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Sunday, September 16, 2012

डासना, मसूरी (उत्तरप्रदेश) फ़सादात



अपनी लाचारी और बेबसी पर ख़ून के आंसू रोने के सिवा कर ही किया सकता हूँ। 2 रोज़ से तबियत बेहद ख़राब और मसूरी से आने वाली ख़बरें ख़ून के आंसू रुलाने वाली, मेरे सामने मरने वालों की लाशें, उनके नामों की फ़ेहरिस्त, ज़ख़्मियों के चेहरे, वो मेरे मुंतज़िर, मौलाना मोहम्मद साहिब व दीगर अफ़राद के मुसलसल फ़ोन, लेकिन एसएसपी ग़ाज़ियाबाद की तरफ़ से आने की इजाज़त नहीं। एन.जी.ओ क्यों किस के लिए, इन्हीं के लिए ना, जो बेगुनाह मारे जा रहे हैं, मीडिया हाऊस की ज़रूरत क्यों? इन्ही बेगुनाहों के तहफ़्फ़ुज़ और इंसाफ़ दिलाने के लिए। आप सबके सामने दामन फैला कर मुत्तहिद होने और साथ खड़े होने की अपील क्यों? इन्ही हालत का सामना करने और ऐसे हालत ना पैदा होने के लिए आप सब का साथ आने का ऐलान, मगर सब कुछ सामने आने पर भी ख़ामोशी, कुछ करने के लिए काग़ज़ के टुकड़े का इंतेज़ार क्यों? इदारे के नाम और ज़िम्मेदारों के नामों के ऐलान का इंतेज़ार क्यों? अरे आप सब इस का हिस्सा हो, क़ौम को आप की ज़रूरत है, फ़ुर्सत के लम्हात का इंतेज़ार क्यों? वो कभी नहीं मिलेंगे, जो कुछ करना है इसी मसरूफ़ियत के दौरान करना है। 
बेगुनाह मरते रहेंगे और हम कुछ करने के इरादों के साथ बंद कमरों में बैठे रहेंगे, इतना भी नहीं कि प्राइम मिनिस्टर, होम मिनिस्टर, चीफ़ मिनिस्टर को ख़त लिखें, भेजें इन ख़ुतूत की कापी मुझे, मैं बात करूंगा इन सबसे, लिखिए इंटरनेट पर इस तहरीर का हवाला दे कर, राबिता क़ायम कीजिए अपनों से फ़ोन पर, मिल कर चुप मत बैठिए। और कितनी लाशें दरकार हैं हमें बेदार होने के लिए, क्या उस वक़्त अपनी दहलीज़ के बाहर क़दम नहीं रखेंगे जब तक अपने आंगन में ये मंज़र नहीं देखेंगे? क्या मैं जज़्बात को मुश्तइल कर रहा हूँ, अगर हाँ तो मत तवज्जो दीजिए मेरी बात पर, क्या मुझे सब्र की तलक़ीन करना चाहिए? क्या मुझे इन तमाम हालात को देख कर भी नज़रअंदाज कर देने की अपील करनी चाहिए? नहीं मुझे माफ़ कीजिए मेरा दिल इतना बड़ा नहीं है, मैं बेगुनाह इंसानों का ख़ून बहते देख कर चुप नहीं रह सकता। उस वक़्त तक जब कि मुझे हमेशा के लिए ख़ामोश ना कर दिया जाय या हालात ना बदल जाएं। 7000 से ज़्यादा लोग सिर्फ फेसबुक पर मुझ से जुड़े हैं, अगर उन की फ़्रैंडज़ लिस्ट भी इसमें शामिल कर ली जाय तो ये तादाद लाखों में है। जिस वक़्त रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा में लिख रहा था 2 6 लाख लोग हर रोज़ मुझे पढ़ते थे। क्या हो गया सब को, क्यों ख़ामोशी तारी है? एक ख़ातून की फेसबुक पर आवाज़ मिस्र की हुकूमत का तख़्ता पलट देती है और हम हैं कि जागते ही नहीं। 21 अक्तूबर संडे के दिन कितने लोग पहुंच सकते हैं, दिल्ली बात करने। नहीं काम करना तो जितने चाहे सवाल कर लीजिए, आने से पहले जो चाहे तस्दीक़ कर लीजिए, भरोसा करने से पहले भरोसा क़ायम हो। तो फिर आईए एक अज़ीम इन्क़लाब का आग़ाज़ करने, फिर कोई सवाल मत कीजिए, बहस मत कीजिए, वक़्त कम है, काम बहुत ज़्यादा समझ लीजिए आप मेरी आर्मी हैं और मैं आप का कमांडर हूँ, हमें आता है जंग लड़ना भी और हुकूमत करना भी, हमने जीती जंग अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़, हमने की है हुकूमत हिंदूस्तान पर, मैं आज बेहद ग़ुस्से में हूँ। अपनी मज़लूम क़ौम पर और ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं कर सकता, मेरे सामने मसूरी में मरने वालों, ज़ख़्मी बेगुनाहों की फ़ेहरिस्त भी है और तस्वीरें भी । सिर्फ उन के नाम, उम्र, चेहरे ही सामने रख रहा हूँ, इसलिए कि मुकम्मल जिस्म आप के जज़्बात को मुश्तइल कर सकते हैं..........
डासना मसूरी में शहीद होने वालों की फेहरिस्त
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नाम उम्र वल्दियत साकिन
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वसीम 20 इकरामुद्दीन , मसूरी का रहने वाला सिर में गोली लगने से मौत हुई
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आसिफ 17 असलम कुरैशी, ग्राम नहाल, पेट में गोली लगने से मौत
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अब्दुल वाहिद 19 इस्लामुद्दीन, ग्राम - पिपलेड़ा, सिर में गोली लगने से मौत
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आमिर खान 14 हश्मत, ग्राम - पिपलेड़ा, सिर में गोली लगने से मौत
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फुरकान 13 हाफिज़ यूसुफ, ग्राम - खचरा, गोली लगने से मौत
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हयात 35 इसरार अहमद ग्राम - लिलियाना , सिर में गोली लगने से मौत
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डासना मसूरी में ज़ख़्मी होने वालों की फेहरिस्त
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फज्र मोहम्मद , 21 नन्हें, ग्राम - नहाल, पेट में गोली आरपार हो गई है, ज़ख्मी है
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नन्हें 25 मों इस्लाम, ग्राम - खचरा, बाज़ू में गोली पार हुई , ज़ख्मी
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शहज़ाद 14 अली हसन, ग्राम - देहरा, पैर में गोली लगी, ज़ख्मी है
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अब्दुल कादिर 18 अब्बास, ग्राम - नहाल,
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नोट- ज़ख्मियों की तादाद ज़्यादा है, पुलिस के खौफ से न सामने आना चाहतें और न जानकारी देना चाहते हैं, तमाम इत्तेलाआत और फोटोग्राफ इलाके के लोगों से मौसूल, तलब करने पर रियासती या मर्कज़ी हुकूमत को दस्तियाब करायी जा सकती हैं।
मज़ीद इत्तेलाआत के लिए राबिता करें aizzburney1@gmail.com

Monday, September 10, 2012

कुछ अपनी ज़िंदगी



एनजीओ पर काम कर रहा था आगे भी जारी रहेगा पर आज के चंद अल्फ़ाज़ अपने लिए.............
दुख, तकलीफ़, धोखा, फ़रेब, हसद, जलन ये सब ज़िंदगी का हिस्सा हैं। ये सब भी चलता है, फिर भी ज़िंदगी चलती रहती है, हाँ रफ़्तार मुतास्सिर होती है। कभी कभी इरादे भी मुतास्सिर होते हैं। मुझे ये सौगातें पैदाइश के बाद से ही मिलती रही हैं और ये सिलसिला आज भी जारी है। गुज़श्ता 3 रोज़ कुछ ऐसे ही हालात में गुज़रे, ना कुछ लिख सका, ना एनजीओ का काम आगे बढ़ सका, ना अपनी ज़िंदगी जी सका। फिर याद आया वो दिन जब आज से 20 बरस क़ब्ल मैं अपने दफ़्तर सहारा इंडिया काम्प्लेक्स से शाम को अपना कम ख़त्म कर निकल रहा था। गेट से बाहर निकलते ही मेरा एक्सीडेंट हुआ। बेहोशी की हालत में मुझे अस्पताल ले जाया गया, मालूम हुआ एक हाथ टूट गया है। रॉड डाली गई। पलास्टर चढ़ाया गया। तक़रीबन 24 घंटे होश नहीं आया फिर जब होश आया तो तमाम वाक़ेआत एक फ़िल्म की तरह मेरी आँखों के सामने घूमने लगे। ये वेल प्लान्ड एक्सीडेंट था। जब क्रीम कलर की जीप 8426 मुझे दी गई। हाई वे पर पहुंच कर मालूम हुआ कि इसके ब्रेक फ़ेल हैं। ड्राईव मैं ख़ुद कर रहा था। उन दिनों मयूर विहार के सामने वाला हाई वे बन रहा था लिहाज़ा पत्थरों पर चढ़ा कर गाड़ी रोकी और जान बच गई। वो भी वेल प्लान्ड था। बुरा हाल, जब होश आया और मैंने देखा दाहिने हाथ पर उंगलियों से कुहनी तक पलास्टर है, तो रात भर बाएं हाथ से लिखने की मश्क़ करता रहा और अगली सुबह दफ़्तर में था। एक्सीडेंट प्लान्ड करने वाले ने मुझे देख कर कहा हम तो तुम्हें देखने आ रहे थे कि इस हालत में दफ़्तर। मेरा जवाब था सिर्फ एक हाथ टूटा है, बाक़ी सब ठीक है। इरादे अभी नहीं टूटे हैं। काम कर सकता हूँ। तफ़सील लंबी है ऐसे बहुत से वाक़ेआत हैं जिन्हें अपनी ज़िंदगी की दास्तां में लिख रहा हूँ। इन हादसात के बाद फ़र्क़ बस इतना है कि हादसात की नौईयत बदल गई है। एक्सीडेंट अब भी होते हैं मगर जिस्मानी नुक़्सान के लिए नहीं ज़हनी नुक़्सान के लिए। बहरहाल इन अज़ीयतनाक हालत से गुज़रने पर भी ज़िंदा रहना होता है, काम करना होता है। ख़ुशी मिले ना मिले, दुख का दामन थाम कर भी आगे बढ़ना होता है, लिहाज़ा तमाम नाख़ुशगवार हालात के बाद भी कल फिर निकला, ज़िंदगी के सफ़र पर, दिन की शुरूआत करनी थी। सुबह 10 बजे मुस्लिम मुत्तहेदा महाज़ के प्रोग्राम से मुज़फ़्फ़र नगर पहुंच कर जिसके आर्गेनाईज़र हाफ़िज़ आफ़ताब साहिब मुझे बहुत अज़ीज़ हैं, मगर अफ़सोस ज़हनी कैफ़ीयत ऐसी नहीं थी कि जा पाता, बोल पाता, हालाँकि मुस्लिम रिज़र्वेशन का इश्यू ऐसा था, जिस पर मुझे बोलना चाहिए था, मगर ज़हनी एक्सीडेंट के असर से बाहर आने में कुछ वक़्त लग रहा था, फिर सँभाला ख़ुद को और शाम पाँच बजे जमाते इस्लामी हिंद के कैंपस में मुनाक़िद किशनगंज एऐमयू सेंटर के इजलास में पहुंचा और अपने ख़यालात का इज़हार किया और चल दिया डिफ़ेंस कॉलोनी की तरफ़ जहां तेहरान टीवी के लाइव प्रोग्राम अंदाज़े जहां में हिंदुस्तान पाकिस्तान के वज़ीरे ख़ारजा की मुलाक़ात के मौज़ू पर डिस्कशन में हिस्सा लेना था जिस में कश्मीर से यासीन मलिक और पाकिस्तान से सीनियर जर्नलिस्ट अबरार ज़ैदी भी थे। 45 मिनट के लाइव डिस्कशन की तफ़सील बयान करना यहां मुम्किन नहीं मगर दो बातें ज़रूर लिखना चाहता हूँ एक वो जो मैंने यासीन मलिक को मुख़ातिब करके कही कि कश्मीर से मैं आप से कम मुहब्बत नहीं करता फ़र्क़ बस इतना है आप ने कश्मीर की लड़ाई बंदूक़ के ज़रिए लड़ी है और मैंने क़लम के ज़रिए । दूसरी बात मैंने पाकिस्तानी जर्नलिस्ट अब॒रार ज़ैदी को मुख़ातिब कर के कही कि तारीख़ी पसे मंज़र पर नज़र डाल कर देखें तो कश्मीरियों ने पाकिस्तान को उसी वक़्त रीजेक्ट कर दिया था जब पाकिस्तान की तरफ़ से कबायलियों ने कश्मीर पर हमला किया इस के बाद 9/11 के इश्यू पर तहरान टीवी के लिए मेरा एक इंटरव्यू रिकार्ड किया गया। समाजी ज़िंदगी के लिहाज़ से मेरे दिन का सफ़र बस यहीं तमाम होता था लेकिन ज़ाती ज़िंदगी का सफ़र अभी बाक़ी था कुछ दुश्वार मराहिल से गुज़रना अभी बाक़ी था। ये मंज़िल भी ख़ुदा ख़ुदा कर के तय हुई उम्मीद थीं कि सोने से पहले चंद लमहात ख़ुशी के भी होंगे मगर ऐसा हो ना सका, जाने दीजिए इस ज़िंदगी की दास्तान को, बस इतना ज़हन में रखिए कि जिस मक़सद को हासिल करने के लिए आप को साथ लेकर निकला हूँ इस में हज़ार तूफ़ान आयेंगे, कई बार लगेगा कि बाज़ू टूट गए हैं मगर इरादों को, हौसले को टूटने नहीं देना है। माज़ी का एक वाक़िया बस इस लिए तहरीर कर दिया कि अगर फिर किसी हादसे से गुज़रना पढ़े तो भी नज़र मंज़िल पर रहे..........

Wednesday, September 05, 2012

5 सितंबर, 2012 एन.जी.ओ. का आगाज़


आज का दिन कई वजहों से मेरी लिए अहम है आज यानी 5 सितंबर को मेरी वालिदा मोहतरमा की बरसी है। मेरी बड़ी बेटी सबा अज़ीज़ का जन्म दिन है, टीचर्स डे है और आज के दिन को आप अपनी एन.जी.ओ. का फ़ाउंडेशन डे भी समझ सकते हैं। अभी तक 103 फेसबुक फ़्रैंडज़ ने इस एनजीओ से अपने कमेन्स्ओ के ज़रीए जुड़ने की दिलचस्पी ज़ाहिर की है 22 लोगों ने मेरी ई मेल आई डी पर अपना प्रोफ़ाइल भेज कर और लेटर लिख कर अपनी वाबस्तगी का इज़हार किया है, मैं इन सबका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ये सब इस एनजीओ के फ़ाउन्डर मेंबर हैं जल्द ही मैं इस ताल्लुक़ से सभी के नाम लेटर जारी कर दूंगा इस वक़्त मेरी पास कोई स्टाफ़ नहीं है इसलिए वक़्त लग रहा है आप ही में से कुछ लोग सामने आयेंगे और ऑनलाइन ये ज़िम्मेदारी संभालेंगे।
एन.जी.ओ. रजिस्ट्रेशन के पेपर्स मेरी सामने हैं जल्द ही एक नाम तय करके रजिस्ट्रेशन के लिए भेज दूंगा। लेकिन काम आप के दिलचस्पी लेने के साथ ही शुरू हो चुका है जो लोग इस एनजीओ से जुड़ना चाहते हों उनके नाम आप सबके सामने रख दे रहा हूँ। फ़ाउन्डर मेम्बर्स और आज से 15 सितंबर तक जुड़ने वालों को हक़ होगा कि इन नामों पर अपनी राय का इज़हार करें। 11सितंबर को मैं रजिस्ट्रेशन पेपर्स तैय्यार कर मुताल्लिक़ अफ़राद की मंज़ूरी के लिए भेज दूंगा और उम्मीद है अगले जुमा यानी 15 सितंबर तक ये पेपर्स दाख़िल कर दिए जाऐंगे। क़ौमी सतह पर एन.जी.ओ. का क़याम करने के लिए कम से कम 8 रियासतों की नुमाइंदगी ज़रूरी होती है। मैं अभी हिंदुस्तान की 10 रियासतों से चंद नाम आपके सामने रख रहा हूँ, इन्शाअल्लाह जल्द ही 10 से ज़्यादा मुल्कों के नुमाइंदे आप के साथ होंगे। अभी तक किसी से बात नहीं की है पर सबको जानता हूँ उनकी क़ाबिलियत का इल्म है, पर डैमोक्रेटिक सिस्टम के साथ चलना चाहता हूँ। मेरे सामने जो नाम हैं—
1- एस.वाई. क़ुरैशी (दिल्ली) साबिक़ इलेक्शन कमिश्नर आफ़ इंडिया।
2- माजिद मेमन (मुंबई) हिंदुस्तान के मशहूर वकील। 
3- पी. ए. इनामदार (पुणे) एजूकेशन एक्सपर्ट।
4-
5- रहमान शरीफ़ (बंग्लुरू) जनाब सी. के. जाफ़र शरीफ़ के पोते (यूथ विंग)।
6- शाइस्ता अम्बर (लखनऊ) प्रेसीडेन्ट मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (वीमन)। 
7- एम. आदिल (हैदराबाद) प्रोड्यूसर प्रज़ेंटर टीवी शो हम बदलेंगे देश बदलेगा। 
8- उजाला आयत (श्रीनगर) यूथ विंग। 
9- आफ़ताब अह॒मद एम.एल.ए. (मेवात)। 
10- अख़तरुल ईमान एम.एल.ए. ( किशनगंज, बिहार)। 
11- मौलाना मुफ़्ती महफ़ूज़ुर्रहमान, (अररिया, बिहार)। 
12- मौलाना इसरारुल हक़ क़ासिमी एम.पी. (किशनगंज, बिहार)। 
13- मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद वस्तानवी (अक्क्लकुँआं, गुजरात)। 
14- मौलाना बरकाती साहब (कोलकाता)।
15- डाक्टर नूर मोहम्मद (रामपुर, यू.पी.) यूथ विंग। 
16- हफीज़ुर्रहमान (मुरादाबाद, यू.पी.) यूथ विंग। 
17- बिलाल बर्नी ऐडवोकेट (यूथ विंग)। 
18- प्रोफ़ेसर अख़॒तर मेहंदी (जे.एन.यू.)। 
19- अल्हाज जी.एम. मुस्तफ़ा, सदर नेशनल माइनारीटीज़ फ्रंट (मेरठ, यू.पी.)।  
20- हाफ़िज़ आफ़ताब (मुज़फ़्फ़र नगर, यू.पी.)।
21-
22- फ़िरोज़ बख़्त अह॒मद (दिल्ली) मौलाना आज़ाद के पोते। 
23- मिस मुमताज़ (मेवात) यूथ विंग। 
24- एस.यू. ख़ान (क़ौमी अक़ल्लियती कमीशन)।
25- वसी अह॒मद नोमानी, ऐडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट।

इन के अलावा कुछ दीगर मुमालिक की नुमाइंदगी भी होगी। हमारे जो फ़ाउन्डर मेंम्बर हैं उनसे दरख़्वास्त है कि इसी तरह अपने दायरे से कल 25 नुमाइंदा अफ़राद का इंतिख़ाब करें। 14 का ताल्लुक़ दुनिया के किसी भी शहर की नुमाइंदगी से हो पर 11 नुमाइंदे आप के शहर से हों, जो ज़िला कमेटी को बनायें.............


तास्सुरात आने लगे हैं, हौसला अफ़्ज़ा आग़ाज़ हैं, कुछ हौसला शिकन लहजा भी सामने आ रहा है। कोई हैरानी नहीं, अक्सर बड़े इरादों की नाकामी के पीछे वजूहात ये भी होती हैं कि किस तरह इरादों को कमज़ोर किया जाय। किस किस तरह के इल्ज़ामात लगाए जाएं। लिहाज़ा, मैं शुरूआत तमाम इल्ज़ामात को क़ुबूल करने के बाद करने जा रहा हूँ। मैं क़ौम के लिए जो कुछ कर सकता था अपनी 25 बरस की सहाफ़त के दौरान कर चुका अब जो कुछ कर रहा हूँ ज़ाती मफ़ादात के लिए, अपने वजूद को ख़त्म होने से बचाने के लिए। लोग मुझे जीते जी नजर अंदाज़ ना कर दें, लिहाज़ा, उनके ज़हनों में बने रहने के लिए एन.जी.ओ. के नाम पर जिस जिस तरह के जितने भी मफ़ादात हासिल हो सकते हैं, उन्हें हासिल करने के लिए अगर इस बहाने सियासत में कोई जगह बन सकती है तो वो बनाने के लिए लोक सभा, राज्य सभा या कोई भी सरकारी तमग़ा हासिल हो सकता है, तो उसे हासिल करने के लिए, बाक़ी जो मुम्किन इल्ज़ामात मैं भूल गया हूँ उन्हें भी शामिल कर लें इस सबके बावजूद भी मेरे ज़ाती मफ़ादात को ज़हन में रख कर जो मेरे साथ जुड़ सकते हैं उनका ख़ैर मक़दम है । इस एन.जी.ओ. के ज़रीए अपने अख़बार से कहीं ज़्यादा उन सियासतदानों के नाक में दम करने का इरादा रखता हूँ जो पिछले 65 बरस से हमें सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं, बेगुनाहों को जेल की सलाखों के पीछे भेजते रहे हैं ताकि हमारे हौसले टूटे रहें। हम एहसासे कमतरी, एहसासे जुर्म का शिकार रहें। कश्मीरियों को दहशतगर्द साबित कर दिया जाय ताकि हम उनकी हिमायत में खड़े होने से घबराएं। मुसलमानों के लिए इंसाफ़ की आवाज़ उठाने वालों को ख़ामोश कर दिया जाय या सफ़ए हस्ती से मिटा दिया जाय, मैं इन साज़िशों को नाकाम बनाने के लिए एक मज़बूत प्लेटफार्म बनाना चाहता हूँ, जो ये एन.जी.ओ. हो सकता है क्योंकि उसकी आड़ में मैं अपना सियासी मक़सद हासिल करना चाहता हूँ, नेता बनना चाहता हूँ। क्या करूं कहीं से आज तक नेता बनने का लाईसेंस मिला ही नहीं तो एन.जी.ओ के बहाने ही सही। छोटे छोटे अख़बारों के एडीटर राज्य सभा में चले गए। मैं हिंदुस्तान के सबसे बड़े अख़बार का एडीटर हो कर भी... , किसी ने इस लायक़ नहीं समझा, इसलिए अब आख़िरी रास्ता अपना रहा हूँ। ये सब जान कर भी अगर आप मेरी साथ खड़े होने का इरादा रखते हैं तो आप का ख़ैर मक़दम है। मेरी क़लम और तक़ारीर ने जिन लोगों की नींदें उड़ा दी थीं वो अब फिर से पेश बंदी कर लें। मुख़ालिफ़ों की फ़ौज खड़ी कर लें। मेरी पास बस दर्से क़ुरान, सीरते रसूल और इस एन.जी.ओ से जुड़ने वाले चंद साथी हैं मगर बहुत काफ़ी हैं। तमाम साज़िशों को नाकाम बनाने के लिए और कामयाबियों की मंज़िलें तय करने के लिए शायद फिर कोई तारीख़ बन जाय। उर्दू सहाफ़त में एक तारीख़ रक़म करने के बाद क़ौम के दामन से दहशतगर्दी का दाग़ मिटाने के बाद दुआ करें अल्लाह कामयाब करे........ मेरा नया ई-मेल आई.डी. है azizburneyngo@gmail.com बराये करम एन.जी.ओ. के ताल्लुक़ से अपने मश्विरे और प्रोफ़ाइल इस पर भेजें।


तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ अपने उन तमाम फेसबुक फ़्रैंडज़ का जो एन.जी.ओ. के वजूद में आने से क़ब्ल ही बड़ी तादाद में इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं। जो लोग फेसबुक पर नहीं हैं उनके भी फ़ोन काल और ई-मेल मिल रहे हैं। कुछ लोगों के नाम मैं उनसे राबिता किए बगै़र सामने रख रहा हूँ इसलिए कि वो क़ौम का सरमाया हैं अगर वो सब वाक़ई साथ आ गए तो बिलाशुबा एक नई तारीख़ रक़म होगी लेकिन पहले 2 बातों पर रौशनी डाल दूँ। नंबर एक इस एन.जी.ओ. का मक़सद 1- सोशल जस्टिस 2- कश्मीर हमारा है और कश्मीरी हमारे हैं। सोशल जस्टिस फ़ार इनोसेंट कश्मीरी पीपल (Social Justice For Innocent Kashmiri People) 3- एजूकेशन 4- पोलीटिकल पावर फ़ार मुस्लिम्स (Political Power For Muslims) होगा।
अब अपने बारे में
मैं इस एनजीओ का 1 साल के लिए ऐक्टिंग चेयरमैन और कोआर्डीनेटर रहना चाहूंगा। इसके बद तंज़ीम से अलग हो जाऊंगा। तमाम मेंबर चाहें तो फ़ाउन्डर के तौर पर मेरा नाम तंज़ीम के साथ रख सकते हैं। जिस दिन रजिस्ट्रेशन के बाद एन.जी.ओ. का नाम और अग़राज़ो मक़ासिद जारी करूंगा उसी दिन अपने एसेट डेक्लेरेशन (Asset Declearation) और सोर्स आफ़ इनकम (Source Of Income) भी सब के सामने रख दूंगा और 1 साल बद अलग होने के वक़्त के असेट सब के सामने रख दूंगा। मेरी ख़्वाहिश होगी कि नई नसल अहम ज़िम्मादारियां सँभाले और वो तमाम शख्सियतें जो क़ौम का सरमाया हैं अपने अपने क़ीमती मश्विरों से नवाज़ें। अपने तजुर्नबों की रोशनी में इस तंज़ीम को चलायें। नई नस्ल की रहनुमाई करें। 1 साल की बंदिश सिर्फ मेरी लिए होगी बाक़ी किसी के लिए नहीं।
कल की तहरीर में कुछ और अहम नाम लिखने जा रहा हूँ। फिर फ़र्दन फ़र्दन राबिता भी क़ायम करूंगा। जो रजामंदी देंगे उन के नाम ही रजिस्ट्रेशन पेपर्स में शामिल होंगे। मैं आने वाले 20 साल के लिए क़ौम की क़यादत तैय्यार करना चाहता हूँ और इसके लिए क़ौम के रहनुमाओं की रहनुमाई चाहता हूँ। मैं जल्द ही सफ़र पर निकलना चाहता हूँ। मैं जिस वक़्त अपने अख़बार में लिख रहा था 26 लाख से ज़्यादा लोग तक़रीबन हर रोज़ मुझे पढ़ते थे और 1 बरस के अंदर 1 करोड़ से ज़्यादा लोगों से सीधे उन के सामने पहुंच कर ख़िताब किया था। आज़ाद भारत का इतिहास लिख रहा था, लिख रहा हूँ और आख़िरी सांस तक लिखता रहूँगा। तंज़ीम की शुरूआत कर कश्मीर से कन्याकुमारी तक सफ़र करना चाहता हूँ। रास्ते भर की मसाजिद में नमाज़ पढ़ना चाहता हूँ, नमाज़ियों और इमाम साहिबान से बात करना चाहता हूँ। मदारिस में तलबा से गुफ़्तगु करना चाहता हूँ। गर्ल्स स्कूल और कॉलिजों में ख़िताब करना चाहता हूँ, ताकि वो आने वाली नस्लों को ऐसी तर्बीयत दें कि इनमें अपना हक़ हासिल करने का हौसला पैदा हो। अपने हालात पर आँसू बहाने या रहम की भीख मांगने की आदत ना पड़े।
और एक बात इस तंज़ीम के नुमाइंदों को सबसे पहले मुसलमानों के वोट पर सियासत करने वालों से जवाब तलब करना है। चाहे वो किसी पार्टी के क्यों ना हों। अगर आप ज़हनी तौर पर इसके लिए तैय्यार हैं तो साथ आएं, हम उनसे अपने वोट के क़र्ज़ की अदायगी के साथ अपने काम की शुरूआत चाहते हैं। क़ौम को दरपेश मसाइल की फ़ेहरिस्त हमारे हाथ में होगी, उन की पेशरफ़्त क्या रही इस का जवाब उन के पास होगा। जवाब तसल्ली बख़्श मिला तो सर आँखों पर, चाहे जिस पार्टी में हों, ना मिला तो अब तक जो क़ौम इक़्तेदार सौंपती आई है अब इक़्तेदार छीनने के लिए क़दम उठाएगी।
हमारे लिए ये जंगे आज़ादी की जंग से कम नहीं होगी, हम ने मुल़्क की आज़ादी के लिए क़ुर्बानियां इस लिए नहीं दी थीं कि हम मुल्क को आज़ाद करायें और ख़ुद ग़ुलाम हो जाएं। मेरी बात बहुत वाज़ेह है। जोशो जज़्बात में साथ खड़े होने का फ़ैसला ना करें। एक नई तारीख़ रक़म करने का इरादा हो, मज़लूम क़ौम को इंसाफ़ दिलाना हो तो आगे आएं, हक़ की इस जंग में सामने कौन होगा पता नहीं, लेकिन इतना पता है कि अगर हम क़ौम को मुत्तहिद करने और जगाने में कामयाब हो गए तो एक नया इन्क़लाब बरपा होगा और इस इन्क़लाब में हमारे साथ होंगे इंसाफ़ पसंद हिन्दू भाई। हमें शिकवा उनसे नहीं, ना इंसाफ़ी करने वाली सियासत से है।
अगर आप मेरी राय से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं तो जान लें कि मैं इस वक़्त अपनी क़ौम के दरमियान महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, चन्द्रशेखर आज़ाद और शहीद भगत सिंह और झांसी की रानी, मैदान कर्बला की ज़ैनब तलाश कर रहा हूँ, अगर आप में ये जज़्बा हो तो प्लीज़ ज्वाइन मी (Please Join Me)...................


एन.जी.ओ. का कन्सेप्ट अभी प्रोसेस में है। कई बातें ज़ेरे ग़ौर हैं कुछ सवाल उठ रहे हैं कुछ और उठेंगे इसीलिए तो ओपन प्लेटफार्म पर आकर बात कर रहा हूँ, एक सवाल ये सामने आ रहा है कि मैं 1 साल बाद क्यों हट जाना चाहता हूँ। जवाब हाज़िर है मैं आने वाले 20-25 साल के लिए क़यादत सामने लाने की कोशिश कर रहा हूँ। पुराने चेहरे अपनी ज़िंदगी में बहुत हासिल कर चुके। अब नए लोगों को आगे लाने का वक़्त आ गया है। एक नई और मज़बूत टीम खड़ी करनी है। मुसलमानों में एक थिंक टैंक की कमी है। काबिल लोगों की कमी नहीं बस एक प्लेटफार्म पर आ जाएं तो कमाल हो जाय। सब बड़ों में कोई किसी की क़यादत क्यों तस्लीम करे। मैं किसी को इस कश्मकश में नहीं डालना चाहता, इसलिए एक नई अंजान टीम को रखना चाहता हूँ। जिसे तमाम क़ाबिल लोग मिल कर ग्रूम (Groom) करें जो हमारी अहम तंज़ीमें हैं वो अपनी सरपरस्ती फ़राहम करें, क़ौम को मुत्तहिद करें, एक रोड मैप सामने रखना चाहता हूँ । क़ौम को एक ऐसी सियासी ताक़त के तौर पर देखना चाहता हूँ जो अपने मसाइल को हल कर सके, दूसरों के सामने हक़ीर बन कर ना खड़े हों। बड़े लोगों के साथ बड़ी मस्लेहत होती है। नौजवान ऐसी मस्लेहत से दूर होते हैं इसलिए मैं उन्हें एक बढ़ी फ़ोर्स की शक्ल में देख रहा हूँ, वैसे भी हम लोग तो अपनी ज़िंदगी जी चुके, अब तो नई नस्ल का मुस्तक़बिल संवारना है.................

Sunday, September 02, 2012

सफ़र ज़िंदगी का - अज़ीज़ बर्नी


एक बड़े तूफ़ान से गुज़र रहा हूँ, मगर ज़िंदा हूँ और फिर से ज़िंदगी का सफ़र शुरू करना चाहता हूँ, कैसे, कहां से, किस तरह मालूम नहीं, लेकिन अब कुछ तो करना ही होगा। बर्मा, आसाम, कर्नाटक, महाराष्ट्रा, उत्तरप्रदेश के हालात सामने हैं और मैं ज़ंजीरों में जकड़े एक क़ैदी की तरह ख़ामोश तमाशाई, ये घुटन मौत के अंधेरे से ज़्यादा ख़ौफ़नाक है, हर सिम्त अंधेरा ही अंधेरा है, उजाले की तलाश बेसूद, अपने लिए जीना बस एक ख़्वाब की सी बात, क़ौम के मसाइल को नज़रअंदाज करना नामुमकिन, आप सब साथ फिर भी तन्हा, दोनों हक़ीक़त मेरे सामने, आप कहाँ हो, किस तरह मेरे साथ खड़े हो सकते हो, कुछ नहीं मालूम, कभी मैं पुकारता हूँ, किसी तरफ़ से आवाज़ें आती हैं, फिर लंबी ख़ामोशी, कभी मेरी तरफ़ से, कभी आप की तरफ़ से ये सिलसिला टूटता ही नहीं, कोई एक प्लेटफार्म, कोई रोड मैप हो जहां मिलें, कुछ आगे बढ़ें, एन.जी.ओ की शक्ल में एक प्लेटफार्म क़ायम करने का इरादा था और रजिस्ट्रेशन से पहले नाम सामने रखना मुश्किल है मगर, आप सब इस के मेम्बर होंगे तो मुझे ख़ुशी होगी। 

आप लोग मेरे ई-मेल आई.डी. azizburney1@gmail.com पर अपना प्रोफ़ाइल या कुछ तार्रुफ़ भेजें तो रोड मैप बनाने में आसानी हो। ये एन.जी.ओ. एजुकेशन के लिए काम करे, एक बड़ा मीडिया हाऊस क़ायम करे, सोशल जस्टिस की ज़िम्मेदारी क़बूल करे, मुसलमानों को दीगर क़ौमों की तरह एक सियासी ताक़त बना कर खड़ा करे, कश्मीर के दामन से दहशतगर्दी का दाग़ मिटाए, हुकूमतों को इस मसले के हल के लिए मजबूर करे, आलमी सतह पर इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ जारी साज़िशों की दिफ़ा का रास्ता निकाले, ये सब ज़हन में है और ये सब मुम्किन है, जिन्हें यक़ीन नहीं आता वो रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा में मेरे ज़रिए चलाई गई तहरीक और उसके नताइज को सामने रखें, यक़ीन आ जाएगा, वो सब भी नामुमकिन नज़र आता था जो इस एक अख़बार के ज़रिए हुआ, ग़ैरों से लेकर अपनों तक हैरान परेशान और हसद की आग में जल रहे थे कि अगर इस तहरीक को ना रोका गया, तो ये एक तूफ़ान बरपा कर देगी, वो सब अपने भी, पराए भी, सब एक जुट हुए, उन के ज़ाती मफ़ादात वाबस्ता थे, वो अपने मक़सद में कामयाब हुए, आप सब की तादाद बहुत ज़्यादा थी और है मगर आप सब एक जुट नहीं हैं, इसलिए किसी भी तहरीक को कामयाब नहीं बना सके, कोई प्लेटफार्म नहीं था मेरा, आप सब से राबेता होता गया, सोचा क़ुदरत को क़ौम के लिए मुझसे जो ख़िदमात लेनी थी ले चुकी, चलो अब ख़ामोशी के साथ मौत का इंतेज़ार करते हैं, अगर हो सके तो कुछ अपने लिए जीने की कोशिश करते हैं, बस यही सोच कर गुमनामी के अंधेरों में चला गया, कभी आप पुकारते तो फेसबुक पर ट्वीटर पर चला आता हूँ, आप से गुफ़्तगु करने के लिए, आप दिलचस्पी लेते हैं अच्छा लगता है, लेकिन कुछ करने के लिए इस दायरे के बाहर आना होगा, मेरी क़ौम मसाजिद और मदारिस के ज़रिए तहरीक चलाने का तजुर्बा रखती है, फेसबुक के ज़रिए नहीं, मैंने बारहा आप से दरख़्वास्त की कि कोई मेरे इन नज़रियात को किसी भी तरह मसाजिद और मदारिस तक पहुंचाएं, क्या आप ऐसा कर पाए, मेरी ख़्वाहिश थी और है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक मस्जिद में नमाज़ पढ़ता चला जाऊं, अल्लाह से दुआ करूं, नमाज़ियों से गुफ़्तुगू करूं, मैंने इस लंबे सफ़र के लिए गाड़ी भी तैय्यार की जो बेमसरफ़ खड़ी है, मैं सियासतदां नहीं हूँ, मेरे पास कोई तंज़ीम नहीं है जो रास्ते भर का इंतेज़ाम करे, मुल्क में ऐसी तंज़ीमें हैं जो ऐसा कर सकती थीं, शायद मेरी आवाज़ उन तक नहीं पहुंची, उन्होंने मुनासिब नहीं समझा या कोई मसलेहत रही, ख़ुदा जाने आप लोग तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर जगह हैं, आप ही अगर ये बता देते कि रास्ते के किस शहर की किस मस्जिद या मदरसा में आपसे मुलाक़ात होगी और इस मौज़ू पर गुफ़्तुगू होगी, ये इंतिज़ाम कर लिया है तो मैं सफ़र शुरू कर देता लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका, अब बताएं में क्या करूं, ना अपने लिए जी पा रहा हूँ ना क़ौम के लिए और मौत आती नहीं। मेरे पास क़ुव्वते इरादा है, हौसला है, कुछ करने का जज़्बा है, क़ौमी मसाइल की समझ है, हुकूमतों को कैसे मजबूर किया जाय ये तजुर्बा है। अल्लाह ने लिखने और बोलने की सलाहियत भी दी है, मगर ऐसा कोई प्लेटफार्म या ज़रिया नहीं है जहां से इस सब का इस्तेमाल कर कोई तहरीक चलाई जा सके, लिहाज़ा आप तय करें कि मुझे क्या करना है, या तो आप साथ खड़े हों इस जज़्बे के साथ की मुल़्क की तस्वीर और क़ौम की तक़दीर बदलना है...........

Sunday, August 12, 2012

मेरे पास गीत नहीं हैं आप का दिल बहलाने के लिए



एक ही सवाल, कहाँ हूँ, कैसा हूँ, क्या कर रहा हूँ, हर सवाल का एक ही जवाब- जहां था वहीं हूँ, काम ख़त्म हो चुका मगर मैं ज़िंदा हूँ क्यों... जो कर सकता था किया, अल्लाह जो काम लेना चाहता था उसने लिया अब क्यों ज़िंदा हूँ, समझ में नहीं आता। अपने लिए कुछ रोज़ जीने की एक ज़माने से ख़ाहिश थी, कभी फ़ुर्सत ही ना मिली, शायद मौत से पहले वो ज़िंदगी तलाश कर रहा हूँ, मेरे क़लम से निकलने वाला एक एक लफ़्ज़ हर रोज़ सौ नए दुश्मन बनाता है, दोस्त बहुत हैं पर ना उनको मेरा पता मालूम, ना मुझे उनका.... पर मेरे सब दुश्मनों को मेरा पता मालूम है, तहरीक को नाकाम बनाने का तरीक़ा मालूम है, वो हर रोज़ इस पर काम करते हैं और आप जो बहुत दर्दमंद हैं वो बातें कर लेते हैं, बाक़ी इतना भी नहीं, बीस करोड़ मुसलमानों की तादाद जम्हूरी मुल्क में बहुत अहमियत रखती है, पर अपनी अहमियत खो चुके हो आप, बर्मा (म्यानमार) में हज़ारों मुसलमान क़त्ल कर दिए गए, बातें करने और अफ़सोस ज़ाहिर करने के सिवा क्या किया आपने, जिनको वोट दिया वो आप के वोट की ताक़त पर हुकूमत करते हैं, क्या मिले उनसे, क्या मजबूर किया उनको इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करने के लिए, जो आपके नेता हैं, मुसलमान हैं, मालूम किया उनसे, क्या किया इस सिलसिले में। मैं लिखता क्यों नहीं, बोलता क्यों नहीं, क्या हो जाएगा मेरे लिखने और बोलने से, आप मज़लूमीन को इंसाफ़ दिलाने के लिए एक प्लेटफार्म पर खड़े हो जाऐंगे, नहीं आप ऐसा नहीं करेंगे, आसमान से तारे तोड़ कर लाने की ख़्वाहिश रखेंगे लेकिन घर की दहलीज़ पर क़दम रखना नहीं चाहेंगे, फिर क्या करेंगे, मेरा लिखा पढ़ कर या मेरी तक़रीर सुन कर, मेरे पास गीत नहीं हैं आप का दिल बहलाने के लिए, दर्द भरी दास्तान है........

Saturday, July 28, 2012

इंडिया टुडे की कवर स्टोरी पर चंद बातें



9/11और 26/11 के बाद कुछ बातें पूरी तरह साफ़ हो गईं कि सारी दुनिया में मुसलमानों को सिर उठा कर नहीं जीने देना है और उनकी दिफ़ा में जो बोले उस की ज़िंदगी ख़राब कर देना है, वो भी इस तरह कि कोई और हिम्मत ना कर सके, मुसलमान मौरिदे इल्ज़ाम ठराए जाते रहेंगे तो हमेशा जूते के नीचे रहेंगे, अपने हक़ की बात तो दूर इल्ज़ामात से निजात पाने के लिए ही एड़ियां रगड़ते रहेंगे हमारे क़दमों में पड़े रहेंगे। मैं चाहता था सच सामने आए असल दहशतगर्द बेनकाब हों, बेगुनाह जेल की सलाखों से बाहर आएं, ये होने लगा तो जैसे मुस्लिम दुश्मनों के सिर पर क़यामत टूट पड़ी, अज़ीज़ बर्नी को रोको वो लिखने ना पाए, वो बोलने ना पाए, इसे मुल्क दुश्मन साबित कर दो, अपने मसाइल में उलझा कर रख दो, तमाम इख़्तियारात छीन लो, किसी को क़रीब मत आने दो, बिलकुल तन्हा कर दो, जो लिखा आज तक इस में आग लगा दो, ज़ाया कर दो ताकि आने वाली नस्लें पढ़ ना पाएं, सब सिर जोड़ कर बैठो, आपसी सियासी दुश्मनी भुला दो, इसके ख़िलाफ़ एक हो जाओ, इसे जीते जी मार डालो, हमारी सियासत के लिए इस का ख़त्म होना ज़रूरी है। मुसलमान हमारे ग़ुलाम बने रहें, हमें वोट दे कर अपनी गु़लामी पर मोहर लगाते रहें, कोई मुस्लिम लीडरशिप की बात करे तो उसे देश के गद्दार, पाकिस्तानी, अलैहदगी पसंद कहो।
सियासी हिमायत, मीडिया का सपोर्ट ये साबित करने के लिए काफ़ी है। क़ौम के ग़द्दार उनके ज़र ख़रीद ग़ुलाम, उन की हाँ मैं हाँ मिलाने के लिए उनके पीछे मुट्ठी भर मुसलमान हमेशा खड़े रहेंगे, तो क्या इन हथकंडों से सच बदल जाएगा, तारीख़ बदल जाएगी, ज़िंदा क़ौम हमेशा के लिए ग़ुलाम बन जाएगी। नहीं, कभी नहीं, ख़ुद को देश भक्त कहने वाले आरएसएस का एक भी सदस्य अपनी असल ज़िंदगी में मुझ से बेहतर हिंदुस्तानी ख़ुद को साबित कर दे तो बड़ी से बड़ी सज़ा के लिए तैय्यार, पर तुम झूटे इल्ज़ामात से क़ौम को ज़लील करते हो, ये नामंज़ूर, मेरी ज़िंदगी में ये नहीं हो सकता।
26/11 के हवाले से इंडिया टुडे के 16जुलाई के इश्यू में कवर स्टोरी दी सिक्रेट प्लाट टू ब्लेम इंडिया में मुझे मेरे मज़ामीन को, ए आर अन्तुले साहब, और दिग्विजय सिंह जी का हवाला दिया गया है। अन्तुले साहब ने अपने अल्फ़ाज़ को अपनी ग़लती तस्लीम कर लिया, दिग्विजय सिंह जी ने ख़ामोश रहने का फ़ैसला कर लिया, पर मैं अपने लिखे मज़ामीन के एक एक लफ़्ज़ पर क़ायम हूँ। हमारी खु़फ़िया तंज़ीमों की रिपोर्ट के मुताबिक़ और तमाम सबूतों की रौशनी में मैं पाकिस्तान को ज़िम्मेदार मानता हूँ लेकिन इससे शहीद हेमंत करकरे की तफ़तीश को रद्दी की टोकरी में नहीं फेंका जा सकता है, मैंने सवाल उठाए उन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। आरएसएस को जांच में बेदाग़ साबित हुए बगै़र, क्लीनचिट नहीं दी जा सकती। ये आरएसएस की नहीं देश की आबरू का सवाल है और देश की अस्मत के सामने आरएसएस कया है, जिन्हें अज़ीज़ बर्नी के लिखने से तकलीफ़ है वो असीमानंद का क़ुबूल नामा पढ़ लें। सीआईए, मोसाद और आरएसएस का गठजोड़ शहीद हेमंत करकरे की जांच का नतीजा है, मेरे दिमाग़ की उपज नहीं है, इस पर बात ना करना, कौन सा राष़्ट्रा हित है, ये राष़्ट्र नेता जानें, मेरे जैसा हिंदुस्तानी ना समझता है ना समझना चाहता है। अज़ीज़ बर्नी की रगों से वीर अबदुल हमीद के ख़ून की उम्मीद की जा सकती है , पुरोहित या उपाध्याय के ख़ून की नहीं, चुप हूँ यार अपनी मर्ज़ी से, पिंजरे में क़ैद हूँ गूंगा नहीं हूँ, पैरों में बेड़ियां नहीं हैं। मुझे मत बताओ किस ने क्या गुनाह क़बूल किया और क्या बयान दिया है। इस सिस्टम ने दिल्ली के मोहम्मद आमिर से भी सारे गुनाह क़बूल करा लिए थे, फिर उसने ख़त लिखा मुझे तिहाड़ जेल से, मैंने सच बेनकाब करने का अज़्म किया, अल्लाह का करम है वो बाइज़्ज़त बरी हुआ। ठीक है मुझे सज़ा मिली कोई बात नहीं। आमिर जैसे बहुत से बेगुनाह आज़ाद तो हुए।
कोई बात नहीं, शेर अभी माँद में है, आपकी दुआएं साथ रहीं और खुदा चाहेगा तो फिर निकलेगा बाहर और रखेगा सच सामने। महात्मा गांधी के लिए ज़मीन तंग कर दी गई थी अंग्रेज़ों के ज़रीए, फिर उन्होंने हिंदूस्तान की आज़ादी की जंग जारी रखी साऊथ अफ़्रीक़ा में, हो सकता है मुझे भी वतन छोड़ना पड़े लेकिन ये सिलसिला रुकेगा नहीं। ज़रूरत पड़ी तो तारीख़ को फिर दुहराया जाएगा, हम आज़ाद हिंदुस्तान में पैदा हुए मुसलमान हैं हमें ग़ुलाम बनाया जाय, ये हो नहीं सकता, 10-20 या 100-50 कुर्सी के भूखे ख़रीदे जा सकते हैं, 24करोड़ हिंदुस्तानी मुसलमान नहीं। आप इस तादाद पर भी सवाल करेंगे, मुसलमान तो 12करोड़ हैं, ये 24करोड़ क्यों लिख रहा है, करूंगा इस मौज़ू पर भी बात, अभी तो इंडिया टुडे के ज़रीया उठाए गए सवालों का जवाब देना है। वो सब मज़ामीन हैं मेरे पास। फेसबुक के रीडर की अदालत में एक एक कर सब को पेश कर देना है, फिर पूछना है बताओ देश हित किया है, क्या ग़लत लिखा मैंने , हाँ आरएसएस हित का ध्यान नहीं रखा ये ज़रूर किया मैंने लेकिन राष़्ट्र हित मेरे लिए कल भी बहुत अहम था आज भी बहुत अहम है और कल भी अहम रहेगा।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का पहला बयान (28-07-12)



दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ जंग चौथी आलमी जंग है। प्रणब दा एक दूर अंदेश, सियासी ज़हन रखने वाले सदरे जम्हूरिया हिंद हैं। ओबामा ने भी अमेरीका के सदर बनने के बाद यही कहा था। अपने वज़ीरे आज़म के साथ बहुत से ग़ैर मुल्की दौरों पर गया और यही सुनता रहा, ये दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ जंग किस के ख़िलाफ़ है और इसकी बुनियादी वजह क्या हैक्यों 9/11 के बाद से इसकी शुरूआत हुई? क्यों आलमी सतह पर मुसलमान और मुस्लिम देश इसके निशाने बने? क्यों सद्दाम हुसैन, कर्नल कज़्ज़ाफ़ी को हमने खो दिया। हुस्नी मुबारक का तख़्ता पलट हुआ, म्यांमार (बर्मा) और आसाम में मुसलमानों का क़त्ले आम जारी है? क्यों गुजरात हुआ और इसके बाद हमें दहशतगर्द बता कर जेलों में ठूंसा जाने लगा, हम मुत्तहिद नहीं हो सकते, हो सकते तो इतने फ़िरक़े ना होते, क़ौमों का उरूज या ज़वाल एक दिन में नहीं होता, सैंकड़ों बरस लगते हैं, आज हम आलमी सतह पर इसी तबाही के अमल में हैं, मगर कुछ सोचने या करने की फ़ुर्सत नहीं है, आप जिन मुस्लिम सियासतदानों की तरफ़ देख रहे हो वो ख़तरे में नहीं हैं, इनका मुत्तहिद होने में नुक़्सान है, सब अलग अलग पार्टी में होंगे तो जब जिस की हुकूमत होगी उसे मौक़ा मिल जाएगा, एक साथ होंगे तो ये मुम्किन नहीं होगा, और आपको हर रोज़ की मुसीबतें चैन नहीं लेने देतीं, सीने में दर्द बहुत है पर कुछ करने का रास्ता नहीं, इस्लामी फ़लसफ़े ने दिन में पाँच बार मस्जिद में जमा होने और हालाते हाज़रा पर गुफ़्तगु की आदत डाली, मगर हमने इससे फ़ायदा उठाने का तरीक़ा नहीं सीखा, जिस दिन एक शहर के तमाम मस्जिदों के नमाज़ी एक साथ एक जगह इकट्ठा हो कर हालाते हाज़रा पर बात करने लगे एक इन्क़लाब आ जाएगा, आप समझते क्यों नहीं, मैं लगातार कुछ कहने की कोशिश कर रहा हूँ, जानता हूँ एक दिन ख़ामोश कर दिया जाऊंगा, काश! इसके पहले मेरी आवाज़ आपके दिलो दिमाग़ तक पहुंच जाय, साल में दो बार ईद की नमाज़ पढ़ने के लिए सारे शहर के नमाज़ी ईदगाह में आते ही हैं, दरमियान में ज़रूरत के वक़्त जमा होकर बात करने में क्या परेशानी है, आप दुनिया में वाहिद क़ौम हो जिसे प्लेटफार्म दे कर भेजा गया है..............माफ़ कीजिए लिख नहीं पा रहा हूँ, शायद कल इससे आगे लिख सकूं................