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Sunday, August 06, 2017

दैनिक जागरण ने इस ‘हसीना’ को बना दिया आतंकी

बिजनौर : शादी में एक युवती को बंदूक़ के साथ तस्वीर खिंचवाना काफ़ी महंगा पड़ा. दैनिक जागरण ने इस वायरल फोटो के आधार पर एक ख़बर लिख दी और ख़बर का शीर्षक था —‘सिमी आतंकियों से जुड़ी ‘हसीना’ की तलाश’

ख़बर का शीर्षक किसी भी आम आदमी के होश उड़ा देने के लिए काफी है. जागरण ने अपनी ख़बर में बताया कि, ‘चार साल पहले बिजनौर के जाटान मुहल्ले में धमाका हुआ था. धमाके के बाद मची अफरा-तफरी का फायदा उठाते हुए धमाके में घायल छह लोग फरार हो गए थे. इनकी पहचान सिमी आतंकियों के रूप में हुई थी. इनमें से एक आतंकी को मुठभेड़ में तेलंगाना में मार गिराया गया था. दो को पकड़ा भी गया था. चार की गिरफ्तारी कर भोपाल जेल में रखा गया. 2015 में इन चारों ने जेल से भागने का प्रयास किया था. तब भोपाल पुलिस ने इन्हें एनकाउंटर में मार गिराया था. इन्हीं आतंकियों में से एक के साथ काजीपुरा की एक युवती की तस्वीर एजेंसियों को मिली है. तस्वीर में मौजूद सिमी आतंकी पिस्टल लिए है जबकि युवती अत्याधुनिक एके-47 लिए है.’
यही नहीं, ख़बर लिखने वाले रिपोर्टर ने अपने विचार लिखते हुए यह भी लिख दिया कि, ‘सूत्रों की मानें तो युवती स्लीपिंग माड्यूल है और आतंकियों के लिए फंड व वाहन की व्यवस्था करती है. सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो युवती के पकड़े जाने पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आतंकियों और स्लीपिंग माड्यूल्स की कमर टूट जाएगी. पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भ्रमणशील हैं. जल्द ही बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश होगा. डीआइजी ओंकार सिंह ने बताया कि एजेंसियां अपने मूवमेंट की जानकारी नहीं देती हैं. इस संबंध में मदद मांगने पर एजेंसियों की मदद की जाएगी.’

इस ख़बर के छपते ही युवती के घर व आस-पास के लोगों में हड़कंप मच गया. युवती के पैरों तले जैसे ज़मीन ही खिसक गई. लेकिन उसने संयम से काम लिया और खुद ही थाने पहुंचकर फोटो की सच्चाई को बताया और इस पूरे मामले में बिजनौर पुलिस अधीक्षक अतुल शर्मा से जांच करने की गुज़ारिश की. यहां बताते चलें कि युवती का नाम हसीना नहीं, बल्कि नसरीन है. स्योहारा के क़स्बा सहसपुर की रहने वाली है.
इस ‘हसीना’ की गुज़ारिश पर पुलिस कप्तान ने एक जांच टीम का गठन किया. इसी दिन स्योहारा थाना अध्यक्ष धर्मपाल सिंह इसकी जांच करते हैं. एक ही दिन में वो अपनी रिपोर्ट पुलिस कप्तान को देते हैं और पुलिस कप्तान इसे तमाम मीडिया संस्थानों को भेज देते हैं.
रिपोर्ट में जांच अधिकारी लिखते हैं, नसरीन स्योहारा में अक्लीमा की शादी में आई थी. यहां कश्मीर का एक युवक जो समाजसेवी शादुल्लाह का सुरक्षा गार्ड है, की लाइसेंसशुदा एसबीबीएल बंदूक के साथ कुछ लोग फोटो खिंचा रहे थे. नसरीन ने भी अपना फोटो खिंचवा लिया. ये कश्मीरी युवक एक वैध सेक्युरिटी एजेंसी के साथ काम करता है. अख़बार इसी बन्दुक को एके-47 लिखता है. अख़बार ने ग़लत लिखा है. दरअसल, इस महिला का एक युवक के साथ विवाद है, जिसने यह फोटो वायरल किया है. पुलिस की इस जांच से साफ़ होता है कि यह सिर्फ़ एक फ़ोटो का मामला है, जिसे अख़बार ने आतंकी हसीना कहकर प्रचारित किया.

पुलिस के इस प्रेस रिलीज़ के बाद दैनिक जागरण 01 अगस्त को अपने बिजनौर एडिशन में एक ख़बर लगाई. अब इस ख़बर का शीर्षक था —‘पुलिस ने खंगाली ‘हसीना’ व कश्मीरी युवक की कुंडली’
अब अख़बार अपने ख़बर में लिखता है, ‘वायरल हुए फोटो में युवती के साथ नज़र आ रहा कश्मीरी युवक सहसपुर में ही फिलहाल निजी गनर के तौर पर एक राजनेता के पास तैनात है. बताया जाता है कि इससे पूर्व वह फोटो में साथ नज़र आ रही युवती के एक रिश्तेदार के यहां गनर के तौर पर तैनात था. तभी युवती की प्रेमी युवक की बहन के शादी समारोह में उससे मुलाकात हुई और युवती ने गनर के पास मौजूद हथियार को साथ लेकर फोटो खींच लिए. अब इन्हीं फोटो को लेकर संशय बना है. आशंका जताई जा रही है फोटो में नजर आ रही पिस्टल व दूसरा हथियार प्रतिबंधित प्रतीत हो रहा है. हालांकि एसओ धर्मपाल सिंह का कहना है कि कश्मीरी युवक गार्ड है और उसके हाथ में लाइसेंसी बंदूक है. उसका लाइसेंस की जांच कर ली गई है.’
लेकिन यही दैनिक जागरण इसी ख़बर में एक बॉक्स के अंदर यह भी लिखता है कि, ‘कश्मीरी युवक की तलाश में जुटी पुलिस’ आगे ख़बर में बताया गया है कि युवती के साथ फोटो में नज़र आ रहा कश्मीरी युवक अभी फ़रार बताया गया है… 

दैनिक जागरण की कहानी यहीं ख़त्म हुई. बिजनौर एडिशन को छोड़कर बाक़ी सारे एडिशन में एक दूसरी ख़बर आई है और इस ख़बर का शीर्षक है —‘स्लीपिंग माड्यूल्स की फंडिंग करते हैं ‘हसीना’ के गुर्गे’
इस बार ख़बर में यह भी लिखा गया कि, ‘जिले का नाम कभी स्लीपिंग माड्यूल्स तो कभी फेक करेंसी के कारण सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है. रविवार को काजीपुरा निवासी हसीना का नाम सामने आया. इसके बाद पुलिस अधिकारी और सुरक्षा एजेंसियां मंडल में सक्रिय हो गई. हसीना के रिश्तेदारों की धरपकड़ की जाने लगी. स्योहारा पुलिस ने हसीना के रिश्तेदारों से घंटों पूछताछ की. न तो हसीना की जानकारी हो पाई और न ही उससे जुड़े लोगों की. सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो हसीना के गुर्गे स्लीपिंग माड्यूल्स और आतंक से जुड़े लोगों के लिए फंड की व्यवस्था करते हैं.’
इस ख़बर के लिखने वाले आगे यह भी लिखा कि, ‘एजेंसियों के सामने एक तस्वीर आई है, जिसकी पड़ताल की जा रही है. इसमें एक युवती अत्याधुनिक बंदूक लिए बैठी है जबकि उसके पास में युवक शस्त्र लिए बैठा है. पड़ोस में बैठा युवक फौजियों की वर्दी के रंग की जैकेट पहने है. लिहाजा उसे निजी सुरक्षाकर्मी नहीं बताया जा सकता. फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां हसीना की कुंडली खंगालने में जुटी हैं. मुरादाबाद में निर्यातकों की संख्या अधिक होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि हसीना के गुर्गो के संपर्क शहर के निर्यातकों से हैं. हसीना पहले नई उम्र के युवकों को प्रेम जाल में फंसाती है उसके बाद उसे स्लीपिंग माड्यूल्स के रैकेट में शामिल कर देश विरोधी गतिविधियां कराती है. सुरक्षा एजेंसियों को कुछ नाम मिले हैं. जिनके आधार पर टीम छापेमारी कर रही है.’
रिपोर्टर का दिल इतना भर लिखने से भी नहीं भरा. अब उसने इस ‘हसीना’ के तार जोड़ने शुरू किए. ज़रा आप देखिए कि कैसे रिपोर्टर इस ‘हसीना’ के तार कहां-कहां जोड़ता है. अख़बार का रिपोर्टर सुधीर मिश्र आगे लिखता है कि, सूत्रों की मानें तो हसीना के तार लखनऊ से भी जुड़े हैं. कुछ दिन पहले राजधानी में हुए एनकाउंटर के कुछ दिन पहले ही वह उन लोगों से मिली थी, जो आतंक का सामान तैयार कर रहे थे. दिल्ली, मेरठ तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई जिले हैं, जहां हसीना का नेटवर्क फैला हुआ है. कुछ महीने पहले ही उसने काजीपुरा का घर छोड़ा है. उसके नए ठिकाने की भी तलाश एजेंसियां कर रही हैं. कुछ नंबरों को सर्विलांस पर लेकर टीमें हसीना और उसके गुर्गो की तलाश में छापेमारी कर रही हैं.

इस पूरे मामले में TwoCircles.net ने बिजनौर पुलिस कप्तान एसपी अतुल शर्मा से बात की. उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि, युवती का कोई आतंकी केनेक्शन नहीं है. हथियार लाइसेंसी है और प्रतिबंधित भी नहीं है. युवती ने अपने हाथ में लेकर फोटो खिंचा लिया. जांच करा ली गई है. फोटो वायरल कराने में एक युवक की इस षंड्यंत्र में भूमिका सामने आई है.
वहीं बुरी तरह से तनावग्रस्त नसरीन 3 दिन से बेहद परेशान हैं. नसरीन कहती हैं कि, अख़बार ने उसकी और समाज की छवि खराब की है, जिसके लिए वो अख़बार के ख़िलाफ़ अदालत में जा रही हैं. बिना पुष्टि किया ऐसी ख़बर किसी की भी ज़िन्दगी बर्बाद कर देगी.
इस संबंध में दैनिक जागरण से बात करने पर बिजनौर ब्यूरो इस ख़बर को मुरादाबाद से छपना बताता है और मुरादाबाद ब्यूरो डेस्क पर टाल देता है. कोई भी इस पर बोलने को तैयार नहीं है. सब अपना पल्ला झाड़ते हुए नज़र आते हैं.
-आस मुहम्मद कैफ़

Tuesday, November 24, 2015

चिंगारी हमारी मूँछ तक आ गई है


Sunday, July 19, 2015

फांसी पर लटकाए जाने वाले मुसलमानों के पास राजनीतिक समर्थन की कमी है


इब्राहिम टाइगर मेमन के भाई याक़ूब मेमन को इस महीने के अंत में फांसी दिए जाने की ख़बरें आजकल भारतीय मीडिया में चल रही हैं.

याक़ूब मेमन को जिस जज पीके कोडे ने सज़ा सुनाई थी, उन्हें मैं पिछले दो दशकों से जानता हूँ. चरमपंथ के मामलों के लिए बनी उनकी कोर्ट की मैं रिपोर्टिंग किया करता था.
कोडे ने जब याक़ूब मेमन को साज़िश रचने के लिए सज़ाए मौत दी थी तो उनके फ़ैसले ने याक़ूब के वकील सतीश कांसे समेत कई लोगों को हैरान कर दिया था.
कुछ साल पहले कांसे ने रेडिफ़ डॉट कॉम की शीला भट्ट को बताया था, “याक़ूब ने कभी पाकिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण नहीं लिया. उन्होंने कोई बम या आरडीएक्स नहीं लगाया था, ना ही हथियार लाने में कोई हिस्सेदारी की थी. जिन लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी, वो इन ख़तरनाक़ गतिविधियों में से किसी न किसी तरह से शामिल थे. याक़ूब के ख़िलाफ़ इनमें से किसी भी मामले में आरोप नहीं थे.”
लेकिन, अब चाहे जो हो, वो फांसी देंगे और इस मामले में ऐसा पहली बार होगा.

याक़ूब पर मुकदमा चलाने वाले उज्ज्वल निकम ने कहा था, “मुझे याद है कि मुझे वो एक शांत और चुप व्यक्ति लगे थे. वो एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं इसलिए सबूतों के बारे में उन्होंने विस्तार से नोट लिए. वो शांत थे और दूसरों से दूर ही रहते थे. केवल अपने वकील से ही बाते करते थे. वो बुद्धिमान आदमी थे और वे पूरी सुनवाई बारीकी से देख रहे थे.”
उज्ज्वल निकम वही वकील हैं, जिन्होंने अज़मल कसाब के बिरयानी मांगने के बारे में चर्चित झूठ बोला था.
उस समय कोर्ट में मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया था.
मेमन चुप थे और कार्रवाई पर नज़र रखे हुए थे. मैंने सिर्फ एक बार उन्हें भावुक होते हुए देखा. यह बात साल 1995 के अंत या 1996 के शुरुआत की रही होगी.
उस समय मामले की सुनवाई कर रहे जज जेएन पटेल ने कई अभियुक्तों को ज़मानत दे दी थी.
एक उम्मीद थी, लेकिन यह मेमन बंधुओं के लिए नहीं थी. याक़ूब को चिल्लाते और बिना किसी को नुकसान पहुंचाए आक्रामक होते हुए मैंने पहली बार देखा था. उन्होंने कहा था, “टाइगर सही था. हमें वापस नहीं लौटना चाहिए था.”
मुझे ताज्जुब होगा अगर वो इन सालों में बदल गए हों. मीडिया की ख़बरों के अनुसार, वो आज नागपुर के जेल की एक एकांत कालकोठरी में फांसी का इंतज़ार कर रहे हैं.
ये अलग बात है कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, एकांत कोठरी में रखना ग़ैरक़ानूनी है.

उनके लिए कोर्ट से राहत की एक आखिरी कोशिश बाकी है.
मेरे दोस्त आर जगन्नाथन ने 'फ़र्स्टपोस्ट डॉट कॉम' में अपने एक लेख में दमदार तर्क दिया है कि क्यों सरकार को याक़ूब मेनन को फांसी नहीं देनी चाहिए.
वो तर्क देते हैं कि राजीव गांधी और पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामलों में जिन्हें फांसी दी जानी थी, उन्हें अभी तक फांसी पर नहीं लटकाया गया है.
तमिलनाडु विधानसभा की दया अपील के बाद राजीव की हत्या करने वाले संथन, मुरुगन और पेरारीवलन की फांसी की सज़ा कम कर दी गई थी. बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजाओना ने बड़े गर्व से अपना अपराध स्वीकार किया था और उन्होंने खुद को फांसी दिए जाने की मांग की थी.
लेकिन उन्हें अभी तक ज़िंदा रखा गया है. शायद इसका कारण पंजाब विधानसभा की कोशिशें हैं.

जगन्नाथन ने लिखा है, “एक चीज़ सबको साफ़ दिखती है. जहां एक सज़ायाफ़्ता हत्यारे या चरमपंथी के पास मज़बूत राजनीतिक समर्थन होता है वहां न तो सरकार और ना ही अदालत निष्पक्ष न्याय देने की हिम्मत जुटा पाती है.”
अब देखिए, जब हत्यारों की अलग किस्म का मामला आता है जैसे अज़मल कसाब, अफ़जल गुरु और अब याक़ूब मेमन, तो कैसे वही केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और अदालतें ‘क़ानून का सम्मान’ करने में दिलचस्पी लेने लगती हैं.
जगन्नाथन के मुताबिक़,“फांसी पर लटकाए जाने वाले मुसलमानों में और एक बात है. इन सबके पास राजनीतिक समर्थन की कमी है.’’
मैं सहमत हूँ और इस कारण मैं सोचता हूँ कि मेमन को फांसी दे दी जाएगी.
इस फांसी के साथ ही धमाके मामले में अदालती सुनवाई से मेरा जुड़ाव भी ख़त्म हो जाएगा.

एक रिपोर्टर के रूप में अपने पहले दिन, मैं अभियुक्तों से मिला था. उस दिन मैं मुंबई के आर्थर रोड ज़ेल देर शाम को पहुंचा था.
ज़ेल के बंद दरवाज़ों के सामने बुरक़ा पहने दर्जन भर महिलाएं ख़डी थीं. ये औरतें अपने पतियों, बेटों या भाइयों को घर का खाना देने के लिए आवेदन करना चाहती थीं.
इन महिलाओं को अंग्रेज़ी लिखना नहीं आता था और उनमें से एक ने मुझसे लिखने को कहा था. मैंने उन सबके लिए आवेदन लिखे थे.
जैसे ही मैंने लिखना ख़त्म किया, एक गॉर्ड जेल के गेट से बाहर आया और जेल के सबसे ऊपरी सिरे पर एक अंधेरी खिड़की की ओर इशारा करते हुए बोला कि जेलर मुझसे मिलना चाहते हैं.
मुझे जेलर हीरेमठ के पास पहुंचाया गया. उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं क्या कर रहा था.

मैंने उन्हें बताया तो वो नरम पड़े.
हीरेमठ ने मुझे ज़ेल दिखाने का प्रस्ताव किया और पूछा, “क्या आप संजय दत्त से मिलना चाहते हैं?”
मैंने हां कहा और इस तरह से मैं धमाके के अभियुक्त लोगों को जान पाया और उनसे नियमित रूप से कोर्ट और जेल में मिलने लगा.
दत्त की तरह कुछ लोग फिर से जेल में हैं.
जबकि शांत और मध्यवर्ग से आने वाले मोहम्मद जिंद्रान जैसे लोग मार दिए गए हैं.
और अब, फांसी दिए जाने के लिए याक़ूब की बारी है.

(आकार पटेल एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं.)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)