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Wednesday, October 24, 2012

शरद पूर्णिमा की शाम महिषासुर की शहादत का शोक मनेगा



महिषासुर शहादत दिवस को लेकर जवाहर लाल नेहरु विश्‍वविद्यालय में तनाव

ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम (AIBSF) द्वारा लगाये गये कुछ पोस्टडर को फाड़ दिया गया है।
AIBSF की बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) शाखा भी स्थानीय स्‍तर पर शहादत दिवस का आयोजन करेगी जबकि लखनऊ यूनिवर्सिटी व भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी, बिहार के छात्र बड़ी संख्या में शहादत दिवस में भाग लेने 29 अक्टूबर को जेएनयू आएंगे।
राजा महिषासुर
जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (JNU) में महिषासुर शहादत दिवस के आयोजन को लेकर तनाव का महौल बनने लगा है। ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंट फोरम (AIBSF) द्वारा लगाये गये कुछ पोस्‍टर को फाड़ दिया गया है। पोस्‍टर में संगठन ने महिषासुर को भारत के आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों का पूर्वज बताते हुए 29 अक्‍टूबर (शरद पूर्णिमा) को उनकी शहादत मनाने के लिए एकजुट होने का आह्वान किया था।
ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूडेंट फोरम के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष जितेंद्र यादव व जेएनयू अध्‍यक्ष विनय कुमार ने बताया कि तीन दिन पहले कैंपस में इससे संबंधित 30 बड़े पोस्‍टर विभिन्‍न स्‍‍थानों पर लगाये गये थे। इन पोस्‍टरों में अकादमिक जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ में प्रकाशित कवर स्‍टोरी में प्रकाशित शोध को दर्शाया गया था, जिसके अनुसार ‘असुर’ एक जनजाति है, जो आज भी झारखंड में पायी जाती है।
सुषमा असुर
छात्र नेताओं के अनुसार, संगठन के सदस्‍यों ने उन स्‍थानों पर, जहां पोस्‍टर लगाये गये थे, का मुआयना करने पर पाया कि लाइब्रेरी के सामने व केसी मार्केट कांप्‍लेक्‍स में लगाये गये पोस्‍टर फाड़ दिये गये हैं। संगठन यह मुद्दा जेएनयूएसयू व विश्‍वविद्यालय प्रशासन के सामने उठाएगा। उन्‍होंने आरोप लगाया कि पोस्‍टर दक्षिणपंथी-हिंदूवादी राजनी‍ति से जुड़े असामाजिक तत्‍वों ने फाड़े हैं।
छात्र नेताओं ने बताया कि कैंपस में महिषासुर शहादत दिवस मनाने की तैयारी जोरों पर चल रही है। ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टूकडेंट फोरम (AIBSF) की बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) शाखा भी स्‍थानीय स्‍तर पर बीएचयू में शहादत दिवस का आयोजन करेगी, जबकि लखनऊ यूनिवर्सिटी व भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी, बिहार के विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में शहादत दिवस में भाग लेने 29 अक्‍टूबर को जेएनयू आएंगे। उन्‍होंने कहा कि महिषासुर शहादत दिवस भारत के बहुजनों के सांस्‍कृति आजादी की लड़ाई है, अपनी जड़ों की ओर लौटना है तथा अपने पूर्वजों के प्रति सम्‍मान व्‍यक्‍त करना है।
AIBSF के अनुसार, विजयादशमी को राष्ट्रीय शर्म दिन के रूप में घोषित करने के लिए आंदोलन किया जाएगा क्योंकि यह हमारे पूर्वजों के हत्या का जश्न है।
शिबू सोरेन ने महिषासुर को अपना पूर्वज बताते हुए कहा है कि मुझे ‘असुर होने पर गर्व है’।
जेएनयू कैंपस में AIBSF द्वारा लगाये गये बड़े-बड़े में पोस्टर में कहा गया है कि महिषासुर इस देश के बैकवर्ड समाज के नायक थे, जिनकी हत्या आर्यों ने दुर्गा के माध्यम से की। पोस्टर के पहले पेज पर झारखंड की ‘असुर’ जा‍ति की कवयित्री सुषमा असुर की तस्‍वीर यह कहते हुए दी गयी है कि ‘देखो मुझे, महाप्रतापी महिषासुर की वंशज हूं मैं’।
जेएनयू की दीवार पर चिपके पोस्‍टर
पोस्टर के एक अंश में अका‍दमिक पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ में प्रकाशित झारखंड के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्‍यमंत्री शिबू सोरेन से बातचीत दी गयी है। शिबू सोरेन ने महिषासुर को अपना पूर्वज बताते हुए कहा है कि मुझे ‘असुर होने पर गर्व है’। पोस्‍टर के माध्‍यम से कहा गया है कि ‘फारवर्ड प्रेस’ के अक्‍टूबर, 2012 अंक में प्रकाशित आवरण कथा में आदिवासी मामलों के विख्‍यात अध्‍येता अश्विनी कुमार पंकज ने दशहरा को असुर राजा महिषासुर और उसके अनुयायियों के आर्यों द्वारा वध और सामूहिक नरसंहार का अनुष्ठान बताया है, इसलिए भारत के बहुजनों को दुर्गा की पूजा का विरोध करना चाहिए। संगठन ने कहा है कि विजयादशमी को राष्ट्रीय शर्म दिन के रूप में घोषित करने के लिए आंदोलन किया जाएगा, क्योंकि यह हमारे पूर्वजों के हत्याओं का जश्न है।
एआईबीएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र यादव का कहना है कि राजा महिषासुर की हत्या के बाद पूर्णिमा की रात को असुरों ने शोक सभा की थी। इसलिए संगठन देश भर में इस दिन (शरद पूर्णिमा) को शहादत दिवस के रूप में मनाएगा।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष जेएनयू में महिषासुर-दुर्गा पोस्टर के कारण बैकवर्ड फोरम और विद्यार्थी परिषद के छात्रों से हुई मार-पीट और मुकदमेबाजी हुई थी। इस संबंध में जेएनयू प्रशासन ने संगठन के प्रमुख जितेंद्र यादव को धार्मिक भावनाओं के आहत करने के कारण नोटिस जा‍री किया था जिसके कारण इस मामले ने और तूल पकड़ लिया था। परंतु अंततः विश्वविद्यालय प्रशासन को इस मामले में माफी मांगनी पड़ी थी।
एआईबीएसएफ के जेएनयू अध्यक्ष विनय कुमार ने जानकारी दी कि शहादत दिवस के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं। इस अवसर पर ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका की संपादक व आदिवासी मामलों पर काम करने वाली चर्चित लेखिका रमणिका गुप्‍ता, बिहार के चर्चित साहित्‍यकार प्रेमकुमार मणि समेत बैकवर्ड समाज के जाने-माने बुद्धिजीवी और पत्रकार उपस्थित रहेंगे।

संपर्क:
जितेंद्र यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, एआईबीएसएफ (All India Backward Students’ Forum), 345, सतलज, जेएनयू, मोबाइल – 9716839326, 4859439496
विनय कुमार, जेएनयू अध्यक्ष, एआईबीएसएफ158, साबरतमी जेएनयू मोबाइल – 9871387326

Thursday, October 27, 2011

जनसाधारण के लिए अक्तूबर - क्रान्ति को न जानना या उपेक्षित करना आत्मघाती है



अक्तूबर क्रान्ति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनत कशो की अनन्य नियत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए , मेहनत कश समुदाय के लिए आत्मघाती हो रहा है और आगे भी होगा

1917 में रूस में हुई अक्तूबर क्रांति को याद करने व मनाने की जगह उसे भुलाए जाने का सुनियोजित प्रयास किया जाता रहा है | खासकर पिछले 20 - 22 सालो से | 1989-90 के बाद बची खुची समाजवादी व जनवादी सत्ता व व्यवस्था को उखाड़े जाने के बाद से इसे इन देशो की कम्यूनिस्टो की सत्ता व्यवस्था के अपने आप उखड़ जाने या ढह जाने के रूप में प्रचारित किया गया था | वह प्रचार आज भी जारी है | यह प्रचार रूस और पूर्वी यूरोप की उन सत्ताओ व्यवस्थाओं के असली चरित्र को छिपाने के लिए भी किया जाता रहा है | इसी के अंतर्गत उसे मजदूरों किसानो की या कहिये समाज के मेहनत कशो की सत्ता व्यवस्था के रूप में बताने का काम पिछले 20 - 25 सालो से लगभग बन्द कर दिया गया है | प्रचार इस तरह से चलाया जाता रहा मानो वहा की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने अपने सत्ता - स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही उन सत्ताओ व्यवस्थाओं को स्थापित किया था |ऐसा इसलिए किया गया ताकि कम्यूनिस्टो के बारे में ' धर्म - विरोधी ' राष्ट्र - विरोधी ' परिवार -विरोधी ' जैसे प्रचारों के चलते गैर कम्युनिस्ट जनसाधारण इन सत्ताओ - व्यवस्थाओं की विरोधी बने रहे |उसे जनसाधारण की मजदूरों - किसानो की सत्ता व्यवस्था न समझ पाए | आम तौर पर यही होता भी रहा है |
जबकि सच्चाई यह है कि मजदूरों , मेहनतकशो के आम हितो से इतर कम्यूनिस्टो का कोई अपना अलग हित या स्वार्थ नही होता और न ही हो सकता है | ' कम्युनिस्ट घोषणा - पत्र ' में इसे स्पष्ट रूप से घोषित भी किया गया हैं | इसका व्यवहारिक सबूत यह भी है कि अक्तूबर क्रान्ति के उपरान्त कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्त्व में सोवियतो के रूप में संगठित मजदूरों , किसानो व अन्य मेहनतकश हिस्सों के अनन्य नियत्रण की सत्ता स्थापित हुई थी | वह सत्ता मजदूरों , किसानो के दशको तक चले संघर्ष के जरिये वहा की जारशाही सत्ता को और फिर धनाढ्य पूंजीपतियों एवं उच्च वर्गो के हितो - अधिकारों की सत्ता को बलपूर्वक तोडकर और हटाकर स्थापित हुयी थी | फिर यह निजी लाभ - मुनाफ़ा कमाने और निजी धन सम्पति खड़ी करने की सामाजिक व्यवस्था को तोड़ते और हटाते हुए आगे बढ़ी थी | साथ ही वह सामन्तो एवं देशी व विदेशी पूंजीवाद वर्गो की निजी सम्पत्तियों को छीनकर उसे मेहनतकश समाज की सामूहिक सम्पति बनाते हुए तथा उसके जरिये समाज की मानवीय आवश्यकताओ की अधिकाधिक पूर्ति करते हुए आगे बढ़ी थी | खासकर 1917 से लेकर 1956 तक के सुधारों , संशोधनों से पहले के पूरे दौर में | इस उद्देश्य से अक्तूबर -क्रांति द्वारा स्थापित सत्ता - व्यवस्था ने पूंजी वादी धनाढ्य वर्गो द्वारा दूसरो को मजदूर ( तथा दास या अर्द्ध दास ) बनाकर काम करवाने , और धन सम्पत्ति बढाने की सदियों से चली आ रही प्रणाली का अन्त कर दिया था | मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत कर दिया था |दुसरो को मजदूर रखने और स्वंय श्रम न करने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया था | इसीलिए मेहनतकशो के सामूहिक हितो की पूर्ति के लिए बनी इस क्रांतिकारी समाजवादी सत्ता व्यवस्था में शासक पार्टी के रूप में विद्यमान कम्युनिस्ट पार्टी के नेता न तो स्वंय निजी तौर पर धन - पैसा - पूंजी कमा सकते थे और न ही उसके लिए किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को करवाने की छूट दे सकते थे | इसीलिए कोई कम्युनिस्ट नेता निजी तौर पर न तो जमीन , जायदाद तथा कल - कारखाने आदि का मालिक बना औरं न ही बन सकता था |जबकि हम यह बात स्पष्ट तौर पर देख रहे है कि जनतांत्रिक सत्ता - व्यवस्था के संचालन नियंत्रण में लगी पार्टियों के लोग निजी हितो को हर तरह से बढाने में , उसके लिए हर तरह के भ्रष्टाचार करने में कही से पीछे नही रहते | कयोंकि वे जन्त्रंत्र के नाम से देश व समाज के धनाढ्य वर्गो के निजी लाभ व निजी मालिकाने को बढाने में लगे रहते है और उसका फल अपने निजी चढत -बढत के रूप में हासिल कर लेते है | इसीलिए और इसी के साथ धनाढ्य वर्गो के हितो कि पूर्ति के लिए मजदूरों , किसानो एवं अन्य साधारण मध्यम वर्गियो के नाम मात्र के अधिकारों व सम्पत्तियों को भी काटने घटाने का काम निरंतर करते रहते है |
इसका सबूत आप सभी जनतांत्रिक या गैर- जनतांत्रिक शेख शाही व सैन्य शाही शासन व्यवस्थाओं में देख सकते हैं | मध्य युगीन और आधुनिक काल के भारत में इसका सबूत हर जगह मौजूद है |देश की वर्तमान व्यवस्था में जनतंत्र का यही दोहरा और परस्पर विरोधी चेहरा एकदम प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने मौजूद है | अल्पसख्यक धनाढ्यो के खुशहाल भारत और बहुसख्यक मेहनतकशो की बदहाल भारत के रूप में |अक्तूबर क्रांति से पहले जारशाही रूस भी ऐसा ही था और अब 1989 -90 के बाद समाजवादी सत्ता व्यवस्था के उखाड़े जाने के बाद जनतांत्रिक कहा जाने वाला रूस भी अमीरों को रूस व गरीबो के रूस में , अमीरों को बढाने और गरीबो को दबाने वाले रूस में तथा राज व समाज में हर तरह के भ्रष्टाचार को बढावा देने वाले रूस में बदलता जा रहा है या कहिये की बदल गया है |
यह काम इस देश या वर्तमान रूस व अन्य देशो की कुनीतियो , कुशासनो , के चलते नही हो रहा है | बल्कि इस देशो के समाज में बहुसख्यक गरीब एवं मेहनतकश हिस्से के साथ अल्पसख्या में धनाढ्य एवं उच्च वर्गो की मौजूदगी के फलस्वरूप हो रहा है | देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो द्वारा अपने आधुनिक साधनों , पूंजियो तकनीको और उसे बढाने के छुट , अधिकारों के जरिये आम किसानो , मजदूरों व अन्य जनसाधारण की सम्पत्तियों को छीनते जाने तथा उन्हें मजदूर व मजबूर बनाये जाने के फलस्वरूप हो रहा है | देशो की जनतांत्रिक या किसी नाम की सत्ता सरकार की ताकत से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के शोषण , लूट व प्रभुत्व को संचालित करने के चलते हो रहा है | मालिको एवं मेहनतकशो में बटे समाज में यही होना भी हैं | यही होता आया है | क्योंकि साधन सम्पन्न मालिको और साधनहीन बनते जनसाधारण के हितो में , न हल किया जा सकने विरोध मौजूद हैं | इस विरोध का समाधान इतिहास में गुलाम मालिको , फिर राजाओं बादशाहों , जमीदारो को और उनके मालिकाने व प्रभुत्व की व्यवस्था को हटाकर किया गया था | वही समाधान वर्तमान दौर के पूंजिवान वर्गो और उनकी बाजारवादी सत्ता व्यवस्था के प्रति भी किया जाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | अत:इतिहास से सबक लेकर देश दुनिया की जनसाधारण के लिए , मेहनतकशो के लिए , धनाढ्य वर्गो के विरुद्ध तथा उनके मालिकाने व अधिकार के विरुद्ध निर्मम संघर्ष चलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नही बचता है |धनाढ्य वर्गो के लिए जनतांत्रिक पर मेहनतकशो के लिए आमतौर पर तानाशाही सत्ता व्यवस्था को हटाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | मेहनतकशो के लिए जनतांत्रिक पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर तानाशाही लगाने वाली सत्ता व्यवस्था की स्थापना भी अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | अक्टूबर क्रांति ने यही किया था | इसीलिए दुनिया के धनाढ्य वर्गो द्वारा खासकर अमेरिकी इंग्लैण्ड जैसे देशो के साम्राज्यी ताकतों द्वारा रूस और पूर्वी यूरोप के देशो में स्थापित मेहनतकशो के समाजवादी एवं जनवादी सत्ता व्यवस्था के बारे में हर तरह के कुप्रचार करते रहे हैं | उसे उखाड़ फेकने के हर हरबे - हथकंडे अपनाते रहे है | इसी के फलस्वरूप साम्राज्यी ताकतों द्वारा इन समाजवादी सत्ताओ व्यवस्थाओं को उखाड़ा भी गया है | लेकिन यह काम खुद इन देशो में शिक्षा - ज्ञान , शासन - प्रशासन में दक्ष और 1989 - 90 के दौर में मौजूद उच्चता प्राप्त तबको के साथ सहयोग से किया गया | ठीक ऐसे ही बौद्धिक शासकीय हिस्सों द्वारा लूटेरी साम्राज्यी कम्पनियों को उनकी पूंजी व तकनीक को छूट देते हुए देश के आम जनता के हितो को 1991 से खुलेआम काटा जाता रहा है | देश की स्वतंत्रता एवं आत्म निर्भरता का प्रचार भी चलता रहा और उसे विदेशी संबन्धो पे खुलेआम परनिर्भर व परतंत्र बनाने का काम भी होता रहा | समाजवादी एवं जनवादी सत्ताओ , व्यवस्थाओं को हटाने के बाद अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी ताकते पिछड़े देशो पर , , इन देशो के जनसाधारण लोगो के हिस्सों पर खुलेआम हमला कर रही है | इसलिए इस देश के जनसाधारण के लिए भी अपने वर्गीय हितो को जानना , समझना व उसे हासिल करने के लिए अक्तूबर - क्रांति के रास्ते पर चलना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो चुका है | अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी साम्राज्यी ताकतों के शोषणकारी प्रभुत्वकारी संबंधो , नीतियों , प्रस्तावों आदि से राष्ट्र को पूरी तरह मुक्त कराए जाने का काम अब अनिवार्य हो चुका है |
इसी के साथ साम्राज्यी ताकतों के सहयोगी व हिमायती बने इस देश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर भी कठोरतम नियंत्रण लगाना भी अनिवार्य हो चुका है |
इसीलिए अक्तूबर क्रांति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनतकशो द्वारा मेहनतकशो के हित और मेहनतकशो की अनन्य नियंत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए मेहनतकश समुदाय के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है और आगे भी होगा | इसी के साथ धूमिल की कुछ पक्तिया याद आ रही है |
यह तीसरा आदमी कौन है?
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
- धूमिल
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

Friday, May 06, 2011

लोग तारीखें भूल जाते हैं, इसलिए बता दें कि आज कार्ल मार्क्‍स का जन्‍मदिन है



कार्ल मार्क्स की कविता
मेरी आत्मा जिस बात की गिरफ्त में आ चुकी है
उसके रहते मैं कभी भी शांत नहीं बैठ सकता
कभी भी चीजों को सामान्य ढंग से नहीं ले सकता
मुझे आगे बढ़ते रहना है, बिना विराम के।
अतः आओ, हम सारा कुछ दांव पर लगा दें
न आराम करें, न थकान को तरजीह दें
न रहें गमगीन खामोशी के आगोश में
न होने दें बुद्धि को मंद
बिना गति की इच्छा के, बगैर चाहत के
बुदबुदाता हुआ अंतर्चिंतन में नहीं,
न दर्द के हल के नीचे दबें
ताकि हममें बची रहें इच्छाएं
और
बचे रहें स्वप्न, बची रहे कारवाई,
भले ही वे अपूर्ण ही क्यों न हों।
बर्लिन की एक साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित, वर्ष 1841
अनुवाद : विश्वजीत सेन
वैश्वीकरण को जिन महानुभावों ने हम पर थोपा उन्‍होंने साथ साथ एक और काम भी किया उनके अपने विचारकों से किताबें लिखवाकर उन किताबों को विश्व भर में प्रचारित करवाया। वे बुद्धिमान थे। उन्हें पता था कि समाजवाद के आदर्शों पर वैचारिक हमला भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि वैश्वीकरण। किसी चीज को खत्म जड़ मूल से करना जरूरी है। उगर यह चीज विचारधारा है, तो उसका कुछ भी अवशेष बचना नहीं चाहिए। बचे खुचे अवशेष, समस्या उत्पन्न कर सकते हैं।
समाजवादी विचारधारा को जड़ मूल से नष्ट करने का इरादा जिनका था, उनसे लेकिन एक भूल हो गयी। वे जिस विचारधारा को आगे लाने के लिए प्रयासरत थे, वे जिस सामाजिक आर्थिक ढांचे की वकालत कर रहे थे, उनमें निहित द्वंद्वों का अध्ययन उन्होने बारीकी से नहीं किया। ऐसा होना स्वाभाविक भी था। वर्ग-विभाजित समाज में द्वंद्व केवल एक ही तरीके से हल हो सकते हैं, क्रांति से। अब वह क्रांति हिंसक होगी या नहीं, यह तो उस खास समाज की बनावट पर निर्भर करता है। मसलन, उस समाज की वर्ग संरचना कैसी है, शोषित वर्ग किस हद तक सामाजिक आर्थिक फैसलों में हिस्सेदार है आदि आदि। लेकिन क्रांति के बगैर वर्ग-विभाजित समाज के द्वंद्वों को सुलझाना मुमकिन नहीं।
जब भी आप क्रांति की बात करेंगे आपको मार्क्स की ओर मुखातिब होना पड़ेगा। मार्क्स के बाद के विश्व में अनगिनत बार उन्‍हें खारिज करने की कोशिशें हुईं। मार्क्स को खारिज करनेवाले तरह तरह के मुखौटे लगाकर आये, पूरी कोशिश भी की, पर इतिहास ने उनकी कोशिशों को धूल में मिला दिया। आज भी सैद्धांतिक बौने कोशिश करते दिखते हैं, पर अब कोई उनकी ओर मुड़कर भी नहीं देखता। हाल की महामंदी ने स्थिति यह पैदा कर दी है कि पूंजीपति भी मार्क्स की कृतियों को पढ़ना आवश्यक समझ रहे हैं।
लेकिन, पूंजीपति आखिर मार्क्स की कृतियों को पढ़कर करेंगे क्या? क्या वे अपनी पूंजी का सामाजिक वितरण करने में लग जाएंगे? या फिर मार्क्स की कृतियों में से कुछ टोटके निकाल कर अपनी ढहती व्यवस्था को बचाने का प्रयास करेंगे? अपनी पूंजी का सामाजिक वितरण तो वे खुद से करेंगे नही। अगर यह संभावना रहती तो दुनिया अब तक बदल चुकी होती। वे टोटके ढूंढेंगे और अपनी व्यवस्था को कुछ और दशकों तक बचाकर ले चलने का प्रयास करेंगे। कुछ और दशकों तक। हद से हद एक और सदी तक। उसके बाद तो पूंजीवादी व्यवस्था को ढहना ही है।
आज भी जिन्‍हें मार्क्स में यकीन है, उनका कर्तव्य क्या बनता है? क्या वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे और पूंजीवाद के स्वतः ढह जाने की प्रतीक्षा करेंगे? क्या ऐसा करना उचित होगा? मेरी समझ से, नहीं। पूंजीवाद जितना दिन जीवित रहेगा, वह अपनी सड़ांध को जनता पर फेंकने का प्रयास करता रहेगा। आज के पूंजीवाद की स्थिति राजा ययाति जैसी है, जो अपनी संतान से गुहार लगा रहा है कि वह अपनी जवानी उसे दे दे और खुद जराग्रस्त हो जाना स्वीकार कर ले। राजा ययाति ने तो आखिर अपनी संतान को जवानी वापस कर दी थी, पर पूंजीवाद ऐसा नहीं करनेवाला। वह अपनी संतान को मरते हुए देख सकता है, लेकिन उसकी जवानी उसे वापस नहीं कर सकता। यह उसका चरित्र है।
तब जनता को क्या करना चाहिए? अवश्य ही उसे पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहिए। लेकिन यह कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए सारे पूंजीवाद-विरोधी आंदोलनों के अनुभवों का अध्ययन आवश्यक है। आज के परिदृश्य में क्रांति को सफल बनाने के लिए कौन सी राह अपनायी जाए, इसको लेकर गंभीर मनन तथा मंथन आवश्यक है। पूंजीवाद-विरोधी आंदोलनों के दौरान अगर जनता ने अनुभव हासिल किया है, तो पूंजीवाद भी कोई नाबालिग नहीं रह गया। सबसे बड़ी बात यह है कि उसके पास संसाधन हैं, उसके पास सिद्धांतकार हैं, उसके पास षड्यंत्रकारी हैं, उसके पास लगभग अटूट हालत में पूरा का पूरा राष्ट्रयंत्र है, उसके पास न्यायपालिका है। जनता के पास क्या है? समाजवादी खेमे के विघटन के बाद जनता तो करीब करीब निःशस्त्र हो चुकी है, क्या जनता इतने बड़े लक्ष्य को हासिल करने लायक रह गयी है?
कुछ होने की शुरुआत कुछ नहीं होने से ही होती है। समाजवादी खेमा का ढह जाना एक बहुत बड़ी त्रासदी जरूर है, लेकिन उसके कारण जनता के संघर्ष तो बंद नहीं हुए? साम्राज्यवादी घुड़की के आगे क्यूबा ने घुटने नहीं टेके। बोलिविया और वेनेजुएला में जनपक्षी सरकारें सत्ता में आ गयीं। समाजवादी खेमे के विघटन के बावजूद संपूर्ण विश्व में साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलनों में एक नयी तेजी आ गयी। अब किसी राष्ट्रवादी राजनेता को, जैसे चिली के राष्ट्रपति सल्वादोर अलेंदे, फौजी बगावत भड़का कर खत्म करना आसान नहीं रह गया।
पेरिस के मजदूरों ने जब क्रांति कर दी तो कार्ल मार्क्स ने कहा था, यह स्वर्ग पर धवा है। मार्क्स ने यह उक्ति इस वजह से की कि मजदूरों ने एक असाध्य काम का बीड़ा उठा लिया था। पेरिस कम्‍यून को खून की नदी में डुबो दिया गया, लेकिन स्वर्ग पर धावा बोलने के काम में कभी विराम नहीं आया। आखिरकार 1917 में रूस के मजदूरों ने स्‍वर्ग को अपने कब्जे में ले ही लिया। आगे भी वे स्‍वर्ग को अपने कब्जे में लेंगे। इसके लिए उन्‍हें धीरज रखना होगा, सही रणनीति तय करनी होगी और आपसी भाईचारे को मजबूत बनाना होगा। पूंजीवाद की आयु अब अधिक दिनों की नहीं रह गयी है।

(विश्‍वजीत सेन। पटना में रहने वाले चर्चित बांग्ला कवि। पटना युनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई। बांग्ला एवं हिंदी में समान रूप से सक्रिय। पहली कविता 1967 में छपी। अब तक छह कविता संकलन। पिता एके सेन आम जन के डॉक्‍टर के रूप में मशहूर थे और पटना पश्‍िचम से सीपीआई के विधायक भी रहे। उनसे vishwajitsen1967@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)