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Saturday, November 02, 2013

अल्पसंख्यक मंत्रालय को बंद कर देना चाहिए


vxvcvsकिसी देश की नीतियों को वहां की सरकार और उसके मंत्रालय ही लागू करते हैं. भारत में भी ऐसा ही होता है, लेकिन अगर कोई मंत्रालय सशक्त न हो और काम भी न करे, तो क्या करना चाहिए? इसका सीधा जवाब तो यही है कि ऐसे मंत्रालय को बंद कर देना चाहिए. कुछ ऐसा ही हाल है भारत के अल्पसंख्यक मंत्रालय का, जिसके ऊपर शुरू से ही इस प्रकार के आरोप लगते रहे हैं कि इसने सरकार की अधिकतर नीतियों को लागू नहीं किया है.  अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान ख़ान यूपीए सरकार के सबसे बेबस मंत्री के रूप में उभरकर सामने आए हैं. उन्होंने भारत के अल्पसंख्यकों के कल्याण को लेकर झूठ बोलने के अलावा अब तक कोई काम नहीं किया है. यही कारण है कि अब आम जनों और विद्बानों की ओर से ऐसा कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को बंद कर दिया जाना चाहिए.
मौजूदा दौर में दुनिया भर में धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण प्राप्त है. संयुक्त राष्ट्र भी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मुहैया कराने पर ज़ोर देता है. विभिन्न देशों के संविधानों में भी इसका ध्यान रखा गया है. जहां तक हमारे देश का सवाल है, कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद  संविधान में अल्पसंख्यकों के तमाम अधिकार और सुरक्षा के उल्लेख के बावजूद कोई गंभीर प्रयास नहीं किया. मार्च 1977 में मोरारजी देसाई की अगुवाई में बनी जनता पार्टी की सरकार को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने अल्पसंख्यक मामलों के राष्ट्रीय आयोग के गठन की घोषणा की. इसके बाद पी वी नरसिम्हा रॉव की अगुवाई में 30 सितंबर, 1994 को कांग्रेस की अल्पसंख्यक सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास व आर्थिक कॉर्पोरेशन का गठन किया. फिर 2004 के आम चुनावों में सफलता के बाद कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाया और एक साल बाद मुसलमानों की स्थिति जानने के लिए सच्चर कमेटी का गठन किया और 29 जनवरी, 2006 को विशेष रूप से अल्पसंख्यक मंत्रालय की घोषणा की.
विश्‍लेषण से पता चलता है कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए कभी भी अल्पसंख्यकों के लिए कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया और 1977 में अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग के बाद इसे केवल राजनीतिक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किया. इसका उदाहरण अल्पसंख्यक मामलों के राष्ट्रीय आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम, अल्पसंख्यक मंत्रालय और सच्चर कमेटी के क्रियान्वयन में मिलता है. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से काट कर बनाए गए अल्पसंख्यक मंत्रालय ने अब तक बजट आबंटित करने और स्कॉलरशिप बांटने के अलावा कोई नया काम नहीं किया है. यह काम तो सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भी कर सकता था, फिर अल्पसंख्यक मंत्रालय का क्या औचित्य है?  अल्पसंख्यक मंत्रालय को भले ही केन्द्रीय मंत्रालय का दर्जा प्राप्त है, लेकिन वह अपने अधिकतर कार्यक्रमों को लागू करने के लिए या तो राज्य सरकारों पर निर्भर है या फिर स्वयंसेवी  संगठनों पर. उसके पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है, जिससे यह मालूम हो सके कि उसने अल्पसंख्यक कल्याण से संबंधित जिन विकास कार्यों को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से बजट पास करवाए हैं, उन पर उचित ढंग से क्रियान्वयन हो भी रहा है या नहीं. 2001 की जनगणना के अनुसार, देश में अल्पसंख्यकों की कुल आबादी लगभग 18.4 प्रतिशत है, जिनमें से मुसलमानों की आबादी 13.4 प्रतिशत, ईसाइयों की 2.3 प्रतिशत, सिक्खों की 1.9 प्रतिशत, बौद्धों की 0.8 प्रतिशत और पारसियों की आबादी 0.007 प्रतिशत है. कांग्रेस अल्पसंख्यकों के नाम पर अगर केवल मुसलमानों का ही नाम लेती है, तो इसका एकमात्र उद्देश्य चुनावों में मुस्लिम वोट हथियाना है. आंकड़ों से पता चलता है कि लोकसभा की 35 ऐसी सीटें हैं, जहां पर मुसलमानों की आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है, जबकि 38 सीटों पर मुसलमानों की आबादी 21 से 30 प्रतिशत के बीच है और 145 सीटों पर मुसलमानों की आबादी 11 से 20 प्रतिशत के बीच है. जब भी आम चुनाव नज़दीक आते हैं, कांग्रेस मुसलमानों का वोट हथियाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने लगती है. 
लोकसभा चुनाव नजदीक देख कांग्रेस ने फिर से मुसलमानों से झूठ बोलना शुरू कर दिया है.  केन्द्रीय मंत्री के रहमान कह रहे हैं कि उनके मंत्रालय ने सच्चर कमेटी की 76 अनुशंसाओं में से 73 को लागू कर दिया है. चौथी दुनिया ने जब प़डताल की तो पता  चला कि आरंभिक 22 अनुशंसाओं में 12 अनुशंसाओं को यूपीए सरकार ने अभी तक लागू नहीं किया है. यूपीए सरकार के मंत्री लगातार झूठ बोल रहे हैं. सरकार ने अपनी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में अल्पसंख्यक मंत्रालय को 7 हज़ार करोड़ रुपये आबंटित किए थे, मंत्रालय का दावा है कि उसने उन रुपयों में से 6,824 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि मंत्रालय ने राज्यों को जो राशि आबंटित की थी, उनमें से अधिकतर राशि ख़र्च ही नहीं की गई. हाल ही में जारी सोशल डेवलपमेंट रिपोर्ट 2012 के अनुसार, 2007-12 के दौरान राज्य सरकारों ने अल्पसंख्यकों से संबंधित केन्द्र की ओर से जारी की गई राशि में से आधी राशि भी ख़र्च नहीं की. 12 राज्यों ने अल्पसंख्यकों से संबंधित 50 प्रतिशत से भी कम ख़र्च किया, जिनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और असम जैसे राज्य सूची में ऊपर हैं. कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहां पर इसमें से केवल 20 प्रतिशत राशि ही ख़र्च की गई. सच्चाई यह है कि अल्पसंख्यक मंत्रालय ने वर्ष 2008-09 में केन्द्र सरकार को 33.63 करोड़, 2009-10 में 31.50 करोड़ और 2010-11 में 587 करोड़ रुपये इसलिए वापस लौटा दिए, क्योंकि उन पैसों को ख़र्च ही नहीं किया जा सका. अल्पसंख्यक मंत्रालय की असमर्थता को देखते हुए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की संसदीय स्टैंडिंग कमेटी ने कड़ी आपत्ति जताई थी. अल्पसंख्यकों की बहुलता वाले 90 ज़िलों में बहु क्षेत्रीय विकास के तहत विभिन्न योजनाओं पर ख़र्च करने के लिए केन्द्र की ओर से इस मंत्रालय को जो 462.26 करोड़ रुपये दिए गए थे, वह भी उसने केन्द्र को लौटा दिए गए. इस प्रकार पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप की 24 करोड़ रुपये की राशि, मैट्रिक स्कॉलरशिप की 33 करोड़, मैरिट कोमेंस स्कॉलरशिप की 26 करोड़ और वक़्फ़ बोर्ड के कंप्यूटरीकरण की 9.3 करोड़ रुपये की राशि को अल्पसंख्यक मंत्रालय ख़र्च करने में असफल रहा और नतीजतन इस पूरी राशि को इसे केन्द्र को वापस करना पड़ा. ऐसी स्थिति में अल्पसंख्यकों, विशेषत: मुसलमानों के विकास के बारे में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के सभी दावे खोखले ही साबित हो रहे हैं. सच्चर कमेटी ने सबसे अधिक ज़ोर मुसलमानों की शिक्षा व पिछड़ेपन को दूर करने पर दिया था, लेकिन 7 वर्ष बाद भी मुस्लिम समाज की शिक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं. सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए अलग से किसी प्रकार के आरक्षण की व्यवस्था भी अब तक नहीं की जा सकी है.

अल्पसंख्यक मंत्रालय का ढांचा
यूपीए सरकार ने भारत के अल्पसंख्यकों के कल्याण से संबंधित कल्याणकारी कार्यक्रमों को उचित ढंग से क्रियान्वित करने के लिए 29 जनवरी, 2006 को एक नया मंत्रालय बनाया और उसका नाम रखा अल्पसंख्यक मंत्रालय. इसे सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय से अलग करके एक नया मंत्रालय बनाया गया. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुर्रहमान अंतुले को इसका पहला मंत्री बनाया गया, जो 2009 तक इस पद पर रहे. इसके बाद सलमान ख़ुर्शीद को अल्पसंख्यक मंत्री बनाया गया, जो 2012 तक इस पद पर रहे. वर्तमान मंत्री के रहमान ख़ान हैं, जिन्होंने 28 अक्टूबर, 2012 को अल्पसंख्यक मंत्री का पद संभाला था. वर्तमान में नैनोंग एरंग इसके राज्यमंत्री हैं. अल्पसंख्यक मंत्रालय के कुल पदाधिकारियों की वर्तमान संख्या 93 है, जिनमें एक सचिव, तीन संयुक्त सचिव और व आर्थिक सलाहकार (अतिरिक्त प्रभार) शामिल हैं. आश्‍चर्य की बात यह है कि 2006 में जिस समय यह मंत्रालय बनाया गया था और अब्दुरर्रहमान अंतुले को जब इसका मंत्री बनाया गया था, इस समय इसके लिए अलग से न तो कोई भवन था और न ही कोई स्थायी कार्यालय, बल्कि एआर अंतुले जंतर मंतर रोड पर स्थित अपने सरकारी आवास से इसे चलाते थे, लेकिन आज, जब इस मंत्रालय के पास अपना कार्यालय भी है और इसके स्टाफ में कुल 93 सरकारी अधिकारी भी मौजूद हैं, फिर भी रहमान ख़ान अपने मंत्रालय को ठीक ढंग से नहीं चला पा रहे हैं.

-डॉ. कमर तबरेज

Thursday, August 15, 2013

एक 'देशद्रोही' ने कैसे मनाया स्‍वतंत्रता दिवस (Independence Day)


यह लेख आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लिखा गया था। लेकिन यह आज भी उतना ही सही है जितना तब था और शायद तब तक रहेगा जब तक हालात नहीं बदलते। 
नीरेंद्र नागर 
कितना अच्छा दिन है आज। हम अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति के साठ साल का जश्न मना रहे हैं। लाल किले से लेकर स्कूल-कॉलेजों में और मुहल्लों से लेकर अपार्टमेंटों तक में तिरंगा फहराया जा रहा हैबच्चों में मिठाइयां बांटी जा रही हैं। मेरे अपार्टमेंट में भी देशभक्ति से भरे गाने बज रहे हैं और मैंने उस शोर से बचने के लिए अपने फ्लैट के सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं। मैं नीचे झंडा फहराने के कार्यक्रम में भी नहीं जा रहा जहां अपार्टमेंट के सारे लोग प्रेज़िडेंट साहब और लोकल नेताजी का भाषण सुनने के लिए जमा हो रहे हैं। मैं इस छुट्टी का आनंद लेते हुए घर में बैठा बेटी के साथ टॉम ऐंड जेरी देख रहा हूं। 
आप मुझे देशद्रोही कह सकते हैं। कह सकते हैं कि मुझे देश से प्यार नहीं है। मुझपर जूते-चप्पल फेंक सकते हैं। कोई ज़्यादा ही देशभक्त मुझपर पाकिस्तानी होने का आरोप भी लगा सकता है। 
मैं मानता हूं कि मेरा यह काम शर्मनाक हैलेकिन मैं क्या करूं..?? मैं जानता हूं कि जब मैं नीचे जाऊंगा और लोगों को बड़ी-बड़ी देशभक्तिपूर्ण बातें बोलते हुए देखूंगा तो मुझसे रहा नहीं जाएगा। वहां हमारे लोकल एमएलए होंगे जिनके भ्रष्टाचार के किस्से उनकी विशाल कोठी और बाहर लगीं चार-पांच कारें खोलती हैंवह हमारे बच्चों को गांधीजी के त्याग और बलिदान की बात बताएंगे। वहां हमारे सेक्रेटरी साहब होंगे जिन्होंने मकान बनते समय लाखों का घपला किया और आज तक जबरदस्ती सेक्रेटरी बने हुए हैंवह देश के लिए कुर्बानी देनेवाले शहीदों की याद में आंसू बहाएंगे। वहां अपार्टमेंट के वे तमाम सदस्य होंगे जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एक्स्ट्रा कमरे बनवा लिए हैंऔर कॉमन जगह दखल कर ली हैऐसे भी कई होंगे जिन्होंने बिजली के मीटर रुकवा दिए हैं। ये सारे लोग वहां तालियां बजाएंगे कि आज हम आज़ाद हैं। 

क्या करूं अगर मुझे ऐसे लोगों को देशभक्ति की बात करते देख गुस्सा आ जाता है। इसलिए मैंने फैसला कर लिया है कि मैं वहां जाऊं ही नहीं। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं उनसे बच नहीं पाऊंगा। ये सारे लोग आज आज़ादी का जश्न मनाने के बाद कल शहर की सड़कों पर निकलेंगे और हर गलीहर चौराहेहर दफ्तरहर रेस्तरां में होंगे। मैं उनसे बचकर कहां जाऊंगा..?? 

कल 16 अगस्त को जब मैं ऑफिस के लिए निकलूंगा और देखूंगा कि टंकी में तेल नहीं है तो मेरी पहली चिंता यही होगी कि तेल कहां से भराऊंक्योंकि ज़्यादातर पेट्रोल पंपों में मिलावटी तेल मिलता है (पेट्रोल पंप का वह मालिक भी आज आज़ादी का जश्न मना रहा होगाअगर वह खुद नेता होगा तो शायद भाषण भी दे रहा होगा)। खैरअपने एक विश्वसनीय पेट्रोल पंप तक मेरी गाड़ी चल ही जाएगीइस भरोसे के साथ मैं आगे बढ़ूंगा और चौराहे की लाल बत्ती पर रुकूंगा। रुकते ही सुनूंगा मेरे पीछे वाली गाड़ी का हॉर्न, जिसका ड्राइवर इसलिए मुझपर बिगड़ रहा होगा कि मैं लाल बत्ती पर क्यों रुक रहा हूं। मेरे आसपास की सारी गाड़ियांरिक्शेबस सब लाल बत्ती को अनदेखा करते हुए आगे बढ़ जाएंगेक्योंकि चौराहे पर कोई पुलिसवाला नहीं है। मैं एक देशद्रोही नागरिक जो आज आज़ादी के समारोह में नहीं जा रहाकल उस चौराहे पर भी अकेला पड़ जाऊंगाजबकि सारे देशभक्त अपनी मंज़िल की ओर बढ़ जाएंगे। 

अगले चौराहे पर पुलिसवाला मौजूद होगाइसलिए कुछ गाड़ियां लाल बत्ती पर रुकेंगी। लेकिन बसवाला नहीं। उसे पुलिसवाले का डर नहींक्योंकि या तो वह खुद उसी पुलिसवाले को हफ्ता देता हैया फिर बस का मालिक खुद पुलिसवाला हैया कोई नेता है। नेताओंपुलिसवालों और पैसेवालों के लिए इस आज़ाद देश में कानून न मानने की आज़ादी है। मैं देखूंगा कि मेरे बराबर में ही एक देशभक्त पुलिसवाला बिना हेल्मेट लगाए बाइक पर सवार हैलेकिन मैं उसे टोकने का खतरा नहीं मोल ले सकताक्योंकि वह किसी भी बहाने मुझे रोक सकता हैमेरी पिटाई कर सकता हैमुझे गिरफ्तार कर सकता है। आप मुझे बचाने के लिए भी नहीं आएंगे क्योंकि मैं ठहरा देशद्रोही जो आज आज़ादी का जश्न मनाने के बजाय कार्टून चैनल देख रहा है। 

आगे चलते हुए मैं उन इलाकों से गुज़रूंगा जहां लोगों ने सड़कों पर घर बना दिए हैंलेकिन उन घरों को तोड़ने की हिम्मत किसी को नहीं हैक्योंकि वे वोट देते हैं। वोट बेचकर वे सड़क को घेर लेने की आज़ादी खरीदते हैंऔर वोट खरीदकर ये एमएलए-एमपी विधानसभा और संसद में पहुंचते हैं जहां एक तरफ उन्हें कानून बनाने का कानूनी अधिकार मिल जाता हैदूसरी तरफ कानून तोड़ने का गैरकानूनी अधिकार भी। कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता। इसलिए वे अपने वोटरों से कहते हैंरूल्स आर फॉर फूल्स। मैं भी कानून तोड़ता हूंतुम भी तोड़ो। मस्त रहोबस मुझे वोट देते रहोमैं तुम्हें बचाता रहूंगा। 

इसको कहते हैं लोकतंत्र। लोग अपने वोट की ताकत से नाजायज़ अधिकार खरीदते हैंअपनी आज़ादी खरीदते हैं - कानून तोड़ने की आज़ादी। यह तो मेरे जैसा देशद्रोही ही है जो लोकतंत्र का महत्व नहीं समझ रहाजिसने अपने फ्लैट में एक इंच भी इधर-उधर नहीं कियाऔर उसी तंग दायरे में सिमटा रहाजबकि देशभक्तों ने कमरेमंजिलें सब बना दीं सिर्फ इस लोकतंत्र के बल पर। आज उसी लोकतांत्रिक देश की आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लोक और सत्ता के इस गठजोड़ को और मज़बूती देने के लिए जगह-जगह ऐसे ही कानूनतोड़क लोग अपने कानूनतोड़क नेता को बुला रहे है। 

जनता के ये सेवक आज अपने-अपने इलाकों में तिरंगा फहराएंगे। एक एमएलए-एमपी और बीसियों जगह से आमंत्रण। लेकिन देशसेवा का व्रत लिया है तो जाना ही होगा। आखिरकार जब भाषण देते-देते थक जाएंगे तो रात को किसी बड़े व्यापारी-इंडस्ट्रियलिस्ट के सौजन्य से सुरा-सुंदरी का सहारा लेकर अपनी थकान मिटाएंगे। यह तो मेरे जैसे देशद्रोही ही होंगे जो अपने फ्लैट में दुबके बैठे है और जो रात को दाल-रोटी-सब्जी खाकर सो जाएंगे। 

नीचे देशभक्ति के गाने बंद हो गए हैंभाषण शुरू हो चुके हैं। जय हिंद के नारे लग रहे हैं। मेरा मन भी करता है कि यहीं से सहीमैं भी इस नारे में साथ दूं। दरवाज़ा खोलकर बालकनी में जाता हूं। नीचे खड़े लोगों के चेहरे देखता हूं। चौंक जाता हूंअरेयह मैं क्या सुन रहा हूंऊपर से हर कोई जय हिंद बोल रहा हैलेकिन मुझे उनके दिल से निकलती यही आवाज़ सुनाई दे रही है - मेरी मर्ज़ी। मैं लाइन तोड़ आगे बढ़ जाऊंमेरी मर्जी। मैं रिश्वत दे जमीन हथियाऊंमेरी मर्ज़ी। मैं हर कानून को लात दिखाऊंमेरी मर्ज़ी... 

मैं बालकनी का दरवाज़ा बंद कर वापस कमरे में आ गया हूं। ड्रॉइंग रूम में बेटी ने टीवी के ऊपर प्लास्टिक का छोटा-सा झंडा लगा रखा है। मैं उसके सामने खड़ा हो जाता हूं। झंडे को चूमता हूंऔर बोलने की कोशिश करता हूं - जय हिंद। लेकिन आवाज़ भर्रा जाती है। खुद को बहुत ही अकेला पाता हूं। सोचता हूंक्या और भी लोग होंगे मेरी तरह जो आज अकेले में आज़ादी का यह त्यौहार मना रहे होंगे। वे लोग जो इस भीड़ का हिस्सा बनने से खुद को बचाये रख पाए होंगे..?? वे लोग जो अपने फायदे के लिए इस देश के कानून को रौंदने में विश्वास नहीं करते..?? वे लोग जो रिश्वत या ताकत के बल पर दूसरों का हक नहीं छीनते..??

Monday, October 22, 2012

तालिबानों पर होती लानतों की विश्वव्यापी बौछार....



वैसे तो दुनिया के किसी भी देश में तालिबानों को समर्थन दिए जाने, उनके साथ सहयोग करने अथवा उनकी दरिंदगी की प्रशंसा करने की बात देखी व सुनी नहीं गई। चूंकि उनका काम ही आतंक फैलानाबेक़ुसूरलोगों को मारनाधार्मिक उन्माद फैलाना, इस्लाम के नाम पर आत्मघाती दस्ते तैयार करना तथा आत्मघाती हमले कराना, मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारों, दरगाहों व इमाम बारगाहों पर हमले करना तथा स्कूली शिक्षा विशेषकर लड़कियों को दी जाने वाली शिक्षा का विरोध करना आदि है इसलिए दुनिया का हर देश, हर वर्ग तथा हर समुदाय यहां तक कि आम मुस्लिम समुदाय भी तालिबानों को गिरी नज़रों से देखता है तथा समय-समय पर इन के द्वारा अंजाम दी जाने वाली अमानवीय घटनाओं की निंदा व भत्र्सना करता रहता है। परंतु गत् 9 अक्तूबर मंगलवार को पाकिस्तान स्थित इन वहशी तालिबानों द्वारा पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र की स्वात घाटी की मलाला युसुफ ज़ई नामक 14 वर्षीय किशोरी पर जो वहशियाना आक्रमण किया गया तथा उसके सिर में गोली मार कर उस मासूम की हत्या का प्रयास किया गया उसके बाद पूरे विश्व में इन दरिंदे तालिबानों पर जिस प्रकार लानतों की बौछार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होती देखी जा रही है उतनी लानतें तालिबानों पर बरसते पहले कभी नहीं देखी गई। पाकिस्तान जैसा देश जहां यह हादसा हुआ तथा जो देश खुद तालिबानों, कट्टरपंथियों व रूढ़ीवादियों की गिरफ़्त में आता जा रहा है वहां भी कई प्रमुख स्थानों पर मलाला युसुफ ज़ई के पक्ष में तथा उसकी जि़दगी के लिए दुआएं मांगने के हक में व वहशी तालिबानों के विरोध में प्रदर्शन होते हुए देखे गए।
आखिर ऐसी क्या बात थी जिसने मात्र एक 14 वर्षीय कन्या पर तालिबानी हमले को पूरी दुनिया के लिए ध्यान आकर्षित करने का मुद्दा बना दिया। दरअसल मलाला युसफ ज़ई जब 11 वर्ष की थी तथा स्कूल जाया करती थी उसी दौरान स्वात घाटी में तालिबानों ने स्कूलों के खुलने का विरोध करना शुरु कर दिया था। उन्होंने कई स्कूल जहां सांसारिक व प्रगतिशील शिक्षा दी जाती थी उन्हें ध्वस्त करना शुरु कर दिया। स्कूल जाते हुए बच्चों का अपहरण करने लगे। और सबसे ज़्यादा उनका विरोध इस बात को लेकर था कि लड़कियां तो खासतौर पर स्कूल हरगिज़ न जाया करें। और तालिबानों के इस रवैये का प्रभाव यह पड़ा कि स्वात घाटी में आम लोग भयवश अपने बच्चों को स्कूल जाने से रोकने लगे। 11 वर्षीय मलाला भी उस समय स्कूल जाया करती थी। इसी उम्र में उसे यह एहसास हो चला था कि इंसान को अपने जीवन को सफल व सुखद बनाने के लिए शिक्षित होना बहुत ज़रूरी है। और अपने इन्हीं विचारों के साथ वह शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए तथा तालिबानों के शिक्षा विरोधी मुहिम के विरुद्ध खुलकर सामने आ गई। उसने शिक्षा, प्रगतिशीलता, उदारवाद तथा धर्मनिरपेक्षता के हक़ में बोलना व लिखना शुरु कर दिया। यहां तक कि विश्व की सबसे प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी बीबीसी उर्दू सर्विस के लिए मात्र 11 वर्ष की आयु में ही उसने अपनी डायरी लिखनी शुरु कर दी। बीबीसी पर प्रसारित होने वाले उसके हृदयस्पर्शी कार्यक्रम स्वात घाटी सहित पूरे पाकिस्तान व अफ़ग़ानिस्तान में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। अपनी डायरी में वह स्वात घाटी के वास्तविक हालात का बयान करती, तालिबान की दहशत तथा उनके ज़ल्मो-सितम के परिणामस्वरूप उस क्षेत्र पर पडऩे वाले नकारात्मक प्रभाव का जि़क्र करती तथा साथ-साथ शिक्षा के प्रसार पर ज़ोर देती।
मलाला के ऐसे प्रयासों के परिणामस्वरूप स्वात क्षेत्र के आम लोगों ने अपने बच्चों को सादे लिबासों में तथा अपनी शाल व चादरों के बीच किताबें छुपाकर पुन: स्कूल भेजना शुरु कर दिया। उसकी बहादुरी के चर्चे इस हद तक हुए कि उसे पाकिस्तान में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार भी दिया गया। इसके पश्चात मलाला को बच्चों के अंतर्राष्ट्रीय विश्व शांति पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया। और इस प्रकार वह स्वात के प्रगतिशील विचार रखने वाले लोगों खासतौर पर बच्चों के लिए एक आदर्श कन्या के रूप में लोकप्रिय होने लगी। ज़ाहिर है उसे यह सभी उपलब्धियां केवल इसीलिए मिल रही थीं क्योंकि वह एक किशोरी थी और कम उम्र की बालिका होने के बावजूद तथा दरिंदे तालिबानों के गढ़ में रहने के बावजूद वह बड़े बुलंद हौसलों के साथ सच्चाई के पक्ष में तथा असत्य, अधर्म तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठा रही थी। जिस समय तालिबानी दरिंदे मलाला युसुफज़ई को स्कूल के बच्चों की गाड़ी से उसका नाम पुकार कर बाहर उतरवा कर उसके सिर में गोली मारी इस हमले के बाद पाकिस्तान तालिबान के प्रवक्ता ने अपनी जि़म्मेदारी स्वीकार करते हुए यह कहा भी था-कि यह हमला उसने इसलिए किया है क्योंकि मलाला तालिबान के खिलाफ थी व धर्मनिरपेक्ष थी और उसे बख्शा नहीं जाएगा। ज़ाहिर है तालिबानों की इस स्वीकारोक्ति का अर्थ यही है कि तालिबानों के शिक्षा के विरोध करने के बावजूद मलाला का शिक्षा के पक्ष में खड़े होना तालिबानों को नागवार गुज़रा।
सवाल यह है कि क्या इस्लाम धर्म भी शिक्षा के विरुद्ध है? यदि हम तालिबानों की शिक्षा विरोधी सोच को सही मान लें तो एक सवाल यह भी है कि क्या कुरान शरीफ का संकलन बिना शिक्षित लोगों के सहयोग के संभव हो सका? क्या कुरान शरीफ में लिखी आयतें तथा उसकी समीक्षाएं या उनपर तबसेरा आदि करना किसी अशिक्षित व्यक्ति के वश की बात है? क्या दवा-इलाज, इंजीनियरिंग, यहां तक कि तालिबानों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले आधुनिक संचार प्रणाली व हथियार आदि किसी अशिक्षित व्यक्ति द्वारा किए गए अविष्कार हैं? आज यही तालिबानी सोच रखने वाले लोगों के घरों की लड़कियां या महिलाएं जब बीमार होती हैं तब यही लोग महिला डॉक्टर की खोज करते देखे जाते हैं। आखिर कहां से आएगी महिला डॉक्टर जब आपकी बच्चियां स्कूल ही नहीं जाएंगी? पैगंबर हज़रत मोहम्मद, हज़रत अली से लेकर सभी इमाम व खलीफा शिक्षा व शिक्षित समाज के पक्ष में बोलते देखे गए। शिक्षा को मानवता, विकास तथा आत्मनिर्भरता की बुनियाद माना जाता है। अशिक्षित समाज की हालत दुनिया में कैसी होती है यह देखने के लिए किसी और वर्ग या समाज को देखने की नहीं बल्कि स्वयं तालिबानों को अपने-आप को देखने की ज़रूरत है। क्या मलाला युसुफ ज़ई का कुसूर यही था कि वह आम लोगों के बच्चों विशेषकर स्वात घाटी के तालिबानी दरिंदों की दहशत के शिकार समाज के बच्चों को शिक्षित होने का रास्ता दिखा रही थी? शिक्षा की चाहत रखने वाले अभिभावकों व बच्चों के लिए वह मशअल-ए-राह बन चुकी थी?
स्वयं को इस्लाम धर्म का ठेकेदार बताने वाले यह दुष्ट, क्रूर व खबीस तालिबानी क्या इस्लाम धर्म के इतिहास में किसी ऐसी घटना की मिसाल दे सकते हैं जो 14 वर्षीय बच्ची के सिर में गोली मारे जाने की घटना का समर्थन करती हो। स्वयं को मुस्लिम कहकर इस्लाम धर्म को कलंकित करने वाले इन वहशियों ने मलाला को केवल इसलिए गोली मारी क्योंकि वह बच्ची पिछड़े व अनपढ़ समाज को शिक्षित समाज के रूप में देखना चाहती थी। यदि तालिबानी वहशी आधुनिक शिक्षा, आधुनिक समाज या आधुनिक व्यवस्था के इतने ही बड़े विरोधी हैं तो वे अपने आतंकी मिशन में आधुनिक हथियारों व आधुनिक संचार माध्यमों का भी प्रयोग क्यों करते हैं? दरअसल तालिबान या इन जैसे कोई भी आतंकी संगठन यह भलीभांति जानते हैं कि अनपढ़ समाज व जाहलियत के कारण बेरोज़गारी का सामना करने वाला युवा ही इनका समर्थक, इनका सहयोगी हो सकता है तथा वह जल्दी इनके झांसे में आ सकता है। परंतु शिक्षित युवा प्राय: अपनी सोच-समझ व शिक्षा के अनुसार ही कोई निर्णय लेता है। लिहाज़ा तालिबानों को अपनी भलाई भी इसी में नज़र आती है कि उनसे संबंधित अधिकांश लोग अनपढ़ ही हों।
परंतु दुनिया तालिबानों की इस सोच के पूरी तरह विरुद्ध है। आज विश्व के प्रत्येक भाग में शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो रहा है। यहां तक कि कट्टरपंथियों की गिरफ़्त में रहने वाले पाकिस्तान व अफगानिस्तान जैसे देशों में भी । और यही वजह है कि मलाला युसुफ ज़ई पर हुए हमले ने तालिबानों को दुनिया की नज़रों से इस कद्र गिरा दिया है जिसकी वे कभी उम्मीद भी नहीं कर सकते थे। यह उनकी इस दरिंदगी का ही परिणाम है कि आज सारी दुनिया में जहां मलाला के शीघ्र सेहतमंद होने के लिए दुआओं के हाथ बुलंद हो रहे हैं वहीं तालिबानों पर लानतों की विश्वव्यापी बौछार भी हो रही है।

Wednesday, October 17, 2012

सर सैय्यद अहमद खां तो पैदा ही मरने के बाद हुए !



यह दुनिया का दस्तूर है कि मरने के बाद ही उस आदमी की कीमत का लोगों को पता चलता है. सर सैय्यद के साथ भी ऐसा ही हुआ. दरअसल, सर सैय्यद पैदा ही मरने के बाद हुए. जीवित रहते हुए तो सर सैय्यद को काफ़िर और पता नहीं और किन-किन विरोध भरे शब्दों को सुनने को मिला. सर सैय्यद को तो पहचाना तब गया जब वह इस दुनिया से विदा हो चुके थे. पर सैय्यद जैसे लोग मरते नहीं हैं, वह तो अपने कारनामों और सोच के रूप में हमेशा जीवित रहेंगे.
किसी ने कितना सच कहा है कि आदमी मर सकता है, देश बन और बिगड़ सकते हैं लेकिन सोच हमेशा जीवित रहती है (A man may die, nations may rise and fall, but the idea lives on).
सर सैय्यद आधुनिक विज्ञान की सोच को लेकर बहुत गंभीर थे और इसलिए वह 1869 में लंदन गए और वहां के ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे शिक्षा संस्थानों का निरीक्षण किया. वह हिंदुस्तान में कैम्ब्रिज जैसी संस्था बनाना चाहते थे जहां आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी की पढ़ाई हो. सर सैय्यद प्रगतिशील सोच रखते थे और इसलिए उन्हें यह एहसास हो गया था कि पश्चिमी विज्ञान और यूरोपीय सोच के बिना मुसलमानों का भविष्य सुरक्षित नहीं है.
इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने साइंटिफ़िक सोसाइटी ऑफ अलीगढ़ बनाई जिसका काम विज्ञान और अन्य अध्ययन से संबंधित नोट्स उर्दू और अंग्रेज़ी में अनुवाद करना था. सर सैय्यद अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे. जब उन्होंने 1875 में मुस्लिम एंग्लो ओरियन्टल कॉलेज (MAO College) की स्थापना की और उन्होंने अपनी सोच के अनुसार कॉलेज को आगे बढ़ाने का जिम्मेदारी थीयोडोर बेक को दी. थीयोडोर बेक ने कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में काम किया.
सर सैय्यद का सपना था कि वह इस संस्थान को आधुनिक विज्ञान और धार्मिक शिक्षा के संगम के रूप में पेश. उनकी नज़र में यह संस्थान नए और पुराने पश्चिम और पूर्वी अध्ययन के बीच पुल का काम करने वाला होगा.
सर सैयद को सही मानों में अगर हम श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो उनकी सोच को आगे बढ़ाने का काम करना होगा. उनकी सोच इस देश के मुसलमानों को ज़लालत और पिछड़ेपन से निकालना था.
1857 के युद्ध के बाद उन्हें यह पूरी तरह विश्वास हो गया था कि मुसलमानों के पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह उनका ज्ञान से दूर होना है. उन्होंने इसका समाधान केवल ज्ञान को लोगों तक मुहैया कराने में किया. लेकिन आज बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि सिर सैय्यद की मृत्यु के बाद कोई सर सैय्यद तो छोड़िए उनके आसपास स्थान रखने वाला व्यक्ति भी हमने पैदा नहीं किया.
हाँ, छोटी बड़ी कोशिशें ज्ञान के क्षेत्र में ज़रूर हुई है, पर जिस उद्देश्य को लेकर सर सैय्यद चले थे उस उद्देश्य से आज सर सैय्यद के विचार और प्रयासों से फैज़याब लोग बहुत दूर हैं. हम सर सैय्यद के बनाए संस्थान से फ़ैज़याब हुए लेकिन सर सैय्यद के विचारों को भूल बैठे.
ऐसा नहीं कहूंगा कि लोगों ने कोशिश नहीं की. हकीम अब्दुल हमीद ने जामिया हमदर्द की स्थापना की और आज वह deemed university है. इसी तरह कुछ लोगों के प्रयासों का नतीजा है कि लखनऊ में Integral University स्थापित हुआ. अभी हाल ही में आज़म खान के प्रयासों से उत्तर प्रदेश के रामपुर में मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय खुली. लेकिन अधिकांश शिक्षण संस्थानों में आम मुसलमान इसलिए शिक्षा नहीं पा सकता क्योंकि यहां self-finance कोर्सेस अधिक हैं, जहां प्रवेश शुल्क दे पाना एक आम मुसलमान के बस की बात नहीं है.
सर सैय्यद का सपना तो हर मुसलमान को सस्ती, अच्छी और आधुनिक विज्ञान मुहैया कराना था, जो ये शिक्षण संस्थान पूरा नहीं करते.
क्या बात है कि सर सैय्यद की मृत्यु के इतने दिनों बाद भी मुसलमानों के पास सस्ती और क्वालिटी शिक्षा देने वाले स्कूल नहीं के बराबर हैं? अधिकांश मुस्लिम क्षेत्रों में ऐसे स्कूलों की बेहद कमी है जिनमें अंग्रेजी, आधुनिक विज्ञान और क्वालिटी एजूकेशन दी जा सके.
मेरी नज़र में हमने सर सैय्यद के सपनों को सच करने के लिए सच्चे दिल से प्रयास नहीं किए. जो संस्था सर सैय्यद हमें दे गए उसी को हम काफी मान कर घर बैठे रहे. क्या कारण है कि मुस्लिम बच्चे आज देश की कोई भी प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी या कॉलेज में देखने को नहीं मिलते?
सच्चर समिति ने ये सारे आंकड़े पेश किए हैं कि किस तरह आईआईटी, आईआईएम और विभिन्न प्रोफेसनल शिक्षण संस्थानों में मुस्लिम छात्र न के बराबर हैं. सच्चर रिपोर्ट इस के कारण पर भी प्रकाश डालती है. रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम क्षेत्रों में स्कूलों की बेहद कमी है, यहां पर प्राथमिक, अपर प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूल बहुत कम संख्या में हैं. अक्सर बच्चे सेकेंडरी तक आते-आते ड्रॉप आउट कर जाते हैं जिससे उनकी ऐसी कॉलेज और विभिन्न शिक्षण संस्थानों कम होती जा रही है.
मुझे नहीं लगता कि कोई सर सैय्यद हमें समझाने आएगा कि अपने समाज को बेहतर बनाना चाहते हैं तो आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा का दामन थाम लो. ऐसे में हम सब को ही मिलकर ऐसी कोशिशें करनी चाहिए कि सर सैय्यद के सपनों की ताबीर हो सके.
मौजूदा हालात को देखते हुए मुस्लिम समाज के पढ़े-लिखे लोगों को आगे आना होगा. उन्हें अपनी जिम्मेदारी अपने-अपने क्षेत्रों में संभालनी होगी. उन्हें सोचना होगा कि हम तो शिक्षित हो गए अब उनकी यह ज़िम्मेदारी बनती कि अपने समाज को ज़लालत के अंधेरे से बाहर निकालें.
आजकल देखने को मिलता है कि लोग खुद पढ़-लिखने के बाद अपने जीवन और घर को संवारने में जुट जाते हैं. उन्हें अपने समुदाय में क्या हो रहा है इसकी कम ही चिंता रहती है. ऐसे समय में मुझे बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की एक बात याद आती है. दलित समाज के लोगों को संबोधित करते हुए बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने 18 मार्च, 1956 को आगरा में कहा था कि मुझे मेरे समाज के पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया क्योंकि वे पढ़ लिख जाने के बाद अपनी ज़िंदगी में लग गए.
बाबा साहब ने कहा कि हमने अपने समाज में पढ़ाई से बहुत छोटे और बड़े क्लर्क पैदा कर लिए. यह लोग अपने और अपने परिवार के पोषण में लग गए और भूल गए कि समाज के लिए भी उनकी जिम्मेदारी बनती है. यही कम और अधिक मुस्लिम समाज में हुआ, जो पढ़ गए उन्होंने समाज की ओर मुड़ कर नहीं देखा, हालांकि हर व्यक्ति की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह बदले में समाज को कुछ दे ताकि समाज और देश का भला हो सके.
सर सैय्यद ने अपने भाषण में कहा था कि हिंदू और मुसलमान भारतीय रूपी दुल्हन की दो सुंदर आँखें हैं और इनमें से अगर एक आँख भी ख़राब हो जाए तो दुल्हन बदसूरत दिखेगी. 2012 तक पहुंचते-पहुंचते यही हुआ. मुस्लिम समाज के लोग सरकारी नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थानों से नदारद होते चले गए. आज भारतीय रूपी दुल्हन की एक आंख ख़राब होती जा रही है. जब तक आंख नहीं बेहतर बनाया जाएगा भारतीय रूपी दुल्हन की सुंदरता बनाए रखना संभव नहीं पाएगा.
यह सभी के अधिकार में है कि मुस्लिम समाज के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए उनके लिए कुछ पुख्ता प्रबंध किए जाए. मैं समझता हूं कि यह जिम्मेदारी सरकार और मुस्लिम समाज के पढ़े-लिखे और पैसे से मज़बूत लोगों की बनती है कि हर मुस्लिम क्षेत्र में अंग्रेजी मीडियम स्कूल खोलें ताकि कम्पेटेटिव वर्ल्ड में मुस्लिम बच्चों को क्षमता से लबरेज़ किया जा सके. यह क्षमता से लबरेज़ मुस्लिम बच्चे अपना भविष्य खुद सर्च करेंगे.
आज आवश्यकता अंग्रेजी और आधुनिक शिक्षा और इसके लिए हजारों ऐसी उत्कृष्ट, सस्ते और क्वालिटी स्कूल खोलने होंगे. अगर मुस्लिम समाज के लोग सर सैय्यद को सही मायनों में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो इन स्कूलों को स्थापित करना होगा.
सर सय्यद डे पर भाषण देकर, मुआशरों का आनंद लेकर और डिनर खा हाथ पोछने से कुछ नहीं होगा. मैं तो कहता हूँ कि मुस्लिम समाज के 10-15 जिम्मेदार लोगों जैसे सेवानिवृत्त न्यायाधीश, पूर्व कुलपति, सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस, प्रोफेसर और बिज़नेसमैन आदि की कमिटी बनाकर एक फंड बनाया जाए ताकि मुस्लिम क्षेत्रों में अंग्रेजी मीडियम स्कूल खोले जाएं. यह कमिटी देश में और विदेशों में मनाए जाने वाले सर सैय्यद दिवस समिति के अधिकारियों से अपील करे कि सब लोग डिनर और मुशायरें न करा कर इस फंड में पैसा दें जिस पैसे का इस्तेमाल स्कूल खोलने में हो और मुस्लिम क्षेत्रों में शिक्षा पहुंचे.
इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए कुछ लोगों को आगे आना होगा. समाज का काम करने के लिए गालियां भी पड़ती है, इसलिए इन लोगों को इसके लिए तैयार होना होगा. यह काम बहुत अच्छा और बड़ा है, इसलिए जो लोग यह काम करने के लिए आगे आएं उन्हें आपने आपको समझाना होगा कि इस काम में अच्छी और बुरी दोनों बातें सुनने को मिलेगी. क्योंकि कुछ लोगों का स्वभाव ही सही लोगों और सही काम की बुराई करना है. इस कमिटी के लोगों को गाली-प्रूफ़ होना पड़ेगा, तब जा कर यह काम हो सकता है अन्यथा नहीं. अगर इस स्कूल निर्माण होने लगे तो मेरी नज़र में इससे अच्छा सर सैय्यद को कोई श्रद्धांजलि नहीं हो सकती.

Monday, October 15, 2012

मुझे भी उतना ही अधिकार है!



भारत के मुसलमानों में अब शिक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी हैं, बल्कि लड़कों की शिक्षा को लेकर घर में सभी लोग चिंतित भी रहने लगे हैं. लेकिन अभी भी जितनी कोशिशें लड़कियों की शिक्षा के लिए होनी चाहिए थी, वह नहीं हो सकी हैं. क्योंकि हम अभी तक यह नहीं समझ पाएं हैं कि लड़कियों की शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी लड़कों की.
हालांकि कुछ मायनों में तो लड़कियों की शिक्षा लड़कों की शिक्षा अधिक महत्व रखती है. लड़के की शिक्षा से एक घर रौशन होता है, लेकिन लड़की की शिक्षा से दो घरों के हालात सुधरते हैं. एक घर जहां वो बचपन से रहती है और दूसरा वो जहां शादी के बाद जाना होता है. इतना ही नहीं, लड़कियों की शिक्षा से समाज को बहुत लाभ होता है. हम जानते हैं कि माँ की गोद बच्चे का पहला स्कूल होता है, इसलिए माँ का पढ़ा-लिखा होना बहुत ज़रूरी है. और वैसे भी कोई समाज आधी आबादी को शिक्षा से दूर रखकर विकास का सपना नहीं देख सकता.

इस्लाम में शिक्षा के मामले में लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं है, पर हमारे समाज में लड़कियों की शिक्षा की चिंता कम देखने को मिलती है. अक्सर सुनने को मिल जाएगा कि बेटी को तो पराये घर जाना है, उसे शिक्षित करके क्या फायदा? उसे तो घर में चौका-बर्तन करना है तो पढ़ाई लिखाई की क्या ज़रूरत है? लोग ऐसा भी कहते मिल जाएंगे कि लड़की को अधिक पढ़ाने से शादी के लिए लड़के की तलाश मुश्किल हो जाती है. पर यहां सवाल उठता है कि समाज में मौजूदा कमियों का हवाला दे कर हम कब तक लड़कियों के साथ अन्याय करते रहेंगे? कब तक इस तरह लड़कियों को पढ़ाई से रोका जाता रहेगा?
सच्चर कमेटी के आंकड़ों बताते हैं कि 12 वीं श्रेणी में लड़कियों का लड़कों की तुलना में अच्छे परिणाम हैं. इसी रिपोर्ट के अनुसार उर्दू और अन्य मीडियम में लड़कियों का  परफॉर्मेंस लड़कों से बेहतर है. जब लड़कियों में लड़कों से अधिक सलाहियत नज़र आती है तो क्यों नहीं हम उनकी शिक्षा की ओर अपना ध्यान देते हैं?
मैं मानता हूँ कि माँ बाप के दिलों में लड़कियों की सुरक्षा को लेकर कुछ सवाल हैं और कुछ हद तक यह जायज़ भी है. लेकिन हर जगह तो सुरक्षा का सवाल नहीं है. शहरों और छोटे-बड़े मुहल्लों में अब तो शिक्षा के कुछ बेहतर व्यवस्था हो गई हैं, लेकिन फिर भी ऐसा क्या है कि हम अपनी बच्चियों को शिक्षण संस्थानों तक नहीं भेजते? इसका मतलब तो यही हुआ कि कहीं न कहीं हमारी सोच लड़कियों की शिक्षा में आड़े आ रही है. यदि ऐसा नहीं है तो क्यों आज भी हमारी आधी आबादी कही जाने वाली यह वर्ग शिक्षा से कोसों दूर है? और यह सब तब हो रहा जब इस्लाम में शिक्षा पर पूरा ज़ोर दिया गया है.
एक हदीस है जिसका अर्थ है कि “शिक्षा प्राप्त करना हर मुसलमान मर्द व औरत पर फर्ज़ है.” [Seeking knowledge is a duty of every Muslim, man or woman. (Al-Tirmidhi Hadith 218)]. एक और हदीस है जिसका अर्थ है कि “अगर किसी के यहाँ लड़की पैदा होती है और वह पालन-पोषण करता है और अच्छी शिक्षा देता है तो उस आदमी को नरक की आग से बचाया जाएगा.” [If a daughter is born to a person and he brings her up, gives her a good education and trains her in the arts of life, I shall myself stand between him and hell-fire. (Kanz al-Ummal, reported by Abdullah ibn Mas'ud)] दोनों हदीसों से पता चलता है कि लड़कियों की शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी लड़कों की.
इस्लामी इतिहास में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई गई. हज़रत ख़दीजा, जो अंतिम रसूल (सल्ल.) की पहली पत्नी थीं, उनका काम ही व्यापार करना था. हज़रत आइशा पैग़म्बर साहब की बहुत करीबी सलाहकार थीं. यह भी देखने को मिलता है कि महिलाओं को युद्ध में जाने की अनुमति थी. इस्लाम में औरत को राजनीतिक पदों पर चुने जाने का भी अधिकार था. उदाहरण के लिए देखें तो दूसरे खलीफा हज़रत उमर ने तो बाज़ार की निगरानी के लिए एक औरत को इस पद पर चुना था. हज़रत उमर के दौर में महिलाएं तो कानून-साज़ी में भाग लेती थीं. एक बार हज़रत उमर ने किसी कानून का प्रस्ताव रखा तो मस्जिद में एक महिला ने कहा उमर तुम यह नहीं कर सकते. हज़रत उमर ने उससे पूछा- क्यों? इस औरत ने सब के सामने अपना जवाब कुरान की रोशनी में दिया. हज़रत उमर खड़े हुए और कहा कि यह औरत सही कह रही है और उन्होंने अपना मसौदा वापस ले लिया. इस्लामिक इतिहास में महिलाओं ने काफी अहम भूमिका निभाई हैं.  यही नहीं, इमाम शाफ़ई, जिन्होंने अपने अलग इस्लामी स्कूल की शुरूआत की, उन्होंने कई शिक्षाएं नफ़ीसा बिन्ते अल हसन (824 AD) से प्राप्त की. शोहदा बिन्ते अबी नस्र (1178 A.D) अपने ज़माने की मशहूर स्कोलर थी, जो बगदाद की मस्जिद में लोगों से अक्सर अलग-अलग मुद्दों पर संबोधित किया करती थीं. इस्लामी स्कोलर हाफ़िज़ इब्ने असाकर (1175 A. D.) शोहदा बिन्ते अबी नस्र के छात्र थे.
इमाम बुखारी ने भी अपने जोड़ में महिला को बैठने की कुछ शर्तों पर अनुमति दी थी. इस्लामिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां महिलाओं ने शिक्षा के क्षेत्र में कई अहम क़दम उठाएं. ग़ाजी सलाहुद्दीन अय्यूबी (1193 A.D) की बहन ज़म्मरद और भतीजी उज़रा ने दो अलग अलग मदरसों को स्थापित किया. इसी तरह मोरक्को में फ़ातिमा बिन्ते मोहम्मद अल फहरी ने Al Karaouine University (859 AD) को स्थापित किया. यह जामिया इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड और मिस्र के अल-अजहर विश्वविद्यालय से भी काफी पुरानी है. Al-Karaouine University में बहुत बड़ी लाइब्रेरी बनाई, जो आज भी है. इस जामिया में अफ्रीकी देशों से छात्र काफी संख्या में लाभवंतित होने आते हैं.
भारत में रज़िया सुल्तान (1240 AD) ने दो मदरसों को बनाया- मोज्जिया और नसीरिया. सुल्तान मोहम्मद शाह तुग़लक (1351 AD) के दौर में दिल्ली में काफी मदरसों थे, जिनमें कई लड़कियों की शिक्षा के लिए भी थे. इन सबसे ज़ाहिर होता है कि पहले मुस्लिम समाज  महिलाओं की शिक्षा के बारे में कुछ हद तक चिंतित था. लेकिन समय के साथ-साथ महिलाएं चार-दिवारी में बंद होती चली गईं. ऐसा लगता है कि शिक्षा तो केवल लड़कों के लिए ही है और लड़कियों का दायरा केवल घर व चूल्हा-बर्तन है.
यह हमें कब समझ आएगा कि औरत और आदमी चक्र के दो पहियों की तरह हैं. एक भी कमजोर और खराब होने से साइकिल चरमरा जाएगी और गति धीमी होगी या एकदम से रुक जाएगी.
मैंने उपर जो महिलाओं के कुछ उदाहरण दिए हैं, वह अब इतिहास के पन्नों में दफ़न है. हमें उनसे सबक़ ज़रूर लेनी चाहिए. लेकिन कब तक हम इन उदाहरणों को समाज को बताते रहेंगे? क्यों नहीं आज हम नई उदाहरण पैदा करते? हालात यह है कि पहले तो हम लड़कियों को स्कूल भेजते ही नहीं और अगर भेजते भी हैं तो निचले स्तर के स्कूलों में भेजते हैं. यह कैसा अन्याय है कि लड़का तो अच्छा और अंग्रेजी मीडियम से पढ़ें और लड़की को हम ऐसे-वैसे स्कूल में प्रवेश कराएं? वह समाज कभी विकसित नहीं हो सकता जो महिलाओं को उनके जायज़ अधिकार नहीं देता. इस्लाम तो पढ़ाई में बराबर की हिस्सेदारी की बात करता है. लेकिन अफसोस की बात है कि  हम इनको अनदेखा कर सिर्फ अपने हित और संकीर्ण मानसिकता के कारण लड़कियों को अच्छी शिक्षा से दूर रख रहे हैं.
होना तो यह चाहिए था कि आज लड़कियां जीवन के हर क्षेत्र में अपना नाम कर रही होती. मुस्लिम समाज कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, छवि रजावत (जो एमबीए करने के बाद गांव के सरपंच बनी), जस्टिस बीवी फातिमा आदि कहाँ हैं?
समस्या तो यह है कि कम उम्र में लड़कियों की शादी हो जाती हैं, जिससे उनकी शिक्षा में बाधा आती है. इसलिए मुस्लिम समाज में यह सोच भी बनना चाहिए कि लड़कियों की शादी कम से कम 20 साल की उम्र से पहले नहीं करेंगे. यदि ऐसा होता है तो जो लड़कियां अपनी शिक्षा और कैरियर को लेकर सिरियस हैं, वो अपनी पढ़ाई सही से पूरी कर पाएंगी.
अब सवाल उठता है कि स्थिति को बेहतर करने के लिए क्या करना चाहिए? पहली कोशिश तो यह होना चाहिए कि जहां मुस्लिम अल्पसंख्यक के लोग रहते हैं वहां समाज के लोग खुद आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा देने के लिए मॉडर्न शैक्षणिक संस्थान खोलें. इससे समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता पैदा होगी. जब अच्छे छात्र यहां से निकलेंगे तो हर क्षेत्र में कम्पीटिशन का सामना कर सकते हैं. इन मॉडर्न शिक्षण संस्थानों में लड़कियों के लिए आरक्षण रखा जाए ताकि कम से कम 30 प्रतिशत लड़कियों का प्रवेश इन संस्थाओं में होना आवश्यक है. दूसरा यह कि सरकार से अपील की जाए कि कम से कम एक गर्ल्स सेंट्रल यूनिवर्सिटी हर राज्य में बने और हर जिले में कम से कम एक गर्ल्स कॉलेज हो. सरकार की ओर से लड़कियों के लिए हर स्तर पर वजीफा देने की योजना होनी चाहिए. जिससे कि मां-बाप को लड़कियों की शिक्षा पर खर्च ज़्यादा न करना पड़े और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हमारे समाज को लड़कियों की शिक्षा के बारे में बनी हुई सोच को बदलने की जरूरत है. दक्षिण भारतीय लोग लड़कियों की शिक्षा की ओर बहुत ध्यान दे रहे हैं, ज़रूरत उत्तर भारत में भी उनकी शिक्षा के लिए माहौल और रिसोर्स पैदा करने की है. उम्मीद है कि मुसलमानों के सियासी व मिल्ली रहनुमा इस ओर ज़रूर कुछ ध्यान देंगे.

Saturday, October 13, 2012

अशिक्षा, आतंकवाद, गरीबी और मुसलमानों की तरक्की का रास्ता


भारत के मुसलमान दुनिया की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी हैं. खुद भारत में यह सेकूलर ताने-बाने को मज़बूत बनाये रखने की एक अहम कड़ी है. इन्हें दुनिया में साम्राज्यवाद के खिलाफ़ एक बड़ी ताक़त माना जाता है. आज़ादी पाने के बाद घोर सांप्रदायिक माहौल में भी मुसलमानों ने सेकुलर भारत को चुना और अपने बाप-दादा की मिट्टी को अपना वतन बनाया.
हजारों मजदूर किसान व मज़हबी उलेमा ने शहादतें दी. देश की फिरकावाराना हम आहंगी इनके बिना अधूरी मानी जाती है. भारत में सभी कौमों के साथ मिलकर रहना पसंद करते हैं.
खून से लथपथ आजादी की सुबह के साथ हमारा मुल्क खुशहाली की तरफ बढ़ा और नए भारत के रहनुमाओं ने उजड़े देश की तरक्की के लिए मिक्स इकोनॉमी का रास्ता चुना. इस राह में कम से कम  खेतिहर किसान मजदूर  खुश थे. लेकिन राजीव गांधी के गुज़रने के बाद मनमोहन सिंह की आर्थिक पॉलिसी ने भारत को सुपर पावर बनने का सपना दिखाया. सपने देखने में कोई बुराई नहीं, लेकिन जिन सपनों में देश के अधिकतर ग़रीब मजदूर व अल्पसंख्यक के हितों का ध्यान न हो, कभी कभार यह सपना अपना नहीं लगता.
2011 के आते ही कांग्रेस के लीडर राज्य सभा सदस्य अर्जुन सेन गुप्ता की कमेटी, जिसे देश की असली ताक़त यानी ग़रीबी अमीरी की प्रतिशत का पता करना था, ने बताया कि देश के 73 करोड़ लोग आज भी 8-20 रूपए पर गुज़र बसर करते हैं. मैं सोचता हूं  कि यह 73 करोड़ लोग कौन हैं? हिन्दू हैं? मुसलमान हैं? सिख है? ईसाई हैं? दिल पर हाथ रखकर जान लीजिएगा. इनका मज़हब ग़रीबी है.
जिनका मज़हब अमीरी था, उनके हाथ में देश की पूंजी का सबसे बड़ा हिस्सा आया. अम्बानी जैसों ने घरों पर ही हजारों करोड़ खर्च कर दिए. तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत के 40 करोड़ लोगों को पूरी खुराक नहीं मिल पाती. एक दिन में 2 मजदूर महाजन के ज़ुल्म से मर जाते हैं. हर 1 घंटे में बेटी-बहन का बलात्कार होता है.
अमीरों का मज़हब तो विलासिता है लेकिन इन बेबसों को किस मज़हब से जोड़ा जाये. मज्लूमी, ग़रीबी, मुफलसी के अलावा इनका मज़हब कुछ नहीं. जानने की कोशिश करनी चाहिए कि इस मुल्क में 73 करोड़ लोगों या ‘मुसलमानों’ की समस्याएं क्या हैं. रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोज़गार और बराबरी का दर्जा.  सभी को समान अवसर चाहिए. सस्ती शिक्षा, रोज़गार या इसके लिए  सरकार कम दरों पर कम से कम क़र्ज़ दे.
चलिए आज खास तौर पर मुसलमानों की बात करते हैं. यूं तो मुसलमानों की कयादत करने के लिए हर पार्टी में सेल है. उनके नेता हैं. भारत में तकरीबन सैकड़ों फलाह बहबूद की बात करने वाली अंजुमने हैं. हर तरफ आप देखे तो टोपियां दाढ़ी में सजे हज़रात कौम की लडाई के लिए हर वक़्त तैयार रहते दिखते हैं. बहुत संघर्ष के मैदान में लड़ते भी हैं. लेकिन ज़मीनी लीडरशिप और काम न होने से बुनियादी मसले दब जाते हैं या रमजान की सियासी इफ्तार की पार्टियों तक तमाम हो जाते हैं.
यह इसलिए भी है कि मुसलमानों  का शिक्षित तबका सियासत को लानत भेजकर बड़ी गंदी चीज़ है दूर हो गया. जिससे मुसलमानों का बड़ा नुक्सान हुआ और खासकर वामपंथी विचार के मुसलमान राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रिय मुद्दों में व्यस्त हो गए. राजनीति में दौलत का खेल शुरू हुआ उसने और बेडा गरक किया. हमारे शिक्षित राजनीतिक लीडरों को वक़्त ही नहीं मिला कि ज़मीन पर जाते. उन्हें लगा की अगर उन्होंने मुसलमानों की बेहतरी की बात की तो कही ‘आईडेंटिटी राजनीति’ करने के आरोप न लगे, इसी का नतीजा हुआ  की राजनीति में बिल्डर माफिया, सरगना और अपराधियों के लिए रास्ते खुल गए. वो मुसलमानों को क्या देते या क्या दिया हम सबको मालूम है. लेकिन इमानदारी से हम प्रोग्रेसिव मुसलमानों की बदहाली की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए कि जिस तरह का हस्तक्षेप हमें करना था हम नहीं कर पाए. लेकिन अभी भी कोई देर नहीं हुई है.
मुसलमानों की समस्याए:
यूं तो मुसलमानों की समस्याएं तो आम नागरिकों की तरह एक जैसी हैं, लेकिन जिस तरीके से तालीम और तरक्की के मंसूबे को लेकर मुहीम चलानी चाहिए थी, वो नहीं हुई. जस्टिस सच्चर ने जिन समस्यायों को रेखांकित किया वो तो और भी हैरत अंगेज़ है.  उन्होंने बताया कि आर्थिक और सामाजिक रूप  से  पिछड़े मुसलमानों की हालत दलितों से बदतर है.  हुआ यह कि किसी कोने में राजनीतिक पार्टियों ने अल्पसंख्यक के नाम पर दफ्तर  तो खोल दिए लेकिन मुसलमान नौजवानों को बुनियादी सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी साझा करने जैसे बुनियादी काम में नहीं लगाया गया.
नतीजा यह हुआ कि मज़लूम मुसलमानों के नाम का फंड फाइलों में ही खत्म हो गया और राजनीतिक पार्टियों के अल्पसंख्यक सैल के कार्यकर्ता चाय की चुस्कियां लेते रहे.  यदि आरटीआई के ज़रिये फंड की अवेलिबिलिटी पता की गई होती और ज़रूरत मंदों को उसके बारे में जानकारी दी गई होती तो शायद हालात कुछ और हो सकते थे.
राजनीतिक पार्टियों को राज्य / ज़ोन / जिला / ब्लोक / गाँव की स्तर पर कार्यकर्ताओं की मुस्तैद टीम बनानी चाहिए थी ताकि वो तमाम सरकारी योजनाओं का फायदा जरूरतमंदों तक पहुंचा सकते.
जो फॉर्म नहीं भर सकते थे उनके लिए कमेटी में फार्म भरने के एक्सपर्ट होते. ब्लॉक और जिला स्तर पर हजारों फॉर्म करवाए जाते.  इसके बाद भी अगर उन्हें इसका फायदा न पहुंचता तो ज़मीन पर अवाम को संघर्ष में उतार दिया जाता. क्योंकि लाल-फीताशाही कौम किसी की भी नहीं है. जाहे वो दलित हो या मुस्लमान.  जब तक उन्हें घूस न मिले किसी स्कीम के बारे में ये बताते भी नहीं.
विधायक और लोकसभा सांसद के कुछ एक चमचों को इसका फायदा पहुंच जाता है. लेकिन ग़रीब बेरोजगार मुफलिसों को तो खुद पहाड़ खोदना है. इसलिए किसी आसमानी मदद का इंतज़ार न करते हुए कुछ क़दम हम सब उठाना होगा.
हुकूमत की गाँव से लेकर शहर  तक की स्कीमें, मसलन आंगनवाडी में गर्भवती महिलाओं और उसके बच्चे के लिए दी जाने वाली फ्री खुराक जिससे बच्चा सेहतमंद पैदा हो. नरेगा के तहत साल में 150 दिन का काम, बुजुर्गो और बेवाओं के लिए पेंशन, गांव के लिए सोलर बिजली, एसएचजी के तहत मुर्गा और मछली पलने की स्कीम, 1 से 12 तक के बच्चों की किताब के लिए 700 रूपए तक के वजीफे और लड़कियों की खुदमुख्तारी के लिए सिलाई मशीन वगैरह का दिया जाना, स्कूल कालेज और हॉस्टल खोलने के लिए केंद्र सरकार की मौलाना आज़ाद फाउंडेशन की स्कीम से मदद.
ऐसी बहुत सी योजनाएं के बारे में जानकारी केंद्र सरकार के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने प्रकाशित की हैजिसमे मुख्तलिफ फॉर्म भी दस्तयाब है.  अगर पहली किस्त में सिर्फ सरकार के  ‘मल्टी सेक्टरल डेवलपमेंट प्रोग्राम’  के तहत देश के 90 जिले को ही तरजीह देकर युद्ध स्तर पर शुरू किया गया तो मुसलमानों को उनके बुनियादी हुकूक के बारे में पता चलेगा और उनमें तालीम और सियासी बेदारी आयेगी.
कौमी बेदारी आने के बाद वो किसी बिल्डर माफिया के लिए अपने वोट को जाया नहीं करेंगे और उनमे सेकूलर लोकतान्त्रिक सरकारों के प्रति विश्वास और मज़बूत होगा.
राज्य प्रायोजित आतंकवाद:
बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद देश में पहली बार बीजेपी  सत्ता में आई. सत्ता में आते ही इज़राइल और अमरीका की नीतियों को भारत में लागू किया गया. दुनिया में अमरीका के चेले बिन लादेन के नाम पर आतंकवाद के खिलाफ़ लडाई को इंडिया में भी इम्पोर्ट किया गया.
नरसिम्हा और अटल सरकार ने इजराइली ख़ुफ़िया एजेंसियों को यहां घुसने की इजाज़त दी और बाबरी मस्जिद शहादत के बाद  सेकूलर ताकतें जैसे ही कमज़ोर पड़ गईं.  बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी को अन्दर  से बीजेपी का समर्थन हासिल था और यह लडाई  बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए सांप्रदायिक तरीके से लड़ी गई.  एक बार फिर बीजेपी सत्ता में आई और ऐसा माहौल देश में बनाया गया कि हर मुसलमान आतकंवादी लगे.
सैकड़ों नौजवान पकडे जाने लगे. कोई  श्री आडवाणी को तो कोई  श्री अटल बिहारी वाजपेयी की जान लेने के लिए घूम रहा था. इसके बाद गुजरात नरसंहार हुआ और राज्य प्रायोजित सांप्रदायिक हिंसा में सैकड़ों बेगुनाह मारे गए. मोदी सरकार ने अपनी ही पुलिस से गुजरात दंगों के बाद अनगिनत मुसलमान नौजवानों के फर्जी एनकाउंटर करवाए.  पढ़ने के लिए शहर आए नौजवान तालीम छोड़ अपने घरों को वापस जाने लगे.
कई साल बाद अनगिनत  मामलों में  अदालतों ने यह पाया है एटीएस और स्पेशल सैल के नाम से बनी पुलिस टीमों ने र्मिक भेदभाव और सांप्रदायिक नज़रिए से मुसलमान नौजवानों को फंसाया और क़त्ल किया या कत्ल करने की कोशिश की.
मदरसों की ब्रांडिंग आतंक की फैक्ट्रियों के रूप में की गई. पत्रकार पुलिस के स्टेनोग्राफरों की तरह काम करने लगे. नतीजा यह हुआ कि हर दाढ़ी वाले शख्स को अपने अंदर एक आतंकी नज़र आने लगा.
आज मुसलमान इस मुद्दे पर खुलकर बात तक करना नहीं चाहते. वो  सिर्फ सेकुलर हुकूमत के सामने इन्साफ की गुहार लगा रहे है .  बटला हाउस एनकाउंटर मामले में देश के  मुसलमानों ने सिर्फ न्यायिक जांच की मांग की थी लेकिन दिल्ली और केंद्र की कांग्रेस हुकूमत ने आजतक इसे नहीं माना. मुसलमान नौजवानों में ‘सेन्स आफ फियर’ को ख़त्म किए और ‘सेन्स आफ बिलांगिंग’पैदा किए बिना उन्हें देश की तरक्की की कोशिशों में शामिल नहीं किया जा सकता.
झूठे मामलों में  फंसाए गए नौजवानों के लिए कानूनी मदद और पीड़ित परिवार का साथ देना  क्या समाज और  सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? अधिकतर राज्यों में इन नौजवानों को न्यायालय में अपना केस तक लड़ने नहीं दिया जाता.  लखनऊ का मामला इसका ताजा उदाहरण है.
इस समस्या को खत्म करने के लिए वामपंथी इंसाफपसंद  वकीलों को भी अपना योगदान देना होगा.  साथ ही जो मुल्क के सेकुलर ताने-बाने को तोड़कर माहौल खराब करने की कोशिश करने वाली आंतरिक और बाहरी ताकतों के खिलाफ़ एकजुट होकर लड़े बिना देश को तरक्की के रास्ते पर नहीं ले जाया जा सकता. वक्त की ज़रूरत उन ताकतों की पहचान करने की भी है जो हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत पैदा करती हैं और अपने राजनीतिक और आर्थिक फायदे के लिए उनकी भावनाओं का इस्तेमाल करती हैं. इन ताकतों के खात्मे के बिना एक बेहतर भारत का सपना नहीं देखा जा सकता. और इस सच को भी नहीं नकारा जा सकता कि मुसलमानों की तरक्की के बिना देश की तरक्की मुमकिन नहीं है.