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Friday, February 05, 2016

गंगाजल, साधू यादव, लोकतंत्र की हत्या, संघ व उच्चतम न्यायालय का मूकदर्शक बना रहना

फिल्म "गंगाजल" में तेजपुर के एसपी अमित कुमार अपने इंस्पेक्टर बच्चा यादव से तमाम केस को दिखाते हुए कहते हैं कि "यह ऐसे तमाम केस जो तुम्हें दिये गये तुमने अपनी इमानदारी और दिन रात की मेहनत और लगन से काम करके इन पर फाइनल रिपोर्ट लगाई और मुजरिमों को अदालत से सज़ा दिलवाई पर जैसे ही "साधू यादव" से संबंधित इन फाईलों की ओर मैं देखता हूँ तो सोचता हूँ कि तुम्हारी इमानदारी और मेहनत को क्या हो जाता है"।

यही सवाल कल मेरे दिमाग में तब गूँजा जब उच्चतम न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध सुनवाई पर टिप्पणी करते हुए कही कि "लोकतंत्र की हत्या हो रही है तो हम मूक दर्शक बन कर नहीं रह सकते" उच्चतम न्यायालय का यह व्यवहार बिल्कुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह था। क्युँकि जब मुसलमानों से संबंधित विषयों पर इसी तरह "लोकतंत्र की हत्या" होती है तो उच्चतम न्यायालय "मूक दर्शक" बन कर सदैव रहा है । आजादी से आजतक कोई एक मामले पर ऐसा फैसला जो देश के मुसलमानों के हक में उच्चतम न्यायालय ने दिया हो मुझे याद नहीं आता, फैसला तो छोड़िए एक टिप्पणी भी हक में आई हो मुझे याद नहीं पड़ती ।

इसी उच्चतम न्यायालय ने "बाबरी मस्जिद" के मामले में यथास्थिति रखने के अपने आदेश, 6 दिसम्बर के पूर्व बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए कल्याण सिंह से लिए "शपथपत्र", संसद को विश्वास में लेने कि "बाबरी मस्जिद" की सुरक्षा की जाएगी, जैसे तमाम संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रयासों को ध्वस्त करते हुए "बाबरी मस्जिद" उसी कल्याण सिंह ने ध्वस्त करा दी और लोकतंत्र की हत्या कर दी तब "उच्चतम न्यायालय" अपने ही आदेश की अवमानना पर "मूकदर्शक" बना रहा और बहुत किया तो लोकतंत्र के उस हत्यारे को मात्र "24 घंटे" की पिकनिक मनाने के लिए जेल भेजती है जो 6 दिसम्बर की घटना पर गर्व करता रहा है बार बार करता रहा है। 

गर्व किस बात का ? उच्चतम न्यायालय के आदेश, शपथपत्र, संसद और संविधान की हत्या पर गर्व, और उच्चतम न्यायालय मूक दर्शक बनकर बैठा रहता है, बिलकुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह जो साधू यादव और उसके पुत्र से संबंधित अपराधों पर चुप्पी साध लेता है ।

मुसलमानों से संबंधित तमाम विषयों पर तमाम न्यायिक जाँच आयोग भारत की ही सरकारों ने बनाए जिसके मुखिया मुसलमान नहीं थे, जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग, जस्टिस सच्चर आयोग, जस्टिस  काटजू आयोग, जस्टिस श्रीकृष्णा आयोग तथा जस्टिस लिब्राहन आयोग इत्यादि इत्यादि आयोग जो कि मुसलमानों से संबंधित मामले और उनके हक, बर्बादी, तबाही, खूनखराबे तथा हक माँगते इन आयोग की रिपोर्ट की वही सरकारें चिता जला देती हैं जिनका उन्होंने ही गठन किया होता है पर उच्चतम न्यायालय सरकार से यह नहीं पूछती कि जब कार्यवाही करना नहीं तो ऐसे ईमानदार पूर्व न्यायाधीशों को आयोग का प्रमुख बनाकर उनका अपमान क्यों किया जाता है ? 
परन्तु यही उच्चतम न्यायालय क्रिकेट के सुधार के लिए बनी जस्टिस लोढ़ा कमेटी की आज से एक महीने पहले आई रिपोर्ट को लागू करने के लिए आदेश पर आदेश सुनाती है तो हैरानी होती है कि उपरोक्त आयोग की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को क्यूँ नहीं दिखते ? या देख कर भी उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनी रहती है ?

लिब्राहन आयोग ने अपनी जाँच में 68 लोगों को दोषी पाया जिन्होंने "बाबरी मस्जिद" को ध्वस्त करने की साजिश रची और ध्वस्त करके "लोकतंत्र" की हत्या की परन्तु 24 वर्ष बाद भी यही उच्चतम न्यायालय "बच्चा यादव" की तरह मूक दर्शक आजतक बना हुआ है जबकि उन 68 दोषियों में कितने तो बिना सज़ा पाए तिरंगे में लपेट कर राजकीय सम्मान के साथ दुनिया से विदा हो गये और उनकी मृत्यु पर "राजकीय शोक" तक मनाया गया ।

क्यों "मूकदर्शक" बन जाती है "उच्चतम न्यायालय" गुजरात के 3000 बेगुनाह लोगों की हत्या पर और उस समय के राज्य के मुखिया जिन पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी और 3000 हत्याएँ बताती हैं कि वह अपनी जिम्मेदारी में विफल हुए, उनके अनेकों अनेक अप्रत्यक्ष और सांकेतिक बयान बताते हैं कि 3000 हत्याएँ उनके ही अप्रत्यक्ष आदेश पर हुईं, तो क्यों "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनकर "क्लीनचिट" पर "क्लीनचिट" देता चला जाता है ? राज्य के मुखिया के रूप में क्या वह इन हत्याओं के जिम्मेदार नहीं ?

गर्भवती महिलाओं के पेट चीरकर अजन्मे शिशु निकाल लिए जाते हैं, उस शिशु को त्रिशूल में गोद कर झंडे की तरह लहराया जाता है तो उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनकर चुप अजन्मे रहा ? गोधरा कांड हो या गुजरात दंगे के लगभग सभी सजायाफ्ता मुजरिमों को जिनको फाँसी पर लटका कर एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए था उनमें गुजरात दंगों के लगभग सभी दोषी "माया कोडनानी तथा बाबू बजरंगी" समेत सबके सब किसी ना किसी आधार पर बाहर घूम रहे हैं, क्यों ? 
और गोधरा के दोषी ऐसी ही घटनाओं के कारण जेल में सड़ रहे हैं क्यों ? उच्चतम न्यायालय क्यों "मूकदर्शक" बनकर बैठ जाती है ? 

हाशिमपुरा में 40 मुसलमानों को पीएसी के जवान भूनकर नहर में फेक देते हैं और लगभग 30 वर्ष मुकदमा चलने के बाद उनको बाईज्जत बरी कर दिया जाता है, हाशिमपुरा हत्याकांड की फाईलों को गायब कर दिया जाता है और "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनी रहती है तो यह भी सवाल नहीं करती कि यदि आरोपी निर्दोष हैं तो 40 लोगों की हत्या करने वाले कौन थे कहाँ हैं ?

कभी "सिमी" तो कभी "इंडियन मुजाहिदीन" जैसे छद्म संगठन जिसका कोई आस्तित्व ही नहीं तो कभी अलकायदा और अब "आइएस" के नाम पर सरकार जब चाहे मुसलमानों को उठाकर आतंकवादी बता देती है और जेलों में ठूसकर देश को अपनी चाकचौबंद व्यवस्था होने का एहसास दिलाती है, 10-10 वर्ष 15-15 वर्ष बाद यह जेल में ज़िन्दगी बर्बाद करके यही "सिमी" "इंडियन मुजाहिदीन" "अलकायदा" और अब "आइएस" के आतंकवादी बिना सबूतों के आधार पर बाईज्जत रिहा हो जाते हैं तो भी "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बन कर बैठी रहती है और एक सवाल नहीं पूछती कि सबके सब आतंकवादियों के विरुद्ध सबूत क्यों नहीं हैं और सबूत नहीं है तो किस आधार पर 10-15 वर्ष जेलों में बंद किये जाते रहे हैं, किस आधार पर उनपर आतंकवादी का टैग गिरफ्तार करते ही लगा दिया जाता है।

महाराष्ट्र के हेमंत करकरे ने संघ के लोगों को 12 आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के सबूत इकट्ठा करके लोगों को गिरफ्तार किया और "सिमी" पर ऐसे ही आरोपों से प्रतिबंध तो लग गया पर "संघ" देश पर शासन कर रहा है और उच्चतम न्यायालय उसी इंस्पेक्टर "बच्चा यादव" की तरह चुप है तो क्यों चुप है ? उच्चतम न्यायालय तो इस देश के लोकतंत्र और न्याय का प्रहरी है ? तो देश के एक वर्ग के साथ ही होता अन्याय उस प्रहरी को क्यों नहीं दिखता ? और दिखता है तो देखकर भी "मूकदर्शक" क्यों बना बैठा रहता है ? बच्चा यादव की तरह।

उसी "गंगाजल" फिल्म में आगे इंस्पेक्टर बच्चा यादव "साधू यादव" के विरुद्ध कार्यवाही करता है तो उसकी आँख फोड़कर हत्या कर दी जाती है । कहीं उच्चतम न्यायालय को यही डर तो नहीं ? जो साधू यादव ( संघ ) के विरुद्ध कार्यवाही से रोक तो नहीं रहा ? कहीं साधू यादव का डर उच्चतम न्यायालय को मुसलमानों से संबंधित मामलों में मूकदर्शक बनने को बाध्य तो नहीं कर रहा है ? या उच्चतम न्यायालय में सब साधु यादव के लोग ही बैठे हैं ?

Thursday, January 07, 2016

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के 'अहम' से हुआ 'नाकाम' पठानकोट ऑपरेशन!


आधिकारिक सूचनाओं के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पास पहले से ही एक जनवरी के सुनियोजित हमले के प्लान की खुफ़िया जानकारी थी.
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि पठानकोट हमले पर भारत की प्रतिक्रिया बिल्कुल नौसिखिया थी- आक्रमण अपर्याप्त था, कई फोर्स एक साथ ऑपरेशन में शामिल थीं, इसके बाद उपयुक्त हथियारों की कमी ने पूरे ऑपरेशन को करीब-करीब नाकाम कर दिया.
जब हमले शुरू हुए तब अजित डोभाल ने 150 एनएसजी कमांडोज़ को माणेसर से एयरलिफ्ट कराकर अनजान इलाके में लड़ने के लिए भेज दिया.
मिशन का नेतृत्व एनएसजी, डिफेंस सर्विस कॉर्प्स और वायु सेना के गरुड़ स्पेशल फोर्सेस को सौंप दिया गया.
डिफेंस सर्विस कॉर्प्स, सेवानिवृत और प्रेरणाविहीन सैनिकों का समूह है तो वहीं गरुड़ भारत की बढ़ते स्पेशल फोर्सेस के भीड़ के बीच अपने लिए औचित्य तलाश रहा है.
ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे ऑपरेशन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए डोभाल ने पठानकोट में पहले से तैनात 50 हज़ार सैनिकों को नज़रअंदाज़ कर दिया जो संभवतः पूरे देश में सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है.
रिपोर्टों की मानें तो डोभाल ने सेना प्रमुख से महज़ 50 से 60 फौजियों की टुकड़ी ऑपरेशन के बैक-अप के लिए मांगी थी.
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक सेना के पास कश्मीरी घुसपैठियों से लड़ने का ज्यादा अनुभव है.
एनएसजी इलाके से वाकिफ़ नहीं थी जिससे उसे नुकसान का सामना करना पड़ा जिससे बड़ी आसानी से बचा जा सकता था. इ
समें एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन कुमार भी शामिल हैं जिनकी मौत एक फंसे हुए चरमपंथी के शरीर में लगे ग्रेनेड फटने से हुई थी.
इस विस्फोट में चार अन्य एनएसजी कमांडोज़ घायल हो गए.
माना जा रहा है कि अगर सेना उनकी जगह होती तो चरमपंथियों के इस फंदे में कभी न फंसती क्योंकि वो इस तरफ के हमले से वाकिफ़ है.
सैन्य सूत्रों के मुताबिक एनएसजी के पास पठानकोट जैसे ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए नाइट विज़न डिवाइस और दूसरे ज़रूरी साजो-सामान तक नहीं थे.
चार दिन तक चले ऑपरेशन में सेना की भूमिका सीमित थी.
हालांकि ऑपरेशन के 48 घंटे बीत जाने के बाद और मोदी, राजनाथ, पर्रिकर के ऑपरेशन के सफलतापूर्वक समाप्त होने की घोषणा के बाद करीब 200 सैनिकों को तैनात किया गया.
चार चरमपंथियों को मार गिराने के बाद प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षा मंत्री के बधाई संदेश आए. लेकिन इसके तुरंत बाद दोबारा गोलीबारी शुरू हो गई.
इससे इस बात पर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि 1,200 हेक्टेयर में फैले एयरबेस में कितने बंदूकधारी छुपे हुए थे.
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक सोमवार रात तक रुक-रुककर गोलीबारी और ग्रेनेड धमाके एयरबेस के अंदर से सुनाई पड़ रहे थे. हालांकि कोई भी ज़मीनी हक़ीक़त से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं था.
सोमवार दोपहर को उप एनएसजी कमांडो मेजर जेनरल दुष्यंत सिंह ने कहा कि ऑपरेशन अपने आखिरी चरम पर था.
जबकि मंगलवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने प्रेस वार्ता में कहा कि 6 चरमपंथियों को मार गिराया गया है. लेकिन पूरे एयरबेस को खाली कराने में अभी समय लगेगा.
पर्रिकर ने उस वक्त कहा था कि ऑपरेशन में कुछ खामियां हैं. हालांकि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया है.
समीक्षकों के मुताबिक 2008 मुंबई हमलों में हुए 166 लोगों की मौत के वक्त भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने जो गलतियां की थीं वे पठानकोट में भी दोहराई गईं क्योंकि किसी तय नीति के तहत ऑपरेशन को अंजाम नहीं दिया गया.
मुंबई हमलों के वक्त शुरू में 10 बंदूकधारियों के विरुद्ध स्थानीय पुलिस बल को तैनात किया गया था. बाद में उनकी जगह मार्कोस स्पेशल कमांडोज़ को लड़ने के लिए भेजा गया.
इसके बाद सैन्य कमांडोज़ ने मुंबई के तीनों हमले वाले इलाकों, दो होटल और एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र में मार्कोस की जगह ले ली.
बाद में एनएसजी ने सेना की जगह ली जिन्हें मुंबई पहुंचने में 12 घंटे का वक्त लगा.
सैन्य समीक्षक, सेवानिवृत मेजर जेनरल शेरू थपलियाल के मुताबिक पठानकोट ऑपरेशन में सुरक्षा एजेंसियों के क्रम और किसी एक के हाथों में कंट्रोल न होने से लड़ाई के नतीजे पर बुरा असर पड़ा.
उनके मुताबिक चार दिनों का वक्त पांच से छह चरमपंथियों को मार गिराने, वो भी एक सीमित जगह पर समझ के परे और अस्वीकार्य है.
लेकिन इस ऑपरेशन की एक सबसे महत्वपूर्ण बात रही कि चरमपंथी वायु सेना की संपत्ति, जैसे मिग-21 हेलीकॉप्टर का नुकसान नहीं कर पाए.
पठानकोट एयरफोर्स बेस पर चरमपंथी हमले पर काबू पाने में भारतीय अधिकारियों को चार दिन लग गए.
पाकिस्तानी सीमा के नज़दीक स्थित इस बेस पर हुए हमले में सात भारतीय सैनिक मारे गए जबकि 22 अन्य घायल हो गए.
मेरे हिसाब से सुरक्षा ऑपरेशन का संचालन पूरी तरह विफल रहा.

Wednesday, January 06, 2016

पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि बातचीत की प्रक्रिया चलती रहे अपने आप में सवाल है


तो पठानकोट हमला अपने आप में दो सवाल है। पहला, टैरर अटैक है या फिर पाकिस्तानी सेना की मदद से किया गया आतंकियों का सैनिक ऑपरेशन। और दूसरा भारतीय सुरक्षा एजेंसियों में आपसी तालमेल नहीं है या फिर सैनिक ट्रैनिंग के साथ आये आंतकवादियों के हमले को रोकने की कोई तैयारी नहीं है। दोनों हालात 67 घंटों के दौर में ही उभरे। और इन दोनों हालातों से आगे सबसे खतरनाक हालात यह भी रहे कि पहली बार एनएसजी के जवान आपरेशन शुरु होने से पहले ग्राउंड जीरो पर पहुंच चुके थे। यानी ऑपरेशन रात दो से तीन के बीच शुरु हुआ। जबकि एनएसजी के जवान एक जनवरी को रात ग्यारह बजे तक पठानकोट एयरबेस के भीतर पहुंच चुके थे। बावजूद इसके 7 सुरक्षाकर्मियों की शहादत हुई। 21 गंभीर रुप घायल हुये। और जिस तरह तीन दिन तक पठानकोट के भीतर बाहर आतंक के दायरे में देश बंधक सरीखा लग रहा था वह पहली बार इसके संकेत देता है कि हमलावर आंतकी जरुर थे लेकिन उनकी ट्रेनिग सेना के ऑपरेशन की तरह थी। क्योंकि एयरबेस के भीतर एनएसजी ने भी अपना आपरेशन क्लीन तरीके से किया। लेकिन डिफेन्स सिक्यूरटी कोर की ट्रेनिग की कमी, पुलिस, खुफिया एजेंसी और सेना के बीच तालमेल की कमी, जल्दबाजी में आरपेशन खत्म करने की सोच ने ही सात जवानो को शहीद कर दिया। 
क्योंकि आतंकवादियो ने एयरबेस में घुसते ही निशाने पर सबसे पहले यूनिफार्म में मौजूद चौकीदार जो कि डिफेन्स सिक्यूरटी कोर कहलाते है उसे लिया। जिन्हें कोई ट्रेनिग नहीं होती है कि ट्रेन्ड आतंकवादियो से कैसे लड़ना है। चार सुरक्षाकर्मी तुरंत मारे गये। एक सुरक्षा कर्मी एक आतंकी को मारने के बाद मारा गया। एयरफोर्स का एक जवान मुठभेड़ के दौरान मारा गया। और एमएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन की शहादत तब हुई जब जल्दबाजी में ऑपरेशन खत्म कर आतंकियों के बॉडी हटाने की प्रक्रिया शुरु हुई। और आखरी सवाल आईबी का काम भी क्या सिर्फ अलर्ट के साथ खत्म हो गया और जब पठानकोट जैसी महत्वपूर्ण जगह पर सेना की टुकड़ी तक मौजूद रहती है तो उसे तत्काल सक्रिय क्यों नहीं किया गया। और समूचा आपरेशन दिल्ली से ही एनएसजी के आपरेशन को क्यों जा टिका। यानी शुक्रवार को पहले अलर्ट के बाद 36 घंटे तक जो पठानकोट पूरी तरह सेना के जरीये सीज किया जा सकता था वह क्यों नहीं हुआ।

तो क्या देश के सबसे सुरक्षित और सबसे महत्वपूर्ण एयरबेस की सुरक्षा को लेकर हमारे सामने सवाल ही ज्यादा है । खासकर तब जब 18 किलोमीटर में फैले पठानकोट एयरबेस के भीतर सैनिको के परिवारो का एक शहर भी है। जिसके भीतर अस्पताल से लेकर स्कूल और बाजार से लेकर पार्क तक है। यानी छह किलोमीटर में शहर तो बाकि एयरबेस। और आतंकी यहा तक पहुंचे और तीन दिन बाद भी आपरेशन जारी है तो पांच बड़े सवाल हैं। पहला, हार्ड इनपुट होते हुये भी सिक्यूर्टी ग्रिड अलर्ट क्यों नहीं हुआ। दूसरा. आतंकवादी जब कश्मीर छोड़ मैदानी इलाको को चुन रही है तो हम कितने तैयार है। तीसरा, क्या सभी राज्यों के पास आंतकवाद से निपटने का इन्फ्रास्ट्रक्चर है। चौथा, आतंक को लेकर एनसीटीसी पर बहस फिर होगी या सहमति का कोई रास्ता बनेगा। और पांचवां अगर आंतकवादी मल्टी सिटी-मल्टी टारगेट को लेकर चले तब हमारा क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप क्या करेगा। यानी इन सवालों का जबाब देने की तैयारी से पहले यह जरुर सोचना होगा कि पठानकोट एयरबेस वह जगह है जहां से दुशमनों के दांत खट्टे करने की लिए सेना मौजूद रहती है और वही जगह पहली बार आ तंकवादियो के निशाने पर आ गई। इससे पहले गुरुदासपुर में भी निशाने पर सुरक्षाकर्मी ही थे। और सीमापार से घुसपैठ की जगह भी कमोवेश वही थी जो गुरुदासपुर के वक्त थी। यानी सवाल सिर्फ देश के भीतर आतंकवाद से लड़ने की तैयारी भर का नहीं है बल्कि पठानकोट का संदेश साफ है कि सीमा पार की नीति ही भारत को लेकर आतंकवाद के जरीये सौदेबाजी की है तो फिर पाकिस्तान को लेकर क्यो करना होगा इसकी रणनीति भी नयी बनानी होगी।

क्योंकि भारत- पाकिसातन के प्रधानमंत्रियों की आपसी मुलाकात हो या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारो की आपसी मुलाकात। पदो के लिहाज दोनों मुलाकात दो बराबर पदों के व्यक्तियों की मुलाकात कही जा सकती है। लेकिन सवाल जब पाकिस्तान का होगा तो समझना होगा कि आखिर जनरल राहिल शरीफ को भरोसे में लिये बगैर कोई मुलाकात किसी अंजाम तक पहुंच नहीं सकती और पठानकोट हमले के बाद तो यह सवाल कहीं ज्यादा गहरा गया है कि आखिर अब दोनों देशों का रुख होगा क्या। क्योंकि आतंकवादियों के पीछे पाकिस्तानी सेना थी इसे भारत में माना जा रहा है। और आतंकवादियो के खिलाफ पूरा आपरेशन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल की निगरानी में चल रहा है। इसे हर कोई मान रहा है। और भारत में यह माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना के नुमाइन्दे के तौर पर नवाज शरीफ के साथ बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नासीर खान जांजुआ की नियुक्ति के पीछे राहिल शरीफ ही है। यानी प्रधानमंत्री मोदी चाहे मुलाकातों का सिलसिला बढाये और बातचीत के अलावे पाकिस्तान के साथ संबंधों की डोर मजबूत करने की दिशा में अपने कदम दिखाये। लेकिन पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि इसके बाद बातचीत किस जमीन पर खड़े होकर किया जाये यह अपने आप में सवाल है । यानी विदेश सचिवो की मुलाकात में बात क्या होगी । डोभाल और जांजुआ की मुलाकात से निकलेगा क्या । यानी सवाल अब मुलाकात से आगे पाकिस्तान में इसी बरस होने वाले सार्क सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के जाने या ना जाने का भी होगा। क्योकि अर्से बाद भारत के साथ रिश्तो की डोर पाकिस्तान में दो अलग अलग छोरों पर खिंची जाती दिखायी दे रही है। क्योंकि भारत के रुख को लेकर एक तरफ नवाज शरीफ हो तो दूसरी तरफ राहिल शरीफ। और इन दोनो के बीच प्रधानमंत्री मोदी संबंधों को पटरी पर लाने के लिये इतिहास रचने को बेताब हैं। जबकि पाकिस्तान पहली बार भारत को लेकर उस मोड़ पर जा खड़ा है जहां सेना और चुनी हुई सत्ता में ही खुली तकरार है। इसीलिये पहली बार आतंकवादी संगठनों को कैसे कब उपयोग में लाना है यह भी पठानकोट हमलो के बाद नजर आने लगा है।

पाकिस्तान के पन्नों को ही पलटे तो जनरल मशर्रफ से लेकर जनरल राहिल शरीफ। और हाफिज सईद से लेकर अजहर मसूद। बीच में सैय्यद सलाउद्दीन। पाकिस्तान में भारत के खिलाफ कश्मीर का सवाल हो या आतंक की चौसर पर डिप्लोमैसी का सवाल। बीते 19 बरस के दौर में इन्ही किरदारो के आसरे आंतक को स्टेट पालेसी बनाकर जो चाल चली गई भारत उसी में उलझ कर संबंधो की डोर कभी पड़ोसी के नाते तो कभी अंतराष्ट्रीय दबाव में उलझता रहा । सत्ता पलट के बाद जनरल मुशर्रफ ने वक्त के लिहाज से सैयद सलाउद्दीन को सबसे पहले कश्मीर का स्वतंत्रता सैनानी बताकर सियासत साधनी शुरु की । तो जनरल राहिल शरीफ ने अब सैय्यद सलाउ्द्दीन को उस मोड़ पर सामने ला खड़े किया जब आंतक पर नकेल कसने के लिये मोदी नवाज शरीफ एक रास्ते को पकड़ने निकल रहे है । क्योकि पठानकोट हमले की पहली जिम्मेदारी उस यूनाइटेड जेहाद काउंसिल ने ली जिसका चेयरमैन सैयद सलाउद्दीन है । काउसिंल में तमाम वही संगठन है जो कश्मीर की लड़ाई पाकिस्तान में बैठकर लड़ रहे है । यानी हाफिजद सईद भी सक्रिय है और अजहर मसूद भी । लेकिन जेहादी काउंसिल को कटघरे में खडा किया जाये तो पाकिस्तान के आंतक की जमीन पहली बार अलग दिखायी देने लगे । क्योंकि सैय्यद सलाउद्दीन कश्मीर से पाकिस्तान की जमीन पर पनाह लिये हुये आंतकवादी है । तो हाफिज सईद और अजहर मसूद पाकिस्तान के ही नागरिक है । यानी पठानकोट का रास्ता कश्मीर के जेहाद से कैसे जोड़ा जाये और आंतक के इल्जाम से कैसे बचा जाये इसकी बिसात पर पहला पांसा यूनाइटेड जेहाद काउसिंल का नाम लेकर फेंका गया है । यानी यह चाल जैश-ए-मोहम्मद को कटघरे से बाहर देखने के है । क्योकि जैश पर आरोप लगते है तो सवाल पाकिस्तान की सत्ता और सेना पर उठेगें । फिर हाफिज सईद के बाद अजहर मसूद ही पाकिस्तान में सत्ता के लिये सबसे अनुकुल शख्स है जिसकी तकरीर पर गरीब-मुफलिस तबका फिदायिन बनने को तैयार हो जाता है ।

याद किजिये रिहाई के तुरंत बाद कराची में हथियारो के साये में जैश के अजहर मसूद की जो तस्वीर सामने आयी थी वह आंतक की तस्वीर थी । लेकिन लश्कर के आंतकी चेहरे के सामने धीरे धीरे् जैश कमजोर दिखायी देने लगा । और उसके बाद लगातार यही माना जाता रहा कि अजहर मसूद खुद कभी सामने नहीं आया लेकिन उन संगठनो को मदद देता रहा है जो इस्लाम के नाम पर आंतक का खुला खेल खेल रहे है । लेकिन पठानकोट हमले के बाद जिस तरह सारे तार जैश से जुडे उसमें पाकिस्तान के लिये भी मुसिबत पैदा हुई कि आंतक की डोर अगर कश्मीर से इतर पंजाब जा रही है तो फिर उसकी अपनी जमीन खिसकेगी इसलिये पठानकोट हमला भी कश्मीर के दायरे में ही दिखाने के लिये यूनाइटेड जेहादी काउसिंल ने श्रीनगर के एक समाचार एंजेसी सीएमएस को फोन कर पठानकोट हमले की जिम्मेदारी ले ली ।

ऐसे में आखरी सवाल यही है कि आखिर भारत करे तो क्या करें । क्योंकि पठानकोट एयरबेस पर हुये हमले ने प्रधानमंत्री मोदी के 19 महीने की उस कवायद को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिस आसरे एक दो नहीं बल्कि पांच मुलाकात पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ से की । पांचों मुलाकात कुछ इस तरह की गई जिसने बार बार देश को चौकाया । पीएम बनते ही शपथ के वक्त नवाज शरीफ को बुलाना हो या फिर अचानक काबुल से लाहौर पहुंचकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देना । नेपाल में हाथ मिलाना हो या पेरिस में गुफ्तगु करना । हर मुलाकात में मोदजी ने देश कौ चौकाया । तो क्या देश को चौकाते वक्त प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के साथ भारत के जटिल रिश्तो की डोर को समझ नहीं पाये । जिसपर से वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह गुजर चुके है । याद कीजिये 2001 में संसद पर हुआ हमला हो या 2008 में मुंबई पर हुआ हमला। तब की सरकारों ने पाकिस्तान को क्या संदेश दिया। संसद पर लशकर के हमले के बाद तब के पीएम अटलबिहारी वाजपेयी ने तो आर पार की लड़ाई का एलान कर दिया था। और मुंबई हमलों के बाद तो मनमोहन सरकार ने पाकिस्तान से बातचीत के ना सिर्फ हर रास्ते को बंद किया बल्कि पीओके में आंतकी कैपो पर हमले तक का जिक्र कर दिया । यानी यह बोली नरेन्द्र मोदी के उस एलान से भी कई कदम आगे की रही जिसका जिक्र मोदी पीएम बनने से पहले पाकिस्तान को लेकर करते रहे।

तो क्या इतिहास को पढ़ने-समझने के बदले मोदी सरकार इतिहास रचने की बेताबी में जा फंसी। इसीलिये कभी हा कभी ना की सोच इस तरह खुलकर कहती रही जिससे कभी लगा कि मोदी सरकार वाकई पाकिस्तान को पाठ पढ़ाना चाहती है तो कभी लगा मोदी सरकार पाकिस्तान को ना बदलने वाले पड़ोसी की तर्ज पर देख रही है । क्योंकि एक सिर के बदले दस सिर का जिक्र करने वाली सुषमा स्वराज भी मुंबई हमलो के दोषी लखवी के जेल से छूटने पर पाकिस्तान से कोई बातचीत ना करने को कहती है। और इसके बाद इस्लामाबाद जाकर कैंडल लाइट डिनर करने से नहीं चुकती। तो रक्षा मंत्री पारिकर भी साल भर पहले पाकिस्तान को चेताते नजर आते है। लेकिन मोदी लाहौर जाकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देते है तो पर्रिकर भी बदलते है और मोदी सरकार का हर मंत्री ही नहीं बीजेपी से लेकर संघ परिवार भी पाकिस्तान को लेकर संबंधो की आस बनाता नजर आता है। क्योंकि मोदी की नवाज से दोस्ती में ही रिश्तो की नई डोर खोजी जाती है । लेकिन महज हफ्ते भर के भीतर ही रिश्तो की इस डोर में पहली गांठ पठानकोट में अगर लगती है तो सवाल फिर वहीं आ अटकता है कि अब आगे क्या ?
पुण्य प्रसून बाजपेयी

Friday, December 18, 2015

महीनों से भुखमरी का शिकार है ‘अल क़ायदा आतंकी’ का परिवार

Friday, December 11, 2015

बोलो खरीदोगे ?

Monday, April 27, 2015

मेरे साथ आठ माह तक रोज़ हुआ गैंग रेप


गुजरात के बोटाड ज़िला के देवालिया गांव में कांसे और स्टील के बर्तनों से सजे कमरे में एक चारपाई पर वह चुपचाप लेटी हुई हैं और उसके बच्चे उसके पास बैठे हैं.

गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह उन्हें खेलते हुए देखती रहती हैं और सिर्फ़ रोज़मर्रा के कामकाज निपटाने या अपनी आठ महीने की दर्दनाक कहानी पुलिस या मीडिया वालों को सुनाने के लिए ही उठती हैं.
सामूहिक बलात्कार की शिकार 23 साल की यह युवती बताती हैं, "उन्होंने करीब आठ महीने तक रोज़ मेरा बलात्कार किया. चार लोग तो नियमित थे, बाकी आते-जाते रहते थे. अगर मैं कुछ ऐसा करती जो उन्हें पसंद न आता तो वह मुझे पीटते. मुझे रोने में भी डर लगता था."
कभी एक ख़ुश बेटी, बीवी और मां रही इस युवती के सात माह के गर्भ को गिराने की याचिका को पिछले हफ़्ते गुजरात उच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया.

अब वह अपने मायके में ही रह रही है. उसके मां-पिता की नज़रें भी उसी पर टिकी रहती हैं.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह कहती हैं, "यह मेरे बलात्कारियों का बच्चा है. मैं इसकी मां हूं लेकिन अगर यह बच्चा मेरे साथ रहेगा तो कोई भी मुझे और मेरे परिवार को स्वीकार नहीं करेगा. अदालत ने गर्भपात की इजाज़त नहीं दी. मैं सरकार से प्रार्थना करती हूं कि वह इस बच्चे को अपने सरंक्षण में ले ले और किसी अनाथालय में दे दे."
परिवार के अंदर बेचैनी साफ़ नज़र आती है. पीड़िता अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को त्यागने के विचार से शायद पूरी तरह सहमत नहीं है.
बच्चे को अपने पास रखने के सवाल पर वह चुप हो जाती हैं और धीरे से अपनी मां की ओर देखती हैं. उनकी मां जवाब देती हैं, "यह बच्चे को कैसे रख सकती है? अगर यह ऐसा करेगी तो समाज और गांव हमें बहिष्कृत कर देगा. मेरे दो और बच्चे हैं. मेरा 14 साल का लड़का कुंवारा रह जाएगा. कोई भी हमारी इज़्ज़त नहीं करेगा."
वो कहती हैं, "यह मां है लेकिन बच्चा बलात्कारियों का है, हम उसे नहीं रख सकते."

जब मां यह कह रही थी तो पीड़िता एक कुर्सी पर सिर झुकाए और पल्ला ओढ़े बैठी हुई थीं.
वह उस दहशत और सदमे के बारे में बात भी मुश्किल से ही कर पाती हैं. उन दिनों का ज़िक्र उसकी आँखों में आँसू ले आता है.
अपने 18 महीने के बेटे को खेलता देखते हुए वह कहती हैं, "रात को वह जंगल में ख़रगोश और काले हिरने का शिकार करने जाते. दो लोग मेरे साथ रुक जाते और गलत काम (बलात्कार) करते. फिर उन दो की जगह दूसरे दो आ जाते. महीनों तक हर रात यही होता रहा."
पीड़िता के ससुरालवालों ने उसे घर में घुसने से रोका तो उसके पति भी घर छोड़कर साथ ही आ गए.
वह कहती हैं, "एक रात जब मेरे अपहरणकर्ताओं ने एक खरगोश को काटा तो उसके पेट में से दो नन्हें ख़रगोश निकले. मैं खुद को रोक नहीं पाई और तुरंत उनमें से एक को उठा लिया जिसने मेरी उंगलियां कुतरनी शुरू कर दीं. इससे मुझे अपने बच्चों की याद आ गई और मैंने रोना शुरू कर दिया."

गुजरात, बलात्कार पीड़ितपुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने सात लोगों को नामजद किया है और बताया है कि वह उसे लगातार पीटते थे.
बात करते हुए उसके हाथ और ज़बान कांपते हैं.
वो कहती है, "मुझे रोता देखकर एक को ग़ुस्सा आ गया और वो अपनी बंदूक से मुझे पीटने लगा जिसमें बाकी भी शामिल हो गए. उस घटना के बाद उन्होंने कुछ दिन तक मुझे भूखा रखा. मैंने खाना मांगा तो उन्होंने मुझे ख़रगोश का गोश्त दिया, जो मैं खा नहीं पाई."

पीड़िता के पति ने पिछले साल जुलाई में सूरत में अपनी पत्नी के लापता होने की पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. पीड़िता के अपहरण से पहले शहर में उनकी ज़िंदगी आराम से गुज़र रही थी.
पीड़िता के परिवार को उन्हें ढूंढने के लिए पुलिस और नेताओं के चक्कर काटने पड़े लेकिन कोई मदद नहीं मिली.
अभियुक्त दाफ़र समुदाय से हैं जो गुजरात की ख़ानाबदोश जाति है. पीड़िता गुजरात के देवी पूजक समुदाय की हैं.
पीड़िता की मांसात नामजद अभियुक्तों में से पांच को गिरफ़्तार कर लिया गया है. इस मामले में गुजरात पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे.
पीड़िता की मां कहती हैं, "उसके ग़ायब होने के कुछ दिन बाद मुझे उसके अपहरणकर्ताओं के बारे में पता चला. मैंने पुलिस को बताया तो उन्होंने कहा कि वह अपनी मर्ज़ी से उनके साथ रह रही है और उसने यह लिखकर दिया है कि उसके लिव-इन संबंध हैं. लेकिन कौन क़ैद रहने और बलात्कार किए जाने के लिए अपनी मर्ज़ी से काग़ज़ पर दस्तखत करता है. पुलिस ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया."
लेकिन इस मामले के जांच अधिकारी पुलिस उपाध्यक्ष तेजस पटेल इससे अनभिज्ञता जताते हैं, "पीड़िता या उसके परिवार के साथ इस तरह के व्यवहार के बारे में मुझे नहीं पता. हमने पांच अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया है. एक अभियुक्त, गांव के सरपंच ने अपनी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ अदालत से स्टे ऑर्डर ले लिया है और एक फ़रार है."

लेकिन पीड़िता और उनके परिजन पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हैं. पीड़िता के पारिवारिक दोस्त सरदारसिंह मोरी कहते हैं, "अपहर्ताओं के कब्ज़े से बच निकलने में कामयाब होने पर पीड़िता और उनकी मां घंटों तक जंगल में छुपे रहे, उसके बाद हिम्मत जुटाकर वह पुलिस के पास गए. लेकिन जैसी आशंका थी स्थानीय पुलिसकर्मियों ने शिकायत लिखने से इनकार कर दिया और फिर हमने महिला पुलिस हेल्पलाइन को फ़ोन किया जिसके बाद न चाहते हुए भी हमारी शिकायत लिखी गई."
पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए एफ़आईआर के 48 घंटे बाद ले जाया गया. हालांकि मामले के कोर्ट में जाने और राष्ट्रीय अख़बारों की सुर्खियां बनने के बाद गुजरात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले का निरीक्षण शुरू किया.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
इस मामले में पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर रोष का सामना कर रही गुजरात सरकार ने गुरुवार को पीड़िता को 20,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी.
उसके लिए अब बलात्कार और गर्भ में पल रहे बच्चे को पैदा करने की मुश्किल से ज्यादा बड़ी चुनौती है 'पवित्र' होने की कवायद को पार करना.
क्या होता है पवित्र करने का ये तरीका….??
बीबीसी हिंदी

Wednesday, December 04, 2013

बाबरी मस्जिद कि शहादत और अयोध्या में भगवान राम का आगमन


राम आये नगर में तो हलचल दिखी/
जिस शकल को पढ़ा उसपे ख़ुशियाँ लिखी/
जैसे लगता था आबो हवा है बिकी/
जिससे भगवान कि साँसे ख़ुद है रुकी/
शोर नारे हवाओं में सुनते रहे/
हर घड़ी कुछ सवालों को बुनते रहे/

क्या हुआ है मेरे घर में मजमा है क्यूँ/
नज़रें जैसे पड़ी भीड़ पर उनकी ज्यूँ/
देखा कुछ नौजवानों का शोरो फ़ुग़ाँ/
थोड़ा आगे बढ़े जल रही थी दुकाँ/
मुफ़लिसों और बेचारों के जलते मकाँ/
उनकी प्यारी अयोध्या में हर सू धुआँ/

तेज़ क़दमों से जब वो महल को चले/
रास्ते में लगे जैसे वहशत पले/
हर सिमत में वहाँ पे थे मजमें लगे/
उनके अपने महल में थे झंडे सजे/
सबकी शक्लों पे ख़ुशियों कि वहशत रजे/
जैसे हर एक डगर पर थे बाजे बजे/

सोचकर जैसे क़दमों से आगे बढ़े/
कुछ अवाज़ें थी कानों में कैसे लड़े/
फिर दुबारा महल कि थे सीधी चढ़े/
जिससे मजमें कि शक्लों को फिर से पढ़ें/
दूर नज़रों ने देखा कहीं पर धुआँ/
जल्दी जल्दी क़दम से वो पहुंचे वहाँ/

एक मजमा था उनकी सदा दे रहा/
और कहता गिरा दो ये ढाँचा यहाँ/
नामे बाबर मिटा दो सदा के लिए/
कह दो तैय्यार हैं वो सज़ा के लिए/
माँ के माथे का कालिख गिराएंगे हम/
राम के नाम को फिर सजायेंगे हम/

नामे भगवन का डंका बजायेंगे हम/
ए अयोध्या तेरे गीत गायेंगे हम/
इतना कहके वो मस्जिद गिराने लगे/
उनके क़ायद भी जल्दी से आने लगे/
नाम भगवन के सब गीत गाने लगे/
उसकी मिट्टी तिलक से सजाने लगे/

ज़ोर से शोर उट्ठा फ़लक गिर गया/
शर्म से सारे इन्सां का झुक सिर गया/
राम कहते रहे किसने क्या कर दिया/
मेरी आँखों को आंसू से क्यूँ भर दिया/
कौन है ये वहाँ पर जो सब कर रहे/
जिससे हर सिम्त इन्सां फ़क़त डर रहे/

पाक मेरी ज़मीं पर लहू बह गया/
क्यूँ सियासत में इन्सां ज़हर सह गया/
सदियों पहले ज़माने से मैं कह गया/
देखना था जो कलयुग में ये रह गया/
देखते देखते सारी धरती जली/
और सियासत कि गोदी में साज़िश पली/

मुल्क जलता रहा लोग बढ़ते रहे/
सीढ़ियां सब सियासत कि चढ़ते रहे/
ख़ौफ़ सारी नज़र में वो गढ़ते रहे/
सारे इंसान आपस में लड़ते रहे/
सदियों सदियों का रिश्ता कहाँ खो गया/
बोले लक्ष्मण से भाई ये क्या हो गया/

कौन रंजिश दिलों में यहाँ बो गया/
सारे दिल से मुहब्बत को ख़ुद धो गया/
पलमें ख़ुशियों का अम्बर कहाँ सो गया/
कुछ न बोले लबों से था दिल रो गया/
कौन थे मुझसे ही साज़िशें कर गए/
मेरी अपनी अयोध्या में लड़ मर गए/....
-सलमान रिज़वी