लिए है। असम में व्याप्त इस गंभीर सामाजिक टकराव को केन्द्र व राज्य, दोनों ही सरकारें नजरअंदाज करती रही हैं।

इस आंतरिक टकराव का प्रकटीकरण पहली बार तब हुआ जब आल असम स्टूडेन्टस यूनियन ने मतदाता सूचियों में से “बांग्लादेशी घुसपैठियों“ के नाम हटाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन को भाजपा का पूरा समर्थन प्राप्त था। इसी दौरान अल्पसंख्यकों के खिलाफ भयावह हिंसा हुई। नेल्ली जनसंहार में कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार से ज्यादा मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस आंदोलन और जनसंहार के बाद हुए चुनाव आल असम स्टूडेन्टस यूनियन जो अब असम गणपरिषद के नाम से जानी जाती है, असम में सत्ता में आ गई। नेल्ली जनसंहार की जांच के लिए त्रिभुवनदास तिवारी आयोग की नियुक्ति की गई। असम गणपरिषद ने सत्ता में आने के बाद नेल्ली जनसंहार के दोषियों के खिलाफ सारे आरोप वापस ले लिए और तिवारी आयोग की रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया।

इसके एक दशक बाद, हिंसा का एक और दौर हुआ जिसके शिकार आज भी राहत शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं। पिछले दशक के शुरूआती वर्षों में बोडो जनजातीय नेताओं के साथ एक समझौता किया गया जिसके अंतर्गत बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद का गठन हुआ। इस परिषद के अंतर्गत चार जिले-कोकराझार, चिरांग, बक्सा व उदलगिरी रखे गए। समझौते के अंतर्गत, बोडो अतिवादियों को अपने हथियार डालने थे जो उन्होंने नहीं किया और इन हथियारों का उपयोग अन्य स्थानीय निवासियों को आतंकित करने के लिए किया जाता रहा। अलग-अलग अनुमानों के अनुसार, इन जिलों में बोडो आबादी का प्रतिशत 22 से 29 के बीच है। उनके अलावा, वहां संथाल, राजबंगी, अन्य आदिवासी और मुसलमान भी रहते हैं। बोडो इन जिलों में अल्पसंख्यक हैं। इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक होने के बावजूद, बोडो समुदाय ने शासन के अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हुए ऐसी नीतियां लागू कीं जिससे गैर-बोडो निवासियों के सामाजिक-आर्थिक हालात बिगड़ते गए। इस क्षेत्र के गैर-बोडो निवासी बदहाली में जी रहे हैं और वे बोडो क्षेत्रीय स्वायत्तशासी परिषद के गठन के खिलाफ थे और हैं। हालिया हिंसा के पहले ऐसी अफवाहें फैलाई गईं कि बांग्लादेश से बड़ी संख्या में हथियारबंद लोग इस क्षेत्र में घुस आए हैं। इसके बाद हिंसा शुरू हो गई।

असम के मुख्यमंत्री ने हिंसा के पीछे “विदेशी हाथ“ होने से इंकार किया है। इस क्षेत्र में असली समस्या यह है कि समय के साथ आबादी बढ़ गई है और खेती की जमीन व अन्य आर्थिक संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। इस दबाव से जनित समस्याओं को सुलझाने की बजाए क्षेत्र की आर्थिक बदहाली और वहां रोजगार की कमी के लिए बांग्लादेशी घुसपैठियों को दोषी ठहराया जा रहा है। “बांग्लादेशी घुसपैठिए“ शब्द पूरे देश व विशेषकर असम में बहुत लोकप्रिय हो गया है। मुंबई में जब बेरोजगारी का संकट बढ़ने लगा तो इसका दोष गैर-मराठी प्रवासियों के सिर मढ़ दिया गया। सच यह है कि बढ़ती आबादी और घटते संसाधनों के कारण सारे देश में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही है और इसके लिए किसी समूह विशेष को दोषी ठहराना व्यर्थ है। असम में समस्या और गंभीर इसलिए है क्योंकि जिन लोगों को समस्या के लिए दोशी ठहराया जा रहा है, वे विदेशी बताए जाते हैं। क्या यह सच है?

असम में बांग्लाभाषियों की बड़ी आबादी है। उनमें से अधिकांश मुसलमान हैं। क्या ये लोग हाल में यहां आकर बसे हैं? क्या उनकी घुसपैठ के पीछे कोई राजनैतिक लक्ष्य है? क्या वे केवल पिछले कुछ दशकों से ही यहां आते रहे हैं?

बांग्लादेशी घुसपैठियों के मिथक का इस्तेमाल लम्बे समय से पूरे देश के साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा अपने हित साधन के लिए किया जाता रहा है। यहां तक कि पूरे देश में इस मिथक ने जड़ें पकड़ ली हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के मसले को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। बंगाली प्रवासियों का असम में आने का सिलसिला 1875 के आसपास शुरू हुआ परंतु इसे गति दी अंग्रेजों ने 20वीं सदी के पहले दशक में। उस समय पड़ोसी बंगाल की आबादी बहुत ज्यादा हो गई थी और वहां राजनैतिक चेतना भी फैल रही थी। बंगाल में जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक हो जाने के कारण वहां बार-बार अकाल पड़ रहे थे। इसके विपरीत, असम में आबादी बहुत कम थी और वहां से ब्रिटिश सरकार को अपेक्षित राजस्व प्राप्त नहीं हो रहा था। इस समस्या के सुलझाव के लिए ब्रिटिश सरकार ने “मानवरोपण“ कार्यक्रम शुरू किया, जिसके अंतर्गत बंगाल के लोगों को असम में बसने के लिए प्रेरित किया गया और उन्हें इसके बदले बहुत-से लाभ भी दिए गए। ब्रिटिश शासकों ने अपनी “फूट डालो और राज करो“ की नीति के अंतर्गत लाईन सिस्टम लागू किया जिसके अंतर्गत प्रवासियों और स्थानीय निवासियों को अलग-अलग क्षेत्रों में बसाया जाता था। बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम में बसने का यह सिलसिला लंबे समय तक चला और सन 1930 के आसपास, बांग्लाभाषी मुसलमानों का असम की आबादी में अच्छा-खासा  हिस्सा हो गया था। आजाद भारत में असम में मुस्लिम आबादी की दशकीय वृद्धि दर उतनी ही रही है जितनी कि अन्य राज्यों की मुस्लिम आबादी की (स्त्रोतः मुस्लिम्स इन इंडियाः एस. यू. अहमदः जनगणना आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित)।

आजादी के तुरंत बाद के सालों में असम की कुल आबादी और उसमें मुसलमानों के प्रतिशत संबंधी आंकड़े एकदम स्पष्ट हैं। हां, जिस समय पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान के निवासियों का दमन कर रही थी उस समय कुछ बांग्लादेशी अवश्य भाग कर असम आएं होंगे। उसके बाद भी आर्थिक कारणों से असम में गरीब बांग्लादेशीयों के बसने का सिलसिला जारी रहा होगा, जैसा कि दुनिया के सभी हिस्सों में होता है। प्रश्न यह है कि हम इस आप्रवासन को किस दृष्टि से देखें। उदाहरणार्थ, भारत में बहुत बड़ी संख्या में नेपाली रहते हैं परंतु उन्हें न तो नीची निगाहों से देखा जाता है और न ही उनका दानवीकरण किया जाता है। यहां तक कि बांग्लादेश से आने वाले हिन्दुओं के साथ प्रवासी के रूप में व्यवहार किया जाता है जबकि वहीं से आने वाले मुसलमानों को घुसपैठिया, भारत की सुरक्षा के लिए खतरा और न जाने क्या क्या बताया जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में व्यापार-व्यवसाय पर मुख्यतः राजस्थान के मारवाड़ियों का कब्जा है। असम में बिहारी भी बड़ी संख्या में रहते हैं।

भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के “घुसपैठियों“ के बारे में दुष्प्रचार के पीछे राजनैतिक निहित स्वार्थ हैं। जहां देश के दूसरे हिस्सों में मध्यकालीन इतिहास का इस्तेमाल मुसलमानों को दानव-रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है वहीं उत्तर-पूर्व में उन्हें घुसपैठिया बताकर राजनैतिक लक्ष्य साधे जाते हैं। यह अत्यंत दुःखद है कि नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चिस इन इंडिया भी इस दुष्प्रचार के झांसे में आ गया और उसके प्रवक्ता ने फरमाया कि बांग्लादेशी घुसपैठियों ने असम में दस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है! सच यह है कि भारत के विभाजन के समय भी असम में मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी थी। इसके बाद, आर्थिक कारणों से कुछ बांग्लादेशी असम में आ बसे होंगें। असम को विभाजित कर 6 नए राज्य बना देने के बाद मुसलमान मुख्यतः उस इलाके में बच रहे जिसे अब असम कहा जाता है, और शायद इसलिए प्रतिशत के लिहाज से उनकी आबादी कुछ ज्यादा प्रतीत होती है।

साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा बांग्लादेशीयों की कथित घुसपैठ के बारे में दुष्प्रचार और तीखा होता जा रहा है। यहां तक कि कई आमजन इसे सही मानने लगे हैं। असम में इस मसले पर कई आंदोलन होने से भी इस मिथक को बल मिला है। असम में मुख्य समस्या आर्थिक विकास का अभाव है न कि स्थानीय रहवासियों को घुसपैठियों द्वारा उनकी जमीनों से बेदखल किया जाना। असम का मसला मुंबई की शिवसेना-ब्रांड राजनीति और “साम्प्रदायिक विदेशी“ के मिथक का काकटेल है। इसके अलावा, इसमें नस्लीय मसलों को भी शामिल कर दिया गया है। नेल्ली से लेकर हालिया हिंसा तक लगातार एक समुदाय विशेष को उनके घरों और गांवों से खदेड़ने का क्रम चल रहा है। पहले घुसपैठ के नाम पर दुष्प्रचार किया जाता है और फिर प्रायोजित हिंसा होती है।

असम में सबसे पहली ज़रूरत है सभी समूहों का निशस्त्रीकरण। इसके बाद यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विस्थापित लोग फिर से अपने गांवों में वापिस जा सकें और बुआई का मौसम खत्म होने के पहले खेती का काम शुरू कर सकें। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बहुत बड़ी संख्या में गरीब लोगों के पास खाने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं बचेगा। पिछले सौ वर्षों के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों का निष्पक्ष अध्ययन और विश्लेषण कर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को “घुसपैठ“ का सच जनता के सामने लाना चाहिए। “बांग्लादेशी घुसपैठियों“ के नाम पर साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा खेली जा रही राजनीति का पर्दाफाश होना चाहिए। जो लोग हिंसा के शिकार हुए हैं उनके घावों पर मरहम लगाने का काम भी प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। उनके साथ सार्थक संवाद स्थापित करके और उन्हें न्याय दिलाकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया) 

Wednesday, March 28, 2012

बाजार की गिरफ़्त में मीडिया



आज पूरी दुनियाँ पर बाजारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाजार बहुत ही तेजी के साथ समस्त संसाधनों पर अपना कब्जा जमाता जा रहा है। चाहे वह प्राकृतिक संसाधन हो या गैर प्राकृतिक हो। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाजार की गिरफ़्त में आ गए हैं यहाँ तक की इंसान भी बाजार की एक वस्तु मात्र बनकर रह गया है।

पूँजीवादी सभ्यता ने साहित्य, कला, संस्कृति यहाँ तक की ज्ञान को भी बाजार की वस्तु बनाकर रख दिया है। दुनिया के सामने सच की तस्वीर रखने का दावा करने वाली हमारी मीडिया, समाचार पत्र भी आज बाजार की गिरफ्त में आ गए हैं। कभी-2 तो ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता पत्रकारिता न होकर पूँजीपतियों और सरकारों की चाटुकारिता करती नजर आती है। खास तौर से भारत की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा शोषकों और साम्राज्यवादी ताकतों की ही वकालत करता दिखाई देता है। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि आज की पत्रकारिता इन्हीं पूँजीपतियों, भ्रष्टाचारियों और जमाखोरों के विज्ञापन के बलबूते जीवित है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि आज का प्रकाशक, सम्पादक और पत्रकार जनसेवक नहीं अपितु वह देश के बड़े अमीरों की कतार में खड़ा होना चाहता है। आज का प्रकाशक, सम्पादक व मीडिया कर्मी यह पूरी तरह से भूल गया है कि पत्रकारिता के मायने क्या होते हैं और पत्रकारिता किसे कहते हैं।

भूमण्डलीकरण के इस वर्तमान दौर में भारतीय पत्रकारिता ने बाजार की शक्तियों के सामने घुटने टेक दिए हैं वैसे तो भारतीय पत्रकारिता का दायरा बहुत बड़ा है। यही नहीं भारत में तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ भी कहा जाता है। इसके बावजूद भी भारतीय पत्रकारिता पूरी ईमानदारी के साथ जनहित में खड़ी होती नजर नहीं आती। पूरा मीडिया जगत जनसरोकारों की जगह बाजार से सरोकार रखने लगा है। अंग्रेजी पत्रकारिता तो तमाम सामाजिक सरोकारांे और नैतिक मूल्यों से पल्ला झाड़कर सीधे-2 बाजार से जुड़ गई है। लेकिन वर्तमान समय में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार भी अंग्रेजी पत्रकारिता के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं और इसके चलते उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गई है। भूमण्डलीकरण और साम्राज्यवादी नीतियों के चलते भारत के आम आदमी का जीवन कष्टों का पर्याय बन गया है। इससे इनका कोई नाता नहीं है। साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ संघर्षरत श्रमिकों, किसानों व जन सामान्य के कष्टों से उदासीन हमारे भारतीय भाषाओं के बड़े कहे जाने वाले अखबार आम जनता के संघर्ष से कहीं भी जुड़े हुए दिखाई नहीं देते। सत्तासीन राजनैतिक पार्टियों के जोड़-तोड़ की राजनीति में ही मशगूल हैं। जनता के दर्द से इनका कोई भी लेना देना नहीं रह गया है।

जहाँ तक क्षेत्रीय अखबारों का प्रश्न है वे अपनी साधन हीनता के चलते अपने अस्तित्व को ही बचाने में लगे रहते हैं लेकिन अब इन अखबारों के प्रकाशकों के अंदर भी बाजारवादी मानसिकता घर करने लगी है जो कभी परिवर्तन कामी आन्दोलनकारी भूमिका निभाने की इच्छा रखते थे। अब यह भी बाजार के रंग में रंगने लगे हैं। वर्तमान समय में इन अखबारों के प्रकाशक और पत्रकार स्थानीय व्यापारियों, माफियाओं, सांसदों, मंत्रियों, और छुट-भइये नेताओं के विज्ञापन के नाम पर मोटी रकम काटने के चक्कर में इनकी दलाली व चापलूसी करते फिरते हैं। स्थानीय स्तर पर फूट रहे जन-आन्दोलनों और संघर्षों की रिर्पोटिंग न के बराबर ही करते हैं। यदि करते भी हैं तो आलोचनात्मक रिर्पोटिंग करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि यह जन आन्दोलनों को उत्साहित करने की जगह हतोत्साहित करते नजर आते हैं। भारत जैसे देश में, जिसे कृषि प्रधान देश कहा जाता है, जिस देश की 60 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है उस देश में लगभग 40 हजार किसानों ने पिछले एक दशक के अंदर आत्महत्याएँ कर लीं। बेरोजगारी की मार से आज का शिक्षित युवा वर्ग आत्महत्या करने को विवश है, आई।टी. जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आज देश में शिक्षा का निजीकरण दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का व्यक्तिगत क्षेत्र में विलय होता जा रहा है लेकिन वर्तमान समय में पूरे देश की मीडिया मौन खड़ी है। आज जनता शासक वर्ग के खिलाफ दिनों दिन हथियार उठाती जा रही है। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें अपने दमनात्मक अभियानों से उन जन आन्दोलनों को कुचलने का असफल प्रयास कर रही हैं। फिर भी ये जन आन्दोलन दिनो दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह बात जुदा है कि आज का जन आंदोलन संगठित न होकर अनेक धाराओं में बँटा हुआ है और जनता का भारी समर्थन जुटाने में असफल है। इसके पीछे शासक वर्ग द्वारा मीडिया के माध्यम से किया जा रहा दुष्प्रचार, ज्यादा कारगर साबित हुआ, क्योंकि मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा, केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, पूँजीपतियों व साम्राज्यवादी ताकतों से संचालित होता है और शासक वर्ग यह कभी नहीं चाहता है कि उसके खिलाफ खड़ा हो रहा कोई भी जन आन्दोलन मजबूत हो और उनकी शोषण परक व्यवस्था को नेस्तानाबूद कर जनता के लिए एक शोषण विहीन शासन व्यवस्था का निर्माण करे इसके लिए देश में जन सरोकारी मीडिया की अत्यन्त आवश्यकता है जो बाजार के चंगुल से मुक्त हो, जो जनता के अधिकारों के लिए काम करे, जो मानवीय संस्कृति, साहित्य, कला और शिक्षा का निर्माण करे और व्यापक जनता के पक्ष में खड़ी होकर जनपक्षधरता की बात करे, एक जनसंस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा करे। सही मायने में वही पत्रकारिता एक श्रेष्ठ पत्रकारिता होगी जो वास्तव में मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त कर एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करने में अपनी महती भूमिका अदा करेगी।