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Saturday, April 29, 2017

परित्यक्त महिलाओं की संख्या तलाक़ पीड़िताओं से कई गुणा अधिक, मोदी उनके लिए भी बोलें.....

Image result for जशोदाबेनपतियों द्वारा एक़तरफा तरीके से छोड़ी गई हर औरत की ज़िंदगी दयनीय है. ऐसी औरतें अपने ससुराल और मायके दोनों जगह मुश्किलों का सामना करती हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध राष्ट्रवादी मुस्लिम महिला संघ ने जून, 2016 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की. यह याचिका मुस्लिम पर्सनल लॉको संहिताबद्ध करने के लिए दायर की गई थी.

इसका मकसद खासतौर पर बहुविवाह, तीन तलाक़ और तत्काल तलाक़ जैसी प्रथाओं पर रोक लगाना था. अक्टूबर महीने में कोर्ट ने इन मुद्दों पर भारत सरकार से विचार और सिफारिशें मांगीं.

इस पर सरकार की तरफ से जवाब आया कि पिछले 65 वर्षों में मुस्लिम समुदाय में सुधार न होने की वजह से आज मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाज़ुक स्थिति मेंखड़ी हैं.

बिना वक़्त गंवाए 24 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तथाकथित तीन तलाक़ की प्रथाकी आलोचना की. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमारी माताओं और बहनों के साथ धर्म या संप्रदाय के नाम पर कोई अन्याय नहीं होना चाहिए.

पहली नज़र में लगता है कि भारत के मुसलमानों के लिए यह एक खुशी का क्षण है क्योंकि भाजपा और इसका सांस्कृतिक प्रतीक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी मुस्लिम औरतों की दशा सुधारना चाहते हैं.

ये निश्चित तौर पर इस बात का भी संकेत है कि एक दिन मुस्लिम पुरुषों की दशा में भी सुधार होगा.

क्या कहते हैं आंकड़े

लेकिन 2011 के भारत की जनगणना के आंकड़ों के सहारे किए गए थोड़े से शोध ने हमारी ख़ुशी छीन ली.

यह विश्लेषण निम्नलिखित सवाल उठाता है : क्या भारत में मुस्लिम औरतों की स्थिति सचमुच में उतनी ही ख़राब है जितनी मोदी सरकार, आरएसएस और इसकी संतानें दावा कर रहे हैं?

क्या मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाज़ुक स्थितिमें हैं- जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से दिए गए हलफनामे में बताया गया है?

और अपनी हिंदू, ईसाई और दूसरे धार्मिक संप्रदायों की औरतों की तुलना में उनकी स्थिति कैसी है?

चूंकि न तो सरकारी हलफनामे में, न ही प्रधानमंत्री के भाषण में इस दावे के पक्ष में कोई विश्वसनीय आंकड़ा पेश किया गया, इसलिए असली स्थिति जानने के लिए जनगणना के आंकड़ों पर नज़र डालना उपयोगी होगा.

हमने वास्तविक स्थिति जानने के लिए जनगणना के सी3 टेबल– ‘धार्मिक समुदायों और लिंग के हिसाब से वैवाहिक स्थिति-2011’ के आंकड़ों का विश्लेषण किया है.

हमारा मुख्य निष्कर्ष यह है कि भारत की मुस्लिम औरतों की स्थिति दूसरे धार्मिक समूहों की औरतों की तुलना में कहीं बेहतर नज़र आती है.

उदाहरण के तौर पर वैवाहिक संबंधों में रहने वाली औरतों का प्रतिशत सबसे ज़्यादा मुस्लिमों में 87.8 प्रतिशत है, जबकि हिंदुओं में यह 86.2 प्रतिशत, ईसाइयों में 83.7 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 85.8 प्रतिशत है.
विधवा औरतों का सबसे कम प्रतिशत मुसलमानों में 11.1 प्रतिशत है, जबकि हिंदुओं में यह 12.9, ईसाइयों में 14.6 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 13.3 प्रतिशत है.
इस बात की संभावना है विधवा पुनर्विवाह की संस्कृति मुस्लिम औरतों को दूसरे धार्मिक समुदायों की तुलना में ज़्यादा पारिवारिक सुरक्षा प्रदान करती है.
अलग की गईं और त्याग दी गईं (छोड़ी गईं) औरतों का सबसे कम प्रतिशत भी मुस्लिमों में (0.67 प्रतिशत) है, जबकि हिंदुओं में यह 0.69, ईसाइयों में 1.19 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 0.68 प्रतिशत है.
इसी जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मुस्लिमों और ईसाइयों में अपेक्षाकृत ज़्यादा औरतें तलाक़शुदा हैं- क्रमशः 0.49 प्रतिशत और 0.47 प्रतिशत.
अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में यह आंकड़ा 0.33 प्रतिशत और हिंदुओं में 0.22 प्रतिशत है. हिंदुओं में तलाक़ लेने की प्रथा का परंपरागत तौर पर अस्तित्व नहीं रहा है.
किसी भी उम्र में विवाह के बंधन में बंधने वाली कुल 34 करोड़ महिलाओं में 9.1 लाख तलाक़शुदा हैं और इनमें 2.1 लाख मुस्लिम हैं.
कुरान पाक़ में तलाक़ की प्रक्रिया स्पष्ट तौर पर लिखी गई है, जो कि तीन तलाक़ के खिलाफ है. विशेष परिस्थितियों में तीन तलाक़ अपवाद की तरह होते हैं न कि रिवाज़ की तरह. तलाक़ मनमर्जी का मामला नहीं है.

अलगाव और मेल-मिलाप की कोशिशों के नाकाम हो जाने के बाद पुरुष और स्त्री दोनों को एक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है जिसकी मियाद कम से कम तीन महीने (या तीन मासिक धर्म चक्र) की होती है.

इसके पीछे दो तर्क हैं : पहला तो यह कि अगर वाह औरत मां बन सकती है, तो यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह गर्भवती नहीं है. और अगर वह गर्भवती है, तो बच्चे की परवरिश का इंतज़ाम किया जा सके.

दूसरा कारण है कि दोनों पक्ष रहने के लिए जगह की तलाश कर सकें और वे सड़क पर न छोड़ दिये जाएं. इसके अलावा पारदर्शी मेल-मिलाप के लिए, पति और पत्नी, दोनों के परिवारों से एक-एक मध्यस्थ को भी नियुक्त किया जाना चाहिए.

और आखिर बात, दोनों पक्षों को अलगाव के दौर में अपना कदम वापस लेने और शादी को बरकरार रखने का अधिकार दिया गया है.

आगे बात करें, तो इस्लाम दो तरह के तलाक़ की बात करता है- एक खुला’, जिसकी पहल पत्नी कर सकती है और दूसरा तलाक़जिसकी पहल पति कर सकता है.

तीन तलाक़ पति द्वारा पहल किए गए तलाक़ का एक रूप है. अगर पति अपनी बीवी को तलाक़ देता है, तो उसे बीवी को मेहर चुकाना अनिवार्य है.

मेहर निकाह के वक्त तय की गई वह रकम है जिसे दूल्हा, दुल्हन को अदा करने का वादा करता है, या अदा करता है. हर निकाह के इक़रारनामे में मेहर की रकम का साफ ज़िक्र होता है.

अगर बीवी खुला चाहती है, तो उसे मेहर पर से अपना हक़ छोड़ना पड़ता है क्योंकि निकाह को निरस्त करने की पहल उसकी तरफ से की गई होती है.

इस लेख के लेखकों ने इस्लामी न्यायशास्त्र में विशेषज्ञता रखने वाले और हैदराबाद शहर में खुला या तलाक़ को अंजाम देने का अख्तियार रखनेवाले दारुल कज़ा’ (पारिवारिक न्यायालय) के चार क़ाज़ियों से बातचीत की.

गौरतलब है कि निकाह कराने की शक्ति शहरभर में मौजूद कई क़ाज़ियों के पास होती है, लेकिन खुला या तलाक़ के मामले का निपटारा सिर्फ ये चार क़ाज़ी ही कर सकते हैं.

एक क़ाज़ी से पता चला कि पिछले सात वर्षों में उसके सामने तीन तलाक़के सिर्फ दो मामले आए. एक दूसरे क़ाज़ी, जो पिछले 15 वर्षों से फैसले दे रहे हैं, ने तलाक़ के 160 मामले निपटाए थे, जिनमें 130 खुला के मामले थे, 21 सामान्य तलाक़ के मामले थे और सिर्फ 9 मामले तीन तलाक़ के थे.

छोड़ी गई- परित्यक्त औरतों का हाल

हालांकि यह साबित करने के लिए पक्के आंकड़े नहीं हैं, लेकिन ज़बानी साक्ष्य बताते हैं कि तीन तलाक़ के मामले विरले होते हैं.

और ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण मामलों में जहां तीन तलाक़ की घटना घटी है, यह देखा गया है कि समुदाय के लोग पीड़ित के पक्ष में मजबूती से खड़े रहे हैं और उसे फिर से बसाने की कोशिश की है.

इसके अलावा, यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार वाले मामले के फैसले में पहले ही तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी ठहरा चुका है.

यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि तलाक़शुदा मुस्लिम औरतें इंडियन पीनल कोड के अलावा मुस्लिम वुमंस एक्ट और प्रोटेक्शन ऑफ़ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट (घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम), 2005 के तहत न्याय पा रही हैं.

इस पृष्ठभूमि में देखें, तो तीन तलाक़ को मुस्लिम महिला समुदाय के सशक्तीकरण के लिए बड़ा मुद्दा बनाने की आरएसएस, भाजपा और यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी की उत्सुकता कई सवालों को जन्म देती है.

इसकी जगह उन्हें समाज के हर हिस्से से ताल्लुक़ रखनेवाली 4.3 करोड़ विधवा महिलाओं की चिंता करनी चाहिए. उन्हें पुनर्विवाह करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए और/या उन्हें अपना जीवन चलाने के लिए कार्यक्रमबद्ध वित्तीय मदद मुहैया कराने की ओर ध्यान लगाना चाहिए.

भारत में तलाक़शुदा औरतों की संख्या भी दस लाख के करीब है, जिन्हें सामाजिक और सरकारी मदद की जरूरत है. इतना ही नहीं, अलग की गई और छोड़ी गई महिलाओं का मुद्दा भी तीन तलाक़ के मुद्दे से कहीं ज़्यादा गंभीर है.

पिछली जनगणना के मुताबिक भारत में कुल 23 लाख अलग की गई-परित्यक्त औरतें हैं, जो कि तलाक़शुदा औरतों की संख्या के दोगुने से ज़्यादा है.

20 लाख ऐसी हिंदू महिलाएं हैं, जिन्हें अलग कर दिया गया है या छोड़ दिया गया है. मुस्लिमों के लिए यह संख्या 2.8 लाख, ईसाइयों के लिए 90 हजार, और दूसरे धर्मों के लिए 80 हजार है.

एक़तरफा तरीके से अलग कर दी गई हर औरत का जीवन दयनीय है, भले ही वो राजा भोज की पत्नी हो या गंगू तेली की. उन्हें अपने ससुराल और मायके दोनों जगहों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

ससुराल वाले उनके साथ इसलिए नहीं आते, क्योंकि उनके बेटे ने उसे छोड़ दिया है और मायके में उनकी अनदेखी इसलिए होती है क्योंकि परंपरागत तौर पर उन्हें पराया धन समझा जाता है, जिसकी ज़िम्मेदारी किसी और की है.

वे फिर से शादी या परिवार शुरू नहीं कर सकतीं क्योंकि उन्हें कानूनी तरीके से तलाक़ नहीं दिया गया है. इनमें से ज़्यादातर सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन गुज़ार रही हैं.

साथ ही उनका दूसरों द्वारा उनके शोषण का ख़तरा भी बना रहता है. वे अपने पति के साथ रहना चाहती हैं, बस उनके बुलाने भर का इंतज़ार कर रही हैं.

43 वर्षों से अपने पति के साथ नहीं रह रहीं जशोदा बेन मोदी ने 24 नवंबर, 2014 को कहा था कि अगर वे एक बार भी मुझे बुलाएं तो मैं उनके साथ चली जाऊंगी’. लेकिन उनके पति ने कभी जवाब नहीं दिया. छोड़ी गई महिलाओं को भारत में पासपोर्ट बनवाने में भी दिक्कतें पेश आती हैं.

उदाहरण के तौर पर 2015 में जशोदाबेन ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनका आवेदन इस आधार पर ख़ारिज कर दिया गया था कि उनके पास न तो शादी का कोई प्रमाण-पत्र था न ही पति के साथ कोई साझा हलफनामा ही था’. उन्होंने इसके लिए काफी संघर्ष किया. आखिरकार उन्हें अपने पति के पासपोर्ट के ब्यौरे के लिए एक आरटीआई लगानी पड़ी.

जो भी तीन तलाक़ का भुलावा देकर मुस्लिम महिलाओं की हालत सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें देश की 24 लाख छोड़ दी गई औरतों की तकलीफों की भी जानकारी होनी चाहिए.

मोदी ने कहा कि धर्म और समुदाय के नाम पर हमारी मांओं और बहनों के साथ किसी किस्म का अन्याय नहीं होना चाहिए’.

क्या मोदी इन छोड़ी गई औरतों के सवाल को नहीं उठाएंगे, इस तथ्य के बावजूद कि इनमें सबसे ज़्यादा संख्या, करीब 19 लाख, हिंदू महिलाओं की है और उनकी तकलीफों की बात करने से कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने वाला?

(अबुसालेह शरीफ वाशिंगटन डीसी के यूएस-इंडिया पॉलिसी इंस्टीट्यूट में अर्थशास्त्री हैं. सैयद खालिद सेंटर फॉर रिसर्च एंड डेटाबेस इन डेवेलपमेंट पॉलिसी (सीआरडीडीपी), नई दिल्ली, में रिसर्च एसोसिएट हैं.)

Saturday, September 19, 2015

मेरा सवाल आपसे हैं, आपसे पूछ रहा हूँ.…


दोस्तों,
मैं 2013 से इस बारे में लिख रहा हूँ । अपने टीवी शो में बोल रहा हूँ । इस प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता रहता हूँ । मैंने सोचा था अब इस विषय पर नहीं लिखूँगा । आज आप सबके फोन आए तो लगा कि मैं अपनी बात फिर से रखूँ । मेरे ब्लाग क़स्बा की उतनी हैसियत नहीं है कि वो हर किसी के पास पहुँच जाए इसलिए हो सके तो आप मेरी बात आगे बढ़ा दीजियेगा । मैं अपनी बात का पर्चा छपवाऊँगा और आम लोगों में बाटूँगा । आप जानते हैं कि मैंने फेसबुक बंद कर दिया है । ट्वीटर पर लिखना बंद कर दिया है ।

मेरे कई दर्शकों ने सलाह दी कि आनलाइन गुंडागर्दी को दिल पर मत लीजिये । यह सब चलता रहता है । यह आपके सेलिब्रेटी होने की क़ीमत है । मैं सेलिब्रिटी नहीं हूँ और हूँ भी तो यह कब तय हो गया कि मुझे अनाप शनाप गाली खाली खानी पड़ेगी । मेरे परिवार और बच्चों तक को गाली दी जाएगी । मुझे क्यों गालियाँ और अनाप-शनाप आरोप बर्दाश्त करने चाहिए ? जब मैं कमज़ोर लोगों की तकलीफ़ बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो अपने साथ हो रही इस नाइंसाफी को क्यों बर्दाश्त करूँ । मुझे लगता है कि इस आनलाइन गुंडाराज के ख़िलाफ़ मुझे भी बोलना चाहिए और आपको भी । पूरी दुनिया में ऑनलाइन बुली यानी गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ हो रहा है, भारत में क्यों चुप्पी है ?

मुझे पता है कि इसका निशाना राजनेताओं और प्रवक्ताओं को भी बनना पड़ता है । प्रवक्ताओं ने इसे क्यों मंज़ूरी दी है ? पत्रकारों को ख़ासकर कई महिला पत्रकारों को गालियाँ दी गईं । ये कौन सा समाज है जो गालियों के गुंडाराज को स्वीकार कर रहा है । बीते दौर की गुंडागर्दी और इस गुंडागर्दी में क्या अंतर है ? मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन शिकार हो रहा है ? सोशल मीडिया में आए दिन किसी का भी चरित्र हनन हो रहा है ? कहीं से कोई कुछ भी बोल दे रहा है । वो क्या यूं ही हो जाता है । क्या यह संगठित काम नहीं है ।

आनलाइन गुंडाराज राजनीतिक संस्कृति की देन है । अब यह तमाम दलों की रणनीति का हिस्सा हो गया है लेकिन अफवाह फैलाना और बिना किसी तथ्य के किसी को बदनाम करना ये कब से मान्य हो गया । एक बात समझ लीजिये इस गुंडाराज को बढ़ावा देने में भले ही कई दल शामिल हैं और दलों के बनाए हुए असंख्य संगठन यह काम कर रहे हैं लेकिन मामला बराबरी का नहीं है । इसमें गुंडई उसकी चल रही है जिसकी ताकत ज्यादा है और जिसकी सत्ता पर पकड़ है । यह सारा मामला संसाधनों का है।

यह एक भयावह संस्कृति पसरती जा रही है और जिसे मोटी चमड़ी वाला मध्यमवर्ग, जिसकी सत्ता से साँठ गाँठ है , सहन कर रहा है और दूसरों को सहने की सलाह देता है । इस खेल ने सत्ता का काम आसान कर दिया है । इस ग्लोबल जगत में सरकार पर आँच न आए इसलिए गुमनाम संगठन या दलों के आनलाइन मीडिया सेल के इशारे पर यह काम हो रहा है । ऐसे पेश किया जाता है जैसे समाज शामिल है । किसी के पक्ष और विपक्ष में ट्रेंड कराना भी राजनीतिक गुंडई है ।

लिखने बोलने वाले लोग और कई लड़कियाँ शिकायत करती हैं कि वो गालियों के डर से नहीं लिखतीं । कई लोग डरने लगे हैं । लड़कियों को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसी भाषा और प्रतीकों के दम पर मर्द उन्हें इस जगह से भी बेदख़ल कर देना चाहते हैं । अगर ये जारी रहा तो मेरी दोस्तों आप जिस पद पर जितनी बार पहली महिला बन जाओ लेकिन इस बेदख़ली से आपको वहीं पहुँचा दिया जाएगा जहाँ से आप चली थीं । सोशल मीडिया रचनात्मक, अनौपचारिक और मौजमस्ती की जगह है , यहाँ नेताओं ने घुस कर विरोधियों को खोजना पहचानना शुरू कर दिया है । बचाइये इस सोशल मीडिया को ।

लोकतंत्र के नाम पर सोशल मीडिया के पब्लिक स्पेस में माँ बहन की गालियाँ दी जा रही हैं । इन नेताओं ने ऐसा क्या कर दिया है कि सब चुप हैं । गली मोहल्लों के गुंडों से परेशान लड़कियाँ और महिलाएँ जो इस मुल्क का भविष्य हैं, आनलाइन गुंडागर्दी क्यों सहन कर रही हैं ? क्या हमारे नौजवान लड़के अपने आस -पास पनप रही ऐसी संस्कृति के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेंगे ? वे क्यों चुप हैं ? जो कमज़ोर है उसके लिए इस संस्कृति में कहाँ जगह बचेगी ?

यह एक रणनीति है । तर्क या तथ्य की गुज़ाइश खतम कर दो और धारणा बनाओ, बदनाम करो । प्रचार और प्रोपेगैंडा से धारणा बना दो । हम एक ऐसी जानलेवा भीड़ को मान्यता दे रहे हैं जिसकी चपेट में बारी बारी से सब आने वाले हैं । आप इसके ख़तरों को समझना चाहते हैं तो अमरीका की मोनिका लेविंस्की के अनुभव को इंटरनेट से निकाल कर पढ़ लीजिएगा । आनलाइन बुली कुछ और नहीं सिर्फ गुंडाराज है । क्या हम जवाबदेही से बहस का माहौल नहीं बना सकते ।

मीडिया में समस्या है । वो समस्या व्यक्ति की है और संस्था की भी । आप व्यक्ति को गाली देकर संस्था के सवाल को नकार नहीं सकते । उन सवाले के जवाब पत्रकार के पास नहीं हैं । वो कब तक देता रहेगा । लोग फिर क्यों उस कारोपोरेट के ख़िलाफ़ चुप रहते हैं जिनके हाथ में मीडिया है और जो नेता के साथ बैठकर विकास बन जाता है और उसके मीडिया में काम करने वाला पत्रकार दलाल हो गया ? ये किस तराज़ू पर तौल रहे हो भाई । तंत्र देखो, व्यक्ति नहीं ।

मैंने पहले भी कहा है कि इस सवाल पर खुल कर बहस हो । वे कौन से पत्रकार हैं जो राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्य बने और अख़बार और चैनल भी चलाते हैं ? वे कौन से पत्रकार हैं जो दो दलों में शामिल होने के बीच भी संपादक बन जाते हैं ? ये कैसे स्वीकृत हो जाते हैं ? मीडिया पर राजनीतिक नियंत्रण आपके लिए मुद्दा क्यों नहीं है ? ऐसे लोगों के साथ तो नेता मंत्री खूब नज़र आते हैं तब ये गाली देने वाले गुंडे किधर देख रहे होते हैं । पार्टियाँ बतायें कि उनके भीतर कितने पत्रकार शामिल हैं ? पत्रकारिता में संकट है तो उसके लिए दो चार को गाली देने से क्या होगा ।

मेरे काम का भी हिसाब कीजिये । निकालिये मेरी एक एक रिपोर्टिंग और उसकी आडिट कीजिए । मैं नालियों और गलियों के किनारे कांग्रेस या बीजेपी के फ़ायदे नुक़सान के लिए नहीं गया । लोगों के लिए गया । चैनल चैनल बदलकर अपने होने की क़ीमत नहीं वसूली । काम ही किया । जितना कर सकता था किया । मुझे सफाई नहीं देनी है । मुझे आपका पक्ष जानना है ?

मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे कोई यह लिखे कि वो मेरी लाद फाड़ देना चाहता है । मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है कि मैं गाली सुनूँ और आप या समाज सुनने सहने की सलाह दें । आप उनसे लड़िये जो गुंडाराज की सेना तैयार कर रहे हैं । मेरे बारे में अनगिनत अफ़वाहें फैलाई गईं हैं । आप मेरी नहीं अपनी चिन्ता करें क्योंकि अब बारी आपकी है । आप सरकारों का हिसाब कीजिये कि आपके राज में बोलने की कितनी आज़ादी है और प्रेस भांड जैसा क्यों हो गया है ?

यह मज़ाक़ का मसला नहीं है । मैं जानना चाहता हूँ कि समाज का पक्ष क्या है ? मैं आम लोगों से पूछने जा रहा हूँ कि आप इसके ख़िलाफ़ बोलेंगे या नहीं ? आप मीडिया के आज़ाद स्पेस के लिए बोलेंगे या नहीं ? आप किसी पत्रकार के लिए आगे आएँगे या नहीं ? अगर नहीं तो मैं युवा पत्रकारों से अपील करता हूँ कि वे इस समाज के लिए आवाज़ उठाना छोड़ दें । यह समाज उस भीड़ से मिल गया है । यह किसी भी दिन आपकी बदनामी से लेकर हत्या में शामिल हो सकता है ? पत्रकारों ने हर क़ीमत पर समाज के लिए लड़ाई लड़ी है, बहुत कमियाँ रही हैं और बहुतों ने इसकी क़ीमत भी वसूली लेकिन मैं देखना चाहता हूँ कि समाज आगे आता है या नहीं ।

अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब मैंने खुलेआम दर्शकों से एक बात कही थी । आज के बाद से आप नागरिक बन जाइये । अब आप मतदाता नहीं है । अपनी चुनी हुई सरकार को लेकर सख्त हो जाइये । तटस्थ हो जाइये और किसी का फैन मत बनिये । क्योंकि फैन लोकतंत्र का नया गुंडा है जो विरोध और असहमति की आवाज़ को दबाने के खेल में साझीदार बनता है।

आपका
रवीश कुमार 

Saturday, November 23, 2013

साहेब और युवती के बीच थे अवैध संबंध



लड़की का पीछा क्यों करवाया गया, इसकी कहानी एक मिस्ड काल से शुरू हुई। यह मिस्ड कॉल साहब के पर्सनल नंबर पर आई थी। इसके बाद से ही इस युवती के फोन को  2009 में दो महीने तक अवैध रूप से सर्विलांस पर रखा गया। कांग्रेस अब इस मामले में मोदी को पूरी तरह से घेरने में जुटी है और इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी जज से कराने की मांग कर रही है। माना जा रहा है कि जासूसी का यह खेल मोदी के लिए भारी पड़ सकता है, क्योंकि तमाम मानवाधिकार संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस तरह की जासूसी को निजता का उल्लंघन माना है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों न्यूज पोर्टल कोबरा पोस्ट और गुलेल ने गुजरात के राज-काज के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए गुजरात के पूर्व गृहराज्यमंत्री अमित शाह और आईपीएस अफसर जीएल सिंघल की टेलीफोन पर हुई बातचीत की रिकार्डिंग पे्रस के सामने पेश की। वेबसाइट ने इस जासूसी कांड को गैरकानूनी मानते हुए कहा कि गुजरात के पूर्व गृहमंत्री और मोदी के खास अमित शाह ने सिंघला को एक लड़की की 24 घंटे निगरानी का आदेश दिया, ताकि किसी साहब को उसके बारे में पल-पल की जानकारी दी जा सके। अमित शाह से बातचीत की यह रिकार्डिंग खुद सिंघला ने सीबीआई को सौंपी है। कांग्रेस ने इस मामले की गहराई से जांच की मांग की है। वहीं भाजपा ने पूरे मसले पर चुप्पी साध ली है।

आइए, इस जासूसी कांड के कुछ रोचक तथ्यों पर नजर डालें। मिली जानकारी के मुताबिक, 62 दिनों तक चले इस सर्विलांस में गुजरात के आठ बड़े पुलिस अधिकारी शामिल थे। इस पूरी कार्रवाई की कमान आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल के हाथों में थी। सिंघल को उस समय अमित शाह के बेहद करीब थे। हालांकि उसके बाद दोनों के रिश्ते बिगड़ गए। अमित शाह और जीएल सिंघल दोनों राज्य में हुए दो अलग-अलग फर्जी एनकाउंटरों के मामले में आरोपी हैं और फिलहाल बेल पर बाहर हैं। अमित शाह जहां सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के आरोपी हैं, वहीं सिंघल पर इशरत जहां एनकाउंटर मामले में आरोप लगाए गए हैं। सिंघल ने शाह से अपनी नजदीकी के बावजूद उनसे हुई बातचीत की कुछ रिकार्डिंग्स भी अपने पास रख ली थी। इस साल जून में सिंघल ने इस बातचीत के 267 रिकार्डिंग्स सीबीआई को सौंप दी।

कोबरा पोस्ट से मिली जानकारी के मुताबिक, 2005 में पहली बार साहब से युवती की मुलाकात हुई। इस युवती ने भूकंप प्रभावित भुज में सरकारी पुनर्निर्माण के प्रयासों के तहत एक हिल गार्डन डिजाइन किया था। दोनों की मुलाकात तत्कालीन जिलाधिकारी प्रदीप शर्मा ने कराई थी। साहेब ने इस युवती को अपना पर्सनल मोबाइल नंबर भी दे रखा था, जिस पर साहेब और युवती की अक्सर बातें होती थीं। एक दिन युवती ने भुज के अपने कलक्टर मित्र प्रदीप शर्मा को साहेब के साथ चल रहे संबंध से संबंधित कॉल्स और मैसेज को दिखला दिया। शर्मा ने उस साहब का नंबर सेव कर लिया। बाद में युवती और साहब के बीच कुछ नजदीकी रिश्तों को लेकर अनबन शुरू हो गई और युवती परेशान रहने लगी। साहब चाहते थे कि भले ही हम दोनों के बीच में संबंध कुछ और हो, लेकिन सार्वजनिक तौर पर यह दिखे कि साहब युवती को बेटी की तरह मानते हैं। युवती की परेशानी जानने के बाद कलक्टर शर्मा ने साहब के सेव नंबर पर काल लगा दी। काल उठाया तो नहीं गया, लेकिन इस मिस्ड कॉल से साहब को संदेह हो गया कि आखिर उनका पर्सनल नंबर किसके पास है। कॉल डीटेल्स में शर्मा का नाम सामने आ गया। इस मिस्ड कॉल के बाद से ही युवती और साहब के संबंधों का समीकरण बदल गया। शर्मा के फोन पर नजर रखी जाने लगी और यह बात सामने आ गई कि शर्मा और यह युवती बराबर संपर्क में रहते थे। सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद ही अमित शाह ने इस युवती पर सर्विलांस लगाने का आदेश दिया।

कोबरापोस्ट और गुलेल के मुताबिक, कुछ ही दिनों बाद प्रदीप शर्मा को उनकी हरकत का दंड मिल गया। उनके खिलाफ गुजरात सरकार ने आपराधिक मामलों में चार शिकायतें दर्ज कराई हैं। शर्मा को सस्पेंड कर दिया गया और फिर वह गिरफ्तार भी कर लिए गए। 62 दिनों तक चला सर्विलांस का सिलसिला तब खत्म हुआ, जब इस युवती ने शादी कर गुजरात छोड़ने का फैसला किया। अब राजनीति गरमाने के बाद भाजपा इस पूरे प्रकरण में लीपापोती करने में जुट गई है। भाजपा के दबाव में युवती के पिता ने कहा है कि गुजरात के मुख्यमंत्री से उनके पारिवारिक संबंध हैं और उन्होंने ही मुख्यमंत्री से अपनी बेटी का खयाल रखने का निवेदन किया था। उनकी बेटी बेंगलुरू से अहमदाबाद आई थी और उसे अपनी मां के इलाज के सिलसिले में बाहर निकलना पड़ता था। गुजरात के मुख्यमंत्री और उनकी बेटी का रिश्ता बाप-बेटी की तरह था। भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कोबरापोस्ट और गुलेल के खुलासों को खारिज करते हुए कहा है कि इस पूरे मामले के पीछे कांग्रेस की गंदी राजनीति है, लेकिन कांग्रेस के महिला युवा प्रकोष्ठ ने अमित शाह और इस पूरे मामले की जांच की मांग की है। जयंती नटराजन ने कहा है कि इन खुलासों से वह दुख, आश्चर्य, गुस्सा और शर्म महसूस कर रही हैं।

अब डर है कि इस जासूसी कांड में कहीं उस युवती की जान न चली जाए। अपने फायदे के लिए राजनीति में कुछ भी संभव है। कांग्रेस भी इस मामले को आगे बढ़ाने में रुचि रखेगी और भाजपा किसी तरह से साहब को बचाने में लगेगी। इस पर पर्दा डालने और पर्दा हटाने के खेल में सबसे अहम सवाल है कि कहीं उस युवती की जान खतरे में न पड़ जाए।

Wednesday, June 12, 2013

मेरी इनकम्प्लीट फैमिली...

 
जिस तरह भारत में ज़िंदा रहने के लिए विवाह करना जितना अनिवार्य है, ठीक उसी प्रकार विवाह होने के उपरान्त बच्चा पैदा करना उतना ही अनिवार्य है. आपको कोई कुंवारा रहने नहीं देगा और शादी के बाद बिना बच्चे के जीने नहीं देगा.
pregnent-women
इधर पिछले कुछ वर्षों से समाज में दो तरह के लोग आपसे टकराते हैं, एक वे हैं जो पहली संतान के विषय में बेधड़क होकर कहते हैं ' पहला बच्चा कोई भी हो चलेगा.' कोई भी से मतलब यह न निकाला जाए कि चूहा, बिल्ली या कोई भी जानवर पैदा हो जाए और ये उसे अपना लेंगे. कोई भी का मतलब यहाँ लड़की से होता है. ये बहुत बड़े दिल वाले होते हैं. ऐसे लोगों की वजह से ही शायद संसार में लड़कियों का जन्म हो पाता है.
दूसरे वे लोग हैं जो ज़िंदगी में किसी भी प्रकार का रिस्क नहीं लेते. ' पहला तो लड़का ही होना चाहिए, दूसरा चाहे कोई भी हो जाए.' यहाँ भी कोई भी का मतलब कीड़ा-मकौड़ा, पक्षी या जानवर नहीं बल्कि लडकी से ही है. ऐसे लोग शुरू में भले ही परेशान हो लें, लेकिन बाद में स्वयं को सुखी महसूस करते हैं.
ये दूसरी तरह के लोग बड़े ही स्मार्ट किस्म के होते हैं. इधर स्त्री ने गर्भधारण किया नहीं, उधर अल्ट्रासाउंड सेंटरों की खोज में आकाश -पाताल एक कर देते हैं. इन सेंटरों में, जहाँ बाहर से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है 'गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण करना कानूनन अपराध है' और अन्दर सब जगह अलिखित रूप से लिखा रहता है 'यहाँ ये अपराध इत्ते रुपयों में खुशी-खुशी किया जाता है'.
अगर आपकी पहली लडकी है और आप दूसरी संतान की इच्छा रखती हैं और कई साल बाद दोबारा गर्भधारण करतीं हैं तो समाज में बड़ी ही विचित्र परिस्थितियाँ जन्म लेने लगती हैं. आपसे मिलने आने वाली आपकी हर मित्र, रिश्तेदार या किसी भी पड़ोसी महिला को जाने किस गुप्त विधि से यह पता होता है कि आपके गर्भ में निश्चित रूप से लड़का है. सिर्फ आपको ही नहीं पता होता बाकी सबको पता होता है. कह सकते हैं 'जाने तो बस एक गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है.’ आप उन्हें कितना ही यकीन दिलाने की कोशिश करें कि वाकई आपको बच्चे का लिंग नहीं पता या आपने डॉक्टर पूछने की ज़रुरत ही नहीं समझी है, उन्हें किसी भी सूरत में यकीन नहीं होता है. आपकी हर कोशिश को काटने के यन्त्र इनके पास मौजूद रहते हैं.
वे फ़ौरन पूछती हैं ‘अल्ट्रासाउंड नहीं करवाया क्या?' आप कहेंगी ‘सात या आठ बार करवाया है’ ,'तब झूठ क्यूँ बोल रही हो कि नहीं पता’ अगर आप कहती हैं ‘वह तो बस बच्चे की ग्रोथ जानने के लिए डॉक्टर ने करवाए थे.’ किसी भी सूरत में वे इस बात को नहीं मानतीं कि अल्ट्रासाउंड गर्भ में पल रहे शिशु का विकास देखने के लिए भी किया जाता है. वे चुनौती देने लगतीं हैं ‘हम भी देख लेंगे जब लड़का होगा, अभी देखो कितनी एक्टिंग कर रही है, जैसे की हमें कुछ पता नहीं. इतने साल बाद क्यों याद आई दूसरे बच्चे की.’ कैसी आश्चर्य की बात है कि वे आपसे ज्यादा बेसब्री से आपके होने वाले बच्चे का इंतज़ार करने लगतीं हैं कि लड़का हो और वे आपसे खुलेआम कह सकें ‘हमने तो पहले ही कहा था, ऐसा कौन बेवकूफ होगा जिसकी पहली लडकी हो और उसने दूसरे बच्चे का लिंग नहीं पता किया हो.’
तब आपको अपने आसपास के अनेक लोग याद आने लग जाते हैं, जिनकी पहली संतान लड़की है और जो साल में दो-तीन बार प्राइवेट नर्सिंग होम्स के चक्कर काटते हैं और शिकायत करते हैं’ बहुत परेशान हैं, पता नहीं क्या हो गया, दूसरा बच्चा नहीं हो रहा, कितना ही इलाज करा लिया’ अगर आप उन्हें किसी इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट का पता बताती हैं तो वे आपकी बात पर बिलकुल ध्यान नहीं देते हैं. यह बाद में पता चलता है कि दरअसल इलाज से उनका मतलब गर्भपात से और दूसरे बच्चे से उनका मतलब सिर्फ और सिर्फ लड़के से होता है, जो न जाने कितनी गर्भपात के बाद भी पैदा होने का नाम ही नहीं लेता.
धर्मसंकट शायद इसे ही कहते हैं कि परिवार भी छोटा रखना है और फैमिली भी कम्प्लीट होनी चाहिए. ये वही पहले प्रकार के लोग होते हैं जो कहते थे ‘पहला कुछ भी चलेगा.’ अब ये लोग अपने पुराने निर्णय पर पछताते और हाथ मलते हैं कि काश! पहली बार में ही लिंग का पता कर लिया होता.
इधर आपके पेट का आकार बढ़ने लगता है और उधर आपके आसपास समाज में मौजूद कई तरह की चलती-फिरती अल्ट्रासाउंड मशीनें सक्रिय होने लगती हैं. कोई आपके पेट का आकार देखकर लड़का पैदा होने की भविष्यवाणी करेगी तो कोई चेहरे की रंगत देखकर. कोई आपसे कैटवॉक करवाके आपके चलने के अंदाज़ से जान लेती है तो कोई पहली लड़की के सिर के बालों के बीचोंबीच में पड़ने वाले भंवर को देखकर अनुमान लगा लेती है. एक आध मशीनें तो इतनी ज्यादा बेतकल्लुफ हो जाती हैं कि आपकी नाभि का आकार तक देख लेती हैं, उनके अनुसार इसके संकुचन की दिशा से एकदम सटीक अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
गौर करने वाली बात ये होती है कि सारी की सारी भविष्यवाणियाँ सिर्फ लड़के के लिए होती हैं. मौसम वैज्ञानिकों ने शायद इस बाद का अध्ययन नहीं किया होगा कि लड़का होने का भी एक मौसम होता है जिसके द्वारा ये मशीनें आने वाले बच्चे के लिंग का पूर्वानुमान कर लेती हैं. खट्टा या मीठा खाने की इच्छा उगलवाकर हर दूसरी औरत भविष्यवक्ता होने का दावा पेश कर देती है.
अगर इन मशीनों के सामने आपके मुंह से निकल गया ‘लडकी भी तो हो सकती है’ फ़ौरन आपके मुंह पर हाथ रख दिया जाएगा ‘शुभ-शुभ बोलते हैं. ऐसा नहीं कहते. कहते हैं दिन भर के चौबीस घंटे में से एक बार माँ सरस्वती जुबान पर बैठती है, अतः इन दिनों हमेशा शुभ-शुभ बोलना चाहिए.’ माँ सरस्वती! आप सब सुनतीं हैं न?
जैसे-जैसे आपके दिन बढ़ते जाते हैं आपकी शुभचिंतक महिलाएं, जो आपकी बेहद करीबी होती हैं, जिन्हें आप तर्क के द्वारा नहीं हरा सकती हैं, आपके घर में तरह-तरह के श्लोक, भांति-भांति के भगवानों की स्तुति, चालीस प्रकार की चालीसाएँ, सैकड़ों प्रकार के सहस्त्रनामों की फोटोकॉपी पहुँचाने में जुट जाते हैं. इन सब का एक ही निचोड़ होता है कि इन सबके द्वारा आपको अवश्य ही पुत्ररत्न प्राप्त होगा. आपके सिरहाने मन्त्र चिपका दिए जाते हैं, ताकि आप सुबह-शाम, दिन-रात उक्त मन्त्र का जाप करते रहें.
ऐसे बाबाओं के पते जिनके आशीर्वाद से सिर्फ लड़का ही होता है, आपके हाथ में छोटी सी पुर्ची बनाकर थमा दिए जाते हैं. गंडे, ताबीज लौकेट से अलमारियां भरने लगती हैं. इनके भोलेपन पर तरस भी आता है. अगर आप कह बैठेंगी कि ‘बच्चे का लिंग तो कब के बन चुका होगा अब क्या फायदा इन्हें जापने का.’ तब भी ये हार नहीं मानतीं और कहती हैं ‘चमत्कार भी तो कोई चीज़ होती है.’ इस चमत्कार को वाकई नमस्कार करने का मन करता है.
कभी-कभी आप सोचने लग जाती हैं कि शायद लोग झूठ बोलते हैं या दुनिया की सारी रिसर्चें फर्जी होती होंगी, जो ये कहती हैं कि बच्चा गर्भ में सब कुछ सुनता है, महसूस करता है. इतनी साजिशों को जानने के बाद तो कोई भी लडकी भगवान को अर्जी देकर गर्भ में ही अपना लिंग परिवर्तन करवा ले। इतने षड्यंत्र इसी पृथ्वी पर रचे जातीं हैं ताकि दूसरी लडकी पैदा न हो पाए, उस पर भी लडकियां पैदा हो ही जाती हैं. लड़कियों के अन्दर वाकई बहुत जिजीविषा होती है.
अगर आपकी डॉक्टर से आपकी आत्मीयता स्थापित हो गयी गई है, जो कि पर्याप्त महँगा इलाज करवाने की मजबूरी के कारण हो ही जाती है, तो वह भी आपको हिंट देने से पीछे नहीं हटेगी. तीसरे महीने के अल्ट्रासाउंड के बाद वह हँसते-हँसते कह ही देती है ‘लड़का भी ज़रूरी है आजकल. करिश्मा कपूर को देख लो, इतने साल बाद हुआ न बेटा.’ इसी तरह से दो-तीन और अभिनेत्रियों के नाम वह आपके सामने रखती है. वह चाहती है कि आप बच्चे का लिंग पूछे और वह अपनी फीस बताए. आप नहीं पूछतीं तो वह मन मसोसकर चुप हो जाती है.
अनुमानों की बारिश के जीभर के बरसने के बाद आपका नौ महीने का समय पूरा हो जाता है. अस्पताल जाने की तैयारियां पूरी कर ली जातीं हैं. एक बार फिर आपके द्वारा लगाई गयी अटैची को दोबारा खोल कर रखे गए कपड़ों के आधार पर बच्चे का लिंग जानने की अंतिम कोशिश की जाती है. अगर आप आधे कपडे लड़के के रखती हैं, और आधे लड़कियों के, तो ही इनके दिल को तसल्ली होती है कि वाकई आप सच बोल रही थीं. फिर अस्पताल जाने तक सांत्वना देने का अनवरत क्रम चलता रहता है ‘सब अच्छा होगा, देखना पक्का लड़का ही होगा.’
ऑपरेशन की टेबल पर ले जाने से पाहिले आपका चेकअप डॉक्टर की असिस्टेंट द्वारा किया जाता है. वह पूछती है ‘पहला बच्चा क्या है?’ आप उत्तर देती हैं ‘बेटी है' फिर उसका जवाब आता है ’एक लडकी है, दूसरा लड़का हो जाता तो फैमिली कम्प्लीट हो जाती’ उसी डॉक्टरजिसके यहाँ घुसते ही बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ टंगा रहता है ‘आप जिस डॉक्टर से परामर्श के लिए कतार में बैठे हैं वह भी किसी की बेटी है, अतः गर्भस्थ शिशु लड़का है या लडकी यह पूछने से पहले सोचें.’
आपके ताबूत में आख़िरी कील तब लगती है जब डॉक्टर द्वारा आपका पेट चीर के बच्चे को बाहर निकाला जाता है और बताया जाता है ‘बधाई हो, लक्ष्मी आई है.’ फिर तुरंत दूसरा प्रश्न गोली की तरह छूटता है ‘पहला बच्चा क्या है आपका?’ आप एनस्थीसिया का इंजेक्शन लगा होने के कारण अर्धनिद्रा में होती हैं और धीमे से कहतीं हैं ’ बेटी है’ वो सुनती हैं ‘बेटा है’ और सुनकर कहती हैं ‘एक बेटा और एक बेटी हो गए। चलो फैमिली कम्प्लीट हो गयी.’
कम्प्लीट सुनते ही आपकी सुप्त हो गयी चेतना वापिस आ जाती है. आप कहतीं हैं ‘बेटी है पहली’ वो तुरंत बात पलट देती हैं ‘कोई बात नहीं, आजकल तो लड़का-लड़की सब बराबर हैं, फिर भी अगर इच्छा होगी तो दो साल बाद आ जाना.’ यह सुनते ही वापिस आई हुई चेतना फिर से लुप्त हो जाती है.
ऑपरेशन के बाद आपको कमरे में शिफ्ट किया जाता है. आपके साथ मौजूद घरवालों को कोई बधाई का एक शब्द तक नहीं कहता. आपके पति द्वारा तैयार किये गए सौ-सौ के नोट जेब में ही फड़फड़ाते रह जाते हैं. अस्पताल का कोई भी कर्मचारी शगुन नहीं मांगने आता. सफाई करने वाली बेहद गरीब औरत भी इतनी स्वाभिमानी निकलती है कि आपके घर में दूसरी लड़की होने के बोझ को जानकार आपसे एक पैसा भी नहीं मांगती.
वहीँ दूसरी और आपके बगल के कमरे में लड़का हुआ होता है और वहां मांगने वालों का तांता लगा हुआ होता है. अस्पताल के सभी कर्मचारी वहां से वसूली करके आते हैं. इधर आपके द्वारा सबसे महंगी दुकान से मंगवाई गयी मिठाइयां पड़े-पड़े सूख जाती हैं. ऐसा लगता है जैसे पूरा अस्पताल एकाएक डायबिटीज़ की गिरफ्त में आ गया हो. पेट की ताज़ा-ताज़ा सिलाई से उठने वाला दर्द पीड़ा नहीं देता, लेकिन अब दिल पर लगे हुए घाव एकाएक टीस देने लगते हैं. आपको लगता है जैसे ज़माना फिर से सौ बरस पीछे चला गया.
आप घर आती हैं. अब तक सबको खबर हो चुकी होती है. लोग आने लगते हैं. बधाई के शब्द सांत्वना की चाशनी में लपेटकर आपके सामने परोसे जाते हैं. बहाने-बहाने से आपकी आँखों में झांका जाता हैं कि कहीं से तो शायद एक कतरा दुःख का गिरे तो वे लपक लें और अपने सांत्वना के शब्द जो उन्होंने बीते कई दिनों से सहेज रखें हैं, आपके सामने उगल दें. आपके कंधे पर अपना हाथ रखकर दुःख प्रकट करें. अगर आप ऐसा कुछ भी नहीं करतीं तब भी वे रह नहीं पातीं, बैचैन होकर अपने दिल की बात कह ही डालतीं हैं, ‘कोई बात नहीं, अगली बार लड़का हो जाएगा, अभी कौन सी उम्र चली गयी है. तीन ऑपरेशन तो आजकल साधारण बात हैं.’
आप अगर कह दें ‘तीसरी बार कि क्या गारंटी है ‘लड़का ही होगा’ वे कहती हैं ‘नहीं अबकी ज़रूर लड़का होगा.’ ऐसे कई उदाहरण आपके सामने फिर से प्रस्तुत किये जाते हैं, जिसमे तीसरी बार में जाकर लड़का हुआ. इस दृढ़ विश्वास पर कौन न कुर्बान हो जाए.
आपके गले में बहादुरी का तमगा पहनाया जाता है. आप हिम्मती ठहराई जाती हैं. हकीकत में देखा जाए तो आप बहुत कमज़ोर किस्म की होतीं हैं. ह्रदय बहुत नाज़ुक होता है. गलत काम पर करने पर ऊपरवाले से डरती हैं. हिम्मती तो वे होतीं हैं जो साल में दो बार गर्भपात करवाती हैं, शरीर पर इतना ज़ुल्म सहती हैं, और चूं भी नहीं करतीं. कर्म प्रधान होने के कारण न भाग्य से और न ही भगवान से डरती हैं.
घर में ऐसी कई महिलाएं कई दिनों तक आती रहती हैं, आप इन्हें चाय पिलाती हैं और ये आपको लड़के की अनिवार्यता के विषय में लेक्चर पिलाती हैं. इनमें से कई महिलाएं एक ही शहर में अपने सास और ससुर से अलग घर लेकर रहती हैं. कई के सास-ससुर बुढापे में अपना खाना आप ही बनाते हैं. इकलौते लड़के हालचाल पूछने तक नहीं जाते. लड़का न हो पाने की सांत्वना तो वह भी देती है, जो रोज़ मौका ढूंढती है और पहला मौक़ा लगते ही सास-ससुर से अलग हो जाना चाहती है.
सबसे ज्यादा अफ़सोस तब होता है जब वह भी आपको पुत्र के ज़रूरी होने की बात कहती है, जिसका खुद का लड़का साल में छह महीने मानसिक अस्पताल में भर्ती रहता है. जब घर में रहता है उसे आए-दिन मारता रहता है. पति बीस साल पहले घर छोड़कर चला गया था, जिंदा भी है या मर गया उसे नहीं मालूम, लेकिन वह उसके नाम के सिन्दूर से मांग भरना एक दिन भी नहीं छोड़ती है.
इसके कई दिन बाद तक कई तरह के रहस्योद्घाटन आपके सामने होते रहते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं- दूसरी लड़की होने का मतलब है आपका पढ़ा-लिखा होना बेकार है. पढ़े-लिखे लोग ऐसी गलती नहीं करते. अब भुगतो सारी ज़िंदगी दूसरी लड़की को. आपसे तो अच्छे कम पढ़े-लिखे लोग होते हैं. धिक्कार है आपकी डिग्रियों को. इनको पहली फुर्सत में आग लगा देनी चाहिए.
दूसरी लड़की पूर्वजों के अभिशाप की वजह से होती है. अगर आपने अपने अपने माँ-बाप की इच्छा के विरूद्ध विवाह किया है तो भगवान् आपको दंडस्वरूप दो लड़कियां देता है.
लड़कों की उत्पत्ति अनिवार्य रूप से जबकि लड़कियों की उत्पत्ति अपने कन्यादान के शौक को पूरा करने के लिए होनी चाहिए. जो कन्यादान करता है वह अपनी सारी ज़िंदगी किसी भी भिखारी या मांगने वाले को कुछ भी न दे तो भी चलेगा. ऊपरवाला उसे कोई सजा नहीं देता, क्योंकि वह भविष्य में कन्यादान नाम का महादान करेगा.
बाज़ार में सुन्दर-सुन्दर कपडे सिर्फ़ लड़कियों के लिए मिलते हैं, इसलिए एक लड़की तो होनी ही चाहिए. बाज़ार में लड़कियों के डिज़ाईनर कपडे नहीं मिलते, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हालत कितनी खराब होती. लड़कियां भाई को राखी बाँधने के काम आती हैं. अच्छा हुआ कि भारतवर्ष में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है. सोचिये, अगर भारतवर्ष त्योहारों का देश न होता तो कितनी बुरी दशा होती लिंगानुपात की.
अगर पहली लड़की हो तो दूसरी बार भगवान् पर भूलकर भी भरोसा नहीं करना चाहिए. हाँ, लिंग परीक्षण करवाने के उपरान्त गर्भपात सही-सलामत हो जाए, इसके लिए भगवान् को हाथ ज़रूर जोड़कर जाना चाहिए.फैमिली हर हाल में कम्प्लीट होनी चाहिए, इसके लिए गर्भपातों की संख्या याद करना बंद कर देना चहिए.
'कम्प्लीट फैमिली' का मतलब सिर्फ चार लोग माँ, बाप एक लड़का एक लड़की होता है. कम्प्लीट फैमिली में दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ या कहें कि किसी भी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं आता. इस लेख की प्रेरणास्रोत, मेरी दूसरी बेटी पूरे दो साल की हो गयी है. उसे जीभर के आशीर्वाद और शुभकामनाएँ दीजिये.

लेखिका : शेफाली पांडे पेशे से शिक्षक हैं.