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Sunday, January 17, 2016

राम मंदिर मुद्दा पैसा कमाने की मशीन है


“मैं अयोध्या के बाराबंकी कस्बे का रहने वाला हूं। मैंने अपने इलाके और उसके आसपास कभी राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर नफरत का माहौल नहीं देखा। इस माहौल की शुरूआत दिल्ली से हुई। सन 1947 में हमारी जमीन बंटी और 1992 में हमारे दिल बंट गए। जिस दिन हमारे दिल बंटे, वह दिन हमारे लिए सबसे बदनसीब दिन था। चुनाव जीतने के चक्कर में हमारी नस्लें बरबाद हो गईं। हैरान हूं कि यह लोग अभी भी चैन से नहीं बैठ रहे हैं। आखिर यह इस मुद्दे को कहां ले जाकर छोड़ना चाहते हैं?”
इसमें न्यायालय की भूमिका अहम है। मुझे भारत की न्याय व्यवस्था पर नाज है, फख्र है। मुझे लगता है कि बजाय इसके कि कोई बोले कि हम मंदिर बनाएंगे, इस मुद्दे को न्यायालय के फैसले पर छोड़ देना चाहिए। आखिर लड़ाई किस बात की है? असल लड़ाई जमीन की है कि जमीन किसकी है। अदालत में इसी का झगड़ा है। यहां सवाल आस्था का नहीं है। मैं तहेदिल से कह रहा हूं कि मुसलमानों को कोई गलतफहमी नहीं है कि राम अयोध्या में पैदा नहीं हुए थे। हम भी राम को मानते हैं लेकिन मशहूर इतिहासकार बिश्बरनाथ पांडे ने अपनी किताब में कहा है कि भारत में राम का 400 साल पुराना कोई मंदिर नहीं है। जब देश में भगवान राम का 400 साल मंदिर नहीं है तो राम भक्तों को रामजन्म स्थान का पता कैसे लगा लिया? आखिर यह कैसे साबित हुआ कि यह ही रामजन्म भूमि है। अगर ये लोग राम को सच में प्यार करते हैं तो मासूमों के खून से सींचे हाथों से मंदिर की ईंटे न ढोएं। अगर सच में राम हैं तो उनपर क्या गुजरेगी?  आखिरकार राम के नाम पर क्या कर रहे हैं ये लोग।

हिंदू समाज को राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों से सवाल करना चाहिए कि राम मंदिर के नाम पर जो खरबों रुपये का चंदा इक्ट्ठा हुआ था उसका क्या हुआ?  मेरे खयाल से हिंदू समाज बहुत भोला है, नेक है। आडवाणी की रथ यात्रा के वक्त हिंदू औरतों ने राम मंदिर बनवाने के लिए अपने गहनें तक उतार कर दे दिए थे। जनता को राम मंदिर आंदोलन चलाने वालों से सवाल करना चाहिए। मेरे ख्याल से तो इस आंदोलन को दोबारा इसलिए शुरू किया गया है क्योंकि पहले का चंदा सब खा-पी गए होंगे अब दोबारा पैसे की जरूरत होगी। राम मंदिर मुद्दा पैसा कमाने की मशीन है। मेरी गुजारिश है सबसे पहले हिंदू भाई 15-20 सालों के उन खरबों रुपये का हिसाब लें, जो राम मंदिर के नाम पर इक्ट्ठा किए गए हैं। अरे भई, अदालत के फैसले का इंतजार करें। हिंदू नेताओं को चाहिए कि उग्र लोगों को समझाएं कि इस मसले पर लड़ाई न करें। अन्यथा देश खतरे में पड़ जाएगा। 

मुस्लिम समुदाय से मेरा कहना है कि किसी के भी कहने पर उकसावे में न आएं। यह देश धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं का देश है। हमेशा रहेगा। कट्टरपंथियों और सांप्रदायिक लोगों का देश नहीं है। यहां की मासूम जनता नहीं जानती कि ऐसे लोग जनता के बहुत छोटे से प्रतिशत को वरगला लेते हैं। इसलिए कम से कम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक सतर्क रहें। मौजूदा सरकार हर कदम पर असफल रही है। राम मंदिर मुद्दा उसका आखिरी हथियार होगा। इसलिए किसी के भी बहकावे में नहीं आएं।

Friday, December 25, 2015

फिर याद आ रहा है राम मंदिर

Wednesday, December 04, 2013

बाबरी मस्जिद कि शहादत और अयोध्या में भगवान राम का आगमन


राम आये नगर में तो हलचल दिखी/
जिस शकल को पढ़ा उसपे ख़ुशियाँ लिखी/
जैसे लगता था आबो हवा है बिकी/
जिससे भगवान कि साँसे ख़ुद है रुकी/
शोर नारे हवाओं में सुनते रहे/
हर घड़ी कुछ सवालों को बुनते रहे/

क्या हुआ है मेरे घर में मजमा है क्यूँ/
नज़रें जैसे पड़ी भीड़ पर उनकी ज्यूँ/
देखा कुछ नौजवानों का शोरो फ़ुग़ाँ/
थोड़ा आगे बढ़े जल रही थी दुकाँ/
मुफ़लिसों और बेचारों के जलते मकाँ/
उनकी प्यारी अयोध्या में हर सू धुआँ/

तेज़ क़दमों से जब वो महल को चले/
रास्ते में लगे जैसे वहशत पले/
हर सिमत में वहाँ पे थे मजमें लगे/
उनके अपने महल में थे झंडे सजे/
सबकी शक्लों पे ख़ुशियों कि वहशत रजे/
जैसे हर एक डगर पर थे बाजे बजे/

सोचकर जैसे क़दमों से आगे बढ़े/
कुछ अवाज़ें थी कानों में कैसे लड़े/
फिर दुबारा महल कि थे सीधी चढ़े/
जिससे मजमें कि शक्लों को फिर से पढ़ें/
दूर नज़रों ने देखा कहीं पर धुआँ/
जल्दी जल्दी क़दम से वो पहुंचे वहाँ/

एक मजमा था उनकी सदा दे रहा/
और कहता गिरा दो ये ढाँचा यहाँ/
नामे बाबर मिटा दो सदा के लिए/
कह दो तैय्यार हैं वो सज़ा के लिए/
माँ के माथे का कालिख गिराएंगे हम/
राम के नाम को फिर सजायेंगे हम/

नामे भगवन का डंका बजायेंगे हम/
ए अयोध्या तेरे गीत गायेंगे हम/
इतना कहके वो मस्जिद गिराने लगे/
उनके क़ायद भी जल्दी से आने लगे/
नाम भगवन के सब गीत गाने लगे/
उसकी मिट्टी तिलक से सजाने लगे/

ज़ोर से शोर उट्ठा फ़लक गिर गया/
शर्म से सारे इन्सां का झुक सिर गया/
राम कहते रहे किसने क्या कर दिया/
मेरी आँखों को आंसू से क्यूँ भर दिया/
कौन है ये वहाँ पर जो सब कर रहे/
जिससे हर सिम्त इन्सां फ़क़त डर रहे/

पाक मेरी ज़मीं पर लहू बह गया/
क्यूँ सियासत में इन्सां ज़हर सह गया/
सदियों पहले ज़माने से मैं कह गया/
देखना था जो कलयुग में ये रह गया/
देखते देखते सारी धरती जली/
और सियासत कि गोदी में साज़िश पली/

मुल्क जलता रहा लोग बढ़ते रहे/
सीढ़ियां सब सियासत कि चढ़ते रहे/
ख़ौफ़ सारी नज़र में वो गढ़ते रहे/
सारे इंसान आपस में लड़ते रहे/
सदियों सदियों का रिश्ता कहाँ खो गया/
बोले लक्ष्मण से भाई ये क्या हो गया/

कौन रंजिश दिलों में यहाँ बो गया/
सारे दिल से मुहब्बत को ख़ुद धो गया/
पलमें ख़ुशियों का अम्बर कहाँ सो गया/
कुछ न बोले लबों से था दिल रो गया/
कौन थे मुझसे ही साज़िशें कर गए/
मेरी अपनी अयोध्या में लड़ मर गए/....
-सलमान रिज़वी

Tuesday, March 27, 2012

तकदीर लिखिए, तदबीर नहीं


कभी समुद्र में गहरे उतरे हैं आप? मौका मिले तो ऐसा जरूर कर देखिएगा। अथाह लगने वाली गहराई में आप ज्यों-ज्यों धंसते जाते हैं, हर पल एक नई दुनिया सामने आती जाती है। जहां सूरज की किरणें तक नहीं पहुंचतीं, वहां एक समूची दुनिया सांस ले रही होती है। जल का अपना जीवन होता है। इतिहास का भी। जाने बूझे सत्य, तथ्य और कथ्य को जितना हिलाइए-डुलाइए उतने अर्थ नजर आते हैं। क्यों न हम भी ऐसा कुछ करें? आजादी की वर्षगांठ के इस महीने के पहले हफ्ते देश की मौजूदा चुनौतियों को गुजरे जमाने की घटनाओं से जोड़कर देखेंगे। आखिर हमारा आज गुजरे कल पर टिका है, जैसे आने वाला कल वर्तमान पर।
क्या हो रहा था अगस्त 1947 के पहले हफ्ते में। साफ हो चुका था, हजारों साल से चला आ रहा यह राष्ट्र अब दो मुल्कों में बंटने जा रहा है। बंटवारा मजहब के नाम पर हुआ था, लिहाजा सदियों से साथ रहते आए लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। हर ओर लहूलुहान आशंकाएं बिखरी पड़ी थीं। क्या विडंबना थी! पीढ़ियों से संग जिंदगी गुजार रहे लोग अपनी ही जमीन से धकिया दिए गए थे। उनका खून-पसीना पोंछने के लिए जो हाथ उठ रहे थे, वे अपरिचित थे। पंजाब, सिंध और बंगाल का हाल सबसे बुरा था। इसके लिए जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना इसी हफ्ते के अंतिम दिन अपने सपनों के पाकिस्तान के लिए रवाना होने वाले थे, हालांकि जो सरजमीं उनका खैरमकदम करने वाली थी, वह तब तक हिन्दुस्तान का ही हिस्सा थी।
देश को दो हिस्सों में बांटने का संकल्प लेकर आए लॉर्ड माउंटबेटन के सामने बहुत बड़ी चुनौती थी। वह कानून और व्यवस्था का पालन करवाने में नाकाम साबित हो रहे थे। उधर जिन्ना की गरदन के बल कायम थे। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी एक बार फिर हिम्मत संजो रहे थे, पर सवाल उभर रहा था कि क्या वह भारतीय समाज और राजनीति के लिए कुछ नया कर सकेंगे?
जवाहरलाल नेहरू के स्वप्नजीवी भाषण लोगों के दिल-दिमाग पर छाए हुए थे। नेहरू आम आदमी में उम्मीद का संचार करने में भले ही कामयाब लग रहे थे, पर भारत नाम का यह देश कैसा होगा, इस पर कई सवालिया निशान थे। हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर के शासकों ने अभी तक विलय प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं किए थे। इनके बिना भारतीय गणराज्य की कल्पना अधूरी थी।
उधर उत्तर-पूर्व में कुछ लोग अलगाव की दुकान चला रहे थे। मसलन, मणिपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री इरबोट सिंह खुद को संप्रभु राष्ट्र का सर्वेसर्वा साबित करने पर आमादा थे। वहां के राजा की हालत पतली थी। किसी को यकीन नहीं था कि घने जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम घाटियों से बने ‘सतबहनी’ के राज्य कभी लोकतंत्र की किलकारियों से खुद को आनंदित महसूस करेंगे। हमारी धरती पर उभर रही चारदीवारियों के दोनों तरफ कुछ ऐसे लोग थे, जो हिंदू और मुस्लिम राष्ट्र के सपने बुन रहे थे। अगस्त के उस पहले हफ्ते तक लाखों लोग यह जान चुके थे कि सिर्फ एक हफ्ते बाद उनमें से कुछ की पहचान बदल जाएगी। वे हिन्दुस्तानी से पाकिस्तानी बन जाएंगे।
पर बहुत कुछ अनजाना और अनकहा था। मसलन, सिर्फ छह महीने बाद अनहोनी घटने जा रही थी। एक ऐसे आदमी की हत्या, जो यकीनन उस समय दुनिया का सबसे लोकप्रिय शख्स था। जी हां, किसी ने सोचा भी न था कि खुद को हिंदुओं का प्रतिनिधि बताने वाला कोई युवक गांधी जी की हत्या कर देगा। खुद गांधी आश्वस्त थे कि ऐसा नहीं होगा। सिर्फ दस दिन पहले 20 जनवरी, 1948 को भी उन पर हत्यारों की इसी टोली ने हमला बोला था, पर वह सुरक्षा बढ़ाने पर राजी नहीं हुए। नेहरू के शब्दों में अपनी नियति खुद लिखने वाले राष्ट्र में एक प्रवृत्ति उभर रही थी, वक्ती लोकप्रियता अजिर्त करने की। अर्धसत्य को संपूर्ण सच साबित करने की। आने वाले वक्त में यह पुख्ता होती गई।
तीन उदाहरण देना चाहूंगा। अगस्त 1977 में हम अति आशावाद के शिकार थे। मार्च में जनता पार्टी शासन में आ चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि हिन्दुस्तानी जम्हूरियत जवान हो गई है। वंशवाद का नामोनिशान मिट गया है। कुछ ही सालों में हम सबसे बड़े ही नहीं, बल्कि आदर्शतम लोकतंत्र के तौर पर जाने और माने जानेवाले हैं। यह सपना दो साल भी नहीं चला। ठीक इसी तरह स्वघोषित ‘सत्य’ और ‘ईमानदारी’ की राह पर चलते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह और उनके अलंबरदार अगस्त के पहले हफ्ते में दहाड़ रहे थे। परिणाम? ढाक के तीन पात।  1992 के अगस्त का पहला हफ्ता। पूरा देश हिंदू लहर में डूब-उतरा रहा था। और तो और नाथूराम गोड्से के भाई गोपाल गोड्से शहर-दर-शहर घूमकर प्रचार कर रहे थे कि उन्होंने अपने भाई के साथ गांधी जी पर गोली क्यों चलाई? वह इसे ‘हत्या’ नहीं, ‘वध’ मानते थे। उनकी पुस्तक ‘गांधी वध और मैं’ की बिक्री जोरों पर थी। नतीजतन, अयोध्या का राम मंदिर उन लोगों की महत्वाकांक्षा का हिस्सा बन गया था, जिनके पुरखों ने भी कभी अयोध्या में कदम नहीं रखे थे। सब जानते हैं। न मंदिर बना, न हिंदू राष्ट्र अलबत्ता सदा सर्वदा के लिए भारतीय राजनयिकों से सफाई मांगने का बहाना हमसे द्वेष रखने वाले देशों को मिल गया।
इसीलिए आज जब कुछ लोग खुद को 121 करोड़ की आबादी वाले महान देश की ‘सिविल सोसाइटी का नुमाइंदा’ बताकर बयानबाजी करते हैं, तो डर लगता है। लोगों को पहले भी शब्दों की आडंबरी आंधियों में उड़ाने का काम किया गया है। तनी हुई पतंग की तरह हवा में ऊपर जाना तो अच्छा लगता है, पर जब कटी पतंग की तरह अरमान धूल चाटते हैं, तो कुंठाएं पैदा होती हैं। ये तीन उदाहरण इस सच को बताने और जताने के लिए काफी हैं। मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि यकीनन इस समय देश के सामने महंगाई और भ्रष्टाचार सबसे बड़े मुद्दे हैं, पर इनसे जूझने के लिए एक सामूहिक रणनीति की जरूरत है। लोकप्रिय बयानबाजी की नहीं। पहले भी इसको देश भोग चुका है।
अगस्त 1947 के पहले हफ्ते से मौजूदा हालात की तुलना करें, तो आपका सिर यकीनन गर्व से ऊंचा हो उठेगा। अब हम एक लहूलुहान देश नहीं हैं। हमारी ताकत का लोहा दुनिया मानती है। यह बात अलग है कि कुछ मूलभूत समस्याएं आज भी कायम हैं। पर ऐसा संसार के किस देश में नहीं है? क्या सबसे ताकतवर देश अमेरिका में, जिसने अभी आजादी की 234वीं वर्षगांठ मनाई है, गरीबी नहीं है? क्या वहां बेरोजगारी के आंकड़े नहीं बढ़ रहे? क्या ओबामा पहले अश्वेत राष्ट्रपति नहीं हैं? क्या अभी तक वहां किसी भी महिला को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला है? क्या धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला यह देश अंदरूनी तौर पर कंपकंपी का शिकार नहीं है? अगर यह सच है, तो शर्म के बजाय गर्व कीजिए। हमने गए 64 सालों में बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की हैं।
भूलिए मत। सफलताएं तभी बरकरार रहती हैं, जब नई चुनौतियां पैदा होती हैं। सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में यह जबरदस्त परिवर्तन का दौर है। बदलाव अंधी गुफाओं में भटकने का अभ्यस्त होता है। उसके साथ चलते-दौड़ते अक्सर लगता है कि हम भटक गए हैं। पर हर अंधेरी रात के आगे उजला सवेरा होता है।

Monday, December 26, 2011

हिन्दुत्व की राजनीति बाबरी से अन्ना तक


 
इस महीने (दिसंबर 2011) बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के उन्नीस साल पूरे हो गए। इस अवसर पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने मस्जिद के पुनर्निर्माण की माँग फिर से उठाई। इस माँग के पूरी होने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही, यह एक ऐसी राजनैतिक गुत्थी बन गया है जिसका कोई हल नजर नहीं आ रहा है। कई अलग अलग राजनैतिक ताकतें, इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनी अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहीं हैं।
यहां हम एक बार फिर दुहराना चाहेंगे कि हिंदुत्व का हिंदू धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। हिंदुत्व तो संघ परिवार की राजनीति का नाम है। हिंदुत्व, संकीर्ण सोच व सांप्रदायिक दृष्टिकोण की राजनीति है। हिंदुत्व, दरअसल, उच्च जातियों के हिंदुओं के उस तबके की सोच को प्रतिबिंबित करता है जो प्रजातंत्र का खात्मा कर देना चाहता है। हिंदुत्व का पैरोकार वर्ग अपेक्षाकृत समॢद्ध और अधिकांशतः शहरी है। हिंदुत्व की राजनीति का उद्देश्य, हिंदू राष्ट्र की स्थापना है जहां समाज के ऊँचे तबके का वर्चस्व होगा और जहां सामंती मूल्यों का बोलबाला होगा। जो खेल खेला जा रहा है वह है सामंती मूल्यों व जन्म आधारित उंचनीच को गौरवशाली परंपरा के नाम पर आधुनिक कलेवर में परोसना।
बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना केवल एक राष्ट्रीय स्मारक का विनाश नहीं था बल्कि उसके साथ ही भारतीय राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ जिसमें राजनीति के प्रांगण में अब तक दबे छिपे ढंग से काम कर रहीं सांप्रदायिक राजनैतिक ताकतें, खुलकर अपना कुत्सित खेल खेलने लगीं। इसके चलते अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा बढ़ी और भारतीय संविधान के मूल्यों का मखौल बना। बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना, दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने की ओर सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का पहला कदम था।
बाबरी घटना के तुरंत बाद भाजपा राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया परंतु इससे समाज का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न रूक सका। जमकर सांप्रदायिक हिंसा हुई और हाशिए से खिसककर भाजपा, राजनीति के मंच के केन्द्र में आ पहुँची। वह सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी। भाजपा के पितृसंगठन आऱएस़एस़ की समाज में स्वीकार्यता ब़ने लगी। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह, सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। मुसलमानों के अलावा ईसाई अल्पसंख्यक भी सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर आ गए। पॉस्टर ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जला दिया गया और देश के कई हिस्सों में ईसाई मिश्नरियों के विरूद्ध हिंसा हुई। इसका चरमोत्कर्ष था कंधमाल में खूनी मारकाट।
मूलतः प्रजातंत्रविरोधी व हिंदू राष्ट्र की पक्षधर भाजपा पहली बार सन 1996 में केन्द्र में सत्ता में आई। उस समय सभी अन्य पार्टियों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया। सत्ता का लालच भी उन्हें न बांध सका परंतु बाद में, शनै:शनै: राजनैतिक पार्टियाँ, सत्ता की खातिर भाजपा से जुड़ने लगीं। उन्हें बाबरी मस्जिद ढाहने के आरोपियों से हाथ मिलाने में कोई संकोच नहीं हुआ। उन्हें उन लोगों से कोई परहेज न रहा जिन्होंने पूरे देश में भारी खूनखराबा मचाया था। भाजपा केन्द्र में सत्ता में आ गई और इससे विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसे संघ परिवार के अन्य सदस्यों की बन आई। वे मनमानी पर उतर आए। राज्यतंत्र और पुलिस बलों का तेजी से सांप्रदायिककीकरण होने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भगवाधारियों ने अपने हाथपैर फैलाने शुरू कर दिए। वैज्ञानिक सोच व तार्किकता के स्थान पर आस्था व विश्वास शिक्षा के आधार बनने लगे।
इससे भाजपा की ताकत और बढ़ी। चुनावों में जीत उसके लिए आसान होती गईं। संघ का प्रचार तंत्र केवल अल्पसंख्यकों का दानवीकरण नहीं करता, वह बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के "खतरे" का भय भी उत्पन्न करता है। इससे संघ का प्रचार और धारदार बन जाता है और मध्यमार्गी भी संघ के झंडे तले जुटने लगते हैं। कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही, दक्षिण भारत में भाजपा के पैर जमाने की शुरूआत हुई। भाजपा की राजनैतिक विचारधारा पूरे देश में अपनी जड़ें जमा रही है। उसकी जड़ें और मजबूत, और मोटी होती जा रहीं हैं।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के साथ ही कई प्रक्रियाएं शुरू हुईं। हिंसा पीड़ित न्याय पाने से वंचित कर दिए गए। उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जीने पर मजबूर कर दिया गया। बाद में, आतंकवाद का मुद्दा भी मुसलमानों के दानवीकरण का बहाना बन गया। ईसाई अल्पसंख्यक भी विशेषकर आदिवासी इलाकों में साम्प्रदायिक ताकतों के शिकार बनने लगे।
9/11 के बाद, अमरीकी प्रचारतंत्र अल्कायदा को आतंकवाद का स्त्रोत बताने लगा। मुसलमानों व इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना शुरू कर दिया गया। अमरीकी मीडिया ने "इस्लामिक आतंकवाद" शब्द उगाया। तेल संसाधनों पर कब्जे की राजनीति में सफलता की खातिर आमजनों की विचारधारा और सोच में जहर घोलना शुरू कर दिया गया। भारत में भी मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार ने नई ऊँचाईयाँ छूईं। इस्लाम की शिक्षाओं और मुसलमानों को आतंकवाद के लिए दोषी ठहराया जाने लगा। यह झूठा प्रचार अत्यंत होशियारी से किया गया।
आऱएस़एस़-भाजपा की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामाजिक धु्रवीकरण को चरम पर पहॅुचा देने के बाद अब इन तत्वों ने अन्ना हजारे के आंदोलन के नाम पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का अभियान शुरू कर दिया है। वे एक ऐसे तंत्र का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें "लोकपाल" नामक सर्वशक्तिमान संगठन, हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों व संस्थाओं पर नजर रखे। ऊपर से देखने से ऐसा लग सकता है कि लोकपाल से देश की समस्याएं सुलझेंगी। परंतु दरअसल इससे एक ऐसी संस्था अस्तित्व में आएगी जिसपर प्रजातांत्रिक नियमकानून लागू नहीं होंगे। कुछ लोग और संगठन, जो जनता का एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं और "अन्ना संसद के ऊपर हैं" जैसे बेमानी नारे लगा रहे हैं, असल में पर्दे के पीछे से देश के संचालन के सूत्र अपने हाथों में लेना चाहते हैं। अन्ना आंदोलन ने एक ऐसे सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है जो यह मानता है कि पहचान से जुड़े मुद्दे (राम मंदिर) और भ्रष्टाचार जैसे मसले, जो कि असली बीमारी के लक्षण मात्र हैं, ही देश की मूल समस्याएं हैं। उन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों व समाज के अन्य वंचित समूहों की समस्याओं से कोई लेनादेना नहीं है। पहचान आधारित मुद्दे और बाहरी लक्षणों से जुड़े मसले, राजनैतिक यथास्थितिवाद के हामी होते हैं और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले सभी समूह चाहे वे ईसाई कट्टरपंथी हों, इस्लामिक कट्टरपंथी हों या हिंदुत्ववादी भी यही चाहते हैं।
अब चूंकि राममंदिर मुद्दे की चमक खो गई है इसलिए सामाजिक राजनैतिक यथास्थितिवादी तत्वों ने भ्रष्टाचारविरोध का पल्ला थाम लिया है। यह एक चालाकी भरा कदम है। "मैं अन्ना हूँ" "हम जनता हैं" जैसे नारों से वंचित वर्ग स्वयं को अलगथलग महसूस कर रहे हैं। अन्ना आंदोलन के कर्ताधर्ताओं का संदेश साफ है। इस देश की व्यवस्था केवल "शाईनिंग इंडिया" वर्ग से निर्देशित होगी और वंचित वर्ग सदा हाशिए पर रहेंगे।
संघ हिंदुत्व राजनीति, समाज का धु्रवीकरण व सांप्रदायिकीकरण करने व मूल मुद्दों से समाज का ध्यान हटाने के लिए नित नई रणनीतियाँ अपनाता रहता है। जहाँ पहले रथ यात्राओं व सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने में भूमिका अदा की वहीं अब भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दे का इस्तेमाल उस राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है जिसका लक्ष्य सामाजिक असमानताओं को बनाए रखना है।

Sunday, October 02, 2011

फैसला कीजिये : अडवाणी बड़े या मोदी??



हिन्दुवत्ववादी खेमे के सबसे बड़े राजीनीतिक दल में अडवाणी बड़े या मोदी को लेकर घमासान चल रहा है और हिन्दुवत्व वादी तत्व संशय की स्तिथि में हैं। अडवाणी जी ने पहले अपनी रथ यात्रा निकाल कर जनता दल की सरकार को ध्वस्त कर दिया था और फिर बाद में बाबरी मस्जिद ध्वंस करा कर पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे करवाए थे लेकिन पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना की मजार पर जाकर उनका गुणगान भी किया था वहीँ दूसरी तरफ टनाटन हिन्दुवत्व वादी नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं। गोधरा ट्रेन कांड के बाद पूरे गुजरात में भारतीय नागरिकों का कत्ले आम कराया था और अब उनके खिलाफ मुंह खोलने वाले आई.पी.एस अफसर संजीव भट्ट निलंबित होकर जेल की हवा खा रहे हैं। डी.डी बंजारा के समय गुजरात में आतंकवाद के नाम पर सरेआम नौजवानों को गोलियों से एनकाउंटर के नाम पर मार डाला गया था लेकिन हिन्दुवत्ववादी नरेंद्र मोदी जी का ह्रदय जरा सा भी नहीं पिघला। नरेंद्र मोदी साहब ने अभी कुछ दिन पूर्व सद्भावना उपवास किया था और एक चापलूस ने इस्लामी टोपी लगाने के लिये भेट की तो उन्होंने सख्ती से मना कर दिया। अडवाणी जी अगर होते तो टोपी अवश्य लगा लेते। अब फैसला हिन्दुवत्ववादी शक्तियों को करना है कि उनका नेता मोदी है या अडवाणी ?

Saturday, October 01, 2011

अमेरिका पोषित ‘इस्लाम’ का कहर



अमेरिका उन लोगों को खत्म करना चाहता है, जिन्होंने अफगानिस्तान से रूस को बाहर निकालने में उसकी मदद की थी। वह उस ‘इस्लाम’ से परेशान हो गया है, जो उसने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से अफगानिस्तान के बच्चों को घुट्टी में पिलाया था। जब उसका पढ़ाया इस्लाम उसका ही दुश्मन बन गया है, तो वह पाकिस्तान से कह रहा है कि वह हक्कानी नेटवर्क खत्म करने में उसकी मदद करे। पाकिस्तान ने भी अमेरिका को आंखें दिखाते हुए अमेरिका के फरमान को यह कहकर मानने से इंकार कर दिया है कि हक्कानी नेटवर्क उसका ही पाला-पोसा हुआ है। बात यहां तक बिगड़नी शुरू हो गई कि यदि अमेरिका स्वयं वजीरिस्तान में सैनिक कार्रवाई करता है, तो पाकिस्तान उसका जवाब देगा।
अमेरिका ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के लिए जिन लोगों को तैयार किया था, वे आज न केवल पाकिस्तान और अमेरिका के लिए, बल्कि भारत के लिए भी बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। जिस तरह से पाकिस्तान में आतंकवादी मसजिदों और जनाजों पर गोलियां और बम बरसाकर लोगों को हलाक कर हैं, ये हरकत किसी ऐसे गुट की नहीं हो सकती, जो अपने आप को इस्लाम का अनुयायी कहता है। ये सरासर गैरइसलामी हरकतें हैं। जो इस्लाम पड़ोसी के भूखा रहने पर खाना हराम बताता हो, इस्लाम शिक्षा के लिए चीन तक जाने की बात करता हो, औरतों की इज्जत करने की हिदायत देता है। सबसे बड़ी बात यह कि इस्लाम एक बेगुनाह के कत्ल को पूरी इंसानियत का कत्ल बताता है, उस इस्लाम के बारे में कुछ लोगों की करतूतों से पूरी दुनिया में यह संदेश गया है कि यह एक दकियानूसी और खून-खराबे वाला धर्म है। जेहाद के बारे में बता दिया गया है कि मानव बम बनकर लोगों को मारोगे, तो सीधे ‘जन्नत’ मिलेगी। उन मासूमों को क्या पता कि बेगुनाह लोगों का खून बहाओगे, तो जन्नत नहीं, ‘दोजख’ की आग मिलेगी। अमेरिका ने जो इस्लाम पढ़ाया, वह अब इतना ताकतवर हो गया है कि पाकिस्तानी फौज तो पस्त हो ही गई है, अमेरिका और यूरोप भी परेशान हैं। अफगानिस्तान से फारिग होने के बाद अमेरिका द्वारा तैयार किए आतंकवादियों का रुख वहां भी हुआ, जो यह समझते थे कि हम सात समंदर पार हैं, इसलिए महफूज हैं। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका का यह गुरूर भी टूटा।
इधर, जब नब्बे के दशक की शुरुआत में सोवियत यूनियन का मर्सिया पढ़ा जा रहा था, तो भारत में बाबरी-मसजिद और राममंदिर आंदोलन के चलते सांप्रदायिकता पूरे उभार पर थी, जिसकी परिणति बाबरी मसजिद विध्वंस और खूनी सांप्रदायिक दंगों के रूप में हुई। अमेरिकी पोषित आतंकवादियों का मुंह भारत की ओर हुआ और उन्हें खून खराबे करने के तर्क के रूप में बाबरी मसजिद विध्वंस और बाद में गुजरात दंगा मिल गया।
मुंबई के आतंकी हमलावरों ने जब ताज होटल में बेकसूरों को बंधक बनाया था, तो बंधकों में से एक ने हिम्मत करके पूछा था, ‘तुम लोग ऐसा क्यों कर रहे हो ?’ इस पर एक आतंकी ने कहा था, ‘क्या तुमने बाबरी मसजिद का नाम नहीं सुना? क्या तुमने गुजरात के बारे में नहीं सुना?’ दरअसल, आतंकी बाबरी मसजिद और गुजरात का हवाला देकर अपनी नापाक हरकत को पाक ठहराने का कुतर्क दे रहे थे। इन आतंकियों को पता होना चाहिए कि जिन बेकसूर को उन्होंने निशाना बनाया था, वे बाबरी मसजिद विध्वंस और गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार नहीं थे? भारतीय मुसलमानों की हमदर्दी का नाटक करने वाले आतंकी संगठन क्या इस तरह से फायरिंग करते हैं या बमों को प्लांट करते हैं, जिससे मुसलमान बच जाएं और दूसरे समुदाय के लोग मारे जाएं? मुंबई हमलों में ही 40 मुसलमानों ने अपनी जान गंवाई थी और 70 के लगभग घायल हुए थे। बेगुनाहों को निशाना बनाकर बाबरी मसजिद और गुजरात का कैसा बदला लिया जाता है, यह समझ से बाहर है। और यह भी कि कौन-सा इस्लाम इस बात की इजाजत देता है? पाकिस्तान में नमाजियों से भरी मसिजद को बमों से उड़ाकर कौन सी मसजिद विध्वंस का बदला लिया जाता है? आत्मघाती हमलों में बेकसूर लोगों की जान लेकर किस गुजरात का बदला लिया जाता है?
अब अमेरिका को समझ में आ रहा है कि जो भस्मासुर उसने सोवियत यूनियन के लिए तैयार किया था, उसका रुख अब पूरी दुनिया के ओर हो गया है। इस भस्मासुर को तैयार करने में मदद करने वाला पाकिस्तान भी अब दोराहे पर खड़ा है। उसके लिए ‘इधर कुआं, उधर खाई’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। यदि वह हक्कानी गुट के सफाए के लिए आगे आता है, तो आतंकवादी उसका जीना हराम कर देंगे। नहीं करता है, तो अमेरिका आगे आने लिए तैयार है। बहुत दिनों से यह बात की जा रही है कि अमेरिका के निशाने पर अब पाकिस्तान है, लेकिन अमेरिका फिलहाल इराक और अफगानिस्तान में उलझा हुआ है, इसलिए पाकिस्तान उसे आंखें दिखा रहा है, लेकिन बकरे मां कब तक खैर मनाएगी?

Wednesday, June 01, 2011

क्या 17 वर्षों के बाद न्याय के कुछ मायने हैं?



ह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस के बाद पहली जांच सात दिनों के भीतर पूरी कर ली गई. 13 दिसंबर को रविवार था. उस दिन तत्कालीन रक्षा मंत्री शरद पवार ने कुछ दोस्तों और सहयोगियों को एक साथी सांसद के घर आमंत्रित किया. उन्होंने एक फिल्म देखी-मस्ज़िद विध्वंस की लाइव फुटेज, जो किसी सरकारी एजेंसी की थी. शायद इंटेलिजेंस विभाग की. वह पुरानी रील अब भी कहीं सरकारी आर्काइव में प़ड़ी होनी चाहिए. उस फिल्म के बाद शायद ही किसी जांच आयोग की ज़रूरत थी, या कोई जांच आयोग उन सबूतों में कोई इज़ाफा कर पाता. छह दिसंबर का पूरा घटनाचक्र उस फिल्म में क़ैद था, जिसमें आख़िरकार मस्ज़िद को ढाह दिया गया था.
इस ऐतिहासिक घटना के कारण भी पूरी तरह सबके सामने थे. लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा कोई छिपी और अचानक हुई यात्रा नहीं थी. सच पूछिए तो बड़े पैमाने पर मीडिया कवरेज इसकी एक वजह रही हो, चूंकि आडवाणी अपनी राजनीतिक योजना के लिए बड़े पैमाने पर जनता की हिस्सेदारी चाहते थे. न ही यह कोई छिपी बात रही थी, जब कांग्रेस ने 1989 के आम चुनावों के बीच राममंदिर का शिलान्यास किया था. बोफोर्स के साथ ही बाबरी मस्ज़िद भी उन नाटकीय चुनावों का एक अहम हिस्सा थी. 1989 में भी भाजपा में आज के वरुण गांधी के संस्करण थे और उनके नारे, उनकी आवाज़ पूरी बुलंदी पर थी. अपने नारों में वे ऐसी आलंकारिक सजावट करते थे, जिस पर बाद में प्रतिबंध लगाया गया-मंदिर वहीं बनाएंगे या मुसलमान के दो स्थान, पाकिस्तान या क़ब्रिस्तान. किसी ने कुछ नहीं छिपाया.
लोकशाही खुले में खेला जाने वाला अस्थिर खेल है. आख़िर इस खुले खेल फर्रूखाबादी में छिपा क्या था, जिसकी जांच करने की ज़रूरत थी.
एक सरकारी जांच केवल यही कर सकता था कि जानी हुई बातों पर ही पक्षपातरहित फैसले की न्यायिक मुहर लगाता. यह क्या अजीब नहीं लगता कि 16 दिसंबर 1992 को नियुक्त जस्टिस लिबरहान को तीन महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था. अगर उनको छह महीने या एक वर्ष का भी विस्तार मिला होता, तो बात समझ में आती, लेकिन उन्होंने 17 साल क्यों लिए?
सारे मुख्य किरदार जाने हुए और उपलब्ध थे. आख़िर लिबरहान ने वी पी सिंह का बयान लेने में नौ वर्षों से अधिक और पी वी नरसिंहराव के बयान के लिए साढ़े नौ वर्ष क्यों लगा दिए? ज़ाहिर तौर पर वह उनके आदेशों से बच नहीं रहे थे? आडवाणी, उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता भाजपा नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री थे, जब उन्होंने बयान दिए. आरएसएस के पूर्व प्रमुख केएस सुदर्शन केवल एक बार छह फरवरी 2001 को उपस्थित हुए. राव ने 9 अप्रैल 2001 से पहले बहुत कुछ बता दिया होता, जब वह प्रधानमंत्री नहीं रहे थे.
क्या आयोग ने सचमुच ही अपना उद्देश्य 2001 के पहले पा लिया था?  उसने राव के प्रधानमंत्री के काल के बाद भी कई वर्षों तक काम किया था. इससे यह तो तय हो गया कि इसकी जांच से राव को इस्तीफा देने की मांग का सामना न करना पड़े. नरसिंह राव छह दिसंबर 1992 के बाद भी बचे रह गए, क्योंकि उन्होंने उनको ही ख़रीद लिया, जिनसे उनको सबसे अधिक ख़तरा महसूस होता था. वह कांग्रेस के भीतर के मुसलमान थे. सरकार के अंदर मौजूद कुछ को तऱक्क़ी दी गई और बाहर के अधिकतर को 3 जनवरी 1993 को मंत्रिमंडल के पुनर्गठन में जगह दे दी गई. अंतरात्मा ख़रीद ली गई. ज़िंदगी चलती रही.
यह जानना मज़ेदार होगा कि लिबरहान आयोग ने क्या खुलासा किया है? आख़िर राव उस पूरे दिन क्या कर रहे थे? बाबरी मस्ज़िद कोई अचानक और ताक़तवर विस्फोट से नहीं गिराई गई थी. उसे पत्थर-दर-पत्थर तोड़ा गया था. कारसेवकों द्वारा.
तो राव इन मिनटों और घंटों के दौरान-यानी सुबह से शाम तक-क्या कर रहे थे? सो रहे थे.  जैसा कि उनके व्यक्तिगत सहायक ने कई क्षुब्ध कांग्रेसियों को बताया, जो जानना चाहते थे कि आख़िर सरकार सो क्यों रही है? वे इस जवाब को सुनकर अवाक रह गए थे. यह सचमुच सरकारी जवाब था. उनका विरोध तब शांत हो गया, जब उन्हें लगा कि पार्टी को इसकी सचमुच बड़ी क़ीमत चुकानी होगी. साथ ही, ज़ाहिर तौर पर मौन का अपना महत्व है.
17 वर्षों की जांच की कोई तार्किक व्याख्या नहीं होगी, पर इसकी राजनीतिक व्याख्या है. 1992 से 2004 के बीच हरेक सरकार का निहित स्वार्थ देरी में था. एच डी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की अल्पमत सरकार राव-केसरी की कांग्रेस के समर्थन के बिना एक दिन भी नहीं चल सकती थी. (उस समय सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष नहीं थीं). न तो देवगौड़ा और न ही गुजराल कोई ऐसी रिपोर्ट चाहते थे, जो उनको लाभ पहुंचाने वालों को नुक़सान पहुंचाए.
भाजपा नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार छह साल तक चली और सारे दोषी इसकी आगे की पांत में ही बैठे थे. केवल उमा भारती इतनी बेबाक थीं कि उन्होंने कहा कि मस्ज़िद टूटते व़क्त उनको ख़ुशी हुई थी. (मैं मस्ज़िद टूटने की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार हूं और इसकी एवज में फांसी पर लटकने को भी). जस्टिस लिबरहान भाजपा की अगली पंक्ति में कुछ नैतिक छिद्र तलाश सकते थे. और यही वजह थी कि एक के बाद एक जब उन्होंने विस्तार मांगा तो सार्वजनिक तौर पर चुप्पी और निजी तौर पर ख़ुशी ज़ाहिर की गई.
भले चाहे या अनचाहे, लेकिन जस्टिस लिबरहान ने दोनों ही पक्षों के नेताओं को बचाया. यहां भी एक सवाल बच जाता है. उन्होंने 2004 में अपनी रिपोर्ट क्यों नहीं दी? ज़ाहिर तौर पर डॉक्टर मनमोहन सिंह तब नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे. हालांकि उनको बाबरी की राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं था. जब देरी इतनी आरामदेह बन जाए, तो चिंता क्यों करें?

Tuesday, March 15, 2011

अरी ओ भाजपा, तुमने मेरा नाम मिट्टी में मिला दिया!


अरी ओ भाजपा, तुमने मेरा नाम मिट्टी में मिला दिया!
शोले में गब्बर सिंह का डॉयलाग तो आपको याद ही होगा. अरे ओ सांभा इन तीनों ने हमारा नाम पूरा का पूरा मिट्टी में मिला दिया. कुछ इसी अंदाज में अब लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर बोल पड़े हैं. हालांकि ब्लागबीर आडवाणी ने आज अपने ब्लाग पर यूपीए की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है लेकिन साथ में कुछ ऐसा जिक्र भी कर दिया है जो एक बार फिर उन्हें सेकुलर साबित करने के लिए पर्याप्त होगा.
अपने ब्लाग में आडवाणी लिखते हैं-"मेरे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण मेरी विश्वसनीयता है. न सिर्फ मेरी विश्वसनीयता बल्कि मेरे पार्टी की भी विश्वसनीयता." आडवाणी बताते हैं कि यह बात उन्होंने कोई दो दशक पहले बाबरी विध्वंस के बाद टेलीग्राफ के एक पत्रकार से कही थी. उन्होंने 27 दिसंबर 1992 को इंडियन एक्सप्रेस अखबार से यह भी कहा था कि बाबरी विध्वंस का दिन उनके जीवन का सबसे दुखद दिन था. आडवाणी लिखते हैं कि यह बोलने के बाद उनके कई नजदीकी लोग उनके ऊपर सवाल उठाते रहे कि आपको ऐसा नहीं बोलना चाहिए था. यह आपने क्यों बोल दिया? तो आज आडवाणी एक बार फिर उन सबको जवाब देते हुए लिखते हैं कि " मैं कभी अयोध्या आंदोलन को लेकर माफी मांगने के मूड में नहीं रहा हूं बल्कि मुझे तो अयोध्या आंदोलन पर गर्व है. लेकिन 6 दिसंबर को अयोध्या में जो कुछ हुआ उसके कारण पार्टी की विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा."
अब लो, कर लो बात. जिस बाबरी विध्वंस को संघी भाजपाई अपने राजनीतिक इतिहास का सबसे स्वर्णिम दिन मानते हैं और कोई सवाल उठाये तो काट खाने दौड़ते हैं, उसे आडवाणी जी पार्टी की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा संकट बता रहे हैं. आडवाणी जी ने अचानक अयोध्या राग क्यों अलापा है इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. कांग्रेस की सरकार में कार्यरत एक जांच एजंसी सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उसे अयोध्या में बाबरी विध्वंस की फाइल को दोबारा खोलने का आदेश करे. सुप्रीम कोर्ट ने विहिप, शिवसेना और भाजपा के कई नेताओं को नोटिस जारी करते हुए उनसे जवाब तलब किया है. सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब देने से पहले आडवाणी ने पार्टी और पांसा फेका है कि कल को अगर सुप्रीम कोर्ट में नोटिस के जवाब में आडवाणी इस बात से मुकर जाएं कि अयोध्या में जो कुछ हुआ उसमें उनका कोई रोल नहीं है तो पार्टी वाले उनको शूली पर न टांगे, इसलिए पार्टीवालों को पहले ही लालीपाप दिखा रहे हैं कि देखो तुम्हारी भी छवि धूमिल हुई है.
सेकुलर आडवाणी भले ही चाहे जितनी कोशिश कर लें लेकिन उन्हें भी मालूम है कि भाजपा में या तो सनकी भरे पड़े हैं या फिर शोहदों की भरमार है. उन्हें भाजपा की वैसे भी अब कोई चिंता नहीं है. अगर चुनाव सचमुच चार साल आगे चले गये तो भाजपा रहे या भाड़ में जाए, आडवाणी भाजपा को भी शर करके अपनी छवि चमकाने की कोशिश करेंगे. इसलिए अगर आडवाणी यह बात बोल रहे हैं कि अयोध्या में बाबरी विध्वंस के कारण पार्टी की विश्वसनीयता खत्म हो गयी तो जाते जाते आडवाणी भाजपा की जड़ में बचा खुचा मट्ठा भी डाल देना चाहते हैं. इसलिए आडवाणी भले ही नाम भाजपा का ले रहे हों और बात किसी और से कर रहे हों लेकिन वे बता रहे हैं कि भाजपा अयोध्या आंदोलन को इतना तूल न देती तो वे देश के सबसे बड़े सेकुलर नेता होते. लेकिन भाजपा के अयोध्या आंदोलन को बेवजह तूल देते रहने से देश को एक सच्चा सेकुलर नेता मिलते मिलते रह गया. आह! दर्द की कोई सीमा नहीं है. आडवाणी जो नहीं बोल रहे हैं वह बात समझ में आ रही है न?

Monday, March 07, 2011

बाबरी विध्वंस मुकदमे की रोजाना सुनवाई कराने की मांग



 बाबरी विध्वंस मुकदमे की रोजाना सुनवाई कराने की मांग
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जीलानी
 (फाइल फोटो)

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने केन्द्र सरकार और सीबीआई से बाबरी विध्वंस मामले की रोजाना सुनवाई करने की मांग की है.
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने केन्द्र सरकार और सीबीआई से उच्च न्यायालय में प्रार्थनापत्र देकर विवादित ढांचा ढहाए जाने सम्बन्धी मुकदमों की रोजाना सुनवाई के आधार पर जल्द से जल्द निपटारे का प्रयास करने की मांग की है.
कमेटी के संयोजक जफरयाब जीलानी ने बताया कि रविवार को लखनऊ में हुई कमेटी की बैठक में बाबरी मस्जिद से सम्बन्धित मुकदमों और लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर विचार-विमर्श किया गया.

उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी महसूस करती है कि ढांचे के विध्वंस को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिव सेना और बजरंग दल की सोची-समझी साजिश का नतीजा बताने वाले लिब्रहान आयोग के जांच निष्कर्ष कानूनी तौर पर सही हैं लेकिन इस बारे में केन्द्र सरकार की कार्यवाही की घोषणा संतोषजनक नहीं थी. हालांकि उस एलान पर भी अमल नहीं किया गया.

जीलानी ने बताया कि कमेटी की मांग है कि सीबीआई और केन्द्र सरकार विवादित ढांचा ढहाए जाने से जुड़े मुकदमों में जल्द फैसला करवाने के लिये उच्च न्यायालय में प्रार्थनापत्र देकर मुकदमों की दिन-प्रतिदिन सुनवाई के आधार पर जल्द से जल्द निर्णय कराने का प्रयास करें.

 साभार: http://www.samaylive.com

Saturday, March 05, 2011

वह औरत सिर्फ सफदर हाशमी की मां नहीं है…


क़मर आज़ाद हाशमी। तस्‍वीर सौजन्‍य : शबनम हाशमी
दिल्ली सरकार की उर्दू अकादमी की ओर से कल एक ऐसी महिला का सम्मान किया गया, जिन्होंने मुसीबतों को हर मोड़ पर चुनौती दी है। दिल्ली के समाज के निर्माण में उनका खुद का और उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान है। कमर आजाद हाशमी का जन्म 4 मार्च 1926 को झांसी में हुआ था। उनके पिता अजहर अली आजाद उर्दू और फारसी के विद्वान थे। उनकी मां जुबैदा खातून, दहेज के खिलाफ सक्रिय थीं, कई भाषाओं की जानकार थीं, घुड़सवारी करती थीं और राइफल चलाना जानती थीं। उनकी ससुराल के लोग दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे। उनके पति की मां, बेगम हाशमी नैशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन की संस्थापक अध्यक्ष थीं। मुल्क के बंटवारे के वक्त ऐसे हालात बने कि कमर आजाद हाशमी को अपने माता पिता के साथ पाकिस्तान जाना पड़ा। वहां वे पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव, सज्जाद जहीर से मिलीं। सज्जाद जहीर को कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान भेजा था, जहां उन्हें पार्टी का गठन करना था। उन्‍हें मालूम था कि कमर की शादी हनीफ हाशमी से होने वाली थी। उन्होंने कमर को कहा कि वापस जाओ और हनीफ से शादी करके उसे भी पाकिस्तान लाओ, जिससे वहां वामपंथी आंदोलन को ताकत दी जा सके। कमर आजाद हाशमी जब दिल्ली आयीं, तो शादी तो उन्होंने हनीफ हाशमी से कर ली लेकिन वापस जाने की बात खत्म कर दी। बाद में स्व सज्जाद जहीर भी वापस हिंदुस्तान आ गये।
कमर आजाद हाशमी ने अपनी पहली किताब 69 साल की उम्र में लिखी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उनकी पढ़ाई पर ब्रेक लग गयी थी क्योंकि 1947 के तकसीम-ए-मुल्क ने सब कुछ बदल दिया था। उन्होंने सत्तर साल की उम्र में एमए करने का फैसला किया और किया भी। मजदूरों के हक के लिए लड़ते हुए उनके 34 साल के बेटे को दिल्ली के पास साहिबाबाद में गुंडों ने मार डाला, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उस दिन उन्होंने दुःख में डूबे उसके साथियों का हौसला बढ़ाया था और कहा कि साथियो उठ खड़े हो और रोशनी फैलाने का काम जारी रखो क्योंकि अंधेरे के परदे को रोशनी से ही खत्म किया जा सकता है। उनके बेटे का नाम सफदर हाशमी था और आज उसे पूरी दुनिया में लोग जानते हैं।
कमर आजाद हाशमी के सफदर के अलावा चार और बच्चे हैं। इन्‍होंने अपने सभी बच्चों के अंदर पता नहीं क्या भर दिया है कि उनमें से कोई भी अन्याय के खिलाफ मोर्चा संभालने में एक मिनट नहीं लगाता। इनकी सबसे छोटी औलाद शबनम हाशमी हैं, जिन्होंने गुजरात नरसंहार 2002 के बाद दर्द के तूफान को झेल रहे हर गुजराती मुसलमान को ढाढ़स बंधाया और उसके साथ खड़ी रहीं। शबनम ने बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद संघी ताकतों का मुकाबला किया और देश में सेकुलर जमातों को एकजुट किया। इनके बड़े बेटे सुहेल हाशमी हैं, जो दिल्ली की विरासत के सबसे बड़े जानकारों में गिने जाते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक रूप को स्थापित करने में सुहेल का बड़ा योगदान है। इनकी दो और बेटियां हैं, जिन्होंने स्कूल टीचर के रूप में दिल्ली के दो नामी स्कूलों में काम किया और अपने विषय को बहुत ही लोकप्रिय बनाया। अपने बच्चों को कमर आजाद हाशमी ने बेहतर इंसान बनने की ट्रेनिंग अच्छी तरह से दे रखी है। दिल्ली में नर्सरी शिक्षा को एक सम्मानजनक मुकाम तक पंहुचाने में कमर आजाद हाशमी का खास योगदान है।
मुल्क के बंटवारे के बाद से दिल्ली और अलीगढ के बीच उन्होंने वक्त की हर मार को झेला और अपने बच्चों को मजबूत इंसान बनाया। उनके छोटे बेटे सफदर को 1989 में मार डाला गया। उसकी याद में ही सामाजिक बदलाव और सांस्कृतिक हस्तक्षेप का मंच, सहमत बनाया गया। शुरू में सहमत का संचालन उनकी छोटी बेटी शबनम हाशमी ने किया। बाद में शबनम ने अनहद का गठन किया जो शोषित पीड़ित जनता की लड़ाई का एक प्रमुख मोर्चा है। सहमत और अनहद से जुड़े ज्यादातर लोग कमर आजाद हाशमी को अम्माजी कहते हैं। सफदर को विषय बनाकर अम्माजी ने एक किताब भी लिखी जिसका नाम है, “पांचवां चिराग”। यह किताब कई भाषाओं में छप चुकी है। घोषित रूप से तो यह सफदर की जीवनी है लेकिन वास्तव में यह बीसवीं सदी में हो रहे बदलाव का एक आईना है। यह किताब उस औरत के अज्म की कहानी है, जिसका जवान बेटा राजनीतिक कारणों से शहीद कर दिया गया था। इस किताब में चारों तरफ बिखरे हुए सपने पड़े हैं, उम्मीदें हैं और हौसले हैं। इस किताब को पढ़ने के बाद लगता है कि एक औरत अगर तय कर ले तो मुसीबतें कहीं नहीं ठहरेगीं। अम्माजी को बहुत सारे सम्मान मिले हैं और आज भी काम करने का जज्बा ऐसा है कि अगले बीस साल तक के लिए प्लान बना चुकी हैं।
आजकल दिल्ली में अपनी छोटी बेटी शबनम हाशमी के साथ रहती हैं और अनहद के काम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हैं। अपने वालिद की फारसी गजलों और नज्मों का एक संकलन प्रकाशित कर चुकी हैं और दूसरे संकलन के बारे में काम चल रहा है। आज भी उनके पास बैठने पर लगता है कि काम करने का अगर हौसला हो तो बाकी चीजें अपने आप दुरुस्त हो जाएंगीं।
shesh narayan singh(शेष नारायण सिंह। मूलतः इतिहास के विद्यार्थी। पत्रकार। प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। महात्‍मा गांधी पर काम किया। अब स्‍वतंत्र रूप से लिखने-पढ़ने के काम में लगे हैं। उनसे sheshji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
शेष नारायण सिंह से जुड़ी अन्‍य पोस्‍टें यहां देखें : www.mohallalive.com/tag/shesh-narayan-singh/