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Sunday, February 22, 2015

शपथ ग्रहण के दिन नीतीश कुमार का एक्सक्लूसिव लेख : 'बिहार के लिए पीएम के साथ मिलकर काम करूंगा'


बिहार के लोगों की सेवा करने का जो अवसर मिला है, उसके लिए मैं आभारी हूं। इतिहासकार भरोसे के साथ कहते हैं कि प्राचीन भारत का गौरवशाली इतिहास प्राचीन बिहार का इतिहास है। वैसे आज ये आम जानकारी है कि बिहार भारत का सबसे ग़रीब राज्य है और अगर इसके आकार के दुनिया भर के राज्यों से इसकी अलग से तुलना की जाए तो ये दुनिया का सबसे गरीब राज्य है।
Nitish Kumar's exclusive op-ed on the day that he takes oath as CM
क्या यही सब कुछ है? मैं ऐसा नहीं सोचता। मैं मानता हूं कि बिहार देश में बहुत बड़ी संभावनाओं वाला राज्य है और विकसित भारत की कहानी विकसित बिहार की कहानी के बिना संभव नहीं है। मैं इसे यथार्थ में बदलने के लिए काम करता रहा हूं, करता रहूंगा।

बिहार की मज़बूती, कमज़ोरी, इसके अवसर और इसकी प्रगति की चुनौतियों के बहुत सरल विश्लेषण से भी बिहार की संभावना को रेखांकित किया जा सकता है। बिहार की ताकत इसके लोगों में- ख़ासकर यहां की महिलाओं, यहां के नौजवानों, इसकी उपजाऊ ज़मीन, इसके प्रचुर जल स्रोतों, हज़ारों वर्षों की इसकी समृद्ध विरासत और बड़ी तेज़ी से फैल रहे बहु कुशल अनिवासी बिहारियों में है।

साथ ही साथ, बिहार के बहुत सारे कमज़ोर मोर्चे भी हैं। बिहार बुनियादी ढांचे और संस्थानों के विकास में बाकी देश से पीछे छूट गया, जो भारत के दूसरे समृद्ध और बेहतर विकसित राज्यों का मामला नहीं है। बुनियादी ढांचे और संस्थानों की कमी ने ज्ञान सृजन में एक बड़ी कमी को जन्म दिया है। इसके अलावा, बिहार चारों तरफ़ से ज़मीन से घिरा है। झारखंड के बिहार से अलग होने के बाद, बिहार के पास प्राकृतिक संसाधन भी नहीं रह गए। तो कुछ अंतर्निहित कमज़ोरियां हैं जिनसे राज्य को जूझना है।

बहरहाल, भविष्य उज्ज्वल है। बिहार की मज़बूती कोई उससे छीन नहीं सकता, जबकि उसकी कमज़ोरियां दूर करने के लिए व्यवस्थागत ढंग से काम किया जा सकता है। इसी बिंदु पर सबसे ज़्यादा अवसर बने हुए हैं। किसी भी दूसरे राज्य को सुशासन और नीति निर्माण से उतना फ़ायदा नहीं हो सकता, जितना बिहार को। यह केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह देश के भीतर बढ़ती विकराल गैरबराबरी को सहायक नीति निर्माण के ज़रिए दूर करे। विशेष राज्य का दर्जा ऐसा ही नीतिगत कदम है।

बिहार में बुनियादी ढांचे की बराबरी हासिल करने के लिए सड़क, रेल, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करने भर से राज्य की अर्थव्यवस्था रफ़्तार पकड़ लेगी। नेतृत्व और शासन यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि बिहार को उसका प्राप्य मिले और ज़रूरी आधारभूत और संस्थागत विकास हासिल करने के लिए परियोजनाओं को वक़्त पर पूरा किया जाए।

आज बिहार तकनीक की मदद से विकास के कई डग एक साथ भर सकता है। डिजिटल क्षमता से लैस बिहार किफायती तरीक़े से बेहतर स्तर की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक कल्याण मुहैया करा सकता है। राज्य के मूल बुनियादी ढांचे की बेहतरी, बेहतर शिक्षा और युवाओं के प्रशिक्षण, दुरुस्त कानून-व्यवस्था और बिजली की उपलब्धता निवेश और उद्यमिता की बेहद ज़रूरी बुनियाद रख देगी। यहां से बैंकों से मिलने वाला कर्ज़ निजी क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने में काफी अहम भूमिका निभाएगा। इस फ्रेम में, आप जहां भी देखें, निवेश की एक भूमिका है- चाहे वह बुनियादी सुविधा के विकास में हो, नौजवानों के कौशल और ज्ञान को बढ़ावा देने में हो या निवेश और उद्यमिता को सक्षम बनाने में हो। बिहार में निवेश का मामला सरल है और यह निवेशकों, राज्य और समाज को बिल्कुल समयबद्ध फायदा देगा।

इसके अलावा खेती के खाके पर भी काम चलता रहना चहिए, जो भारत को दूसरी हरित क्रांति की तरफ ले जाने के लिए राज्य द्वारा खींचा गया है, जिसकी मैं अक्सर एक रेनबो रिवॉल्यूशन (सतरंगी क्रांति) की तरह कल्पना करता हूं। बिहार छोटे किसानों का राज्य है जिनके पास देश की सबसे उपजाऊ भूमि है। खेती का खाका साफ़ तौर पर ऐसा नीतिगत दृष्टिकोण बनाता है जिससे खेती महत्वपूर्ण ढंग से और उत्पादक हो सके।

शहरीकरण वह एक और अहम क्षेत्र है जहां बिहार में अवसर ही अवसर हैं। आज बिहार के नौ में से एक ही आदमी शहरी इलाक़े में रहता है। इसे स्वाभाविक ढंग से बढ़ना है और अगले दस साल में कम से कम दुगुना हो जाना है। राज्य इस सूरत का फायदा उठा सकता है, बस यह सुनिश्चित करके कि बिहार के शहरी केंद्र बेहतर ढंग से नियोजित हों, वहां बिजली हो और वे रोज़गार सृजन के लंगर बन सकें। आधुनिक तकनीक के साथ, इसे कहीं बेहतर रफ़्तार और सुनिश्चित परिणामों के साथ हासिल किया जा सकता है।

बिहार के लिए एक अहम मौक़ा राज्य के अनिवासी लोगों का का बहुत बड़़ा आधार है जिनके पास तरह-तरह के कौशल हैं और ढेर सारे संसाधन हैं। राज्य से उनका ज़ुड़ाव सिर्फ़ संपत्ति और उनके विस्तृत परिवार तक ही सीमित नहीं है जो राज्य में रह रहा है, बल्कि यह एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव है और उनको बिहार के विकास के लिए काम करने को प्रेरित करता है। मैं इसे बहुत बड़ी संभावना के तौर पर देखता हूं कि अनिवासी बिहारियों के ज्ञान, साधनों और उनकी आकांक्षाओं को राज्य के विकास के मुद्दे की तरफ मोड़ा जा सकता है।

मुझे उन ख़तरों का भी पूरा-पूरा एहसास है जो बिहार लगातार झेल रहा है। एक तो, राज्य प्राकृतिक आपदाओं- ख़ासकर बाढ़ और अकाल का मारा है। पहले से ही बढ़ा हुआ ये खतरा जलवायु परिवर्तन को देखते हुए और बड़ा हो सकता है। दूसरे, हमारे बेहद घनी आबादी वाले और गरीब राज्य में जाति और धर्म अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए बिहार अन्याय, निष्क्रियता और विभाजक ताकतों का भी आसान शिकार है। जहां सक्रिय शासन से प्राकृतिक आपदा के ख़तरों को कम किया जा सकता है, वहीं सामाजिक मोर्चे पर राज्य को सहनशील बनाने का इकलौता उपाय न्याय के साथ विकास का नज़रिया है।

बिहार की सरकार ऐसी होनी चाहिए जो विकास कर सके, उसके फायदों को सबसे कमज़ोर तबकों तक पहुंचा सके, और सामाजिक समरसता को लगातार मज़बूत कर सके। दुनिया में कहीं भी किसी गरीब राज्य को बांटने वाली नीति और राजनीति से नहीं बदला गया है। तो बिहार के आगे बढ़ने का इकलौता रास्ता मज़बूत नेतृत्व, सुशासन और न्याय के साथ विकास है।

राज्य की मज़बूती, कमज़ोरी, उसके अवसरों और ख़तरों का यह सरल विश्लेषण भी राज्य की बेतहाशा संभावनाओं को सामने रख देता है। मेऱी कल्पना इस संभावना को मूर्त रूप देने की है। मज़बूतियों का पूरा-पूरा इस्तेमाल करना होगा- नौजवानों में आगे बढ़ने और योगदान करने का हुनर हासिल करना होगा, महिलाओं को समाज में अपनी समुचित भूमिका निभानी होगी. हमारी ज़मीन की उत्पादकता बढ़ानी होगी, जल संसाधनों के इस्तेमाल को उत्पादक बनाना होगा और दुनिया भर के लोगों को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अऩुभव कराना होगा। कमज़ोरियों को कम करना होगा। इसके लिए चाहे जो भी करना पड़े। बिहार को आधारभूत ढांचे, संस्थाओं और ज्ञान के मामले में बराबरी हासिल करनी है। यह राज्य और केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है।

अक्सर लोग बिहार के चूके हुए मौकों की बात करते हैं। अब और नहीं। मेरी कल्पना ऐसा दृष्टिकोण विकसित करने की है जिससे बिहार अपने अवसरों का पूरा इस्तेमाल करेगा। हमारे नौजवान लड़के-लड़कियां- और वे करोड़ों में हैं- बेहतर प्रशिक्षित होंगे और किसी भी दूसरे राज्य के लोगों से सक्षम होंगे। हमारे नगर और शहर बेहतर जीवन स्तर और रोज़गार के अवसर मुहैया कराएंगे। और राज्य उद्यमियों और निवेशकों के हब के रूप में विकसित होगा। साथ ही, हमारे गांव आत्मनिर्भर और जीवंत होंगे। इस बार बिहार दूसरी हरित क्रांति में सिर्फ शामिल नहीं होगा, बल्कि उसका नेतृत्व करेगा।

जहां मैं इन लक्ष्यों की ओर काम कर रहा हूं, मैं लोगों के लिए सबसे अहम संदेश भी साफ़ कर दूं। मैं एक ऐसा राज्य बनाने में लगूंगा जो हमेशा-हमेशा के लिए कुशासन की कहानी की छाया से मुक्त हो जाए। यह खयाल और डर कि बिहार कभी भी गैरज़िम्मेदार हुकूमत और कानून-व्यवस्था की ओर लौट सकता है, लोगों के दिलो-दिमाग से दूर होना चाहिए।

मेरी मूल ताकत सुशासन, समग्र विकास और सामाजिक समरसता देने की क्षमता है। जैसा कि मैंने बीते नौ सालों में कोशिश की है, मेरी हसरत एक ऐसा राज्य बनाने की है जहां मज़बूती संस्थागत हो जाए। और मैं ये कोशिश हमेशा हमेशा जारी रखते हुए, ऐसा राज्य बनाना चाहता हूं जो सकारात्मक भविष्य, जीवंत संस्कृति और टिकाऊ समरसता की दास्तान को भरोसे के साथ आगे ले जा सके। और ये हासिल करने में, मैं बिहार के हक़ में भारत सरकार और माननीय प्रधानमंत्री के साथ तत्परता के साथ काम करूंगा।

Monday, November 05, 2012

विशेष राज्य के दर्जे की लड़ाई नहीं, जनता को मुद्दे से भटकना है नीतीश बाबू


"

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए,
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए..."
दुष्यंत सिर्फ ये चंद पंक्तियाँ लिख कर लोगों के जहन में बदलाव की आग जला गए, पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इतनी भव्य रैली का आयोजन कर भी सिर्फ हंगामा खड़ा करने में कामयाब हो सके. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले ये हम सभी चाहते हैं, लेकिन क्या सिर्फ हंगामा खड़ा कर इस मकसद को पाया जा सकता है. नहीं.... कदापि नहीं.
नीतीश इसे मुद्दा बना राजनीति कर रहे हैं. कहीं ये तीर निशाने पर लग जाए और आगामी चुनाव में फिर एक बड़ी जीत. नीतीश बताएंगे कि अधिकार रैली के नाम पर कितने पैसे पार्टी फंड में जमा हुए. एक उदाहरण देता हूँ, मुज़फ्फ़रपुर सेन्ट्रल जेल में सजा काट रहे जेडीयू के पूर्व बाहुबली विधायक मुन्ना शुक्ला अधिकार रैली के लिए पार्टी को चंदा देने के एवज में वैशाली जिले के एक निजी कॉलेज संचालक से सात करोड़ की रंगदारी मांगी. शुरूआती जांच में इसे सही पाया गया. इसकी पुष्टि खुद एडीजी गुप्तेश्वर पाण्डेय कर चुके हैं. ऐसे कई उदाहरण हैं कि किस तरह से अरबों रूपए पार्टी फंड में चुनावी तैयारी के लिए जमा किये गए. इस चक्कर एक बड़ा सच सामने आ गया. सुशासन की पोल खुल गई. फंड के नाम पर जिस तरह से धन की उगाही हुई ये आम आदमी की नींद हराम करने के लिए काफी है. ये लालू राज के उस वाकये की याद दिलाता है जब लाठी रैली के लिए सुभाष और साधू यादव के गुंडे शोरुम से नई गाड़ियाँ और व्यापारियों से रंगदारी मांग नया चलन शुरू किया था. 
रैली को सफल बनाने के लिए पार्टी की तरफ से नौ विशेष रेलगाड़ियों को किराए पर लिया गया था. साथ ही सैकड़ों बसों के ज़रिए लोगों को रैली में लाने और वापस भेजने की मुफ्त सुविधा उपलब्ध भी कराई गई थी. बड़े-बड़े होर्डिंग, बैनर और पोस्टर से पटना शहर के तमाम प्रमुख हिस्सों को इस क़दर पाट दिया गया था, जैसे दल को अवैध अतिक्रमण की खुली छूट प्राप्त हो. इतना ही नहीं, रैली में आने वालों के मनोरंजन के लिए जदयू विधायकों और दल से जुड़े मंत्रियों के सरकारी आवासों पर नाच-गाने की भी पुख्ता व्यवस्था थी.
दरअसल ये विशेष राज्य के दर्जे की लड़ाई नहीं, पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश भर है. इस रैली का मकसद कार्यकर्ता में जोश भरना, एक जुट करना और विपक्ष को उसकी औकात बताना है. भीड़ जमा करें, पैसे जमा करें यही टास्क विधायकों, जिला अध्यक्षों और संगठन के कर्ताधर्ता को दिया गया था. मुर्गा, मछली और मटन बिरियानी का भोज, मुफ्त की पिकनिक, सैर सपाटा.. ऐसी ही सोच वाले लोग जमा हुए थे अधिकार रैली में. जिन्हें ये नहीं पता कि हमारे देश के प्रधानमंत्री कौन हैं, जो ये नहीं जानते कि बिहार के मुख्यमंत्री कौन हैं. जिन्हें ये नहीं पता कि बिहार देश है या राज्य या जिला. ऐसे ही लोग आते हैं इस रैली में. भीड़ में शामिल 70 फीसदी लोग ये नहीं जानते कि वो पटना क्या करने आये हैं. उन्हें नहीं पता क्या होता है विशेष राज्य. ये ऐसे ही लोग हैं जो नादानी में पैसे लेकर वोट देते हैं. जो डर या किसी दवाब में आ कर वोट देते हैं. इनकी अपनी सोच नहीं होती. ऐसे लोग इशारों पर चलते हैं. फिर नीतीश किस मकसद को पूरा करने के लिए ऐसी भीड़ जमा करते हैं.  
ये सत्ता का दंभ है. नीतीश ये दिखाना चाहते हैं कि मेरे एक इशारे पर क्या हो सकता है. वो ये साबित करना चाहते हैं कि विशेष राज्य के मुद्दे पर वो चुनाव जीत सकते हैं, या जो बड़ी पार्टी बिहार को ये तमगा देगी राज्य में जीत उसी की होगी. लेकिन ये महज एक चुनावी हथकंडा भर है. राजनीतिक रूप से बिहार को विशेष दर्जा मिल भी सकता है लेकिन तकनीकी रूप से शायद कभी नहीं. क्यूंकि राज्य इसके लिए जरूरी नियम फुलफील नहीं करता है.  
न्यूज़ चैनलों पर लाइव कवरेज, अख़बारों की अघोषित सहमती, इंटरनेट पर टेलीकास्ट... ये सब इतनी खूबसूरती से मैनेज किया गया था कि कोई भी साधारण सोच का आदमी नीतीश कुमार के झांसे में आ जायेगा. ये त्रासदी भी है कि लोग अक्सर ऐसी बात के लिए भीड़ बन जाते हैं जो शायद मुमकिन नहीं है.
अगर ऐसी रैली नीतीश शिक्षा में जागरूकता फ़ैलाने के लिए करते या महिलाओं के उत्थान के लिए करते. गांव गांव से लोगों को बुलाते, भीड़ जमा करते और शिक्षा की अहमियत को समझाते तो कोई बात होती. तब लगता सुशासन बाबू अपना काम कर रहे हैं. पर ऐसी बेतुका बातों के लिए अनपढ़, कमअक्ल, निर्दोष ग्रामीणों का नैतिक शोषण करना निहायत ही ओछी राजनीति है. अधिकार रैली शुद्ध रूप से राजनीतिक आयोजन है. इससे किसी भी रूप से विकास की खुशबू नहीं आती. केवल सत्ता में टिके रहने जैसी लालच की बू आती है. पैसे बनाने की बू आती है. धिक्कार है ऐसी रैली पर जिसका मकसद ही झूठा है.
ऐसी रैलियों में ताली इशारों पर बजती हैं. मंच पर जगह पाने के लिए नेताओं की आपस में लड़ाई होती है. भीड़ में हंगामा होता है. भाषण देने के लिए बड़े छोटे नेताओं में होड़ लगी रहती है. फिर कैसे ऐसी रैली से बिहार की आवाज़ को मजबूती मिलेगी. सत्तासीन दल के इस भव्य रैली का एक बड़ा मकसद है बड़ी पार्टियों को प्रभाव में लेना. ताकि वो इस मुद्दे को अपनी चुनावी घोषणा पत्र में जगह दे. उन्हें ये एहसास दिलाना कि इस सहमती के बगैर आप चुनाव नहीं जीत सकते. लेकिन नीतीश को ये याद रखना चाहिए कि बिहार में मुद्दे की नहीं जाति की राजनीति होती है. इसलिए इस आयोजन का बड़ी पार्टियों पर कोई असर होगा मुश्किल लगता है. नीतीश का दूसरा मकसद, जनता को उसके मुद्दे से भटका कर नकली सोच देना है. पर वो भूल रहे है कि ऐसे आयोजन का असर सिर्फ 24 घंटे ही रहता है. लोग ऐसी बातें जल्दी भूल जाते हैं. रोटी खाते वक़्त, सड़क पर चलते वक़्त और ढिबरी की रौशनी में पढाई करते वक़्त सरकार की खूबी और खामी समझ आती है. और यही वो चीज़ है जो रोज 24/7 लोग याद करते हैं.

Monday, October 29, 2012

बिहार में तेज चल ही है तेज़ाबी हवा, झुलस रही हैं स्त्रियां



समाज सड़ चुका है। विकास झूठ है, फरेब है। हाशिये के लोग इसकी सड़ांध झेलने को मजबूर हैं। महिलाएं और वो भी दलित हैं तो और भयानक शोषण और अत्याचार की शिकार हैं। विकास और सुशासन के नारों के बीच हाशिये के लोग लगातार संघर्ष कर रहे हैं। वहीं बिहार का घमंडी राजा नीतीश राजसूय यज्ञ कर रहा है और महिलाएं सामंतवादियों के चंगुल में नरक भोग रही हैं। उन पर लगातार हमले हो रहे हैं। बिहार में अभी हाल के दिनों में लगातार महिलाओं और दलितों के खिलाफ हमले बढ़े हैं। दूर दराज ही नहीं, बल्कि राजधानी और इससे सटे इलाकों में लगातार लड़कियों के रेप और हत्या जैसे मामले सामने आये हैं। अभी रोंगटे खड़े कर देने वाला ताजा मामला बिहार में राजधानी पटना से सटे मनेर थाने के छितनावां गांव का है। दबंगों ने क्रूरता की हद पार करते हुए रविवार 21 अक्टूबर की देर रात घर में घुस कर दो दलित बहनों चंचल और सोनम को तेजाब डालकर बुरी तरह जला दिया। कारण वही सामंतवादी पुरुष ऐंठन। वही सामंतवादी सोच कि गरीब, दलित और स्त्री होकर ये सामंतवादी पुरुष के शोषण का विरोध कैसे कर सकती हैं? कैसे नहीं तैयार होगी शोषित होने को स्त्री? ये सामंतवादी ताकतें इतनी प्रभावशाली हो गयी हैं कि सरकार इनके इशारों पर चल रही है। और जैसे-जैसे हाशिये का समाज सशक्त होने की कोशिश कर रहा है, सामंतवादी ताकतों का दमन बढ़ता जा रहा है।

मीडिया में भी खबरें आयी हैं कि प्रेम और शादी से इनकार करने पर दोनों दलित बहनों पर मनचलों ने तेजाब डाला है। बात साफ है कि यह वही पुरानी सामंतवादी सोच काम कर रही है कि स्त्री और वो भी गरीब और दलित कैसे पुरुष को अस्वीकार करने की हिम्मत जुटा रही है। तेजाब की शिकार चंचल को दबंग लगातार छेड़ते रहते थे। बाजार या पढ़ने आते-जाते वे लगातार उसे परेशान कर रहे थे। दबंगों के डर से वह चुप रह परिजनों को बताने से बचती रही, लेकिन दबंगों के सामने घुटने भी नहीं टेके। वे लगातार उसे बुरे परिणाम भुगतने की धमकी भी देते रहे। पर चंचल झुकी नहीं। हाल ये हुआ कि इन सामंतवादी पुरुषों के अहम को ठेस लगी और इन्होंने चंचल को अपनी क्रूरता का शिकार बना डाला। देर रात घर में घुस कर छत पर सो रही चंचल और उसकी छोटी बहन सोनम पर तेजाब डाल कर जला दिया। दलितों और महिलाओं के विरोध को कुचलने के लिए ही सामंतवादी ताकतें इतनी क्रूरता पर उतर आयी हैं। बिहार में आये दिन दलितों के खिलाफ हो रही हिंसा इसी सामंतवादी सोच को जाहिर कर रहे हैं। इससे पहले भी वैशाली में एक दलित छात्रा को दबंग परेशान करते रहे और विरोध करने पर उन्होंने उसके साथ बालात्कार कर के उसे कुएं में मार कर फेंक दिया था।

दबंगों की क्रूरता का शिकार हुई इंटर में पढ़ी रही चंचल बैंक में नौकरी करना चाहती थी। उसका यही सपना था ताकि गरीब मां-बाप को बेहतर जिंदगी दे सके। इसके लिए वह खूब मन लगा कर पढ़ाई भी कर रही थी। अपने सपनों को उड़ान देने के लिए उसने मनेर से दूर दानापुर में एक निजी संस्थान से कंप्यूटर के डीसीए कोर्स में भी दाखिला ले लिया था। वह रोज ऑटो से पढ़ने आया जाया करती थी। वहीं इसकी छोटी बहन सोनम सातवीं में पढ़ रही थी। सोनम की एक आंख पहले से ही खराब थी, इस हमले के बाद वह और सकते में है। वह भी पढ़-लिख कर मां-बाप की गरीबी दूर करना चाहती थी। लेकिन दबंगों ने तेजाब से न केवल इनके शरीर और आंखों को जलाया है बल्कि इनके सपनों को भी चकनाचूर कर दिया है।

चंचल का चेहरा पूरी तरह से झुलस चुका है। छाती, गला, पीठ और पैर भी तेजाब से जले हुए हैं। शरीर का कुल 28% भाग जल चुका है। वहीं छोटी बहन सोनम का 20% भाग, हाथ और पीठ-पैर झुलसा है। चंचल की दशा इतनी बुरी है कि वह बोल भी नहीं पा रही है। बड़ी मुश्किल से कराहते हुए वह कहती है “बैंक में नौकरी पा कर मां-बात की गरीबी दूर करना चाहती थी। अब क्या होगा समझ में नहीं आ रहा। जिंदगी बर्बाद हो गयी है”। ये बताते हुए उसको रोते हुए साफ महसूस किया जा सकता है, लेकिन हालत ऐसी है कि उसके आंसू भी पता नहीं चलते। बस सुनाई पड़ती है तो सिसकियां और दर्द भरी कराह।

चंचल के पिता शैलेश पासवान के लिए बेटियां ही सब कुछ थीं। ऐसे वक्त में जब बेटियों की चाह कोई नहीं रखता, इन्हें हमेशा बेटियों की ही चाह थी। दो बेटियां होने के बाद इन्होंने और कोई औलाद नहीं चाही। वे फफकते हुए कह पड़ते हैं, “चाहते थे कि बेटियां अपने पैरों पर खड़ा होकर नाम रोशन करेगी। हमारी गरीबी भी दूर होगी। इसलिए बेटियों को पढ़ा भी रहे थे। लेकिन अब बेटियों के इस हाल के बाद भविष्य अंधकारमय हो गया है”।

पीड़ित दलित परिवार बेहद गरीब है। परिवार इंदिरा आवास से उपलब्ध घर में ही रहता है। कमरों का अभाव होने के कारण ही ठंड शुरू हो जाने के बावजूद भी बहनों को छत पर सोना पड़ रहा था। मां-बाप मेहनत मजदूरी करके गुजारा करते हैं। बड़ी मुश्किल से बेटियों की पढ़ाई हो रही थी। सोनम गांव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर पा रही थी। चंचल जैसे-तैसे कंप्यूटर कोर्स कर रही थी। वहीं अब इस घटना के बाद परिवार को कुछ सूझ नहीं रहा है। चंचल और सोनम के इलाज में भी पैसे लगेंगे। फिलहाल तो पटना के पीएमसीएच में मुफ्त में इलाज चल रहा है, लेकिन दवाएं बाहर से भी खरीदनी पड़ रही हैं। चंचल की हालत इतनी नाजुक है कि इलाज लंबा चलेगा। पूरी तरह से ठीक होने में लंबा वक्त लगेगा। चेहरा इतना झुलसा है कि कैसे ठीक होगी, कहना मुश्किल है। बेहतर सर्जरी के लिए अच्छे अस्पताल और इलाज खर्च की जरूरत है। जबकि परिजन इसमें सक्षम नहीं हैं। फिलहाल पीएमसीएच में इलाज चल रहा है लेकिन ऐसे हाल में जब बिना काम किये परिजनों का गुजारा मुश्किल है, इलाज कैसे चलता रहेगा कहना मुश्किल है। बार-बार पत्रकारों और संगठनों की पूछताछ से खीज चुकी चचंल की मां सुनैना देवी गुस्से में कहती हैं, “कुछो तो नहीं हो रहा है खबर छपे के। कउनो फायदा नहीं हो रहा। रोजे अखबार में छपइत है लेकिन अभी तक कोई मुआवजे न मिलल”

दरिंदों के पक्ष में दैनिक जागरण:
पटना में दैनिक जागरण महिलाओं के मामले में जिस तरह रिपोर्टिंग कर रहा है, उससे इसकी सामंतवादी सोच का पता चलता है। पिछले दिनों पटना में गैंग रेप की शिकार लड़की को जहां बेबुनियादी तर्कों के आधार पर वह कठघरे में खड़ा कर रहा था, वहीं इस मामले में भी कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है। 26 अक्टूबर को अखबार लिखता है कि चंचल के फर्द बयान पर उसका अंगूठा क्यों लगा, जबकि वह इंटर की छात्रा है, हस्ताक्षर होना चाहिए था। इससे काफी कुछ पता चलता है कि गड़बड़ है। अब यह अखबार केवल इस बात से दबंगों पर आरोप को संदिग्ध बता रहा है। जबकि चंचल की हालत बिल्कुल नाजुक थी। वह निस्‍तेज पड़ी रहती थी। बोल पाने में असक्षम थी। ऐसे नाजुक हाल में हस्ताक्षर के बजाय अंगूठा ले लिया गया होगा। दैनिक जागरण आगे लिखता है कि अपराधियों को घर में किसी ने नहीं देखा। देर रात सारे लोग सोये थे। सोयी अवस्था में तेजाब डाल अपराधी भाग खड़े हुए। ऐसे हाल में अपराधियों को कैसे पहचाना जा सकता था। दैनिक जागरण की रिपोर्ट से साफ है कि वह पीड़ित परिवार को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा है।

इस सुशासन में अपराधियों के मनोबल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मीडिया में इसकी खबर प्रकाशित होने और तीन गिरफ्तारियों होने के बावजूद दबंगों का हौसला कम नहीं हुआ है। दबंग लगातार परिजनों को धमकी देते फिर रहे हैं। चंचल के चाचा मिथिलेश पासवान बताते हैं, “26 अक्टूबर की रात को दबंगों ने दुबारा घर पर हमला बोला। रात में दरवाजे पर धक्का देते रहे, जंजीर खटखटाते रहे और दरवाजा न खोलने पर घर उड़ा देने की धमकी दी। वहीं 27 अक्टूबर को कुछ संदिग्ध युवक पीएमसीएच तक पहुंच कर छात्राओं के बारे में पूछते पाए गये”। ऊपर से पुलिस का वही पुराना रटा-रटाया जवाब मिल रहा है कि धड़-पकड़ जारी है। ऐसे हाल में परिजन भय में जी रहे हैं और सुशासन कान में तेल डाल कर सो रही है।

पीड़ित परिवार जहां बेहद गरीब है, वहीं इनकी मदद को कोई सामने नहीं आ रहा है। एपवा और एक-दो दलित संगठनों ने पीड़ितों से मुलाकात के बाद सरकार से मुआवजे और अपराधियों की गिरफ्तारी की मांग जरूर की है। भाकपा माले ने भी विरोध प्रदर्शन भी किया है। लेकिन इनका दायरा केवल सरकार से मांग तक सीमित होने के कारण कोई तात्कालिक सहायता नहीं पहुंची है। बिहार राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने मुआवजे की बात कही है लेकिन अभी तक कोई सहायता राशि परिजनों को नहीं मिली है। कोई सामाजिक संगठन या एनजीओ ने भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ली है, जबकि पीड़ित परिवार बेहद गरीब है। बहरहाल चंचल और सोनम के सपने टूट चुके हैं और इनको मदद की जरूरत है।

ऐसे हाल में जब महिलाओं के खिलाफ लगातार हिंसा सामने आ रही है, राजधानी में पटना में पिछले दिनों कई गैंग रेप के मामले सामने आये हैं, दलित छात्राओं के रेप और हत्या के मामले सामने आये हैं, कुछ ही किलोमीटर दूर मनेर में दबंग इतने हौसले में हैं कि तेजाब से जलाने और गिरफ्तारी के बाद भी दबंगई से बाज नहीं आ रहे हैं… ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अधिकार यात्रा के आयोजन में व्यस्त हैं। अपराधियों का हौसला यों ही नहीं बढ़ा हुआ है। बल्कि इस सुशासन में इन्हीं लोगों की सहभागिता है। चार नवंबबर को होने वाले अधिकार सम्मेलन को लेकर बाहुबली अनंत सिंह से लेकर सुनील पांडेय और हुलास पांडेय जैसों के विशालकाय होर्डिंग से पटना की सड़कें पटी पड़ी हैं। और तो और, अधिकार सम्मेलन के लिए भारी रंगदारी वसूली जा रही है। 28 अक्टूबर को जदयू के पूर्व सासंद पर अधिकार रैली के लिए सात करोड़ रुपये रंगदारी मांगने का आरोप लगा है। हाजीपुर के एक निजी शैक्षणिक ग्रुप डायरेक्टर ने यह आरोप लगाया है। साफ है कि सरकार में कौन लोग हैं। ऐसे लोग ही सत्ता में शामिल हैं और अधिकार की मांग कर रहे हैं। जहां हाशिये के लोगों के अधिकार छीने जा रहे हैं, शोषण किया जा रहा है। आखिर सुशासन बाबू किनके अधिकारों की बात कर रहे हैं? अपराधियों की ही न! हाशिये के लोगों के अधिकारों की तो न सुशासन बाबू को फिक्र है न प्रशासन को, फिर सत्ता में सामंतवादी और अपराधी ही तो शामिल हैं। तो क्यों न अपराधियों और सामंतवादियों का मनोबल बढ़े?

एक व्यक्तिगत अपील: पीड़ित दलित परिवार बेहद गरीब है। मजदूरी से ही खर्चा चलता है। ऐसे हाल में तेजाब से बुरी तरह झुलसी छात्राओं का पूरी तरह ठीक होना कैसे संभव है, कह नहीं सकता। सरकारी पीएमसीएच अस्पताल में मुफ्त इलाज के सिवा और कोई मदद अभी तक सामने नहीं आयी है। इलाज और सर्जरी वगैरह में लाखों रुपये खर्च हो सकते हैं। संस्थाओं या व्यक्तियों से अनुरोध है कि हो सके तो पीड़ित परिवार की मदद करें।

Monday, September 03, 2012

हम दोनों हैं अलग अलग :-) हम दोनों हैं जुदा जुदा :-) :-)



नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार : दो मित्रों की कहानी

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार क्रमशः गुजरात और बिहार के मुख्यमंत्री हैं और इन दिनों लगातार सुर्खियों में हैं। दोनों न केवल एक ही राशि के हैं, बल्कि एक ही राजनीतिक गठबंधन के भी; लेकिन दोनों में आजकल ठनी है। कम-से-कम दिखता तो ऐसा ही है।

लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि नीतीश कुमार का अंतर्मन नरेंद्र मोदी से गहरे प्रभावित रहा है। आज दिख रही शत्रुता में भी कभी-कभी मुझे मित्रता का ही भाव दिखता है। मनोविज्ञान में प्यार-घृणा एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाते हैं। इन दोनों की मित्रता और शत्रुता कुछ ज्यादा ही गड्ड-मड्ड हो गयी है।

एक घटना को याद कर रहा हूं। 2004 की गरमियां थीं। लोकसभा के चुनावों का नतीजा आ चुका था और बिहार में लालू प्रसाद के नेतृत्व में यूपीए को निर्णायक बढ़त मिली थी। जॉर्ज-नीतीश के नेतृत्व में एनडीए बुरी तरह पिट चुका था। नीतीश जी मेरे घर आये थे। फुरसत में थे, सो घंटों दुनिया-जहान की बातें होती रहीं। मेरा कहना था कि नरेंद्र मोदी के कारण एनडीए को हार का सामना करना पड़ा। नीतीश जी इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे। मैं नरेंद्र मोदी के खिलाफ रुख लिये हुए था। नीतीश जी ने स्थिर और गंभीर होकर कहा – नरेंद्र मोदी बीजेपी का नया चेहरा है। वह अति पिछड़े तबके से आता है। घांची है, घांची। गुजरात की एक अत्यल्पसंख्यक पिछड़ी जाति है यह। बीजेपी की ब्राह्मण लाबी उसे बदनाम करने पर तुली है। इसमें वाजपेयी तक शामिल हैं। डायनमिक आदमी है। आप अगर उससे एक बार मिल लीजिएगा, तो उसके प्रशंसक हो जाइएगा। निहायत गरीब परिवार से आता है। सादगी और कर्मठता कूट-कूट कर भरी है उसमें। नीतीश जी एक त्वरा (ट्रांस) में थे। वह बोले ही जा रहे थे। मोदी द्वारा दिये गये एक आतिथ्य को चुभलाते हुए उन्होंने अपनी बात को एक विराम दिया, ‘मैं तो उसका फैन हो गया हूं।‘

मुझे आश्चर्य होता है नरेंद्र मोदी का यह फैन आज उसके लिए फन काढ़कर कैसे बैठा है। क्या इसे ही राजनीति कहते हैं। क्या मुस्लिम वोट बैंक पर सेंध लगाने के लिए यह सब हो रहा है। या फिर कुछ और बात है?

मैं नहीं बता सकता कि असलियत क्या है। क्योंकि नीतीश कुमार से इन दिनों मेरी व्यक्तिगत दूरी है। अनुमान आखिर अनुमान होते हैं। कहनेवाले तो यह भी कहते हैं कि प्रकारांतर से नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की मदद ही कर रहे हैं, वे उन्हें लगातार चर्चा में बनाये रखे हुए हैं। ऐसा मित्र-लाभ भला कौन नहीं पाना चाहेगा। संभव है इस बात में कुछ सच्चाई हो, लेकिन सार्वजनिक संबंधों की जो कड़वाहट नीतीश कुमार ने पैदा की है, वह तो दिख रही है। इस कड़वाहट से शायद उन्हें किसी बड़े नतीजे की उम्मीद है। लेकिन क्या यह संभव है?

नरेंद्र मोदी बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार हैं। नीतीश कुमार के मन में भी इसी पद की व्याकुल लालसा है। स्वार्थ के इस टकराव ने ही मित्र को शत्रु बना दिया है। ऐसे में कोई क्या कर सकता है?

पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जहां तक मुझे याद है, जून 2010 में नीतीश कुमार ने पटना में आयोजित बीजेपी राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने वाले लोगों के लिए अपने सरकारी आवास पर एक भोज का आयोजन किया था। ऐन वक्त पर एक विज्ञापन का बहाना बनाकर उस भोज को रद्द कर दिया गया। विज्ञापनकर्ता कोई व्यापारी था और उसने 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान जालंधर में एक ही मंच से चुनावी उद्घोष कर रहे नरेंद्र-नीतीश की जगमग तस्वीर अखबारों में प्रकाशित करा दिया था। दरअसल वह बिहार की धरती पर इस तस्वीर के साथ नरेंद्र मोदी का इस्तकबाल करना चाहता था। बदहवास नीतीश ने सामान्य शिष्टाचार को भी ताक पर रख दिया। बाढ़ के समय गुजरात सरकार द्वारा भेजी गयी सहायता राशि लौटा दी। नीतीश, नरेंद्र मोदी से अपने संबंधों को सार्वजनिक करने के विरुद्ध थे। विज्ञापनकर्ता ने शायद इस बात को गंभीरता से नहीं समझा था कि कुछ संबंध – खासकर प्रेम संबंध – के सार्वजनिक करने के खतरे ज्यादा होते हैं। यही हुआ। भाजपा नेताओं को अपमानित होना पड़ा। उन्होंने सब कुछ बर्दाश्त किया। हालांकि उन्हें इन सब का अभ्यास है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती के नखरे भी उन्होंने खूब बर्दाश्त किये हैं। यह गठबंधन की विवशता है। भाजपा अपनी दुधारू गाय की लताड़ भी बर्दाश्त करेगी। असलियत तो यही है न कि भाजपा के राजनीतिक खूंटे पर नीतीश हैं। न कि नीतीश के खूंटे पर भाजपा।

2012 के राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश ने भाजपा के उम्मीदवार का समर्थन न करके कांग्रेसी उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया, तब एक बार फिर मीडिया ने नीतीश की धर्मनिरपेक्षता को थपथपाया। मीडिया ने इस बात की भी समीक्षा नहीं की कि इस मामले में धर्मनिरपेक्षता की बात कहां आती है। क्या भाजपा समर्थित उम्मीदवार संगमा सांप्रदायिक चरित्र के हैं? और नहीं तो फिर क्या कांग्रेस ही धर्मनिरपेक्षता का असली घराना है। नीतीश ने इस बीच ऐसा आलाप लगाया मानो वह ही धर्मनिरपेक्षता के मुख्य ध्वजवाहक हैं और इस मुल्क की सेक्यूलर पालिटिक्स बस उन्हीं के बूते चल रही है। किसी ने भी वास्तविकता को सामने लाने का साहस नहीं किया कि प्रणव मुखर्जी कांग्रेस से अधिक अंबानी घराने के उम्मीदवार थे, और नीतीश को इस घराने के विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं थी; क्योंकि इस घराने का एक दूत नीतीश के दल में सांसद के रूप में बना हुआ है, और पूरे दल को संचालित करता है। नीतीश की पीठ थपथपा रहे लोगों को भी याद रखना चाहिए कि प्रणव के समर्थन में नीतीश थे, तो बगल में बाल ठाकरे भी थे।

मैं उन लोगों में नहीं हूं, जो नरेंद्र मोदी को गोधरा उपरांत दंगों के लिए क्लीन चिट दे चुके हैं, या फिर बाबरी मस्जिद मामले के लिए आडवाणी के कृत्यों को भूल चुके हैं। 2002 का गुजरात दंगा भयावह था और मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की जिम्मेवारी थी कि वह उसे रोकें। मैं उन्हें आज भी दोषी मानता हूं। लेकिन क्या वह अकेले दोषी थे? उस वक्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। उन्होंने गुजरात सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं किया? उनके पास तो बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद कई राज्य सरकारों को एक साथ बर्खास्त किये जाने का उदाहरण मौजूद था। वाजपेयी ने गुजरात दंगों के पूर्व बिहार में सेनारी नरसंहार पर बिहार सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाया था। सेनारी दुर्घटना से गुजरात दंगे कहीं ज्यादा भयावह थे। जब एक नरसंहार के लिए बिहार सरकार बर्खास्त हो सकती थी, तो फिर गुजरात सरकार क्यों नहीं? क्या नरेंद्र मोदी ने अकेले राजधर्म का पालन नहीं किया था? वाजपेयी कौन से राजधर्म का पालन कर रहे थे।

और वाजपेयी को मसीहा मानने वाले नीतीश कुमार ने तब किस राजधर्म का पालन किया था? नरेंद्र मोदी की आज वे चाहे जितनी तौहीन कर लें, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उस वक्त रेलमंत्री वही थे और गोधरा कांड रेल में ही हुआ था। उसके पूर्व गाइसल ट्रेन दुर्घटना में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री पद से त्यागपत्र देने वाले (हालांकि त्यागपत्रित सरकार से) नीतीश गोधरा हादसे के निरीक्षण के लिए भी प्रस्तुत नहीं हुए। आश्चर्य है कि यह आदमी भी आज नरेंद्र मोदी को नसीहत दे रहा है और वह भी दंगों को लेकर।

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार दोनों गोधरा मामले में दूध के धुले नहीं हैं। दोनों ने, और फिर दोनों के दादागुरु वाजपेयी ने भी तब राजधर्म का पालन नहीं किया था। दोनों विज्ञापनप्रिय हैं और दोनों ने विकास पुरुष की पट्टी अपने माथे पर खुद बांध रखी है। उपलब्धियों की बात की जाए तो गुजरात और बिहार दोनों राज्यों में बेतरह असमानता बढ़ी है। दोनों जगह के अमीर ज्यादा पावरफुल हुए हैं, और गरीब ज्यादा दयनीय।

लेकिन नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार में कुछ गैरमामूली अंतर भी है। नीतीश बिहार के कुलक उच्चकुर्मी परिवार से आते हैं और नरेंद्र मोदी गुजरात के निर्धन अति पिछड़े घांची परिवार से। नीतीश के पिता वैद्यराज और कांग्रेसी नेता थे जबकि नरेंद्र के पिता मामूली चाय दुकानदार, जहां नरेंद्र ने अपना बचपन ग्राहकों के जूठे गिलास मांजकर गुजारा। नीतीश इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, तब नरेंद्र एक वकील परिवार में डोमेस्टिक हेल्पर थे, जहां रोज नौ कमरों की सफाई और पंद्रह लोगों के खाना बनाने का काम उन्हें करना पड़ता था। उन्होंने प्राइवेट परीक्षाएं देकर येन केन प्रकारेण डिग्रियां हासिल की हैं और जो सीखा है दुनिया की खुली युनिवर्सिटी में सीखा है। वह दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े हैं, लेकिन उनका बचपन और युवावस्था रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की तरह संघर्षमय रहा है। एक अंतर और रहा है नरेंद्र मोदी और नीतीश में। मुख्यमंत्री के रूप में भी नरेंद्र सादगी पसंद रहे हैं। उन्होंने चापलूसों-चाटुकारों को अपने से दूर ही रखा है। दागदार लोगों से जुड़ना नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं आया। लेकिन यही बात नीतीश कुमार के लिए नहीं कही जा सकती। कभी साफ-सुथरी छवि वाले नीतीश आज विवादों से घिरे हैं। उनकी जीवन शैली बदल चुकी है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक अपने सरकारी आवास और पैतृक गांव को संवारने में उन्होंने सरकारी खजाने से सैंकड़ों करोड़ रुपये खर्च किये हैं। चापलूस, अपराधी और दागदार आज उनकी खास पसंद हैं और अपने खानदान की मूर्तियां स्थापित करने में मायावती से वह थोड़ा ही पीछे हैं।

(प्रेमकुमार मणि। हिंदी के प्रतिनिधि कथाकार, चिंतक व राजनीति कर्मी। जदयू के संस्‍थापक सदस्‍यों में रहे। इन दिनों बिहार परिवर्तन मोर्चा के बैनर तले मार्क्‍सवादियों, आंबेडकरवादियों और समाजवादियों को एक राजनीति मंच पर लाने में जुटे हैं। उपरोक्‍त लेख फारवर्ड प्रेस के सितंबर, 2012 अंक में उनके कॉलम ‘जनविकल्‍प’ के तहत प्रकाशित हुआ है। उनसे manipk25@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)