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Saturday, August 15, 2015

आखिर यह कैसी आजादी है?

 

इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की एक और वर्षगांठ मना रहे हैं। जाहिर सी बात है कि हर बार की तरह यह वर्षगांठ भी महज एक रस्म अदायगी मात्र ही है। हम सिर्फ यह कह-सुन कर आपस में खुश हो लेते हैं कि हम आजाद हैं, लेकिन सच में हम कितना आजाद हैं, यह तो हमारा दिल ही जानता है। यही वजह है कि आजादी का आंदोलन देख चुकी हमारी बुजुर्ग पीढ़ी बड़े सहज भाव में कहती सुनाई देती है कि इससे तो अंग्रेजों का राज अच्छा था।
 
वस्तुत: हमारी आजादी आधी अधूरी ही है। इसकी वजह ये है कि हम 15 अगस्त 1947 को अग्रेजों की दासता से तो मुक्त हो गए, मगर जैसी शासन व्यवस्था है, उसमें अब हम अपनों की ही दासता में जीने को विवश हैं। सबसे बड़ी समस्या है आतंकवाद और सांप्रदायिक विद्वेष की। इसके चलते देश के अनेक इलाकों में आजाद होने के बावजूद व्यक्ति को अगर अपने ही घर में संगीनों के साए में रहना पड़े, तो यह कैसी आजादी। लचर कानून व्यवस्था और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण संगठित अपराध इतना बढ़ गया है कि हम निर्भीक होकर सड़क पर चल नहीं सकते। हमारी बहन-बेटियों को अपने ही मोहल्लों में अपनी अस्मिता का भय बना रहता है। हम अपने ही देश में न्याय के लिये भटकते रहते हैं। शासन और प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाने के लिये यदि हमें फिल्म शोले के वीरू की तरह टंकी या टॉवर पर चढना पड़े या आत्मदाह की कोशिश करनी पड़े तो उसे आजादी कैसे कहा जा सकता है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या हमारे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी आजादी के लिये अपना बलिदान दिया था? क्या महात्मा गांधी ने ऐसी ही आजादी के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था? क्या हम सिर्फ फिरंगियों की सत्ता से घृणा करते थे? फिरंगियों की सत्ता से हमने भले ही मुक्ति पा ली, लेकिन फिरंगी मानसिकता से आज हम 68 साल बाद भी मुक्त नहीं हो सके हैं। जो काम फिरंगी करते थे, उससे भी कहीं आगे हमारा राजनीतिक तंत्र कर रहा है। ‘फूट डालो, राज करो की जगह ‘फूट डालो और वोट पाओ की नीति चल रही है। राजनीतिक हित साधने के लिए सत्ताधीशों को दंगा-फसाद कराने से भी गुरेज नहीं है। सत्ता को भ्रष्टाचार की ऐसी दीमक लग चुकी है की पूरा देश इससे कराह रहा है।

संविधान में जिस स्वतंत्रता और समानता की बात की जाती है, वह स्वतंत्रता और समानता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। पहले हम फिंरगियों के जुल्म सहते थे, अब अपनों के जुल्म सह रहे हैं। पहले भी सत्ता के खिलाफ बोलने पर आवाज बंद करने की कोशिश की जाती थी, आज भी ऐसा चल रहा है। पहले आजादी के संघर्ष में जान जाती थी, आज तो पता नहीं, कब चली जाए। पहले अंग्रेज देश को लूट रहे थे, आज वही काम नेता कर रहे हैं। पहले भी सत्ता की ओर से तुगलकी फरमान जारी होते थे, आज भी ऐसे फरमान जारी हो रहे हैं। आजादी के लिए बलिदान देने वालों को देश भुला चुका है। आज ऐसे सत्ताधीशों की पूजा हो रही है, जिनका न कोई चरित्र है, न जिनमें नैतिकता है और न ईमानदारी। पहले भी लोग भूख से मरते थे, आज भी मर रहे हैं। सत्ता से चिपके रहने वाले लोग फिंरगी शासन में भी ऐश कर रहे थे, आज भी सत्ता से चिपके रहने वाले ही सारे सुख भोग रहे हैं। आखिर यह कैसी आजादी है? क्या आम आदमी को भय और भूख से मुक्ति मिली है? क्या आम आदमी को उसके जीवन की गांरंटी दी जा सकी है? क्या नारी की अस्मिता सुरक्षित है? क्या व्यक्ति अपनी बात निर्भीकता से रखने के लिए स्वतंत्र है? जाहिर है, इनके जवाब ना में ही होंगे। और जब ऐसा है, तब फिर इस आजादी के आम आदमी के लिए क्या मायने?

दरअसल, अब हम एक ऐसी परंतत्रता में जी रहे हैं, जिसके खिलाफ अब दोबारा संघर्ष की जरूरत है। हमें अगर पूरी आजादी चाहिए, तो हमें एक और स्वाधीनता संग्राम के लिये तैयार हो जाना चाहिये। यह स्वाधीनता संग्राम जमाखोरों, कालाबाजारियों के खिलाफ होना चाहिए। यह संग्राम भ्रष्टाचारियों से लड़ा जाना चाहिए। यह संग्राम चोर, उचक्कों, लुटेरों और ठगों के खिलाफ छेड़ा जाना चाहिये। यह संग्राम देश को खोखला कर रहे सत्ता व स्वार्थलोलुप नेताओ के विरुद्ध लड़ा जाना चाहिए। यह संग्राम उन लोगों के खिलाफ किया जाना चाहिये, जो गरीबों, दलितों, मजलूमों और नारी का शोषण कर फल-फूल रहे हैं। अगर हम ऐसे लोगों को परास्त कर सके, अगर हम ऐसे लोगों से देश को मुक्त करा सके, तब हम कह सकेंगे कि हम वास्तविक रूप से आजाद हो चुके हैं। लोगों के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष तो है, मगर व्यवस्था परिवर्तन के लिए कोई तैयार नहीं है।

हर भारतीय की इच्छा है कि आजादी केवल किताबों और शब्दों में ही नहीं, बल्कि धरातल पर भी दिखनी चाहिये। हमें गाँधी के सपनों का भारत चाहिये। हमें देश के महान क्रांतिकारियों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना है। विडंबना यह है कि हम आजादी के पर्व पर इन तथ्यों पर जरा भी चिंतन नहीं करते। हम सिर्फ इस दिन रस्म अदायगी करते हैं। सुबह झंडा फहरा कर और बड़े-बड़े भाषण देकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और दूसरे ही दिन पुराने ढर्ऱे वाली आपाधापी में व्यस्त हो जाते हैं।

-तेजवानी गिरधर

Sunday, January 09, 2011

वन्देमातरम् वास्तव में दुर्गा देवी की वन्दना है - रवीन्द्रनाथ टैगोर

सुशोभित, शक्तिशालिनी, अजर-अमर

मैं तेरी वन्दना करता हूँ।

वन्देमातरम् के समर्थन और विरोध की प्रक्रिया प्रायः तभी शुरू हो गई थी, जब यह गीत छपकर पाठकों के सामने आया था। उसी समय से हिन्दुत्ववादी शक्ति इसका समर्थन करती आ रही है। इसके विपरीत अल्पंसख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, इसका विरोधी रहा है। समर्थक और विरोधी दोनों वर्ग के अपने-अपने तर्क हैं।

बंकिमचन्द्र चटर्जी के विवादास्पद उपन्यास ‘आनंदमठ’ से उद्धृत इस गीत का समर्थन करने वाले लोग कहते हैं कि इसका विरोध करने वाले लोग न तो भारत के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं और न यहां की सभ्यता और संस्कृति का आदर ही कर सकते हैं। विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल वन्देमातरम् या सरस्वती वन्दना के गायन के विरोध को ‘राष्ट्र का अपमान तथा हिन्दू समाज के प्रति घृणा का प्रदर्शन’ कहते हैं।

विपरीत अल्पसंख्यक समुदाय का कहना है कि हम वन्देमातरम् या सरस्वती वन्दना का विरोध नहीं करते हैं, इस गीत को गै़र हिन्दू समुदाय पर थोपने का विरोध करते हैं। हिन्दू भाई गाएं और रात-दिन गाएं, गाते रहें। हम नहीं गाएंगे। इसे हम पर न थोपा जाए।

मुस्लिम समुदाय कहता है कि वन्देमातरम् में अनेक देवी-देवताओं की वन्दना की गई है। इसलिए यह इस्लाम की मूल अवधारणा-एकेश्वरवाद-के खि़लाफ़ है। मुसलमान सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करता है, उसी के समक्ष झुकता है, अन्य किसी की न तो वह इबादत या वन्दना कर सकता है और न ही किसी दूसरे के सामने झुक सकता है। वह तो अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की भी इबादत नहीं करते , इबादत के लायक़ तो केवल अल्लाह है, अन्य कोई नहीं। अतः मुस्लिम समुदाय दुर्गा, सरस्वती, माता, मातृभूमि या अन्य किसी भी देवी-देवता की वन्दना नहीं कर सकता।

संघ परिवार के बहुत निकट समझे जाने वाले एक मौलाना भी इस तथ्य से इनकार नहीं करते कि वन्दना में धरती या देश को विभिन्न देवी-देवताओं के रूप में दिखलाया गया है। मौलाना का कहना है कि मुसलमान मानता है कि अल्लाह एक है। सिर्फ़ उसी के आगे झुकना है। इसलिए यह मुस्लिम चित्त को ठेस पहुँचाता है। मुसलमान का हृदय हर उस बात से आन्दोलित होता है, जो इस विश्वास के खि़लाफ़ जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि मुसलमान देशभक्त नहीं है। भारत के प्रति या अपने देश के लिए मुसलमान के मन में अपार श्रद्धा है। परन्तु यह उस तरह की मातृ भक्ति कदापि नहीं कर सकता, जैसी संघ परिवार चाहता है।

मौलाना एक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि लाखों लोग सड़क पर चलते हैं। उनमें औरतें भी होती हैं। एक औरत होती है, जिसने हमें जन्म दिया है। वह औरत भी हज़ारों-लाखों औरतों की तरह मामूली है। उन्हीं की तरह चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल है, थोड़े से हेरफेर के साथ वैसी ही शक्ल-सूरत है। लेकिन उस औरत के प्रति विशेष लगाव क्यों आ जाता है, जिसने हमें जन्म दिया है? उस लगाव का ऐलान नहीं करना पड़ता। गीत गाकर आपको बताना नहीं पड़ता कि यह मेरी माँ है और मैं इसकी इज़्ज़त करता हूँ क्योंकि यह मुहब्बत स्वाभाविक है। वह माँ के प्रति प्यार की तरह स्वाभाविक है। उसके लिए गीत गाना ज़रूरी नहीं है। यह भी नहीं समझना चाहिए कि देशगान गाएंगे तो ही देशभक्त साबित होंगे, वरना नहीं।

यहां गुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर के एक पत्र का उल्लेख प्रसंगानुकूल होगा। उन्होंने 1937 ई॰ में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘‘वन्देमातरम् वास्तव में दुर्गा देवी की वन्दना है। यह सत्य इतना स्पष्ट है कि इस पर बहस नहीं की जा सकती। बंकिम ने अपने इस गीत में बंगाल से दुर्गा का अटूट संबंध बताया है। इसलिए किसी भी मुसलमान से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह दस हाथों वाली इस देवी को राष्ट्रीयता की भावना से स्वदेश के रूप में पूजेगा। इस साल हमारी पत्रिका के बहुत से पाठकों ने वन्देमातरम् के गायन वाले कुछ स्कूलों के हवाले दिए हैं और सबूतों के साथ सम्पादकों को लिखा है कि यह गीत दुर्गा देवी का भजन ही है।’’ (सेलेक्टेड लेटर्स आफ रवीन्द्रनाथ टैगोर, सम्पादक दत्ता तथा रॉबिन्सन, कैम्ब्रिज, 1997, पृ॰ 487)

वन्देमातरम् और संघ परिवार

वन्देमातरम् गाने या न गाने का विवाद जब ज़ोरों पर था, तभी संघ परिवार के प्रमुख नेता सदाशिव माधव गोलवलकर ने अपने एक लेख में यह लिखकर वन्देमातरम् विवाद को एक नया मोड़ दे दिया था कि जो लोग देश को अपनी मां नहीं समझते, इस रूप में उसे पूज्य नहीं मानते, वन्देमातरम् गाने से परहेज़ करते हैं, वे इस देश के प्रति निष्ठावान नहीं हो सकते।

आज भी संघ परिवार गुरूजी के नक्शेक़दम पर चल रहा है। संघ परिवार भारतीय मुसलमानों को नया नाम देना चाहता है। क्या है वह नया नाम? वह नाम है ‘मुहम्मदी हिन्दू’ अर्थात् ऐसे प्रत्येक मुसलमान को ‘मुहम्मदी हिन्दू’ कहा जा सकता है, जो पूरी तरह हिन्दुत्व के रंग में रंग जाए और यहां की देवियों तथा यहां के देवताओं एवं महापुरूषों को अपना पूज्य माने, उनके आगे पूरे श्रद्धाभाव से झुके। उनका नाम मुसलमानों जैसा हो, लेकिन काम पूरी तरह हिन्दुओं जैसा। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर एक बार गुरूजी ने मज़ारपरस्त मुसलमानों के बारे में कहा था कि इन्हें न छेड़ो, इनकी मदद करो, क्योंकि ये हमारे भटके हुए भाई हैं। - मुहम्मद इलियास हुसैन


मासिक कान्ति जुलाई 1999 से साभार