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Monday, April 27, 2015

मेरे साथ आठ माह तक रोज़ हुआ गैंग रेप


गुजरात के बोटाड ज़िला के देवालिया गांव में कांसे और स्टील के बर्तनों से सजे कमरे में एक चारपाई पर वह चुपचाप लेटी हुई हैं और उसके बच्चे उसके पास बैठे हैं.

गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह उन्हें खेलते हुए देखती रहती हैं और सिर्फ़ रोज़मर्रा के कामकाज निपटाने या अपनी आठ महीने की दर्दनाक कहानी पुलिस या मीडिया वालों को सुनाने के लिए ही उठती हैं.
सामूहिक बलात्कार की शिकार 23 साल की यह युवती बताती हैं, "उन्होंने करीब आठ महीने तक रोज़ मेरा बलात्कार किया. चार लोग तो नियमित थे, बाकी आते-जाते रहते थे. अगर मैं कुछ ऐसा करती जो उन्हें पसंद न आता तो वह मुझे पीटते. मुझे रोने में भी डर लगता था."
कभी एक ख़ुश बेटी, बीवी और मां रही इस युवती के सात माह के गर्भ को गिराने की याचिका को पिछले हफ़्ते गुजरात उच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया.

अब वह अपने मायके में ही रह रही है. उसके मां-पिता की नज़रें भी उसी पर टिकी रहती हैं.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
वह कहती हैं, "यह मेरे बलात्कारियों का बच्चा है. मैं इसकी मां हूं लेकिन अगर यह बच्चा मेरे साथ रहेगा तो कोई भी मुझे और मेरे परिवार को स्वीकार नहीं करेगा. अदालत ने गर्भपात की इजाज़त नहीं दी. मैं सरकार से प्रार्थना करती हूं कि वह इस बच्चे को अपने सरंक्षण में ले ले और किसी अनाथालय में दे दे."
परिवार के अंदर बेचैनी साफ़ नज़र आती है. पीड़िता अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को त्यागने के विचार से शायद पूरी तरह सहमत नहीं है.
बच्चे को अपने पास रखने के सवाल पर वह चुप हो जाती हैं और धीरे से अपनी मां की ओर देखती हैं. उनकी मां जवाब देती हैं, "यह बच्चे को कैसे रख सकती है? अगर यह ऐसा करेगी तो समाज और गांव हमें बहिष्कृत कर देगा. मेरे दो और बच्चे हैं. मेरा 14 साल का लड़का कुंवारा रह जाएगा. कोई भी हमारी इज़्ज़त नहीं करेगा."
वो कहती हैं, "यह मां है लेकिन बच्चा बलात्कारियों का है, हम उसे नहीं रख सकते."

जब मां यह कह रही थी तो पीड़िता एक कुर्सी पर सिर झुकाए और पल्ला ओढ़े बैठी हुई थीं.
वह उस दहशत और सदमे के बारे में बात भी मुश्किल से ही कर पाती हैं. उन दिनों का ज़िक्र उसकी आँखों में आँसू ले आता है.
अपने 18 महीने के बेटे को खेलता देखते हुए वह कहती हैं, "रात को वह जंगल में ख़रगोश और काले हिरने का शिकार करने जाते. दो लोग मेरे साथ रुक जाते और गलत काम (बलात्कार) करते. फिर उन दो की जगह दूसरे दो आ जाते. महीनों तक हर रात यही होता रहा."
पीड़िता के ससुरालवालों ने उसे घर में घुसने से रोका तो उसके पति भी घर छोड़कर साथ ही आ गए.
वह कहती हैं, "एक रात जब मेरे अपहरणकर्ताओं ने एक खरगोश को काटा तो उसके पेट में से दो नन्हें ख़रगोश निकले. मैं खुद को रोक नहीं पाई और तुरंत उनमें से एक को उठा लिया जिसने मेरी उंगलियां कुतरनी शुरू कर दीं. इससे मुझे अपने बच्चों की याद आ गई और मैंने रोना शुरू कर दिया."

गुजरात, बलात्कार पीड़ितपुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने सात लोगों को नामजद किया है और बताया है कि वह उसे लगातार पीटते थे.
बात करते हुए उसके हाथ और ज़बान कांपते हैं.
वो कहती है, "मुझे रोता देखकर एक को ग़ुस्सा आ गया और वो अपनी बंदूक से मुझे पीटने लगा जिसमें बाकी भी शामिल हो गए. उस घटना के बाद उन्होंने कुछ दिन तक मुझे भूखा रखा. मैंने खाना मांगा तो उन्होंने मुझे ख़रगोश का गोश्त दिया, जो मैं खा नहीं पाई."

पीड़िता के पति ने पिछले साल जुलाई में सूरत में अपनी पत्नी के लापता होने की पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. पीड़िता के अपहरण से पहले शहर में उनकी ज़िंदगी आराम से गुज़र रही थी.
पीड़िता के परिवार को उन्हें ढूंढने के लिए पुलिस और नेताओं के चक्कर काटने पड़े लेकिन कोई मदद नहीं मिली.
अभियुक्त दाफ़र समुदाय से हैं जो गुजरात की ख़ानाबदोश जाति है. पीड़िता गुजरात के देवी पूजक समुदाय की हैं.
पीड़िता की मांसात नामजद अभियुक्तों में से पांच को गिरफ़्तार कर लिया गया है. इस मामले में गुजरात पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे.
पीड़िता की मां कहती हैं, "उसके ग़ायब होने के कुछ दिन बाद मुझे उसके अपहरणकर्ताओं के बारे में पता चला. मैंने पुलिस को बताया तो उन्होंने कहा कि वह अपनी मर्ज़ी से उनके साथ रह रही है और उसने यह लिखकर दिया है कि उसके लिव-इन संबंध हैं. लेकिन कौन क़ैद रहने और बलात्कार किए जाने के लिए अपनी मर्ज़ी से काग़ज़ पर दस्तखत करता है. पुलिस ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया."
लेकिन इस मामले के जांच अधिकारी पुलिस उपाध्यक्ष तेजस पटेल इससे अनभिज्ञता जताते हैं, "पीड़िता या उसके परिवार के साथ इस तरह के व्यवहार के बारे में मुझे नहीं पता. हमने पांच अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया है. एक अभियुक्त, गांव के सरपंच ने अपनी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ अदालत से स्टे ऑर्डर ले लिया है और एक फ़रार है."

लेकिन पीड़िता और उनके परिजन पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हैं. पीड़िता के पारिवारिक दोस्त सरदारसिंह मोरी कहते हैं, "अपहर्ताओं के कब्ज़े से बच निकलने में कामयाब होने पर पीड़िता और उनकी मां घंटों तक जंगल में छुपे रहे, उसके बाद हिम्मत जुटाकर वह पुलिस के पास गए. लेकिन जैसी आशंका थी स्थानीय पुलिसकर्मियों ने शिकायत लिखने से इनकार कर दिया और फिर हमने महिला पुलिस हेल्पलाइन को फ़ोन किया जिसके बाद न चाहते हुए भी हमारी शिकायत लिखी गई."
पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए एफ़आईआर के 48 घंटे बाद ले जाया गया. हालांकि मामले के कोर्ट में जाने और राष्ट्रीय अख़बारों की सुर्खियां बनने के बाद गुजरात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले का निरीक्षण शुरू किया.
गुजरात, बलात्कार पीड़ित
इस मामले में पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर रोष का सामना कर रही गुजरात सरकार ने गुरुवार को पीड़िता को 20,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी.
उसके लिए अब बलात्कार और गर्भ में पल रहे बच्चे को पैदा करने की मुश्किल से ज्यादा बड़ी चुनौती है 'पवित्र' होने की कवायद को पार करना.
क्या होता है पवित्र करने का ये तरीका….??
बीबीसी हिंदी

Friday, September 27, 2013

पहले मेरी 12 साल की बच्ची के साथ आठ लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया फिर उसे तीन टुकड़ों में काटकर तेजाब से जला दिया..!


थाना फुगाना, गांव लाख। सात सितंबर की शाम को जाट पंचायत खत्म होने के बाद वे अपने घरों को लौट आये थे। उनके लौटने के साथ ही गांव में शोर शराबा और हलचल बढ़ गई थी। गांव के मंदिर से ऐलान किया गया कि सभी हिन्दू मंदिर में इकट्ठा हो जाएं। इस ऐलान के बाद जो जहां था, उसने अपनी तैयारी शुरू कर दी। हथियारबंदी के साथ साथ मुसलमानों के खिलाफ नारेबाजी बुलंद होने लगी। मोहम्मद मुकीम इसी लाख गांव के निवासी थे। नारेबाजी सुनकर वे गांव के प्रधान बिल्लू जाट के पास पहुंचे। उन्होंने बिल्लू जाट से अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई। बिल्लू जाट ने उनसे कहा कि सारे मुसलमान गांव छोड़ दें। महिलाएं और बच्चों को रहने दें, उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।
शामली में एक राहत कैम्प में इस तरह गुजारा कर रहे हैं बच्चे
लेकिन बिल्लू जाट का यह आश्वासन बहुत आश्वस्त करनेवाला नहीं था। बिल्लू जाट के घर पर ही तैयारियां हो रही थीं। शीशियों में केरोसिन और तेजाब भरे जा रहे थे। 7 सितंबर की सारी रात शायद तैयारियों में ही बीत गई और आखिरकार 8 सितंबर की सुबह कहर टूट पड़ा। सुबह नौ बजे से मुसलमानों को खोजकर खत्म करने की जो मुहिम शुरू हुई तो मुकीम चार दिनों तक गन्ने के खेत में छिपे रहे। बीवी और बच्चे पीछे छूट गये थे। उन्हें नहीं मालूम कि इन चार दिनों में उनके साथ क्या हुआ। जब मालूम चला तो वे जीते जी मर गये। इन्हीं चार दिनों के दरम्यान उनकी 12 साल की बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उसे तेजाब से जलाकर मार दिया गया। अब एक राहत शिविर में पत्नी के साथ पनाह लिए मुकीम बताते हैं आखिरी बार उन्होंने अपनी बेटी को आठ गुण्डों से घिरा देखा था। चार दिन बाद जब वे बाहर निकले तो उन्हें फुगाना क्षेत्र से एक लाश की शिनाख्त के लिए बुलाया गया। उन्होंने तीन टुकड़ों में काट दी गई अपनी बेटी की अधजली लाश को पहचान तो लिया लेकिन उस दिन से अपनी पहचान भूल चुके हैं। शिनाख्त के बाद पुलिस ने कागजी कार्रवाई पूरी करके उस सड़ती हुई लाश को तत्काल दफन करवा दिया। मुकीम और उनकी पत्नी वसीला दूसरे हजारों पीड़ितों की तरह ही अब शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं और उन्हें नहीं पता है कि अब यहां से वे कहां जाएंगे।
मुकीम की बेटी के साथ जो हुआ वह अकेली ऐसी जघन्य घटना नहीं है जो कि मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान घटित हुई। लाख गांव के पीडि़तों से तफ्तीश के दौरान वहां पहुंचे रिहाई मंच के एक जांच दल ने पाया है कि इस गांव में इस तरह की और भी कई घटनाएं हुई हैं जहां महिलाओं खासकर कम उम्र की बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार व हत्याएं हुई हैं, जिसे प्रशासन दबा रहा हैं। रिहाई मंच जांच दल में शामिल अवामी कांउसिल फॉर डेमोक्रेसी एंड पीस के असद हयात, राजीव यादव, शरद जायसवाल, गुंजन सिंह, लक्ष्मण प्रसाद और शाहनवाज आलम शामिल हैं। जांच दल से बातचीत में ग्राम फुगाना निवासी आस मोहम्मद की पत्नी के साथ गांव के ही सुधीर जाट, विनोद, सतिंदर ने उन पर हमला किया जिसमें उनके तीन बच्चे गुलजार(10), सादिक(8) और ऐरान(6) बिछड़ गए जिनका पता आज तक नहीं चला। उन्होंने बताया कि उन लोगों ने मेरे कपड़े फाड़ दिये और बुरी तरीके से दांत काटे तभी बगल से एक और लड़की भागी जिसकी तरफ वे लोग लपके और मैं वहां से किसी तरह बच कर भाग पायी। अब वे लोग भी मुकीम की ही तरह कैराना कैम्प में रह रहे हैं।
कैराना कैम्प में रहने वाली फुगाना गांव की ही शबनम का कहना है कि 8 सितम्बर को सुबह 9-10 बजे के करीब नारों का शोर सुनकर हम सब वहां से भागे और पास के लोई गांव में एक घर में छुप गए लेकिन मेरे दादा बूढ़े होने के चलते पीछे छूट गए। जिन्हें हमने अपने गांव के ही विनोद, चसमबीर, अरविंद, हरपाल और अन्य द्वारा गड़ासे से तीन टुकड़े काट कर मारे जाते हुए देखा। फुगना थाने के गांव लिसाढ़ (जहां दो दर्जन से ज्यादा मुसलमान मारे गए) की एक महिला ने बताया कि अख्तरी (65) को जब जिंदा जलाया गया तब उनकी गोद में उनकी पोती भी थी, और वो भी गोद में चिपके-चिपके ही जल गयी, जिन्हें दफनाते वक्त बच्ची को गोद से अलग नहीं किया गया। उस्मानपुर की इमराना की 12 वर्षीय बेटी रजिया जो गांव के मदरसे में पढ़ रही थी। इमराना बताती है कि मदरसे पर बहुत सारे जाटों ने गड़ासे और तलवारों के साथ हमला किया। किसी तरह से रजिया अपने दो भाईयों जावेद(10) और परवेज(8) के साथ भागी और गन्ने के खेतों में पूरा दिन और पूरी रात छुपे रहे। रिहाई मंच जांच दल को पीडि़तों ने बताया कि कई गांवों में मदरसों पर हमला किया गया। जिसमें पढ़ने वाले कई बच्चे-बच्चियां आज तक गायब हैं।
जो लोग अब शरणार्णी शिविरों में उनकी जान तो बच गई है लेकिन शरणार्थी शिविरों में भी हालात अच्छे नहीं है। मलकपुर राहत कैम्प में ही 9 हजार सांप्रदायिक हिंसा पीडि़त मुसलमान खुले आसमान के नीचे बांस की खपच्चियों पर प्लास्टिक बांधकर बारिश के बीच रहने को मजबूर हैं। इस शरमार्थी शिविर में ही अब तक 50 बच्चे जन्म ले चुके हैं और अभी भी 250 महिलाएं गर्भवती हैं। उस कैंप में रह रहे लोगों के लिए दो हफ्ते से अधिक समय में भी यूपी सरकार कोई बुनियादी सुविधा की व्यवस्था नहीं कर पायी है लेकिन वन विभाग ने वन विभाग की जमीन पर बने शरणार्थी शिविर में रह रहे लोगों पर जमीन कब्जा करने का मुकदमा दर्ज करवा दिया है। कैराना रेन्ज के वन अधिकारी नरेन्द्र कुमार पाल ने कैराना थाने में शरणार्थियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाकर उन्हें जमीन खाली करने के लिए कहा है।
रिहाई मंच की ओर से गये इस जांच दल का आरोप है कि समाजवादी पार्टी की सरकार भले ही मुसलमानों के रहनुमाई का बात कर रही हो लेकिन हकीकत में मुसलमानों के कत्लेआम में वह भी बराबर की हिस्सेदार रही है। 5 सितम्बर को लिसाढ़ गांव में आयोजित जाट बिरादरी के गठवारा खाप पंचायत जिसे 52 गांवों के मुखिया और क्षेत्र के दबंग हरिकिशन बाबा ने बुलायी थी उसमें कांग्रेस के पूर्व राज्य सभा सांसद व स्थानीय कांग्रेस विधायक पंकज मलिक के पिता हरिंदर मलिक भी मौजूद थे। इसी पंचायत जिसमें मुसलमानों के जनसंहार की रणनीति बनी उसका संचालन शामली जिला के समाजवादी पार्टी सचिव डॉक्टर विनोद मलिक ने किया जिसमें हुकूम सिंह और तरूण अग्रवाल समेत कई भाजपा नेता भी शामिल थे। हरिकिशन समेत सभी नेताओं पर धारा 120 बी के तहत आपराधिक षडयंत्र रचने का मुकदमा दर्ज है लेकिन आज तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया।
(शामली के कांधला, कैराना, मलकपुर, खुरगान सांप्रदायिक हिंसा पीडि़त कैंप से रिहाई मंच जांच दल की रिपोर्ट का संपादित हिस्सा)

Friday, August 30, 2013

टेंशन लेने का बिलकुल नहीं बापू सा....!


चिंता को नी करो बापू सा....पहले भी आप ही के आश्रम के दो बच्चों की मौत का झूठ आरोप लगा कर आपको बदनाम किया था, क्या हुआ ? कुछ नहीं ना ! सो अब इस बार आपको नाबालिग बच्ची से बलात्कार के झूठे आरोप लगा बदनाम कर रहे हैं, आपके पुत्र महोदय भी कह रहे थे कि मानसिक बीमार बच्ची है...उसका क्या. ? उस बेचारी को  क्या पता कि यौन अपराध क्या होता है, या बलात्कार क्या होता है ? शायद उस नाबालिग बच्ची का पिता भी पागल है जो अपनी बिटिया की इज्ज़त पूरे देश में उछालता  फिर रहा है...? या फिर शायद कोई षड्यंत्र ? आप ही कह रहे थे ना कि किसी मेडम का किया धरा है, क्या करें शायद मेडम को कोई और काम भी तो नहीं है, आप से बड़ा राह का काँटा शायद ही कोई और हो उनके लिए,  इसी लिए शायद आपके दरवाज़े पर राजस्थान पुलिस 7 घंटे समन देने के लिए बैठी रही ? और शायद इसी लिए आप को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया, सिर्फ पूछताछ के लिए ही बुलाया है ? वो भी घटना घटित होने के इतने दिन बाद ! अब जब आपसे लोग पालिटिकल बदला लेने उतारू हो गए हैं तो चिंता काहे की.....आपके बचाव लिए भी तो पालिटिकल लोग घटना के प्रारंभ से ही साथ तो हैं, आपके निर्दोष होने की दुहाइयां तो पहले दिन से ही दी जाने लगी हैं...सो डोन्ट वरी बापू सा !
साध्वी उमा जी ने पहले ही दिन आपको निर्दोष बता दिया था, सो डरने का बिलकुल नहीं !
आपके पास तो दिव्य शक्ति है, जैसा कि आपने भक्तों को बताया था कि कैसे आपने आपके क्रेश होते हुए हेलीकाप्टर को ध्वस्त होने से बचाया, और लोगों सहित खुद को भी सकुशल धरती पर ले आये...जब इतनी दिव्य शक्ति है,  तो घबराने का नहीं ! खैर छोडिये...चिंतित मत होइये....आप निर्मल बाबा को ही देखिये ..कितना बदनाम किया इन्ही लोगों ने, देश का सारा प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनके पीछे पंजे झाड कर पड़ा हुआ था.....क्या हुआ..?? कुछ नहीं ना...आज भी देश के बड़े बड़े न्यूज़ चेनल अपने Prime Time में निर्मल बाबा का दरबार live दिखा रहे हैं, कृपा खूब ठाठ बाँट से बँट रही है, और बांटी जा रही है,.....इधर भी उधर भी....सो, चिंता नी कोई बात नही...यदि कल जेल चले भी गए तो आपका रुतबा कम थोड़े ही होगा, ना ही आपकी दिव्य शक्ति कम होगी...फिर आपके लाखों भक्तगण हैं ना दोबारा आपको सर आँखों पर बैठाने के लिए...फिर से वही आश्रम होगा...फिर से आप अपने सभी लीलाओं और पुराने कार्य कलापों के लिए स्वतंत्र होंगे, सो टेंशन लेने का बिलकुल नहीं....!!

-आसिफ़ अली हाशमी

Monday, August 26, 2013

आसाराम बापू और दाभोलकर के बीच


लाख टके का सवाल है। क्या बलात्कार के मामले में आसाराम बापू गिरफ्तार होंगे या हमेशा की तरह आरोपों के दलदल से साफ बच निकलेंगे? एक और प्रश्न है। क्या डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर के कातिल धरे जाएंगे? चौंकिए मत। दाभोलकर और आसाराम के मामलों में असमानता के बावजूद अखंड रिश्ता है। आसाराम संत हैं, लेकिन उन पर कदाचार का आरोप है। दाभोलकर पाखंड के खिलाफ अलख जगाते हुए मारे गए। एक अपराध का शिकार हुआ, तो दूसरे पर गुनाह की तोहमत है। इंसानों के बीच कभी-कभी ऐसे विरोधाभास अनचाहे जुड़ाव रचते हैं। आसाराम से शुरू करता हूं। 15-20 साल पुरानी बात है। आगरा स्थित दफ्तर में कुछ लोग मेरे सामने बैठे थे, सब के सब धनी-मानी और नामी। उनके मुखिया ने बात शुरू की कि ‘राष्ट्रसंत’ आसाराम बापू कुछ महीनों बाद यहां प्रवचन के लिए आने वाले हैं। हम लोग इस आयोजन की समिति से जुड़े हुए हैं। आप और आपके अखबार से सहयोग की अपेक्षा है। धार्मिक हस्तियों के मामले में मैं हमेशा अज्ञानी रहा हूं। पहले कभी ‘बापू’ का नाम नहीं सुना था। अपने अज्ञान को छिपाए बिना मैंने पूछ लिया कि ये कौन साहब हैं? कुछ सेकंड के लिए कमरे में सन्नाटा पसर गया। उनमें से एक ने बताया कि बापू गुजरात के ‘महान संत’ हैं। वह जहां जाते हैं, लाखों लोग जुटते हैं। उनके प्रवचन किसी अमृत वर्षा से कम नहीं होते।
उन्हीं लोगों ने यह भी बताया कि बापू के प्रवचन के लिए साउंड सिस्टम, तंबू-कनात, भोजन, जलपान आदि के लिए लोग पहले से ही नियत हैं। हमें सिर्फ उनका भुगतान करना है। पत्रकारीय जिज्ञासा में मैंने उनसे पूछा कि तब तो इस आयोजन पर लाखों खर्च हो जाएंगे? कहां से जुटा रहे हैं आप लोग इतना? जवाब साफ-साफ नहीं मिला, पर वह बैठक एक अबूझ खटास के साथ समाप्त हुई। मैंने यह भी पता लगाने की कोशिश नहीं की कि इंतजामात के बारे में उन लोगों के दावे कितने सही या गलत हैं, अलबत्ता अनजाने में ही आसाराम के आने का इंतजार करने लगा। संयोग से वह कोठी मीना बाजार के मैदान में प्रवचन करने वाले थे। मैं जिस मकान में रहता था, उसकी छत और बालकनी से वहां का दृश्य साफ दिखता है। एक दिन मैंने भी मैदान का जायजा लिया और विस्मित रह गया। सैकड़ों बड़े-बूढ़े, औरतें और बच्चे वहां मौजूद थे। बापू नियत समय पर प्रवचन करते थे। लाउडस्पीकर की मेहरबानी से एक दिन सुनने की कोशिश की। नि:संदेह, उन्हें लोगों को जोड़ने और बांधने में महारत हासिल थी। उस दिन यह भी देखा कि बापू मर्सिडीज में चलते हैं और कार से ही दर्शनार्थियों को हाथ हिलाकर आशीर्वाद भी देते रहते हैं।
उनके प्रति लोगों की लालसा और जिज्ञासा स्पष्ट थी। कुछ ही साल पहले अमेरिका के ओरेगॉन में ओशो यानी रजनीश संगीन आरोपों में गिरफ्तार हुए थे। तब उनके हिमायतियों ने कहा था कि संसार की सबसे ताकतवर सरकार जबलपुर के पास जन्मे इस शख्स की ओजस्वी वाणी से घबरा गई। किसी ने यह भी उड़ाने का प्रयास किया था कि यह कुछ भयभीत ईसाइयों की साजिश थी। हकीकत जो भी हो, पर यह सच है कि हम जैसे लोग, जिन्होंने रजनीश के विचारों में एक अलग तरह की आब देखी थी, हताश हुए थे। अखबारों में यहां तक छपा था कि आचार्य से ओशो तक का सफर तय कर चुके रजनीश रॉल्स-रॉयस कारों का बेड़ा रखते थे और यह भी कि उन्हें एक निश्चित तापमान में रहना ही पसंद था। एक शख्स, जो अपने विचारों से सादगी की प्रेरणा देता रहा हो, उसके बारे में ऐसी जानकारी हिला देने वाली थी। अब ‘बापू’ सशरीर सामने थे। उन दिनों मन में सवाल उठते थे कि जिस देश में हम ‘धारयति इति धर्म:’ की परंपरा का पालन करते रहे हों, वहां धार्मिक लोगों को इतने तामझाम की जरूरत क्या है? यदि किसी के विचारों में अलख जगाने की शक्ति है, तो उसे प्रचार की क्या आवश्यकता? हम हिन्दुस्तानी मानते आए हैं कि मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाए।
मतलब, सधुक्कड़ी फक्कड़पन का प्रतीक है। जहां रात हुई, वहीं रम लिए और जो मिला, उसी से पेट भर लिया, पर वहां तो आस्था के नाम पर आयोजन का महाकुंभ लगा हुआ था। बरसों बाद जब ‘बापू’ पर हत्या कराने के प्रयास, बच्चों की बलि, जमीन हथियाने जैसे आरोप लगने लगे, तो उनके प्रति मेरे व्याकुल प्रश्नों की सूची कुछ और लंबी हो गई। हमारे यहां साधुओं के परिवार की परंपरा नहीं है, पर उनके पुत्र भी मिलते-जुलते आरोपों के शिकार होते रहे हैं। पता नहीं, कानूनी एजेंसियों ने अपना काम कितनी तन्मयता से किया, पर यह सच है कि उन पर कोई आंच नहीं आई। इसीलिए यह सवाल उठता है कि क्या इस बार उन पर उचित कानूनी कार्रवाई होगी या उनके ऊपर लगे आरोप गलत साबित होंगे? वह और उनके आश्रमवासी तो पीड़ित कन्या पर झूठ बोलने का दोष मढ़ ही रहे हैं। अगर वह ‘बापू’ का नाम किसी साजिश के तहत ले रही है, तो इसके सूत्रधार कौन हैं? पुलिस ने उसकी डॉक्टरी जांच कराई है। क्या उसे भी ‘मैनेज’ किया गया है? उत्तर के लिए इंतजार करना होगा।
ऐसा नहीं है कि ‘बापू’ इन आरोपों के अकेले शिकार हैं। स्वामी नित्यानंद का मामला आपको याद होगा। तमाम महिलाओं से रिश्ते रखने के आरोपी इस तथाकथित संत को तो 52 दिन जेल में रहना पड़ा था। यह बात अलग है कि अब वह बाहर हैं और उनके प्रवचनों का रंग फिर से चोखा होता जा रहा है। 2010 में एक टीवी चैनल ने तमाम प्रवचनकर्ताओं पर स्टिंग ऑपरेशन किया था। उसमें ये बाबा लोग हवाला के जरिये काले धन को सफेद करने का आश्वासन देते दिखाए गए थे। तब भी सवाल उठा था कि ऐसी कलंक कथाएं कब तक चलती रहेंगी? जाहिर है, ऐसे लोगों के पास धन और जन-बल इतना होता है कि वे अव्वल तो कानून के घेरे में नहीं आते और आ भी जाते हैं, तो नित्यानंद की तरह दोबारा अपने स्वार्थ का सरंजाम जुटाने में कामयाब हो जाते हैं। इसके उलट नरेंद्र दाभोलकर जैसे लोग हमेशा अकेले पाए जाते हैं।
धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ अलख जगाने वाला यह जागृत व्यक्ति दशकों से अपना काम मिशन की तरह करने में जुटा था। इसीलिए जिस तरह यह सवाल फिजा में तैर रहा है कि बापू गिरफ्तार होंगे या नहीं, उसी तरह यह भी गौरतलब है कि दाभोलकर के हत्यारे अपने अंजाम तक पहुंचेंगे या नहीं? उनके कातिल यकीनन कुछ ताकतवर लोगों द्वारा संरक्षित हैं। क्या कमाल है? पाप से जूझने वाले अकेले पड़ जाते हैं और पापी ताकतवर होते जाते हैं। पर यकीन जानिए, यह लाचारी का समय नहीं है। डॉक्टर दाभोलकर की हत्या पर इतना हो-हल्ला मचा कि महाराष्ट्र सरकार को अंधविश्वास विरोधी अध्यादेश लाना पड़ा। उम्मीद है कि सरोकार संपन्न लोग उनके कातिलों को कानून की चौखट तक लाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।
इसके साथ ही एक बात आपको भी तय करनी है। इक्कीसवीं सदी के भारत को डॉक्टर दाभोलकर जैसे लोग चाहिए या शोशेबाजी के जरिये हमारी जेबों से पैसा निकालकर हम ही को धमकाने वाले पाखंडी? भूलिए मत, लोकतंत्र में गेंद कभी-कभी आम आदमी के पाले में भी आती है।

~प्याली में तूफान 

Wednesday, December 19, 2012

गैंगरेपः घड़ियाली आंसू बहाना नेताओं का काम है, आपका नहीं



 क्या सड़कों पर हैवानियत अचानक दौड़ी? क्या जो हुआ वो सिर्फ कुछ सिरफिरे दरिंदों की करतूत थी? पीड़िता का दर्द बयां करने में टीवी एंकरों का गला रूंध गया. अखबारों के पहले पन्ने काले हो गए. दरिंदगी और हैवानियत की कहानी लिखने के लिए पत्रकारों को शब्द नाकाफी लगे. सड़कें चिल्लाईं… संसद रोई… नेताओं के आंसू बहे तो महिला अधिकारों की बात करने वालों ने सीना पीटा.
2 घंटे के घटनाक्रम ने सदियों की मानवता पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए. अचानक हर चेहरा संदिग्ध नज़र आने लगा. हर लड़की बेबस तो हर मां खौफज़दा. हर बाप चिंतित… राह चलती लड़की पर सीटियां मारने वाले लड़के भी बहनों के भाई हो गए.
लेकिन क्या यह सबकुछ अचानक हुआ? क्या 23 साल की मेडिकल छात्रा के साथ हुई घटना के बाद की हमारी प्रतिक्रियाएं भावुकता की अतिश्योंक्ति नहीं है? क्या हम संवेदनशील होने का दिखावा मात्र नहीं कर रहे हैं?
रविवार रात दिल्ली में हुए घटनाक्रम को किसी लड़की का दुर्भाग्य या कुछ सिरफिरों की दरिंदगी कहकर नहीं टाला जा सकता. सफ़दरजंग अस्पताल में मौत से जूझ रही छात्रा के साथ गैंगरेप दरिंदों ने नहीं बल्कि हमारे सिस्टम ने किया है. और जो सिस्टम आज है उसके लिए जितने पुलिस वाले और नेता जिम्मेदार हैं उससे कहीं ज्यादा हम.
नोएडा से दिल्ली जाने वाली चारटर्ड बसों में सफ़र करने वाली कौन सी लड़की ड्राइवर और कंडक्टर के व्यवहार से परिचित नहीं है? कौन सी चौकी ऐसी है जहां इन बसों से हफ्ता नहीं पहुंचता? क्या हमारी नंगी आंखें इस सच को नहीं देखती?
नोएडा से ही दिल्ली जाने वाली 392 नंबर बस में सफ़र करने वाला कौन सा यात्री ऐसा है जो प्राइवेट बसों की मनमानी और डीटीसी बसों की बेबसी (कभी-कभी मजबूर किया जाता है तो अक्सर खरीद लिया जाता है) से परिचित नहीं है? क्या ये सब अचानक हुआ है. ये तो  होता आ रहा है सालों से और शायद होता रहेगा. सड़कों के चिल्लाने और संसद के रोने के बाद भी. क्योंकि दिखावे मात्र से बदलाव नहीं आता.

बेशर्मी देखिए! सिस्टम को रोज़ बिकता देखकर, रोज बद से बदतर होता देखकर, और कभी-कभी इसे दूषति करने वाले ही हाथों में कैंडल लेकर मार्च निकाल रहे हैं. क्यों हमारी संवेदनशीलता इंतजार करती है किसी लड़की की जिंदगी के तबाह होने का?
क्यों हम एक ट्रैफिक हवलदार को रिश्वत देते हुए यह नहीं सोचते कि हम महिलाओं की, बच्चों की, बुजुर्गों की सुरक्षा देने वाले सिस्टम को प्रदूषित कर रहे हैं. क्यों एक बेबस रेहड़ी वाले, छोले कूलचे बेचकर अपने परिवार का पेट पालने वाले, सड़क किनारे सब्जी बेचने वाले से पुलिसवालों को रिश्वत लेते देखकर हमारे मन में यह ख्याल नहीं आता कि इन पुलिसवालों का काम रिश्वत लेना नहीं, समाज को सुरक्षित रखना है?
सड़क पर चलते हैं और पुलिसवालों को वसूली करते नहीं देखा? दोबारा सोचिए जनाब, या तो आप झूठ बोल रहे हैं या फिर भारत नहीं किसी और मुल्क की सड़कों पर चलते हैं. कितनी बार आपने वसूली रोकने की कोशिश की. अंतिम बार कब था जब आपके मन में ख्याल आया कि सिस्टम प्रदूषित हो रहा है. और क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने अपने इस विचार पर दोबारा सोचा हो और कुछ किया हो?
अच्छा सड़कछाप बातें छोड़िए. आप तो हाई क्लास सिटिजन हैं. आपसे आपके स्तर की बात करते हैं. कभी कनॉट प्लेस या फिर प्रगति मैदान ट्रेड फेयर गए हैं? तो आईसक्रीम तो खाई होगी. कभी रेट पर गौर किया है?
20 रुपये की आईसक्रीम 25 में मिलती है और 25 वाली 30 में. कभी पूछिएगा. आइस्क्रीम बेचने वाला बताएगा कि हर आइस्क्रीम का रेट 5 रुपये महंगा क्यों हैं? वो बताएगा कि गश्त करके महिलाओं को सुरक्षित महसूस करवाने वाली पीसीआर वैन की असल ड्यूटी क्या है. वो आपको बताएगा कि संसद में जब गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे पीसीआर की गश्त बढ़ाने की बात कर रहे थे तो उनका असल मतलब महिलाओं को सुरक्षित महसूस कराना नहीं बल्कि अधिक वसूली करने की मंजूरी देना था.
और देखिए अपने पत्रकार साथियों को, कैसे इनका गला रूंध गया है. छात्रा के रेप के बाद आधी रात को सड़कों पर उतर आए हैं हकीकत जानने के लिए. जैसे कभी इन्होंने अपने दफ्तर के नीचे गोलगप्पे बेचने वाले बच्चे से हफ्ता वसूलते पुलिसवालों को कभी देखा ही नहीं. कितनी मासूमियत से ये सिस्टम की वो हकीकत खोजने की कोशिश कर रहे हैं जिसे इनकी आंखें हर दिन अनदेखा करती हैं.
चलिए छोड़िए ये बेकार की बातें. सिस्टम पर अपना फ्रस्ट्रेशन निकालते हैं. एक दो कैंडल हाथ में थामते हैं. मार्च निकालते हैं. और अब तो नारेबाजी की भी दो साल की प्रेक्टिस हो गई है. हल्लाबोल करते हैं. सड़क संसद को हिलाते हैं. अगर पांच रुपये महंगी आइस्क्रीम खा सकते हैं, 100 रुपये ट्रैफिक हवलदार को थमा सकते हैं तो फिर 2 रुपये की कैंडिल तो खरीद ही सकते हैं. और अगर यह भी नहीं कर सके तो फिर फेसबुक-ट्विटर तो है ही, संवेदनशीलता के फूहड़ प्रदर्शन के लिए…
वैसे अगर दिखावे से परे आप कुछ करना चाहते हैं तो प्रतिरोध कीजिए लेकिन सिर्फ शब्दों से नहीं. रिश्वत लेते सिपाही को टोकिए. वसूली करते अफसर पर सवाल उठाइये. पूछिए कि अवैध बसें कैसे चल रही हैं. ऑटो वाला अधिक किराया मांगे तो 100 नंबर पर कॉल कीजिए क्योंकि कैंडल मार्च निकालकर आप किसी की जिम्मेदारी तय नहीं कर सकते. शिकायत करके, टोक कर, सबूत जुटा कर सकते हैं. और यकीन जानिए. जिस दिन पुलिस अपना काम करने लगी उस दिन किसी की हिम्मत नहीं होगी जो किसी बहन, बेटी या बहू पर नज़र टेढ़ी कर सके. लेकिन क्या हम यह लांग टर्म उपाय अपनाने के लिए तैयार हैं? जब प्रदर्शन के शॉर्टकट से काम चल रहा है तो क्या हम शिकायत करने, गलत को गलत कहने, वसूली रोकने का जोखिम उठा पाएंगे?
~दिलनवाज पाशा

Saturday, October 20, 2012

महान लोकतंत्र कि सौतेली संताने



सीता की उम्र लगभग सत्रह साल ! शाम को अपने घर में बर्तन साफ़ कर रही थी! तभी सलवा जुडूम और सुरक्षा बलों ने गाँव पर हमला बोल दिया !
गाँव के लोग जान बचाने के लिये जंगल की तरफ भागने लगे ! सीता के माँ बाप भी घर पर ही थे ! तभी चार एस पी ओ ( विशेष पुलिस अधिकारी ) ने सीता के घर पर धावा बोल दिया ! एक पुलिस अधिकारी ने सीता की चोटी पकड़ी और घर के भीतर ले कर जाने के लिये घसीटने लगा ! सीता के माता पिता ने बेटी को बचाने की कोशिश की ! दो पुलिस अधिकारियों ने सीता के माँ बाप को बन्दूक के कुंदे से मार कर गिरा दिया ! एक पुलिस अधिकारी ने सीता को पशु की तरह कंधे पर उठा कर घर के भीतर ले जाकर पटक दिया ! चारों पुलिस अधिकारियों ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया ! बूढ़े माँ बाप दरवाजा पीट पीट कर अपनी बेटी को छोड़ देने की प्रार्थना करते रहे !
चारों पुलिस अधिकारियों ने सीता से बलात्कार करने के बाद ! सीता के कान और नाक में पहने नथ और कुंडल खींच लिये ! सीता के पिता ने बैल खरीदने के लिये दस हज़ार रूपये भी घर में पेटी में रखे थे ! पुलिस अधिकारियों ने वो रूपये भी लूट लिये ! इसके बाद सीता को ज़मीन पर पड़ा छोड़ कर चारों पुलिस अधिकारी अपने अन्य साथियों के साथ दूसरे आदिवासियों के घरों में लूटपाट करने चल दिये !
सीता हिम्मती लड़की थी !उसने अगले दिन अपने पिता से कहा कि मैं इस घटना की शिकायत थाने में कराऊंगी और इन चारों को सजा दिलवाऊंगी ! सीता थाने पहुँची ! सीता से बलात्कार करने वाले बलात्कारी थाने में ही थे ! वे चारों बलात्कारी पुलिस अधिकारी सीता को देख कर थानेदार के पास कुर्सियों पर आ कर बैठ गये ! सीता ने अपने साथ घटी बलात्कार की घटना के बारे में थानेदार को बताया ! थानेदार हँसने लगा उसके साथ चारों बलात्कारी भी हँसने लगे ! थानेदार ने कहा जल्दी यहाँ से भाग जा नहीं तो दुबारा बलात्कार हो जाएगा !
सीता और उसके पिता वापिस आ गये ! सीता नी हार नहीं मानी उसे कही से हमारे बारे में पता चला ! सीता हमारे आश्रम आयी ! हमने सीता की शिकायत पुलिस अधीक्षक को भेजी ! पुलिस अधीक्षक ने कार्यवाही तो दूर महीने भर तक कोई जवाब भी नहीं दिया ! फिर हम कोर्ट में गये ! कोर्ट ने चारों आरोपी विशेष पुलिस अधिकारियों को अपना पक्ष रखने के लिये समन भेजा ! ये चारों आरोपी नहीं आये ! कोर्ट ने इन चारों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया ! इन् चारों के नाम हैं किच्चे नंदा जो पुलिस अधीक्षक का बाडी गार्ड है दूसरा है विजय जो कोंटा ब्लाक कांग्रस का अध्यक्ष है ! मंगल और राजू पुलिस अधिकारी हैं और वे भी थाने की भीतर ही रहते हैं !
सरकार ने कोर्ट में कहा कि ये चारों विशेष पुलिस अधिकारी फरार हैं और निकट भविष्य में इनके मिलने की कोई आशा भी नहीं है ! अदालत ने केस को अभिलेखागार में बंद कर के रखने का आदेश दे दिया !
इधर मैं दिल्ली आकर गृह मंत्री श्री चिदम्बरम से मिला और उन्हें दंतेवाड़ा आकर आदिवासियों की शिकायतें सुनने का सुझाव दिया ! चिदम्बरम को मैंने एक सीडी भी सौंपी जिसमे इस बलात्कार कांड का भी ज़िक्र था !
श्री चिदम्बरम के दंतेवाड़ा आकर सीता से मिलने के दो सप्ताह पहले बलात्कारी पुलिस अधिकारी पूरे पुलिस दल बल के साथ सीता के गाँव में आये और सीता और उसकी तीन और बलात्कार पीड़ित सहेलियों समेत उठा कर थाने ले आये ! थाने में फिर से वही बलात्कारों का दौर शुरू हुआ जो पांच दिन चलता रहा ! इस बार थाने में इन्हें पीटा भी गया और पांच दिन तक खाना नहीं दिया गया !
सीता के गाँव से मुझे फोन आया ! मैंने श्री चिदम्बरम को , देश के गृह सचिव को , छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को , छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक को , दंतेवाड़ा के कलेक्टर को और पुलिस अधीक्षक को फोन पर सूचना दी ! मैंने प्रार्थना की कि इन लड़कियों को बचा लीजिए !
लेकिन किसी ने इन लड़कियों को नहीं बचाया !
पांच दिन बाद सीता और उसकी तीन सहेलियों को पुलिस ने वापिस लाकर गाँव के चौराहे पर फेंक दिया और गांव वालों को चेतावनी दी कि अब अगर किसी ने हिमांशु से बात की तो पूरे गाँव को आग लगा देंगे !
इसके बाद मैं सीता और उसकी सहेलियों से मिलने उनके गाँव पहुंचा ! पुलिस विभाग ने मेरे पीछे एक जीप भर कर पुलिस वाले लगा दिये !
गाँव वालों ने रोते हुए हाथ जोड़ कर कहा मैं वापिस चला जाऊं , उन्हें अब मेरी और मदद नहीं चाहिये !
ये बलात्कारी अभी भी खुले आम नए गावों पर हमले कर रहे हैं ! नई लड़कियों के साथ बलात्कार कर रहे हैं ! पिछले साल इन लोगों ने फिर से तीन गावों को जला दिया ! जब स्वामी अग्निवेश इन जले हुए गाँव वालों के लिये राहत सामग्री लेकर दंतेवाड़ा पहुँचे तो इसी विजय के नेतृत्व में विशेष पुलिस अधिकारियों के दल ने स्वामी अग्निवेश के दल पर हमला किया ! बाकी के बलात्कारी भी थाने में ही रहते हैं और नियमित सरकारी वेतन लेते हैं !लेकिन सरकार इन्हें कोर्ट में फरार बताती है !
मैं नहीं जानता सीता और उसकी तीनो सहेलियां अब किस हाल में हैं !
पर इस लड़ाई में सीता नहीं हारी बल्कि इस देश के लोकतंत्र ने सीता के सामने दम तोड़ दिया है !

Wednesday, August 01, 2012

बलात्कार पर दोहरे मानदंड क्यों? सज़ा मौत क्यों नहीं…



गुवाहाटी में एक युवती के साथ छेड़खानी की घटना के बाद मीडिया ने जिस तरह उसका चीर हरण किया उस पर कई सवाल खड़े हुए हैं. घटना का वीडियो बनाने वाले रिपोर्टर का गिरफ्तार होना पत्रकारिता के गिरते स्तर का एक और प्रमाण है. घटना में टीआरपी थी इसलिए मीडिया इस पर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़ी, वरना दलित और गरीब लड़कीयों से बलात्कर की खबरें रोज पेज आठ पर सिंगल कॉलम में निपट जाती हैं.
हमारे देश में हर दिन गरीब और दलित युवतियों के साथ बलात्कार होते है, लेकिन उन पर  हुआ जुल्म मीडिया में इसलिए नहीं दिखाया जाता क्योंकि वे लड़कियां गरीब या दलित परिवार की होती हैं, पब और डिस्को के बारे में जानती तक नहीं, जिन्दगी में कभी जींस नहीं पहना… चेहरे पर शर्म लेकर चलती हैं… यानि पिछड़ी महिलाओं का प्रतीक हैं. अगर माडर्न और फेशेनेबल लड़की के साथ छेड़खानी हो तो पूरा देश उबल पड़े और अगर रोजाना सैंकड़ों गरीब-दलित लड़कियों की इज्जत तार-तार हो जाए तो किसी को फर्क न पड़े…

दलितों के साथ बलात्कार के अनेको उद्धाहरण दिए जा सकते हैं, जिन पर हमारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नज़र नहीं गई. दो दिन पहले ही गोवा की राजधानी पणजी में 17 साल की एक लड़की ने दम तोड़ दिया. इस बच्ची ने अपने साथ बलात्कार करने वाले आरोपी शिक्षक की रिहाई की ख़बर सुनते ही खुद को आग लगा ली थी. लड़की ने अपनी अंतिम चिट्ठी में लिखा कि वह डर से इतना बड़ा क़दम उठा रही है, क्योंकि आरोपी ज़मानत पर रिहा हो चुका है.
ओडिशा के पुरी जिले में लगभग सात महीने तक कोमा में रहने के बाद कथित रूप से सामूहिक बलात्कार की शिकार 19 वर्षीय दलित लड़की बबीना की पिछले महीने मौत हो गई. बताया जाता है कि पिछले साल 28 नवंबर को पुरी जिले में अर्जुनगोदा गांव में बबीना एक खेत के पास अर्धनग्न, बेहोश और अधमरी हालत में मिली. उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था और उसके बाद उनकी गला घोंटकर हत्या करने की कोशिश की गई थी. तब से वो कोमा में थी.
हमारी दिल्ली तो बाकी राज्यों से चार क़दम आगे ही है. दिल्ली में एक व्यक्ति ने 15 साल की लड़की को अगवा कर लिया. इस व्यक्ति ने अपनी पत्नी की मदद से इस नाबालिग से बलात्कार किया. इसके बाद पति-पत्नी ने  इसे रोहिणी इलाके में रहने वाले एक व्यक्ति को बेच दिया. उसने भी इस बच्ची के साथ अपना मुंह काला किया.
और जब हमारे रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो क्या होगा? उत्तर प्रदेश की पुलिस ऐसा करने में माहिर है. उत्तरप्रदेश में कुशीनगर जिले के खड्डा थाना परिसर में पुलिसकर्मियों द्वारा एक महिला को जबरन शराब पिलाकर सामूहिक बलात्कार किये जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया. ऐसे बेशुमार मामले हैं, जिसमें हमारे रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं. या फिर महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन बन जाती हैं.
आगे की कहानी तो और भी भयावह है. केरल के सुधीर नाम के एक व्यक्ति ने न केवल अपनी बेटी का बलात्कार किया बल्कि पैसों के लिए उसे कम से कम 200 लोगों के साथ यौन संबंध बनाने पर भी मजबूर किया. इस मामले में पुलिस ने 106 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें एक वकील, एक डॉक्टर, एक फिल्म प्रोड्यूसर और एक व्यवसायी शामिल है, जिन्होंने इस 14 वर्षीय लड़की का शोषण किया है. यही नहीं, अर्नाकुलम के अतिरिक्त सत्र-न्यायालय के न्यायाधीश पीजी अजित कुमार ने बताया कि भारत में कुल 26 ऐसे मामले हैं जिसमें लोगों ने अपनी बेटियों का बलात्कार किया है.

क्या यह घटनाएं हमारी दोहरी मानसिकता और मानदंड़ों का प्रमाण नहीं ?

कई मामले ऐसे हैं जो पुलिस थानों तक पहुंचते हैं, लेकिन उनका होता कुछ नहीं हैं. भारतीय क्राइम रिकार्डस ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक देश में पिछले साल 24,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज किए गए लेकिन उनमें से महज 26 प्रतिशत मामलों में ही दोषियों को सजा हो पाई. और सच तो यह है कि समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों के चलते बलात्कार के ज्यादातर मामले दर्ज हो ही नहीं पाते हैं. हमारी अदालतों पर भी अब दलितों व गरीबों का बहुत ज़्यादा यक़ीन रह नहीं गया है. हालांकि इन दिनों हमारी अदालत इन दिनों इस मामले पर काफी सक्रिय दिखाई दे रही है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 15 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह के बाद जब संभोग होता है तो उसे बलात्कार माना जाएगा. चाहे यह संभोग लड़की की रजामंदी से हुई हो.
कितनी अजीब बात है कि एक तरफ हमारी अदालतें 15 वर्ष की उम्र में शादी को जायज़ क़रार देती है, दूसरी तरफ रजामंदी से हुए संभोग को बलात्कार का नाम दिया जा रहा है. मैं यहां अदालत के फैसले की सम्मान करती हूं, लेकिन कोई यह बताए कि ऐसे मामलों में निगरानी रखेगा कौन?  और फिर जब सब कुछ रजामंदी से हो रहा है तो मामला थानों या अदालतों में जाएगा कैसे?  और फिर आपसी सहमति से बने संबंध को बलात्कार कैसे कहा जा सकता है? ये हम सबके समझ से परे है. इधर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘बलात्कार’ के स्थान पर ‘यौन उत्पीड़न’ शब्द लगाकर इसे लिंग के भेद के आधार से मुक्त ‘अपराध’ घोषित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया है. यानी अब पुरूष भी बलात्कार की शिकायत दर्ज कर पाएंगे. मीडिया में ‘बलात्कारी पुरूष’ के साथ ‘बलात्कारी औरत’ जैसे शब्द भी अब सुनने को मिलेंगे. अब अगर किसी पुरूष के साथ यौन हिंसा का मामला पुलिस में दर्ज होता है तो ये कैसे तय होगा कि उक्त कृत्य स्वेच्छा से हुआ या जोर-जबरदस्ती? दरअसल, प्रस्तावित संशोधन मामले को और उलझा रही हैं.
वैसे ये सच है कि हर बार पुरूष ही दोषी नहीं होते… महिलाएं भी बलात्कार के लिए ज़िम्मेदार होती हैं. कई ऐसी महिलाएं हैं जो अपने फायदे के लिए पुरुषों पर बलात्कार का आरोप लगाने से नहीं हिचकिचातीं या संबंधित पुरुष को शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाती हैं.
बिहार के पूर्णिया में बलात्कार से जुड़ा एक मामला हैरान कर देने वाला है. पूर्णिया के धमदाहा अनुमंडल में एक महिला ने एक ऐसे शख्स पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज कराया है, जिसकी काफी समय पहले मौत हो चुकी है. यह औरत पहले भी धोखाधड़ी कर चुकी है. मगर इस बार वह थोड़ा सा चूक गई और उसने मरे हुए ससुर को ही आरोपी बना दिया…
इस पूरे मामले में इस्लानी कानून लाने की ज़रूरत है, क्योंकि इस्लामी क़ानून में बलात्कार की सज़ा मौत है. हालांकि बहुत से लोग इसे निर्दयता कह कर इस दंड पर आश्चर्य प्रकट करते हैं. कहते हैं कि यह जंगलीपन है. तो उन लोगों से मेरा सवाल है कि “कोई आपकी माँ या बहन के साथ बलात्कार करता है और आपको न्यायधीश बना दिया जाये और बलात्कारी को सामने लाया जाये तो उस दोषी को आप कौन सी सज़ा सुनाएँगे?”  तो शायद आपका जवाब होगा- “उसे मृत्यु दंड दिया जाये या उसे कष्ट दे दे कर मारना चाहिए” लेकिन यही घटना किसी और कि माँ, पत्नी या बहन के साथ होती है तो आप कहते हैं मृत्युदंड देना जंगलीपन है.  इस स्थिति में यह दोहरा मापदंड क्यूँ? मैं लाल कृष्ण आडवानी जी की अन्य नीतियों और विचार से भले ही सहमत न हूँ लेकिन बलात्कार के मामले में उनके इस विचार से सहमत हूं कि बलात्कारियों को सज़ा-ए-मौत देनी चाहिए.

Saturday, October 01, 2011

धरती पर बढ़ेंगे अभी और बलात्कार !!



शीर्षक पढ़कर चौंकिए नहीं क्योंकि तरह-तरह के अध्ययनों के अनुसार जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे दो बातें स्पष्टया साबित होती हैं, एक, धरती पर पुरुष-स्त्री का लिंगानुपात असामान्य रूप से असंतुलित होता जा रहा है, दूसरा, संचार के तमाम द्रुतगामी साधनों की बेतरह उपलब्धता के कारण आदमी जल्द ही व्यस्क होता जा रहा है, आदमी जहां पूर्व में इक्कीस-बाईस में, फिर सत्रह-अट्ठारह में, फिर पंद्रह-सोलह में और अब तेरह-चौदह वर्ष की उम्र में ही व्यस्क हो रहा है, जबकि लड़कियों में यह उम्र बारह-तेरह की निम्नतम स्तर को छु गयी है ! !
                इसका एक मात्र कारण आधुनिक युग के संचार के साधन हैं, जहां अब कुछ भी गोपन नहीं है, पहले जहां किसी प्रकार की कामुक सामग्री बहुत कठिनता से प्राप्त हुआ करती थी, वो भी छपी हुए रूप में, जिसे छिपाना अत्यंत असाध्य हुआ करता था, जिससे ऐसी सामग्री को घर में लाने से कोई किशोर डरा करता था, मगर अब किशोरों की तो क्या कहिये, बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाईल के रूप में चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाला ऐसा साधन उपलब्ध है, जिसके साथ कोई भी किस चीज़ का आदान-प्रदान कर रहा है, कोई नहीं जान सकता, क्योंकि देख-पढ़ लेने के बाद डीलीट करने के ऑप्शन के कारण आप कुछ भी चिन्हित नहीं कर सकते हो, दूसरी और किशोरों के हाथ में इंटरनेट नामक एक ऐसा हथियार आ चुका है, जिसे वो अपनी क्लास छोड़-छोड़ कर चाहे कितनी ही बार इस्तेमाल करने जा सकते हैं, जाते हैं.मगर अब तो यह मोबाईल में भी चौबीस घंटे उपलब्ध है ! ! आपने अपने बच्चों के हाथों में ऐसी चीज़ें उपलब्ध करवा दी हैं, जिसका उपयोग अब वो अस्सी से नब्बे प्रतिशत तक अपना यौवन बढाने के लिए ही करते हैं, आप भी अब खुश हो जाईये कि अब आप अपने ही बच्चों का कुछ भी नहीं उखाड़सकते ! ! ऐसे शब्दों का उपयोग मैं इसी कारण कर रहा हूँ, क्यूंकि मैं देख पा रहा हूँ, कि आगे क्या तस्वीर उभर रही है, जिसे बदल पाना हमारे बस के बाहर है दोस्तों ! !
                धरती पर पुरुष-स्त्री के असंतुलित होते जाने के बरअक्श आप इस तस्वीर को सामने रखिये तो आपको इसकी भयावहता का अंदाजा लगेगा.एक तरफ कामुक होते किशोर तो दूसरी तरफ घटती स्त्री की आबादी, इन दोनों को एक साथ रखकर देखिये तो बात साफ़ हो जाती है.धरती पर पहले ही पुरुष द्वारा स्त्री पर जबरन किये जाने बलात्कारों की सीमा भयावहतम सीमा को पार कर चुकी है, जो अब रोजाना लाखों की संख्या में है, ऐसे में धरती पर आने वाले दिनों में स्त्री की अनुपलब्धता किस स्थिति को जन्म देने वाली है, इसकी कल्पना भी नहीं जा सकती ! ! बच्चे जब जल्द युवा होंगे तो उन्हें जल्द ही स्त्री भी चाहिए होगी, और क़ानून या समाज की उम्र की बंदिशें उन्हें यह करने से रोकेंगी, तब ऐसे में क्या होगा??
                  दोस्तों प्रकृति में जो भी कुछ है, वो एक-दुसरे के जीवन-यापन की ही एक भरपूर श्रृंखला है.इस श्रृंखला की अनेकानेक इकाईयों को आदमी अपनी कारस्तानियों के कारण मेट चुका है, मगर अब अपनी ही जाति की व्याप्त बुराईयों की वजह से स्त्री को माँ के पेट में ही नष्ट कर देता है, यह उसकी इस  थेथरई का ही परिचायक है, कि हम अपने भीतर की बुराईयों को नहीं मिटाएंगे, जिसके कारण हम स्त्री को अजन्मा ही मार डालते हैं, बल्कि स्त्री को ही मार डालेंगे! ! सच भी है, ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसूरी...! !
         मगर ओ पागल धरतीवासियों मगर इसी बांसूरी को बजाने के कारण ही तुम्हें सुख भी मिल रहा है, साथ ही धरती भी चल रही है, और तुर्रा यह कि यह सुख तुम्हें शायद चौबीसों घंटे भी मिले तो तुम अघा ना पाओ, तब तो ओ पागल लोगों इस बात को तुम समझो कि इस सुख को पाने के लिए, जिसके लिए ना जाने तुम कितने ही तरह के धत्त्करम करते चलते हो, ना जाने कितने झूठ बोलते हो, धूर्ततायें करते हो, जिस सुख की खातिर तुम्हारे मनीषी, साधू-पादरी और ना जाने कौन-कौन से महापुरुष अपना सम्मान विगलित कर गए! ! उसके अनिवार्य माध्यम को मिटा देना तुम्हारी कौन सी समझदारी है, यह तो बताओ ! ! ??
                 प्रकृति में हर-एक चीज़ के होने का कोई-ना-कोई कारण है, उसकी उपादेयता है तथा उसके ना होने से व्यापक हानि भी है, स्त्री के सम्मान-वम्माम को तो मारो गोली, वह तो पता नहीं आदमी कब सीख पायेगा, किन्तु एक जैविक तत्व होने के नाते भर से भी स्त्री की उपादेयता को आदमी अगर ईमानदारी-पूर्वक  समझ भर भी ले तो वह इस अपने लिए इस अनिवार्य जैविक के ना होने से होने वाले नुक्सान को समझ पाने में भी सक्षम नहीं है क्या यह सभ्य-सु-संस्कृत सु-शिक्षित आधुनिक इन्सान..??! ! अगर हाँ, तो समस्या का निदान नहीं ही है, ऐसा ही समझिये...मगर मैं तो यह जोड़ना चाहूंगा कि ऐसे आदमी को गधा कहना गधे का भी अपमान होगा....आप क्या कहते हैं दोस्तों....??कुछ आप भी कहिये ना..??