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Saturday, July 20, 2013

जातिप्रथा, भारतीय मुसलमान और इस्लाम


मुसलमानों की सामाजिक सरंचना धर्म और कुरआन के निर्देशों पर आधारित समझी जाती है, कुरआन जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है और यह बतलाता है की जन्म, वंश और स्थान के आधार पर सभी मुसलमान बराबर हैं और मुसलमानों में हिन्दुओ जैसी कोई बंद जाति व्यवस्था नहीं है। यह एक सैधांतिक बात है परन्तु जब हम मुसलमानों को व्यवहार की द्रष्टि से देखते हैं तो पता चलता है कि किसी ना किसी रूप में मुस्लिम समाज में भी जाति व्यवस्था कि जड़ें गहरे तक पायी जाती है और सभी मुसलमान खुद को एक नहीं मानते हैं। केवल इतना ही नहीं, विवाह इत्यादी में भी एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने में भी कुछ सामजिक और जातीय नियमों का पालन करते हैं। अर्थात विवाह सम्बन्ध स्थापित करने में भी मुसलमान पूर्ण स्वतंत्र नहीं है। कुछ ऐसा प्रतीत होता है की भूगोलिक प्रजातीय, जनजातीय और राजनैतिक विभेदों के परिणाम स्वरुप मुस्लिम समाज में भी सामाजिक संस्तरण की व्यवस्था विध्यमान है। भारतीय मुसलमानों पर अरब/ तुर्की और फारस के मुसलमानों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव है। फलस्वरूप इनमें भी एक ऐसा सामाजिक संस्तरण (social stratification) पनप गया है जिसको समझा जाना आवश्यक है।

भारत में सामाजिक संस्तरण के विकसित होने का कारण हिन्दुओं का मुस्लिम में परिवर्तित होना रहा। यधपि परिवर्तित मुसलमान पूर्णतया अपने मूल जाति-धर्म को नहीं छोड़ नहीं पाए और न ही पूर्णतया परिवर्तित हुए। हां सम्बन्ध दोनों ओर रखा! मुस्लिम सामाजिक सरंचना के सम्बन्ध में दो तथ्य उल्लेखित किया जाना जरूरी है। पहला, मुस्लिम समाज में सामाजिक संस्तरण व्यवहार में विध्यमान है। और दूसरा, मुस्लिम प्रशासकों ने अपनी ओर से हिंदू जनसख्या के भाग को मुस्लिम जनसँख्या में परिवर्तित होने की पूरी पूरी छूट भी दी थी।

उपरोक्त दो तथ्यों से फिर दो तथ्य सामने आ जाते हैं, पहला, मुस्लिम समाज में वो मुसलमान जिनके पूर्वज विदेश से आकार बसे। और दूसरा, वो मुसलमान जो अपनी जाती या धर्म परिवर्तित करके मुसलमान बन गए।मोटे तौर पर भारतीय मुसलमानों को तीन स्तरों में विभक्त किया जा सकता है। पहला, उच्च जाती के मुसलमान जिन्हें अशरफशब्द से पुकारा जाता है। दूसरा, धर्म परिवर्तन द्वारा बने मुसलमान और तीसरा, जिनको व्यवसाय के परिवर्तन स्वरुप मुसलमानों में शामिल किया गया-(डा० अंसारी के अनुसार)

इस सम्बन्ध में दूसरी विचारधारा प्रसिद्द विद्वान नजमुल करीम साहब की है इनके अनुसार भारतीय मुसलमानों को हिन्दुओ की भाँती चार खंडों में विभक्त किया गया है- सैय्यद, मुग़ल, शैख़ और पठान।

डा. अंसारी ने संस्तरण में जो उपरोक्त विचार दिए हैं इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि अशरफ मुसलमानों में वो मुसलमान आते हैं जो विदेशो से आकार भारत में बस गए और ये लोग खुद को भारतीय मुस्लिम जाति संस्तरण में सबसे ऊँचा मानते थे। इस सम्बन्ध में अंसारी आगे बतलाते हैं की अशरफशब्द अरबी भाषा के शरीफ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है आदरणीयअर्थात वे मुसलमान आदरणीय हैं जो अशरफ मुसलमान है! धर्म परिवर्तित वे मुसलमान हैं जो मूलतः हिन्दुओं की उच्च जातियों से परिवर्तित हैं। इन्होंने अपनी स्थिति अशरफ मुसलमानों से ऊँची समझी और व्यवसायिक मुसलमानों से खुद को ऊपर माना!

डा. अंसारी के अनुसार श्रेष्ट मुसलमानों ओर व्यवसायिक मुसलमानों के बीच का यह वर्ग है। डा. अंसारी के अनुसार तीसरे मुसलमान वे हैं जो प्रारंभ में हिंदू थे जिनके पूर्वजो ने कुछ मुसलमान व्यवसाय अपना लिए और फिर वे मुसलमान बन गए। ये मुसलमान भारत के सभी प्रान्तों में पाए जाते हैं।

नजमुल करीम साहब के अनुसार, सैय्यद मुसलमानों में, वे लोग अपने को मानते हैं, जो मुस्लिम समाज में हिंदुओं की तरह ब्राह्मणों का स्तर रखते हैं। वैसे 'सैयद' का शाब्दिक अर्थ "राजकुमार" से है। ये लोग अपने नाम के आगे मीर और सैय्यद शब्दों का प्रयोग करते हैं। सैय्यदों में अनेको उपजातिया हैं, जिनमें असकरी, बाकरी, हसीनी, हुसैनी, काज़मी, तकवी, रिज़वी, जैदी, अल्वी, अब्बासी, जाफरी और हाशमी जातियां आती हैं।

शैख़ जातियों में, उस्मानी सिद्दीकी, फारुखी , खुरासनी, मलिकी और किदवई इत्यादी जातियां आती हैं। इनका सैय्यदों के बाद दूसरा स्थान है। शैख़ शब्द का अर्थ है मुखिया, परन्तु व्यवहार में मुसलमानों के धार्मिक गुरु शैख़ कहलाते थे, भारत के सभी प्रान्तों में ये लोग पाए जाते हैं।

मुगुल लोगों में, उजबेक, तुर्कमान, ताजिक, तैमूरी, चंगताई, किब और जिंश्वाश जाति के लोग आते हैं। माना जाता है कि ये लोग मंगोलिया में मंगोल जाती के लोग हैं और अपने नाम के आगे 'मिर्ज़ा' शब्द का प्रयोग करते हैं।

पठानों में, आफरीदी, बंगल, बारक, ओई, वारेच्छ, दुर्रानी, खलील, ककार, लोदहो, रोहिल्ला और युसुफजाई इत्यादी आते हैं। इनके पूर्वज अफगानिस्तान से आये थे। अधिकांशतः ये लोग अपने नाम के पीछे 'खान' शब्द का प्रयोग करते हैं।

राजस्थान के मुस्लिम राजपूतों में तलवार के बल पर और मनसबदारी, ऊँचे ओहदों, धन, प्रशासन और सरकारी सम्मान इत्यादि के लालच में और वैवाहिक संबंधो के कारण बहुत राजपूत जातियां मुस्लमान बनी। इन लोहों में मुसलमान होने से पहले ही ऊँच-नीच का भेदभाव अत्यंत तीव्र था और मुसलमान होने के बाद भी इन्होंने जातिगत भेदभाव बनाये रखा। इसी कारण ये अपने से निचली जातियों में खान पान और वैवाहिक सम्बन्ध नहीं रखते, जो आज भी बरकरार है। ये केवल अपने सामान और ऊँची अशरफी जातियों तक सीमित हैं। इन जातियों में, चंदेल, तोमर, बरबुजा, बीसने, भट्टी, गौतम, चौहान, पनबार, राठौर, और सोमवंशी हैं।

मुसलमानों में कुछ जातियों को व्यवसाय के आधार पर भी समझा जा सकता है, इनमें अंसारी (जुलाहे/बुनकर), कुरैशी (कसाई) छीपी, मनिहार, बढाई, लुहार, मंसूरी (धुनें) तेली, सक्के, धोबी नाई (सलमानी ), दर्जी (इदरीसी), ठठेरे जूता बनाने वाले और कुम्हार इत्यादी शामिल हैं। ये व्यावसायिक जातियां थी जो पहले हिंदू थी और बाद में मुसलमान में परिवर्तित हो गईं। इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसायिक जातियां है जैसे-आतिशबाज़, बावर्ची, भांड, गद्दी, मोमिन, मिरासी, नानबाई, कुंजडा, दुनिया, कबाड़ियों, चिकुवा फ़कीर इत्यादी।

मुसलमानों में अस्पृश्य जातियां भी है। हालाँकि पैगम्बर मुहम्मद (S.A.W.) ने मनुष्यों में भेदभाव नहीं माना था, परन्तु भारतीय समाज की दशा में ये अलग तरह से सामने आया और मुस्लिमो में भी छुआछूत और भेदभाव की बाते सामने आईं। यद्यपि ये हिन्दुओं जैसी कठोर नहीं थी, फिर भी अशरफ और राजपूत जातियां इनसे दूर ही रहीं। इन जातियों में अनेक उपजातियां मिलती है जैसे- गाजीपुरी, रावत, लाल बेगी, पत्थर फोड, शेख, महतर, बांस फोड और वाल्मीकि इत्यादी।

इस प्रकार आसानी से समझा जा सकता है कि भारतीय मुस्लिमों में जातीय व्यवस्था के भारत के संदर्भ में क्या आधार रहे हैं।

~फरहाना अंसारी

Friday, January 04, 2013

बारा रबीअव्वल – गम या खुशी?



बर्रा सगीर (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश) मे हर साल 12 रबीअव्वल को बड़ी धूम-धाम से रसूल अकरम सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का यौम ए विलादत मनाया जाता हैं, जगह-जगह जुलूस निकलते हैं, गली-गली चरागा होता हैं, खाने-पकाने का भी खूब इन्तज़ाम होता हैं और ये सब एक जश्न की सूरत मे हर साल नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत बड़े ही एहतमाम के साथ करती हैं| और इस जश्न को ईद मिलादुन्नबी कहा जाता हैं|

इसमे कोई शक नही के ये तमाम काम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की अकीदत और मोहब्बत मे होते हैं लेकिन काबिले गौर बात ये हैं के हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के साथ किस तरह की मोहब्बत रखनी चाहिए और हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने इस बारे मे क्या हुक्म दिया हैं| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये हैं कि हम साल मे एक बार उनके विलादत का जश्न मना ले तो क्या हमने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत क हक अदा कर दिया या नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये के हम उनके लाये हुए इस दीन ए इस्लाम को अपनी ज़िन्दगी का आईना बना ले?

अगर हम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के विलादत के जश्न को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत का नाम दे तो ज़ाहिर और साबित तौर पर हम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा अरबाअ को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की इस अकीदत और मोहब्बत से बेगाना पायेगें क्योकि जश्न विलादत का ये एह्तमाम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा मे से किसी ने भी नही किया न किसी ने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के बाद इसका हुक्म दिया| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब उनके लाये हुये दीन की पैरवी करना हैं तो आज हम दीन ए इस्लाम से बेगाने हैं क्योकि दीन ए इस्लाम को सहाबा के बाद अगर किसी ने समझा हैं तो ताबाईन और तबाताबाईन हैं लिहाज़ा हम जिस काम को आज दीन समझ कर कर रहे हैं उसका दीन ए इस्लाम से कोई वास्ता नही और इस लिहाज़ से हम गुनाह की ज़द मे हैं|

कोई इन्सान नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत और दीन ए इस्लाम का हक तब तक नही अदा कर सकता जब तक वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के लाये इस दीन की पैरवी न करे और उसे अमली तौर पर न करे| जैसा के सहाबा, ताबाईन और तबाताबाईन ने किया तो फ़िर सोचने की बात ये हैं के क्या जश्न ए मिलादुन्नबी से हमारा कोई वस्ता हैं या नही?

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

दीन मे अपनी तरफ़ से इजाफ़ा मरदूद और नाकाबिले कबूल हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

मज़ीद फ़रमाया के –

दीन मे इज़ाफ़ाशुदा काम (बिदअत) मरदूद ही नही बल्कि गुमराही हैं जो जहन्नम मे ले जाने वाली हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

ईदमिलदुन्नबी मनाने से पहले ये तय करना ज़रूरी हैं नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत कब हुई? और आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने वफ़ात कब पाई क्योकि आज जिस तारिख पर ये जश्न होता हैं उसी दिन आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात भी हुई और विलादत भी हुई| लिहाज़ा आज मआशरे मे जिस दिन जश्न होता हैं वो विलादत और वफ़ात दोनो का ही दिन हैं|

इस बारे मे तमाम तारीख लिखने वालो और सीरत लिखने वालो का इस बारे मे इत्तेफ़ाक हैं के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पीर(सोमवार) को हुई| और बारे मे आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की एक हदीस मौजूद हैं|

हज़रत अबू कतादा रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से पीर(सोमवार) के बारे मे पूछा गया तो आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – ये वो दिन हैं जिस दिन मैं पैदा हुआ और इसी दिन मैं मबऊस हुआ या मुझ पर वह्यी नाज़िल की गयी| (मुस्लिम)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि0 से रिवायत हैं के – नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम पीर(सोमवार) के दिन पैदा हुये और पीर(सोमवार) के दिन नबूअत का ऐलान किया| और पीर(सोमवार) के दिन ही वफ़ात पाई और पीर(सोमवार) के दिन नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम मक्का से मदीना की तरफ़ हिजरत के लिये रवाना हुये और पीर(सोमवार) के दिन ही मदीना पहुंचे और पीर(सोमवार) के दिन हुजरे असवद को उठाया| (हदायक अल नवार)

इन हदीसो की रोशनी मे साबित हैं की नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने पीर(सोमवार) के दिन विलादत पाई| अब रहा सवाल तारीख विलादत तो इस बारे मे खुद नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से तो कोई रिवायत नही अलबत्ता मशहूर मुफ़स्सिर और तारीखदान इब्ने कसीर रह0 ने अपनी तारिख अलबदायाह व अलनहायाह मे लिखा हैं के जमहूर अहले इल्म का इत्तेफ़ाक ये हैं आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम माहे रबीअव्वल मे पैदा हुये लेकिन ये के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस माह के अव्वल, आखीर या किस तारिख को पैदा हुये? इस बारे मे तारिखदान और सीरत निगारो के कयी अलग-अलग राय हैं किसी ने 2 रबीअव्वल, किसी ने 8 रबीअव्वल, किसी ने 10 रबीअव्वल, किसी ने 12 रबीअव्वल , किसी ने 17 रबीअव्वल और किसी ने 18 रबीअव्वल और किसी ने 22 रबीअव्वल कहा हैं और इनमे से दो राय सबसे ज़्यादा बाएतबार हैं एक 8 और दूसरी 12 की| इमाम हमीदी ने इब्ने हज़म से 8 रबीअव्वल ही नकल किया हैं और कयी दूसरे अईम्मा ने इसी बात की तायद की हैं| इमाम तिबरानी और इमाम इब्ने खलदून ने 12 रबीअव्वल की तायद की हैं| और इमाम इब्ने जोज़ी ने अल वफ़ाबा हवालल मुस्तफ़ा मे 10 रबीअव्वल की तायद की हैं| जबकि माज़ी के दो करीबी अज़ीम सीरत निगारो मे अल्लामा काज़ी सुलेमान मन्सूरपुरी ने अपनी किताब रहमतुल्लिल आलामीन मे और अल्लामा सिबली ने सिरतुन्नबी मे 9 रबीअव्वल (20 अप्रेल 571 ईसवी) को तहकीक जदीद सही तारीख करार दिया हैं|

तारीख विलादत और मज़ीद बहस का मौअज़ू हैं जिसमे अलग-अलग उल्मा, अईम्मा, और तारिखनिगारो के कौल मौजूद हैं| बहरहाल सही तारीख का किसी को अन्दाज़ा नही| हालाकि तारीख वफ़ात का दिन 12 रबीअव्वल ये बिल्कुल सही हैं जो बारावफ़ात के नाम से आज तक मौजूद हैं| तो वफ़ात रसूल पर ये खुशीया नही| यही वो तारिख हैं जिस रोज़ हज़रत फ़ातिमा रज़ि0 यतीम हुई| यही वो तारीख हैं जिस रोज़ उम्मुल मोमिनीन बेवा हुई| गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर आज किसी बेवा या यतीम के सामने उसके बाप या शौहर के मरने का जश्न मनाया जाये तो ये बात नाकाबिले बर्दाश्त कही जायेगी तो फ़िर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात पर जश्न क्यो?

दूसरे खुशी मनाने का ये अन्दाज़ जो माआशरे मे चला आ रहा हैं क्या वो सही हैं? क्या इसकी कोई गुन्जाइश भी दीन मे हैं? खुशी के मौके पर जुलूस निकालना, चिरागा करना, ढोल बजाना क्या दीन ए इस्लाम मे हैं क्या सहाबा ने किसी खुशी के मौके पर ये सब किया| यकीनन नही किया| जैसे के दीन ए इस्लाम मे दो ईद के मौके पर नमाज़ पढने और तकबीर व तहलीक ही का हुक्म दिया तो ईद मिलादुन्नबी के मौके पर ये सब खुराफ़ात कैसे की जा रही हैं| जैसा के तमाम दुनिया मे 25 दिसम्बर को ईसा अलै0 की विलादत का जश्न मनाया जाता हैं और खुराफ़ात होती हैं जैसे नाच-गाना, शराबनोशी वगैराह ठीक उसी तरह हम उनकी मुशाबहत करते हैं और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत का जश्न मनाते हैं हालाकि ना ईसाईयो को अल्लाह ने ईसा अलै0 की विलादत मनाने का हुक्म दिया ना ही उनकी किताब इन्जील मे इस बारे मे कही हुक्म हैं| लिहाज़ा हम उनकी नकल करते हैं और किसी कौम की मुशाबहत करने के बारे मे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

जिसने किसी कौम की मुशाबहत इख्तयार करी वो इन्ही मे से समझा जायेगा| (अबू दाऊद)

बहरहाल जिस एतबार से भी देखा जाये जश्न मिलादुन्नबी की कोई शरयी हैसियत नही| ये मोहब्बत रसूल के नाम पर एक खोखला अकीदा हैं क्योकि मुसल्मानो के लिये यौमे विलादत से ज़्यादा अहम रिसालत हैं जिसके तहत अल्लाह ने इन्सान को अंधेरे से निकाल कर उजियाले की राह दिखाई| यौमे रिसालत से ही इन्सान को तौहीद मिली जिससे इन्सान को अपनी दुनिया और आखिरत की ज़िन्दगी सुधारने का मौका मिला|

अगर यौम ए विलादत को किसी मुसलमान को खुशी हैं तो यकीनन हर मुसल्मान को ये खुशी होनी चाहिए| लिहाज़ा मसला खुशी का नही बल्कि इज़हारे खुशी का हैं जिसकी बुनियाद पर मुसलमानो मे एक बिदाआत का रिवाज हैं| क्या इस बेबुनियाद इज़हारे खुशी को करके ही ये साबित होता हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत हैं जबकि सहाबा रज़ि0 ने अगर इसको नही किया तो नाऊज़ोबिल्लाह वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत नही करते थे और उनसे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की शान मे ये अमल छूट गया|

जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत करने वाली असल जमात सिर्फ़ और सिर्फ़ सहाबा रज़ि0 की थी जिन्होने अपने अमल और किरदार से नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत को साबित किया और इस उम्मत मुस्लिमा के लिये एक सबक दिया| आज मुसल्मान इस काम को जिस तरह कर रहा हैं नाऊज़ोबिल्लाह क्या अल्लाह ने अपने दीन को मुकम्मल नही किया जो आज लोग ये ईदमिलादुन्नबी मनाकर इसे पूरा कर रहे हैं| जबकि अल्लाह फ़रमाता हैं –

आज मैने दीन को तुम्हारे लिये मुकम्मल कर दिया| ( सूरह माईदा सूरह नं0 5 आयत नं0 3)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया –

हज़रत अबदुल्लाह बिन उमर रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – अल्लाह ने कोई नबी नही मबऊस फ़रमाया, मगर इसका ये फ़रीज़ा था के वो अपनी उम्मत को हर वो खैर का काम बताये जो अल्लाह ने इसे सिखाया था, और उम्मत को हर वो शर से डराये जो अल्लाह ने इसको तालिम दी थी| (मुस्लिम)

क्या अल्लाह के इस हुक्म और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस फ़रमान को पढने के बाद भी कोई ये कहेगा के दीन आज ईदमिलादुन्नबी मना कर पूरा हो रहा हैं| वो भी उस वक्त जब उसे खुद उसके पास इस बात का सबूत न हो के विलादत की असल तारिख क्या हैं जैसा के उपर गुज़रा के 12 रबीअव्वल वफ़ात नबी की तारीख हैं तो मुसलमान आज वफ़ात पर खुशी मनाते हैं|

आज नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पर जश्न मनाने वाले एक तरफ़ तो तमाम नबी और बुज़ुर्गो को एक तरफ़ तो जिन्दा तसलीम करते हैं दूसरी तरफ़ अगर सचमुच नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम जिन्दा हैं तो सहाबा से नबी की शान मे एक अमल छूट गया| जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने 23 साल अपनी दावत तब्लीग जारी रखी उस लिहाज़ से सहाबा को 23 बार ये मौका मिला बावजूद इसके उन्होने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मौजूदगी मे ये जश्ने विलादत क्यो न मनाया| नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इरशाद हैं-

तमाम ज़मानो मे बेहतरीन ज़माना मेरा ज़माना हैं, फ़िर इन लोगो क जो इसके बाद वाले हैं और फ़िर इन लोगो क जो इन के बाद वाले हैं| (मुस्लिम)

इस हदीस से ये साबित होता हैं के नबी के बाद सहाबा का और सहाबा के बाद ताबाईन का ज़माना बेहतर हैं लिहाज़ा 12 रबीअव्वल को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का जश्न विलादत इन तीन ज़मानो मे से किसी भी एक आदमी से भी साबित हैं लिहाज़ा अगर आज मुसलमान इस अमल को नबी की विलादत का जश्न समझ कर रहा हैं तो यकीनन गुमराही मे हैं|

जश्ने विलादत को लेकर एक और बातिल अकायद हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस महफ़िल मे हाज़िर होते हैं और इसीलिये लोग नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस्तक्बाल मे खड़े हो जाते और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम को सलाम व खुशामदीन और मरहबा कहते हैं| ये एक ऐसा बातिल और जिहालत भरा अकीदा हैं क्योकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मुबारक से कयामत से पहले नही निकलेगें और न किसी इन्सान से मिलेगें और न किसी मजलिस मे हाज़िर होगें बल्कि आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मे कयामत कायम होने तक मुकिम रहेगें| जैसा के अल्लाह कुरान मे फ़रमाता हैं-

इसके बाद फ़िर तुम सब यकिनन मर जाने वाअले हो, फ़िर कयामत के दिन बिलाशुबहा तुम सब उठाये जाओगे| (सूरह मोमिनून सूरह नं0 23 आयत नं0 15-16)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इर्शाद हैं –

कयामत के दिन सबसे पहले मैं कब्र से उठूगां, और मैं ही सबसे पहले शफ़ाअत करूगां और सबसे पहले मेरी ही शफ़ाअत कुबूल होगी| (मुस्लिम)

कुरान और हदीस की रोशनी मे ये पता चलता हैं की तमाम इन्सान और अंबिया सिर्फ़ कयामत के रोज़ ही उठेगें उससे पहले नही| और इस बारे मे तमाम उल्मा का इजमा हैं और इस बारे मे कोई इख्तलाफ़ नही|

गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर विलादत नबवी जश्न का मसला अगर अल्लाह और उसके रसूल के नज़दीक पंसदीदा अमल होता तो वो शरियत बन जाती जबकी ऐसा नही हैं क्योकि जश्न मिलादुन्नबी किसी एक सहाबा या ताबाईन से साबित ही नही और जो चीज़ नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम या सहाबा या खुल्फ़ाए राशीदीन या ताबाईन से साबित नही उसकी कोई शरई हैसियत नही बल्कि वो बिदात हैं|

Thursday, October 25, 2012

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) का विदायी अभिभाषण


आपने पहले ईश्वर की प्रशंसा, स्तुति और गुणगान किया, मन-मस्तिष्क की बुरी उकसाहटों और बुरे कामों से अल्लाह की शरण चाही; इस्लाम के मूलाधार ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ की गवाही दी और फ़रमाया :
ऐ लोगो! अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है, वह एक ही है, कोई उसका साझी नहीं है। अल्लाह ने अपना वचन पूरा किया, उसने अपने बन्दे (रसूल) की सहायता की और अकेला ही अधर्म की सारी शक्ति को पराजित किया।
लोगो मेरी बात सुनो, मैं नहीं समझता कि अब कभी हम इस तरह एकत्र हो सकेंगें और संभवतः इस वर्ष के बाद मैं हज न कर सकूँगा।
लोगो, अल्लाह फ़रमाता है कि, इन्सानो, हम ने तुम सब को एक ही पुरुष व स्त्री से पैदा किया है और तुम्हें गिरोहों और क़बीलों में बाँट दिया गया कि तुम अलग-अलग पहचाने जा सको। अल्लाह की दृष्टि में तुम में सबसे अच्छा और आदर वाला वह है जो अल्लाह से ज़्यादा डरने वाला है। किसी अरबी को किसी ग़ैर-अरबी पर, किसी ग़ैर-अरबी को किसी अरबी पर कोई प्रतिष्ठा हासिल नहीं है। न काला गोरे से उत्तम है न गोरा काले से। हाँ आदर और प्रतिष्ठा का कोई मापदंड है तो वह ईशपरायणता है।
सारे मनुष्य आदम की संतान हैं और आदम मिट्टी से बनाए गए। अब प्रतिष्ठा एवं उत्तमता के सारे दावे, ख़ून एवं माल की सारी मांगें और शत्रुता के सारे बदले मेरे पाँव तले रौंदे जा चुके हैं। बस, काबा का प्रबंध और हाजियों को पानी पिलाने की सेवा का क्रम जारी रहेगा। कु़रैश के लोगो! ऐसा न हो कि अल्लाह के समक्ष तुम इस तरह आओ कि तुम्हारी गरदनों पर तो दुनिया का बोझ हो और दूसरे लोग परलोक का सामन लेकर आएँ, और अगर ऐसा हुआ तो मैं अल्लाह के सामने तुम्हारे कुछ काम न आ सकूंगा।
कु़रैश के लोगो, अल्लाह ने तुम्हारे झूठे घमंड को ख़त्म कर डाला, और बाप-दादा के कारनामों पर तुम्हारे गर्व की कोई गुंजाइश नहीं। लोगो, तुम्हारे ख़ून, माल व इज़्ज़त एक-दूसरे पर हराम कर दी गईं हमेशा के लिए। इन चीज़ों का महत्व ऐसा ही है जैसा तुम्हारे इस दिन का और इस मुबारक महीने का, विशेषतः इस शहर में। तुम सब अल्लाह के सामने जाओगे और वह तुम से तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछेगा।
देखो, कहीं मेरे बाद भटक न जाना कि आपस में एक-दूसरे का ख़ून बहाने लगो। अगर किसी के पास धरोहर (अमानत) रखी जाए तो वह इस बात का पाबन्द है कि अमानत रखवाने वाले को अमानत पहुँचा दे। लोगो, हर मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है और सारे मुसलमान आपस में भाई-भाई है। अपने गु़लामों का ख़्याल रखो, हां गु़लामों का ख़्याल रखो। इन्हें वही खिलाओ जो ख़ुद खाते हो, वैसा ही पहनाओ जैसा तुम पहनते हो।
जाहिलियत (अज्ञान) का सब कुछ मैंने अपने पैरों से कुचल दिया। जाहिलियत के समय के ख़ून के सारे बदले ख़त्म कर दिये गए। पहला बदला जिसे मैं क्षमा करता हूं मेरे अपने परिवार का है। रबीअ़-बिन-हारिस के दूध-पीते बेटे का ख़ून जिसे बनू-हज़ील ने मार डाला था, मैं क्षमा करता हूं। जाहिलियत के समय के ब्याज (सूद) अब कोई महत्व नहीं रखते, पहला सूद, जिसे मैं निरस्त कराता हूं, अब्बास-बिन-अब्दुल मुत्तलिब के परिवार का सूद है।
लोगो, अल्लाह ने हर हक़दार को उसका हक़ दे दिया, अब कोई किसी उत्तराधिकारी (वारिस) के हक़ में वसीयत न करे।
बच्चा उसी के तरफ़ मन्सूब किया जाएगा जिसके बिस्तर पर पैदा हुआ। जिस पर हरामकारी साबित हो उसकी सज़ा पत्थर है, सारे कर्मों का हिसाब-किताब अल्लाह के यहाँ होगा।
जो कोई अपना वंश (नसब) परिवर्तन करे या कोई गु़लाम अपने मालिक के बदले किसी और को मालिक ज़ाहिर करे उस पर ख़ुदा की फिटकार।
क़र्ज़ अदा कर दिया जाए, माँगी हुई वस्तु वापस करनी चाहिए, उपहार का बदला देना चाहिए और जो कोई किसी की ज़मानत ले वह दंड (तावान) अदा करे।
स किसी के लिए यह जायज़ नहीं कि वह अपने भाई से कुछ ले, सिवा उसके जिस पर उस का भाई राज़ी हो और ख़ुशी-ख़ुशी दे। स्वयं पर एवं दूसरों पर अत्याचार न करो।
औरत के लिए यह जायज़ नहीं है कि वह अपने पति का माल उसकी अनुमति के बिना किसी को दे।
देखो, तुम्हारे ऊपर तुम्हारी पत्नियों के कुछ अधिकार हैं। इसी तरह, उन पर तुम्हारे कुछ अधिकार हैं। औरतों पर तुम्हारा यह अधिकार है कि वे अपने पास किसी ऐसे व्यक्ति को न बुलाएँ, जिसे तुम पसन्द नहीं करते और कोई ख़्यानत (विश्वासघात) न करें, और अगर वह ऐसा करें तो अल्लाह की ओर से तुम्हें इसकी अनुमति है कि उन्हें हल्का शारीरिक दंड दो, और वह बाज़ आ जाएँ तो उन्हें अच्छी तरह खिलाओ, पहनाओ।
औरतों से सद्व्यवहार करो क्योंकि वह तुम्हारी पाबन्द हैं और स्वयं वह अपने लिए कुछ नहीं कर सकतीं। अतः इनके बारे में अल्लाह से डरो कि तुम ने इन्हें अल्लाह के नाम पर हासिल किया है और उसी के नाम पर वह तुम्हारे लिए हलाल हुईं। लोगो, मेरी बात समझ लो, मैंने तुम्हें अल्लाह का संदेश पहुँचा दिया।
मैं तुम्हारे बीच एक ऐसी चीज़ छोड़ जाता हूं कि तुम कभी नहीं भटकोगे, यदि उस पर क़ायम रहे, और वह अल्लाह की किताब (क़ुरआन) है और हाँ देखो, धर्म के (दीनी) मामलात में सीमा के आगे न बढ़ना कि तुम से पहले के लोग इन्हीं कारणों से नष्ट कर दिए गए।
शैतान को अब इस बात की कोई उम्मीद नहीं रह गई है कि अब उसकी इस शहर में इबादत की जाएगी किन्तु यह संभव है कि ऐसे मामलात में जिन्हें तुम कम महत्व देते हो, उसकी बात मान ली जाए और वह इस पर राज़ी है, इसलिए तुम उससे अपने धर्म (दीन) व विश्वास (ईमान) की रक्षा करना।
लोगो, अपने रब की इबादत करो, पाँच वक़्त की नमाज़ अदा करो, पूरे महीने के रोज़े रखो, अपने धन की ज़कात ख़ुशदिली के साथ देते रहो। अल्लाह के घर (काबा) का हज करो और अपने सरदार का आज्ञापालन करो तो अपने रब की जन्नत में दाख़िल हो जाओगे।
अब अपराधी स्वयं अपने अपराध का ज़िम्मेदार होगा और अब न बाप के बदले बेटा पकड़ा जाएगा न बेटे का बदला बाप से लिया जाएगा ।
सुनो, जो लोग यहाँ मौजूद हैं, उन्हें चाहिए कि ये आदेश और ये बातें उन लोगों को बताएँ जो यहाँ नहीं हैं, हो सकता है, कि कोई अनुपस्थित व्यक्ति तुम से ज़्यादा इन बातों को समझने और सुरक्षित रखने वाला हो। और लोगो, तुम से मेरे बारे में अल्लाह के यहाँ पूछा जाएगा, बताओ तुम क्या जवाब दोगे? लोगों ने जवाब दिया कि हम इस बात की गवाही देंगे कि आप (सल्ल॰) ने अमानत (दीन का संदेश) पहुँचा दिया और रिसालत (ईशदूतत्व) का हक़ अदा कर दिया, और हमें सत्य और भलाई का रास्ता दिखा दिया।
यह सुनकर मुहम्मद (सल्ल॰) ने अपनी शहादत की उँगुली आसमान की ओर उठाई और लोगों की ओर इशारा करते हुए तीन बार फ़रमाया, ऐ अल्लाह, गवाह रहना! ऐ अल्लाह, गवाह रहना! ऐ अल्लाह, गवाह रहना।

Monday, October 22, 2012

तालिबानों पर होती लानतों की विश्वव्यापी बौछार....



वैसे तो दुनिया के किसी भी देश में तालिबानों को समर्थन दिए जाने, उनके साथ सहयोग करने अथवा उनकी दरिंदगी की प्रशंसा करने की बात देखी व सुनी नहीं गई। चूंकि उनका काम ही आतंक फैलानाबेक़ुसूरलोगों को मारनाधार्मिक उन्माद फैलाना, इस्लाम के नाम पर आत्मघाती दस्ते तैयार करना तथा आत्मघाती हमले कराना, मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारों, दरगाहों व इमाम बारगाहों पर हमले करना तथा स्कूली शिक्षा विशेषकर लड़कियों को दी जाने वाली शिक्षा का विरोध करना आदि है इसलिए दुनिया का हर देश, हर वर्ग तथा हर समुदाय यहां तक कि आम मुस्लिम समुदाय भी तालिबानों को गिरी नज़रों से देखता है तथा समय-समय पर इन के द्वारा अंजाम दी जाने वाली अमानवीय घटनाओं की निंदा व भत्र्सना करता रहता है। परंतु गत् 9 अक्तूबर मंगलवार को पाकिस्तान स्थित इन वहशी तालिबानों द्वारा पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र की स्वात घाटी की मलाला युसुफ ज़ई नामक 14 वर्षीय किशोरी पर जो वहशियाना आक्रमण किया गया तथा उसके सिर में गोली मार कर उस मासूम की हत्या का प्रयास किया गया उसके बाद पूरे विश्व में इन दरिंदे तालिबानों पर जिस प्रकार लानतों की बौछार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होती देखी जा रही है उतनी लानतें तालिबानों पर बरसते पहले कभी नहीं देखी गई। पाकिस्तान जैसा देश जहां यह हादसा हुआ तथा जो देश खुद तालिबानों, कट्टरपंथियों व रूढ़ीवादियों की गिरफ़्त में आता जा रहा है वहां भी कई प्रमुख स्थानों पर मलाला युसुफ ज़ई के पक्ष में तथा उसकी जि़दगी के लिए दुआएं मांगने के हक में व वहशी तालिबानों के विरोध में प्रदर्शन होते हुए देखे गए।
आखिर ऐसी क्या बात थी जिसने मात्र एक 14 वर्षीय कन्या पर तालिबानी हमले को पूरी दुनिया के लिए ध्यान आकर्षित करने का मुद्दा बना दिया। दरअसल मलाला युसफ ज़ई जब 11 वर्ष की थी तथा स्कूल जाया करती थी उसी दौरान स्वात घाटी में तालिबानों ने स्कूलों के खुलने का विरोध करना शुरु कर दिया था। उन्होंने कई स्कूल जहां सांसारिक व प्रगतिशील शिक्षा दी जाती थी उन्हें ध्वस्त करना शुरु कर दिया। स्कूल जाते हुए बच्चों का अपहरण करने लगे। और सबसे ज़्यादा उनका विरोध इस बात को लेकर था कि लड़कियां तो खासतौर पर स्कूल हरगिज़ न जाया करें। और तालिबानों के इस रवैये का प्रभाव यह पड़ा कि स्वात घाटी में आम लोग भयवश अपने बच्चों को स्कूल जाने से रोकने लगे। 11 वर्षीय मलाला भी उस समय स्कूल जाया करती थी। इसी उम्र में उसे यह एहसास हो चला था कि इंसान को अपने जीवन को सफल व सुखद बनाने के लिए शिक्षित होना बहुत ज़रूरी है। और अपने इन्हीं विचारों के साथ वह शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए तथा तालिबानों के शिक्षा विरोधी मुहिम के विरुद्ध खुलकर सामने आ गई। उसने शिक्षा, प्रगतिशीलता, उदारवाद तथा धर्मनिरपेक्षता के हक़ में बोलना व लिखना शुरु कर दिया। यहां तक कि विश्व की सबसे प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी बीबीसी उर्दू सर्विस के लिए मात्र 11 वर्ष की आयु में ही उसने अपनी डायरी लिखनी शुरु कर दी। बीबीसी पर प्रसारित होने वाले उसके हृदयस्पर्शी कार्यक्रम स्वात घाटी सहित पूरे पाकिस्तान व अफ़ग़ानिस्तान में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। अपनी डायरी में वह स्वात घाटी के वास्तविक हालात का बयान करती, तालिबान की दहशत तथा उनके ज़ल्मो-सितम के परिणामस्वरूप उस क्षेत्र पर पडऩे वाले नकारात्मक प्रभाव का जि़क्र करती तथा साथ-साथ शिक्षा के प्रसार पर ज़ोर देती।
मलाला के ऐसे प्रयासों के परिणामस्वरूप स्वात क्षेत्र के आम लोगों ने अपने बच्चों को सादे लिबासों में तथा अपनी शाल व चादरों के बीच किताबें छुपाकर पुन: स्कूल भेजना शुरु कर दिया। उसकी बहादुरी के चर्चे इस हद तक हुए कि उसे पाकिस्तान में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार भी दिया गया। इसके पश्चात मलाला को बच्चों के अंतर्राष्ट्रीय विश्व शांति पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया। और इस प्रकार वह स्वात के प्रगतिशील विचार रखने वाले लोगों खासतौर पर बच्चों के लिए एक आदर्श कन्या के रूप में लोकप्रिय होने लगी। ज़ाहिर है उसे यह सभी उपलब्धियां केवल इसीलिए मिल रही थीं क्योंकि वह एक किशोरी थी और कम उम्र की बालिका होने के बावजूद तथा दरिंदे तालिबानों के गढ़ में रहने के बावजूद वह बड़े बुलंद हौसलों के साथ सच्चाई के पक्ष में तथा असत्य, अधर्म तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठा रही थी। जिस समय तालिबानी दरिंदे मलाला युसुफज़ई को स्कूल के बच्चों की गाड़ी से उसका नाम पुकार कर बाहर उतरवा कर उसके सिर में गोली मारी इस हमले के बाद पाकिस्तान तालिबान के प्रवक्ता ने अपनी जि़म्मेदारी स्वीकार करते हुए यह कहा भी था-कि यह हमला उसने इसलिए किया है क्योंकि मलाला तालिबान के खिलाफ थी व धर्मनिरपेक्ष थी और उसे बख्शा नहीं जाएगा। ज़ाहिर है तालिबानों की इस स्वीकारोक्ति का अर्थ यही है कि तालिबानों के शिक्षा के विरोध करने के बावजूद मलाला का शिक्षा के पक्ष में खड़े होना तालिबानों को नागवार गुज़रा।
सवाल यह है कि क्या इस्लाम धर्म भी शिक्षा के विरुद्ध है? यदि हम तालिबानों की शिक्षा विरोधी सोच को सही मान लें तो एक सवाल यह भी है कि क्या कुरान शरीफ का संकलन बिना शिक्षित लोगों के सहयोग के संभव हो सका? क्या कुरान शरीफ में लिखी आयतें तथा उसकी समीक्षाएं या उनपर तबसेरा आदि करना किसी अशिक्षित व्यक्ति के वश की बात है? क्या दवा-इलाज, इंजीनियरिंग, यहां तक कि तालिबानों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले आधुनिक संचार प्रणाली व हथियार आदि किसी अशिक्षित व्यक्ति द्वारा किए गए अविष्कार हैं? आज यही तालिबानी सोच रखने वाले लोगों के घरों की लड़कियां या महिलाएं जब बीमार होती हैं तब यही लोग महिला डॉक्टर की खोज करते देखे जाते हैं। आखिर कहां से आएगी महिला डॉक्टर जब आपकी बच्चियां स्कूल ही नहीं जाएंगी? पैगंबर हज़रत मोहम्मद, हज़रत अली से लेकर सभी इमाम व खलीफा शिक्षा व शिक्षित समाज के पक्ष में बोलते देखे गए। शिक्षा को मानवता, विकास तथा आत्मनिर्भरता की बुनियाद माना जाता है। अशिक्षित समाज की हालत दुनिया में कैसी होती है यह देखने के लिए किसी और वर्ग या समाज को देखने की नहीं बल्कि स्वयं तालिबानों को अपने-आप को देखने की ज़रूरत है। क्या मलाला युसुफ ज़ई का कुसूर यही था कि वह आम लोगों के बच्चों विशेषकर स्वात घाटी के तालिबानी दरिंदों की दहशत के शिकार समाज के बच्चों को शिक्षित होने का रास्ता दिखा रही थी? शिक्षा की चाहत रखने वाले अभिभावकों व बच्चों के लिए वह मशअल-ए-राह बन चुकी थी?
स्वयं को इस्लाम धर्म का ठेकेदार बताने वाले यह दुष्ट, क्रूर व खबीस तालिबानी क्या इस्लाम धर्म के इतिहास में किसी ऐसी घटना की मिसाल दे सकते हैं जो 14 वर्षीय बच्ची के सिर में गोली मारे जाने की घटना का समर्थन करती हो। स्वयं को मुस्लिम कहकर इस्लाम धर्म को कलंकित करने वाले इन वहशियों ने मलाला को केवल इसलिए गोली मारी क्योंकि वह बच्ची पिछड़े व अनपढ़ समाज को शिक्षित समाज के रूप में देखना चाहती थी। यदि तालिबानी वहशी आधुनिक शिक्षा, आधुनिक समाज या आधुनिक व्यवस्था के इतने ही बड़े विरोधी हैं तो वे अपने आतंकी मिशन में आधुनिक हथियारों व आधुनिक संचार माध्यमों का भी प्रयोग क्यों करते हैं? दरअसल तालिबान या इन जैसे कोई भी आतंकी संगठन यह भलीभांति जानते हैं कि अनपढ़ समाज व जाहलियत के कारण बेरोज़गारी का सामना करने वाला युवा ही इनका समर्थक, इनका सहयोगी हो सकता है तथा वह जल्दी इनके झांसे में आ सकता है। परंतु शिक्षित युवा प्राय: अपनी सोच-समझ व शिक्षा के अनुसार ही कोई निर्णय लेता है। लिहाज़ा तालिबानों को अपनी भलाई भी इसी में नज़र आती है कि उनसे संबंधित अधिकांश लोग अनपढ़ ही हों।
परंतु दुनिया तालिबानों की इस सोच के पूरी तरह विरुद्ध है। आज विश्व के प्रत्येक भाग में शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो रहा है। यहां तक कि कट्टरपंथियों की गिरफ़्त में रहने वाले पाकिस्तान व अफगानिस्तान जैसे देशों में भी । और यही वजह है कि मलाला युसुफ ज़ई पर हुए हमले ने तालिबानों को दुनिया की नज़रों से इस कद्र गिरा दिया है जिसकी वे कभी उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। यह उनकी इस दरिंदगी का ही परिणाम है कि आज सारी दुनिया में जहां मलाला के शीघ्र सेहतमंद होने के लिए दुआओं के हाथ बुलंद हो रहे हैं वहीं तालिबानों पर लानतों की विश्वव्यापी बौछार भी हो रही है।