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Sunday, August 06, 2017

दैनिक जागरण ने इस ‘हसीना’ को बना दिया आतंकी

बिजनौर : शादी में एक युवती को बंदूक़ के साथ तस्वीर खिंचवाना काफ़ी महंगा पड़ा. दैनिक जागरण ने इस वायरल फोटो के आधार पर एक ख़बर लिख दी और ख़बर का शीर्षक था —‘सिमी आतंकियों से जुड़ी ‘हसीना’ की तलाश’

ख़बर का शीर्षक किसी भी आम आदमी के होश उड़ा देने के लिए काफी है. जागरण ने अपनी ख़बर में बताया कि, ‘चार साल पहले बिजनौर के जाटान मुहल्ले में धमाका हुआ था. धमाके के बाद मची अफरा-तफरी का फायदा उठाते हुए धमाके में घायल छह लोग फरार हो गए थे. इनकी पहचान सिमी आतंकियों के रूप में हुई थी. इनमें से एक आतंकी को मुठभेड़ में तेलंगाना में मार गिराया गया था. दो को पकड़ा भी गया था. चार की गिरफ्तारी कर भोपाल जेल में रखा गया. 2015 में इन चारों ने जेल से भागने का प्रयास किया था. तब भोपाल पुलिस ने इन्हें एनकाउंटर में मार गिराया था. इन्हीं आतंकियों में से एक के साथ काजीपुरा की एक युवती की तस्वीर एजेंसियों को मिली है. तस्वीर में मौजूद सिमी आतंकी पिस्टल लिए है जबकि युवती अत्याधुनिक एके-47 लिए है.’
यही नहीं, ख़बर लिखने वाले रिपोर्टर ने अपने विचार लिखते हुए यह भी लिख दिया कि, ‘सूत्रों की मानें तो युवती स्लीपिंग माड्यूल है और आतंकियों के लिए फंड व वाहन की व्यवस्था करती है. सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो युवती के पकड़े जाने पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आतंकियों और स्लीपिंग माड्यूल्स की कमर टूट जाएगी. पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भ्रमणशील हैं. जल्द ही बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश होगा. डीआइजी ओंकार सिंह ने बताया कि एजेंसियां अपने मूवमेंट की जानकारी नहीं देती हैं. इस संबंध में मदद मांगने पर एजेंसियों की मदद की जाएगी.’

इस ख़बर के छपते ही युवती के घर व आस-पास के लोगों में हड़कंप मच गया. युवती के पैरों तले जैसे ज़मीन ही खिसक गई. लेकिन उसने संयम से काम लिया और खुद ही थाने पहुंचकर फोटो की सच्चाई को बताया और इस पूरे मामले में बिजनौर पुलिस अधीक्षक अतुल शर्मा से जांच करने की गुज़ारिश की. यहां बताते चलें कि युवती का नाम हसीना नहीं, बल्कि नसरीन है. स्योहारा के क़स्बा सहसपुर की रहने वाली है.
इस ‘हसीना’ की गुज़ारिश पर पुलिस कप्तान ने एक जांच टीम का गठन किया. इसी दिन स्योहारा थाना अध्यक्ष धर्मपाल सिंह इसकी जांच करते हैं. एक ही दिन में वो अपनी रिपोर्ट पुलिस कप्तान को देते हैं और पुलिस कप्तान इसे तमाम मीडिया संस्थानों को भेज देते हैं.
रिपोर्ट में जांच अधिकारी लिखते हैं, नसरीन स्योहारा में अक्लीमा की शादी में आई थी. यहां कश्मीर का एक युवक जो समाजसेवी शादुल्लाह का सुरक्षा गार्ड है, की लाइसेंसशुदा एसबीबीएल बंदूक के साथ कुछ लोग फोटो खिंचा रहे थे. नसरीन ने भी अपना फोटो खिंचवा लिया. ये कश्मीरी युवक एक वैध सेक्युरिटी एजेंसी के साथ काम करता है. अख़बार इसी बन्दुक को एके-47 लिखता है. अख़बार ने ग़लत लिखा है. दरअसल, इस महिला का एक युवक के साथ विवाद है, जिसने यह फोटो वायरल किया है. पुलिस की इस जांच से साफ़ होता है कि यह सिर्फ़ एक फ़ोटो का मामला है, जिसे अख़बार ने आतंकी हसीना कहकर प्रचारित किया.

पुलिस के इस प्रेस रिलीज़ के बाद दैनिक जागरण 01 अगस्त को अपने बिजनौर एडिशन में एक ख़बर लगाई. अब इस ख़बर का शीर्षक था —‘पुलिस ने खंगाली ‘हसीना’ व कश्मीरी युवक की कुंडली’
अब अख़बार अपने ख़बर में लिखता है, ‘वायरल हुए फोटो में युवती के साथ नज़र आ रहा कश्मीरी युवक सहसपुर में ही फिलहाल निजी गनर के तौर पर एक राजनेता के पास तैनात है. बताया जाता है कि इससे पूर्व वह फोटो में साथ नज़र आ रही युवती के एक रिश्तेदार के यहां गनर के तौर पर तैनात था. तभी युवती की प्रेमी युवक की बहन के शादी समारोह में उससे मुलाकात हुई और युवती ने गनर के पास मौजूद हथियार को साथ लेकर फोटो खींच लिए. अब इन्हीं फोटो को लेकर संशय बना है. आशंका जताई जा रही है फोटो में नजर आ रही पिस्टल व दूसरा हथियार प्रतिबंधित प्रतीत हो रहा है. हालांकि एसओ धर्मपाल सिंह का कहना है कि कश्मीरी युवक गार्ड है और उसके हाथ में लाइसेंसी बंदूक है. उसका लाइसेंस की जांच कर ली गई है.’
लेकिन यही दैनिक जागरण इसी ख़बर में एक बॉक्स के अंदर यह भी लिखता है कि, ‘कश्मीरी युवक की तलाश में जुटी पुलिस’ आगे ख़बर में बताया गया है कि युवती के साथ फोटो में नज़र आ रहा कश्मीरी युवक अभी फ़रार बताया गया है… 

दैनिक जागरण की कहानी यहीं ख़त्म हुई. बिजनौर एडिशन को छोड़कर बाक़ी सारे एडिशन में एक दूसरी ख़बर आई है और इस ख़बर का शीर्षक है —‘स्लीपिंग माड्यूल्स की फंडिंग करते हैं ‘हसीना’ के गुर्गे’
इस बार ख़बर में यह भी लिखा गया कि, ‘जिले का नाम कभी स्लीपिंग माड्यूल्स तो कभी फेक करेंसी के कारण सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है. रविवार को काजीपुरा निवासी हसीना का नाम सामने आया. इसके बाद पुलिस अधिकारी और सुरक्षा एजेंसियां मंडल में सक्रिय हो गई. हसीना के रिश्तेदारों की धरपकड़ की जाने लगी. स्योहारा पुलिस ने हसीना के रिश्तेदारों से घंटों पूछताछ की. न तो हसीना की जानकारी हो पाई और न ही उससे जुड़े लोगों की. सुरक्षा एजेंसियों की मानें तो हसीना के गुर्गे स्लीपिंग माड्यूल्स और आतंक से जुड़े लोगों के लिए फंड की व्यवस्था करते हैं.’
इस ख़बर के लिखने वाले आगे यह भी लिखा कि, ‘एजेंसियों के सामने एक तस्वीर आई है, जिसकी पड़ताल की जा रही है. इसमें एक युवती अत्याधुनिक बंदूक लिए बैठी है जबकि उसके पास में युवक शस्त्र लिए बैठा है. पड़ोस में बैठा युवक फौजियों की वर्दी के रंग की जैकेट पहने है. लिहाजा उसे निजी सुरक्षाकर्मी नहीं बताया जा सकता. फिलहाल सुरक्षा एजेंसियां हसीना की कुंडली खंगालने में जुटी हैं. मुरादाबाद में निर्यातकों की संख्या अधिक होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि हसीना के गुर्गो के संपर्क शहर के निर्यातकों से हैं. हसीना पहले नई उम्र के युवकों को प्रेम जाल में फंसाती है उसके बाद उसे स्लीपिंग माड्यूल्स के रैकेट में शामिल कर देश विरोधी गतिविधियां कराती है. सुरक्षा एजेंसियों को कुछ नाम मिले हैं. जिनके आधार पर टीम छापेमारी कर रही है.’
रिपोर्टर का दिल इतना भर लिखने से भी नहीं भरा. अब उसने इस ‘हसीना’ के तार जोड़ने शुरू किए. ज़रा आप देखिए कि कैसे रिपोर्टर इस ‘हसीना’ के तार कहां-कहां जोड़ता है. अख़बार का रिपोर्टर सुधीर मिश्र आगे लिखता है कि, सूत्रों की मानें तो हसीना के तार लखनऊ से भी जुड़े हैं. कुछ दिन पहले राजधानी में हुए एनकाउंटर के कुछ दिन पहले ही वह उन लोगों से मिली थी, जो आतंक का सामान तैयार कर रहे थे. दिल्ली, मेरठ तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई जिले हैं, जहां हसीना का नेटवर्क फैला हुआ है. कुछ महीने पहले ही उसने काजीपुरा का घर छोड़ा है. उसके नए ठिकाने की भी तलाश एजेंसियां कर रही हैं. कुछ नंबरों को सर्विलांस पर लेकर टीमें हसीना और उसके गुर्गो की तलाश में छापेमारी कर रही हैं.

इस पूरे मामले में TwoCircles.net ने बिजनौर पुलिस कप्तान एसपी अतुल शर्मा से बात की. उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि, युवती का कोई आतंकी केनेक्शन नहीं है. हथियार लाइसेंसी है और प्रतिबंधित भी नहीं है. युवती ने अपने हाथ में लेकर फोटो खिंचा लिया. जांच करा ली गई है. फोटो वायरल कराने में एक युवक की इस षंड्यंत्र में भूमिका सामने आई है.
वहीं बुरी तरह से तनावग्रस्त नसरीन 3 दिन से बेहद परेशान हैं. नसरीन कहती हैं कि, अख़बार ने उसकी और समाज की छवि खराब की है, जिसके लिए वो अख़बार के ख़िलाफ़ अदालत में जा रही हैं. बिना पुष्टि किया ऐसी ख़बर किसी की भी ज़िन्दगी बर्बाद कर देगी.
इस संबंध में दैनिक जागरण से बात करने पर बिजनौर ब्यूरो इस ख़बर को मुरादाबाद से छपना बताता है और मुरादाबाद ब्यूरो डेस्क पर टाल देता है. कोई भी इस पर बोलने को तैयार नहीं है. सब अपना पल्ला झाड़ते हुए नज़र आते हैं.
-आस मुहम्मद कैफ़

Saturday, April 29, 2017

परित्यक्त महिलाओं की संख्या तलाक़ पीड़िताओं से कई गुणा अधिक, मोदी उनके लिए भी बोलें.....

Image result for जशोदाबेनपतियों द्वारा एक़तरफा तरीके से छोड़ी गई हर औरत की ज़िंदगी दयनीय है. ऐसी औरतें अपने ससुराल और मायके दोनों जगह मुश्किलों का सामना करती हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध राष्ट्रवादी मुस्लिम महिला संघ ने जून, 2016 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की. यह याचिका मुस्लिम पर्सनल लॉको संहिताबद्ध करने के लिए दायर की गई थी.

इसका मकसद खासतौर पर बहुविवाह, तीन तलाक़ और तत्काल तलाक़ जैसी प्रथाओं पर रोक लगाना था. अक्टूबर महीने में कोर्ट ने इन मुद्दों पर भारत सरकार से विचार और सिफारिशें मांगीं.

इस पर सरकार की तरफ से जवाब आया कि पिछले 65 वर्षों में मुस्लिम समुदाय में सुधार न होने की वजह से आज मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाज़ुक स्थिति मेंखड़ी हैं.

बिना वक़्त गंवाए 24 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तथाकथित तीन तलाक़ की प्रथाकी आलोचना की. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमारी माताओं और बहनों के साथ धर्म या संप्रदाय के नाम पर कोई अन्याय नहीं होना चाहिए.

पहली नज़र में लगता है कि भारत के मुसलमानों के लिए यह एक खुशी का क्षण है क्योंकि भाजपा और इसका सांस्कृतिक प्रतीक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी मुस्लिम औरतों की दशा सुधारना चाहते हैं.

ये निश्चित तौर पर इस बात का भी संकेत है कि एक दिन मुस्लिम पुरुषों की दशा में भी सुधार होगा.

क्या कहते हैं आंकड़े

लेकिन 2011 के भारत की जनगणना के आंकड़ों के सहारे किए गए थोड़े से शोध ने हमारी ख़ुशी छीन ली.

यह विश्लेषण निम्नलिखित सवाल उठाता है : क्या भारत में मुस्लिम औरतों की स्थिति सचमुच में उतनी ही ख़राब है जितनी मोदी सरकार, आरएसएस और इसकी संतानें दावा कर रहे हैं?

क्या मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाज़ुक स्थितिमें हैं- जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से दिए गए हलफनामे में बताया गया है?

और अपनी हिंदू, ईसाई और दूसरे धार्मिक संप्रदायों की औरतों की तुलना में उनकी स्थिति कैसी है?

चूंकि न तो सरकारी हलफनामे में, न ही प्रधानमंत्री के भाषण में इस दावे के पक्ष में कोई विश्वसनीय आंकड़ा पेश किया गया, इसलिए असली स्थिति जानने के लिए जनगणना के आंकड़ों पर नज़र डालना उपयोगी होगा.

हमने वास्तविक स्थिति जानने के लिए जनगणना के सी3 टेबल– ‘धार्मिक समुदायों और लिंग के हिसाब से वैवाहिक स्थिति-2011’ के आंकड़ों का विश्लेषण किया है.

हमारा मुख्य निष्कर्ष यह है कि भारत की मुस्लिम औरतों की स्थिति दूसरे धार्मिक समूहों की औरतों की तुलना में कहीं बेहतर नज़र आती है.

उदाहरण के तौर पर वैवाहिक संबंधों में रहने वाली औरतों का प्रतिशत सबसे ज़्यादा मुस्लिमों में 87.8 प्रतिशत है, जबकि हिंदुओं में यह 86.2 प्रतिशत, ईसाइयों में 83.7 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 85.8 प्रतिशत है.
विधवा औरतों का सबसे कम प्रतिशत मुसलमानों में 11.1 प्रतिशत है, जबकि हिंदुओं में यह 12.9, ईसाइयों में 14.6 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 13.3 प्रतिशत है.
इस बात की संभावना है विधवा पुनर्विवाह की संस्कृति मुस्लिम औरतों को दूसरे धार्मिक समुदायों की तुलना में ज़्यादा पारिवारिक सुरक्षा प्रदान करती है.
अलग की गईं और त्याग दी गईं (छोड़ी गईं) औरतों का सबसे कम प्रतिशत भी मुस्लिमों में (0.67 प्रतिशत) है, जबकि हिंदुओं में यह 0.69, ईसाइयों में 1.19 और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में 0.68 प्रतिशत है.
इसी जनगणना के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मुस्लिमों और ईसाइयों में अपेक्षाकृत ज़्यादा औरतें तलाक़शुदा हैं- क्रमशः 0.49 प्रतिशत और 0.47 प्रतिशत.
अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में यह आंकड़ा 0.33 प्रतिशत और हिंदुओं में 0.22 प्रतिशत है. हिंदुओं में तलाक़ लेने की प्रथा का परंपरागत तौर पर अस्तित्व नहीं रहा है.
किसी भी उम्र में विवाह के बंधन में बंधने वाली कुल 34 करोड़ महिलाओं में 9.1 लाख तलाक़शुदा हैं और इनमें 2.1 लाख मुस्लिम हैं.
कुरान पाक़ में तलाक़ की प्रक्रिया स्पष्ट तौर पर लिखी गई है, जो कि तीन तलाक़ के खिलाफ है. विशेष परिस्थितियों में तीन तलाक़ अपवाद की तरह होते हैं न कि रिवाज़ की तरह. तलाक़ मनमर्जी का मामला नहीं है.

अलगाव और मेल-मिलाप की कोशिशों के नाकाम हो जाने के बाद पुरुष और स्त्री दोनों को एक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है जिसकी मियाद कम से कम तीन महीने (या तीन मासिक धर्म चक्र) की होती है.

इसके पीछे दो तर्क हैं : पहला तो यह कि अगर वाह औरत मां बन सकती है, तो यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह गर्भवती नहीं है. और अगर वह गर्भवती है, तो बच्चे की परवरिश का इंतज़ाम किया जा सके.

दूसरा कारण है कि दोनों पक्ष रहने के लिए जगह की तलाश कर सकें और वे सड़क पर न छोड़ दिये जाएं. इसके अलावा पारदर्शी मेल-मिलाप के लिए, पति और पत्नी, दोनों के परिवारों से एक-एक मध्यस्थ को भी नियुक्त किया जाना चाहिए.

और आखिर बात, दोनों पक्षों को अलगाव के दौर में अपना कदम वापस लेने और शादी को बरकरार रखने का अधिकार दिया गया है.

आगे बात करें, तो इस्लाम दो तरह के तलाक़ की बात करता है- एक खुला’, जिसकी पहल पत्नी कर सकती है और दूसरा तलाक़जिसकी पहल पति कर सकता है.

तीन तलाक़ पति द्वारा पहल किए गए तलाक़ का एक रूप है. अगर पति अपनी बीवी को तलाक़ देता है, तो उसे बीवी को मेहर चुकाना अनिवार्य है.

मेहर निकाह के वक्त तय की गई वह रकम है जिसे दूल्हा, दुल्हन को अदा करने का वादा करता है, या अदा करता है. हर निकाह के इक़रारनामे में मेहर की रकम का साफ ज़िक्र होता है.

अगर बीवी खुला चाहती है, तो उसे मेहर पर से अपना हक़ छोड़ना पड़ता है क्योंकि निकाह को निरस्त करने की पहल उसकी तरफ से की गई होती है.

इस लेख के लेखकों ने इस्लामी न्यायशास्त्र में विशेषज्ञता रखने वाले और हैदराबाद शहर में खुला या तलाक़ को अंजाम देने का अख्तियार रखनेवाले दारुल कज़ा’ (पारिवारिक न्यायालय) के चार क़ाज़ियों से बातचीत की.

गौरतलब है कि निकाह कराने की शक्ति शहरभर में मौजूद कई क़ाज़ियों के पास होती है, लेकिन खुला या तलाक़ के मामले का निपटारा सिर्फ ये चार क़ाज़ी ही कर सकते हैं.

एक क़ाज़ी से पता चला कि पिछले सात वर्षों में उसके सामने तीन तलाक़के सिर्फ दो मामले आए. एक दूसरे क़ाज़ी, जो पिछले 15 वर्षों से फैसले दे रहे हैं, ने तलाक़ के 160 मामले निपटाए थे, जिनमें 130 खुला के मामले थे, 21 सामान्य तलाक़ के मामले थे और सिर्फ 9 मामले तीन तलाक़ के थे.

छोड़ी गई- परित्यक्त औरतों का हाल

हालांकि यह साबित करने के लिए पक्के आंकड़े नहीं हैं, लेकिन ज़बानी साक्ष्य बताते हैं कि तीन तलाक़ के मामले विरले होते हैं.

और ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण मामलों में जहां तीन तलाक़ की घटना घटी है, यह देखा गया है कि समुदाय के लोग पीड़ित के पक्ष में मजबूती से खड़े रहे हैं और उसे फिर से बसाने की कोशिश की है.

इसके अलावा, यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार वाले मामले के फैसले में पहले ही तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी ठहरा चुका है.

यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि तलाक़शुदा मुस्लिम औरतें इंडियन पीनल कोड के अलावा मुस्लिम वुमंस एक्ट और प्रोटेक्शन ऑफ़ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट (घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम), 2005 के तहत न्याय पा रही हैं.

इस पृष्ठभूमि में देखें, तो तीन तलाक़ को मुस्लिम महिला समुदाय के सशक्तीकरण के लिए बड़ा मुद्दा बनाने की आरएसएस, भाजपा और यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी की उत्सुकता कई सवालों को जन्म देती है.

इसकी जगह उन्हें समाज के हर हिस्से से ताल्लुक़ रखनेवाली 4.3 करोड़ विधवा महिलाओं की चिंता करनी चाहिए. उन्हें पुनर्विवाह करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए और/या उन्हें अपना जीवन चलाने के लिए कार्यक्रमबद्ध वित्तीय मदद मुहैया कराने की ओर ध्यान लगाना चाहिए.

भारत में तलाक़शुदा औरतों की संख्या भी दस लाख के करीब है, जिन्हें सामाजिक और सरकारी मदद की जरूरत है. इतना ही नहीं, अलग की गई और छोड़ी गई महिलाओं का मुद्दा भी तीन तलाक़ के मुद्दे से कहीं ज़्यादा गंभीर है.

पिछली जनगणना के मुताबिक भारत में कुल 23 लाख अलग की गई-परित्यक्त औरतें हैं, जो कि तलाक़शुदा औरतों की संख्या के दोगुने से ज़्यादा है.

20 लाख ऐसी हिंदू महिलाएं हैं, जिन्हें अलग कर दिया गया है या छोड़ दिया गया है. मुस्लिमों के लिए यह संख्या 2.8 लाख, ईसाइयों के लिए 90 हजार, और दूसरे धर्मों के लिए 80 हजार है.

एक़तरफा तरीके से अलग कर दी गई हर औरत का जीवन दयनीय है, भले ही वो राजा भोज की पत्नी हो या गंगू तेली की. उन्हें अपने ससुराल और मायके दोनों जगहों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

ससुराल वाले उनके साथ इसलिए नहीं आते, क्योंकि उनके बेटे ने उसे छोड़ दिया है और मायके में उनकी अनदेखी इसलिए होती है क्योंकि परंपरागत तौर पर उन्हें पराया धन समझा जाता है, जिसकी ज़िम्मेदारी किसी और की है.

वे फिर से शादी या परिवार शुरू नहीं कर सकतीं क्योंकि उन्हें कानूनी तरीके से तलाक़ नहीं दिया गया है. इनमें से ज़्यादातर सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन गुज़ार रही हैं.

साथ ही उनका दूसरों द्वारा उनके शोषण का ख़तरा भी बना रहता है. वे अपने पति के साथ रहना चाहती हैं, बस उनके बुलाने भर का इंतज़ार कर रही हैं.

43 वर्षों से अपने पति के साथ नहीं रह रहीं जशोदा बेन मोदी ने 24 नवंबर, 2014 को कहा था कि अगर वे एक बार भी मुझे बुलाएं तो मैं उनके साथ चली जाऊंगी’. लेकिन उनके पति ने कभी जवाब नहीं दिया. छोड़ी गई महिलाओं को भारत में पासपोर्ट बनवाने में भी दिक्कतें पेश आती हैं.

उदाहरण के तौर पर 2015 में जशोदाबेन ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनका आवेदन इस आधार पर ख़ारिज कर दिया गया था कि उनके पास न तो शादी का कोई प्रमाण-पत्र था न ही पति के साथ कोई साझा हलफनामा ही था’. उन्होंने इसके लिए काफी संघर्ष किया. आखिरकार उन्हें अपने पति के पासपोर्ट के ब्यौरे के लिए एक आरटीआई लगानी पड़ी.

जो भी तीन तलाक़ का भुलावा देकर मुस्लिम महिलाओं की हालत सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें देश की 24 लाख छोड़ दी गई औरतों की तकलीफों की भी जानकारी होनी चाहिए.

मोदी ने कहा कि धर्म और समुदाय के नाम पर हमारी मांओं और बहनों के साथ किसी किस्म का अन्याय नहीं होना चाहिए’.

क्या मोदी इन छोड़ी गई औरतों के सवाल को नहीं उठाएंगे, इस तथ्य के बावजूद कि इनमें सबसे ज़्यादा संख्या, करीब 19 लाख, हिंदू महिलाओं की है और उनकी तकलीफों की बात करने से कोई राजनीतिक फायदा नहीं होने वाला?

(अबुसालेह शरीफ वाशिंगटन डीसी के यूएस-इंडिया पॉलिसी इंस्टीट्यूट में अर्थशास्त्री हैं. सैयद खालिद सेंटर फॉर रिसर्च एंड डेटाबेस इन डेवेलपमेंट पॉलिसी (सीआरडीडीपी), नई दिल्ली, में रिसर्च एसोसिएट हैं.)

Thursday, April 27, 2017

भारत के इस वीभत्स चेहरे का ज़िम्मेदार कौन है ?

जम्मू मे उस अधमरे बुज़ुर्ग मुसलमान की तस्वीर ज़हन को नोच रही है।
उसके परिवार की उन दो महिलाओं की चीखें अगर तुम्हे विचलित नही कर रही, 
तो आत्मा मर चुकी है तुम्हारी। 

कुछ ऐसा ही अखलाक के साथ हुआ होगा। 
कुछ ऐसी ही बेरहमी पहलू खान के साथ देखी थी हमने। 
पुलिस कितनी न्यायसंगत है, इसका प्रमाण इस बात से मिलता है
कि पहलू खान और जम्मू, दोनो मामलों मे पीढ़ित के खिलाफ
भी केस दर्ज कर दिया गया। बेशर्मी देखिए जम्मू पुलिस की। 

कहते हैं कि गडरियों को वन विभाग के साथ साथ
डिप्टी कमिश्नर की भी इजाज़त की ज़रूरत होती है, 
बल्कि खुद अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि 
अगर मवेशियो को किसी वाहन मे ले जाया जा रहा हो, 
तब ही डिप्टी कमिश्नर की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है। 

सवाल ये नहीं। 
तस्वीर आपके सामने है। 
बेबस कौन था। 
बेरहमी किसके साथ हो रही थी। 
यही किया गया था पहलू खान के रिश्तेदारों के साथ। 
हमलावरों के साथ साथ उनपर भी केस दर्ज कर दिया गया। 
न्याय की खातिर ? 
संतुलन की खातिर ? 
वो तो बिगड़ चुका है। 

भारत का संतुलन बिगड़ चुका है। 
क्योंकि ये चीखें प्रधानमंत्री मोदी को सुनाई नही पड़ती। 
हां कभी कभी, दंडवत मीडिया से अक्सर ये खबरें आ जाती हैं कि 
मोदीजी इन घटनाओं से बेहद विचलित हैं
और उसमे भी प्रधानसेवकजी इस बात का खास ख़याल रखते हैं कि 
आसपास कोई चुनाव तो नही है? 

मैने कुछ दिनो पहले कहा था कि 
जो श्मशान और कब्रिस्तान की बातें करते हैं 
उनकी विरासत सिर्फ राख हो सकती है। 
ग़लत कहा था मैने ? 
बोलो? 
दादरी, अलवर और जम्मू से होते हुए 
ये तो अब दिल्ली के कालकाजी आ गए? 
याद है ना? 
वहां भी सही दस्तावेज़ होने के बावजूद 
आशू, रिज़वान और कामिल पर केस दर्ज कर दिया गया। 
जानवरों पर अत्याचार का केस। 

शुक्र है पुलिस ने यही केस हमलावरों पर नही किया। 
क्योंकि गौभक्ति करने वाले इन गुण्डों के लिए 
कामिल, आशू और रिज़वान जानवर ही तो हैं? 
क्योंकि यहां तो गाय का मामला भी नहीं था? 
यहां तो भैंसें लाई जा रही थीं? 
जिसके काटने पर कोई कानूनी रोक नही है। 

एनडीटीवी की राधिका बोर्डिया वहां मौजूद थीं। 
उनके द्वारा शूट किये गए विडियो मे वो तीन अधमरे ज़मीन पर पड़े हुए हैं 
और पुलिस उनके खिलाफ केस दर्ज करती सुनाई पड़ती है। 
वाह! क्या प्राथमिकता है। 
कोई औरत ये भी कहती है, अरे मत मारो इन्हे।
एक और आवाज़ आती है, ये तो समाज का गुस्सा है। 

मीडिया जो योगी योगी कर रहा है 
क्या सहारनपुर और आगरा की तस्वीरें 
कानून व्यवस्था के चरमरा जाने का प्रमाण नही है ? 

कोई बताएगा, भारत के इस वीभत्स चेहरे का कौन ज़िम्मेदार है? 
और ये सब करके क्या हासिल कर लोगे तुम? 
दरअसल मेरे लिए ये तमाम मामले निजी हैं। 
और आप सबके लिए होने चाहिए। 
क्योंकि मुझे डर है कि जब मेरे बच्चे बड़े होंगे, 
तो वो कैसे समाज और देश की बागडोर संभाल रहे होंगे। 
किस सोच मे पल रहे हैं हमारे बच्चे। 
क्या संस्कारी मां बाप उन्हे दूसरे धर्म के लोगों के लिए 
नफरत और हिकारत के माहौल मे बड़ा कर रहे हैं ? 
-अभिसार शर्मा

Saturday, February 20, 2016

इतिहास के पन्नो को पलटेंगे तो मौजूदा वक्त इतिहास पर भारी पड़ता नजर आयेगा

मोदी जी, इस बार पीएम नहीं देश फेल होगा

दो दिन बाद संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। जिस पर संसद की ही नहीं बल्कि अब देश की नजर होगी आखिर मोदी सरकार की किन उपलब्धियों का जिक्र राष्ट्रपति करते हैं और किन मुद्दों पर चिंता जताते हैं । क्योंकि पहली बार जाति या धर्म से इतर राष्ट्रवाद ही राजनीतिक बिसात पर मोहरा बनता दिख रहा है । और पहली बार आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फूलते हाथ पांव हर किसी को दिखायी भी दे रहे है। साथ ही  संघ परिवार के भीतर भी मोदी के विकास मंत्र को लेकर कसमसाहट पैदा हो चली है। यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर के तेवर 2016 के बजट सत्र के दौरान कैसे बुखार में बदल रहे है यह किसी से छुपा नहीं है ।
कारपोरेट सेक्टर के पास काम नहीं है ।
औघोगिक सेक्टर में उत्पादन सबसे निचले स्तर पर है ।
निर्यात सबसे नीचे है। किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य तो दूर बर्बाद फसल के नुकसान की भरपाई भी नहीं मिल पा रही है ।
नये रोजगार तो दूर पुराने कामगारों के सामने भी संकट मंडराने लगा है ।
कोयला खनन से जुड़े हजारों हजार मजदूरों को काम के लाले पड़ चुके हैं ।
कोर सेक्टर ही बैठा जा रहा है तो संघ परिवार के भीतर भी यह सवाल बडा होने लगा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने विकास मंत्र के आसरे संघ के जिस स्वदेशी तंत्र को ही हाशिये पर ढकेला और जब स्वयंसेवकों के पास आम जनता के बीच जाने पर सवाल ज्यादा उठ रहे हैं और जवाब नहीं है तो फिर उसकी राजनीतिक सक्रियता का मतलब ही क्या निकला।

दरअसल मोदी ही नहीं बल्कि उससे पहले मनमोहन सिंह के कार्यकाल से ही राजनीतिक सत्ता में सिमटते हर संस्थान के सारे अधिकार महसूस किये जा रहे थे । यानी संसाधनों का खत्म होना या राजनीतिक सत्ता के निर्देश पर काम करने वाले हालात मनमोहन सिंह के दौर में CBI से लेकर CVC और चुनाव आयोग से लेकर UGC तक पर लगे । लेकिन मोदी के दौर में संकेत की भाषा ही खत्म हुई और राजनीतिक सत्ता की सीधी दखलंदाजी ने इस सवाल को बड़ा कर दिया कि अगर चुनी हुई सत्ता का नजरिया ही लोकतंत्र है तो फिर लोकतंत्र के चार खम्भों के बारे में सोचना भी बेमानी है । इसलिये तमाम उल्झे हालातो के बीच जब संसद सत्र भी शुरु हो रहा है तो यह खतरा तो है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के वक्त ही विपक्ष बायकाट ना कर दें । और सड़क पर भगवा ब्रिगेड ही यह सवाल ना उठाने लगे कि नेहरु माडल पर चलते हुये ही अगर मोदी सरकार पूंजी के आसरे विकास की सोच रही है तो फिर इस काम के लिये किसी प्रचारक के पीएम बनने का लाभ क्या है। यह काम तो कारपोरेट सेक्टर भी आसानी से कर सकता है । और सही मायने में यही काम तो मनमोहन सिंह बतौर पीएम से ज्यादा बतौर सीईओ दस बरस तक करते रहे । यानी पेट का सवाल। भूख का सवाल । रोजगार का सवाल । किसान का सवाल । हिन्दुत्व का सवाल । हिन्दुत्व को राष्ट्र से आगे जिन्दगी जीने के नजरिये से जोड़ने का सवाल ।

मानव संसाधन को विकास से जोड़ कर आदर्श गांव बनाने की सोच क्यों गायब है यह सवाल संघ परिवार के तमाम संगठनो के बीच तो अब उठने ही लगे है। किसान संघ किसान के मुद्दे पर चुप है । मजदूर संघ कुछ कह नहीं सकता । तोगडिया तो विहिप के बैनर तले राजस्थान में किसानों के बीच काम कर रहे है । यानी मोदी सरकार के सामने अगर  एक तरफ संसद के भीतर सरकार चल रही है यह दिखाने-बताने का संकट है तो संसद के बाहर संघ परिवार को जबाब देना है कि जिन मुद्दों को 2014 लोकसभा चुनाव के वक्त उठाया वह सिर्फ राजनीतिक नारे नहीं थे । असर मोदी सरकार के इस उलझन का ही है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी अब संघ के राजनीतिक संगठन के तौर पर सक्रिय ऐसे वक्त हुये जब संसद शुरु होने वाली है। यानी टकराव सीधा नजर आना चाहिये इसे संघ परिवार समझ चुका है । इसलिये पीएम बनने के बाद मोदी के ट्रांसफरमेशन को वह बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है । और  ध्यान दे तो संघ की राष्ट्रभक्ति की ट्रेनिंग का ही असर रहा कि नरेन्द्र मोदी ने 2014 के चुनाव में राइट-सेन्टर की लाइन ली । पाकिस्तान को ना बख्शने का अंदाज था । किसान-जवान को साथ लेकर देश को आगे बढाने की सोच भी थी । कारपोरेट और औघोगिक घरानों की टैक्स चोरी या सरकारी रियायत को बंद कर आम जनता या कहे गरीब भारत को राहत देने की भी बात थी । यानी संघ परिवार के समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सोच के साथ देशभक्ति का जुनून मोदी के हर भाषण में भरा हुआ था । लेकिन बीते दो बरसो में राइट-सेन्टर की जगह कैपिटल राइट की लाइन पकड़ी और पूंजी की चकाचौंध तले अनमोल भारत को बनाने की जो सोच प्रधानमंत्री मोदी ने अपनायी उसमे सीमा पर जवान ज्यादा मरे । घर में किसान के ज्यादा खुदकुशी की । नवाज शरीफ से यारी ने कट्टर राष्ट्रवाद को दरकिनार कर संघ की हिन्दू राष्ट्र की थ्योरी पर सीधा हमला भी कर दिया । लेकिन इसी प्रक्रिया में स्वयंसेवकों की एक नयी टीम ने हर संस्धान पर कब्जा शुरु भी किया और मोदी सरकार ने मान भी लिया कि संघ परिवार उसके हर फैसले पर साथ खड़ा हो जायेगी क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय से लेकर रक्षा मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय से लेकर कृषि मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय में संघ के करीबी या साथ खडे उन स्वयंसेवकों को नियुक्ति मिल गई जिनके जुबा पर हेडगेवार-गोलवरकर से लेकर मोहन भागवत का गुणगान तो था लेकिन संघ की समझ नहीं थी । संघ के सरोकार नहीं थे ।

विश्वविद्यालयों की कतार से लेकर कमोवेश हर संसाधन में संघ की चापलूसी करते हुये बड़ी खेप नियुक्त हो गई जो मोदी के विकास तंत्र में फिट बैठती नहीं थी और संघ के स्वयंसेवक होकर काम कर नहीं सकती थी । फिर हर नीति । हर फैसले । हर नारे के साथ प्रधानमंत्री मोदी का नाम चेहरा जुड़ा । तो मंत्रियों से लेकर नौकरशाह का चेहरा भी गायब हुआ और समझ भी ।

पीएम मोदी सक्रिय है तो पीएमओ सक्रिय हुआ । पीएमो सक्रिय हुआ तो सचिव सक्रिय हुये । सचिव सक्रिय हुये तो मंत्री पर काम का दबाब बना । लेकिन सारे हालात घूम-फिरकर प्रदानमंत्री मोदी की सक्रियता पर ही जा टिके। जिन्हे 365 दिन में से सौ दिन देश में अलग अलग कार्यक्रमों में व्यस्त रखना नौकरशाही बखूबी जानती है। फिर विदेशी यात्रा से मिली वाहवाही 30 से 40 दिन व्यस्त रखती ही है । तो देश के सवाल जो असल तंत्र में ही जंग लगा रहे है और जिस तंत्र के जरीये अपनी योजनाओं को लागू कराने के लिये सरकार की जरुरत है वह भी संकट में आ गये तो उन्हें पटरी पर लायेगा कौन ।

मसलन एक तरफ सरकारी बैक तो दूसरी तरफ बैक कर्ज ना लौटाने वाले औघोगिक संस्थानों का उपयोग । यानी जो गुस्सा देशभक्ति के भाव में या देशद्रोह कहकर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर जेएनयू तक में निकल रहा है । उसको देखने का नजरिया चाह कर भी छात्रों के साथ नहीं जुड़ेगा । यानी यह सवाल नहीं उटेगा कि छात्रो के सामने संकट पढाई के बाद रोजगार का है । बेहतर बढाई ना मिल पाने का है । शिक्षा में ही 17 फिसदी कम करने का है । शिक्षा मंत्री की सीमित समझ का है । रोजगार दफ्तरों में पड़े सवा करोड आवेदनों का है । साठ फिसदी कालेज प्रोफेसरो को अंतराष्ट्रीय मानक के हिसाब से वेतन ना मिलने का है । सवाल राजनीतिक तौर पर ही उठेंगे । यानी हैदराबाद यूनिवर्सिटी के आईने में दलित का सवाल सियासी वोट बैक तलाशेगा । तो जेएनयू के जरीये लेफ्ट को देशद्रोही करारते हुये बंगाल और केरल में राजनीतिक जमीन तलाशने का सवाल उठेंगे । या फिर यह मान कर चला जायेगा कि अगर धर्म के साथ राष्ट्रवाद का छौक लग गया तो राजनीतिक तौर पर कितनी बडी सफलता बीजेपी को मिल सकती है । और चूंकि राजनीतिक सत्ता में ही सारी ताकत या कहे सिस्टम का हर पूर्जा समाया हुआ बनाया जा रहा है तो विपक्षी राजनीतिक दल हो या सड़क पर नारे लगाते हजारों छात्र या तमाशे की तर्ज पर देश के हालात को देखती आम जनता । हर जहन में रास्ता राजनीतिक ही होगा ।

इससे इतर कोई वैकल्पिक सोच उभर सकती है या सोच पैदा कैसे की जाये यह सवाल 2014 के एतिहासिक जनादेश के आगे सोचेगा नहीं । और दिमाग 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दिनो की गिनती करने लगेगा । यानी सवाल यह नहीं है कि संघ परिवार अब सक्रिय हो रहा है कि मोदी फेल होते है तो वह फेल ना दिखायी दे । या फिर कांग्रेस हो या अन्य क्षेत्रिय राजनीतिक दल इनकी पहल भी हर मुद्दे का साथ राजनीतिक लाभ को देखते हुये ही नजर आयेगी । हालात इसलिये गंभीर है क्योकि संसद का बजट सत्र ही नहीं बल्कि बीतते वक्त के साथ संसद भी राजनीतिक बिसात पर प्यादा बनेगी और लोकतंत्र के चारो पाये भी राजनीतिक मोहरा बनकर ही काम करेंगे।  इस त्रासदी के राजनीतिक विकल्प खोजने की जरुरत है इससे अब मुंह चुराया भी नहीं जा सकती । क्योंकि इतिहास के पन्नो को पलटेंगे तो मौजूदा वक्त इतिहास पर भारी पड़ता नजर आयेगा और राजद्रोह भी सियासत के लिये राजनीतिक हथियार बनकर ही उभरेगा । क्योंकि इसी दौर में अंरुधति से लेकर विनायक सेन और असीम त्रिवेदी से लेकर उदय कुमार तक पर देशद्रोह के आरोप लगे । पिछले दिनो हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के आरोप लगे । और अब कन्हैया कुमार पर ।

लेकिन उंची अदालत में कोई मामला पहले भी टिक नहीं पाया लेकिन राजनीति खूब हुई । जबिक आजादी के बाद महात्मा गांधी से लेकर नेहरु तक ने राजद्रोह यानी आईपीसी के सेक्शन 124 ए को खत्म करने की खुली वकालत यह कहकर की अंग्रेजों की जरुरत राजद्रोह हो सकती है । लेकिन आजाद भारत में देश के नागरिको पर कैसे राजद्रोह लगाया जा सकता है । बावजूद इसके संसद की सहमति कभी बनी नहीं । यानी देश की संसदीय राजनीति 360 डिग्री में घुम कर उन्ही सवालों के दायरे में जा फंसा है जो सवाल देश के सामने देश को संभालने के लिये आजादी के बाद थे । और इसी कडी 2014 के जनादेश को एक एतिहासिक मोड माना गया ।  इसलिये मौजूदा दौर के हालात में अगर मोदी फेल होते है तो सिर्फ एक पीएम का फेल होना भर इतिहास के पन्नो में दर्ज नहीं होगा बल्कि देश फेल हुआ । दर्ज यह होगा । और यह रास्ता 2019 के चुनाव का इंतजार नहीं करेगा।

-पुण्य प्रसून बाजपेयी