Showing posts with label वामपंथ. Show all posts
Showing posts with label वामपंथ. Show all posts

Monday, December 23, 2013

बड़े-बड़े एनजीओ संचालकों का संगठन ‘आप’


दिल्ली के विधानसभा चुनाव में ‘आप’ की सफलता ने सभी को चैंका दिया है. लोग हतप्रभ हैं कि आखिर ये क्या हो गया. अब लोग लाल बुझक्कड़ की तरह ‘आप’ की जीत का विश्लेषण करने में लगे हैं. यहां तक कि वामपंथ की हुंकार भरने वाले कुछ लोगों को ये इंकलाब की ओर ले जाने वाली पार्टी लग रही है और वे अपनी वर्गीय लाइन और वर्ग चरित्र की राजनीति को भूल गए हैं.

ये लोग आप की जीत पर उसकी शान में कसीदे पढ़ रहे हैं. जीत का ये गुबार इतना ज्यादा है कि सही तस्वीर लोगों को दिखाई नहीं दे रही है. वास्तव में आप की दिल्ली विधानसभा की जीत भारतीय राजनीति में एनजीओ के बढ़ते हस्तक्षेप का परिचायक है. यह पार्टी न तो किसी विचारधारा पर आधारित है और न ही इसका कोई आर्थिक और सामाजिक दर्शन लोगों के सामने आया है.

आप की जीत में उच्च मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग के असंतुष्ट समूह की बड़ी भूमिका है. यह वह वर्ग है, जिसको उदारीकरण के दौर में सबसे आर्थिक लाभ हुआ है और सबसे अधिक सुविधाएं मिली हैं. जब तक इसे लगातार सुविधाएं मिल रहीं थीं तब तक इसमें कोई असंतोष नहीं था, लेकिन जैसे ही इसकी सुविधाओं में कटौती हुई जैसे गैस के सिलेंडरों की संख्या निर्धारित करना, डीजल पेट्रोल के दाम बढ़ना, सब्जियों विशेषकर प्याज के दाम आसमान पहुंचना, इसमें असंतोष फैलने लगा.

इस असंतोष को स्वर दिल्ली में आप ने दिया. भाजपा तो खैर उन्हीं आर्थिक नीतियों पर चलेगी, जिस पर कांग्रेस चल रही है, वामपंथ भी इस मुद्दे पर ठोस पहलकदमी लेने में नाकाम रहा. इस राजनीतिक रिक्तता को भरा है आप ने. आप की जीत का दूसरा बड़ा कारण उसका बेहतर चुनाव प्रबंधन है. कई ऐसे कामों को उसने किया, जिसे आज राजनीतिक पार्टियां नहीं कर रही हैं.

लेकिन आप खुद में क्या है. बड़े-बड़े एनजीओ संचालकों का संगठन. ये एनजीओ घनघोर मुनाफाखोर पूंजीवाद का मानवीय चेहरा हैं, जहां पूंजीपति अपने बेतहाशा मुनाफाखोरी में से एक छोटा सा हिस्सा परोपकार के कामों में लगाकर वाहवाही लूटता है. वह इस परोपकार के काम को करने के लिए एनजीओ को जन्म देता है.

एनजीओ का काम सरकार को बेकार साबित कर अपने दानदाता की ‘जय जयकार...’ करवाना होता है. इसके साथ ही असमानता के खिलाफ होने वाली लड़ाई को भटकाने का काम भी करते हैं. इन एनजीओ के कारण ही आज समाज में राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता खत्म हो गए हैं.

वे युवा जो राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में परिवर्तन के लिए काम करने की इच्छा रखते थे, एनजीओ के साथ जुड़ रहे हैं और इस भ्रम में हैं कि हम समाज में परिवर्तन तो ला नहीं सकते, तो क्यों न समाज के कमजोर वर्ग का ही भला कर दें. यह भी कि परिवर्तन जैसा कष्टसाध्य काम करने से बेहतर है कि एक सरल रास्ता अपनाया जाए.

-प्रेम पुनेठा

Saturday, October 13, 2012

अशिक्षा, आतंकवाद, गरीबी और मुसलमानों की तरक्की का रास्ता


भारत के मुसलमान दुनिया की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी हैं. खुद भारत में यह सेकूलर ताने-बाने को मज़बूत बनाये रखने की एक अहम कड़ी है. इन्हें दुनिया में साम्राज्यवाद के खिलाफ़ एक बड़ी ताक़त माना जाता है. आज़ादी पाने के बाद घोर सांप्रदायिक माहौल में भी मुसलमानों ने सेकुलर भारत को चुना और अपने बाप-दादा की मिट्टी को अपना वतन बनाया.
हजारों मजदूर किसान व मज़हबी उलेमा ने शहादतें दी. देश की फिरकावाराना हम आहंगी इनके बिना अधूरी मानी जाती है. भारत में सभी कौमों के साथ मिलकर रहना पसंद करते हैं.
खून से लथपथ आजादी की सुबह के साथ हमारा मुल्क खुशहाली की तरफ बढ़ा और नए भारत के रहनुमाओं ने उजड़े देश की तरक्की के लिए मिक्स इकोनॉमी का रास्ता चुना. इस राह में कम से कम  खेतिहर किसान मजदूर  खुश थे. लेकिन राजीव गांधी के गुज़रने के बाद मनमोहन सिंह की आर्थिक पॉलिसी ने भारत को सुपर पावर बनने का सपना दिखाया. सपने देखने में कोई बुराई नहीं, लेकिन जिन सपनों में देश के अधिकतर ग़रीब मजदूर व अल्पसंख्यक के हितों का ध्यान न हो, कभी कभार यह सपना अपना नहीं लगता.
2011 के आते ही कांग्रेस के लीडर राज्य सभा सदस्य अर्जुन सेन गुप्ता की कमेटी, जिसे देश की असली ताक़त यानी ग़रीबी अमीरी की प्रतिशत का पता करना था, ने बताया कि देश के 73 करोड़ लोग आज भी 8-20 रूपए पर गुज़र बसर करते हैं. मैं सोचता हूं  कि यह 73 करोड़ लोग कौन हैं? हिन्दू हैं? मुसलमान हैं? सिख है? ईसाई हैं? दिल पर हाथ रखकर जान लीजिएगा. इनका मज़हब ग़रीबी है.
जिनका मज़हब अमीरी था, उनके हाथ में देश की पूंजी का सबसे बड़ा हिस्सा आया. अम्बानी जैसों ने घरों पर ही हजारों करोड़ खर्च कर दिए. तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत के 40 करोड़ लोगों को पूरी खुराक नहीं मिल पाती. एक दिन में 2 मजदूर महाजन के ज़ुल्म से मर जाते हैं. हर 1 घंटे में बेटी-बहन का बलात्कार होता है.
अमीरों का मज़हब तो विलासिता है लेकिन इन बेबसों को किस मज़हब से जोड़ा जाये. मज्लूमी, ग़रीबी, मुफलसी के अलावा इनका मज़हब कुछ नहीं. जानने की कोशिश करनी चाहिए कि इस मुल्क में 73 करोड़ लोगों या ‘मुसलमानों’ की समस्याएं क्या हैं. रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोज़गार और बराबरी का दर्जा.  सभी को समान अवसर चाहिए. सस्ती शिक्षा, रोज़गार या इसके लिए  सरकार कम दरों पर कम से कम क़र्ज़ दे.
चलिए आज खास तौर पर मुसलमानों की बात करते हैं. यूं तो मुसलमानों की कयादत करने के लिए हर पार्टी में सेल है. उनके नेता हैं. भारत में तकरीबन सैकड़ों फलाह बहबूद की बात करने वाली अंजुमने हैं. हर तरफ आप देखे तो टोपियां दाढ़ी में सजे हज़रात कौम की लडाई के लिए हर वक़्त तैयार रहते दिखते हैं. बहुत संघर्ष के मैदान में लड़ते भी हैं. लेकिन ज़मीनी लीडरशिप और काम न होने से बुनियादी मसले दब जाते हैं या रमजान की सियासी इफ्तार की पार्टियों तक तमाम हो जाते हैं.
यह इसलिए भी है कि मुसलमानों  का शिक्षित तबका सियासत को लानत भेजकर बड़ी गंदी चीज़ है दूर हो गया. जिससे मुसलमानों का बड़ा नुक्सान हुआ और खासकर वामपंथी विचार के मुसलमान राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रिय मुद्दों में व्यस्त हो गए. राजनीति में दौलत का खेल शुरू हुआ उसने और बेडा गरक किया. हमारे शिक्षित राजनीतिक लीडरों को वक़्त ही नहीं मिला कि ज़मीन पर जाते. उन्हें लगा की अगर उन्होंने मुसलमानों की बेहतरी की बात की तो कही ‘आईडेंटिटी राजनीति’ करने के आरोप न लगे, इसी का नतीजा हुआ  की राजनीति में बिल्डर माफिया, सरगना और अपराधियों के लिए रास्ते खुल गए. वो मुसलमानों को क्या देते या क्या दिया हम सबको मालूम है. लेकिन इमानदारी से हम प्रोग्रेसिव मुसलमानों की बदहाली की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए कि जिस तरह का हस्तक्षेप हमें करना था हम नहीं कर पाए. लेकिन अभी भी कोई देर नहीं हुई है.
मुसलमानों की समस्याए:
यूं तो मुसलमानों की समस्याएं तो आम नागरिकों की तरह एक जैसी हैं, लेकिन जिस तरीके से तालीम और तरक्की के मंसूबे को लेकर मुहीम चलानी चाहिए थी, वो नहीं हुई. जस्टिस सच्चर ने जिन समस्यायों को रेखांकित किया वो तो और भी हैरत अंगेज़ है.  उन्होंने बताया कि आर्थिक और सामाजिक रूप  से  पिछड़े मुसलमानों की हालत दलितों से बदतर है.  हुआ यह कि किसी कोने में राजनीतिक पार्टियों ने अल्पसंख्यक के नाम पर दफ्तर  तो खोल दिए लेकिन मुसलमान नौजवानों को बुनियादी सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी साझा करने जैसे बुनियादी काम में नहीं लगाया गया.
नतीजा यह हुआ कि मज़लूम मुसलमानों के नाम का फंड फाइलों में ही खत्म हो गया और राजनीतिक पार्टियों के अल्पसंख्यक सैल के कार्यकर्ता चाय की चुस्कियां लेते रहे.  यदि आरटीआई के ज़रिये फंड की अवेलिबिलिटी पता की गई होती और ज़रूरत मंदों को उसके बारे में जानकारी दी गई होती तो शायद हालात कुछ और हो सकते थे.
राजनीतिक पार्टियों को राज्य / ज़ोन / जिला / ब्लोक / गाँव की स्तर पर कार्यकर्ताओं की मुस्तैद टीम बनानी चाहिए थी ताकि वो तमाम सरकारी योजनाओं का फायदा जरूरतमंदों तक पहुंचा सकते.
जो फॉर्म नहीं भर सकते थे उनके लिए कमेटी में फार्म भरने के एक्सपर्ट होते. ब्लॉक और जिला स्तर पर हजारों फॉर्म करवाए जाते.  इसके बाद भी अगर उन्हें इसका फायदा न पहुंचता तो ज़मीन पर अवाम को संघर्ष में उतार दिया जाता. क्योंकि लाल-फीताशाही कौम किसी की भी नहीं है. जाहे वो दलित हो या मुस्लमान.  जब तक उन्हें घूस न मिले किसी स्कीम के बारे में ये बताते भी नहीं.
विधायक और लोकसभा सांसद के कुछ एक चमचों को इसका फायदा पहुंच जाता है. लेकिन ग़रीब बेरोजगार मुफलिसों को तो खुद पहाड़ खोदना है. इसलिए किसी आसमानी मदद का इंतज़ार न करते हुए कुछ क़दम हम सब उठाना होगा.
हुकूमत की गाँव से लेकर शहर  तक की स्कीमें, मसलन आंगनवाडी में गर्भवती महिलाओं और उसके बच्चे के लिए दी जाने वाली फ्री खुराक जिससे बच्चा सेहतमंद पैदा हो. नरेगा के तहत साल में 150 दिन का काम, बुजुर्गो और बेवाओं के लिए पेंशन, गांव के लिए सोलर बिजली, एसएचजी के तहत मुर्गा और मछली पलने की स्कीम, 1 से 12 तक के बच्चों की किताब के लिए 700 रूपए तक के वजीफे और लड़कियों की खुदमुख्तारी के लिए सिलाई मशीन वगैरह का दिया जाना, स्कूल कालेज और हॉस्टल खोलने के लिए केंद्र सरकार की मौलाना आज़ाद फाउंडेशन की स्कीम से मदद.
ऐसी बहुत सी योजनाएं के बारे में जानकारी केंद्र सरकार के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने प्रकाशित की हैजिसमे मुख्तलिफ फॉर्म भी दस्तयाब है.  अगर पहली किस्त में सिर्फ सरकार के  ‘मल्टी सेक्टरल डेवलपमेंट प्रोग्राम’  के तहत देश के 90 जिले को ही तरजीह देकर युद्ध स्तर पर शुरू किया गया तो मुसलमानों को उनके बुनियादी हुकूक के बारे में पता चलेगा और उनमें तालीम और सियासी बेदारी आयेगी.
कौमी बेदारी आने के बाद वो किसी बिल्डर माफिया के लिए अपने वोट को जाया नहीं करेंगे और उनमे सेकूलर लोकतान्त्रिक सरकारों के प्रति विश्वास और मज़बूत होगा.
राज्य प्रायोजित आतंकवाद:
बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद देश में पहली बार बीजेपी  सत्ता में आई. सत्ता में आते ही इज़राइल और अमरीका की नीतियों को भारत में लागू किया गया. दुनिया में अमरीका के चेले बिन लादेन के नाम पर आतंकवाद के खिलाफ़ लडाई को इंडिया में भी इम्पोर्ट किया गया.
नरसिम्हा और अटल सरकार ने इजराइली ख़ुफ़िया एजेंसियों को यहां घुसने की इजाज़त दी और बाबरी मस्जिद शहादत के बाद  सेकूलर ताकतें जैसे ही कमज़ोर पड़ गईं.  बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी को अन्दर  से बीजेपी का समर्थन हासिल था और यह लडाई  बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए सांप्रदायिक तरीके से लड़ी गई.  एक बार फिर बीजेपी सत्ता में आई और ऐसा माहौल देश में बनाया गया कि हर मुसलमान आतकंवादी लगे.
सैकड़ों नौजवान पकडे जाने लगे. कोई  श्री आडवाणी को तो कोई  श्री अटल बिहारी वाजपेयी की जान लेने के लिए घूम रहा था. इसके बाद गुजरात नरसंहार हुआ और राज्य प्रायोजित सांप्रदायिक हिंसा में सैकड़ों बेगुनाह मारे गए. मोदी सरकार ने अपनी ही पुलिस से गुजरात दंगों के बाद अनगिनत मुसलमान नौजवानों के फर्जी एनकाउंटर करवाए.  पढ़ने के लिए शहर आए नौजवान तालीम छोड़ अपने घरों को वापस जाने लगे.
कई साल बाद अनगिनत  मामलों में  अदालतों ने यह पाया है एटीएस और स्पेशल सैल के नाम से बनी पुलिस टीमों ने र्मिक भेदभाव और सांप्रदायिक नज़रिए से मुसलमान नौजवानों को फंसाया और क़त्ल किया या कत्ल करने की कोशिश की.
मदरसों की ब्रांडिंग आतंक की फैक्ट्रियों के रूप में की गई. पत्रकार पुलिस के स्टेनोग्राफरों की तरह काम करने लगे. नतीजा यह हुआ कि हर दाढ़ी वाले शख्स को अपने अंदर एक आतंकी नज़र आने लगा.
आज मुसलमान इस मुद्दे पर खुलकर बात तक करना नहीं चाहते. वो  सिर्फ सेकुलर हुकूमत के सामने इन्साफ की गुहार लगा रहे है .  बटला हाउस एनकाउंटर मामले में देश के  मुसलमानों ने सिर्फ न्यायिक जांच की मांग की थी लेकिन दिल्ली और केंद्र की कांग्रेस हुकूमत ने आजतक इसे नहीं माना. मुसलमान नौजवानों में ‘सेन्स आफ फियर’ को ख़त्म किए और ‘सेन्स आफ बिलांगिंग’पैदा किए बिना उन्हें देश की तरक्की की कोशिशों में शामिल नहीं किया जा सकता.
झूठे मामलों में  फंसाए गए नौजवानों के लिए कानूनी मदद और पीड़ित परिवार का साथ देना  क्या समाज और  सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? अधिकतर राज्यों में इन नौजवानों को न्यायालय में अपना केस तक लड़ने नहीं दिया जाता.  लखनऊ का मामला इसका ताजा उदाहरण है.
इस समस्या को खत्म करने के लिए वामपंथी इंसाफपसंद  वकीलों को भी अपना योगदान देना होगा.  साथ ही जो मुल्क के सेकुलर ताने-बाने को तोड़कर माहौल खराब करने की कोशिश करने वाली आंतरिक और बाहरी ताकतों के खिलाफ़ एकजुट होकर लड़े बिना देश को तरक्की के रास्ते पर नहीं ले जाया जा सकता. वक्त की ज़रूरत उन ताकतों की पहचान करने की भी है जो हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत पैदा करती हैं और अपने राजनीतिक और आर्थिक फायदे के लिए उनकी भावनाओं का इस्तेमाल करती हैं. इन ताकतों के खात्मे के बिना एक बेहतर भारत का सपना नहीं देखा जा सकता. और इस सच को भी नहीं नकारा जा सकता कि मुसलमानों की तरक्की के बिना देश की तरक्की मुमकिन नहीं है.

नक्सलवाद या राजनीतिक आतंकवाद !



हिन्दुस्तान में राजनीति राष्ट्र की सेवा और विकास का हेतु होने के बजाय लोकतांत्रिक तानाशाही का जरिया मात्र रही है। यह तानाशाही काफी हद तक देश को घुन की तरह चाट चुकी है फिर भी लोकतंत्र में आस्था का डंका पीटने वाले बेशर्मो को इस बात का अंदाजा नहीं है कि उनके पैरों तले जमीन कब की खिसक चुकी है। देश के किसी भी हिस्से में देखिये ये राजनीतिक आतंकवाद फन काढ़े विष वमन कर रहा है। कमोवेश हर जगह के हालात एक जैसे हैं अंतर सिर्फ इतना है कि कुछ जगहों पर इसके विरोध में लोगों ने हथियार तक उठा लिए हैं और कुछ जगहों पर संगठन की कमी के कारण अभी सिर्फ दिलों में बारूद इकट्ठा हो रहा है। गौरतलब है कि जो तस्वीर उभर रही है वह बहुत ही भयानक है और किसी भी समय हकीकत की जमीन पर उतर सकती है। राजनीतिक और प्रशासनिक पर्यवेक्षक शासन और सत्ता के सामने सिर्फ वही तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं जो वह देखना चाहती है। वैसे भी ये इतने प्रैक्टिकल होते हैं कि इनका ध्यान सिर्फ अपने वेतन, भत्ते और हनक बनाने पर ही केन्द्रित रहता है। राजनेताओं द्वारा जिस तरह क़ानून और व्यवस्था को बंधक बनाने की परिपाटी और विरोधियों का दमन करने का चलन अपना लिया गया है वह इस लोकतांत्रिक तानाशाही का निकृष्टतम रूप है। राजनेताओं की इसी राजनीति की प्रतिक्रिया स्वरुप जन्मे हिंसक विरोध को नक्सलवाद की संज्ञा दी जा रही है। नक्सलवाद जाने-अनजाने देशद्रोह तक की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, और जिन स्थानों पर वे पूरी तरह से नक्सलियों के रूप में चिन्हित कर दिए गए हैं वहां उनका राजनीतिक इस्तेमाल भी धड़ल्ले से हो रहा है। यानी प्रतिक्रिया स्वरुप की जाने वाली हिंसा को अब राजनीतिक हथियार बनाकर नासूर में तब्दील कर दिया गया है। स्पष्ट है कि इन नक्सलियों के हालात अब पाकिस्तान द्वारा पोषित आतकवादियों के समकक्ष है जिनके पास पुनर्वास का कोई रास्ता नहीं है। जग-जाहिर है कि इंसान जब हथियार उठता है और उसके लिए पीछे लौटने के दरवाजे बंद हो जाते हैं तो वह जेल में मरने के बजाय आज़ाद जिन्दगी जीते हुए एन्काउन्टर होने की सबसे बड़ी और अदम्य इच्छा पाल लेता है।
नक्सलवाद की जड़ों और उनके प्रभावों पर केन्द्रित ना रहते हुए मेरा मकसद राजनीतिक आतंकवाद से पनप रहे आक्रोश और बेहद चिंताजनक विचारधारा की तरफ ध्यान आकृष्ट करना है। राजनीति अब राज्य और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी तरह से भुलाकर आम आदमी और स्थानीय क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व कायम करने का साधन बन गई है प्रशासनिक कार्यों में बेढंगे और निहायत घटिया स्तर पर हस्तक्षेप करना राजनेताओं का प्रमुख उद्देश्य बना हुआ है। चुनावों के बाद सबसे पहले उन लोगों की लिस्ट बनती है जिन्होंने चुनाव में विरोध किया हो, और उनके दमन की योजनायें तैयार की जाती है, (बहुतेरे नेता इसे बाकायदा नाकाबंदी की संज्ञा देते है) उसके बाद बारी आती है अपने लोगों (जाहिर सी बात है इनमे कोई शरीफ आदमी नहीं होता) को कमाई करवाने और उनका रोब-दाब बढ़ाने की, सो स्थानीय प्रशासन से बाकायदा उनकी पहचान कराई जाती है कि ये आज से आपके नए दामाद हैं। और फिर बारी आती है सगे-सम्बन्धियों और आर्थिक हितैषियों की जिन्हें नाली, खडंजे, सड़के और जितने भी सरकारी निर्माण के ठेके पट्टे (यहाँ तक की बीयर और शराब की दुकानों के लाइसेंस तक) उन्हें सौंपने की। जिन लोगों की तनिक भी दिलचस्पी इन चीजों में होगी उन्होंने अक्सर क्षेत्र के माननीयों को अपने हाथों से सार्वजनिक उपक्रम (शिक्षा, चिकित्सा, खाद्य, निर्माण एवं आपदा प्रबंधन विभाग आदि) के कार्य बांटते देखा होगा। बात सिर्फ यहीं तक सीमित होती तो भी स्थिति विस्फोटक न होती। अपराधियों को संरक्षण देकर जिस तरह का असुरक्षित वातावरण पैदा किया जा रहा है वह लोकतंत्र से स्वास्थ्य के लिए बिलकुल भी लाभदायक नहीं है। दमन और विद्वेष की नीव पर खडी सरकारें हर घर में नक्सली पैदा करने की कोशिश करती नजर आ रही हैं। इन राजनेताओं को इतना भी समझ में नहीं आता है कि ये वास्तव में उस पद के हकदार भी नहीं है जिस पर बैठकर ये इतराते हैं और तानाशाहों जैसी भोंडी हरकतें करते हैं। कुछेक नेताओ को छोड़कर सारे राजनेताओं की हालत ये है कि उन्हें विधायक या संसद इसलिए बनने का मौका मिला क्योंकि मतदाता मतदान करने ही नहीं आया। महज २० से २५ प्रतिशत वोटों को पाकर राजनेता बन गए इन राजनीतिज्ञों को कमाई और राजनीतिक ताकत को छोड़कर राजनेता के किसी फ़र्ज़ का ककहरा तक नहीं आता है। शिक्षित युवाओं और सभ्य हिन्दुस्तानियों के दिल पर क्या गुजरती होगी जब उनके द्वारा चुने गए नेता भारत की जनता और भारत माता में अपनी निष्ठा की बात न कहकर व्यक्ति विशेष में अपनी निष्ठा का ढोल पीटता है? शायद ये बात आज कोई राजनेता नहीं सोचता; हिन्दुस्तान की अधिकाँश जनता भी शायद इस छोटी सी बात की गंभीरता को नहीं समझ पाती और हर बार छली जाती है। लेकिन जिस तरह शिक्षा और संचार के माध्यमों का विकास हो रहा है आज इस देश की जनसँख्या का एक बहुत बड़ा युवा तबका राजनीति की दशा और दिशा पर निगाह रखता है और हर रोज उसका असंतोष बढ़ता जाता है, मैं इसी असंतोष को नक्सलवाद के बीज के रूप में देखता हूँ जो आगे चलकर बहुत ही विकराल रूप ले सकता है। ये राजनीतिक आतंकवाद यदि इसी तरह जारी रहा तो विस्फोट बहुत दूर नहीं है, असंतोष यदि ब्रिटेन में राजा और रानी का सार्वजानिक क़त्ल करवा कर कामनवेल्थ की स्थापना कर सकता है तो हिन्दुस्तान में पूर्ण शुद्धिकरण का नाद करके लोकतांत्रिक-अधिनायक की व्यवस्था भी दे सकता है।

Sunday, July 22, 2012

मैं जेल से लिंगा कोडोपी बोल रहा हूँ



तुमने मुझे धकेल दिया जेल की कोठरी के अँधेरे में,
क्योंकि राष्ट्रपति भवन के,
विशालकाय गणतंत्र के गुम्बद पर
चमचमाता हुआ प्रकाश पुंज,
मेरी ही जमीन छीनकर बनाये गये,
बिजलीघर में तैयार बिजली से दमदमाता है ,

मेरी आजादी को खतरा बताया गया,
गणतन्त्र के उस विशालकाय गुम्बद के
बल्ब की रौशनी के लिये,
पुलिस की कितनी लाठियां टूटी मुझपर,
अब याद नहीं,

मार खाते हुए रोने का विकल्प नहीं था मेरे सामने ,
क्योंकि मेरी आँखों के आंसू
ताड़मेटला गाँव में थाने से बलात्कार होकर लौटी
लड़की की कहानी सुनने के बाद,
बहकर समाप्त हो चुके थे,
सिर्फ खून उतर आया था मेरी आँखों में पुलिस से पिटते समय,

लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा के लिये ,
सभ्य लोगों को जरूरी लगता है ,
हमे लगातार हमारी हैसियत का
अहसास कराते जाना,
और हमारी औरतों के शरीर में ,
तुम्हारे राष्ट्र का पौरुष,
और कंकड,पत्थर भर दिये जाना ,
उस रात तुमने मेरी बुआ सोनी सोरी को नहीं
अपने लोकतन्त्र को नंगा किया था थाने में,

मैं लडूंगा, क्योंकि न लड़ने का विकल्प तुमने छीन लिया मुझसे,
मैं मरूँगा नहीं,
क्योंकि मुझे शपथ लगी है उन सबकी,
जिनकी इज्जत लूटी, जिनके घर जले ,
जिनके बच्चे मरे और वो रो न सके ,
हाथ मेरे अब जुडेंगे नही ,
गर्दन मेरी अब झुकेंगी नही,
जंग मेरी अब रुकेगी नहीं ,
मैं मरूँगा नहीं, लडूंगा मैं अब ,
हर पेंड़ की छाँव में, हर पहाड़ी पर
जंगल के हर मोड पर ,
तुम मुझे ही पाओगे,

तुम्हारी हर लाठी,
तुम्हारे लोकतन्त्र पर ही चली है ,
तुम्हारी हर गोली ने तुम्हारी ही संस्कृति को मारा है,
तुम्हारी हर जेल में तुम्हारा ही लोकतन्त्र कैद है ,
मैं ना पिटा हूँ, ना मरा हूँ और न कैदी ही हूँ,
मेरी बुआ की कोख से निकले पत्थर के नीचे,
दब गया है तुम्हारा गणतन्त्र, संविधान और लोकतन्त्र,
मेरी बुआ रोज पीटती है तुम्हें, सुबह से शाम तक,
देखो कितने अपमानित, पीड़ित और बेचारे दिख रहे हो तुम सब,
मैं और मेरी बुआ जेल से खिल्ली उड़ा रहे हैं तुम्हारी,

तुम हांफ रहे हो,
दम घुट रहा है तुम्हारे नकली लोकतन्त्र का,
मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं,
मैंने तुम्हारे ढोंग के मुखौटों को,
मक्कारी और शराफत की
नकाब को फाडकर फेंक दिया है और
तुम्हारा राष्ट्र, संस्कृति और लोकतन्त्र नंगा हो चुका है,
ताड़मेटला की उस बलात्कृत लड़की के सामने,

देखो मेरी आँखों में झांककर देखो
तुम्हें मेरी आँखों में गुस्सा और
मुझे तुम्हारी आँखों में घबराहट और
डर दिखाई दे रहा है,

Wednesday, March 28, 2012

ये शरीर मुझे अपना नहीं लगता, घृणा होती है!


सोनी सोरी का पत्र हिमांशु कुमार के नाम

sonisori
आप लोग कैसे हैं. गुरूजी मैं भी एक इंसान हूँ. इस शरीर को दर्द होता है. कबतक ऐसे अन्यायों को सहूँ, सहने की भी सीमा होती है. मुझे पेशी में पेश नहीं किया जा रहा है. ना ही कोई मिलने आ रहे हैं. ऐसी स्थिति में मैं क्या करूँ.
हमें तो ऐसा लगने लगा यदि मुझे कुछ हो भी जाये तो आपको मेरे पक्ष की खबर नहीं मिलेगी बल्कि विपक्ष की खबर मिलेगी. दिनांक १२.३.२०१२ को मेरी हालत गंम्भीर हो चुकी थी जिससे मुझे अस्पताल में भरती किया गया. भर्ती करने के बाद हमपर अनेक तरह का आरोप लगाया गया, ये महिला झूठ बोलती है, जानबूझकर नाटक करती है. इसलिये मैंने कहा था कि इलाज मैं यहाँ नहीं कराउंगी.
अगर मैं नाटक करती हूँ तो मुझे अंदरूनी में दर्द क्यों होता है? मैं तो छत्तीसगढ़ सरकार के लिये एक मजाक बनकर रह गई हूँ. जब मेरा सोनोग्राफी कराया गया, उससे पहले मुझे रोटी सब्जी खिलायी गयी और फिर सोनोग्राफी करायी गयी.सब तो कागजों पर लीपापोती करना था दूसरी बात न्यायालय का भी आदेश पालन नहीं किया गया. 
यदि मेरा चेकअप दिनांक 12 मार्च  से पहले होता तो शायद जो स्थिति पैदा हुई वो नहीं होती . गुरूजी आपके द्वारा दी गई शिक्षा की ताकत से बहुत सा मानसिक शारीरिक प्रताड़ना को सह रही हूँ. अब आपके शिष्य और नहीं सह सकती. दिनांक 6 मार्च  को मेरी पेशी थी.

जेलर मैडम जेलर अधीक्षक  से मेरी बहस हुई है. मैंने कहा कि इन सलाखों के अंदर रहकर हर नियमों का पालन कर रही हूँ. अबतक ऐसा कोई भी नियम का उल्लंघन नहीं किया जिससे आप कह सकें कि तुम गलती कर रही हो. मैं भी एक शासकीय कर्मचारी रही हूँ, इसलिए इतना तो समझती हूँ कि जो अनुशासन बना है उसे पालन करना हमारा अनिवार्य कर्तव्य है. फिर आप लोग मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो. पेशी ना ले जाना, स्वास्थ्य पर ध्यान ना देना, तब कहने लगा जेलर अधीक्षक कि ये सब मेरी जिम्मेदारी नहीं है.
तब मैंने कहा आप मुझे बंदी आवेदन दो ताकि सरकार को लेटर भेजकर पूछना चाहूंगी कि ये सब किसके जिम्मेदारी है. गैर जिम्मेदार व्यक्तियों और प्रशासन की देखरेख में हमें क्यों रखा गया. यदि आगामी दिनों में मुझे कुछ हो जाता है इसके जिम्मेदार कौन है. तब कहने लगा बिल्कुल लिखो जो करना है करो.
लेकिन बंदी आवेदन मांगती हूँ तो दे नहीं रहे हैं. कहते हैं ऐसी कोरा कागज पर लिखो.गुरूजी मैं क्या करूँ छत्तीसगढ़ में तो कानून व्यवस्था बनाये रखने वाले राहुल शर्मा जैसे ऑफिसर  अपमान, प्रताड़ना को सह नहीं पा रहे हैं और वे आत्महत्या कर ले रहे हैं.

आप सोचियेगा, इस वक्त मैं किन-किन हालातों से जूझ रही हूँ. ये शरीर मुझे अपना नहीं लगता, घृणा होती है. गुरूजी आपने हमें छोटे से बड़े होते देखा है. हम क्या थे और क्या हो गए.मिलने के लिये किसी को भेजियेगा, गलती पर क्षमा. छत्तीसगढ़ सरकार की अन्यायों से जूझती आपकी शिष्या की ओर से सभी को चरण स्पर्श, नमस्ते.

आपकी शिष्या

Thursday, October 27, 2011

जनसाधारण के लिए अक्तूबर - क्रान्ति को न जानना या उपेक्षित करना आत्मघाती है



अक्तूबर क्रान्ति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनत कशो की अनन्य नियत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए , मेहनत कश समुदाय के लिए आत्मघाती हो रहा है और आगे भी होगा

1917 में रूस में हुई अक्तूबर क्रांति को याद करने व मनाने की जगह उसे भुलाए जाने का सुनियोजित प्रयास किया जाता रहा है | खासकर पिछले 20 - 22 सालो से | 1989-90 के बाद बची खुची समाजवादी व जनवादी सत्ता व व्यवस्था को उखाड़े जाने के बाद से इसे इन देशो की कम्यूनिस्टो की सत्ता व्यवस्था के अपने आप उखड़ जाने या ढह जाने के रूप में प्रचारित किया गया था | वह प्रचार आज भी जारी है | यह प्रचार रूस और पूर्वी यूरोप की उन सत्ताओ व्यवस्थाओं के असली चरित्र को छिपाने के लिए भी किया जाता रहा है | इसी के अंतर्गत उसे मजदूरों किसानो की या कहिये समाज के मेहनत कशो की सत्ता व्यवस्था के रूप में बताने का काम पिछले 20 - 25 सालो से लगभग बन्द कर दिया गया है | प्रचार इस तरह से चलाया जाता रहा मानो वहा की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने अपने सत्ता - स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही उन सत्ताओ व्यवस्थाओं को स्थापित किया था |ऐसा इसलिए किया गया ताकि कम्यूनिस्टो के बारे में ' धर्म - विरोधी ' राष्ट्र - विरोधी ' परिवार -विरोधी ' जैसे प्रचारों के चलते गैर कम्युनिस्ट जनसाधारण इन सत्ताओ - व्यवस्थाओं की विरोधी बने रहे |उसे जनसाधारण की मजदूरों - किसानो की सत्ता व्यवस्था न समझ पाए | आम तौर पर यही होता भी रहा है |
जबकि सच्चाई यह है कि मजदूरों , मेहनतकशो के आम हितो से इतर कम्यूनिस्टो का कोई अपना अलग हित या स्वार्थ नही होता और न ही हो सकता है | ' कम्युनिस्ट घोषणा - पत्र ' में इसे स्पष्ट रूप से घोषित भी किया गया हैं | इसका व्यवहारिक सबूत यह भी है कि अक्तूबर क्रान्ति के उपरान्त कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्त्व में सोवियतो के रूप में संगठित मजदूरों , किसानो व अन्य मेहनतकश हिस्सों के अनन्य नियत्रण की सत्ता स्थापित हुई थी | वह सत्ता मजदूरों , किसानो के दशको तक चले संघर्ष के जरिये वहा की जारशाही सत्ता को और फिर धनाढ्य पूंजीपतियों एवं उच्च वर्गो के हितो - अधिकारों की सत्ता को बलपूर्वक तोडकर और हटाकर स्थापित हुयी थी | फिर यह निजी लाभ - मुनाफ़ा कमाने और निजी धन सम्पति खड़ी करने की सामाजिक व्यवस्था को तोड़ते और हटाते हुए आगे बढ़ी थी | साथ ही वह सामन्तो एवं देशी व विदेशी पूंजीवाद वर्गो की निजी सम्पत्तियों को छीनकर उसे मेहनतकश समाज की सामूहिक सम्पति बनाते हुए तथा उसके जरिये समाज की मानवीय आवश्यकताओ की अधिकाधिक पूर्ति करते हुए आगे बढ़ी थी | खासकर 1917 से लेकर 1956 तक के सुधारों , संशोधनों से पहले के पूरे दौर में | इस उद्देश्य से अक्तूबर -क्रांति द्वारा स्थापित सत्ता - व्यवस्था ने पूंजी वादी धनाढ्य वर्गो द्वारा दूसरो को मजदूर ( तथा दास या अर्द्ध दास ) बनाकर काम करवाने , और धन सम्पत्ति बढाने की सदियों से चली आ रही प्रणाली का अन्त कर दिया था | मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत कर दिया था |दुसरो को मजदूर रखने और स्वंय श्रम न करने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया था | इसीलिए मेहनतकशो के सामूहिक हितो की पूर्ति के लिए बनी इस क्रांतिकारी समाजवादी सत्ता व्यवस्था में शासक पार्टी के रूप में विद्यमान कम्युनिस्ट पार्टी के नेता न तो स्वंय निजी तौर पर धन - पैसा - पूंजी कमा सकते थे और न ही उसके लिए किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को करवाने की छूट दे सकते थे | इसीलिए कोई कम्युनिस्ट नेता निजी तौर पर न तो जमीन , जायदाद तथा कल - कारखाने आदि का मालिक बना औरं न ही बन सकता था |जबकि हम यह बात स्पष्ट तौर पर देख रहे है कि जनतांत्रिक सत्ता - व्यवस्था के संचालन नियंत्रण में लगी पार्टियों के लोग निजी हितो को हर तरह से बढाने में , उसके लिए हर तरह के भ्रष्टाचार करने में कही से पीछे नही रहते | कयोंकि वे जन्त्रंत्र के नाम से देश व समाज के धनाढ्य वर्गो के निजी लाभ व निजी मालिकाने को बढाने में लगे रहते है और उसका फल अपने निजी चढत -बढत के रूप में हासिल कर लेते है | इसीलिए और इसी के साथ धनाढ्य वर्गो के हितो कि पूर्ति के लिए मजदूरों , किसानो एवं अन्य साधारण मध्यम वर्गियो के नाम मात्र के अधिकारों व सम्पत्तियों को भी काटने घटाने का काम निरंतर करते रहते है |
इसका सबूत आप सभी जनतांत्रिक या गैर- जनतांत्रिक शेख शाही व सैन्य शाही शासन व्यवस्थाओं में देख सकते हैं | मध्य युगीन और आधुनिक काल के भारत में इसका सबूत हर जगह मौजूद है |देश की वर्तमान व्यवस्था में जनतंत्र का यही दोहरा और परस्पर विरोधी चेहरा एकदम प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने मौजूद है | अल्पसख्यक धनाढ्यो के खुशहाल भारत और बहुसख्यक मेहनतकशो की बदहाल भारत के रूप में |अक्तूबर क्रांति से पहले जारशाही रूस भी ऐसा ही था और अब 1989 -90 के बाद समाजवादी सत्ता व्यवस्था के उखाड़े जाने के बाद जनतांत्रिक कहा जाने वाला रूस भी अमीरों को रूस व गरीबो के रूस में , अमीरों को बढाने और गरीबो को दबाने वाले रूस में तथा राज व समाज में हर तरह के भ्रष्टाचार को बढावा देने वाले रूस में बदलता जा रहा है या कहिये की बदल गया है |
यह काम इस देश या वर्तमान रूस व अन्य देशो की कुनीतियो , कुशासनो , के चलते नही हो रहा है | बल्कि इस देशो के समाज में बहुसख्यक गरीब एवं मेहनतकश हिस्से के साथ अल्पसख्या में धनाढ्य एवं उच्च वर्गो की मौजूदगी के फलस्वरूप हो रहा है | देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो द्वारा अपने आधुनिक साधनों , पूंजियो तकनीको और उसे बढाने के छुट , अधिकारों के जरिये आम किसानो , मजदूरों व अन्य जनसाधारण की सम्पत्तियों को छीनते जाने तथा उन्हें मजदूर व मजबूर बनाये जाने के फलस्वरूप हो रहा है | देशो की जनतांत्रिक या किसी नाम की सत्ता सरकार की ताकत से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के शोषण , लूट व प्रभुत्व को संचालित करने के चलते हो रहा है | मालिको एवं मेहनतकशो में बटे समाज में यही होना भी हैं | यही होता आया है | क्योंकि साधन सम्पन्न मालिको और साधनहीन बनते जनसाधारण के हितो में , न हल किया जा सकने विरोध मौजूद हैं | इस विरोध का समाधान इतिहास में गुलाम मालिको , फिर राजाओं बादशाहों , जमीदारो को और उनके मालिकाने व प्रभुत्व की व्यवस्था को हटाकर किया गया था | वही समाधान वर्तमान दौर के पूंजिवान वर्गो और उनकी बाजारवादी सत्ता व्यवस्था के प्रति भी किया जाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | अत:इतिहास से सबक लेकर देश दुनिया की जनसाधारण के लिए , मेहनतकशो के लिए , धनाढ्य वर्गो के विरुद्ध तथा उनके मालिकाने व अधिकार के विरुद्ध निर्मम संघर्ष चलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नही बचता है |धनाढ्य वर्गो के लिए जनतांत्रिक पर मेहनतकशो के लिए आमतौर पर तानाशाही सत्ता व्यवस्था को हटाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | मेहनतकशो के लिए जनतांत्रिक पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर तानाशाही लगाने वाली सत्ता व्यवस्था की स्थापना भी अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | अक्टूबर क्रांति ने यही किया था | इसीलिए दुनिया के धनाढ्य वर्गो द्वारा खासकर अमेरिकी इंग्लैण्ड जैसे देशो के साम्राज्यी ताकतों द्वारा रूस और पूर्वी यूरोप के देशो में स्थापित मेहनतकशो के समाजवादी एवं जनवादी सत्ता व्यवस्था के बारे में हर तरह के कुप्रचार करते रहे हैं | उसे उखाड़ फेकने के हर हरबे - हथकंडे अपनाते रहे है | इसी के फलस्वरूप साम्राज्यी ताकतों द्वारा इन समाजवादी सत्ताओ व्यवस्थाओं को उखाड़ा भी गया है | लेकिन यह काम खुद इन देशो में शिक्षा - ज्ञान , शासन - प्रशासन में दक्ष और 1989 - 90 के दौर में मौजूद उच्चता प्राप्त तबको के साथ सहयोग से किया गया | ठीक ऐसे ही बौद्धिक शासकीय हिस्सों द्वारा लूटेरी साम्राज्यी कम्पनियों को उनकी पूंजी व तकनीक को छूट देते हुए देश के आम जनता के हितो को 1991 से खुलेआम काटा जाता रहा है | देश की स्वतंत्रता एवं आत्म निर्भरता का प्रचार भी चलता रहा और उसे विदेशी संबन्धो पे खुलेआम परनिर्भर व परतंत्र बनाने का काम भी होता रहा | समाजवादी एवं जनवादी सत्ताओ , व्यवस्थाओं को हटाने के बाद अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी ताकते पिछड़े देशो पर , , इन देशो के जनसाधारण लोगो के हिस्सों पर खुलेआम हमला कर रही है | इसलिए इस देश के जनसाधारण के लिए भी अपने वर्गीय हितो को जानना , समझना व उसे हासिल करने के लिए अक्तूबर - क्रांति के रास्ते पर चलना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो चुका है | अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी साम्राज्यी ताकतों के शोषणकारी प्रभुत्वकारी संबंधो , नीतियों , प्रस्तावों आदि से राष्ट्र को पूरी तरह मुक्त कराए जाने का काम अब अनिवार्य हो चुका है |
इसी के साथ साम्राज्यी ताकतों के सहयोगी व हिमायती बने इस देश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर भी कठोरतम नियंत्रण लगाना भी अनिवार्य हो चुका है |
इसीलिए अक्तूबर क्रांति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनतकशो द्वारा मेहनतकशो के हित और मेहनतकशो की अनन्य नियंत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए मेहनतकश समुदाय के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है और आगे भी होगा | इसी के साथ धूमिल की कुछ पक्तिया याद आ रही है |
यह तीसरा आदमी कौन है?
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
- धूमिल
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672