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Thursday, January 07, 2016

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के 'अहम' से हुआ 'नाकाम' पठानकोट ऑपरेशन!


आधिकारिक सूचनाओं के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पास पहले से ही एक जनवरी के सुनियोजित हमले के प्लान की खुफ़िया जानकारी थी.
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि पठानकोट हमले पर भारत की प्रतिक्रिया बिल्कुल नौसिखिया थी- आक्रमण अपर्याप्त था, कई फोर्स एक साथ ऑपरेशन में शामिल थीं, इसके बाद उपयुक्त हथियारों की कमी ने पूरे ऑपरेशन को करीब-करीब नाकाम कर दिया.
जब हमले शुरू हुए तब अजित डोभाल ने 150 एनएसजी कमांडोज़ को माणेसर से एयरलिफ्ट कराकर अनजान इलाके में लड़ने के लिए भेज दिया.
मिशन का नेतृत्व एनएसजी, डिफेंस सर्विस कॉर्प्स और वायु सेना के गरुड़ स्पेशल फोर्सेस को सौंप दिया गया.
डिफेंस सर्विस कॉर्प्स, सेवानिवृत और प्रेरणाविहीन सैनिकों का समूह है तो वहीं गरुड़ भारत की बढ़ते स्पेशल फोर्सेस के भीड़ के बीच अपने लिए औचित्य तलाश रहा है.
ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे ऑपरेशन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए डोभाल ने पठानकोट में पहले से तैनात 50 हज़ार सैनिकों को नज़रअंदाज़ कर दिया जो संभवतः पूरे देश में सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है.
रिपोर्टों की मानें तो डोभाल ने सेना प्रमुख से महज़ 50 से 60 फौजियों की टुकड़ी ऑपरेशन के बैक-अप के लिए मांगी थी.
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक सेना के पास कश्मीरी घुसपैठियों से लड़ने का ज्यादा अनुभव है.
एनएसजी इलाके से वाकिफ़ नहीं थी जिससे उसे नुकसान का सामना करना पड़ा जिससे बड़ी आसानी से बचा जा सकता था. इ
समें एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन कुमार भी शामिल हैं जिनकी मौत एक फंसे हुए चरमपंथी के शरीर में लगे ग्रेनेड फटने से हुई थी.
इस विस्फोट में चार अन्य एनएसजी कमांडोज़ घायल हो गए.
माना जा रहा है कि अगर सेना उनकी जगह होती तो चरमपंथियों के इस फंदे में कभी न फंसती क्योंकि वो इस तरफ के हमले से वाकिफ़ है.
सैन्य सूत्रों के मुताबिक एनएसजी के पास पठानकोट जैसे ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए नाइट विज़न डिवाइस और दूसरे ज़रूरी साजो-सामान तक नहीं थे.
चार दिन तक चले ऑपरेशन में सेना की भूमिका सीमित थी.
हालांकि ऑपरेशन के 48 घंटे बीत जाने के बाद और मोदी, राजनाथ, पर्रिकर के ऑपरेशन के सफलतापूर्वक समाप्त होने की घोषणा के बाद करीब 200 सैनिकों को तैनात किया गया.
चार चरमपंथियों को मार गिराने के बाद प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षा मंत्री के बधाई संदेश आए. लेकिन इसके तुरंत बाद दोबारा गोलीबारी शुरू हो गई.
इससे इस बात पर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि 1,200 हेक्टेयर में फैले एयरबेस में कितने बंदूकधारी छुपे हुए थे.
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक सोमवार रात तक रुक-रुककर गोलीबारी और ग्रेनेड धमाके एयरबेस के अंदर से सुनाई पड़ रहे थे. हालांकि कोई भी ज़मीनी हक़ीक़त से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं था.
सोमवार दोपहर को उप एनएसजी कमांडो मेजर जेनरल दुष्यंत सिंह ने कहा कि ऑपरेशन अपने आखिरी चरम पर था.
जबकि मंगलवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने प्रेस वार्ता में कहा कि 6 चरमपंथियों को मार गिराया गया है. लेकिन पूरे एयरबेस को खाली कराने में अभी समय लगेगा.
पर्रिकर ने उस वक्त कहा था कि ऑपरेशन में कुछ खामियां हैं. हालांकि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया है.
समीक्षकों के मुताबिक 2008 मुंबई हमलों में हुए 166 लोगों की मौत के वक्त भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने जो गलतियां की थीं वे पठानकोट में भी दोहराई गईं क्योंकि किसी तय नीति के तहत ऑपरेशन को अंजाम नहीं दिया गया.
मुंबई हमलों के वक्त शुरू में 10 बंदूकधारियों के विरुद्ध स्थानीय पुलिस बल को तैनात किया गया था. बाद में उनकी जगह मार्कोस स्पेशल कमांडोज़ को लड़ने के लिए भेजा गया.
इसके बाद सैन्य कमांडोज़ ने मुंबई के तीनों हमले वाले इलाकों, दो होटल और एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र में मार्कोस की जगह ले ली.
बाद में एनएसजी ने सेना की जगह ली जिन्हें मुंबई पहुंचने में 12 घंटे का वक्त लगा.
सैन्य समीक्षक, सेवानिवृत मेजर जेनरल शेरू थपलियाल के मुताबिक पठानकोट ऑपरेशन में सुरक्षा एजेंसियों के क्रम और किसी एक के हाथों में कंट्रोल न होने से लड़ाई के नतीजे पर बुरा असर पड़ा.
उनके मुताबिक चार दिनों का वक्त पांच से छह चरमपंथियों को मार गिराने, वो भी एक सीमित जगह पर समझ के परे और अस्वीकार्य है.
लेकिन इस ऑपरेशन की एक सबसे महत्वपूर्ण बात रही कि चरमपंथी वायु सेना की संपत्ति, जैसे मिग-21 हेलीकॉप्टर का नुकसान नहीं कर पाए.
पठानकोट एयरफोर्स बेस पर चरमपंथी हमले पर काबू पाने में भारतीय अधिकारियों को चार दिन लग गए.
पाकिस्तानी सीमा के नज़दीक स्थित इस बेस पर हुए हमले में सात भारतीय सैनिक मारे गए जबकि 22 अन्य घायल हो गए.
मेरे हिसाब से सुरक्षा ऑपरेशन का संचालन पूरी तरह विफल रहा.

Wednesday, January 06, 2016

पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि बातचीत की प्रक्रिया चलती रहे अपने आप में सवाल है


तो पठानकोट हमला अपने आप में दो सवाल है। पहला, टैरर अटैक है या फिर पाकिस्तानी सेना की मदद से किया गया आतंकियों का सैनिक ऑपरेशन। और दूसरा भारतीय सुरक्षा एजेंसियों में आपसी तालमेल नहीं है या फिर सैनिक ट्रैनिंग के साथ आये आंतकवादियों के हमले को रोकने की कोई तैयारी नहीं है। दोनों हालात 67 घंटों के दौर में ही उभरे। और इन दोनों हालातों से आगे सबसे खतरनाक हालात यह भी रहे कि पहली बार एनएसजी के जवान आपरेशन शुरु होने से पहले ग्राउंड जीरो पर पहुंच चुके थे। यानी ऑपरेशन रात दो से तीन के बीच शुरु हुआ। जबकि एनएसजी के जवान एक जनवरी को रात ग्यारह बजे तक पठानकोट एयरबेस के भीतर पहुंच चुके थे। बावजूद इसके 7 सुरक्षाकर्मियों की शहादत हुई। 21 गंभीर रुप घायल हुये। और जिस तरह तीन दिन तक पठानकोट के भीतर बाहर आतंक के दायरे में देश बंधक सरीखा लग रहा था वह पहली बार इसके संकेत देता है कि हमलावर आंतकी जरुर थे लेकिन उनकी ट्रेनिग सेना के ऑपरेशन की तरह थी। क्योंकि एयरबेस के भीतर एनएसजी ने भी अपना आपरेशन क्लीन तरीके से किया। लेकिन डिफेन्स सिक्यूरटी कोर की ट्रेनिग की कमी, पुलिस, खुफिया एजेंसी और सेना के बीच तालमेल की कमी, जल्दबाजी में आरपेशन खत्म करने की सोच ने ही सात जवानो को शहीद कर दिया। 
क्योंकि आतंकवादियो ने एयरबेस में घुसते ही निशाने पर सबसे पहले यूनिफार्म में मौजूद चौकीदार जो कि डिफेन्स सिक्यूरटी कोर कहलाते है उसे लिया। जिन्हें कोई ट्रेनिग नहीं होती है कि ट्रेन्ड आतंकवादियो से कैसे लड़ना है। चार सुरक्षाकर्मी तुरंत मारे गये। एक सुरक्षा कर्मी एक आतंकी को मारने के बाद मारा गया। एयरफोर्स का एक जवान मुठभेड़ के दौरान मारा गया। और एमएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन की शहादत तब हुई जब जल्दबाजी में ऑपरेशन खत्म कर आतंकियों के बॉडी हटाने की प्रक्रिया शुरु हुई। और आखरी सवाल आईबी का काम भी क्या सिर्फ अलर्ट के साथ खत्म हो गया और जब पठानकोट जैसी महत्वपूर्ण जगह पर सेना की टुकड़ी तक मौजूद रहती है तो उसे तत्काल सक्रिय क्यों नहीं किया गया। और समूचा आपरेशन दिल्ली से ही एनएसजी के आपरेशन को क्यों जा टिका। यानी शुक्रवार को पहले अलर्ट के बाद 36 घंटे तक जो पठानकोट पूरी तरह सेना के जरीये सीज किया जा सकता था वह क्यों नहीं हुआ।

तो क्या देश के सबसे सुरक्षित और सबसे महत्वपूर्ण एयरबेस की सुरक्षा को लेकर हमारे सामने सवाल ही ज्यादा है । खासकर तब जब 18 किलोमीटर में फैले पठानकोट एयरबेस के भीतर सैनिको के परिवारो का एक शहर भी है। जिसके भीतर अस्पताल से लेकर स्कूल और बाजार से लेकर पार्क तक है। यानी छह किलोमीटर में शहर तो बाकि एयरबेस। और आतंकी यहा तक पहुंचे और तीन दिन बाद भी आपरेशन जारी है तो पांच बड़े सवाल हैं। पहला, हार्ड इनपुट होते हुये भी सिक्यूर्टी ग्रिड अलर्ट क्यों नहीं हुआ। दूसरा. आतंकवादी जब कश्मीर छोड़ मैदानी इलाको को चुन रही है तो हम कितने तैयार है। तीसरा, क्या सभी राज्यों के पास आंतकवाद से निपटने का इन्फ्रास्ट्रक्चर है। चौथा, आतंक को लेकर एनसीटीसी पर बहस फिर होगी या सहमति का कोई रास्ता बनेगा। और पांचवां अगर आंतकवादी मल्टी सिटी-मल्टी टारगेट को लेकर चले तब हमारा क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप क्या करेगा। यानी इन सवालों का जबाब देने की तैयारी से पहले यह जरुर सोचना होगा कि पठानकोट एयरबेस वह जगह है जहां से दुशमनों के दांत खट्टे करने की लिए सेना मौजूद रहती है और वही जगह पहली बार आ तंकवादियो के निशाने पर आ गई। इससे पहले गुरुदासपुर में भी निशाने पर सुरक्षाकर्मी ही थे। और सीमापार से घुसपैठ की जगह भी कमोवेश वही थी जो गुरुदासपुर के वक्त थी। यानी सवाल सिर्फ देश के भीतर आतंकवाद से लड़ने की तैयारी भर का नहीं है बल्कि पठानकोट का संदेश साफ है कि सीमा पार की नीति ही भारत को लेकर आतंकवाद के जरीये सौदेबाजी की है तो फिर पाकिस्तान को लेकर क्यो करना होगा इसकी रणनीति भी नयी बनानी होगी।

क्योंकि भारत- पाकिसातन के प्रधानमंत्रियों की आपसी मुलाकात हो या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारो की आपसी मुलाकात। पदो के लिहाज दोनों मुलाकात दो बराबर पदों के व्यक्तियों की मुलाकात कही जा सकती है। लेकिन सवाल जब पाकिस्तान का होगा तो समझना होगा कि आखिर जनरल राहिल शरीफ को भरोसे में लिये बगैर कोई मुलाकात किसी अंजाम तक पहुंच नहीं सकती और पठानकोट हमले के बाद तो यह सवाल कहीं ज्यादा गहरा गया है कि आखिर अब दोनों देशों का रुख होगा क्या। क्योंकि आतंकवादियों के पीछे पाकिस्तानी सेना थी इसे भारत में माना जा रहा है। और आतंकवादियो के खिलाफ पूरा आपरेशन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल की निगरानी में चल रहा है। इसे हर कोई मान रहा है। और भारत में यह माना जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना के नुमाइन्दे के तौर पर नवाज शरीफ के साथ बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नासीर खान जांजुआ की नियुक्ति के पीछे राहिल शरीफ ही है। यानी प्रधानमंत्री मोदी चाहे मुलाकातों का सिलसिला बढाये और बातचीत के अलावे पाकिस्तान के साथ संबंधों की डोर मजबूत करने की दिशा में अपने कदम दिखाये। लेकिन पठानकोट ने संदेह की इतनी मोटी लकीर खिंच दी है कि इसके बाद बातचीत किस जमीन पर खड़े होकर किया जाये यह अपने आप में सवाल है । यानी विदेश सचिवो की मुलाकात में बात क्या होगी । डोभाल और जांजुआ की मुलाकात से निकलेगा क्या । यानी सवाल अब मुलाकात से आगे पाकिस्तान में इसी बरस होने वाले सार्क सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के जाने या ना जाने का भी होगा। क्योकि अर्से बाद भारत के साथ रिश्तो की डोर पाकिस्तान में दो अलग अलग छोरों पर खिंची जाती दिखायी दे रही है। क्योंकि भारत के रुख को लेकर एक तरफ नवाज शरीफ हो तो दूसरी तरफ राहिल शरीफ। और इन दोनो के बीच प्रधानमंत्री मोदी संबंधों को पटरी पर लाने के लिये इतिहास रचने को बेताब हैं। जबकि पाकिस्तान पहली बार भारत को लेकर उस मोड़ पर जा खड़ा है जहां सेना और चुनी हुई सत्ता में ही खुली तकरार है। इसीलिये पहली बार आतंकवादी संगठनों को कैसे कब उपयोग में लाना है यह भी पठानकोट हमलो के बाद नजर आने लगा है।

पाकिस्तान के पन्नों को ही पलटे तो जनरल मशर्रफ से लेकर जनरल राहिल शरीफ। और हाफिज सईद से लेकर अजहर मसूद। बीच में सैय्यद सलाउद्दीन। पाकिस्तान में भारत के खिलाफ कश्मीर का सवाल हो या आतंक की चौसर पर डिप्लोमैसी का सवाल। बीते 19 बरस के दौर में इन्ही किरदारो के आसरे आंतक को स्टेट पालेसी बनाकर जो चाल चली गई भारत उसी में उलझ कर संबंधो की डोर कभी पड़ोसी के नाते तो कभी अंतराष्ट्रीय दबाव में उलझता रहा । सत्ता पलट के बाद जनरल मुशर्रफ ने वक्त के लिहाज से सैयद सलाउद्दीन को सबसे पहले कश्मीर का स्वतंत्रता सैनानी बताकर सियासत साधनी शुरु की । तो जनरल राहिल शरीफ ने अब सैय्यद सलाउ्द्दीन को उस मोड़ पर सामने ला खड़े किया जब आंतक पर नकेल कसने के लिये मोदी नवाज शरीफ एक रास्ते को पकड़ने निकल रहे है । क्योकि पठानकोट हमले की पहली जिम्मेदारी उस यूनाइटेड जेहाद काउंसिल ने ली जिसका चेयरमैन सैयद सलाउद्दीन है । काउसिंल में तमाम वही संगठन है जो कश्मीर की लड़ाई पाकिस्तान में बैठकर लड़ रहे है । यानी हाफिजद सईद भी सक्रिय है और अजहर मसूद भी । लेकिन जेहादी काउंसिल को कटघरे में खडा किया जाये तो पाकिस्तान के आंतक की जमीन पहली बार अलग दिखायी देने लगे । क्योंकि सैय्यद सलाउद्दीन कश्मीर से पाकिस्तान की जमीन पर पनाह लिये हुये आंतकवादी है । तो हाफिज सईद और अजहर मसूद पाकिस्तान के ही नागरिक है । यानी पठानकोट का रास्ता कश्मीर के जेहाद से कैसे जोड़ा जाये और आंतक के इल्जाम से कैसे बचा जाये इसकी बिसात पर पहला पांसा यूनाइटेड जेहाद काउसिंल का नाम लेकर फेंका गया है । यानी यह चाल जैश-ए-मोहम्मद को कटघरे से बाहर देखने के है । क्योकि जैश पर आरोप लगते है तो सवाल पाकिस्तान की सत्ता और सेना पर उठेगें । फिर हाफिज सईद के बाद अजहर मसूद ही पाकिस्तान में सत्ता के लिये सबसे अनुकुल शख्स है जिसकी तकरीर पर गरीब-मुफलिस तबका फिदायिन बनने को तैयार हो जाता है ।

याद किजिये रिहाई के तुरंत बाद कराची में हथियारो के साये में जैश के अजहर मसूद की जो तस्वीर सामने आयी थी वह आंतक की तस्वीर थी । लेकिन लश्कर के आंतकी चेहरे के सामने धीरे धीरे् जैश कमजोर दिखायी देने लगा । और उसके बाद लगातार यही माना जाता रहा कि अजहर मसूद खुद कभी सामने नहीं आया लेकिन उन संगठनो को मदद देता रहा है जो इस्लाम के नाम पर आंतक का खुला खेल खेल रहे है । लेकिन पठानकोट हमले के बाद जिस तरह सारे तार जैश से जुडे उसमें पाकिस्तान के लिये भी मुसिबत पैदा हुई कि आंतक की डोर अगर कश्मीर से इतर पंजाब जा रही है तो फिर उसकी अपनी जमीन खिसकेगी इसलिये पठानकोट हमला भी कश्मीर के दायरे में ही दिखाने के लिये यूनाइटेड जेहादी काउसिंल ने श्रीनगर के एक समाचार एंजेसी सीएमएस को फोन कर पठानकोट हमले की जिम्मेदारी ले ली ।

ऐसे में आखरी सवाल यही है कि आखिर भारत करे तो क्या करें । क्योंकि पठानकोट एयरबेस पर हुये हमले ने प्रधानमंत्री मोदी के 19 महीने की उस कवायद को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिस आसरे एक दो नहीं बल्कि पांच मुलाकात पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ से की । पांचों मुलाकात कुछ इस तरह की गई जिसने बार बार देश को चौकाया । पीएम बनते ही शपथ के वक्त नवाज शरीफ को बुलाना हो या फिर अचानक काबुल से लाहौर पहुंचकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देना । नेपाल में हाथ मिलाना हो या पेरिस में गुफ्तगु करना । हर मुलाकात में मोदजी ने देश कौ चौकाया । तो क्या देश को चौकाते वक्त प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के साथ भारत के जटिल रिश्तो की डोर को समझ नहीं पाये । जिसपर से वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह गुजर चुके है । याद कीजिये 2001 में संसद पर हुआ हमला हो या 2008 में मुंबई पर हुआ हमला। तब की सरकारों ने पाकिस्तान को क्या संदेश दिया। संसद पर लशकर के हमले के बाद तब के पीएम अटलबिहारी वाजपेयी ने तो आर पार की लड़ाई का एलान कर दिया था। और मुंबई हमलों के बाद तो मनमोहन सरकार ने पाकिस्तान से बातचीत के ना सिर्फ हर रास्ते को बंद किया बल्कि पीओके में आंतकी कैपो पर हमले तक का जिक्र कर दिया । यानी यह बोली नरेन्द्र मोदी के उस एलान से भी कई कदम आगे की रही जिसका जिक्र मोदी पीएम बनने से पहले पाकिस्तान को लेकर करते रहे।

तो क्या इतिहास को पढ़ने-समझने के बदले मोदी सरकार इतिहास रचने की बेताबी में जा फंसी। इसीलिये कभी हा कभी ना की सोच इस तरह खुलकर कहती रही जिससे कभी लगा कि मोदी सरकार वाकई पाकिस्तान को पाठ पढ़ाना चाहती है तो कभी लगा मोदी सरकार पाकिस्तान को ना बदलने वाले पड़ोसी की तर्ज पर देख रही है । क्योंकि एक सिर के बदले दस सिर का जिक्र करने वाली सुषमा स्वराज भी मुंबई हमलो के दोषी लखवी के जेल से छूटने पर पाकिस्तान से कोई बातचीत ना करने को कहती है। और इसके बाद इस्लामाबाद जाकर कैंडल लाइट डिनर करने से नहीं चुकती। तो रक्षा मंत्री पारिकर भी साल भर पहले पाकिस्तान को चेताते नजर आते है। लेकिन मोदी लाहौर जाकर नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देते है तो पर्रिकर भी बदलते है और मोदी सरकार का हर मंत्री ही नहीं बीजेपी से लेकर संघ परिवार भी पाकिस्तान को लेकर संबंधो की आस बनाता नजर आता है। क्योंकि मोदी की नवाज से दोस्ती में ही रिश्तो की नई डोर खोजी जाती है । लेकिन महज हफ्ते भर के भीतर ही रिश्तो की इस डोर में पहली गांठ पठानकोट में अगर लगती है तो सवाल फिर वहीं आ अटकता है कि अब आगे क्या ?
पुण्य प्रसून बाजपेयी

Saturday, October 20, 2012

एक ‘आतंकवादी’ का दावत-ए-वलीमा…



जिस उम्र में नौजवान जिंदगी की रंगीनियों से रू-ब-रू हो रहे होते हैं, उस उम्र में वो सलाखों के पीछे कैद अपने ख्वाबों को फ़ना होते देख रहा था. अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन उसने जेल की सलाखों के पीछे काट दिए. मैं आमिर की बात कर रहा हूं, वो आमिर नहीं जो आपके ज़ेहन में सितारा बनके बसता है, जो आपको हंसाता-गुदगुदाता है, बल्कि वो आमिर जिसकी दास्तान आपकी आंखों को नम कर देगी और जिसकी हकीक़त कई सख्त सवाल आपके ज़ेहन में छोड़ जाएगी.
आमिर 18 साल की उम्र में एक दिन मां के लिए दवा लाने घर से निकला और लौट कर नहीं आया. लौटकर आई तो उसके आतंकवादी होने की ख़बर…. भारत में जन्मा, पला-बढ़ा, खेला-कूदा आमिर चंद दिनों में ही पाकिस्तानी हो गया. आमिर पर बम धमाके करने, आतंकी साजिश रचने और देश के खिलाफ़ युद्ध करने जैसे संगीन आरोप लगे. 18 साल की उम्र में आमिर 19 मामले में उलझा हुआ था.
उसकी जिंदगी शुरू होने से पहले ही एक लंबी कानूनी जंग शुरू हो गई थी. 1998 में शुरु हुई यह जंग 2012 तक चली और अंततः फरवरी 2012 में कानून की देवी ने उसे बेगुनाह क़रार दिया. जेल में सिर्फ 14 साल ही नहीं बीते बल्कि आमिर के ख्वाब भी बीत गए. वो जब जेल से निकला तो उसके अब्बू का इंतकाल हो चुका था. मां ममता के बोझ में ही दब सी गई थी. सब कुछ फना होने के बाद भी अगर कुछ बाकी बचा था तो वो था देश की कानून व्यवस्था में भरोसा…
जेल में कटे 14 साल आमिर की जिंदगी का स्याह पहलू हैं. आज मैं उसकी जिंदगी के खूबसूरत पहलू की झलक आपको दिखाना चाहता हूं. आमिर ने बीते सप्ताह ही शादी की. मैं उसकी दावत-ए-वलीमा में शामिल हुआ. आमिर ने गुजारिश की थी कि मैं दावत में ज़रूर पहुंचूं और मैं वक्त से पहले ही अपने खास दोस्त व बड़े भाई अख़लाक़ अहमद के साथ पुरानी दिल्ली के आज़ाद मार्केट के हसीन महल पहुंच गया.
हम पहुंचे ही थे कि पुलिस की गाड़ी वहां आकर रूकी. जैसे ही पुलिसवालें बाहर निकले इंसानी हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले एक सिपाही ने हंसते-हंसते पूछ लिया कि आप क्यों आए हो? पुलिस वाले ने भी हंसते हुए कहा कि बस ऐसे ही आमिर मियां की खैरियत जानने आए थे, पूछने आए थे कि उन्हें हमारी कोई ज़रूरत तो नहीं है.
धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगी कई बड़े चेहरे नज़र आने लगे. ये तमाम बड़े लोग सिर्फ आमिर को ढूंढ रहे थे. कुछ देर बाद आमिर सेलीब्रेटी की तरह हसीन महल में दाखिल हुआ, मीडिया के कैमरों की फ्लैशें चमकने लगी. लोग आमिर को गले लगाने के लिए बेताब लोगों ने उसे घेर लिया.
भारत के इतिहास में किसी ‘आतंकवादी’ की दावत-ए-वलीमा का शायद ये पहला मौका था जब इतनी बड़ी तादाद में खास-व-आम लोग पहुंचे हों. बहुतों के नाम तो मैं भी नहीं जानता, हां बड़े-बड़े समारोहों में उन्हें देखा-सुना ज़रूर है.  जिनके नाम मुझे याद हैं उनमें प्रख्यात लेखिका अरूधंती राय, पूर्व कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान, राज्यसभा सांसद मो. अदीब, लोजपा के राष्ट्रीय सचिव अब्दुल खालिक, पत्रकार अज़ीज़ बरनी, सईद नक़वी (और भी कई पत्रकार), सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, लेनिन रघूवंशी, मनीषा सेठी, इलाके के विधायक मिस्टर जैन  व ओखला के विधायक आसिफ मुहम्मद खान शामिल थे.
बड़े-बड़े लोग इस दावत की शान बड़ा हो रहे थे और आमिर इसके महताब थे. मसरूफियत के बीच आमिर ने हमारी मुलाकात पत्रकार इंद्रानी सेन गुप्ता से कराई. दावत में शामिल होकर इंद्रानी ने आमिर की खुशी बढ़ा दी थी. अपनी खुशी को चेहरे पर नुमाया करते हुए आमिर ने कहा, इन्होंने हमारी बहुत सी खबरें लिखी हैं. इन्हें पुलिस ने धमकिया भी दी लेकिन ये बेखौफ होकर सच लिखती रही. आमिर के मुंह से इंद्रानी की तारीफ सुनकर मुझे खुशी हुई क्योंकि आमतौर पर पुलिसिया जुल्म के सताए मुसलमान मेनस्ट्रीम मीडिया के पत्रकारों को ज्यादातर कोसते ही हैं.
आमिर की बेगुनाही की सबसे पहली ख़बर समाचार वेबसाईट twocircles.net पर आई थी जिसे रिपोर्टर मो. अली ने लिखा था. मो. अली अब ‘द हिंदू’ में काम कर रहे हैं. अली भी मेहमानों में शामिल थे. उनके चेहरे पर भी एक चमक थी. अली ने इस बात पर खुशी जाहिर की कि उनकी रिपोर्ट के बाद उनके अन्य पत्रकारों को भी आमिर के बारे में पता चला और उसकी बेगुनाही पर खबरें मीडिया में आने लगीं.
आमिर जेल में था और अपनी सफाई में कुछ नहीं लिख सकता था. मीडिया ने बिना आमिर की बात सुने उसकी पहचान पाकिस्तानी के तौर पर पुख्ता कर दी थी. उसे आतंकी, देश का दुश्मन, बेगुनाहों का हत्यारा और न जाने क्या-क्या कहा गया.
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि मीडिया द्वारा ही उसकी बेगुनाही के बारे में खुलकर लिखने के कारण उसका केस मज़बूत हुआ और आज वो जेल से बाहर है और अपने वलीमे की दावत दे रहा है.
दावत में हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के सहाफी ए.एन शिबली भी थे. उन्होंने भी आमिर की बेगुनाही पर अपने अख़बार में खूब लिखा था और मुसलमानों की मिल्ली तंजीमों पर भी आमिर की मदद न करने पर सवाल खड़े किए थे. मीडिया में खिंचाई होने के बाद एक-दो मिल्ली तंजीमों ने आमिर की मदद भी की. अपनी लाज बचाने के लिए ही सही लेकिन मिल्ली तन्जीमों ने कम से कम आमिर की मदद तो की. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी था कि जिन मिल्ली तंज़ीमों के लोगों ने कोई मदद नहीं की, अब उन्हीं मिल्ली तन्जीमों से जुड़े लोग आमिर की दावत-ए-वलीमा में शामिल होकर उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए उतावले थे.
लेनिन रघुवंशी भी इस दावत का हिस्सा थे. यह वही शख्स हैं जिन्होंने आमिर को ‘जन मित्र पुरस्कार’ देकर सम्मानित किया था. उनकी संस्था ने आमिर को न सिर्फ पुरस्कार दिया बल्कि आर्थिक तौर पर भी उसकी मदद की. वो कहते हैं कि आमिर ने दोबारा मज़बूती से अपनी जिंदगी को शुरू किया है. तमाम मुश्किलों के बावजूद वो जिंदगी को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है और 14 साल जेल में काटने के बाद अब वो बेगुनाहों के हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए ज़हनी तौर पर पूरी तरह तैयार है. एपीसीआर के अखलाक़ साहब भी काफी खुश थे. इनकी संस्था ने भी आमिर की अच्छी-खासी आर्थिक मदद की थी.
दावत-ए-वलीमा में आमिर इंसानी हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले बड़े नामों से घिरा था. वो अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करते हुए खुश था. उसे इस बात की भी खुशी थी कि इस मौके पर उसके मुहल्ले के वो लोग और वो रिश्तेदार भी साथ खड़े थे जिन्होंने कभी उनसे आंखे फेर ली थी. ये वही लोग थे जो कभी उसके परिजनों से बात तक नहीं करते थे. आमिर ने अपनी जिंदगी की नई शुरुआत कर दी है. उसकी ख्वाहिश देश व समाजहित में काम करने की है. देश की कानून व्यवस्था में उसे मज़बूत भरोसा है.
अपनी जिंदगी के 14 साल जेल में काटने के बाद, बेुनाही से जंग लड़ते हुए अपने पिता को खो देने के बाद, अपनी मां के मानसिक रूप से कमजोर हो जाने के बाद भी आमिर का इरादा मज़बूत है. वो दोबारा जिंदगी को जीना चाहता है. अंधेरी सुरंग से गुज़र कर आमिर की जिंदगी की गाड़ी दोबारा पटरी पर आ चुकी है. वो वक्त की रफ्तार के साथ आगे बढ़ने की ख्वाहिश रखता है.
लेकिन आमिर की जिंदगी का ये खूबसूरत पहलू उन स्याह सवालों का जवाब अब भी तलाश रहा है जिन्हें हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने पैदा किया है. आतंकवाद के नाम पर न जाने कितने बेगुनाह आमिर अपनी जिंदगी के बेशकीमती लम्हों को जेलों में जाया कर देते हैं. सालों तक जुल्म व सितम सहने के बाद जब वो जेलों से रिहा होते हैं तो हमारा समाज उन्हें स्वीकार नहीं पाता.
जब किसी नौजवान को आतंकी बनाकर पेश किया जाता है तो अख़बार अपनी काली स्याही से उसकी किस्मत लिख देते हैं. बड़े-बड़े लफ्जों में लिखा जाता है कि आतंकी गिरफ्तार हुआ. लेकिन जब वही नौजवान बेगुनाह साबित होकर जेल से बाहर आता है तो सिंगल कालम ख़बर भी उसके लिए नहीं लिखी जाती. यह हमारे देश की बिडंबना ही है कि जब राहुल गांधी पर झूठा मामला दर्ज होता है तो देश का मीडिया चिल्ला-चिल्लाकर झूठ की पोल खोलता है. जब कोर्ट उन्हें बेगुनाह करार देता है तो पूरा दिन ख़बर छाई रहती है. विशेष लेख लिखे जाते हैं. लेकिन जब एक बेगुनाह 14 साल जेल में काटने के बाद दोबारा जिंदगी शुरु करने की कोशिश करता है तब कानून में दोबारा उसका विश्वास पैदा करने के लिए दो शब्द भी नहीं लिखे जाते.
वैसे क्या आप उन गुजरात, हैदराबाद, जयपुर और औरंगाबाद में रिहा हुए बेगुनाहों के नाम जानते हैं? क्या आपने कभी सोचा कि उन पर क्या बीती और क्यों बीती? अगर आपने नहीं सोचा तो अब सोचिए. बेगुनाहों के लिए अपनी आवाज़ मज़बूत कीजिए. अगर आप अब खामोश रहे तो कोई और आमिर कल के अख़बार में पाकिस्तानी आतंकवादी बन जाएगा.

Wednesday, October 10, 2012

दरिन्दे पति ने पत्नी को उल्टा लटका कर पीटा, गंजा किया, गुप्तांगों में डाला मिर्च पावडर



लखनऊ: पति को शराब का अवैध कारोबार बंद करने की बात कहना पत्नी को बहुत महंगा साबित हुआ, दरिन्दे पति ने जो किया उस से मानवता भी शर्मशार हो गई, घटना लखनऊ के पास के ही केडौरा गाँव की है, पति ने पत्नी पर चरित्रहीन होने का आरोप लगा कर उसके साथ जो सलूक किया उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। पति शिवकुमार ने पत्नी के हाथ-पैर बांध कर मुंह में कपड़ा ठूंसा और बल्ली में उल्टा लटकाकर पीटा. उसे गंजा कर दिया । जब इससे भी उसका मन नहीं भरा तो अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए पत्नी के गुप्तांगों में मिर्च का पावडर भर दिया, इस मामले में पुलिस ने कार्यवाही भी सूचना मिलने के बाद दूसरे दिन की.  पीडिता का क्रूर पति घटना के बाद से फरार है।
सूत्रों के अनुसार बुधवार की रात करीब 11 बजे की इस घटना में शिवकुमार की पत्नी ने उसे अवैध शराब बनाने से मना किया। इस बात पर आगबबूला होकर शिवकुमार ने पत्नी पर चरित्रहीनता का आरोप लगाकर मार-पीट शुरू कर दी। उसके बाद पत्नी के हाथ-पैर बांधकर मुह में कपड़ा ठूंस दिया और घर के भीतर लगे टीनशेड की बल्ली से बांधकर उल्टा लटका दिया। पत्नी के शरीर पर बिजली के तार बरसाए। दरिंदगी और अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए उसने पत्नी के गुप्तांगों में मिर्च का पावडर डाल दिया और पत्नी के सिर के बाल मूंड दिए।
इस घटना के  दौरान शराब खरीदने एक व्यक्ति आ गया। क्रूर शिवकुमार शराब देने घर से बाहर निकला तो मौका पाकर उसकी पत्नी घर से भागकर पड़ोसी बुधई के घर में चली गई। शिवकुमार वहां भी मारपीट करने पहुंच गया। शोर सुनकर ग्रामीण एकत्र हो गए तो महिला मौका पाकर गांव में ही रहने वाले अपने मौसा तुला के घर पहुंच गई। वहां से उसने फोन कर मामले की जानकारी सौरा गांव निवासी अपने पिता को दी। वह रात में ही केडौरा पहुंचे और करीब डेढ़ बजे रात को बेटी को लेकर माल थाने गए। थाने से उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि सुबह आना। घर वाले महिला को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र  गए पर वहां  महिला चिकित्सक न होने से उसे लौटा दिया गया। जेहन में निर्दयी पति का खौफ लिए महिला ने परिवारीजन के साथ थाने के सामने सड़क पर ही रात बिताई। जब मामले की जानकारी मीडिया को हुई तो पुलिस हरकत में आई। घटना से आक्रोशित लोग हंगामा करने की तैयारी कर रहे थे। इसकी भनक लगते ही सीओ मलिहाबाद राजेश सक्सेना व एसओ माल जगदीश यादव केडौरा गांव पहुंचे और महिला को सीएचसी लाए। फिर उसे लखनऊ भेज दिया गया है। हालाँकि इस मामले में  पुलिस की लापरवाही सामने आने पर एसओ जगदीश यादव को लाहन हाजिर करने के साथ ही एसआइ सत्यदेव सिंह व कांस्टेबल राम शंकर को निलंबित कर दिया है। परन्तु पुलिस भी ऐसे मामलो में संवेदनशीलता के परिचय नहीं देती. ये उजागर हो गया है।
इस तरह की घटनाएं समाज में इंसानों के बीच मौजूद कुछ दरिंदों की दरिंदगी से इंसानियत को शर्मसार करती हैं। ऐसी घटनाएं हमें आक्रोशित भी करती हैं लेकिन हम सही समय पर प्रतिरोध क्यों नहीं करते? अगर सही समय पर हम इंसानियत का फर्ज निभाएं तो बहुत सी घटनाएं क्रूरता की हदें पार नहीं कर सकतीं। इंदौर की छः साल की शिवानी को बचाया जा सकता था, अगर पड़ोसियों ने सही समय पर थोड़ी सी भी कोशिश की होती। इस महिला के साथ हुए अत्याचार को भी रोका जा सकता था, यदि उसके पड़ोसी हस्तक्षेप करते । अत्याचार करने वालों के हौसलें इसीलिए बुलंद रहते है क्योंकि उन्हें यही लगता है कि कोई पड़ोसी उनके बीच में नहीं बोलेगा, आप बीच में न भी बोले, पर पुलिस को या किसी मददगार संस्था को तो फोन कर सकते है।

Monday, September 03, 2012

हम दोनों हैं अलग अलग :-) हम दोनों हैं जुदा जुदा :-) :-)



नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार : दो मित्रों की कहानी

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार क्रमशः गुजरात और बिहार के मुख्यमंत्री हैं और इन दिनों लगातार सुर्खियों में हैं। दोनों न केवल एक ही राशि के हैं, बल्कि एक ही राजनीतिक गठबंधन के भी; लेकिन दोनों में आजकल ठनी है। कम-से-कम दिखता तो ऐसा ही है।

लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि नीतीश कुमार का अंतर्मन नरेंद्र मोदी से गहरे प्रभावित रहा है। आज दिख रही शत्रुता में भी कभी-कभी मुझे मित्रता का ही भाव दिखता है। मनोविज्ञान में प्यार-घृणा एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाते हैं। इन दोनों की मित्रता और शत्रुता कुछ ज्यादा ही गड्ड-मड्ड हो गयी है।

एक घटना को याद कर रहा हूं। 2004 की गरमियां थीं। लोकसभा के चुनावों का नतीजा आ चुका था और बिहार में लालू प्रसाद के नेतृत्व में यूपीए को निर्णायक बढ़त मिली थी। जॉर्ज-नीतीश के नेतृत्व में एनडीए बुरी तरह पिट चुका था। नीतीश जी मेरे घर आये थे। फुरसत में थे, सो घंटों दुनिया-जहान की बातें होती रहीं। मेरा कहना था कि नरेंद्र मोदी के कारण एनडीए को हार का सामना करना पड़ा। नीतीश जी इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे। मैं नरेंद्र मोदी के खिलाफ रुख लिये हुए था। नीतीश जी ने स्थिर और गंभीर होकर कहा – नरेंद्र मोदी बीजेपी का नया चेहरा है। वह अति पिछड़े तबके से आता है। घांची है, घांची। गुजरात की एक अत्यल्पसंख्यक पिछड़ी जाति है यह। बीजेपी की ब्राह्मण लाबी उसे बदनाम करने पर तुली है। इसमें वाजपेयी तक शामिल हैं। डायनमिक आदमी है। आप अगर उससे एक बार मिल लीजिएगा, तो उसके प्रशंसक हो जाइएगा। निहायत गरीब परिवार से आता है। सादगी और कर्मठता कूट-कूट कर भरी है उसमें। नीतीश जी एक त्वरा (ट्रांस) में थे। वह बोले ही जा रहे थे। मोदी द्वारा दिये गये एक आतिथ्य को चुभलाते हुए उन्होंने अपनी बात को एक विराम दिया, ‘मैं तो उसका फैन हो गया हूं।‘

मुझे आश्चर्य होता है नरेंद्र मोदी का यह फैन आज उसके लिए फन काढ़कर कैसे बैठा है। क्या इसे ही राजनीति कहते हैं। क्या मुस्लिम वोट बैंक पर सेंध लगाने के लिए यह सब हो रहा है। या फिर कुछ और बात है?

मैं नहीं बता सकता कि असलियत क्या है। क्योंकि नीतीश कुमार से इन दिनों मेरी व्यक्तिगत दूरी है। अनुमान आखिर अनुमान होते हैं। कहनेवाले तो यह भी कहते हैं कि प्रकारांतर से नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की मदद ही कर रहे हैं, वे उन्हें लगातार चर्चा में बनाये रखे हुए हैं। ऐसा मित्र-लाभ भला कौन नहीं पाना चाहेगा। संभव है इस बात में कुछ सच्चाई हो, लेकिन सार्वजनिक संबंधों की जो कड़वाहट नीतीश कुमार ने पैदा की है, वह तो दिख रही है। इस कड़वाहट से शायद उन्हें किसी बड़े नतीजे की उम्मीद है। लेकिन क्या यह संभव है?

नरेंद्र मोदी बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार हैं। नीतीश कुमार के मन में भी इसी पद की व्याकुल लालसा है। स्वार्थ के इस टकराव ने ही मित्र को शत्रु बना दिया है। ऐसे में कोई क्या कर सकता है?

पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जहां तक मुझे याद है, जून 2010 में नीतीश कुमार ने पटना में आयोजित बीजेपी राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने वाले लोगों के लिए अपने सरकारी आवास पर एक भोज का आयोजन किया था। ऐन वक्त पर एक विज्ञापन का बहाना बनाकर उस भोज को रद्द कर दिया गया। विज्ञापनकर्ता कोई व्यापारी था और उसने 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान जालंधर में एक ही मंच से चुनावी उद्घोष कर रहे नरेंद्र-नीतीश की जगमग तस्वीर अखबारों में प्रकाशित करा दिया था। दरअसल वह बिहार की धरती पर इस तस्वीर के साथ नरेंद्र मोदी का इस्तकबाल करना चाहता था। बदहवास नीतीश ने सामान्य शिष्टाचार को भी ताक पर रख दिया। बाढ़ के समय गुजरात सरकार द्वारा भेजी गयी सहायता राशि लौटा दी। नीतीश, नरेंद्र मोदी से अपने संबंधों को सार्वजनिक करने के विरुद्ध थे। विज्ञापनकर्ता ने शायद इस बात को गंभीरता से नहीं समझा था कि कुछ संबंध – खासकर प्रेम संबंध – के सार्वजनिक करने के खतरे ज्यादा होते हैं। यही हुआ। भाजपा नेताओं को अपमानित होना पड़ा। उन्होंने सब कुछ बर्दाश्त किया। हालांकि उन्हें इन सब का अभ्यास है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती के नखरे भी उन्होंने खूब बर्दाश्त किये हैं। यह गठबंधन की विवशता है। भाजपा अपनी दुधारू गाय की लताड़ भी बर्दाश्त करेगी। असलियत तो यही है न कि भाजपा के राजनीतिक खूंटे पर नीतीश हैं। न कि नीतीश के खूंटे पर भाजपा।

2012 के राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश ने भाजपा के उम्मीदवार का समर्थन न करके कांग्रेसी उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया, तब एक बार फिर मीडिया ने नीतीश की धर्मनिरपेक्षता को थपथपाया। मीडिया ने इस बात की भी समीक्षा नहीं की कि इस मामले में धर्मनिरपेक्षता की बात कहां आती है। क्या भाजपा समर्थित उम्मीदवार संगमा सांप्रदायिक चरित्र के हैं? और नहीं तो फिर क्या कांग्रेस ही धर्मनिरपेक्षता का असली घराना है। नीतीश ने इस बीच ऐसा आलाप लगाया मानो वह ही धर्मनिरपेक्षता के मुख्य ध्वजवाहक हैं और इस मुल्क की सेक्यूलर पालिटिक्स बस उन्हीं के बूते चल रही है। किसी ने भी वास्तविकता को सामने लाने का साहस नहीं किया कि प्रणव मुखर्जी कांग्रेस से अधिक अंबानी घराने के उम्मीदवार थे, और नीतीश को इस घराने के विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं थी; क्योंकि इस घराने का एक दूत नीतीश के दल में सांसद के रूप में बना हुआ है, और पूरे दल को संचालित करता है। नीतीश की पीठ थपथपा रहे लोगों को भी याद रखना चाहिए कि प्रणव के समर्थन में नीतीश थे, तो बगल में बाल ठाकरे भी थे।

मैं उन लोगों में नहीं हूं, जो नरेंद्र मोदी को गोधरा उपरांत दंगों के लिए क्लीन चिट दे चुके हैं, या फिर बाबरी मस्जिद मामले के लिए आडवाणी के कृत्यों को भूल चुके हैं। 2002 का गुजरात दंगा भयावह था और मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की जिम्मेवारी थी कि वह उसे रोकें। मैं उन्हें आज भी दोषी मानता हूं। लेकिन क्या वह अकेले दोषी थे? उस वक्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। उन्होंने गुजरात सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं किया? उनके पास तो बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद कई राज्य सरकारों को एक साथ बर्खास्त किये जाने का उदाहरण मौजूद था। वाजपेयी ने गुजरात दंगों के पूर्व बिहार में सेनारी नरसंहार पर बिहार सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया था। सेनारी दुर्घटना से गुजरात दंगे कहीं ज्यादा भयावह थे। जब एक नरसंहार के लिए बिहार सरकार बर्खास्त हो सकती थी, तो फिर गुजरात सरकार क्यों नहीं? क्या नरेंद्र मोदी ने अकेले राजधर्म का पालन नहीं किया था? वाजपेयी कौन से राजधर्म का पालन कर रहे थे।

और वाजपेयी को मसीहा मानने वाले नीतीश कुमार ने तब किस राजधर्म का पालन किया था? नरेंद्र मोदी की आज वे चाहे जितनी तौहीन कर लें, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उस वक्त रेलमंत्री वही थे और गोधरा कांड रेल में ही हुआ था। उसके पूर्व गाइसल ट्रेन दुर्घटना में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री पद से त्यागपत्र देने वाले (हालांकि त्यागपत्रित सरकार से) नीतीश गोधरा हादसे के निरीक्षण के लिए भी प्रस्तुत नहीं हुए। आश्चर्य है कि यह आदमी भी आज नरेंद्र मोदी को नसीहत दे रहा है और वह भी दंगों को लेकर।

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार दोनों गोधरा मामले में दूध के धुले नहीं हैं। दोनों ने, और फिर दोनों के दादागुरु वाजपेयी ने भी तब राजधर्म का पालन नहीं किया था। दोनों विज्ञापनप्रिय हैं और दोनों ने विकास पुरुष की पट्टी अपने माथे पर खुद बांध रखी है। उपलब्धियों की बात की जाए तो गुजरात और बिहार दोनों राज्यों में बेतरह असमानता बढ़ी है। दोनों जगह के अमीर ज्यादा पावरफुल हुए हैं, और गरीब ज्यादा दयनीय।

लेकिन नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार में कुछ गैरमामूली अंतर भी है। नीतीश बिहार के कुलक उच्चकुर्मी परिवार से आते हैं और नरेंद्र मोदी गुजरात के निर्धन अति पिछड़े घांची परिवार से। नीतीश के पिता वैद्यराज और कांग्रेसी नेता थे जबकि नरेंद्र के पिता मामूली चाय दुकानदार, जहां नरेंद्र ने अपना बचपन ग्राहकों के जूठे गिलास मांजकर गुजारा। नीतीश इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब नरेंद्र एक वकील परिवार में डोमेस्टिक हेल्पर थे, जहां रोज नौ कमरों की सफाई और पंद्रह लोगों के खाना बनाने का काम उन्हें करना पड़ता था। उन्होंने प्राइवेट परीक्षाएं देकर येन केन प्रकारेण डिग्रियां हासिल की हैं और जो सीखा है दुनिया की खुली युनिवर्सिटी में सीखा है। वह दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े हैं, लेकिन उनका बचपन और युवावस्था रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की तरह संघर्षमय रहा है। एक अंतर और रहा है नरेंद्र मोदी और नीतीश में। मुख्यमंत्री के रूप में भी नरेंद्र सादगी पसंद रहे हैं। उन्होंने चापलूसों-चाटुकारों को अपने से दूर ही रखा है। दागदार लोगों से जुड़ना नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं आया। लेकिन यही बात नीतीश कुमार के लिए नहीं कही जा सकती। कभी साफ-सुथरी छवि वाले नीतीश आज विवादों से घिरे हैं। उनकी जीवन शैली बदल चुकी है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक अपने सरकारी आवास और पैतृक गांव को संवारने में उन्होंने सरकारी खजाने से सैंकड़ों करोड़ रुपये खर्च किये हैं। चापलूस, अपराधी और दागदार आज उनकी खास पसंद हैं और अपने खानदान की मूर्तियां स्थापित करने में मायावती से वह थोड़ा ही पीछे हैं।

(प्रेमकुमार मणि। हिंदी के प्रतिनिधि कथाकार, चिंतक व राजनीति कर्मी। जदयू के संस्‍थापक सदस्‍यों में रहे। इन दिनों बिहार परिवर्तन मोर्चा के बैनर तले मार्क्‍सवादियों, आंबेडकरवादियों और समाजवादियों को एक राजनीति मंच पर लाने में जुटे हैं। उपरोक्‍त लेख फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2012 अंक में उनके कॉलम ‘जनविकल्‍प’ के तहत प्रकाशित हुआ है। उनसे manipk25@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Sunday, August 12, 2012

मेरे पास गीत नहीं हैं आप का दिल बहलाने के लिए



एक ही सवाल, कहाँ हूँ, कैसा हूँ, क्या कर रहा हूँ, हर सवाल का एक ही जवाब- जहां था वहीं हूँ, काम ख़त्म हो चुका मगर मैं ज़िंदा हूँ क्यों... जो कर सकता था किया, अल्लाह जो काम लेना चाहता था उसने लिया अब क्यों ज़िंदा हूँ, समझ में नहीं आता। अपने लिए कुछ रोज़ जीने की एक ज़माने से ख़ाहिश थी, कभी फ़ुर्सत ही ना मिली, शायद मौत से पहले वो ज़िंदगी तलाश कर रहा हूँ, मेरे क़लम से निकलने वाला एक एक लफ़्ज़ हर रोज़ सौ नए दुश्मन बनाता है, दोस्त बहुत हैं पर ना उनको मेरा पता मालूम, ना मुझे उनका.... पर मेरे सब दुश्मनों को मेरा पता मालूम है, तहरीक को नाकाम बनाने का तरीक़ा मालूम है, वो हर रोज़ इस पर काम करते हैं और आप जो बहुत दर्दमंद हैं वो बातें कर लेते हैं, बाक़ी इतना भी नहीं, बीस करोड़ मुसलमानों की तादाद जम्हूरी मुल्क में बहुत अहमियत रखती है, पर अपनी अहमियत खो चुके हो आप, बर्मा (म्यानमार) में हज़ारों मुसलमान क़त्ल कर दिए गए, बातें करने और अफ़सोस ज़ाहिर करने के सिवा क्या किया आपने, जिनको वोट दिया वो आप के वोट की ताक़त पर हुकूमत करते हैं, क्या मिले उनसे, क्या मजबूर किया उनको इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करने के लिए, जो आपके नेता हैं, मुसलमान हैं, मालूम किया उनसे, क्या किया इस सिलसिले में। मैं लिखता क्यों नहीं, बोलता क्यों नहीं, क्या हो जाएगा मेरे लिखने और बोलने से, आप मज़लूमीन को इंसाफ़ दिलाने के लिए एक प्लेटफार्म पर खड़े हो जाऐंगे, नहीं आप ऐसा नहीं करेंगे, आसमान से तारे तोड़ कर लाने की ख़्वाहिश रखेंगे लेकिन घर की दहलीज़ पर क़दम रखना नहीं चाहेंगे, फिर क्या करेंगे, मेरा लिखा पढ़ कर या मेरी तक़रीर सुन कर, मेरे पास गीत नहीं हैं आप का दिल बहलाने के लिए, दर्द भरी दास्तान है........

Thursday, July 26, 2012

सरकार अगर गहरी नींद में है, तो जनता को जागना ही पड़ेगा



दरभंगा अब राज्य प्रायोजित आतंकवाद के प्रतिरोध का केंद्र बन रहा है। हमने आजमगढ़ में बहुत पास से देखा है कि किस तरह अपहरणकर्ता-अपराधी एटीएस-एसटीएफ के लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर, पकड़ कर पूछताछ की गयी और गैरकानूनी गिरफ्तारियों और छापेमारी को रोका गया। यह सिलसिला दरभंगा में भी शुरू हो चुका है। जिस तरह यूपी में एक दौर में आतंकवाद के नाम पर हो रही फर्जी गिरफ्तारियों को लेकर एसटीएफ अधिकारियों के नार्को टेस्ट और उसे भंग करने की मांग मुद्दा बनी, आज उसी तरह एक बार फिर से एटीएस के खिलाफ भी ऐसा माहौल बन रहा है। यह जद्दोजहद फासीवादी/सैन्यवादी मानसिकता वाले राज्य की नीतियों के खिलाफ लोकतांत्रिक राज्य के लिए है। इस मुहीम में सियासत तो बदलेगी ही, बेगुनाहों को भी छोड़ना पड़ेगा।

13 मई को सउदी से अपहरण किये गये फसीह महमूद, जिन्हें आज तक पेश नहीं किया गया, की पत्नी निखत परवीन बता रही थीं कि दरभंगा से फिर किसी को उठाने जा रहे थे। कुछ लोग एक कार में बैठे थे और उनमें से एक सामने वाले डाक्टर की क्लीनिक में देखने गया। एक बंदे को बुला कर कहा कि उस कार वाले लोग तुम्हें बुला रहे हैं। जब वो उस कार के पास गया, तो पुलिस वालों ने जो सिविल ड्रेस में थे, उसका अपहरण करने का प्रयास किया। आस-पास के लोगों ने जब कार रोकी और उस बंदे को निकाला तो पुलिस वाले वहां से भाग गये। इसी तरह की घटना एक और गांव में हुई, जहां पर बाद में एटीएस वालों ने आकर माफी मांगी कि वो लोग गलती से उसे उठाने आये थे। निखत आगे कहती हैं कि अगर लोगों ने बचाव नहीं किया होता, तो आज उनकी गलती नहीं होती बल्कि एक बड़ा नया आतंकवादी पकड़ा गया होता।

इसी तरह आजमगढ़ में भी हुआ था। जब वहां आतंकवाद के नाम पर दमन हो रहा था, तो आम नागरिकों ने गांव-गांव में पर्चे बांटे थे कि अगर आपका कोई करीबी गायब है, तो आप इन सरकारी और मानवाधिकार संगठनों के नंबरों पर फैक्स-फोन-ईमेल करिए। एटीएस-एसटीएफ के आतंक के खिलाफ ग्राम सुरक्षा कमेटियां बनायी गयीं। आज फिर उसी आंदोलन की दस्तक दरंभगा में भी हो चुकी है।

नीतीश सरकार बताये कि आखिर उसके सुशासन वाले राज्य में बिना नंबर प्लेट के एटीएस की कार कैसे घूम रही है। नीतीश को याद रखना चाहिए कि आजमगढ़ जिसे आतंकवाद की नर्सरी के बतौर स्थापित करने की राज्य ने कोशिश की, वहां के लोगों ने 2009 के लोकसभा और 2012 के विधानसभा चुनाव के एजेंडे को बदल दिया। बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद आजमगढ़ में बनी राष्‍ट्रीय ओलमा कांउसिल अपने आप में एक नयी राजनीति की दस्तक थी।

कांग्रेस ने चुनावों में हुई अपनी करारी हार का कारण भी इसे माना। सत्ता में आयी मुलायम सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इस बात को कहा था कि वो सरकार में आएगी, तो आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये बेगुनाहों को छोड़ेगी। आज सपा के सत्ता में आने के बाद लगातार सरकार को राजनीतिक दल और मानवाधिकार संगठन इस बात पर घेरे हुए हैं। सरकार के नुमाइंदे बार-बार छोड़ने की प्रक्रिया के बारे में बयान देते नजर आते हैं।

इसकी तस्दीक लखनऊ की दीवारों पर चिपके ‘वादा निभाओ’ पोस्टर, खुफिया और एटीएस की सांप्रदायिकता के खिलाफ और ‘खुफिया द्वारा संचालित इंडियन मुजाहिदीन पर श्‍वेत पत्र जारी करो’ की मांग वाले बैनर करते हैं। आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के लिए पिछली 30 जून को विधानसभा घेराव के एक दिन पहले ही यूपी के एडीजी (कानून व्यवस्था) जगमोहन यादव को कहना पड़ा कि एटीएस और जिलों के कप्तानों से ऐसे मामलों को चिन्हित करने को कहा गया है, जिनमें फर्जी धरपकड़ की शिकायत है। खैर, जो भी हो, अगर सपा सरकार स्वतंत्रता दिवस तक आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये निर्दोषों को नहीं छोड़ती है, तो इसके खिलाफ एक बड़े जनआंदोलन की तैयारी हो चुकी है।

सैकड़ों दलितों के हत्यारे ब्रम्हेश्‍वर मुखिया को रिहा करने वाली नीतीश सरकार बताये कि उसके राज्य के कतील सिद्दीकी को पुणे की जेल में मार दिया जाता है और उसी के गांव बाढ़ समेला, दरभंगा के फसीह महमूद का दो महीनों से भारतीय एजेंसियों ने अपहरण किया, इस पर उसने क्या किया? उसे ही नहीं, बिहार में पसमांदा (पिछड़े-दलित) मुसलमानों की राजनीति करने वाले और मुस्लिम समुदाय पर ‘मसावात की जंग’ जैसी गंभीर किताब लिखने वाले अली अनवर अपनी चुप्पी तोड़ें। कुछ दिनों पहले बिहार के मधुबनी जिले के सकरी क्षेत्र से फिर एक व्यक्ति के उठाने की खबर सामने आयी थी।

नीतीश बाबू, दरभंगा की गलियों में राज्य प्रायोजित आतंक का जो बीजारोपण हुआ है, उसे जाकर देखिए कि किस तरह लोगों का जीना मुहाल हो गया है। पिछले दिनों दरभंगा के मानवाधिकार नेता शकील शल्फी बता रहे थे कि महेशपट्टी के एक लॉज से पुलिस वाले कुछ मुस्लिम लड़कों को उठा ले गये और दो दिन बाद उन्हें यह लिखवाते हुए छोड़ा कि हम अपनी मर्जी से आये थे। नीतीश जी, जरा अपना कामन सेन्स लगाइए कि जिस इलाके में खाकी वर्दी क्या, किसी हट्टे-कट्टे मोटे आदमी को पुलिस वाला समझकर लोग दहशत में जी रहे हैं, वहां कोई अपनी मर्जी से पुलिस वालों के पास जाएगा?

शकील बताते हैं कि मुंबई एटीएस के नाम से दरभंगा के कुछ लड़कों को फोन करके उन्हें धमकाते हुए मुंबई आने का दबाव बनाया गया कि चुपचाप बिना किसी को बताये वो मुंबई पहुंचे। कुछ दिनों पहले बैंग्लोर में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले अब्दुल निसार को लंबे समय तक एटीएस ने पूछताछ के नाम पर यातना दी। वह डर के मारे किसी को कुछ नहीं बता रहा था, पर उसके शरीर पर गंभीर चोट के निशान देखकर जब परिजनों ने पूछा, तो वह रो-रो कर एटीएस की यातना की लंबी दास्तान बताने लगा। लगातार परिजनों को एटीएस की धमकी मिल रही है और वह पढ़ाई छोड़कर गांव में डर-डर कर रह रहा है।

इसी तरह आजमगढ़, संजरपुर के अबू राशिद पर मुंबई के क्राइम ब्रांच ने दबाव बनाया कि वो मुंबई आये और इसके लिए वे उनके भाई अबू तालिब को उठाकर आजमगढ़ ले आये और फिर अबू राशिद को संजरपुर गांव के लोगों ने इस भरोसे के साथ आजतक टीवी चैनल की मौजूदगी में विदा किया कि जांच करके वो लोग छोड़ देंगे? पर उनके भरोसे को मुंबई क्राइम ब्रांच ने तोड़ दिया और रास्ते से अपहरण कर लिया और आज तक किसी अदालत में पेश नहीं किया और अब उसे फरार बताती है। सवाल यह है कि अगर उसे फरार होना होता, तो वह सार्वजनिक तौर पर जाता ही क्यों? पर इसका जवाब आजमगढ़ ने दिया, जहां राज्य आजमगढ़ को आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों के उत्पीड़न का केंद्र बनाने पर तुला था, वहीं आजमगढ़ आंदोलन का केंद्र बनकर उभरा।

नीतीश जी, रमजान का महीना है और आप और आपके नुमाइंदे इफ्तार करने-करवाने की तैयारी में भी होंगे। क्या आपको मालूम है कि आपके राज्य की राजधानी पटना से कुछ सौ किलोमीटर दूर रहने वाली लड़की निखत परवीन अपने पति फसीह महमूद, जिसे भारतीय एजेंसियों ने दो महीनों से गायब किया है, की खोज में दर-दर भटक रही है? यहां तक कि पिछले दिनों इंटरपोल ने कहा है कि जब तक भारत चार्जशीट नहीं देता, तब तक हम फसीह को भारत को नहीं सौंप सकते।

उत्तर प्रदेश में राज्य प्रायोजित आंतकवाद के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन की शुरुआत आपको जानना चाहिए। 2007 में उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद 12 दिसंबर को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर को मड़ियाहूं से खालिद का अपहरण यूपी एसटीएफ ने किया था, जिसके बाद आजमगढ़ में जबरदस्त आंदोलन हुआ और नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के नेता चौधरी चंद्रपाल सिंह ने कहा कि अगर 22 दिसंबर 2007 तक तारिक को नहीं लाया गया, तो वे आत्मदाह कर लेंगे। एसटीएफ ने 23 दिसंबर को तारिक-खालिद को बाराबंकी से गिरफ्तार करने का दावा किया। जनांदोलनों के दबाव में पिछली मायावती सरकार को यूपी एसटीएफ द्वारा की गयी इस फर्जी गिरफ्तारी पर आरडी निमेश जांच आयोग का गठन करना पड़ा और जब से सपा की सरकार बनी है, वो इतने दबाव में है कि उसके नुमांइदे बार-बार छोड़ने की बात करते हैं।

कतील सिद्दीकी हों या फिर बाटला हाउस में कत्ल किये गये साजिद-आतिफ, वे भले जीते जी इस क्रूर राज्य व्यवस्था में न्याय नहीं पा सके, पर इनकी शहादत और न्याय के लिए चल रहा आंदोलन ही फासीवादी नीतियों को रौंदते हुए एक लोकतांत्रिक राज्य को कायम करेगा। सियासत भी बदलेगी और बेगुनाह अपने घरों पर लौंटेंगे भी, जहां उनके अपने बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे हैं।

(राजीव यादव। पीयूसीएल यूपी के प्रदेश संगठन सचिव। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद अपने प्रदेश में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्टिंग में रम गये। वाम प्रतिबद्धता वाले युवा पत्रकारों के संगठन जेयूसीएस (जर्नलिस्‍ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी) से भी जुड़े हैं। उनसे rajeev.pucl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)