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Saturday, July 20, 2013

जातिप्रथा, भारतीय मुसलमान और इस्लाम


मुसलमानों की सामाजिक सरंचना धर्म और कुरआन के निर्देशों पर आधारित समझी जाती है, कुरआन जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है और यह बतलाता है की जन्म, वंश और स्थान के आधार पर सभी मुसलमान बराबर हैं और मुसलमानों में हिन्दुओ जैसी कोई बंद जाति व्यवस्था नहीं है। यह एक सैधांतिक बात है परन्तु जब हम मुसलमानों को व्यवहार की द्रष्टि से देखते हैं तो पता चलता है कि किसी ना किसी रूप में मुस्लिम समाज में भी जाति व्यवस्था कि जड़ें गहरे तक पायी जाती है और सभी मुसलमान खुद को एक नहीं मानते हैं। केवल इतना ही नहीं, विवाह इत्यादी में भी एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने में भी कुछ सामजिक और जातीय नियमों का पालन करते हैं। अर्थात विवाह सम्बन्ध स्थापित करने में भी मुसलमान पूर्ण स्वतंत्र नहीं है। कुछ ऐसा प्रतीत होता है की भूगोलिक प्रजातीय, जनजातीय और राजनैतिक विभेदों के परिणाम स्वरुप मुस्लिम समाज में भी सामाजिक संस्तरण की व्यवस्था विध्यमान है। भारतीय मुसलमानों पर अरब/ तुर्की और फारस के मुसलमानों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव है। फलस्वरूप इनमें भी एक ऐसा सामाजिक संस्तरण (social stratification) पनप गया है जिसको समझा जाना आवश्यक है।

भारत में सामाजिक संस्तरण के विकसित होने का कारण हिन्दुओं का मुस्लिम में परिवर्तित होना रहा। यधपि परिवर्तित मुसलमान पूर्णतया अपने मूल जाति-धर्म को नहीं छोड़ नहीं पाए और न ही पूर्णतया परिवर्तित हुए। हां सम्बन्ध दोनों ओर रखा! मुस्लिम सामाजिक सरंचना के सम्बन्ध में दो तथ्य उल्लेखित किया जाना जरूरी है। पहला, मुस्लिम समाज में सामाजिक संस्तरण व्यवहार में विध्यमान है। और दूसरा, मुस्लिम प्रशासकों ने अपनी ओर से हिंदू जनसख्या के भाग को मुस्लिम जनसँख्या में परिवर्तित होने की पूरी पूरी छूट भी दी थी।

उपरोक्त दो तथ्यों से फिर दो तथ्य सामने आ जाते हैं, पहला, मुस्लिम समाज में वो मुसलमान जिनके पूर्वज विदेश से आकार बसे। और दूसरा, वो मुसलमान जो अपनी जाती या धर्म परिवर्तित करके मुसलमान बन गए।मोटे तौर पर भारतीय मुसलमानों को तीन स्तरों में विभक्त किया जा सकता है। पहला, उच्च जाती के मुसलमान जिन्हें अशरफशब्द से पुकारा जाता है। दूसरा, धर्म परिवर्तन द्वारा बने मुसलमान और तीसरा, जिनको व्यवसाय के परिवर्तन स्वरुप मुसलमानों में शामिल किया गया-(डा० अंसारी के अनुसार)

इस सम्बन्ध में दूसरी विचारधारा प्रसिद्द विद्वान नजमुल करीम साहब की है इनके अनुसार भारतीय मुसलमानों को हिन्दुओ की भाँती चार खंडों में विभक्त किया गया है- सैय्यद, मुग़ल, शैख़ और पठान।

डा. अंसारी ने संस्तरण में जो उपरोक्त विचार दिए हैं इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि अशरफ मुसलमानों में वो मुसलमान आते हैं जो विदेशो से आकार भारत में बस गए और ये लोग खुद को भारतीय मुस्लिम जाति संस्तरण में सबसे ऊँचा मानते थे। इस सम्बन्ध में अंसारी आगे बतलाते हैं की अशरफशब्द अरबी भाषा के शरीफ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है आदरणीयअर्थात वे मुसलमान आदरणीय हैं जो अशरफ मुसलमान है! धर्म परिवर्तित वे मुसलमान हैं जो मूलतः हिन्दुओं की उच्च जातियों से परिवर्तित हैं। इन्होंने अपनी स्थिति अशरफ मुसलमानों से ऊँची समझी और व्यवसायिक मुसलमानों से खुद को ऊपर माना!

डा. अंसारी के अनुसार श्रेष्ट मुसलमानों ओर व्यवसायिक मुसलमानों के बीच का यह वर्ग है। डा. अंसारी के अनुसार तीसरे मुसलमान वे हैं जो प्रारंभ में हिंदू थे जिनके पूर्वजो ने कुछ मुसलमान व्यवसाय अपना लिए और फिर वे मुसलमान बन गए। ये मुसलमान भारत के सभी प्रान्तों में पाए जाते हैं।

नजमुल करीम साहब के अनुसार, सैय्यद मुसलमानों में, वे लोग अपने को मानते हैं, जो मुस्लिम समाज में हिंदुओं की तरह ब्राह्मणों का स्तर रखते हैं। वैसे 'सैयद' का शाब्दिक अर्थ "राजकुमार" से है। ये लोग अपने नाम के आगे मीर और सैय्यद शब्दों का प्रयोग करते हैं। सैय्यदों में अनेको उपजातिया हैं, जिनमें असकरी, बाकरी, हसीनी, हुसैनी, काज़मी, तकवी, रिज़वी, जैदी, अल्वी, अब्बासी, जाफरी और हाशमी जातियां आती हैं।

शैख़ जातियों में, उस्मानी सिद्दीकी, फारुखी , खुरासनी, मलिकी और किदवई इत्यादी जातियां आती हैं। इनका सैय्यदों के बाद दूसरा स्थान है। शैख़ शब्द का अर्थ है मुखिया, परन्तु व्यवहार में मुसलमानों के धार्मिक गुरु शैख़ कहलाते थे, भारत के सभी प्रान्तों में ये लोग पाए जाते हैं।

मुगुल लोगों में, उजबेक, तुर्कमान, ताजिक, तैमूरी, चंगताई, किब और जिंश्वाश जाति के लोग आते हैं। माना जाता है कि ये लोग मंगोलिया में मंगोल जाती के लोग हैं और अपने नाम के आगे 'मिर्ज़ा' शब्द का प्रयोग करते हैं।

पठानों में, आफरीदी, बंगल, बारक, ओई, वारेच्छ, दुर्रानी, खलील, ककार, लोदहो, रोहिल्ला और युसुफजाई इत्यादी आते हैं। इनके पूर्वज अफगानिस्तान से आये थे। अधिकांशतः ये लोग अपने नाम के पीछे 'खान' शब्द का प्रयोग करते हैं।

राजस्थान के मुस्लिम राजपूतों में तलवार के बल पर और मनसबदारी, ऊँचे ओहदों, धन, प्रशासन और सरकारी सम्मान इत्यादि के लालच में और वैवाहिक संबंधो के कारण बहुत राजपूत जातियां मुस्लमान बनी। इन लोहों में मुसलमान होने से पहले ही ऊँच-नीच का भेदभाव अत्यंत तीव्र था और मुसलमान होने के बाद भी इन्होंने जातिगत भेदभाव बनाये रखा। इसी कारण ये अपने से निचली जातियों में खान पान और वैवाहिक सम्बन्ध नहीं रखते, जो आज भी बरकरार है। ये केवल अपने सामान और ऊँची अशरफी जातियों तक सीमित हैं। इन जातियों में, चंदेल, तोमर, बरबुजा, बीसने, भट्टी, गौतम, चौहान, पनबार, राठौर, और सोमवंशी हैं।

मुसलमानों में कुछ जातियों को व्यवसाय के आधार पर भी समझा जा सकता है, इनमें अंसारी (जुलाहे/बुनकर), कुरैशी (कसाई) छीपी, मनिहार, बढाई, लुहार, मंसूरी (धुनें) तेली, सक्के, धोबी नाई (सलमानी ), दर्जी (इदरीसी), ठठेरे जूता बनाने वाले और कुम्हार इत्यादी शामिल हैं। ये व्यावसायिक जातियां थी जो पहले हिंदू थी और बाद में मुसलमान में परिवर्तित हो गईं। इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसायिक जातियां है जैसे-आतिशबाज़, बावर्ची, भांड, गद्दी, मोमिन, मिरासी, नानबाई, कुंजडा, दुनिया, कबाड़ियों, चिकुवा फ़कीर इत्यादी।

मुसलमानों में अस्पृश्य जातियां भी है। हालाँकि पैगम्बर मुहम्मद (S.A.W.) ने मनुष्यों में भेदभाव नहीं माना था, परन्तु भारतीय समाज की दशा में ये अलग तरह से सामने आया और मुस्लिमो में भी छुआछूत और भेदभाव की बाते सामने आईं। यद्यपि ये हिन्दुओं जैसी कठोर नहीं थी, फिर भी अशरफ और राजपूत जातियां इनसे दूर ही रहीं। इन जातियों में अनेक उपजातियां मिलती है जैसे- गाजीपुरी, रावत, लाल बेगी, पत्थर फोड, शेख, महतर, बांस फोड और वाल्मीकि इत्यादी।

इस प्रकार आसानी से समझा जा सकता है कि भारतीय मुस्लिमों में जातीय व्यवस्था के भारत के संदर्भ में क्या आधार रहे हैं।

~फरहाना अंसारी

Saturday, November 03, 2012

काजी या जिस्म के सौदे का दलाल....!



हैदराबाद: कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की आड़ में होता है जिस्म का सौदा
हैदराबाद। एक ऐसे बाजार में जहां इंसानी मूल्य और मासूमियत बिकती है। शादी के पवित्र बंधन के नाम पर गरीब लड़कियों को फांसा जाता है, उनकी अस्मत और सपनों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। ये एक ऐसा बाजार है जिसमें अमीरों की खातिर 6-8 महीने के लिए बीवियां पैदा की जा रही हैं। निकाह करवाया जाता है और उसी वक्त धोखे से तलाकनामा भी तैयार हो जाता है। लड़कियों को भनक तक नहीं लगती कि कॉन्ट्रैक्ट मैरिज के नाम से ये रिश्ता सिर्फ उनके जिस्म के इस्तेमाल के लिए बन रहा है, दरअसल ये निकाह नहीं है बल्कि नर्क है।

निजाम के जमाने में अपनी शान-शौकत और तहजीब के लिए मशहूर पुराना हैदराबाद। एक अरसे से अरब के शेखों की आरामगाह के बतौर बदनाम हैदराबाद जहां शेख आते और ग़ुरबत में जीती नाबालिग लड़कियों को साथ ले जाते, कानून ने सख्ती की, तो शेखों के दौरे घटने लगे, लेकिन पैदा हो गए नए दलाल, शिकार वही था। सिर्फ जाल बदल गया। पाक रिश्तों पर मोहर लगाने वाला शब्द ‘निकाह’ यानि शादी का कानूनन तरीका, लेकिन उसे इस मंडी ने नया नाम दिया ‘कॉन्ट्रेक्ट मैरिज’ यानि ग्राहकों की जरूरत और मर्जी तक चलने वाली शादी।

खास बात ये कि अपनी जिंदगी के सुनहरे तार बुन रही कुंवारी लड़की को अक्सर भनक तक नहीं लगती कि कुछ महीने या शायद साल तक बेगम बनने के बाद उसे तलाक देकर गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया जाएगा।
ये हकीकत नर्क से भी बदतर है, जहां गढ़े जाते हैं, बुने जाते हैं कागजी निकाह और निकाह के कानूनी रास्ते से पेश किए जाते हैं सेक्स स्लेव। पुराने हैदराबाद इलाके में काजी मोहम्मद अजमतुल्लाह शाह सूफी जाफरी मिले। उनको हमने मकसद बताया तो उन्होंने फौरन कॉन्ट्रेक्ट मैरिज के लिए हामी भर दी। काजी के मुताबिक वो शादी करवा देगा। काजी के राजी होते ही जब लड़कियों और उनके घर वालों से मिलने की इच्छा जताई गई तो वो इसके लिए भी तैयार हो गया।
जब कॉन्ट्रेक्ट मैरिज पर आने वाले खर्च की बात की तो काजी ने धंधे का रिवाज बताया। काजी ने मेहर की रकम की बात बताई। अनमैरिड बच्ची रही तो 4 लाख- 5 लाख। काजी ने बताया कि असल में घरवालों को कभी पता नहीं चलता कि उनकी बेटी की शादी सिर्फ 6 से 8 महीने की मेहमान है यही नहीं तलाक के बाद भी उन्हें ये कभी पता नहीं चलेगा। इसका इंतजाम किया जाता है। इसके बाद काजी ने लड़कियों की रेटलिस्ट पेश की।
काजी ने बताया कि अनमैरिड के लिए 5 लाख, अगर शादीशुदा हो तो रेट 3 लाख हो जाएगा। बच्चे वाली एक लाख में मिल जाएगी। फिर उसी शाम काजी ने पुराने हैदराबाद के एक घर में बुलाया। 9 मासूम लड़कियों की नुमाइश की गई। ये इस मंडी का सबसे खौफनाक पल था-मंडी में बिक रही थीं वो लड़कियां जिन्हें ये तक पता नहीं था कि निकाह के कुछ वक्त बाद उन्हें दूध की मख्खी की तरह निकाल फेंका जाएगा। दलाल उन्हें लेकर आया था। हमने कोई भी लड़की पसंद न आने का बहाना बनाया ताकि हम इस मंडी से बाहर निकल कर खुली हवा में सांस ले सकें। दलालों ने एक और लड़की दिखाने की बात कही और दावा किया कि वो हमें जरूर पसंद आएगी। हम उससे भी मिले और जल्द जवाब देने की बात कह कर बाहर निकल गए।
काजी ने हमारे सामने करीब 10 लड़कियों की नुमाइश कराई। मगर हमारे कहने के बावजूद किसी भी लड़की के घरवालों से नहीं मिलवाया। काजी ने कहा कि घरवालों को बस ये बताया जाता है की उनकी लाडली का ब्याह मुल्क से बाहर करवाया जा रहा है।

Friday, May 04, 2012

मुस्लिम वैवाहिक कानून में सुधार की पहल


तथाकथित फतवों के नाम पर मुस्लिम महिलाओं पर जो ज्यादतियां होती हैं उनसे निज़ात दिलाने के लिए और उन्हें इस्लाम और कुरान के नियमों के अनुसार समाज में बराबरी का स्थान दिलाने के लिए वैवाहिक परिवार कानून का प्रारूप तैयार किया गया है। कानून का प्रारूप अनेक न्यायविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है। इस प्रारूप पर राष्ट्रीय विमर्श जारी है। विमर्श की इसी श्रृंखला में एक आयोजन भोपाल में किया गया था। प्रारूप में निकाह, मैहर के साथ तलाक पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। तलाक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं पर भारी जुल्म किया जाता है। अनेक मामलों में मोबाईल पर एस.एम.एस. द्वारा किये गये तलाक को जायज ठहराया जाता है।

प्रारूप में बताया गया है कि तलाक का वह तरीका सर्वोत्तम तरीका है जो तीन महीने के पीरियड में दिया जाता है। इस बीच यदि पति पत्नी के संबंध सुधर जाते हैं और समझौता हो जाता है तो दोनों फिर साधारण जीवन बिता सकते हैं। प्रारूप में तलाक की अनेक प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया है। ये प्रक्रियाये हैं तलाक-हसन, तलाके-तफवीह, तलाके मुबारता। प्रारूप में बताया गया है कि तलाक देना सिर्फ पुरूष का अधिकार नहीं है जैसा आमतौर पर समझा जाता है। पत्नी भी तलाक मांग सकती है। पत्नी द्वारा तलाक मांगने को “खुल“ कहा जाता है।

प्रारूप के अनुसार निकाह मुस्लिम विवाह की वह प्रक्रिया है जिसका लिखित सुबूत होना चाहिए। लिखित सुबूत में विवाह संबंधी सभी शर्तों को शामिल किया जाएगा। विवाह के इस समझौते की तीन प्रतियां तैयार की जाएंगी। जिनमें से एक दुल्हन को दी जाएगी, एक दूल्हे को दी जाएगी और एक उस मस्जिद में रखी जाएगी जिसमें वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न होगा। विवाह का लिखित सुबूत होने से भविष्य में किसी प्रकार की अनिश्चितता पैदा नहीं होगी। यह आम अनुभव है कि लिखित सुबूत के अभाव से सबसे ज्यादा मुसीबत का सामना महिला को ही करना पड़ता है।

प्रारूप में निकाह की विस्तृत व्याख्या की गई है। निकाह एक पुरूष और महिला के बीच हुआ एक ऐसा समझौता है जिसमें महिला से उतने ही कर्तव्यों की अपेक्षा होती है जितने उसे अधिकार दिये जाते हैं। एक बात जिस पर बार-बार जोर दिया गया है वह यह है कि पति अकेला परिवार का मुखिया नहीं है वरन् दोनों पति-पत्नी मिलजुलकर पारिवारिक उत्तरदायित्व का वहन करते हैं। परिवार संबंधी निर्णय लेने में भी दोनों की बराबर की भागीदारी होती है। पति-पत्नी दोनों का निवास कहां हो इसका निर्णय करने का बराबर का अधिकार दोनों प्राप्त है। विवाह के बाद उपलब्ध संपत्ति पर दोनों का बराबर अधिकार है। घर की जिम्मेदारी निभाना भी दोनों का कर्तव्य है। दोनों को परिवार का प्रतिनिधित्व करने का बराबर अधिकार प्राप्त है।

प्रारूप में इस बात पर जोर दिया गया है कि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य रूप से होना चाहिए। राज्य सरकार को काजी या अन्य अधिकारी की नियुक्ति करना चाहिए जो विवाह का पंजीकरण करेगा। राज्य सरकार को ऐसे व्यक्ति को पंजीकरण के लिए नियुक्त करना चाहिए जो भारत का नागरिक हो, जिसमें आवश्यक योग्यता हो और जिसका धर्म इस्लाम हो। राज्य सरकार निकाह का पंजीकरण करने के लिए लाइसेंस जारी करेगी और ऐसा अधिकारी निकाह रजिस्ट्रार कहलाएगा। निकाह रजिस्ट्रार  के पास निकाहनामा का फार्म होगा, निकाह दर्ज करने के लिए उसके पास रजिस्टर होगा। राज्य सरकार के पास निकाहों का रिकार्ड रहेगा। निकाहनामा में दंपत्ति से संबंधित सभी जानकारी दर्ज रहेगी। इन जानकारियों में मियां-बीबी का स्टेटस, तलाक, विधवा- विधुर या दूसरी शादी जो भी स्थिति हो दर्ज रहेगी। निकाह में वधू की सहमति आवश्यक है। यदि सहमति प्राप्त नहीं की गई हो तो निकाह वैध नहीं समझा जाएगा।

प्रारूप में यह व्यवस्था की गई कि काजी स्वयं स्पष्ट रूप से सुने कि दुल्हन ने विवाह के लिए सहमति दी। सहमति किसी और रिश्तेदार माँ, दादी या बहन के माध्यम से प्राप्त नहीं की जानी चाहिए। सहमति दो गवाहों की उपस्थिति में प्राप्त की जानी चाहिए। सहमति देते समय दुल्हन को दूल्हे का नाम भी लेना चाहिए और मैहर की रकम का भी स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। दुल्हन स्वतः इस बात का फैसला करेगी कि वह मैहर किस रूप में लेगी - नगद, अचल संपत्ति, सोना या चाँदीं। विवाह की आयु वह होगी जो उस देश के कानून में निर्धारित है।

गुजारा भत्ता एक ऐसा मुद्दा है जिस पर भारी मतभेद हैं। प्रारूप में इस बात का प्रावधान किया गया है कि यदि पति सही ढंग से पत्नी का पालन-पोषण नहीं करता है तो उसकी पत्नी और एक से ज्यादा पत्नी हो तो उन्हें अधिकार होगा कानून का सहारा लेने के साथ ही आरबीटेशन काउंसिल से भी हस्तक्षेप की मांग कर सकती है। उसके बाद काउंसिल गुजारा भत्ते की रकम तय करेगी जिसे पति को देना पड़ेगा। यदि पति-पत्नी दोनों में से कोई भी चाहे तो गुजारा भत्ता की रकम में बढौत्री की मांग भी कर सकते हैं। यह मांग जिलाधीश से की जा सकती है जिसका निर्णय अंतिम होगा। यदि तयशुदा रकम का भुगतान नहीं होता है तो उसे पति की संपत्ति से वसूला जा सकता है।

इस्लाम में बहुविवाह जायज है परंतु कुरान में उसके लिए अत्यधिक सख्त शर्तों का प्रावधान है। उन समस्त शर्तों का उल्लेख प्रारूप में किया गया है। जिनके बिना एक से ज्यादा विवाह संभव नहीं है।

प्रारूप में मध्यस्तता के लिए एक काउंसिल के गठन का प्रावधान किया गया है। विवाह संबंधी सभी विवाद काउंसिल द्वारा सुलझाये जायेंगे। यह काउंसिल ही तय करेगी कि एक से ज्यादा विवाह आवश्यक है कि नहीं।

इस वैवाहिक कानून से मुस्लिम महिलाओं को काफी राहत मिलेगी। वहीं इस बात की पूरी संभावना है कि मुस्लिम पुरूषों का एक बड़ा हिस्सा इसे स्वीकार नहीं करेगा। इस बात के संकेत भोपाल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिले। कार्यक्रम के दौरान कुछ मुस्लिम युवक हाल में घुस आये और प्रारूप की आवश्यकता पर ही प्रश्न उठाया। उन्होंने इतना हो-हल्ला किया कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

Saturday, February 05, 2011

नेहरु परिवार ने कराया धर्मान्तरण

गाँधी और नेहरु के बहुत  विरोध  के बावजूद  भी जब यह निकाह संपन्न हो गया तब समस्या 'खान'  उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई, जिसका हल  सोलिसिटर जनरल  श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया...


गाँधी परिवार का परिचय जब भी किसी कांग्रेसी अथवा मीडिया द्वारा देशवासियों को दिया  जाता है तब वह फिरोज गाँधी तक जाकर यकायक रुक  जाता है. फिर बड़ी सफाई के साथ अचानक उस परिचय का हैंडिल एक विपरीत रास्ते की और घुमाकर नेहरु वंश की और मोड़ दिया जाता है।

फिरोज गाँधी भी अंततः किसी के पुत्र तो होंगे ही। उनके पिता कौन थे ? यह बतलाना आवश्यक नहीं समझा जाता। फिरोज गाँधी का परिचय पितृ पक्ष से काट कर क्यों ननिहाल के परिवार से बार-बार जोड़ा जाता रहा है.  यह एक ऐसा रहस्य है जिसे नेहरु परिवार के आभा-मंडल से ढक  कर एक गहरे गड्ढे  में मानो सदैव के लिए ही दफ़न कर दिया गया है।

फिरोज 'खान' और इंदिरा : राजनीति के लिए धर्मान्तरण

यह कैसा आश्चर्य है की पंथ निरपेक्षता(मुस्लिम प्रेम) की अलअम्बरदार कांग्रेस के द्वारा भी आखिर यह गर्वपूर्वक क्यों नहीं बतलाया जाता की फिरोज गाँधी एक पारसी युवक नहीं, एक मुस्लिम पिता के बेटे  थे। दरअसल  फिरोज गाँधी का मूल नाम फिरोज गाँधी नहीं फिरोज खान था,जिसको एक सोची समझी कूटनीति के अर्न्तगत फिरोज गाँधी करा दिया गया था। फिरोज गाँधी मुसलमान थे और जीवन पर्यन्त मुसलमान ही बने रहे।

उनके पिता का नाम नवाब खान था जो इलाहबाद में मोती महल (इशरत महल)के निकट ही एक किराने की दूकान चलाते थे । इसी सिलसिले में (रसोई की सामग्री पहुंचाने के सिलसिले में)उनका मोती महल में आना जाना लगातार रहता था। फिरोज खान भी अपने पिता के साथ ही प्रायः मोती महल में जाते रहते थे। वहीँ पर अपनी समवयस्क इंदिरा  से उनका परिचय हुआ और धीरे-धीरे जब यह परिचय गूढ़ प्रेम में परिणत हुआ तब फिरोज खान ने लन्दन की एक मस्जिद में इंदिरा को मैमूदा बेगम बनाकर उनके साथ निकाह पढ़ लिया।

गाँधी और नेहरु के बहुत  विरोध किये जाने के बावजूद  भी जब यह निकाह संपन्न हो ही गया तब समस्या 'खान' उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई। अंततः इस समस्या का हल नेहरु के जनरल सोलिसिटर श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया। मिस्टर सप्रू ने एक याचिका और एक शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करा कर 'खान' उपनाम को 'गाँधी' उपनाम में परिवर्तित करा दिया।इस सत्य को केवल पंडित नेहरु ने ही नहीं अपितु सत्य के उस महान उपासक तथाकथित माहत्मा कहे जाने वाले मोहन दास करम चंद  गाँधी ने भी इसे राष्ट्र से छिपा कर सत्य के साथ ही एक बड़ा विश्वासघात कर डाला ।

गांधी उपनाम ही क्यों -वास्तव में फिरोज खान के पिता नवाब खान की पत्नी जन्म से एक पारसी महिला थी जिन्हें इस्लाम में लाकर उनके पिता ने भी उनसे निकाह पढ़ लिया था। बस फिरोज खान की माँ के इसी जन्मजात पारसी शब्द का पल्ला पकड़ लिया गया। पारसी मत में एक उपनाम गैंदी भी है जो रोमन लिपि में पढ़े जाने पर गाँधी जैसा ही लगता है।

और फिर इसी गैंदी उपनाम के आधार पर फिरोज के साथ गाँधी उपनाम को जोड़ कर कांग्रेसियों ने उस मुस्लिम युवक फिरोज खान का परिचय एक पारसी युवक के रूप में बढे ही ढोल-नगाढे के साथ प्रचारित कर दिया। और जो आज भी लगातार बड़ी बेशर्मी के साथ यूँ ही प्रचारित किया जा रहा है।

जनज्वार
( प्रस्तुत लेख बोधिसत्व कस्तूरिया के जरिये प्राप्त हुआ है, जिसे गौरव त्रिपाठी ने 'मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी द्वारा लिखित' के तौर पर मेल कर प्रस्तुत किया है. )

Monday, January 03, 2011

Does Islam permit women to give divorce?

‘Talaq’ is an arabic word used for ‘divorce’ when given by a husband to his wife. A woman can very well divorce the husband in Islam, but this is not called ‘talaq’.

        According to Sunan Abu Dawood, Hadith No. 2172 and 2173 which is also mentioned in Sunan Ibn-i-Majah, Hadith No. 2018, the Prophet (pbuh) said that among the permissible things, the most hateful in the sight of Allah, is divorce. However the following conditions need to be fulfilled.

a.         The person should not be in a state of intoxica tion while giving divorce.
b.         The person should be in a sound state of mind and not mentally unstable.
c.         Before deciding on giving a divorce there should be a mutual talk regarding the situation between the     husband and the wife.
d.         According to Surah Nisa, chapter 4 verse 35, if the talks fail, two arbiters should be appointed, one from the husband’s family and the other from the wife’s family. In short, have a family meeting to avoid divorce.
e.        Only if all these measures fails, can a person go ahead to give divorce.
f.        According to Surah Al-Talaq, chapter 65 verse 2, while pronouncing Talaq, two persons endued with justice should be taken as witnesses.

                           There are five different types of divorce in Islam:-

1.       With the mutual consent of both the husband and the wife. Here both may agree that they are not compatible with each other.
2.       With the unilateral will of the husband. Here, the husband has to forego the meher, that is, the dower he has given to the wife. In case any amount of meher has remained unpaid, he should give it to the wife.
3.       With the unilateral will of the wife. This is only permis sible if she specifies it in her marital contract that she too will have the right of unilateral divorce. This is called as Ismah or talaq-e-taufid.
4.       If the husband ill-treats or neglects his wife or does not maintain her properly, she has a right to go to a judge and nullify the marriage. This is called as Nikah-e-fask.  Here, the judge decides whether the husband has to give the complete amount of meher or part of it to the wife.
5.       The last type is called ‘Khula’.  Here the husband may be very good, but due to personal reasons, the wife may wish to separate. Here, with the permission of the husband she can separate but she has to forgo her marital gift, that is, her meher.

Some jurists give different names for the above described divorces, while many club the different types of divorce and broadly divide the different types into two or three categories.

Sunday, January 02, 2011

इस्लाम मे दाम्पत्य व्यवस्था

इस्लामी दाम्पत्य व्यवस्था के मूल में यह विचारधारा काम करती है कि यह परिवार और समाज के सृजन की आधारशिला है। अर्थात् दाम्पत्य-संबंध के अच्छे या बुरे होने पर परिवार और समाज का; यहाँ तक कि सामूहिक व्यवस्था और सभ्यता व संस्कृति का भी; अच्छा या बुरा बनना निर्भर करता है। अतः इस बुनियाद को मज़बूत बनाने और मज़बूत रखने के काफ़ी यत्न इस्लाम ने किए हैं। मिसाल के तौर पर सबसे पहली बात, इस संबंध में पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने यह बताई कि आमतौर पर, रिश्ते तय करने में धन-सम्पत्ति, सुन्दरता और बिरादरी व नस्ल को ही सारा महत्व दिया जाता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि धार्मिकता (अर्थात् नेकी, अच्छे चरित्र, शील, सद्व्यवहार, ईश्वर से व्यावहारिक संबंध, सदाचार आदि) को महत्व दिया जाए।

इस तरह इस्लाम आरंभ में ही दाम्पत्य जीवन को एक नैतिक दिशा दे देता है। फिर विवाह (निकाह) के अवसर पर कु़रआन की जो आयतें अनिवार्यतः पढ़ी जाती है उनके द्वारा नव-दम्पत्ति को यह शिक्षा याद दिलाई जाती है कि इस तरह जीवन बिताना कि अल्लाह (और उसके पैग़म्बर) की अवज्ञा (नाफ़रमानी) से बचते रहना। अर्थात् इस्लाम ने दाम्पत्य जीवन से संबंधित ‘कु़रआन’ में, और ‘हदीस’ में जो मार्गदर्शन किया है, जो आदेश दिए हैं उनकी अवहेलना मत करना।

इस्लाम ने बिना निकाह के स्त्री-पुरुष मिलाप को नैतिक, सामाजिक व क़ानूनी अपराध क़रार देकर ऐसे संबंध को अवैध (हराम) ठहराया और इहलोक तथा परलोक में बड़ी भीषण सज़ा तथा प्रताड़ना व प्रकोप की चेतावनी दी है। इसके बाद इस्लाम ने बताया कि जिस ‘अल्लाह’ के नाम पर दोनों एक-दूसरे के लिए (निकाह द्वारा) वैध (हलाल) हुए हैं उसने एक के, दूसरे के प्रति बहुत से कर्तव्य, (Duties) और बहुत से अधिकार (Rights) निर्धारित किए हैं। इनमें कमी करना, इनकी अनदेखी करना, इन्हें अच्छी तरह से न निभाना, मात्र एक-दूसरे के प्रति ही अनुचित व अपराध न होगा बल्कि अल्लाह की नज़र में भी पाप व अपराध होगा। इसका, सिर्फ़ पति-पत्नी संबंध और परिवार की मान-मर्यादा पर ही बुरा प्रभाव पड़ कर रह जाए, ऐसा नहीं है; बल्कि इसकी सज़ा परलोक जीवन में भी मिल कर रहेगी। वहाँ की सज़ा बड़ी सख़्त होगी और उससे बचने का, वहाँ कोई उपाय न होगा, कोई सोर्स-सिफ़ारिश न चलेगी। इस प्रकार इस्लाम दाम्पत्य जीवन को प्रारंभिक चरण में ही एक ऐसा दृढ़ नैतिक व आध्यात्मिक आधार प्रदान कर देता है जो शायद अन्य समाजों में दुर्लभ हो।

स्त्री और पुरुष, मानव-रूप में बिल्कुल बराबर हैं, साथ ही प्रजनन (Reproduction) और नस्ल को आगे बढ़ाने में ‘माँ’ की जो भूमिका स्त्री को निभानी पड़ती है और बच्चों के पालन-पोषण में- विशेषतः बच्चों की दो-ढाई साल की उम्र तक -उसे जिस प्रकार की कठिन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है, और जो पुरुष से सर्वथा भिन्न होती हैं, उनके अनुकूल स्त्री की शारीरिक संरचना एवं मानसिक (Mental and Temperamental) और मनौवैज्ञानिक (Psychological) अवस्था पुरुष से, कुछ पहलुओं से बिल्कुल ही भिन्न और कुछ पहलुओं से काफ़ी भिन्न होती है। इस भिन्नता के ही परिप्रेक्ष्य में इस्लाम जीविकोपार्जन की ज़िम्मेदारी पुरुष पर रखता है। अर्थात् पुष्ट शरीर और अधिक शारीरिक शक्ति व बल के अनुकूल घर के बाहर का काम जिस में काफ़ी परिश्रम करना होता है, पति के ज़िम्मे; और हल्की मेहनत के काम, घर के अन्दर; जहाँ औरत के शरीर व शील की सुरक्षा यक़ीनी होती है, बच्चों और घर की देख-रेख व रख-रखाव तथा परिवार और पति के मान-मर्यादा की सुरक्षा का काम सरलता, सुख व सुधड़ता-संन्दरता से करना आसान होता है, पत्नी के ज़िम्मे। इस प्रकार इस्लामी दाम्पत्य व्यवस्था में ‘नारी’ और ‘पुरुष’ की शारीरिक संरचना और प्राकृतिक अवस्था के ठीक अनुकूल कार्य का निर्धारण व विभाजन तथा उसी के मुताबिक़ कार्य-क्षेत्र का भी निर्धारण कर दिया गया है ताकि दोनों के सहयोग से घर के अन्दर के और बाहर के काम बिना विघ्न-बाधा के सुचारू रूप से चलते रहें।

वर्तमान युग में नारी-पुरुष समानता की विचारधारा पश्चिमी देशों से बहुत तेज़ी के साथ प्रभावित होती जा रही है और पश्चिम में ही उपजे तथाकथित नारी-उद्धार आन्दोलन (या नारी स्वतंत्रता आन्दोलन) के नाम पर चलने वाले ‘फेमिनिस्ट मूवमेंट’ ने पति व पत्नी दोनों को समान कार्य करने के लिए, समान कार्य क्षेत्र में परिश्रम व संघर्ष करने को नारी की स्वतंत्रता तथा नारी-पुरुष समानता का आयाम दे दिया है। इस कारणवश, एक-दूसरे पर आश्रित रहने का नाज़ुक व भावुक संबंध कमज़ोर होता जाता है। ‘तुम भी कमाओ हम भी कमाएँ’, या ‘तुम कमाते हो तो हम भी तो कमाते हैं’ की मानसिकता से आपसी सहयोग-सहानुभूति की अवस्था कमज़ोर होती जा रही है। पत्नी पर कार्य-स्थल पर ऐसा शारीरिक व मानसिक बोझ पड़ता है जिसके लिए उसका व्यक्तित्व, अपनी प्रकृति तथा स्वभाव में, अनुकूल नहीं होता। परिणामस्वरूप प्रायः पति-पत्नी एक-दूसरे को ‘सुकून’ पहुँचाने की अवस्था में नहीं रह पाते। एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों को भली-भाँति पूरा करने, एक-दूसरे के अधिकार अदा करने के लिए जिस सहयोग व सहानुभूति की आवश्यकता होती है वह प्रभावित होते-होते कभी-कभी बिल्कुल ही समाप्त हो जाती है। दाम्पत्य जीवन नकारात्मक प्रभावों से बोझिल और बुरे परिणामों से ग्रस्त होने लगता है।

इस्लाम का दृष्टिकोण यह है कि पति-पत्नी को बुनियादी और प्राथमिक स्तर पर एक-दूसरे से ‘सुकून’ प्राप्त करने के उद्देश्य से निकाह (विवाह) के वाद मिलन होते ही, एक-दूसरे के लिए प्रेम, सहानुभूति, शुभचिन्ता व सहयोग की भावनाएँ अल्लाह की ओर से वरदान-स्वरूप प्रदान कर दी जाती हैं (कु़रआन, 30:21) अतः ऐसा कोई कारक बीच में नहीं आना चाहिए जो अल्लाह की ओर से दिए गए इस प्राकृतिक देन को प्रभावित कर दे। इस्लाम कहता है कि पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे का लिबास हैं (कु़रआन, 2:187)। अर्थात् वे लिबास ही की तरह एक-दूसरे की शोभा बढ़ाने, एक-दूसरे को शारीरिक सुख पहुँचाने और एक दूसरे के शील (Chastity) की रक्षा करने के लिए हैं। लेकिन आधुनिक संस्कृति में, दोनों को एक-दूसरे पर भौतिक व भावनात्मक निर्भरता से स्वतंत्र होते जाने का तेज़ी से बढ़ता रुजहान, दाम्पत्य जीवन में मिठास और सुकून को कमज़ोर और ख़त्म करता जा रहा है। भौतिक संपन्नता की चाह और ललक पति-पत्नी के बीच आध्यात्मिक, नैतिक व भावनात्मक संबंध को ख़ामोशी के साथ आघात पहुँचा-पहुँचा कर कमज़ोर करती जा रही है।

इस्लाम ने शिक्षा दी है कि पति, हलाल कमाई से अर्जित रोज़ी का एक कौर (लुक़मा) जो प्रेम के साथ पत्नी के मुँह में डालता है वह सदक़ा और इबादत का स्थान रखता है। इसमें दोनों के बीच प्रेम-संबंध के साथ-साथ इस बात की शिक्षा भी निहित है कि कमाने-धमाने का काम पति करे, कमाई करने के लिए पत्नी को घर के शांतिपूर्ण, सुखमय व सुरक्षित वातावरण से बाहर मेहनत-मशक़्क़त और मानसिक तनाव के वातावरण में, तथा ऐसे वातावरण में जाने से बचाए जहाँ उसके नारीत्व, गरिमा व शील को ख़तरा हो।