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Thursday, April 27, 2017

भारत के इस वीभत्स चेहरे का ज़िम्मेदार कौन है ?

जम्मू मे उस अधमरे बुज़ुर्ग मुसलमान की तस्वीर ज़हन को नोच रही है।
उसके परिवार की उन दो महिलाओं की चीखें अगर तुम्हे विचलित नही कर रही, 
तो आत्मा मर चुकी है तुम्हारी। 

कुछ ऐसा ही अखलाक के साथ हुआ होगा। 
कुछ ऐसी ही बेरहमी पहलू खान के साथ देखी थी हमने। 
पुलिस कितनी न्यायसंगत है, इसका प्रमाण इस बात से मिलता है
कि पहलू खान और जम्मू, दोनो मामलों मे पीढ़ित के खिलाफ
भी केस दर्ज कर दिया गया। बेशर्मी देखिए जम्मू पुलिस की। 

कहते हैं कि गडरियों को वन विभाग के साथ साथ
डिप्टी कमिश्नर की भी इजाज़त की ज़रूरत होती है, 
बल्कि खुद अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि 
अगर मवेशियो को किसी वाहन मे ले जाया जा रहा हो, 
तब ही डिप्टी कमिश्नर की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है। 

सवाल ये नहीं। 
तस्वीर आपके सामने है। 
बेबस कौन था। 
बेरहमी किसके साथ हो रही थी। 
यही किया गया था पहलू खान के रिश्तेदारों के साथ। 
हमलावरों के साथ साथ उनपर भी केस दर्ज कर दिया गया। 
न्याय की खातिर ? 
संतुलन की खातिर ? 
वो तो बिगड़ चुका है। 

भारत का संतुलन बिगड़ चुका है। 
क्योंकि ये चीखें प्रधानमंत्री मोदी को सुनाई नही पड़ती। 
हां कभी कभी, दंडवत मीडिया से अक्सर ये खबरें आ जाती हैं कि 
मोदीजी इन घटनाओं से बेहद विचलित हैं
और उसमे भी प्रधानसेवकजी इस बात का खास ख़याल रखते हैं कि 
आसपास कोई चुनाव तो नही है? 

मैने कुछ दिनो पहले कहा था कि 
जो श्मशान और कब्रिस्तान की बातें करते हैं 
उनकी विरासत सिर्फ राख हो सकती है। 
ग़लत कहा था मैने ? 
बोलो? 
दादरी, अलवर और जम्मू से होते हुए 
ये तो अब दिल्ली के कालकाजी आ गए? 
याद है ना? 
वहां भी सही दस्तावेज़ होने के बावजूद 
आशू, रिज़वान और कामिल पर केस दर्ज कर दिया गया। 
जानवरों पर अत्याचार का केस। 

शुक्र है पुलिस ने यही केस हमलावरों पर नही किया। 
क्योंकि गौभक्ति करने वाले इन गुण्डों के लिए 
कामिल, आशू और रिज़वान जानवर ही तो हैं? 
क्योंकि यहां तो गाय का मामला भी नहीं था? 
यहां तो भैंसें लाई जा रही थीं? 
जिसके काटने पर कोई कानूनी रोक नही है। 

एनडीटीवी की राधिका बोर्डिया वहां मौजूद थीं। 
उनके द्वारा शूट किये गए विडियो मे वो तीन अधमरे ज़मीन पर पड़े हुए हैं 
और पुलिस उनके खिलाफ केस दर्ज करती सुनाई पड़ती है। 
वाह! क्या प्राथमिकता है। 
कोई औरत ये भी कहती है, अरे मत मारो इन्हे।
एक और आवाज़ आती है, ये तो समाज का गुस्सा है। 

मीडिया जो योगी योगी कर रहा है 
क्या सहारनपुर और आगरा की तस्वीरें 
कानून व्यवस्था के चरमरा जाने का प्रमाण नही है ? 

कोई बताएगा, भारत के इस वीभत्स चेहरे का कौन ज़िम्मेदार है? 
और ये सब करके क्या हासिल कर लोगे तुम? 
दरअसल मेरे लिए ये तमाम मामले निजी हैं। 
और आप सबके लिए होने चाहिए। 
क्योंकि मुझे डर है कि जब मेरे बच्चे बड़े होंगे, 
तो वो कैसे समाज और देश की बागडोर संभाल रहे होंगे। 
किस सोच मे पल रहे हैं हमारे बच्चे। 
क्या संस्कारी मां बाप उन्हे दूसरे धर्म के लोगों के लिए 
नफरत और हिकारत के माहौल मे बड़ा कर रहे हैं ? 
-अभिसार शर्मा

Monday, November 30, 2015

बिहार में ग़रीब मुसलमानों की नुमाईंदगी अमीरों के हाथ में है

Saturday, August 15, 2015

आखिर यह कैसी आजादी है?

 

इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की एक और वर्षगांठ मना रहे हैं। जाहिर सी बात है कि हर बार की तरह यह वर्षगांठ भी महज एक रस्म अदायगी मात्र ही है। हम सिर्फ यह कह-सुन कर आपस में खुश हो लेते हैं कि हम आजाद हैं, लेकिन सच में हम कितना आजाद हैं, यह तो हमारा दिल ही जानता है। यही वजह है कि आजादी का आंदोलन देख चुकी हमारी बुजुर्ग पीढ़ी बड़े सहज भाव में कहती सुनाई देती है कि इससे तो अंग्रेजों का राज अच्छा था।
 
वस्तुत: हमारी आजादी आधी अधूरी ही है। इसकी वजह ये है कि हम 15 अगस्त 1947 को अग्रेजों की दासता से तो मुक्त हो गए, मगर जैसी शासन व्यवस्था है, उसमें अब हम अपनों की ही दासता में जीने को विवश हैं। सबसे बड़ी समस्या है आतंकवाद और सांप्रदायिक विद्वेष की। इसके चलते देश के अनेक इलाकों में आजाद होने के बावजूद व्यक्ति को अगर अपने ही घर में संगीनों के साए में रहना पड़े, तो यह कैसी आजादी। लचर कानून व्यवस्था और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण संगठित अपराध इतना बढ़ गया है कि हम निर्भीक होकर सड़क पर चल नहीं सकते। हमारी बहन-बेटियों को अपने ही मोहल्लों में अपनी अस्मिता का भय बना रहता है। हम अपने ही देश में न्याय के लिये भटकते रहते हैं। शासन और प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने के लिये यदि हमें फिल्म शोले के वीरू की तरह टंकी या टॉवर पर चढना पड़े या आत्मदाह की कोशिश करनी पड़े तो उसे आजादी कैसे कहा जा सकता है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या हमारे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी आजादी के लिये अपना बलिदान दिया था? क्या महात्मा गांधी ने ऐसी ही आजादी के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था? क्या हम सिर्फ फिरंगियों की सत्ता से घृणा करते थे? फिरंगियों की सत्ता से हमने भले ही मुक्ति पा ली, लेकिन फिरंगी मानसिकता से आज हम 68 साल बाद भी मुक्त नहीं हो सके हैं। जो काम फिरंगी करते थे, उससे भी कहीं आगे हमारा राजनीतिक तंत्र कर रहा है। ‘फूट डालो, राज करो की जगह ‘फूट डालो और वोट पाओ की नीति चल रही है। राजनीतिक हित साधने के लिए सत्ताधीशों को दंगा-फसाद कराने से भी गुरेज नहीं है। सत्ता को भ्रष्टाचार की ऐसी दीमक लग चुकी है की पूरा देश इससे कराह रहा है।

संविधान में जिस स्वतंत्रता और समानता की बात की जाती है, वह स्वतंत्रता और समानता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। पहले हम फिंरगियों के जुल्म सहते थे, अब अपनों के जुल्म सह रहे हैं। पहले भी सत्ता के खिलाफ बोलने पर आवाज बंद करने की कोशिश की जाती थी, आज भी ऐसा चल रहा है। पहले आजादी के संघर्ष में जान जाती थी, आज तो पता नहीं, कब चली जाए। पहले अंग्रेज देश को लूट रहे थे, आज वही काम नेता कर रहे हैं। पहले भी सत्ता की ओर से तुगलकी फरमान जारी होते थे, आज भी ऐसे फरमान जारी हो रहे हैं। आजादी के लिए बलिदान देने वालों को देश भुला चुका है। आज ऐसे सत्ताधीशों की पूजा हो रही है, जिनका न कोई चरित्र है, न जिनमें नैतिकता है और न ईमानदारी। पहले भी लोग भूख से मरते थे, आज भी मर रहे हैं। सत्ता से चिपके रहने वाले लोग फिंरगी शासन में भी ऐश कर रहे थे, आज भी सत्ता से चिपके रहने वाले ही सारे सुख भोग रहे हैं। आखिर यह कैसी आजादी है? क्या आम आदमी को भय और भूख से मुक्ति मिली है? क्या आम आदमी को उसके जीवन की गांरंटी दी जा सकी है? क्या नारी की अस्मिता सुरक्षित है? क्या व्यक्ति अपनी बात निर्भीकता से रखने के लिए स्वतंत्र है? जाहिर है, इनके जवाब ना में ही होंगे। और जब ऐसा है, तब फिर इस आजादी के आम आदमी के लिए क्या मायने?

दरअसल, अब हम एक ऐसी परंतत्रता में जी रहे हैं, जिसके खिलाफ अब दोबारा संघर्ष की जरूरत है। हमें अगर पूरी आजादी चाहिए, तो हमें एक और स्वाधीनता संग्राम के लिये तैयार हो जाना चाहिये। यह स्वाधीनता संग्राम जमाखोरों, कालाबाजारियों के खिलाफ होना चाहिए। यह संग्राम भ्रष्टाचारियों से लड़ा जाना चाहिए। यह संग्राम चोर, उचक्कों, लुटेरों और ठगों के खिलाफ छेड़ा जाना चाहिये। यह संग्राम देश को खोखला कर रहे सत्ता व स्वार्थलोलुप नेताओ के विरुद्ध लड़ा जाना चाहिए। यह संग्राम उन लोगों के खिलाफ किया जाना चाहिये, जो गरीबों, दलितों, मजलूमों और नारी का शोषण कर फल-फूल रहे हैं। अगर हम ऐसे लोगों को परास्त कर सके, अगर हम ऐसे लोगों से देश को मुक्त करा सके, तब हम कह सकेंगे कि हम वास्तविक रूप से आजाद हो चुके हैं। लोगों के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष तो है, मगर व्यवस्था परिवर्तन के लिए कोई तैयार नहीं है।

हर भारतीय की इच्छा है कि आजादी केवल किताबों और शब्दों में ही नहीं, बल्कि धरातल पर भी दिखनी चाहिये। हमें गाँधी के सपनों का भारत चाहिये। हमें देश के महान क्रांतिकारियों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना है। विडंबना यह है कि हम आजादी के पर्व पर इन तथ्यों पर जरा भी चिंतन नहीं करते। हम सिर्फ इस दिन रस्म अदायगी करते हैं। सुबह झंडा फहरा कर और बड़े-बड़े भाषण देकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और दूसरे ही दिन पुराने ढर्ऱे वाली आपाधापी में व्यस्त हो जाते हैं।

-तेजवानी गिरधर

Wednesday, June 17, 2015

केजरीवाल समेत 'आप' के 21 विधायकों पर चार्जशीट की तैयारी में दिल्‍ली पुलिस !


 केजरीवाल समेत 'आप' के 21 विधायकों पर चार्जशीट की तैयारी में दिल्‍ली पुलिस !
सत्‍तारुढ़ आम आदमी पार्टी और दिल्‍ली पुलिस के बीच जारी खींचतान के बीच सूत्रों के हवाले से खबर है कि दिल्‍ली पुलिस जल्‍द ही "आप" के 21 विधायकों के खिलाफ दर्ज 24 क्रिमिनल केसों में चार्जशीट फाइल करने जा रही है। पार्टी के जिन 21 विधायकों के खिलाफ मामले दर्ज हैं, उनमें खुद पार्टी मुखिया और दिल्‍ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, डिप्‍टी सीएम मनीष सिसोदिया और मंत्री सतेंद्र जैन भी शामिल हैं।

यह हैं विधायक
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सतेंद्र जैन, जरनैल सिंह, अखिलेश त्रिपाठी, गुलाब सिंह, रघुवीर शौकीन, संजीव झा, राकेश गुप्‍ता, राखी बिड़लान, रितुराज, वेद प्रकाश, मनोज कुमार, रामनिवास गोयल, सहीराम पहलवान, प्रकाश जरवाल, अमानतुल्‍ला खान, सोमनाथ भारती, जितेंद्र तोमर, नरेश बाल्‍यान और सोमदत्‍त। इसके अलावा करोल बाग के विधायक विशेष रवि के मामले में आरंभिक जांच जारी है।

विधायकों पर हैं धोखाधड़ी, चोरी, मारपीट जैसे आरोप
इन विधायकों पर धोखाधड़ी, चोरी, मारपीट, सशस्‍त्र बदल को भड़काने की कोशिश, अवैध तरीके से बंधक बनाने, जान से मारने की धमकी देने, जबरन घर में घुसने, एक्‍साइज एक्‍ट, सरकारी नौकर पर हमला करने, सार्वजनिक हानि पैदा करने वाले बयान देना, औरत को बेइज्‍जत करने के इरादे से हमला करने जैसे गंभीर अपराधों के तहत मुकदमें दर्ज हैं।
इनमें ज्‍यादातर मामलों में दोष सिद्ध होने पर सात साल से कम सजा का प्रावधान है, लेकिन कुछ मामलों में दस साल से लेकर आजीवन करावास तक की सजा का प्रावधान है।

हर केस में जल्‍द चार्जशीट करने की होती है कोशिश : बस्‍सी
दिल्‍ली पुलिस कमिश्‍नर बीएस बस्‍सी ने इस बाबत कहा कि मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं है। हमारी कोशिश केसों में जल्‍द से जल्‍द चार्जशीट दर्ज करने या उनकी कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल करने में होती है।

केजरीवाल पर हो चुकी हैं छह चार्जशीट फाइल
वैसे, दिल्ली पुलिस सीएम केजरीवाल के खिलाफ छह चार्जशीट अदालत में दाखिल कर चुकी है। अभी दो मामलों में उसकी जांच जारी है और सीएम पर एक क्रिमिनल केस में आगामी चार अगस्‍त को चार्ज फ्रेम होने की सुनवाई होनी भी है। इस केस में आरोप तय होने पर केजरीवाल की मुसीबतें बढ़ सकती हैं।

सूत्रों की मानें तो जब दिल्‍ली पुलिस ने आम आदमी पार्टी के विधायकों पर आरोपों का रिकॉर्ड खंगाला तो पता चला कि कई विधायकों के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं और इनमें संगीन अपराधों की फेहरिस्त भी शामिल है।
~NDTV