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Thursday, January 07, 2016

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के 'अहम' से हुआ 'नाकाम' पठानकोट ऑपरेशन!


आधिकारिक सूचनाओं के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पास पहले से ही एक जनवरी के सुनियोजित हमले के प्लान की खुफ़िया जानकारी थी.
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि पठानकोट हमले पर भारत की प्रतिक्रिया बिल्कुल नौसिखिया थी- आक्रमण अपर्याप्त था, कई फोर्स एक साथ ऑपरेशन में शामिल थीं, इसके बाद उपयुक्त हथियारों की कमी ने पूरे ऑपरेशन को करीब-करीब नाकाम कर दिया.
जब हमले शुरू हुए तब अजित डोभाल ने 150 एनएसजी कमांडोज़ को माणेसर से एयरलिफ्ट कराकर अनजान इलाके में लड़ने के लिए भेज दिया.
मिशन का नेतृत्व एनएसजी, डिफेंस सर्विस कॉर्प्स और वायु सेना के गरुड़ स्पेशल फोर्सेस को सौंप दिया गया.
डिफेंस सर्विस कॉर्प्स, सेवानिवृत और प्रेरणाविहीन सैनिकों का समूह है तो वहीं गरुड़ भारत की बढ़ते स्पेशल फोर्सेस के भीड़ के बीच अपने लिए औचित्य तलाश रहा है.
ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे ऑपरेशन पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए डोभाल ने पठानकोट में पहले से तैनात 50 हज़ार सैनिकों को नज़रअंदाज़ कर दिया जो संभवतः पूरे देश में सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा है.
रिपोर्टों की मानें तो डोभाल ने सेना प्रमुख से महज़ 50 से 60 फौजियों की टुकड़ी ऑपरेशन के बैक-अप के लिए मांगी थी.
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक सेना के पास कश्मीरी घुसपैठियों से लड़ने का ज्यादा अनुभव है.
एनएसजी इलाके से वाकिफ़ नहीं थी जिससे उसे नुकसान का सामना करना पड़ा जिससे बड़ी आसानी से बचा जा सकता था. इ
समें एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन कुमार भी शामिल हैं जिनकी मौत एक फंसे हुए चरमपंथी के शरीर में लगे ग्रेनेड फटने से हुई थी.
इस विस्फोट में चार अन्य एनएसजी कमांडोज़ घायल हो गए.
माना जा रहा है कि अगर सेना उनकी जगह होती तो चरमपंथियों के इस फंदे में कभी न फंसती क्योंकि वो इस तरफ के हमले से वाकिफ़ है.
सैन्य सूत्रों के मुताबिक एनएसजी के पास पठानकोट जैसे ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए नाइट विज़न डिवाइस और दूसरे ज़रूरी साजो-सामान तक नहीं थे.
चार दिन तक चले ऑपरेशन में सेना की भूमिका सीमित थी.
हालांकि ऑपरेशन के 48 घंटे बीत जाने के बाद और मोदी, राजनाथ, पर्रिकर के ऑपरेशन के सफलतापूर्वक समाप्त होने की घोषणा के बाद करीब 200 सैनिकों को तैनात किया गया.
चार चरमपंथियों को मार गिराने के बाद प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और रक्षा मंत्री के बधाई संदेश आए. लेकिन इसके तुरंत बाद दोबारा गोलीबारी शुरू हो गई.
इससे इस बात पर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि 1,200 हेक्टेयर में फैले एयरबेस में कितने बंदूकधारी छुपे हुए थे.
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक सोमवार रात तक रुक-रुककर गोलीबारी और ग्रेनेड धमाके एयरबेस के अंदर से सुनाई पड़ रहे थे. हालांकि कोई भी ज़मीनी हक़ीक़त से पूरी तरह वाकिफ़ नहीं था.
सोमवार दोपहर को उप एनएसजी कमांडो मेजर जेनरल दुष्यंत सिंह ने कहा कि ऑपरेशन अपने आखिरी चरम पर था.
जबकि मंगलवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने प्रेस वार्ता में कहा कि 6 चरमपंथियों को मार गिराया गया है. लेकिन पूरे एयरबेस को खाली कराने में अभी समय लगेगा.
पर्रिकर ने उस वक्त कहा था कि ऑपरेशन में कुछ खामियां हैं. हालांकि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया गया है.
समीक्षकों के मुताबिक 2008 मुंबई हमलों में हुए 166 लोगों की मौत के वक्त भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने जो गलतियां की थीं वे पठानकोट में भी दोहराई गईं क्योंकि किसी तय नीति के तहत ऑपरेशन को अंजाम नहीं दिया गया.
मुंबई हमलों के वक्त शुरू में 10 बंदूकधारियों के विरुद्ध स्थानीय पुलिस बल को तैनात किया गया था. बाद में उनकी जगह मार्कोस स्पेशल कमांडोज़ को लड़ने के लिए भेजा गया.
इसके बाद सैन्य कमांडोज़ ने मुंबई के तीनों हमले वाले इलाकों, दो होटल और एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र में मार्कोस की जगह ले ली.
बाद में एनएसजी ने सेना की जगह ली जिन्हें मुंबई पहुंचने में 12 घंटे का वक्त लगा.
सैन्य समीक्षक, सेवानिवृत मेजर जेनरल शेरू थपलियाल के मुताबिक पठानकोट ऑपरेशन में सुरक्षा एजेंसियों के क्रम और किसी एक के हाथों में कंट्रोल न होने से लड़ाई के नतीजे पर बुरा असर पड़ा.
उनके मुताबिक चार दिनों का वक्त पांच से छह चरमपंथियों को मार गिराने, वो भी एक सीमित जगह पर समझ के परे और अस्वीकार्य है.
लेकिन इस ऑपरेशन की एक सबसे महत्वपूर्ण बात रही कि चरमपंथी वायु सेना की संपत्ति, जैसे मिग-21 हेलीकॉप्टर का नुकसान नहीं कर पाए.
पठानकोट एयरफोर्स बेस पर चरमपंथी हमले पर काबू पाने में भारतीय अधिकारियों को चार दिन लग गए.
पाकिस्तानी सीमा के नज़दीक स्थित इस बेस पर हुए हमले में सात भारतीय सैनिक मारे गए जबकि 22 अन्य घायल हो गए.
मेरे हिसाब से सुरक्षा ऑपरेशन का संचालन पूरी तरह विफल रहा.

Friday, January 25, 2013

कश्मीर पर तो राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए



(पीयूडीआर ने जम्मू-कश्मीर में सैनिकों द्वारा उत्पीड़न पर ‘इम्प्यूटिनी फॉर एलिजिड परपेट्रेटर्स एंड क्वेस्ट फॉर जस्टिस इन जम्मू एंड कश्मीर’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें 214 घटनाओं के हवाले से स्थिति की भयावहता स्पष्ट की गई है। रिपोर्ट के आख़िरी पन्नों में परिशिष्ट के रूप में कुछ दस्तावेजों को भी स्कैन कर लगाया गया है। कश्मीर की राजनीतिक स्थितियों पर अरुंधति लिखती रही हैं, पीयूडीआर की इस रिपोर्ट के मौके पर उन्होंने गांधी शांति प्रतिष्ठान में जो भाषण दिया, पेश है उसका हिंदी तर्जुमा)

मैं ये कहना चाह रही हूं कि कश्मीर में सैनिकों द्वारा जो उत्पीड़न हो रहे हैं वो किसी सैनिक का निजी विचलन नहीं है बल्कि ये सांस्थानिक योजना है। .....अल्जीरिया जब फ्रांस का उपनिवेश था तो उस समय एक फ्रांसीसी सैनिक ने कहा कि ये मेरा काम है कि मैं अल्जीरिया में मानवाधिकार को तोड़ूं, यहां के लोगों को धमकाकर रखूं, लोगों को यातनाएं दूं। मुझे ऐसी ही पाठ पढ़ाई गई है! इसलिए मानवाधिकार हनन का मसला किसी का निजी मामला भर नहीं है, ये सांस्थानिक है और ऐसी स्थिति में इस तथ्य पर नज़र दौड़ाइए कि कैसे भारतीय सेना ये कहती है कि कश्मीर में वे सेना द्वारा हुए मानवाधिकार हनन की जांच खुद अपनी संस्था के मार्फ़त करवाएगी! इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए?
.....कश्मीर की हालत बेहद ख़स्ता है और इस लिहाज से पीयूडीआर ने जो काम किया है उसकी हमें ज़रूरत है। कश्मीर के बारे में लोगों के पास अब सूचनाएं आने लगी हैं। इसलिए कई दफ़ा सुधिजन ये कहने लग जाते हैं, अरे यार, क्या होगा इन आंकड़ों और बातों का, क्या फ़ायदा होने जा रहा? लेकिन ऐसे मुश्किल हालात में काम करने वालों को लगातार काम करते रहना चाहिए क्योंकि इन कामों के पुलिंदों में असर छुपा होता है।
मुझे नर्मदा घाटी की एक बात याद आ रही है: एक गांव में आदिवासी लोग अपने खेत में रोपनी कर रहे थे। वो गांव डूब क्षेत्र में आने वाला था, तो मैंने पूछा कि जब फ़सल डूबनी ही है तो वो क्यों रोपनी कर रहे हैं? गांव वालों ने जवाब दिया कि वो जानते हैं कि फ़सल डूब जाएगी, लेकिन वे और कर क्या सकते हैं। फ़सल रोपना उनका काम है और वो ऐसा करेंगे। इसलिए डुबोने वालों को अपना काम करने दीजिए, आप अपना काम करते रहिए।
बहरहाल, ये रिपोर्ट महज इन आंकड़ों की सूची और घटनाओं का संग्रहण नहीं है कि कितने लोग कश्मीर में मारे गए और कितनों को यातनाएं मिलीं, बल्कि ये हमारे सामने कहीं ज़्यादा गंभीर सवाल उछालती है। ये हमें बताती है कि वास्तव में सैन्य कब्जेदारी का नतीजा किस रूप में सामने आ रहा है। सैन्य अत्याचार की इन घटनाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसा नहीं है कि एक सेना का जवान आया और यातना बरसा गया, एक सेना का जवान आया और ख़ून बहा गया, वास्तव में ये सांस्थानिक मसला है। ये घटनाएं भटकाव या अपवाद को रेखांकित नहीं करतीं। उनको उन्हीं खातिर तैयार किया गया है और वे जो वहां कर रहे हैं वही उनका कर्तव्य है!
मैं कई बार कश्मीर गई हूं और मैंने देखा है वहां के लोगों की आंखों में क्या है? आफ़्सपा जैसे क़ानून के साए में जी रहे कश्मीर में अत्याचार के कैसे-कैसे वारदात अंजाम दिए जाते हैं ये इधर के लोगों की कल्पना से परे हैं। कश्मीर के (तकरीबन) किसी भी घर में चले जाइए वहां दस्तावेज़ों से भरा प्लास्टिक का थैला आपको मिल जाएगा। लोग आपको बताएंगे,- मैंने यहां एफआईआर किया, वहां अर्जी डाली, फिर ऊपर गया, अदालतों के चक्कर काटे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ऐसी निराशा हर घर में पसरी मिलेगी। दस्तावेज़ों के पुलिंदों के बावज़ूद कुछ नहीं हो रहा! पूरी अवाम के साथ ये किस तरह का बरताव है?

...सवाल ये है कि हम इस रिपोर्ट का क्या करें, हमें कश्मीर के बारे में क्या करना चाहिए? चलिए एक सामान्य उदार भारतीय के लिए इसके मायने ढूंढते हैं। आप देखिए न, अन्ना हज़ारे के साथ और दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध में हुए आंदोलन में डूबते-उतराते लोग कहां खड़े हैं? कौन बोल रहा है कश्मीर पर? उनके पोजिशन और मुद्दे साफ़ हैं। कश्मीर से उनको क्या लेना-देना? लेकिन एक उदार राजनीति के व्यक्ति को भी इस मुद्दे पर साथ होना चाहिए। मैं तो कहूंगी कि राष्ट्रवादियों को भी सोचना चाहिए कि कश्मीर के मुद्दे उनके लिए क्यों महत्वपूर्ण है! मैं कारण बताती हूं। आज़ादी के 60 साल बाद तक पुलिस, भारतीय सेना, सीआरपीएफ़ और बीएसफ़ ने नागालैंड, मणिपुर और कश्मीर में कब्जेदारी की बदौलत जिस तरह से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई है और इस दौरान उन्होंने जो भूमिका निभाई है, उसने सांस्थानिक रूप ले लिया। राष्ट्रवादियों को बस मैं ये बताना चाहती हूं कि रक्षा बलों ने जो कसरत उन इलाकों में की है वे अब भारत की “मुख्यभूमि’ में उनका इस्तेमाल करने लग गई हैं। छत्तीसगढ़ में यही कार्रवाई हो रही है और धीरे-धीरे इसकी परास बढ़ती जा रही है.....
....रक्षा बलों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं पर तो सवाल भी नहीं उठते। बड़ी आबादी यातना देने वालों की पांत के साथ खुद को नत्थी पाती है, इस महसूसियत में एक तरह का वर्चस्व का पुट शामिल होता है, इसलिए ये मज़ा देता है। मुझे संसद भवन पर हुए हमले के तुरंत बाद हुए एक टीवी शो की याद आ रही है जो शायद सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित हुआ था, उसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कह रहे थे“हां, ये सच है कि अफ़जल गुरू को मैंने यातनाएं दी है, मैंने उसकी गुदा में पेट्रोल डाला है, मैंने उसको बेतरह पीटा है, लेकिन अफसोस उसने कुछ नहीं कबूला।” उस चर्चा में कई राजनीतिक विश्लेषक, टिप्पणीकार और पत्रकार भी थे, शायद राजदीप सरदेसाई शो को एंकर कर रहे थे, लेकिन किसी ने पुलिस अधिकारी की आपकबूली पर एक वाक्य नहीं बोला। पुलिस अधिकारी ने दावा ठोका कि उसने राष्ट्रहित में ऐसा किया है।....इसलिए मेरा ये मानना है कि ये रिपोर्ट ऐसे कॉरपोरेट मीडिया के लिए नहीं है और न ही उन लोगों के लिए है जिन्हें ऐसी यातनाओं को देखने-सुनते में मज़ा हासिल होता है।

ये उन लोगों के लिए है जो वाकई इन यातनाओं को संदर्भ सहित जानने-समझने की चाह रखते हैं, जो ये समझना चाहते हैं कि बीते छह दशकों में कश्मीर में वाकई हुआ क्या है? बड़ी आबादी की राजनीति को खारिज करने से उपजे सवाल को लेकर कई लोग असहज और परेशान हो जाते हैं। लेकिन ये ढोंग नहीं है, राजनीति है। मैं एक बात और कहना चाहती हूं कि आज यदि एक कश्मीरी पंडित 200 लोगों का संदर्भ देकर एक किताब लिखता है तो लोग उसको हाथों-हाथ लेते हैं, कश्मीर का एक भयावह चेहरा लोगों के सामने नमूदार होने लगता है। लेकिन आज ही अगर आप हज़ारों पेज के दस्तावेज़ के साथ उसी कश्मीर पर सैंकड़ों पेज का किताब लिखेंगे तो लोग तवज्जो तक नहीं देंगे। यही राजनीति है। राजनीति यही है कि बहुसंख्य आबादी को क्या रास आ रहा है और लोग किस मुद्दे के साथ तादात्मय बना पा रहे हैं। लेकिन ऐसे काम लगातार होते रहना चाहिए, कश्मीर पर ये बढ़िया रिपोर्ट है, जिसे ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए।

Thursday, July 26, 2012

सरकार अगर गहरी नींद में है, तो जनता को जागना ही पड़ेगा



दरभंगा अब राज्य प्रायोजित आतंकवाद के प्रतिरोध का केंद्र बन रहा है। हमने आजमगढ़ में बहुत पास से देखा है कि किस तरह अपहरणकर्ता-अपराधी एटीएस-एसटीएफ के लोगों को दौड़ा-दौड़ा कर, पकड़ कर पूछताछ की गयी और गैरकानूनी गिरफ्तारियों और छापेमारी को रोका गया। यह सिलसिला दरभंगा में भी शुरू हो चुका है। जिस तरह यूपी में एक दौर में आतंकवाद के नाम पर हो रही फर्जी गिरफ्तारियों को लेकर एसटीएफ अधिकारियों के नार्को टेस्ट और उसे भंग करने की मांग मुद्दा बनी, आज उसी तरह एक बार फिर से एटीएस के खिलाफ भी ऐसा माहौल बन रहा है। यह जद्दोजहद फासीवादी/सैन्यवादी मानसिकता वाले राज्य की नीतियों के खिलाफ लोकतांत्रिक राज्य के लिए है। इस मुहीम में सियासत तो बदलेगी ही, बेगुनाहों को भी छोड़ना पड़ेगा।

13 मई को सउदी से अपहरण किये गये फसीह महमूद, जिन्हें आज तक पेश नहीं किया गया, की पत्नी निखत परवीन बता रही थीं कि दरभंगा से फिर किसी को उठाने जा रहे थे। कुछ लोग एक कार में बैठे थे और उनमें से एक सामने वाले डाक्टर की क्लीनिक में देखने गया। एक बंदे को बुला कर कहा कि उस कार वाले लोग तुम्हें बुला रहे हैं। जब वो उस कार के पास गया, तो पुलिस वालों ने जो सिविल ड्रेस में थे, उसका अपहरण करने का प्रयास किया। आस-पास के लोगों ने जब कार रोकी और उस बंदे को निकाला तो पुलिस वाले वहां से भाग गये। इसी तरह की घटना एक और गांव में हुई, जहां पर बाद में एटीएस वालों ने आकर माफी मांगी कि वो लोग गलती से उसे उठाने आये थे। निखत आगे कहती हैं कि अगर लोगों ने बचाव नहीं किया होता, तो आज उनकी गलती नहीं होती बल्कि एक बड़ा नया आतंकवादी पकड़ा गया होता।

इसी तरह आजमगढ़ में भी हुआ था। जब वहां आतंकवाद के नाम पर दमन हो रहा था, तो आम नागरिकों ने गांव-गांव में पर्चे बांटे थे कि अगर आपका कोई करीबी गायब है, तो आप इन सरकारी और मानवाधिकार संगठनों के नंबरों पर फैक्स-फोन-ईमेल करिए। एटीएस-एसटीएफ के आतंक के खिलाफ ग्राम सुरक्षा कमेटियां बनायी गयीं। आज फिर उसी आंदोलन की दस्तक दरंभगा में भी हो चुकी है।

नीतीश सरकार बताये कि आखिर उसके सुशासन वाले राज्य में बिना नंबर प्लेट के एटीएस की कार कैसे घूम रही है। नीतीश को याद रखना चाहिए कि आजमगढ़ जिसे आतंकवाद की नर्सरी के बतौर स्थापित करने की राज्य ने कोशिश की, वहां के लोगों ने 2009 के लोकसभा और 2012 के विधानसभा चुनाव के एजेंडे को बदल दिया। बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद आजमगढ़ में बनी राष्‍ट्रीय ओलमा कांउसिल अपने आप में एक नयी राजनीति की दस्तक थी।

कांग्रेस ने चुनावों में हुई अपनी करारी हार का कारण भी इसे माना। सत्ता में आयी मुलायम सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में इस बात को कहा था कि वो सरकार में आएगी, तो आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये बेगुनाहों को छोड़ेगी। आज सपा के सत्ता में आने के बाद लगातार सरकार को राजनीतिक दल और मानवाधिकार संगठन इस बात पर घेरे हुए हैं। सरकार के नुमाइंदे बार-बार छोड़ने की प्रक्रिया के बारे में बयान देते नजर आते हैं।

इसकी तस्दीक लखनऊ की दीवारों पर चिपके ‘वादा निभाओ’ पोस्टर, खुफिया और एटीएस की सांप्रदायिकता के खिलाफ और ‘खुफिया द्वारा संचालित इंडियन मुजाहिदीन पर श्‍वेत पत्र जारी करो’ की मांग वाले बैनर करते हैं। आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के लिए पिछली 30 जून को विधानसभा घेराव के एक दिन पहले ही यूपी के एडीजी (कानून व्यवस्था) जगमोहन यादव को कहना पड़ा कि एटीएस और जिलों के कप्तानों से ऐसे मामलों को चिन्हित करने को कहा गया है, जिनमें फर्जी धरपकड़ की शिकायत है। खैर, जो भी हो, अगर सपा सरकार स्वतंत्रता दिवस तक आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये निर्दोषों को नहीं छोड़ती है, तो इसके खिलाफ एक बड़े जनआंदोलन की तैयारी हो चुकी है।

सैकड़ों दलितों के हत्यारे ब्रम्हेश्‍वर मुखिया को रिहा करने वाली नीतीश सरकार बताये कि उसके राज्य के कतील सिद्दीकी को पुणे की जेल में मार दिया जाता है और उसी के गांव बाढ़ समेला, दरभंगा के फसीह महमूद का दो महीनों से भारतीय एजेंसियों ने अपहरण किया, इस पर उसने क्या किया? उसे ही नहीं, बिहार में पसमांदा (पिछड़े-दलित) मुसलमानों की राजनीति करने वाले और मुस्लिम समुदाय पर ‘मसावात की जंग’ जैसी गंभीर किताब लिखने वाले अली अनवर अपनी चुप्पी तोड़ें। कुछ दिनों पहले बिहार के मधुबनी जिले के सकरी क्षेत्र से फिर एक व्यक्ति के उठाने की खबर सामने आयी थी।

नीतीश बाबू, दरभंगा की गलियों में राज्य प्रायोजित आतंक का जो बीजारोपण हुआ है, उसे जाकर देखिए कि किस तरह लोगों का जीना मुहाल हो गया है। पिछले दिनों दरभंगा के मानवाधिकार नेता शकील शल्फी बता रहे थे कि महेशपट्टी के एक लॉज से पुलिस वाले कुछ मुस्लिम लड़कों को उठा ले गये और दो दिन बाद उन्हें यह लिखवाते हुए छोड़ा कि हम अपनी मर्जी से आये थे। नीतीश जी, जरा अपना कामन सेन्स लगाइए कि जिस इलाके में खाकी वर्दी क्या, किसी हट्टे-कट्टे मोटे आदमी को पुलिस वाला समझकर लोग दहशत में जी रहे हैं, वहां कोई अपनी मर्जी से पुलिस वालों के पास जाएगा?

शकील बताते हैं कि मुंबई एटीएस के नाम से दरभंगा के कुछ लड़कों को फोन करके उन्हें धमकाते हुए मुंबई आने का दबाव बनाया गया कि चुपचाप बिना किसी को बताये वो मुंबई पहुंचे। कुछ दिनों पहले बैंग्लोर में इंजीनियरिंग पढ़ने वाले अब्दुल निसार को लंबे समय तक एटीएस ने पूछताछ के नाम पर यातना दी। वह डर के मारे किसी को कुछ नहीं बता रहा था, पर उसके शरीर पर गंभीर चोट के निशान देखकर जब परिजनों ने पूछा, तो वह रो-रो कर एटीएस की यातना की लंबी दास्तान बताने लगा। लगातार परिजनों को एटीएस की धमकी मिल रही है और वह पढ़ाई छोड़कर गांव में डर-डर कर रह रहा है।

इसी तरह आजमगढ़, संजरपुर के अबू राशिद पर मुंबई के क्राइम ब्रांच ने दबाव बनाया कि वो मुंबई आये और इसके लिए वे उनके भाई अबू तालिब को उठाकर आजमगढ़ ले आये और फिर अबू राशिद को संजरपुर गांव के लोगों ने इस भरोसे के साथ आजतक टीवी चैनल की मौजूदगी में विदा किया कि जांच करके वो लोग छोड़ देंगे? पर उनके भरोसे को मुंबई क्राइम ब्रांच ने तोड़ दिया और रास्ते से अपहरण कर लिया और आज तक किसी अदालत में पेश नहीं किया और अब उसे फरार बताती है। सवाल यह है कि अगर उसे फरार होना होता, तो वह सार्वजनिक तौर पर जाता ही क्यों? पर इसका जवाब आजमगढ़ ने दिया, जहां राज्य आजमगढ़ को आतंकवाद के नाम पर निर्दोषों के उत्पीड़न का केंद्र बनाने पर तुला था, वहीं आजमगढ़ आंदोलन का केंद्र बनकर उभरा।

नीतीश जी, रमजान का महीना है और आप और आपके नुमाइंदे इफ्तार करने-करवाने की तैयारी में भी होंगे। क्या आपको मालूम है कि आपके राज्य की राजधानी पटना से कुछ सौ किलोमीटर दूर रहने वाली लड़की निखत परवीन अपने पति फसीह महमूद, जिसे भारतीय एजेंसियों ने दो महीनों से गायब किया है, की खोज में दर-दर भटक रही है? यहां तक कि पिछले दिनों इंटरपोल ने कहा है कि जब तक भारत चार्जशीट नहीं देता, तब तक हम फसीह को भारत को नहीं सौंप सकते।

उत्तर प्रदेश में राज्य प्रायोजित आंतकवाद के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन की शुरुआत आपको जानना चाहिए। 2007 में उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद 12 दिसंबर को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर को मड़ियाहूं से खालिद का अपहरण यूपी एसटीएफ ने किया था, जिसके बाद आजमगढ़ में जबरदस्त आंदोलन हुआ और नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के नेता चौधरी चंद्रपाल सिंह ने कहा कि अगर 22 दिसंबर 2007 तक तारिक को नहीं लाया गया, तो वे आत्मदाह कर लेंगे। एसटीएफ ने 23 दिसंबर को तारिक-खालिद को बाराबंकी से गिरफ्तार करने का दावा किया। जनांदोलनों के दबाव में पिछली मायावती सरकार को यूपी एसटीएफ द्वारा की गयी इस फर्जी गिरफ्तारी पर आरडी निमेश जांच आयोग का गठन करना पड़ा और जब से सपा की सरकार बनी है, वो इतने दबाव में है कि उसके नुमांइदे बार-बार छोड़ने की बात करते हैं।

कतील सिद्दीकी हों या फिर बाटला हाउस में कत्ल किये गये साजिद-आतिफ, वे भले जीते जी इस क्रूर राज्य व्यवस्था में न्याय नहीं पा सके, पर इनकी शहादत और न्याय के लिए चल रहा आंदोलन ही फासीवादी नीतियों को रौंदते हुए एक लोकतांत्रिक राज्य को कायम करेगा। सियासत भी बदलेगी और बेगुनाह अपने घरों पर लौंटेंगे भी, जहां उनके अपने बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे हैं।

(राजीव यादव। पीयूसीएल यूपी के प्रदेश संगठन सचिव। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद अपने प्रदेश में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्टिंग में रम गये। वाम प्रतिबद्धता वाले युवा पत्रकारों के संगठन जेयूसीएस (जर्नलिस्‍ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी) से भी जुड़े हैं। उनसे rajeev.pucl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Saturday, December 17, 2011

एक अहिंसक वीरांगना- ईरोम शर्मीला


 
एक अहिंसक वीरांगना- ईरोम शर्मीला
आजकल मणिपुर जनता और देश भी इरोम शर्मिला के 11 साल से चल रहे आमारण अनशन से जूझ रही है। वह एक कृत्रिम जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य है। अस्पताल उसका मजबूरी का घर बना हुआ। संभवतः विश्व की वह सबसे लंबा अनशन है जो किसी व्यक्ति वह भी एक महिला ने, अपने लोगों के ऊपर हुए अत्याचार के विरोध में किया है। यह दिसंबर 11 का है और इरोमा ने यह अनशन नवंबर 2000 में मणिपुर के मलोम नगर में सेना  द्वारा आर्मड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट के चलते दस लोगों को गोलियों की भेंट चढ़ा दिया था। आज शर्मीला के अनशन ने मणिपुर को संसार के नक्शे पर ला दिया। उस समय इरोम शर्मीला 28 वर्ष की रही होगी। अब वह 40 साल के लगभग है। उसे लोग अब आयरन लेडी के नाम से पुकारते हैं। अस्पताल में वह अपने संबधियों और मित्रों की जगह सिपाहियों से घिरी रहती है। हर पंद्रह रोज़ में एंबुलेंस में एरोमा को हाज़री देने कचहरी जाना पड़ता है। अगर उससे कोई पूछता है कि क्या तुम अपना अनशन तो़ड़ने के लिए राज़ी वह बिना हिचके इनकार कर देती है, नहीं। उसकी नाक में ट्यूब लगा है जिसके ज़रिए उसे खाना पंहुंचाया जाता है, कृत्रिम खाना। इसी वजह से अब उसका वज़न, बताया जाता है, 37 किलो रह गया। 11 साल में शायद सब खाद्य-पदार्थों का स्वाद भी भूल गई होगी। यह कोई कम बड़ी तपस्या नहीं कि युवा अवस्था में जब सब से अधिक खाने पीने के प्रति बच्चे समर्पित होते हैं एरोमा शर्मीला ने अपने लोगों के लिए उसे भी त्याग दिया। कितने दिन तक वह इस अनशन को इसी तरह जिएगी इसकी किसे चिंता है? और क्यों हो? यह सबसे बड़ा तप है युवावस्था में सारे आकर्षण छोड़कर शरीर को काष्टवत बना लेना और अपने मूल्यवान युवा जीवन के 11 वर्ष अनशन करते हुए, नाक के ज़रिए कृत्रिम भोजन लेकर जीवित रहने के लिए बाध्य होना। यह देश जो अपने को करूणा का स्रोत कहते नहीं अघाता फिर एक महिला पर यह अन्याय कैसे बर्दाश्त करता है?

ईरोमा शर्मीला जैसा कि पहले भी कहा गया अब 39 वर्ष की हो चुकी है। अविवाहित तो है ही पर उसने अपनी सब मानवीय भावनाओं और शारीरिक मूल वासनाओं का परित्याग किया हुआ है। ऐसा नहीं कि उसके मन में कोमल भावनाएं नहीं हैं। उसने एक ब्रिटिश पत्रकार से अपनी इन भावनाओं को प्रकट किया है। गोआ मूल के ब्रिटिशर डेस्मेंड कोटिनो से उसका पूरे एक वर्ष तक पत्र व्यवहार रहा है। पिछले मार्च में वह केवल एक बार उससे मिली भी है। वह भी सामान्य मनुष्य का सा जीवन जीना चाहती है। लेकिन जिस AFSPA कानून को वापिस लिए जाने के लिए वह 11 साल से हर तरह का कारावास जीवन जी रही है, जो उसकी पहली शर्त है, उसकी वापसी की निकट भविष्य में कोई आशा नज़र नहीं आती। भारत सरकार एक पूंजीपति की एयरलाइन्स बचाने के लिए तो सक्रिय हो सकती है, पर 11 साल से कारावास में अपने प्रदेश के नागरिकों की सुरक्षा  के लिए मार्शल लॉ जैसै AFSPA को वापिस लिए जाने की प्रतीक्षा में अनशन करने वाली वीरांगना से बात करने के लिए तैयार नहीं। AFSPA को वापिस लेने की मांग केवल मणिपुर में ही नहीं जेके में भी उठ रही है। वहां के मुख्यमंत्री ने इस सवाल को उठाया है।

यह बहुत बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि मणिपुरी की सिविल सोसायटी के लोग उसकी इस प्रेम भावना को वितृष्णा से देखते हैं। उनका ख्याल है कि प्रेम उनके बीच साजिशन रोपा गया है। इस घटना से शायद मणिपुरवासियों के अहं को चोट पहुंची है। क्या शर्मीला को अपनी निजी जीवन के बारे में कल्पनाएं सजोने और आकांक्षाऐं रखने का कोई अधिकार  नहीं है? खासतौर से जब वह यह कह चुकी है कि वह तब तक विवाह नहीं करेगी जब तक यह काला कानून वापिस नहीं होगा। यह इंताह है कि कि जिस अखबार मे शर्मीला के इंटरव्यू छपते हैं उनका मणिपुर में बहिष्कार किया जाता है। आखिर कब तक सिविल सोसायटी उसके साथ ऐसा कठोर व्यवहार करती रहेगी। वह क्या यह नहीं समझती कि उनके इस आंदोलन को सबसे अधिक प्रतिष्ठा इस अनशन ने दिलाई है। जे के भी इस कानून को वापिस लेने के लिए आवाज़ उठा रहा है लेकिन वहां अभी तक कोई शर्मीला नहीं पैदा हुई। वहां के मुख्यमंत्री इस सवाल को उठा रहे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व कश्मीर से ‘शर्मीला बचाओ’ यात्रा एक कश्मीरी सज्जन फैज़ल भाई के नेतृत्व में चलकर कई राज्यों से होकर मणिपुर गई है। उसमें मधयप्रदेश, पंजाब,गुजरात आदि प्रदेशों के प्रतिनिधि सम्मिलित हैं। काशमीर के कुछ ऐसे युवा कार्यकर्ता भी शामिल थे जिन्हें इस कानून के अंतर्गत उठाकर दो दो तीन साल गिरफ्त में रखा गया था। स्वाभाविक है शर्मीला के अनशन की सहानुभूति लहर कश्मीर तक पहुंची है। वह यात्रा कानपुर भी आई थी, उसकी बैठक हरिहर शास्त्री भवन में हुई थी। उसकी इध्यक्षता का अवसर मुझे दिया गया था। गुजरात भी एक खामोश दमन का शिकार बताया जाता है। यह अच्छा संकेत नहीं है।

अभी AFSPA को हटाने की सुरसुराहट भी नहीं है। ऐसा लगता है शर्मीला को अपने प्रण के अनुपालन में अपना अनशन  पता नहीं कब तक जारी रखना पड़े। अगर ऐसा हुआ तो उसके जीवन के साथ उसका प्रेम भी बलि चढ़ जाएगा। गृहमंत्री का कहना है कि सरकार भी इस मामले पर एकमत नहीं है। सेना को अगर इस मसले पर निर्णय लेना है तो कोई भी अपने दमनात्मक अधिकारों को जल्दी छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता। हत्या या दंड सत्ता का सबसे बड़ा हथियार होता है। खासतौर से उस जब कानूनन भी अधिकार प्राप्त हो।

11 साल के दौरान, जैसा कि पहले कहा गया, वह बहुत कमज़ोर हो गई है। स्नायु तंत्र भी प्रभावित हुआ है। उससे कुछ मित्रों ने कहा कि तुम सोनिया जी को सख्त शब्दों में पत्र लिखो। तो वह रोने लगी ‘मैं कुछ भी सख्त लिखकर किसी का दिल नहीं दुखाना चाहती। मै जैसे जी रही हूं जी लूंगी।‘ वह मन से पूरी तरह गांधीवादी है। मनसा वाचा कर्मणा वह अहिंसा में विश्वास करती है। ऐसी स्त्री को ऐसी हालत में कैंद में रखना और उसके सपनों में को शनैः शनैः तोड़ना कितना मानव विरोधी है और कहां तक जायज़ है। सरकार लोहे की जंज़ीर ही नहीं होती उसका एक पक्ष संवेदनशीलता से भी जुड़ा होना चाहिए। जो सरकारें दमन के सहारे चलती हैं उनका अशहर स्टालिन, मुसोलीनी और गद्दाफी जैसे तानाशाहों की तरह होता है। इस तरह के कानून अनन्तकाल तक नहीं बने रह सकते। जब बदलाव आता है तो बड़ी बड़ी चट्टानें ढह जाती है। अनशन की परंपरा और अहिंसा की पुकार के चलते ही अंततः इस तरह के कानून रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाते हैं। कानून संवेदना विहीन ज़रूर होते हैं पर उन्हें इन्सानों की बेहतरी के लिए इस्तेमाल किया जाए तो समाज को जोड़ने के काम आते हैं। सहनशीलता और मौन अंततः इंसानों के पक्षधर बनकर सामने आते हैं। मुझे बार बार बर्मा की सू की की याद आती है। वह बिना उफ़् किए गांधी की तरह हर दमन को अपने हिस्से की रोटी समझ कर हज़म करती रही है। लेकिन मणिपुर वासी यह भारतीय वीरांगना भी किसी भी हाल उनसे कम नहीं। 11 वर्ष तक भूखा रहकर जेल की यातना सहना और अपने व्यक्तिगत सुखों को बिसार कर अपनी सांसों को  समाज के नाम मौरूसी कर देना, उसे और भी ऊपर भी ऊपर उठा देता है। हम जिस दुनिया में रह रहे हैं उस दुनिया में इस तरह के बलिदानों का कोई मूल्य नहीं। शायद इसी मूल्यहीनता के कारण ही मणिपुर की सिविल सोसायटी और देश के समर्थन के बावजूद शर्मीला आज इतने बड़ा बलिदान के बाद अकेली है। शर्मीला बचाओ यात्रा और दस दिसंबर को दिल्ली के राजघाट पर देश भर की हज़ारों महिलाओं का उपवास, हो सकता है इस राजनीतिक जड़ता को तोड़ने में कामयाब हो सके। आमीन!

Sunday, June 12, 2011

भारतीय मीडिया का फारबिसगंज सिंड्रोम



Dilip Mandal
अगर आप बिहार से बाहर हैं तो इस बात की पूरी आशंका है कि अररिया के फारबिसगंज में हुए पुलिसिया हत्याकांड के बारे में नहीं जानते। अगर आप पटना में हैं तो भी यह शायद आपके लिए बड़ी खबर नहीं होगी। राज्य के हिला दे, ऐसी बड़ी खबर तो आप इसे नहीं ही मानते होंगे। ऐसा क्यों हुआ होगा, जानने के लिए नीचे का ब्यौरा गौर से पढ़ें।   

नीचे की लिस्ट में पहली एंट्री तारीख है, दूसरी तीसरी और चौथी एंट्री पहले पेज की तीन बड़े खबरों के बारे में हैं और आखिरी एट्री पहले पेज पर फारबिसगंज कांड की रिपोर्टिंग है। 


दैनिक हिंदुस्तान, पटना संस्करण, पहला पेज, 5-11 जून, 2011 
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड के संदर्भ में

5 जून
बाबा को मैदान छोड़ने का फरमान
हेडली का आका इलियास ढेर
बचना है तो पेड़ लगाएं
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड- कोई खबर नहीं

6 जून
आर पार को तैयार बाबा और सरकार
इंटर में भी छाए गांव के छात्र
धरहरा संदेश बढ़ाने फिर पहुंचे नीतीश
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

7 जून
और कोई रास्ता नहीं था (पीएम/रामदेव)
डॉक्टर हत्याकांड की सीबीआई जांच
समंदर से निकला शुगर का रामबाण इलाज
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

8 जून
निवेश का खुला खजाना
छह घंटे में पटना पहुंचने के लक्ष्य में जुड़ा एक और अध्याय
बापू के दर पर होगा अन्ना का अनश
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

9 जून
दूसरी लड़ाई का अल्टिमेटम (अन्ना)
अब पूरा देश देखेगा बिहार की सफलता की कहानी
आंधी पानी से भारी तबाही, 24 की मौत
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

10 जून
पास न होगा बीज बिल: नीतीश
मकबूल फिदा ने कहा दुनिया को अलविदा
एक जुलाई से मिलेगा टीटीई का फॉर्म
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

11 जून
ग्लूकोज से सुधरी सेहत (रामदेव)
सीबीएसई दसवीं में पटना रीजन के छात्रों का कमाल
ग्रामीण सड़कों के लिए बनेगा निगम: नीतीश
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

दैनिक जागरण, पटना संस्करण, पहला पेज, 5-11 जून, 2011 
अररिया हत्याकांड के संदर्भ में

5 जून
बाबा रामदेव का अनशन शुरू
मारा गया इलियास कश्मीरी
चाहिए शीतल छाव, चलिए गांव गिरांव
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

6 जून
नए आंदोलनों की तैयारी (अन्ना)
इंटर में भी ग्रामीण प्रतिभाओं का परचम
पेड़ लगाएं बेटी बचाएं
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-आरोपी होमगार्ड पर चलेगा हत्या का मुकदमा (1 कॉलम)

7 जून
केंद्र व दिल्ली सरकार को नोटिस
डॉक्टर हत्याकांड की होगी सीबीआई जांच: सीएम
डॉन का उठ गया आईएसआई से भरोसा
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

8 जून
अन्ना का अनशन अब राजघाट पर
निवेश का द्वार खोलेगी नई औद्योगिक नीति
ताजपुर से दरभंगा तक बनेगी चार लेन सड़क
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

9 जून
अन्ना ने किया लंबी लड़ाई का एलान
बयान से पलटे बाबा रामदेव
राज्यों ने रोया धन न होने का रोना
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

10 जून
अन्ना पर भी केंद्र रहेगा आक्रामक
सूबे में महंगी हुई शराब और बीयर
नहीं रहे एम एफ हुसैन
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-कोई खबर नहीं

11 जून
गुणवत्ता से समझौता नहीं (नीतीश)
सीबीएसई 10वीं में 99.5% सफल
रामदेव की हालत बिगड़ी
फारबिसगंज अररिया पुलिसिया हत्याकांड-फारबिसगंज में मारे गए बच्चे के परिजन को तीन लाख (2 कॉलम)

हिंदुस्तान और जागरण मीडिया समूह बिहार में टॉप 10 अखबारों की कुल पाठक संख्या का लगभग 90 फीसदी कंट्रोल करते हैं (देखें -इंडियन रीडरशिप  सर्वे)। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इन दो अखबारों ने भी अगर फारबिसगंज हत्याकांड को अंडरप्ले करने का तय कर लिया तो यह राज्य और देश का मुद्दा कैसे बनेगा। वैसे एक बात और। हिंदुस्तान टाइम्स मीडिया समूहों के मालिकों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में बिहार के सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड के राज्य सभा के सांसद एन के सिंह भी हैं।