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Friday, August 30, 2013

टेंशन लेने का बिलकुल नहीं बापू सा....!


चिंता को नी करो बापू सा....पहले भी आप ही के आश्रम के दो बच्चों की मौत का झूठ आरोप लगा कर आपको बदनाम किया था, क्या हुआ ? कुछ नहीं ना ! सो अब इस बार आपको नाबालिग बच्ची से बलात्कार के झूठे आरोप लगा बदनाम कर रहे हैं, आपके पुत्र महोदय भी कह रहे थे कि मानसिक बीमार बच्ची है...उसका क्या. ? उस बेचारी को  क्या पता कि यौन अपराध क्या होता है, या बलात्कार क्या होता है ? शायद उस नाबालिग बच्ची का पिता भी पागल है जो अपनी बिटिया की इज्ज़त पूरे देश में उछालता  फिर रहा है...? या फिर शायद कोई षड्यंत्र ? आप ही कह रहे थे ना कि किसी मेडम का किया धरा है, क्या करें शायद मेडम को कोई और काम भी तो नहीं है, आप से बड़ा राह का काँटा शायद ही कोई और हो उनके लिए,  इसी लिए शायद आपके दरवाज़े पर राजस्थान पुलिस 7 घंटे समन देने के लिए बैठी रही ? और शायद इसी लिए आप को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया, सिर्फ पूछताछ के लिए ही बुलाया है ? वो भी घटना घटित होने के इतने दिन बाद ! अब जब आपसे लोग पालिटिकल बदला लेने उतारू हो गए हैं तो चिंता काहे की.....आपके बचाव लिए भी तो पालिटिकल लोग घटना के प्रारंभ से ही साथ तो हैं, आपके निर्दोष होने की दुहाइयां तो पहले दिन से ही दी जाने लगी हैं...सो डोन्ट वरी बापू सा !
साध्वी उमा जी ने पहले ही दिन आपको निर्दोष बता दिया था, सो डरने का बिलकुल नहीं !
आपके पास तो दिव्य शक्ति है, जैसा कि आपने भक्तों को बताया था कि कैसे आपने आपके क्रेश होते हुए हेलीकाप्टर को ध्वस्त होने से बचाया, और लोगों सहित खुद को भी सकुशल धरती पर ले आये...जब इतनी दिव्य शक्ति है,  तो घबराने का नहीं ! खैर छोडिये...चिंतित मत होइये....आप निर्मल बाबा को ही देखिये ..कितना बदनाम किया इन्ही लोगों ने, देश का सारा प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनके पीछे पंजे झाड कर पड़ा हुआ था.....क्या हुआ..?? कुछ नहीं ना...आज भी देश के बड़े बड़े न्यूज़ चेनल अपने Prime Time में निर्मल बाबा का दरबार live दिखा रहे हैं, कृपा खूब ठाठ बाँट से बँट रही है, और बांटी जा रही है,.....इधर भी उधर भी....सो, चिंता नी कोई बात नही...यदि कल जेल चले भी गए तो आपका रुतबा कम थोड़े ही होगा, ना ही आपकी दिव्य शक्ति कम होगी...फिर आपके लाखों भक्तगण हैं ना दोबारा आपको सर आँखों पर बैठाने के लिए...फिर से वही आश्रम होगा...फिर से आप अपने सभी लीलाओं और पुराने कार्य कलापों के लिए स्वतंत्र होंगे, सो टेंशन लेने का बिलकुल नहीं....!!

-आसिफ़ अली हाशमी

Monday, August 26, 2013

आसाराम बापू और दाभोलकर के बीच


लाख टके का सवाल है। क्या बलात्कार के मामले में आसाराम बापू गिरफ्तार होंगे या हमेशा की तरह आरोपों के दलदल से साफ बच निकलेंगे? एक और प्रश्न है। क्या डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर के कातिल धरे जाएंगे? चौंकिए मत। दाभोलकर और आसाराम के मामलों में असमानता के बावजूद अखंड रिश्ता है। आसाराम संत हैं, लेकिन उन पर कदाचार का आरोप है। दाभोलकर पाखंड के खिलाफ अलख जगाते हुए मारे गए। एक अपराध का शिकार हुआ, तो दूसरे पर गुनाह की तोहमत है। इंसानों के बीच कभी-कभी ऐसे विरोधाभास अनचाहे जुड़ाव रचते हैं। आसाराम से शुरू करता हूं। 15-20 साल पुरानी बात है। आगरा स्थित दफ्तर में कुछ लोग मेरे सामने बैठे थे, सब के सब धनी-मानी और नामी। उनके मुखिया ने बात शुरू की कि ‘राष्ट्रसंत’ आसाराम बापू कुछ महीनों बाद यहां प्रवचन के लिए आने वाले हैं। हम लोग इस आयोजन की समिति से जुड़े हुए हैं। आप और आपके अखबार से सहयोग की अपेक्षा है। धार्मिक हस्तियों के मामले में मैं हमेशा अज्ञानी रहा हूं। पहले कभी ‘बापू’ का नाम नहीं सुना था। अपने अज्ञान को छिपाए बिना मैंने पूछ लिया कि ये कौन साहब हैं? कुछ सेकंड के लिए कमरे में सन्नाटा पसर गया। उनमें से एक ने बताया कि बापू गुजरात के ‘महान संत’ हैं। वह जहां जाते हैं, लाखों लोग जुटते हैं। उनके प्रवचन किसी अमृत वर्षा से कम नहीं होते।
उन्हीं लोगों ने यह भी बताया कि बापू के प्रवचन के लिए साउंड सिस्टम, तंबू-कनात, भोजन, जलपान आदि के लिए लोग पहले से ही नियत हैं। हमें सिर्फ उनका भुगतान करना है। पत्रकारीय जिज्ञासा में मैंने उनसे पूछा कि तब तो इस आयोजन पर लाखों खर्च हो जाएंगे? कहां से जुटा रहे हैं आप लोग इतना? जवाब साफ-साफ नहीं मिला, पर वह बैठक एक अबूझ खटास के साथ समाप्त हुई। मैंने यह भी पता लगाने की कोशिश नहीं की कि इंतजामात के बारे में उन लोगों के दावे कितने सही या गलत हैं, अलबत्ता अनजाने में ही आसाराम के आने का इंतजार करने लगा। संयोग से वह कोठी मीना बाजार के मैदान में प्रवचन करने वाले थे। मैं जिस मकान में रहता था, उसकी छत और बालकनी से वहां का दृश्य साफ दिखता है। एक दिन मैंने भी मैदान का जायजा लिया और विस्मित रह गया। सैकड़ों बड़े-बूढ़े, औरतें और बच्चे वहां मौजूद थे। बापू नियत समय पर प्रवचन करते थे। लाउडस्पीकर की मेहरबानी से एक दिन सुनने की कोशिश की। नि:संदेह, उन्हें लोगों को जोड़ने और बांधने में महारत हासिल थी। उस दिन यह भी देखा कि बापू मर्सिडीज में चलते हैं और कार से ही दर्शनार्थियों को हाथ हिलाकर आशीर्वाद भी देते रहते हैं।
उनके प्रति लोगों की लालसा और जिज्ञासा स्पष्ट थी। कुछ ही साल पहले अमेरिका के ओरेगॉन में ओशो यानी रजनीश संगीन आरोपों में गिरफ्तार हुए थे। तब उनके हिमायतियों ने कहा था कि संसार की सबसे ताकतवर सरकार जबलपुर के पास जन्मे इस शख्स की ओजस्वी वाणी से घबरा गई। किसी ने यह भी उड़ाने का प्रयास किया था कि यह कुछ भयभीत ईसाइयों की साजिश थी। हकीकत जो भी हो, पर यह सच है कि हम जैसे लोग, जिन्होंने रजनीश के विचारों में एक अलग तरह की आब देखी थी, हताश हुए थे। अखबारों में यहां तक छपा था कि आचार्य से ओशो तक का सफर तय कर चुके रजनीश रॉल्स-रॉयस कारों का बेड़ा रखते थे और यह भी कि उन्हें एक निश्चित तापमान में रहना ही पसंद था। एक शख्स, जो अपने विचारों से सादगी की प्रेरणा देता रहा हो, उसके बारे में ऐसी जानकारी हिला देने वाली थी। अब ‘बापू’ सशरीर सामने थे। उन दिनों मन में सवाल उठते थे कि जिस देश में हम ‘धारयति इति धर्म:’ की परंपरा का पालन करते रहे हों, वहां धार्मिक लोगों को इतने तामझाम की जरूरत क्या है? यदि किसी के विचारों में अलख जगाने की शक्ति है, तो उसे प्रचार की क्या आवश्यकता? हम हिन्दुस्तानी मानते आए हैं कि मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाए।
मतलब, सधुक्कड़ी फक्कड़पन का प्रतीक है। जहां रात हुई, वहीं रम लिए और जो मिला, उसी से पेट भर लिया, पर वहां तो आस्था के नाम पर आयोजन का महाकुंभ लगा हुआ था। बरसों बाद जब ‘बापू’ पर हत्या कराने के प्रयास, बच्चों की बलि, जमीन हथियाने जैसे आरोप लगने लगे, तो उनके प्रति मेरे व्याकुल प्रश्नों की सूची कुछ और लंबी हो गई। हमारे यहां साधुओं के परिवार की परंपरा नहीं है, पर उनके पुत्र भी मिलते-जुलते आरोपों के शिकार होते रहे हैं। पता नहीं, कानूनी एजेंसियों ने अपना काम कितनी तन्मयता से किया, पर यह सच है कि उन पर कोई आंच नहीं आई। इसीलिए यह सवाल उठता है कि क्या इस बार उन पर उचित कानूनी कार्रवाई होगी या उनके ऊपर लगे आरोप गलत साबित होंगे? वह और उनके आश्रमवासी तो पीड़ित कन्या पर झूठ बोलने का दोष मढ़ ही रहे हैं। अगर वह ‘बापू’ का नाम किसी साजिश के तहत ले रही है, तो इसके सूत्रधार कौन हैं? पुलिस ने उसकी डॉक्टरी जांच कराई है। क्या उसे भी ‘मैनेज’ किया गया है? उत्तर के लिए इंतजार करना होगा।
ऐसा नहीं है कि ‘बापू’ इन आरोपों के अकेले शिकार हैं। स्वामी नित्यानंद का मामला आपको याद होगा। तमाम महिलाओं से रिश्ते रखने के आरोपी इस तथाकथित संत को तो 52 दिन जेल में रहना पड़ा था। यह बात अलग है कि अब वह बाहर हैं और उनके प्रवचनों का रंग फिर से चोखा होता जा रहा है। 2010 में एक टीवी चैनल ने तमाम प्रवचनकर्ताओं पर स्टिंग ऑपरेशन किया था। उसमें ये बाबा लोग हवाला के जरिये काले धन को सफेद करने का आश्वासन देते दिखाए गए थे। तब भी सवाल उठा था कि ऐसी कलंक कथाएं कब तक चलती रहेंगी? जाहिर है, ऐसे लोगों के पास धन और जन-बल इतना होता है कि वे अव्वल तो कानून के घेरे में नहीं आते और आ भी जाते हैं, तो नित्यानंद की तरह दोबारा अपने स्वार्थ का सरंजाम जुटाने में कामयाब हो जाते हैं। इसके उलट नरेंद्र दाभोलकर जैसे लोग हमेशा अकेले पाए जाते हैं।
धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ अलख जगाने वाला यह जागृत व्यक्ति दशकों से अपना काम मिशन की तरह करने में जुटा था। इसीलिए जिस तरह यह सवाल फिजा में तैर रहा है कि बापू गिरफ्तार होंगे या नहीं, उसी तरह यह भी गौरतलब है कि दाभोलकर के हत्यारे अपने अंजाम तक पहुंचेंगे या नहीं? उनके कातिल यकीनन कुछ ताकतवर लोगों द्वारा संरक्षित हैं। क्या कमाल है? पाप से जूझने वाले अकेले पड़ जाते हैं और पापी ताकतवर होते जाते हैं। पर यकीन जानिए, यह लाचारी का समय नहीं है। डॉक्टर दाभोलकर की हत्या पर इतना हो-हल्ला मचा कि महाराष्ट्र सरकार को अंधविश्वास विरोधी अध्यादेश लाना पड़ा। उम्मीद है कि सरोकार संपन्न लोग उनके कातिलों को कानून की चौखट तक लाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।
इसके साथ ही एक बात आपको भी तय करनी है। इक्कीसवीं सदी के भारत को डॉक्टर दाभोलकर जैसे लोग चाहिए या शोशेबाजी के जरिये हमारी जेबों से पैसा निकालकर हम ही को धमकाने वाले पाखंडी? भूलिए मत, लोकतंत्र में गेंद कभी-कभी आम आदमी के पाले में भी आती है।

~प्याली में तूफान 

Wednesday, June 12, 2013

मेरी इनकम्प्लीट फैमिली...

 
जिस तरह भारत में ज़िंदा रहने के लिए विवाह करना जितना अनिवार्य है, ठीक उसी प्रकार विवाह होने के उपरान्त बच्चा पैदा करना उतना ही अनिवार्य है. आपको कोई कुंवारा रहने नहीं देगा और शादी के बाद बिना बच्चे के जीने नहीं देगा.
pregnent-women
इधर पिछले कुछ वर्षों से समाज में दो तरह के लोग आपसे टकराते हैं, एक वे हैं जो पहली संतान के विषय में बेधड़क होकर कहते हैं ' पहला बच्चा कोई भी हो चलेगा.' कोई भी से मतलब यह न निकाला जाए कि चूहा, बिल्ली या कोई भी जानवर पैदा हो जाए और ये उसे अपना लेंगे. कोई भी का मतलब यहाँ लड़की से होता है. ये बहुत बड़े दिल वाले होते हैं. ऐसे लोगों की वजह से ही शायद संसार में लड़कियों का जन्म हो पाता है.
दूसरे वे लोग हैं जो ज़िंदगी में किसी भी प्रकार का रिस्क नहीं लेते. ' पहला तो लड़का ही होना चाहिए, दूसरा चाहे कोई भी हो जाए.' यहाँ भी कोई भी का मतलब कीड़ा-मकौड़ा, पक्षी या जानवर नहीं बल्कि लडकी से ही है. ऐसे लोग शुरू में भले ही परेशान हो लें, लेकिन बाद में स्वयं को सुखी महसूस करते हैं.
ये दूसरी तरह के लोग बड़े ही स्मार्ट किस्म के होते हैं. इधर स्त्री ने गर्भधारण किया नहीं, उधर अल्ट्रासाउंड सेंटरों की खोज में आकाश -पाताल एक कर देते हैं. इन सेंटरों में, जहाँ बाहर से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है 'गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण करना कानूनन अपराध है' और अन्दर सब जगह अलिखित रूप से लिखा रहता है 'यहाँ ये अपराध इत्ते रुपयों में खुशी-खुशी किया जाता है'.
अगर आपकी पहली लडकी है और आप दूसरी संतान की इच्छा रखती हैं और कई साल बाद दोबारा गर्भधारण करतीं हैं तो समाज में बड़ी ही विचित्र परिस्थितियाँ जन्म लेने लगती हैं. आपसे मिलने आने वाली आपकी हर मित्र, रिश्तेदार या किसी भी पड़ोसी महिला को जाने किस गुप्त विधि से यह पता होता है कि आपके गर्भ में निश्चित रूप से लड़का है. सिर्फ आपको ही नहीं पता होता बाकी सबको पता होता है. कह सकते हैं 'जाने तो बस एक गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है.’ आप उन्हें कितना ही यकीन दिलाने की कोशिश करें कि वाकई आपको बच्चे का लिंग नहीं पता या आपने डॉक्टर पूछने की ज़रुरत ही नहीं समझी है, उन्हें किसी भी सूरत में यकीन नहीं होता है. आपकी हर कोशिश को काटने के यन्त्र इनके पास मौजूद रहते हैं.
वे फ़ौरन पूछती हैं ‘अल्ट्रासाउंड नहीं करवाया क्या?' आप कहेंगी ‘सात या आठ बार करवाया है’ ,'तब झूठ क्यूँ बोल रही हो कि नहीं पता’ अगर आप कहती हैं ‘वह तो बस बच्चे की ग्रोथ जानने के लिए डॉक्टर ने करवाए थे.’ किसी भी सूरत में वे इस बात को नहीं मानतीं कि अल्ट्रासाउंड गर्भ में पल रहे शिशु का विकास देखने के लिए भी किया जाता है. वे चुनौती देने लगतीं हैं ‘हम भी देख लेंगे जब लड़का होगा, अभी देखो कितनी एक्टिंग कर रही है, जैसे की हमें कुछ पता नहीं. इतने साल बाद क्यों याद आई दूसरे बच्चे की.’ कैसी आश्चर्य की बात है कि वे आपसे ज्यादा बेसब्री से आपके होने वाले बच्चे का इंतज़ार करने लगतीं हैं कि लड़का हो और वे आपसे खुलेआम कह सकें ‘हमने तो पहले ही कहा था, ऐसा कौन बेवकूफ होगा जिसकी पहली लडकी हो और उसने दूसरे बच्चे का लिंग नहीं पता किया हो.’
तब आपको अपने आसपास के अनेक लोग याद आने लग जाते हैं, जिनकी पहली संतान लड़की है और जो साल में दो-तीन बार प्राइवेट नर्सिंग होम्स के चक्कर काटते हैं और शिकायत करते हैं’ बहुत परेशान हैं, पता नहीं क्या हो गया, दूसरा बच्चा नहीं हो रहा, कितना ही इलाज करा लिया’ अगर आप उन्हें किसी इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट का पता बताती हैं तो वे आपकी बात पर बिलकुल ध्यान नहीं देते हैं. यह बाद में पता चलता है कि दरअसल इलाज से उनका मतलब गर्भपात से और दूसरे बच्चे से उनका मतलब सिर्फ और सिर्फ लड़के से होता है, जो न जाने कितनी गर्भपात के बाद भी पैदा होने का नाम ही नहीं लेता.
धर्मसंकट शायद इसे ही कहते हैं कि परिवार भी छोटा रखना है और फैमिली भी कम्प्लीट होनी चाहिए. ये वही पहले प्रकार के लोग होते हैं जो कहते थे ‘पहला कुछ भी चलेगा.’ अब ये लोग अपने पुराने निर्णय पर पछताते और हाथ मलते हैं कि काश! पहली बार में ही लिंग का पता कर लिया होता.
इधर आपके पेट का आकार बढ़ने लगता है और उधर आपके आसपास समाज में मौजूद कई तरह की चलती-फिरती अल्ट्रासाउंड मशीनें सक्रिय होने लगती हैं. कोई आपके पेट का आकार देखकर लड़का पैदा होने की भविष्यवाणी करेगी तो कोई चेहरे की रंगत देखकर. कोई आपसे कैटवॉक करवाके आपके चलने के अंदाज़ से जान लेती है तो कोई पहली लड़की के सिर के बालों के बीचोंबीच में पड़ने वाले भंवर को देखकर अनुमान लगा लेती है. एक आध मशीनें तो इतनी ज्यादा बेतकल्लुफ हो जाती हैं कि आपकी नाभि का आकार तक देख लेती हैं, उनके अनुसार इसके संकुचन की दिशा से एकदम सटीक अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
गौर करने वाली बात ये होती है कि सारी की सारी भविष्यवाणियाँ सिर्फ लड़के के लिए होती हैं. मौसम वैज्ञानिकों ने शायद इस बाद का अध्ययन नहीं किया होगा कि लड़का होने का भी एक मौसम होता है जिसके द्वारा ये मशीनें आने वाले बच्चे के लिंग का पूर्वानुमान कर लेती हैं. खट्टा या मीठा खाने की इच्छा उगलवाकर हर दूसरी औरत भविष्यवक्ता होने का दावा पेश कर देती है.
अगर इन मशीनों के सामने आपके मुंह से निकल गया ‘लडकी भी तो हो सकती है’ फ़ौरन आपके मुंह पर हाथ रख दिया जाएगा ‘शुभ-शुभ बोलते हैं. ऐसा नहीं कहते. कहते हैं दिन भर के चौबीस घंटे में से एक बार माँ सरस्वती जुबान पर बैठती है, अतः इन दिनों हमेशा शुभ-शुभ बोलना चाहिए.’ माँ सरस्वती! आप सब सुनतीं हैं न?
जैसे-जैसे आपके दिन बढ़ते जाते हैं आपकी शुभचिंतक महिलाएं, जो आपकी बेहद करीबी होती हैं, जिन्हें आप तर्क के द्वारा नहीं हरा सकती हैं, आपके घर में तरह-तरह के श्लोक, भांति-भांति के भगवानों की स्तुति, चालीस प्रकार की चालीसाएँ, सैकड़ों प्रकार के सहस्त्रनामों की फोटोकॉपी पहुँचाने में जुट जाते हैं. इन सब का एक ही निचोड़ होता है कि इन सबके द्वारा आपको अवश्य ही पुत्ररत्न प्राप्त होगा. आपके सिरहाने मन्त्र चिपका दिए जाते हैं, ताकि आप सुबह-शाम, दिन-रात उक्त मन्त्र का जाप करते रहें.
ऐसे बाबाओं के पते जिनके आशीर्वाद से सिर्फ लड़का ही होता है, आपके हाथ में छोटी सी पुर्ची बनाकर थमा दिए जाते हैं. गंडे, ताबीज लौकेट से अलमारियां भरने लगती हैं. इनके भोलेपन पर तरस भी आता है. अगर आप कह बैठेंगी कि ‘बच्चे का लिंग तो कब के बन चुका होगा अब क्या फायदा इन्हें जापने का.’ तब भी ये हार नहीं मानतीं और कहती हैं ‘चमत्कार भी तो कोई चीज़ होती है.’ इस चमत्कार को वाकई नमस्कार करने का मन करता है.
कभी-कभी आप सोचने लग जाती हैं कि शायद लोग झूठ बोलते हैं या दुनिया की सारी रिसर्चें फर्जी होती होंगी, जो ये कहती हैं कि बच्चा गर्भ में सब कुछ सुनता है, महसूस करता है. इतनी साजिशों को जानने के बाद तो कोई भी लडकी भगवान को अर्जी देकर गर्भ में ही अपना लिंग परिवर्तन करवा ले। इतने षड्यंत्र इसी पृथ्वी पर रचे जातीं हैं ताकि दूसरी लडकी पैदा न हो पाए, उस पर भी लडकियां पैदा हो ही जाती हैं. लड़कियों के अन्दर वाकई बहुत जिजीविषा होती है.
अगर आपकी डॉक्टर से आपकी आत्मीयता स्थापित हो गयी गई है, जो कि पर्याप्त महँगा इलाज करवाने की मजबूरी के कारण हो ही जाती है, तो वह भी आपको हिंट देने से पीछे नहीं हटेगी. तीसरे महीने के अल्ट्रासाउंड के बाद वह हँसते-हँसते कह ही देती है ‘लड़का भी ज़रूरी है आजकल. करिश्मा कपूर को देख लो, इतने साल बाद हुआ न बेटा.’ इसी तरह से दो-तीन और अभिनेत्रियों के नाम वह आपके सामने रखती है. वह चाहती है कि आप बच्चे का लिंग पूछे और वह अपनी फीस बताए. आप नहीं पूछतीं तो वह मन मसोसकर चुप हो जाती है.
अनुमानों की बारिश के जीभर के बरसने के बाद आपका नौ महीने का समय पूरा हो जाता है. अस्पताल जाने की तैयारियां पूरी कर ली जातीं हैं. एक बार फिर आपके द्वारा लगाई गयी अटैची को दोबारा खोल कर रखे गए कपड़ों के आधार पर बच्चे का लिंग जानने की अंतिम कोशिश की जाती है. अगर आप आधे कपडे लड़के के रखती हैं, और आधे लड़कियों के, तो ही इनके दिल को तसल्ली होती है कि वाकई आप सच बोल रही थीं. फिर अस्पताल जाने तक सांत्वना देने का अनवरत क्रम चलता रहता है ‘सब अच्छा होगा, देखना पक्का लड़का ही होगा.’
ऑपरेशन की टेबल पर ले जाने से पाहिले आपका चेकअप डॉक्टर की असिस्टेंट द्वारा किया जाता है. वह पूछती है ‘पहला बच्चा क्या है?’ आप उत्तर देती हैं ‘बेटी है' फिर उसका जवाब आता है ’एक लडकी है, दूसरा लड़का हो जाता तो फैमिली कम्प्लीट हो जाती’ उसी डॉक्टरजिसके यहाँ घुसते ही बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ टंगा रहता है ‘आप जिस डॉक्टर से परामर्श के लिए कतार में बैठे हैं वह भी किसी की बेटी है, अतः गर्भस्थ शिशु लड़का है या लडकी यह पूछने से पहले सोचें.’
आपके ताबूत में आख़िरी कील तब लगती है जब डॉक्टर द्वारा आपका पेट चीर के बच्चे को बाहर निकाला जाता है और बताया जाता है ‘बधाई हो, लक्ष्मी आई है.’ फिर तुरंत दूसरा प्रश्न गोली की तरह छूटता है ‘पहला बच्चा क्या है आपका?’ आप एनस्थीसिया का इंजेक्शन लगा होने के कारण अर्धनिद्रा में होती हैं और धीमे से कहतीं हैं ’ बेटी है’ वो सुनती हैं ‘बेटा है’ और सुनकर कहती हैं ‘एक बेटा और एक बेटी हो गए। चलो फैमिली कम्प्लीट हो गयी.’
कम्प्लीट सुनते ही आपकी सुप्त हो गयी चेतना वापिस आ जाती है. आप कहतीं हैं ‘बेटी है पहली’ वो तुरंत बात पलट देती हैं ‘कोई बात नहीं, आजकल तो लड़का-लड़की सब बराबर हैं, फिर भी अगर इच्छा होगी तो दो साल बाद आ जाना.’ यह सुनते ही वापिस आई हुई चेतना फिर से लुप्त हो जाती है.
ऑपरेशन के बाद आपको कमरे में शिफ्ट किया जाता है. आपके साथ मौजूद घरवालों को कोई बधाई का एक शब्द तक नहीं कहता. आपके पति द्वारा तैयार किये गए सौ-सौ के नोट जेब में ही फड़फड़ाते रह जाते हैं. अस्पताल का कोई भी कर्मचारी शगुन नहीं मांगने आता. सफाई करने वाली बेहद गरीब औरत भी इतनी स्वाभिमानी निकलती है कि आपके घर में दूसरी लड़की होने के बोझ को जानकार आपसे एक पैसा भी नहीं मांगती.
वहीँ दूसरी और आपके बगल के कमरे में लड़का हुआ होता है और वहां मांगने वालों का तांता लगा हुआ होता है. अस्पताल के सभी कर्मचारी वहां से वसूली करके आते हैं. इधर आपके द्वारा सबसे महंगी दुकान से मंगवाई गयी मिठाइयां पड़े-पड़े सूख जाती हैं. ऐसा लगता है जैसे पूरा अस्पताल एकाएक डायबिटीज़ की गिरफ्त में आ गया हो. पेट की ताज़ा-ताज़ा सिलाई से उठने वाला दर्द पीड़ा नहीं देता, लेकिन अब दिल पर लगे हुए घाव एकाएक टीस देने लगते हैं. आपको लगता है जैसे ज़माना फिर से सौ बरस पीछे चला गया.
आप घर आती हैं. अब तक सबको खबर हो चुकी होती है. लोग आने लगते हैं. बधाई के शब्द सांत्वना की चाशनी में लपेटकर आपके सामने परोसे जाते हैं. बहाने-बहाने से आपकी आँखों में झांका जाता हैं कि कहीं से तो शायद एक कतरा दुःख का गिरे तो वे लपक लें और अपने सांत्वना के शब्द जो उन्होंने बीते कई दिनों से सहेज रखें हैं, आपके सामने उगल दें. आपके कंधे पर अपना हाथ रखकर दुःख प्रकट करें. अगर आप ऐसा कुछ भी नहीं करतीं तब भी वे रह नहीं पातीं, बैचैन होकर अपने दिल की बात कह ही डालतीं हैं, ‘कोई बात नहीं, अगली बार लड़का हो जाएगा, अभी कौन सी उम्र चली गयी है. तीन ऑपरेशन तो आजकल साधारण बात हैं.’
आप अगर कह दें ‘तीसरी बार कि क्या गारंटी है ‘लड़का ही होगा’ वे कहती हैं ‘नहीं अबकी ज़रूर लड़का होगा.’ ऐसे कई उदाहरण आपके सामने फिर से प्रस्तुत किये जाते हैं, जिसमे तीसरी बार में जाकर लड़का हुआ. इस दृढ़ विश्वास पर कौन न कुर्बान हो जाए.
आपके गले में बहादुरी का तमगा पहनाया जाता है. आप हिम्मती ठहराई जाती हैं. हकीकत में देखा जाए तो आप बहुत कमज़ोर किस्म की होतीं हैं. ह्रदय बहुत नाज़ुक होता है. गलत काम पर करने पर ऊपरवाले से डरती हैं. हिम्मती तो वे होतीं हैं जो साल में दो बार गर्भपात करवाती हैं, शरीर पर इतना ज़ुल्म सहती हैं, और चूं भी नहीं करतीं. कर्म प्रधान होने के कारण न भाग्य से और न ही भगवान से डरती हैं.
घर में ऐसी कई महिलाएं कई दिनों तक आती रहती हैं, आप इन्हें चाय पिलाती हैं और ये आपको लड़के की अनिवार्यता के विषय में लेक्चर पिलाती हैं. इनमें से कई महिलाएं एक ही शहर में अपने सास और ससुर से अलग घर लेकर रहती हैं. कई के सास-ससुर बुढापे में अपना खाना आप ही बनाते हैं. इकलौते लड़के हालचाल पूछने तक नहीं जाते. लड़का न हो पाने की सांत्वना तो वह भी देती है, जो रोज़ मौका ढूंढती है और पहला मौक़ा लगते ही सास-ससुर से अलग हो जाना चाहती है.
सबसे ज्यादा अफ़सोस तब होता है जब वह भी आपको पुत्र के ज़रूरी होने की बात कहती है, जिसका खुद का लड़का साल में छह महीने मानसिक अस्पताल में भर्ती रहता है. जब घर में रहता है उसे आए-दिन मारता रहता है. पति बीस साल पहले घर छोड़कर चला गया था, जिंदा भी है या मर गया उसे नहीं मालूम, लेकिन वह उसके नाम के सिन्दूर से मांग भरना एक दिन भी नहीं छोड़ती है.
इसके कई दिन बाद तक कई तरह के रहस्योद्घाटन आपके सामने होते रहते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं- दूसरी लड़की होने का मतलब है आपका पढ़ा-लिखा होना बेकार है. पढ़े-लिखे लोग ऐसी गलती नहीं करते. अब भुगतो सारी ज़िंदगी दूसरी लड़की को. आपसे तो अच्छे कम पढ़े-लिखे लोग होते हैं. धिक्कार है आपकी डिग्रियों को. इनको पहली फुर्सत में आग लगा देनी चाहिए.
दूसरी लड़की पूर्वजों के अभिशाप की वजह से होती है. अगर आपने अपने अपने माँ-बाप की इच्छा के विरूद्ध विवाह किया है तो भगवान् आपको दंडस्वरूप दो लड़कियां देता है.
लड़कों की उत्पत्ति अनिवार्य रूप से जबकि लड़कियों की उत्पत्ति अपने कन्यादान के शौक को पूरा करने के लिए होनी चाहिए. जो कन्यादान करता है वह अपनी सारी ज़िंदगी किसी भी भिखारी या मांगने वाले को कुछ भी न दे तो भी चलेगा. ऊपरवाला उसे कोई सजा नहीं देता, क्योंकि वह भविष्य में कन्यादान नाम का महादान करेगा.
बाज़ार में सुन्दर-सुन्दर कपडे सिर्फ़ लड़कियों के लिए मिलते हैं, इसलिए एक लड़की तो होनी ही चाहिए. बाज़ार में लड़कियों के डिज़ाईनर कपडे नहीं मिलते, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हालत कितनी खराब होती. लड़कियां भाई को राखी बाँधने के काम आती हैं. अच्छा हुआ कि भारतवर्ष में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है. सोचिये, अगर भारतवर्ष त्योहारों का देश न होता तो कितनी बुरी दशा होती लिंगानुपात की.
अगर पहली लड़की हो तो दूसरी बार भगवान् पर भूलकर भी भरोसा नहीं करना चाहिए. हाँ, लिंग परीक्षण करवाने के उपरान्त गर्भपात सही-सलामत हो जाए, इसके लिए भगवान् को हाथ ज़रूर जोड़कर जाना चाहिए.फैमिली हर हाल में कम्प्लीट होनी चाहिए, इसके लिए गर्भपातों की संख्या याद करना बंद कर देना चहिए.
'कम्प्लीट फैमिली' का मतलब सिर्फ चार लोग माँ, बाप एक लड़का एक लड़की होता है. कम्प्लीट फैमिली में दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ या कहें कि किसी भी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं आता. इस लेख की प्रेरणास्रोत, मेरी दूसरी बेटी पूरे दो साल की हो गयी है. उसे जीभर के आशीर्वाद और शुभकामनाएँ दीजिये.

लेखिका : शेफाली पांडे पेशे से शिक्षक हैं.

Wednesday, June 22, 2011

ये बाबा बढ़वा देंगे आपकी सेलरी!



बाबा
आस्था और अंधविश्‍वास में एक सूत जितना ही फर्क होता है। जहां आस्था और विश्वास इन्सान को संबल देते हैं, भरोसा करना सिखाते हैं वहीं अंधविश्‍वास इन्सान को निष्क्रिय और कमजोर बना देता है। ईश्वर में विश्वास करना सही है, क्योंकि ईश्वर के प्रति आस्था मनुष्य की सोच को सकरात्मक बनाती है। लेकिन हाथ-पैर छोड़कर सिर्फ भगवान के भरोसे बैठ जाना विश्वास नहीं अंधविश्‍वास है। कहा भी गया है कि 'अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गये सबके दाता राम।'  सबकुछ छोड़-छाड़ कर भगवान के भरोसे बैठ जाना ईश्वर में आपके विश्वास को नहीं बल्कि आपकी अकर्मण्यता को बयान करता है। और वास्तविकता भी यही है कि कर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। इन्सान के कर्म ही उसके भविष्य और वर्तमान के लिए उत्तरदायी होते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी कर्म को ही सर्वोपरि बताया है।
परन्‍तु आज हर कोई शॉर्ट कट के पीछे भागा जा रहा है। हर एक सोचता है कि कैसे कम से कम मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा मिल जाए। कम मेहनत करके ज्यादा पाने की यही ललक इन्सान को पाखंडी ओझाओं और बाबाओं के पास ले जाती है। और जैसे ही वो इन ढोंगी बाबाओं की चौखट पर पहला कदम रखता है, अंधविश्‍वास के दलदल में फंसता चला जाता है। जब तक होश आता है न विश्वास बचता है और न तो कुछ...।
21वीं सदी का समाज ज्यादा प्रतिस्पर्धी और प्रैक्टिकल है। ऐसे में भावनाओं और संवेदनाओं का स्थान परस्पर प्रतियोगिता ने ले लिया है। कुछ वर्षों पूर्व तक जो कुछ प्राथमिक था आज वही उपेक्षित है। जहां अब तक इन बाबाओं के पास वशीकरण, शादी कराने, तलाक दिलाने, सन्तान सुखदिलाने जैसी बातों के लिए कॉन्ट्रैक्ट लिये और दिये जाते थेअब वहीं इन्होंने अपने पोर्टपफोलियों में भी व्यापक बदलाव कर लिया है। आप देख ही रहे होंगे कि ग्राहक को फंसाने के लिए कितनी नयी-नयी बातों का उल्लेख है।
अभी तक के बाबा वशीकरण, सम्मोहन जैसी ही कुछ बातों को लेकर अपना धंधा करते थे लेकिन अब इन बाबाओं ने खुद को इक्कीसवीं शताब्दी के अनुरूप ढ़ाल लिया है और कहते हैं न कि बिजनेसमैन वही सफल है जो बाजार के बदलाव को भांप सके और अपना माल बाजार की मांग के हिसाब से बेच सके। आज इन्सान शादी-विवाह से आगे का सोचने लगा है। आज उसके लिए नौकरी, प्रमोशन, विदेश यात्रा जैसी बातें ज्यादा जरूरी हो गयी हैं। और इन्सान की इन्हीं नयी जरूरतों के अनुरूप आज के बाबाओं ने भी खुद के व्यवसाय में एक नये ट्रेंड को जन्म दिया है। इतना ही नहीं आम आदमी भी पूरे विश्वास के साथ अपनी परेशानियों का समाधन इन टोने-टोटकों में तलाशता है। अन्ततः इन्हीं धर्म के व्यापारियों के चक्कर में पड़कर कितनी ही जिन्दगियां तबाह हो जाती हैं। लेकिन सच्चाई तो यही है कि सफलता के लिए कोई शॉर्ट कट नहीं होता है। ईश्वर में आस्था रखना सही है लेकिन कुछ इस तरह की उससे भरोसा बढ़े ना की अंधविश्‍वास।
पर सारा दोष किसी एक के मत्थे मढ़ देना भी सही नहीं होगा, सच्चाई ये भी है कि इन ढोंगी बाबाओं के पास जाते भी तो हम-आप ही हैं। आज जबकि दावे किये जाते हैं कि समाज वैज्ञानिक तौर-तरीके अपना रहा है तो क्या कारण है कि इन ढोंगी-पाखंडी बाबाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। असल में हमारा समाज साक्षर तो रहा है लेकिन शिक्षित नहीं। साक्षर होकर किताबी ज्ञान तो मिल रहा है लेकिन बौद्धिक विकास नहीं हो रहा और कहीं न कहीं यही भटकाव इन बाबाओं को बढ़ावा दे रहा है। ये बेवकूपफ बनाते हैं और हम बनते हैं जिससे इनके खर्चे पूरे होते हैं। गांवों में कहा जाता है कि 'जब तक बेवकूफ इस धरती पर हैं चालाक भूखे नहीं मरेगा।' और यहां बेवकूफ हैं हम। अब हमें ही यह सोचना और निर्धरित करना होगा कि हम चाहते क्या हैं, दूसरों के हाथों बेवकूफ बनना या फिर कर्म प्रधान बनकर आगे बढ़ना।


लेखिका भूमिका राय दिल्ली विश्वविद्यालय के कम्युनिटी रेडियो में बतौर कार्यक्रम उदघोषक कार्यरत हैं. उन्होंने हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट लखनऊ से और स्नातक की शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी की है. वर्तमान में भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा में अध्यनरत हैं.