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Saturday, April 29, 2017

परित्यक्त महिलाओं की संख्या तलाक़ पीड़िताओं से कई गुणा अधिक, मोदी उनके लिए भी बोलें.....

Image result for जशोदाबेनपतियों द्वारा एक़तरफा तरीके से छोड़ी गई हर औरत की ज़िंदगी दयनीय है. ऐसी औरतें अपने ससुराल और मायके दोनों जगह मुश्किलों का सामना करती हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध राष्ट्रवादी मुस्लिम महिला संघ ने जून, 2016 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की. यह याचिका मुस्लिम पर्सनल लॉको संहिताबद्ध करने के लिए दायर की गई थी.

इसका मकसद खासतौर पर बहुविवाह, तीन तलाक़ और तत्काल तलाक़ जैसी प्रथाओं पर रोक लगाना था. अक्टूबर महीने में कोर्ट ने इन मुद्दों पर भारत सरकार से विचार और सिफारिशें मांगीं.

इस पर सरकार की तरफ से जवाब आया कि पिछले 65 वर्षों में मुस्लिम समुदाय में सुधार न होने की वजह से आज मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाज़ुक स्थिति मेंखड़ी हैं.

बिना वक़्त गंवाए 24 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तथाकथित तीन तलाक़ की प्रथाकी आलोचना की. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमारी माताओं और बहनों के साथ धर्म या संप्रदाय के नाम पर कोई अन्याय नहीं होना चाहिए.

पहली नज़र में लगता है कि भारत के मुसलमानों के लिए यह एक खुशी का क्षण है क्योंकि भाजपा और इसका सांस्कृतिक प्रतीक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी मुस्लिम औरतों की दशा सुधारना चाहते हैं.

ये निश्चित तौर पर इस बात का भी संकेत है कि एक दिन मुस्लिम पुरुषों की दशा में भी सुधार होगा.

क्या कहते हैं आंकड़े

लेकिन 2011 के भारत की जनगणना के आंकड़ों के सहारे किए गए थोड़े से शोध ने हमारी ख़ुशी छीन ली.

यह विश्लेषण निम्नलिखित सवाल उठाता है : क्या भारत में मुस्लिम औरतों की स्थिति सचमुच में उतनी ही ख़राब है जितनी मोदी सरकार, आरएसएस और इसकी संतानें दावा कर रहे हैं?

क्या मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाज़ुक स्थितिमें हैं- जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से दिए गए हलफनामे में बताया गया है?

और अपनी हिंदू, ईसाई और दूसरे धार्मिक संप्रदायों की औरतों की तुलना में उनकी स्थिति कैसी है?

चूंकि न तो सरकारी हलफनामे में, न ही प्रधानमंत्री के भाषण में इस दावे के पक्ष में कोई विश्वसनीय आंकड़ा पेश किया गया, इसलिए असली स्थिति जानने के लिए जनगणना के आंकड़ों पर नज़र डालना उपयोगी होगा.

हमने वास्तविक स्थिति जानने के लिए जनगणना के सी3 टेबल– ‘धार्मिक समुदायों और लिंग के हिसाब से वैवाहिक स्थिति-2011’ के आंकड़ों का विश्लेषण किया है.

हमारा मुख्य निष्कर्ष यह है कि भारत की मुस्लिम औरतों की स्थिति दूसरे धार्मिक समूहों की औरतों की तुलना में कहीं बेहतर नज़र आती है.

उदाहरण के तौर पर वैवाहिक संबंधों में रहने वाली औरतों का प्रतिशत सबसे ज़्यादा मुस्लिमों में 87.8 प्रतिशत है, जबकि हिंदुओं में यह 86.2 प्रतिशत, ईसाइयों में 83.7 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 85.8 प्रतिशत है.
विधवा औरतों का सबसे कम प्रतिशत मुसलमानों में 11.1 प्रतिशत है, जबकि हिंदुओं में यह 12.9, ईसाइयों में 14.6 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 13.3 प्रतिशत है.
इस बात की संभावना है विधवा पुनर्विवाह की संस्कृति मुस्लिम औरतों को दूसरे धार्मिक समुदायों की तुलना में ज़्यादा पारिवारिक सुरक्षा प्रदान करती है.
अलग की गईं और त्याग दी गईं (छोड़ी गईं) औरतों का सबसे कम प्रतिशत भी मुस्लिमों में (0.67 प्रतिशत) है, जबकि हिंदुओं में यह 0.69, ईसाइयों में 1.19 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 0.68 प्रतिशत है.
इसी जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मुस्लिमों और ईसाइयों में अपेक्षाकृत ज़्यादा औरतें तलाक़शुदा हैं- क्रमशः 0.49 प्रतिशत और 0.47 प्रतिशत.
अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में यह आंकड़ा 0.33 प्रतिशत और हिंदुओं में 0.22 प्रतिशत है. हिंदुओं में तलाक़ लेने की प्रथा का परंपरागत तौर पर अस्तित्व नहीं रहा है.
किसी भी उम्र में विवाह के बंधन में बंधने वाली कुल 34 करोड़ महिलाओं में 9.1 लाख तलाक़शुदा हैं और इनमें 2.1 लाख मुस्लिम हैं.
कुरान पाक़ में तलाक़ की प्रक्रिया स्पष्ट तौर पर लिखी गई है, जो कि तीन तलाक़ के खिलाफ है. विशेष परिस्थितियों में तीन तलाक़ अपवाद की तरह होते हैं न कि रिवाज़ की तरह. तलाक़ मनमर्जी का मामला नहीं है.

अलगाव और मेल-मिलाप की कोशिशों के नाकाम हो जाने के बाद पुरुष और स्त्री दोनों को एक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है जिसकी मियाद कम से कम तीन महीने (या तीन मासिक धर्म चक्र) की होती है.

इसके पीछे दो तर्क हैं : पहला तो यह कि अगर वाह औरत मां बन सकती है, तो यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह गर्भवती नहीं है. और अगर वह गर्भवती है, तो बच्चे की परवरिश का इंतज़ाम किया जा सके.

दूसरा कारण है कि दोनों पक्ष रहने के लिए जगह की तलाश कर सकें और वे सड़क पर न छोड़ दिये जाएं. इसके अलावा पारदर्शी मेल-मिलाप के लिए, पति और पत्नी, दोनों के परिवारों से एक-एक मध्यस्थ को भी नियुक्त किया जाना चाहिए.

और आखिर बात, दोनों पक्षों को अलगाव के दौर में अपना कदम वापस लेने और शादी को बरकरार रखने का अधिकार दिया गया है.

आगे बात करें, तो इस्लाम दो तरह के तलाक़ की बात करता है- एक खुला’, जिसकी पहल पत्नी कर सकती है और दूसरा तलाक़जिसकी पहल पति कर सकता है.

तीन तलाक़ पति द्वारा पहल किए गए तलाक़ का एक रूप है. अगर पति अपनी बीवी को तलाक़ देता है, तो उसे बीवी को मेहर चुकाना अनिवार्य है.

मेहर निकाह के वक्त तय की गई वह रकम है जिसे दूल्हा, दुल्हन को अदा करने का वादा करता है, या अदा करता है. हर निकाह के इक़रारनामे में मेहर की रकम का साफ ज़िक्र होता है.

अगर बीवी खुला चाहती है, तो उसे मेहर पर से अपना हक़ छोड़ना पड़ता है क्योंकि निकाह को निरस्त करने की पहल उसकी तरफ से की गई होती है.

इस लेख के लेखकों ने इस्लामी न्यायशास्त्र में विशेषज्ञता रखने वाले और हैदराबाद शहर में खुला या तलाक़ को अंजाम देने का अख्तियार रखनेवाले दारुल कज़ा’ (पारिवारिक न्यायालय) के चार क़ाज़ियों से बातचीत की.

गौरतलब है कि निकाह कराने की शक्ति शहरभर में मौजूद कई क़ाज़ियों के पास होती है, लेकिन खुला या तलाक़ के मामले का निपटारा सिर्फ ये चार क़ाज़ी ही कर सकते हैं.

एक क़ाज़ी से पता चला कि पिछले सात वर्षों में उसके सामने तीन तलाक़के सिर्फ दो मामले आए. एक दूसरे क़ाज़ी, जो पिछले 15 वर्षों से फैसले दे रहे हैं, ने तलाक़ के 160 मामले निपटाए थे, जिनमें 130 खुला के मामले थे, 21 सामान्य तलाक़ के मामले थे और सिर्फ 9 मामले तीन तलाक़ के थे.

छोड़ी गई- परित्यक्त औरतों का हाल

हालांकि यह साबित करने के लिए पक्के आंकड़े नहीं हैं, लेकिन ज़बानी साक्ष्य बताते हैं कि तीन तलाक़ के मामले विरले होते हैं.

और ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण मामलों में जहां तीन तलाक़ की घटना घटी है, यह देखा गया है कि समुदाय के लोग पीड़ित के पक्ष में मजबूती से खड़े रहे हैं और उसे फिर से बसाने की कोशिश की है.

इसके अलावा, यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार वाले मामले के फैसले में पहले ही तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी ठहरा चुका है.

यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि तलाक़शुदा मुस्लिम औरतें इंडियन पीनल कोड के अलावा मुस्लिम वुमंस एक्ट और प्रोटेक्शन ऑफ़ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट (घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम), 2005 के तहत न्याय पा रही हैं.

इस पृष्ठभूमि में देखें, तो तीन तलाक़ को मुस्लिम महिला समुदाय के सशक्तीकरण के लिए बड़ा मुद्दा बनाने की आरएसएस, भाजपा और यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी की उत्सुकता कई सवालों को जन्म देती है.

इसकी जगह उन्हें समाज के हर हिस्से से ताल्लुक़ रखनेवाली 4.3 करोड़ विधवा महिलाओं की चिंता करनी चाहिए. उन्हें पुनर्विवाह करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए और/या उन्हें अपना जीवन चलाने के लिए कार्यक्रमबद्ध वित्तीय मदद मुहैया कराने की ओर ध्यान लगाना चाहिए.

भारत में तलाक़शुदा औरतों की संख्या भी दस लाख के करीब है, जिन्हें सामाजिक और सरकारी मदद की जरूरत है. इतना ही नहीं, अलग की गई और छोड़ी गई महिलाओं का मुद्दा भी तीन तलाक़ के मुद्दे से कहीं ज़्यादा गंभीर है.

पिछली जनगणना के मुताबिक भारत में कुल 23 लाख अलग की गई-परित्यक्त औरतें हैं, जो कि तलाक़शुदा औरतों की संख्या के दोगुने से ज़्यादा है.

20 लाख ऐसी हिंदू महिलाएं हैं, जिन्हें अलग कर दिया गया है या छोड़ दिया गया है. मुस्लिमों के लिए यह संख्या 2.8 लाख, ईसाइयों के लिए 90 हजार, और दूसरे धर्मों के लिए 80 हजार है.

एक़तरफा तरीके से अलग कर दी गई हर औरत का जीवन दयनीय है, भले ही वो राजा भोज की पत्नी हो या गंगू तेली की. उन्हें अपने ससुराल और मायके दोनों जगहों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

ससुराल वाले उनके साथ इसलिए नहीं आते, क्योंकि उनके बेटे ने उसे छोड़ दिया है और मायके में उनकी अनदेखी इसलिए होती है क्योंकि परंपरागत तौर पर उन्हें पराया धन समझा जाता है, जिसकी ज़िम्मेदारी किसी और की है.

वे फिर से शादी या परिवार शुरू नहीं कर सकतीं क्योंकि उन्हें कानूनी तरीके से तलाक़ नहीं दिया गया है. इनमें से ज़्यादातर सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन गुज़ार रही हैं.

साथ ही उनका दूसरों द्वारा उनके शोषण का ख़तरा भी बना रहता है. वे अपने पति के साथ रहना चाहती हैं, बस उनके बुलाने भर का इंतज़ार कर रही हैं.

43 वर्षों से अपने पति के साथ नहीं रह रहीं जशोदा बेन मोदी ने 24 नवंबर, 2014 को कहा था कि अगर वे एक बार भी मुझे बुलाएं तो मैं उनके साथ चली जाऊंगी’. लेकिन उनके पति ने कभी जवाब नहीं दिया. छोड़ी गई महिलाओं को भारत में पासपोर्ट बनवाने में भी दिक्कतें पेश आती हैं.

उदाहरण के तौर पर 2015 में जशोदाबेन ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनका आवेदन इस आधार पर ख़ारिज कर दिया गया था कि उनके पास न तो शादी का कोई प्रमाण-पत्र था न ही पति के साथ कोई साझा हलफनामा ही था’. उन्होंने इसके लिए काफी संघर्ष किया. आखिरकार उन्हें अपने पति के पासपोर्ट के ब्यौरे के लिए एक आरटीआई लगानी पड़ी.

जो भी तीन तलाक़ का भुलावा देकर मुस्लिम महिलाओं की हालत सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें देश की 24 लाख छोड़ दी गई औरतों की तकलीफों की भी जानकारी होनी चाहिए.

मोदी ने कहा कि धर्म और समुदाय के नाम पर हमारी मांओं और बहनों के साथ किसी किस्म का अन्याय नहीं होना चाहिए’.

क्या मोदी इन छोड़ी गई औरतों के सवाल को नहीं उठाएंगे, इस तथ्य के बावजूद कि इनमें सबसे ज़्यादा संख्या, करीब 19 लाख, हिंदू महिलाओं की है और उनकी तकलीफों की बात करने से कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने वाला?

(अबुसालेह शरीफ वाशिंगटन डीसी के यूएस-इंडिया पॉलिसी इंस्टीट्यूट में अर्थशास्त्री हैं. सैयद खालिद सेंटर फॉर रिसर्च एंड डेटाबेस इन डेवेलपमेंट पॉलिसी (सीआरडीडीपी), नई दिल्ली, में रिसर्च एसोसिएट हैं.)

भारत में तीन तलाक़ 2002 से ही अवैध, फिर अब इसे कौन लाया?

Image result for तीन तलाककई महीने से सुप्रीम कोर्ट में चल रहे तीन तलाक़केस में अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया है, और यह मुद्दा कई तरह के ध्रुवीकरण की वजह बन गया है. दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर झूठे इलज़ाम के साथ ही अफवाहें फैलाने का सिलसिला जारी है, कि आज फैसला आ रहा है, कल फैसला आ रहा है, या फैसला आ गया है.

एक अजब का गैर ज़िम्मेदारी वाला माहौल समाज के लगभग सभी हिस्सों में बन चुका है. सबसे अहम बात यह है कि आम जनता को छोड़ भी दिया जाए लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर टीवी या दूसरे कार्यक्रमों में बोलने वाले विशेषज्ञों के पास ख़ुद जानकारी का अभाव है. वे अप्रासंगिक मुहावरों और वाक्यों का इस्तेमाल तेज़ आवाज़ में करते हुए एक दूसरे के ऊपर अपने विचार थोपने की कोशिश करते हुए अभी तक दिख रहे हैं. ये सब बहुत ही मायूस करने वाला है.

सबसे बड़ी अफवाह है कि कोई मुस्लिम महिला या मुस्लिम महिला संगठन तीन तलाक़ के केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पास गए जोकि पूरी तरह बेबुनियाद है.

सुप्रीम कोर्ट में दो हिन्दू बहनें अपने माँ-बाप की संपत्ति में हिस्सा मांगने के लिए आईं, उन्हें संपत्ति में अधिकार देने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया, और कानून के जानकारों के अनुसार यह फैसला ऐतिहासिक रूप से महिला अधिकारों को लेकर एक प्रतिगामी फैसला था.

इस फैसले को देते हुए सुप्रीम कोर्ट की इसी पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं पर बहुत अत्याचार हो रहा है, इसलिए तीन तलाक़ के बारे में वे सू-मोटो लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका स्थापित करते हैं.

इस केस में सबसे पहले जमियत उलेमा-ए-हिन्द ने एक बहुत ही कमज़ोर एफिडेविट के साथ अपने आपको पक्ष बनाया. बाद में पक्ष बनते हुए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी जमियत के कमज़ोर एफिडेविट की हुबहू नक़ल दाखिल की.

इस केस में मुस्लिम महिला संगठनों के पक्ष बनने से पहले लखनऊ की रहने वाली एक मुस्लिम महिला फराह फैज़ इस केस में पक्ष बनीं, और उन्होंने अपने एफिडेविट में लिखा कि वह श्री मोहन भागवत (आरएसएस) के साथ काम करती हैं, और मांग रखी कि महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लॉ को खत्म किया जाए और यूनिफार्म सिविल कोड लागू किया जाए. मालूम हो कि फराह फैज़ इस केस में यूनिफार्म सिविल कोड की मांग करने वाली अकेली वादी हैं. और उनकी इस मांग के कई महीने बाद केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अलग राष्ट्रीय विधि आयोग को यूनिफार्म सिविल कोड के बाबत ज़िम्मेदारी दी.

इस दौरान एक महत्वपूर्ण घटना यह हुई कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखण्ड की एक पीड़ित मुस्लिम महिला शायरा बानो के केस को तीन तलाक़ के केस में जोड़ दिया.

इस बीच भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन और दूसरे संगठन भी इस केस में एक पक्ष के तौर पर आये. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन के वकील श्री आनंद ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में ही अपना फैसला सुना दिया है, अब इस केस की कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए इस केस में आगे कोई बहस नहीं होनी चाहिए, पर सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी.

भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली ज़किया सोमन और नूरजहाँ सफिया नाज़ पर आरएसएस से जुड़े होने की बेबुनियाद अफवाहें फैलाई गईं, उनकी आस्था और उनकी निजी ज़िन्दगी को बुनियाद बनाते हुए. ज़किया सोमन के बेटे अरस्तू ज़किया को भी नहीं बख्शा गया. जो लोग इन अफवाहों के पीछे हैं, वे ही असल में आरएसएस का काम करते हुए दिख रहे हैं. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन द्वारा की गई रिसर्च पर भले ही हमारे ऐतराज़ हो जिसे वरिष्ठ विधि जानकार प्रोफेसर फैजान मुस्तफ़ा ने अपने लेखों में उजागर किया है. पर ज़किया सोमन और उनके साथियों ने आरएसएस के खिलाफ गुजरात में 2002 नरसंहार के बाद से लगातार मुसलमानों के हक के लिए जो काम किया है उसे फरामोश नहीं किया जा सकता. उनकी पोटा एक्टको हटाने के लिए गुजरात में हुए संघर्षों में अहम भूमिका रही है, यह वही कानून है जिसका गलत इस्तेमाल कर मासूम मुस्लिम नौजवानों की ज़िन्दगी तबाह कर दी गई.

धार्मिक विचारों और निजी ज़िन्दगी से किसी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए, उसकी बुनियाद पर झूठे इलज़ाम लगाना निंदनीय है. आज मुसलमानों के हक और इंसाफ के लिए आवाज़ उठाने वाले बहुत से लोग मुसलमान नहीं हैं, और बहुत से मुसलमान चेहरे जिनसे उम्मीद की जाती है वे अक्सर खामोश रहते हैं. आरएसएस की परिभाषा वाले मुसलमान भी आजकल अपने चेहरे को सियासत में जमाने की खातिर नारे लगाते हुए दिखते हैं, पर उनके इरादे नेक नहीं हैं. इस पर मुसलमानों को गौर करने की ज़रूरत है.

इस केस में इसके उलट कई चीजें इस बात का इशारा कर रहीं हैं कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को गुमराह करते हुए उसी के कुछ मौलवी हज़रात आरएसएस के इशारे पर काम कर रहें हैं. इसका सबसे बड़ा सबूत है अभी कुछ हफ्तों पहले सुप्रीम कोर्ट में इस्लाम और शरियत के नाम पर जमा किया गया एफिडेविट, जिसके समर्थन के लिए इन्हीं कुछ लोगों ने हस्ताक्षर अभियान और साथ ही गाँव, कस्बों, शहरों में जुलुस निकलवाने का काम किया.

इस 68 पन्नों के एफिडेविट में जो बातें कही गई हैं, अगर निष्पक्ष रूप से किसी इस्लामी विद्वान से पूछी जायें, तो वह बतायेंगे कि ये इस्लाम और शरियत के खिलाफ हैं. इसके बारे में जब आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सर्वोच्च नेतृत्व को बताया गया, तब उन्होंने जलसे-जुलुस और हस्ताक्षर अभियान पर रोकथाम की.

आज सुप्रीम कोर्ट में इन विभिन्न धाराओं वाले संगठनों के तर्कों पर गौर करने की ज़रूरत है.

साथ ही यह कहते हुए कि फ़ासीवाद के इस दौर में जब अधिकतर सरकारी प्रतिष्ठानों से शोषित और वंचितों का विश्वास उठता जा रहा है, न्यायपालिका से बहुत-सी शिकायतें होने के बावजूद अभी तक उससे बहुत उम्मीदें बाकी हैं, उसे धूमिल नहीं किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट से पूछना होगा कि जब उन्होंने कई फैसलों में, ख़ासकर शमीम आरा के 2002 केस में जब यह फैसला दे दिया कि न्यायपालिका तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) को अमान्य मानती है और कुरआन में दिए हुए तलाक़ की प्रक्रिया जिसे तलाक़े अहसनकहा जाता है, उसे ही मानेगी. इस फैसले को किसी भी धार्मिक संगठन, या व्यक्ति विशेष ने चुनौती नहीं दी, कोई विरोध नहीं हुआ, और ये कानून बन गया. तब नए सिरे से किसी भी जज द्वारा जनहित याचिका स्थापित करने का क्या औचत्य था?

क़ानूनी तौर पर अभी की मौजूदा बेंच 2002 के शमीम आरा फैसले को पलट कर तीन तलाक़ को सही करार दे ही नहीं सकती तो फिर ये तमाम हंगामा क्यों? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज 2002 के ऐतिहासिक शमीम आरा फैसले के बारे में नहीं जानते हैं?

तीन तलाक़ जब पहले से ही अमान्य है, जिसे तलाक़े बिद्दत कहते हैं और जिसका कुरआन से कोई ताल्लुक नहीं है, जिसे इस्लाम ने भी एक अपराध माना है, तब उस पर इतनी उलझन पैदा करने की ज़रूरत क्यों हुई.

मई 2014 से हिंदोस्तान का मुसलमान एक नए दौर से गुज़र रहा है, और खास तौर पर याकूब मेमन की फाँसी के बाद मुसलमानों का एक नया लोकतान्त्रिक राजनीतिकरण हुआ है, जो मुसलमानों के लिए और देश के लिए बहुत अच्छा संकेत है. आज इस लोकतान्त्रिक राजनीतिकरण को कई तरह से थामने की कोशिशें जारी हैं. आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ लोगों को अपने साथ मिलाकर, आरएसएस ने जिस तरह से हिंदोस्तान के मुसलमानों को, खुद आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को गुमराह करने की कोशिश की है वे अपने आप में इस बात को उजागर कर रही है.

तीन तलाक़ के ऊपर मज़हब का चोगा पहनाकर आम लोगों को बहकाने की बजाये, आज जब हिंदोस्तान में एक तरफ़ा संगठित हिंसा की वजह से मुसलमान औरत, मर्द, बुज़ुर्ग, जवान, बच्चे, बच्चियां, एक खौफ के साये में जी रहे हैं. जिसे पूरा देश इस बात को जानता है. देश का एक बड़ा तबका इसका समर्थन भी करता है और इसे न्यायसंगत मानता है. सुप्रीम कोर्ट से पूछने की ज़रूरत थी कि इस मुस्लिम विरोधी संगठित हिंसा को रोकने के लिए आपने कुछ कदम क्यों नहीं उठाये.

आज के दौर में अमानवीयकरण कितने और चरम पर पहुंचेगा, इसका अंदाज़ा करना अब मुश्किल है. एक कतार है नज़ीरों की. देश की संसद में विराजमान एक माननीय ने जनसभाओं में कहा कि मृत मुस्लिम महिलाओं की कब्र खोदकर उनके शवों के साथ बलात्कार करो. उत्तरप्रदेश में दो जगह इस अपील पर अमल करते हुए एक विचारधारा विशेष के व्यक्तियों ने कब्र खोदी और मृत मुस्लिम महिला के शव के साथ बलात्कार का प्रयास किया, और बाद में इन्हें मानसिक रोगी कह दिया गया, जैसे कि पूरी दुनिया में इस प्रकार के संगठित अपराध करने वाले लोगों के बारे में प्रशासन कहता है. पर संसद, सरकारें और न्यायपालिका खामोश रहीं.

अगर हिंदोस्तानी समाज ये सोच रहा है कि अमानवीयकरण देश में रहने वाले मुसलमानों के खात्में के बाद रुक जाएगा, तो यह एक भयानक भूल है. यह अमानवीयकरण ऐसा दैत्य है कि वह किसी को भी नहीं छोड़ेगा.

आज देश के प्रगतिशील समाज को गहराई से संवेदनशील होकर कुछ चीजों पर गौर करने की ज़रूरत है. महिला विरोधी फ़ासिस्ट दृष्टिकोण और महिला विरोधी रूढ़िवादी दृष्टिकोण में फर्क होता है. दोनों भले ही गलत हैं पर उन्हें एक पैमाने पर रखना न्यायसंगत नहीं.

अधिनायकवादी फ़ासिस्ट दृष्टिकोण देश के बहुसंख्यकवाद पर टिका होता है. अल्पसंख्यक शोषित समाज जब अपने ऊपर एक तरफ़ा हमला महसूस करता है, तब अपनी सोच को सीमित कर, अपने ऊपर रूढ़िवाद की जकड़न को ओढ़ लेता है. और इसे अपनी आन का सवाल बना लेता है. आज इस शोषित समाज से उसकी रूढ़िवादी जकड़न के कारण विरोध और सीधा मुकाबला करने की जगह, उसकी मदद करने की ज़रूरत है ताकि वे रूढ़िवादी जकड़न से मुक्त हों.
 उवेस सुल्तान खान एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

Thursday, February 18, 2016

देश में चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है, ऐसा पक्षपात क्यों, और कैसे ??

 महात्मा गांधी ने अक्तूबर, 1931 में डा. बीआर अंबेडकर के बारे में कहा था, “उनके पास नाराज़ होने, कटु होने की तमाम वजहें हैं. वे हमारा सिर नहीं फोड़ रहे हैं तो ये उनका आत्म संयम है.”

इस बयान से ज़ाहिर है कि अंबेडकर और उनके समुदाय के साथ हुए अत्याचारों की पृष्ठभूमि में उनके द्वारा कटु शब्दों के इस्तेमाल को महात्मा गांधी ग़लत नहीं मानते थे.
बहरहाल, मैं अभी सतारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ एक दूसरे विश्वविद्यालय में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बारे में सोच रहा हूं.
दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफ़ज़ल गुरू की बरसी के मौक़े पर हुई विरोध सभा के मुद्दे पर कुछ छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज कराया गया है.
देशद्रोह “वह अपराध है जिसके तहत कुछ कहने, लिखने और कुछ अन्य काम करने से सरकार की अवज्ञा करने को प्रोत्साहन मिलता है.’’

पूर्वी दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के सांसद महेश गिरी ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराई है. उन्होंने अपनी लिखित शिकायत में इन छात्रों को संविधान विरोधी और देशद्रोही तत्व कहा है.

गिरी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भी ख़त लिखकर, “इस तरह के शर्मनाक और भारत विरोधी गतिविधियों के दोबारा नहीं होने देने के लिए अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की अपील की थी.”

यह हैदराबाद में हुई घटना को दुहराने जैसा लग रहा है, जहां बीजेपी ने याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर सख़्त कार्रवाई की थी. इस मामले का दुखद पहलू ये रहा है कि एक छात्र ने आत्महत्या कर ली.

हालांकि जेएनयू ने कहा कि उसने इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और उसने मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है.

लेकिन इस कमेटी में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. छात्र संघों का कहना है कि जांच कमेटी में उपेक्षित और हाशिए पर रहे समुदायों का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया है.

मेरे ख़्याल से भारतीय जनता पार्टी के सामने इस मामले में विकल्प था, छात्रों पर आरोप लगाने के बदले, उसे इस मुद्दे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, जो सीधे जाति से जुड़ा पहलू है.

हैदराबाद में याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ दलित क्यों विरोध प्रदर्शन कर रहे थे? जेएनयू में मुस्लिमों पर इतना ध्यान क्यों है?

जब भी किसी कमेटी से जांच कराने की बात होती है तो छात्र हाशिए पर रहे समुदायों के प्रतिनिधियों की बात क्यों करते हैं? हक़ीक़त यही है कि भारत में दलितों और मुस्लिमों को ही सबसे ज़्यादा फांसी की सज़ा दी गई है.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़, मृत्युदंड पाने वालों में कुल 75 फ़ीसदी और चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है. ऐसे में पक्षपात का मुद्दा उभरता है.

मालेगांव धमाकों का उदाहरण देते हुए कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि अगर चरमपंथी गतिविधियों में सवर्ण हिंदुओं के शामिल होने का मामला हो तो सरकार सख़्ती नहीं दिखाती है.

बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी देने की जल्दी नहीं है. राजीव गांधी के हत्यारों की सज़ा कम कर उसे उम्रक़ैद में तब्दील कर दिया गया है.

इन लोगों को भी चरमपंथ का दोषी पाया गया था. लेकिन सबको समान क़ानून से कहां आंका जा रहा है?

इन सबमें मायाबेन कोडनानी को छोड़ ही दें, जिन्हें 95 गुजरातियों की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था, लेकिन वे जेल में भी नहीं हैं.

दूसरा मुद्दा आर्थिक है.
दलित और मुस्लिम ग़रीब लोग हैं. अदालत में सुनवाई के दौरान अफ़ज़ल गुरु को लगभग नहीं के बराबर क़ानूनी प्रतिनिधित्व मिल पाया था.

इन वास्तविकताओं को देखते हुए, इसमें बहुत अचरज नहीं होना चाहिए कि दलित, मुस्लिम और उनके समर्थक सरकार का विरोध कर रहे हैं. उन्हें नाराज़ होने का पूरा हक़ है.
सवर्ण इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि हर भारतीय को इस भ्रम में जीना चाहिए कि हम एक पूर्ण समाज हैं और हर किसी को इसके सामने झुकना चाहिए.

हिंदुत्व मध्यम वर्ग और उच्च वर्गों के लिए मसला है. यह आरक्षण से घृणा करता है क्योंकि उसे लगता है कि यह उनको मिल रही सुविधाओं में अतिक्रमण है.

यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण को पसंद नहीं करता और इस मुद्दे पर संघ के बयानों के चलते चुनावों में बीजेपी मुश्किल में आई थी.

प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया भी विपक्ष पर झूठ गढ़ने का आरोप रहा है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई बिलकुल साफ़ है.

दलित अपनी आवाज़ उठा रहे हैं और अपने हक़ के लिए खड़े हो रहे हैं. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. अगर उनकी भाषा में असंयम हो तो भी उन्हें अपराधी की तरह से नहीं देखा जा सकता.

सरकार के लिए अहम ये है कि उनसे जुड़े, उनकी बात सुने, उनके तर्क सुने, केवल उनके नारों पर नहीं जाए.

लेख की शुरुआत में मैंने गांधी जी की बुद्धिमता का उदाहरण दिया है. उसकी तुलना हिंदुत्व के नेताओं की पहले हैदाराबाद और फिर दिल्ली में की गई कार्रवाई से करके देखिए.

हमें इस मामले पर परिपक्व समझ दिखाना चाहिए, जब तक सरकार इस दिशा में कोशिश करती भी नहीं दिखेगी तब तक हमें इस बात पर अचरज नहीं होना चाहिए कि अब तक दबे और पीड़ित रहे लोग सरकार की अवज्ञा के लिए प्रोत्साहित करने वाले काम करते रहेंगे.