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Saturday, March 15, 2014

नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला


मुझे भाजपा के नंदू श्री नरेंद्र भाई मोदी से कोई दुश्मनी नहीं है। कांग्रेस मेरे लिए कोई दूध की धुली हुई पार्टी नहीं है। न ही बसपा से मायावती जी मेरा भला चाहती। लालू के डुप्लीकेट अरविन्द केजरीवाल तो सबसे महान है। मुझे तो हमाम में सारे नंगे लगते हैं। जैसे चोर-चोर मौसेरे भाई। ये बातें मेंने इसलिए कही कि ये लेख और बयानों को पढ़ने वाले मेरे भाई-बंधू और माताएं-बहनें ये न समझे कि मैं किसी विशेष राजनितिक दल या किसी नेता का अंदरखाने प्रचार कर रहा हूँ। क्योंकि ऐसे आरोप मेरे ऊपर हमेशा लगते रहे हैं। लेकिन सारी पार्टियां और नेता ये बात जान लें कि हम जिसे भी समर्थन करेंगे तो सीना ठोंक कर करेंगे।
इन सभी बातों से दूर चलो अब मुद्दे पर आते हैं। मैंने क्यों कहा "नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला". भाइयों-बहनों ये जुमला भी एक जीता-जागता सच है। इस जुमले पर तो मैं गीत भी लिखने वाला हूँ। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर और अपनी अंधभक्ति से ऊपर उठकर देखोगे तो ही आपको "असली चाय वाला" दिखेगा और चाय पीने में मज़ा भी आएगा। फिर आप किसी को मुफ्त में चाय पिलाओगे तो भी मज़ा ही आएगा। भाइयों-बहनों आगे पढ़ने से पहले अपने खुराफाती दिमाग को मोदी साहब से और अन्य किसी नेता से दूर ले जाना। एक पल के लिए आप किसी के कार्यकर्ता नहीं बल्कि एक "मानव" बनकर सोचना। क्या सच है और क्या गलत? 
हमारे भाजपा के "नंदू" श्री नरेंद्र भाई मोदी जी आजकल पुरे देश में चाय की "घुग्गी" लगाते हुए घूम रहे हैं। कहने को तो भाई साहब "रैली" करते हैं, लेकिन लगा रहे हैं "चाय की घुग्गी". अरे भई रेहडी लेकर गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर अगर चाय मुफ्त में पिलाते घूमते तो मैं समझता कि हाँ आपने चाय वालों का मान-सम्मान बढ़ाया है और महनत भी चौखी की है। पर क्या करें ये कहते हुए मुझे अतयंत दुःख हो रहा है कि "चाय मुफ्त में वो भी रेहड़ी लेकर अगर मोदी जी गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर घुमते तो कुड़ते-पजामे पर सलवटें नहीं पड़ जाती, इतना ही नहीं सर्दी के मौसम में पसीना सर से निकल कर निचे दरारों तक पहुँच जाता" उसे कहते हम कि भाई मोदी साहब तो महान हैं। लेकिन अब कैसे महान कहें मोदी साहब को। यहाँ तो गिरी हुई घटिया राजनीति हो रही है। चाय वालों का सरेआम मज़ाक बनाया जा रहा है और चाय वाले बंधू है कि कुछ बोल नहीं सकते। क्या मोदी जी ने गुजरात में किसी चाय वाले की गरीबी दूर करके उसे दूकान में बैठाया है? खामखां बेमतलब स्वार्थी रूप में चाय वालों का इस्तेमाल ही कर रहे नरेंद्र मोदी जी। अरे कोई तो बताये भाई क्या आज तक किसी चाय वाले का मोदी साहब ने कोई भला किया है? ये जो छुटभैये नेता मोदी की नमो चाय मुफ्त में बांटते घूम रहे, क्या वो सारी जिंदगी ऐसे मुफ्त चाय पिलाते रहेंगे? नहीं न। मोदी चुनाव हारे या चुनाव जीते, इससे भाई कोई मतलब नहीं है। सवाल तो ये है कि क्या मोदी जी और मोदी जी वाले छुटभैये चुनाव के बाद ऐसे मुफ्त चाय पिलायेंगे? हारने के बाद भी और जीतने के बाद भी। गुड़गांव में तो छुटभैये नेताओं ने तो "चाय पर चर्चा" कर डाली. कोई पूछे इन स्वार्थी भाजपाई घोड़ों से कि क्या ऐसे "चाय पर चर्चा" होती है भला? बेवकूफ बनाने का धंधा खोलकर बैठ गए हैं। बड़े-बड़े होटलों में और चौपालों पर चाय पर चर्चा करते नहीं थक रहे। किस बिरादरी की और किस गरीब के उद्धार की चर्चा कर रहे हो भाई? मोदी जी को कैसे लाल-किले तक पहुँचाया जाये। इसी का तो ठेका ले रखा है तुमने। इसी ठेके के आधार पर मुफ्त चाय की चुस्की लगाते हो और फ़ालतू की "चर्चा" करते हो। देश की मुंह फाड़े पड़ी समस्याओं के बारे में चर्चा की है कभी? क्या कभी किसी चाय वाले को गले से लगाया है आपने? चाय वाले से मुख्यमंत्री बने श्री मोदी जी ने क्या कभी चाय वालों की व्यथा सुनी? क्या कभी अपनी ही बिरादरी के चाय वालों से अपने फूटे मुह से बात की मोदी जी ने? नहीं न। तो क्यों फिर खामखां का ढोल पीटते घूम रहे हो? नमो चाय... नमो चाय...
सच तो ये है कि मोदी साहब और उनके गुर्गे छुटभैये नेताओं ने चाय वालों का तो रोज़गार भी छीन लिया है। बुरा मानो या भला, आपको अपने आप पता चल जायेगा। अपने भाई सतपाल तंवर को आगे-आगे पढ़ते जाओ...
मैं आपको एक दिन की घटना बताता हूँ। हुआ यूँ कि मैं रोड पर से गुजर रहा था। मुझे एक चाय वाला दिखा। कुछ अटपटा सा था। क्योंकि वहाँ मोदी साहेब के बैनर लगे हुए थे। उन बैनर पर गुड़गांव के एक छुटभैये नेता का फोटो भी लगा था। वो छुटभैया नेता गुड़गांव जिले की एक विधानसभा से भाजपा की टिकट मांगता है। मुझे थोडा ओर अच्छा लगा, मैंने ड्राईवर को बोलकर गाडी रुकवाई और ड्राईवर के साथ-साथ सभी साथियों को भी कह दिया कि आराम से पेड़ के निचे गाडी खड़ी कर आराम फरमाओ। मैं 10 मिनट में आता हूँ। बस फिर क्या था दोस्तों, मैं पहुँच गया उसी चाय वाले भैया के पास। पहले तो गरमागरम चाय का आर्डर दिया और फिर इत्मीनान से बैठकर स्थिति को भांपने लगा। बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया और चाय वाले भैया से घुलने-मिलने की कोशिश की। इस दौरान भाई हम तो चाय वाले भैया से घुल-मिल गए। लेकिन चाय वाला भैया थोडा परेशान सा लगा। बस मैं एक ही झटके में मुद्दे की बात पर आ गया। पूछ ही डाला चाय वाले भैया से, " कि भैया ये तो बताओ कि ये मोदी जी के बैनर लगाने से क्या आपकी बिक्री ज्यादा होती है?" मेरा ये दनदनाता हुआ सवाल सुनकर चाय वाला भैया सकपका गया। मैं भी यार खुलकर बोल रहा था। क्योंकि उसका चाय का खोखा सूना पड़ा था। वहाँ पर परिंदा भी पर नहीं मार रहा था। मेरे इस सवाल पर वो चौंका ज़रूर लेकिन इस बीच बात थम गयी। क्योंकि मेरी चाय बन गयी थी। मैंने भी चुपचाप चाय का गिलास पकड़ा और एक चुस्की ली। गला खांस कर मैंने फिर वही सवाल दोहरा दिया। उस चाय वाले ने इधर-उधर की बातें करके बात घुमा दी। मैं भी भाई राजनीति के दांव-पेंच जानता हूँ। मैं कहाँ चुप रहने वाला था। आ गया चाय वाला भाई मेरी बातों में और कह दिया सारा राज़ उस छुटभैये नेता और मोदी का। 
चाय वाला भैया बोला, "भाई साहब दिन में आराम से 500-1000 रूपये कमा लेता था लेकिन ये बैनर लगने के बाद 100 रुपए की बिक्री भी मुश्किल से होती है। इससे पहले मैं एक कम्पनी के बहार 12 साल खोखा लगाता था, इसके अलावा कम्पनी वाले भी एक दिन में 2200 रुपए तक की चाय मंगवा ही लेते थे, महीने की 10 तारीख तक उनका हिसाब हो जाता था। मेरा पूरा बचपन चाय बेचने में ही बीता है।" मैंने पूछा, "फिर वहाँ आप 12 साल से खोखा लगाते थे तो वहाँ से छोड़ कर यहाँ क्यूँ और कैसे आ गए?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब एक दिन कुछ लड़के आये और चाय पीकर गए. मैं 7 रुपए की एक चाय बेचता था। उन्होंने 7 रुपए के बदले 10 रुपए दिए। एक बार तो मैंने मना किया। लेकिन उन्होंने जबर्दस्ती मेरे हाथ में थमा दिए और कहा कि हम "फलां-फलां" नेता के आदमी हैं और मोदी जी के समर्थक हैं।"
मैंने भी गहरे रूप में ध्यानमग्न होकर पूछा कि, "भैया फिर क्या हुआ?" तो उस चाय वाले ने बताया कि, "भाई साहब ऐसे करके वो हर 2-4 दिन में चाय पीने के बहाने आने लगे और एक दिन कहा कि तुम हमारे साथ चलो वहाँ बिक्री भी ज्यादा होगी, किराया भी नहीं लेंगे, सेक्टर की मार्किट है, तुम्हारा खोखा खूब चलेगा और इस "फलां-फलां" नेता के पास लोग-बाग़ आते रहते हैं, सारी चाय तुमसे ही मंगवाया करेंगे।"
मुझे ओर भी बहुत कुछ जानने की इच्छा में समय का ही भान नहीं रहा। पीछे मुड़कर देखा तो मेरे साथी मेरे दैर होने की अवस्था में मेरे पीछे आकर खड़े हो गए थे। मैंने कहा, "मैं यहीं हूँ चिंता मत करो, आराम से बैठो।" उनके बताने पर मैंने अपना फोन देखा तो 8-10 मिस कॉल आयी हुई थी। साथी अपने फोन पर फोन कर रहे थे। जवाब नहीं मिलने पर ढूँढ़ते हुए चले आये। वैसे भी मोबाइल वाइब्रेशन पर था। दूसरा चाय वाले भैया की कहानी इतनी इंटरेस्टिंग थी कि कहाँ फोन का पता लगता। खैर मेरे कहने पर सभी लोग वापिस होकर दूर हट कर एकांत में खड़े हो गए।
मैं भी वापिस टॉपिक पर आ गया और पूछा, "हाँ भाई आगे क्या हुआ..."
चाय वाले भैया ने बताया कि उसने उन मोदी समर्थक लोगों पर विश्वास कर लिया और जगह देखने की इच्छा जाहिर की। नतीजन जहाँ अभी चाय वाला भैया बैठा है उसे वो जगह मोदी समर्थकों ने दिखा दी। जगह चाय वाले भैया को पसंद आ गयी। वहाँ से ज्यादा बिक्री होने पर भी विश्वास हो गया क्योंकि जगह गुड़गांव के एक पाश सेक्टर की मार्किट की थी। नतीजन इस सप्ताह के अंदर-अंदर चाय वाले ने अपना खोखा एक नामी कम्पनी के सामने से हटाकर उस नेता के घर के सामने लगा लिया। नेता का घर भी, मार्केट भी, नेता के पास आने वाले लोग भी सभी चाय पीने लगे।
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "ये तो अच्छी बात है, फिर क्या हुआ?"
चाय वाले ने बताया कि, "अच्छी बात क्या भाई साहब, पता नहीं कौन सी घडी थी जो मैं अपनी 12 साल पुरानी जगह छोड़ कर जो यहाँ आ गया।"
इतना कहते ही चाय वाला भाई रो पड़ा। मैंने उसको ढाढस बंधाया और कहा, "भाई बात बताओ कैसे? आखिर कैसे और किस रूप में आपके साथ बुरा हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब शुरू में 1 हफ्ता मैं निश्चिंत था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक सप्ताह बाद सामने वाले "नेता" ने अपने बैनर मेरे खोखे पर लगा दिए।"
मैंने पूछा फिर क्या हुआ?
चाय वाले भैया ने खखारकर थूक निगलते हुए जवाब दिया, "भाई साहब बैनर लगाने के बाद राह चलते ग्राहकों में कमी आ गयी। काफी लोग तो पास आकर, थोडा हंसकर दूर निकल जाते। उस समय मैंने समझा कुछ नहीं, नॉर्मल बात होगी। लेकिन मुझे तब सच्चाई का पता चला जब में पढ़ने वाले बच्चों से बात की। कुछ एक पढ़ने वाले बच्चे यहाँ पी०जी० में रहते हैं, 2-4 दिन से उन्होंने मेरे पास उनका आना शुरू हुआ था।
लेकिन ये बैनर लगाने के बाद उन्होंने आना बंद कर दिया। मैंने ये बात अपने दिमाग में रख ली। एक दिन वो बच्चे सामने से गुज़र रहे थे। तो मैंने उनसे पूछा कि बेटा अब चाय पीने क्यों नहीं आते तो उन्होंने कहा कि अंकल आप मोदी जी को चाय पिलाते हो उन्हें ही पिलाओ। हम नहीं पियेंगे। आपके यहाँ तो राजनीति होती है। हम क्यों शामिल हों आपकी राजनीति में? मैंने कहा मोदी के बैनर लगने से आपको क्या दिक्कत है? तो उन बच्चों ने कहा कि हम मोदी से नफरत करते हैं क्योंकि वो झूठे हैं। गुजरात में गरीबी की हद है, हम टूर पर गए थे तो देखा था। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मोदी टी०वी० पर सिर्फ झूठ का प्रचार करते हैं। हमें झूठे के बैनर तले बैठ कर चाय नहीं पीनी। थोडा आगे जाकर पी लेंगे। अपने रूम पर बनाकर पी लेंगे। लेकिन मोदी के बैनर नीचे बैठकर चाय नहीं पीयेंगे।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
तो चाय वाले भैया ने बताया कि उन्होंने बात आयी-गयी कर दी। कोई ज्यादा अफ़सोस नहीं जताया। लेकिन हद तो तब हो गयी जब भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये नेता ने अपनी गिरी हुई औकात दिखा दी। सुनिये चाय वाले भैया की ही जुबानी :-
 
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस 'फलां-फलां' नेता से उसका 4 रुपए प्रति चाय में सौदा तय हुआ। मेरे काफी प्राथना करने के बावजूद भी उसने इससे ज्यादा रुपए देने से मना कर दिया। परन्तु बहार भी ज्यादा बिक्री न होने के कारण मुझे बहार के रेट भी 7 रुपए से घटाकर 6 रुपए करने पड़े। यानि नेता जी 3 रुपए नुक्सान में और राह चलते लोगों को 1 रुपए नुक्सान में मुझे चाय पिलानी पड़ी। शुरू के 1 या सवा हफ्ते इस नेता ने चाय के नगद रुपए दिए। उसके बाद उधार करनी शुरू कर दी। मैंने कहा कि साहब 15-20 दिन में हिसाब हो जाये तो ठीक रहेगा। मुझे भी सामान लाना पड़ता है। इस पर उन्होंने कहा ठीक है कर देंगे। लेकिन महीना बीत गया। कोई हिसाब नहीं किया। आज-कल आज-कल करते करते दूसरा महीना भी बीत गया। मैंने पैसे मांगे तो नेता जी ने चुनाव के बाद हिसाब करने को बोला। मैं बहुत गिड़गिड़ाया लेकिन वो नहीं माना। इस दौरान नेता जी ने "चाय पर चर्चा" भी खूब की और इन महीनों में नेता जी ने खूब "मोदी टी स्टाल" लगवायी और "नमो चाय" मुफ्त में पिलाई। एक दिन में 5000-6000 रुपए की चाय मैं लोगों को पिलाने लगा। उसका रुपया नेता जी अपने खाते में चढ़वाते थे क्योंकि वो मोदी के नाम से "नमो चाय" जनता को मुफ्त पिलवाते थे।"
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस दौरान एक सरकारी विभाग वाले आकर मुझसे हफ्ता मांगने लगे। क्योंकि ये सरकारी जगह थी। ये जगह नेता जी की नहीं थी। इस पर मैंने नेता जी का नाम लिया तो उन्होंने कहा कि, "वो क्या करेगा? ये जगह उसके बाप की नहीं, सरकारी है।" नतीजन मैंने उनको 50 रुपया दिन का हफ्ता देना शुरू कर दिया।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया का गला भर आया। वो फूट-फूट कर रोने लगा। "भाई साहब मेरे साथ धोखा हुआ है। मैं तो लुट गया।" मैंने उसे गले लगाया और समझाया। इस पर उसे थोडा तसल्ली मिली। लेकिन 2 पल की तसल्ली फिर से गम में बदल गयी। अपने उबड़-खाबड़ हाथों से उसने अचानक अपना चेहरा ढंका और फिर उसका दुःख उसके गले और आँखों से फूट पड़ा। नाक बहने लगी। नाक भी निचे तलक लटक आयी। मैंने अपना रूमाल निकाला और चाय वाले भैया का नाक पोंछा।
मैंने कहा, "इत्मीनान से बैठो भाई। मैं आपके साथ हूँ।"
चहेरे पर उसके बदले की आग और गुस्से के भाव साफ़ झलक आये। चाय वाले भैया बोले :-
"चाय मेरी, चीनी मेरी, पत्ती मेरी, पतीला मेरा, अदरक मेरी, इलायची मेरी, दूध मेरा, छलनी मेरी, चम्मच मेरी, गिलास मेरा, कप मेरा, गैस मेरी, महनत मेरी, खून मेरा, पसीना मेरा। सब कुछ पी गया ये "फलां-फलां" नेता और जनता को भी पिलाया। क़र्ज़ चढ़ा मेरे सर पे और मुफ्त चाय पिला कर भला बन रहा है ये नेता। भाई साहब मेरा तो सब कुछ लूट लिया मोदी और मोदी के कुत्तों ने।" (नोट : "कुत्ता शब्द चाय वाले के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, जिसे आप तक पहुँचाना मेरा फ़र्ज़ है)
इस पर मैंने चाय वाले भैया से हिसाब-किताब पूछा। तो चाय वाले भाई ने अपनी पत्थर की बनी सीट पर पड़े एक मैले-कुचेले तकिये के निचे से एक फटी पुराणी कॉपी निकाल कर उसमें एक कपडे की कत्तर से बंधी हुई नेता के द्वारा लिखी गयी चाय की पर्चियां और कुल जोड़ा गया हिसाब मेरे सामने रख दिया।
बाप रे!
हिसाब देख कर तो मेरे पैरों तले की जमीन ही खिसक गयी। सवा 3 महीने का उधार 4 लाख 65 हज़ार 437 रुपया देख कर मेरे होंश उड़ गए।
बस मुझे तो मुद्दा चाहिए था और एक गरीब का भला करने का मौका। फर्क ये रहा कि मेरी आँख से आंसू निकले नहीं लेकिन कसर रही नहीं। लेकिन मेरी आँखों में भाजपा के उस छुटभैये नेता और मोदी के लिए गुस्से के लाल डोरे ज़रूर तैर रहे थे।
मैंने चाय वाले भैया की पीठ पर हाथ रखा और कहा आप चिंता मत करो मैं आपकी मदद करूँगा। ये मेरी जिम्मेवारी है।
इतना कह कर मैंने नेता जी के दरबार की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। इस दौरान चाय वाल भैया थोडा घबराया लेकिन मैंने उसको हाथ से इशारा करके तसल्ली रखने को कहा। मुझे देख कर दूर खड़े मेरे साथी भी मेरे पीछे-पीछे नेता जी के दरबार की तरफ चले आये।
सबसे पहले मेरा सामना नेता जी के यहाँ भाड़े के टट्टुओं से हुआ, नेता जी से मिलने की इच्छा जाहिर करने पर एक टट्टू बोला : कहाँ से आये हो, क्या नाम है, "भाई साहब" से क्यों मिलना है। इस पर मैंने बड़े इत्मीनान से कहा कि भाई जी मेरा नाम "सतपाल तंवर" है और मैं "भाई साहब" का ही एक चाहने वाला हूँ। इस पर वो बोले "भाई साहब" तो मीटिंग में हैं, समय लग जायेगा... वो भाड़े के छछूंदर इतना बोल ही रहे थे कि सामने की गैलरी में से अपने बाल संभालती हुई, दुप्पटा ठीक करती हुई और अपना लाल रंग का सूट निचे की तरफ खींच कर "सामने" से "फ्रंट" का उभरा हुआ बैलेंस सही करती हुई एक मोटी सी-काली सी औरत आती दिखाई पड़ी। थोडा बहार की तरफ नजदीक आयी तो देखा नेता जी के भाड़े के छछूंदर उसकी तरफ हल्का-हल्का मुस्कुराते हुए बढे। ओर थोडा नजदीक आयी। तो मुझे समझने में दैर नहीं लगी। ये तो वाही औरत थी जो कभी गुड़गांव के सरकारी हस्पताल और नगर निगम कार्यालय के आसपास, कभी झाड़सा रोड पर और कभी मोर चौक के आसपास सरेआम ग्राहकों को लुभाती देखी जा सकती है। काफी बार रोड पर से गुजरते हुए मैंने उसे देखा है। एक टैम्पू ड्राइवर ने बताया था कि ये गुड़गांव की सबसे पुराणी "सेक्स वर्कर" है। मेरी तरफ एक नज़र देख कर वो बहार पहले से ही खड़े रिक्शॉ में बैठ कर निकल गयी।
फिर नेता जी के टट्टुओं में से एक टट्टू की आवाज मेरे कानों में गूंजी। वो बोल रहा था कि "भाई साहब" फ्री हो गए हैं। मेरे हाथ में उस टट्टू ने एक पर्ची थमाते हुए कहा कि आप इस पर्ची पर अपना नाम लिख दो। मैं "भाई साहब" को देकर आता हूँ। मैंने वैसे ही किया जैसा उस टट्टू ने कहा। वो 5 मिनट बाद बाहर निकल कर आया। अबकी बार उसकी भाषा में कुछ अखड़पन नहीं बल्कि आदर झलक रहा था। वो बोला कि सर आपको भाई साहब अंदर बुला रहे हैं। हम भी उस टट्टू के बताये अनुसार नेता जी के घोंसले की तरफ चल पड़े। सोफे पर बैठे नेता जी बड़े ही विनम्र स्वभाव से हाथ जोड़कर गले लग गए। बदले में हमने भी थोडा सा प्यार दिखाया और बैठ गए सोफे पर। नेता जी ने चाय का ऑर्डर दिया। बहार से चाय बनकर आ गयी। इस दौरान चाय भी पी और नेता जी से पहली मुलाक़ात थी तो उन्होंने भी उस चाय की प्याली को "नमो चाय" कहकर ही सम्बोधित किया। हमने भी चुपचाप सुना। इधर-उधर की बातें होने के साथ-साथ चुनाव का ज़िक्र चल ही पड़ा। हम तो बनकर गए थे चाय वाले भैया की आवाज। नेता जी तो हमसे वोट और सपोर्ट ही मांगने लग गए। मुझे भी मुद्दे पर आना था। बस 4 रुपए के हिसाब से 7 लोगों के 28 रुपए सामने पड़ी मेज पर डाल दिए। ये देखकर नेता जी थोडा सकपकाया। मैंने कहा उठाओ "भाई साहब".
नेता जी चौंकते हुए बोले, "ये क्या है?"
तो मैंने भी नेता जी को मतलब समझा ही दिया। 4 रुपए के हिसाब से हम 7 लोगों के 28 रुपए हुए। उस गरीब चाय वाले भैया को अभी ये रुपए पहुंचाओ। नेता जी बोले नहीं तंवर साहब आप हमारे घर आये हैं। आप महमान हैं। हम आपको चाय पिलायेंगे और तंवर आपको कैसे पता कि हम एक चाय के 4 रुपए देते हैं। इस पर मैंने नेता जी को जवाब दिया कि "भाई साहब" मुझे तो बहुत कुछ पता है। ये पोल कहीं जनता में न खुल जाये। इसलिए सबसे पहले ये 28 रुपया उठाकर चाय वाले के पास पहुंचाओ। हम आपके पास किसी गरीब की बद्दुआ लेने नहीं आये। आगे की बात बाद में करेंगे। पहले ये 28 रुपया चाय वाले तक पहुंचाओ। 
नेता जी के चहेरा थोडा सफ़ेद पड़ गया और बहार से अपने एक भाड़े के छछूंदर को आवाज लगाकर 28 रुपया उस चाय वाले के पास उसने भिजवा दिया। मैं वहाँ बैठा मन ही मन सोच रहा था कि चाय वाले भैया का थोडा होंसला तो बढ़ेगा। इतनी देर में नेता जी बोले "क्या हुआ तंवर साहब, पहली बार आये और नाराज़गी में आये।"
बस फिर क्या था। जो मन में आया वो बका। नेता जी तो नेता जी ठहरे। विरोध कर नहीं सकते थे। वोटों का लालच जो था। अब इसी की आड़ में मैंने भी नेता जी का कोई बहाना नहीं सुना और चाय वाले भैया का हिसाब फाइनल करने की तारीख मांग ली। काफी कुर-कुर करने के बाद भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये कुकडूं नेता ने 9 दिन बाद हिसाब का दिन मुक्करर कर दिया। इसी के साथ हम भी उठ खड़े हुए और चेतावनी देकर निकल चले। इतना भी कह दिया कि चाय वाले भैया का ख्याल रखना इसे कुछ हुआ तो आप जिम्मेवार होंगे।

अब दोस्तों 9 दिन बाद का इंतज़ार है। यदि भाजपा के उस छुटभैये नेता ने तय समय के अनुसार चाय वाले भैया का रुपया नहीं दिया तो उसका नाम मीडिया में उजागर करके उसकी पोल खोलनी है। बस आप इंतज़ार करियेगा और पढ़ते रहिएगा हरियाणा की माटी के लाल अपने भाई सतपाल को।
 
लेखक "नवाब सतपाल तंवर" 

Thursday, August 15, 2013

एक 'देशद्रोही' ने कैसे मनाया स्‍वतंत्रता दिवस (Independence Day)


यह लेख आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लिखा गया था। लेकिन यह आज भी उतना ही सही है जितना तब था और शायद तब तक रहेगा जब तक हालात नहीं बदलते। 
नीरेंद्र नागर 
कितना अच्छा दिन है आज। हम अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति के साठ साल का जश्न मना रहे हैं। लाल किले से लेकर स्कूल-कॉलेजों में और मुहल्लों से लेकर अपार्टमेंटों तक में तिरंगा फहराया जा रहा हैबच्चों में मिठाइयां बांटी जा रही हैं। मेरे अपार्टमेंट में भी देशभक्ति से भरे गाने बज रहे हैं और मैंने उस शोर से बचने के लिए अपने फ्लैट के सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं। मैं नीचे झंडा फहराने के कार्यक्रम में भी नहीं जा रहा जहां अपार्टमेंट के सारे लोग प्रेज़िडेंट साहब और लोकल नेताजी का भाषण सुनने के लिए जमा हो रहे हैं। मैं इस छुट्टी का आनंद लेते हुए घर में बैठा बेटी के साथ टॉम ऐंड जेरी देख रहा हूं। 
आप मुझे देशद्रोही कह सकते हैं। कह सकते हैं कि मुझे देश से प्यार नहीं है। मुझपर जूते-चप्पल फेंक सकते हैं। कोई ज़्यादा ही देशभक्त मुझपर पाकिस्तानी होने का आरोप भी लगा सकता है। 
मैं मानता हूं कि मेरा यह काम शर्मनाक हैलेकिन मैं क्या करूं..?? मैं जानता हूं कि जब मैं नीचे जाऊंगा और लोगों को बड़ी-बड़ी देशभक्तिपूर्ण बातें बोलते हुए देखूंगा तो मुझसे रहा नहीं जाएगा। वहां हमारे लोकल एमएलए होंगे जिनके भ्रष्टाचार के किस्से उनकी विशाल कोठी और बाहर लगीं चार-पांच कारें खोलती हैंवह हमारे बच्चों को गांधीजी के त्याग और बलिदान की बात बताएंगे। वहां हमारे सेक्रेटरी साहब होंगे जिन्होंने मकान बनते समय लाखों का घपला किया और आज तक जबरदस्ती सेक्रेटरी बने हुए हैंवह देश के लिए कुर्बानी देनेवाले शहीदों की याद में आंसू बहाएंगे। वहां अपार्टमेंट के वे तमाम सदस्य होंगे जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एक्स्ट्रा कमरे बनवा लिए हैंऔर कॉमन जगह दखल कर ली हैऐसे भी कई होंगे जिन्होंने बिजली के मीटर रुकवा दिए हैं। ये सारे लोग वहां तालियां बजाएंगे कि आज हम आज़ाद हैं। 

क्या करूं अगर मुझे ऐसे लोगों को देशभक्ति की बात करते देख गुस्सा आ जाता है। इसलिए मैंने फैसला कर लिया है कि मैं वहां जाऊं ही नहीं। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं उनसे बच नहीं पाऊंगा। ये सारे लोग आज आज़ादी का जश्न मनाने के बाद कल शहर की सड़कों पर निकलेंगे और हर गलीहर चौराहेहर दफ्तरहर रेस्तरां में होंगे। मैं उनसे बचकर कहां जाऊंगा..?? 

कल 16 अगस्त को जब मैं ऑफिस के लिए निकलूंगा और देखूंगा कि टंकी में तेल नहीं है तो मेरी पहली चिंता यही होगी कि तेल कहां से भराऊंक्योंकि ज़्यादातर पेट्रोल पंपों में मिलावटी तेल मिलता है (पेट्रोल पंप का वह मालिक भी आज आज़ादी का जश्न मना रहा होगाअगर वह खुद नेता होगा तो शायद भाषण भी दे रहा होगा)। खैरअपने एक विश्वसनीय पेट्रोल पंप तक मेरी गाड़ी चल ही जाएगीइस भरोसे के साथ मैं आगे बढ़ूंगा और चौराहे की लाल बत्ती पर रुकूंगा। रुकते ही सुनूंगा मेरे पीछे वाली गाड़ी का हॉर्न, जिसका ड्राइवर इसलिए मुझपर बिगड़ रहा होगा कि मैं लाल बत्ती पर क्यों रुक रहा हूं। मेरे आसपास की सारी गाड़ियांरिक्शेबस सब लाल बत्ती को अनदेखा करते हुए आगे बढ़ जाएंगेक्योंकि चौराहे पर कोई पुलिसवाला नहीं है। मैं एक देशद्रोही नागरिक जो आज आज़ादी के समारोह में नहीं जा रहाकल उस चौराहे पर भी अकेला पड़ जाऊंगाजबकि सारे देशभक्त अपनी मंज़िल की ओर बढ़ जाएंगे। 

अगले चौराहे पर पुलिसवाला मौजूद होगाइसलिए कुछ गाड़ियां लाल बत्ती पर रुकेंगी। लेकिन बसवाला नहीं। उसे पुलिसवाले का डर नहींक्योंकि या तो वह खुद उसी पुलिसवाले को हफ्ता देता हैया फिर बस का मालिक खुद पुलिसवाला हैया कोई नेता है। नेताओंपुलिसवालों और पैसेवालों के लिए इस आज़ाद देश में कानून न मानने की आज़ादी है। मैं देखूंगा कि मेरे बराबर में ही एक देशभक्त पुलिसवाला बिना हेल्मेट लगाए बाइक पर सवार हैलेकिन मैं उसे टोकने का खतरा नहीं मोल ले सकताक्योंकि वह किसी भी बहाने मुझे रोक सकता हैमेरी पिटाई कर सकता हैमुझे गिरफ्तार कर सकता है। आप मुझे बचाने के लिए भी नहीं आएंगे क्योंकि मैं ठहरा देशद्रोही जो आज आज़ादी का जश्न मनाने के बजाय कार्टून चैनल देख रहा है। 

आगे चलते हुए मैं उन इलाकों से गुज़रूंगा जहां लोगों ने सड़कों पर घर बना दिए हैंलेकिन उन घरों को तोड़ने की हिम्मत किसी को नहीं हैक्योंकि वे वोट देते हैं। वोट बेचकर वे सड़क को घेर लेने की आज़ादी खरीदते हैंऔर वोट खरीदकर ये एमएलए-एमपी विधानसभा और संसद में पहुंचते हैं जहां एक तरफ उन्हें कानून बनाने का कानूनी अधिकार मिल जाता हैदूसरी तरफ कानून तोड़ने का गैरकानूनी अधिकार भी। कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता। इसलिए वे अपने वोटरों से कहते हैंरूल्स आर फॉर फूल्स। मैं भी कानून तोड़ता हूंतुम भी तोड़ो। मस्त रहोबस मुझे वोट देते रहोमैं तुम्हें बचाता रहूंगा। 

इसको कहते हैं लोकतंत्र। लोग अपने वोट की ताकत से नाजायज़ अधिकार खरीदते हैंअपनी आज़ादी खरीदते हैं - कानून तोड़ने की आज़ादी। यह तो मेरे जैसा देशद्रोही ही है जो लोकतंत्र का महत्व नहीं समझ रहाजिसने अपने फ्लैट में एक इंच भी इधर-उधर नहीं कियाऔर उसी तंग दायरे में सिमटा रहाजबकि देशभक्तों ने कमरेमंजिलें सब बना दीं सिर्फ इस लोकतंत्र के बल पर। आज उसी लोकतांत्रिक देश की आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लोक और सत्ता के इस गठजोड़ को और मज़बूती देने के लिए जगह-जगह ऐसे ही कानूनतोड़क लोग अपने कानूनतोड़क नेता को बुला रहे है। 

जनता के ये सेवक आज अपने-अपने इलाकों में तिरंगा फहराएंगे। एक एमएलए-एमपी और बीसियों जगह से आमंत्रण। लेकिन देशसेवा का व्रत लिया है तो जाना ही होगा। आखिरकार जब भाषण देते-देते थक जाएंगे तो रात को किसी बड़े व्यापारी-इंडस्ट्रियलिस्ट के सौजन्य से सुरा-सुंदरी का सहारा लेकर अपनी थकान मिटाएंगे। यह तो मेरे जैसे देशद्रोही ही होंगे जो अपने फ्लैट में दुबके बैठे है और जो रात को दाल-रोटी-सब्जी खाकर सो जाएंगे। 

नीचे देशभक्ति के गाने बंद हो गए हैंभाषण शुरू हो चुके हैं। जय हिंद के नारे लग रहे हैं। मेरा मन भी करता है कि यहीं से सहीमैं भी इस नारे में साथ दूं। दरवाज़ा खोलकर बालकनी में जाता हूं। नीचे खड़े लोगों के चेहरे देखता हूं। चौंक जाता हूंअरेयह मैं क्या सुन रहा हूंऊपर से हर कोई जय हिंद बोल रहा हैलेकिन मुझे उनके दिल से निकलती यही आवाज़ सुनाई दे रही है - मेरी मर्ज़ी। मैं लाइन तोड़ आगे बढ़ जाऊंमेरी मर्जी। मैं रिश्वत दे जमीन हथियाऊंमेरी मर्ज़ी। मैं हर कानून को लात दिखाऊंमेरी मर्ज़ी... 

मैं बालकनी का दरवाज़ा बंद कर वापस कमरे में आ गया हूं। ड्रॉइंग रूम में बेटी ने टीवी के ऊपर प्लास्टिक का छोटा-सा झंडा लगा रखा है। मैं उसके सामने खड़ा हो जाता हूं। झंडे को चूमता हूंऔर बोलने की कोशिश करता हूं - जय हिंद। लेकिन आवाज़ भर्रा जाती है। खुद को बहुत ही अकेला पाता हूं। सोचता हूंक्या और भी लोग होंगे मेरी तरह जो आज अकेले में आज़ादी का यह त्यौहार मना रहे होंगे। वे लोग जो इस भीड़ का हिस्सा बनने से खुद को बचाये रख पाए होंगे..?? वे लोग जो अपने फायदे के लिए इस देश के कानून को रौंदने में विश्वास नहीं करते..?? वे लोग जो रिश्वत या ताकत के बल पर दूसरों का हक नहीं छीनते..??

Monday, September 03, 2012

सात साल की सुप्रिया को महज 25 रूपये में बेच डाला एक मां ने…


संसद में लाखों करोड़ के कोयला घोटाले का शोर है. ट्विटर पर करीब 50 लाख करोड़ के थोरियम की चोरी के चर्चे हैं. और पश्चिम बंगाल में एक मां ने अपनी तीन बेटियों को मात्र 155 रुपये में बेच दिया. ये भारत का सच है. वो सच जिससे लाख चाहकर भी हम नज़र नहीं फेर सकते.
30 साल की पूर्णिमा हल्दर का पति शराबी है. शराबी पति ने 15 दिन पहले पूर्णिमा और तीन बेटियों को घर से निकाल दिया था, जिसके बाद से वो दर दर भटक रही थी. कई दिन की भूख जब तड़प बन गई तो इस मां की ममता मर गई और उसने बेटियां बेचकर भूख शांत की. बेटियां बेचने की बात पूर्णिमा ने कोलकाता के डायमंड हार्बर रेलवे स्टेशन पर खोमचे वालों को बताईं. खोमचे वालों ने यह जानकारी पुलिस को दी. फिलहाल पुलिस ने तीनों लड़कियों को बरामद और पूर्णिमा के पति को गिरफ्तार कर लिया है.

जिस देश में कोयला लाखों करोड़ का बिक रहा हो, वहां बेटियों की कीमत कितनी सस्ती है इसका अंदाजा आपको पूर्णिमा की बेटियों की कीमत सुनकर लग जायेगा. इस भूखी मां ने साढ़े तीन साल की अपनी छोटी बेटी रमा को 33 रूपये में, सात साल की सुप्रिया को महज 25 रूपये में सबसे बड़ी बेटी 9 साल की प्रिया को 100 रूपये में बेच दिया. यानि 3 बेटियों के बदले पूर्णिमा को 155 रूपये मिले.
हालांकि सरकारी महकमा ने महिला के तंगहाली के दावे को खारिज किया है. दक्षिणी 24 परगना के ज़िलाधिकारी ने कहा कि ‘हम यह जांचने की कोशिश कर रहे हैं कि इस घटना के लिए कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं.’ बहरहाल, कोलकाता की ये घटना कोई नहीं है. इससे पूर्व भी इस तरह के कई घटना इस देश में घटित हो चुके हैं.
आज से ठीक एक महीना पूर्व झारखंड के मनोहरपुर में गरीबी से तंग आकर एक मां द्वारा अपने जुड़वा बच्चों को बेचने का मामाला प्रकाश में आया था. अगस्त महीने में ही राजस्थान के श्रीगंगानगर में आठ दिन के एक मासूम बच्चे को उसके मां-बाप ने इसलिए बेच दिया क्योंकि उनके पास अपने दूसरे बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं थे. जुलाई के महीने में बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज में सुशासन और विकास के दावे करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज में गरीबी से मजबूर एक मां ने अपने दूधमुंहे बच्चे को महज़ 62 रुपये में बेच दिया था. वहीं पिछले महीने बेंगलुरू में एक मां अपने अजन्में बच्चे को बेचने के लिए मजबूर थी. मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक शोभा नामक महिला बच्चे के लिए खरीददार खोज रही थी. क्योंकि शोभा के पास अपने बच्चे के पालन पोषण के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए वह ऐसे खरीददार की तलाश कर रही थी, जो उसके अजन्में बच्चे को सही पालन-पोषण दे सके.
ऐसे न जाने कितने मामले हर महीने मीडिया के माध्यम से प्रकाश में आते हैं. और न जाने उससे कई गुना अधिक दब जाते हैं, जिन पर मीडिया या किसी की भी नज़र नहीं पड़ती.
आज़ादी के 65 वर्ष पूरे होने के बाद भी देश में एक लाख से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है. आज भी लगभग 30 प्रतिशत भारतीय निर्धनता की रेखा तले जीते हैं. लाखों को दो जून की रोटी भी नहीं मिल पा रही है. करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं. आज भी स्कूल, चिकित्सा, मकान और अन्य बुनियादी सुविधाओं से करोड़ों लोग वंचित हैं.
आखि़र यह कैसी विडंबना है. लोकतंत्र का आधार मानव जीवन का मूल्य और व्यक्तियों के बीच समानता को माना जाता है, किन्तु हमारा सामाजिक जीवन और चिंतन आज भी सामंतवादी हैं. आज भी मनुष्य के जीवन की अलग-अलग कीमतें लगती हैं. कहीं एक बच्चे का प्रतिदिन का खर्च 500 रूपये है तो कहीं मात्र 25 रूपये में गरीब माएं अपने बच्चे को बेच डालती हैं.
यह जीवन के अलग रंग हो सकते हैं लेकिन सबसे बुनियादी सवाल यही है कि जब संसद में पौने दो लाख करोड़ रुपये के घोटाले की गूंज होती है. ट्विटर पर 50 लाख करोड़ के थोरियम घोटाले का शोर होता है तब देश का भविष्य चंद सिक्कों में बिक जाता है? आखिर ऐसा क्यों हैं? क्यों भारत में जीवन इतना सस्ता और घोटाले इतने महंगे हैं? सबसे बड़ा सवाल यह  है कि भूख और गरीबी की भट्टी में तप रहे लोगों के हिस्से का कोयला कहां हैं? आपके पास कोई जवाब हो तो जरूर दीजियेगा… मुझे तो यह संसद के शोर में दिख रहा है.

Friday, August 24, 2012

बाबा! यह सब क्या हो रहा है?



फर्जी दस्तावेजों के सहारे पासपोर्ट हासिल करने के मामले में फंसे बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण पर अब प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लांड्रिंग का मामला दर्ज किया है. जल्द ही उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. आरोप है कि बालकृष्ण ने फर्जी पासपोर्ट के सहारे विदेशों में जाकर वहां कई ट्रस्ट बनाएं और करोड़ों रुपये जमा किए हैं.

गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई में सीबीआइ ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे पासपोर्ट बनवाने के मामले में बालकृष्ण के खिलाफ एफआइआर दर्ज की थी. वह काफी दिनों तक जेल में बंद रहे. गत 17 अगस्त को उन्हें जमानत मिली थी. लेकिन अब ईडी को जानकारी मिली है कि विदेशों में रामदेव व बालकृष्ण के कई ट्रस्ट हैं और इसमें करोड़ों रुपये जमा है.
पासपोर्ट एक्ट का उल्लंघन मनी लांड्रिंग के तहत अपराधों की सूची में शामिल है. चूंकि बालकृष्ण का पासपोर्ट अवैध है, इसलिए कानून के तहत उनके ट्रस्ट में जमा पैसे भी अवैध है. इसी आधार पर ईडी ने मनी लांड्रिंग रोकने के कानून पी.एन.एल.ए. एक्ट के अंतर्गत उन पर मुकदमा दर्ज किया है. इसके तहत विदेशों में जमा किए गए पैसे को जब्त किया जा सकता है. आरोप साबित होने पर बालकृष्ण को सात साल जेल की सजा भी हो सकती है. ऐसे में ये विषय काफी चिंतनीय व सोचनीय है कि बाबा किसके लिए काम कर रहे हैं? वो चाहते क्या हैं? लेकिन इतना ज़रूर है कि जो व्यक्ति खुद ही भ्रष्ट हो, कर चोरी कर रहा हो और विदेशों में काला धन बना रहा हो, वो देश में भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ आन्दोलन चलाए, यह उसे शोभा नहीं देता…
हमें नहीं पता कि बाबा किस के लिए काम कर रहे हैं? उन्होंने स्वयं यह बेड़ा अपने अंतरआत्मा की आवाज़ पर उठाई है या फिर उनके पीछे कोई और है, जो उनको यह साहस प्रदान कर रहा है कि काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते रहें, ताकि बाबा और उनके साथी पर भी कोई हाथ ना डाले और वह भी अपने उद्देश्य में सफल हो जाएं.
यानी यह कि कांग्रेस हटाओ देश बचाओ और महंगाई के खिलाफ़ जनता को खड़ा करने के बाद “हम भी” सफल और “तुम भी”… या वास्तव में बाबा की अंतरआत्मा उन्हें परेशान कर रही है और वो यह देखकर दुख व अफसोस से बदहाल हैं कि हमारे देश-वासी और नेता किस निचले स्तर तक पहुंच गए हैं. और अब जरूरी हो गया है कि बुराई के खिलाफ़ आवाज़ उठाई जाए. यदि वास्तव में ऐसा है तो बाबा आपको अपने बारे में और अपने साथी के बारे में सोचने का अवसर क्यों नहीं मिल रहा? और अगर यह सच है कि बाबा देश की उन्नति व सफलता के लिए ही ऐसा सब कुछ कर रहे हैं तो बाबा को तो उस भ्रष्टाचार से पाक होना चाहिए, जिसके खिलाफ उन्होंने आवाज़ उठाई है.
उठो बाबा उठो! अगर कर की चोरी में आप या आपके ट्रस्ट और आयुर्वेदिक दवाएं बनाने वाली आपकी कंपनियां आती हैं तो पहले उसका भुगतान करो. साथ ही बालकृष्ण और इन जैसे तमाम लोगों के खिलाफ आवाज़ उठाओ, तब ही देश और देश-वासियों को आप पर विश्वास होगा और देश आपका और आपके मिशन का पूरा साथ देगा.

Saturday, August 11, 2012

यमुना एक्सप्रेसवे : गांवों के जबरदस्‍ती शहरीकरण की त्रासदी



आगरा से दिल्ली को जोड़नेवाली सड़क यमुना एक्सप्रेसवे को आम उपयोग के लिए खोल दिया गया है। छह लेन की इस 165 किलोमीटर सड़क के कारण आगरा से दिल्ली का सफर मात्र तीन घंटे में पूरा किया जा सकता है। लेकिन यह एक सड़क मात्र नहीं है। इसके साथ पांच-पांच सौ हेक्टेयर की पांच टाउनशिप भी विकसित की जा रही है। इसे दिल्ली-एनसीआर के विस्तार के एक नये अध्याय के बतौर देखा जा रहा है। इसके साथ ही पिछले साल इस परियोजना क्षेत्र में विस्थापित भट्टा पारसौल के ग्रामीणों के पक्ष में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के उत्सवी सत्याग्रह का भी पटाक्षेप हो जाएगा, जबकि गांवों के बलात शहरीकरण से जुड़े सवाल लंबे समय तक विकास की मौजूदा अवधारणा को मुंह चिढ़ाएंगे।

यह प्रसंग महज ग्रेटर नोएडा से आगरा तक सीमित नहीं बल्कि झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा जैसे राज्यों में हाल के दिनों में भूमि-अधिग्रहण को लेकर सरकार, रैयतों और कारपोरेट घरानों के बीच तीखे संघर्षों तथा विभिन्न हित-समूहों की भूमिका से भी जुड़ा है। झारखंड की राजधानी रांची के समीप पिठोरिया रोड पर नगड़ी गांव की लगभग 200 एकड़ जमीन तीन प्रतिष्‍ठित शिक्षण संस्थानों को देने को लेकर जारी तीखा विवाद भी एक देशव्यापी चिंता का एक अहम हिस्सा है।

यमुना एक्सप्रेसवे और नोएडा एक्सटेंशन को लेकर जारी विवाद हो या फिर सिंगूर-नंदीग्राम-झाड़ग्राम या फिर नगड़ी, इन मामलों ने अंग्रेजों द्वारा वर्ष 1894 में बनाये गये भूमि-अधिग्रहण कानून की असलियत सामने ला दी है, जिसमें राज्य सरकार को किसी भी रैयत को उसकी भूमि से किसी भी क्षण बेदखल कर देने की निर्बाध ताकत प्राप्त है। अंग्रेजों के जमाने में बने औपनिवेशिक कानूनों को अब तक बनाये रखने का नतीजा खुद सरकार को ही नहीं, पूरे समाज और खासकर रैयतों को भुगतना पड़ रहा है।
भूमि-अधिग्रहण कानून की धारा चार के अनुसार अगर सरकार को किसी सार्वजनिक हित या किसी कंपनी के लिए जरूरत हो तो किसी भी जमीन का अधिग्रहण करने की सूचना जारी कर सकती है। ऐसी सूचना जारी होने के साथ ही तत्काल सरकारी अधिकारियों को उस जमीन में घुसकर कुछ भी करने का अधिकार मिल जाएगा। वे चाहें तो जमीन का सर्वेक्षण करें, या कोई खुदाई करें, यहां तक कि चहारदीवारी खड़ी कर लें या फिर खड़ी फसलों को काट डालें। अगर उस जमीन पर कोई घर हो तो सरकार महज एक सप्ताह का नोटिस देकर उस घर के अंदर भी घुस सकती है।

कानून की धारा पांच के मुताबिक अगर रैयत को कोई आपत्ति हो तो जिला मजिस्ट्रेट उसकी आपत्तियां सुनकर रिपोर्ट देगा। रैयत के पुनर्वास और मुआवजे के संबंध में कोई स्पष्‍ट प्रावधान नहीं होने के कारण रैयतों को आसानी से बेदखल करना संभव हो जाता है। झारखंड में नगड़ी के उदाहरण से समझा जा सकता है कि 1957 में महज सात रुपये डिसमिल पर जमीन छोड़ने को रैयत तैयार नहीं हुए, तो यह राशि कोषागार में जमा करके जमीन को अधिगृहीत मान लिया गया।

कानून की धारा 17 के दुरुपयोग ने इस समस्या को कुछ ज्यादा ही जटिल बना दिया है। इसके अनुसार किसी आपातकालीन स्थिति में रैयतों की आपत्ति मांगे बगैर ही किसी जमीन का अधिग्रहण कर लिया जाएगा। यह धारा किसी बाढ़ या आफत की स्थिति के लिए बनायी गयी थी। लेकिन उत्तरप्रदेश के उदाहरणों में देखा जा सकता है कि आवासीय कालोनियां बनाने और कारखाने लगाने के लिए इस धारा का कितना बेजा इस्तेमाल हुआ।

इस परिघटना को सभ्यताओं के टकराव के बतौर भी देखा जा सकता है, जहां शहरी परिवेश के लोगों की नजर में ग्रामीण परिवेश को अविकसित माना जाता है और जहां प्राकृतिक जंगलों के बजाय कंक्रीट के जंगल को विकास का पर्याय मान लिया जाता है। ग्रेटर नोएडा हो या गुड़गांव, हर जगह शहरीकरण के नाम पर हुए तथाकथित विकास में एक चीज सिरे से गायब है और वह है स्थानीय लोगों की सहभागिता। दिल्ली एनसीआर के फैलाव की महत्वाकांक्षी योजनाओं का महत्व समझा जा सकता है, लेकिन इसमें स्थानीय लोगों को पूरी तरह दरकिनार करके किसी जेपी ग्रुप जैसे कारपोरेट को विकास का पूरा जिम्मा देने से एक अपंग समाज का ही निर्माण होगा। वही हो भी रहा है। दिल्ली से आप बहादुरगढ़ की ओर जाएं या फिर गाजियाबाद की ओर, हर जगह आपको ग्रामीण परिवेश के सामने मौजूद अस्तित्व का संकट साफ दिख जाएगा। गगनचुंबी भवनों के बीच कहीं दबी-सहमी ग्रामीण बस्तियों और खेत-खलिहानों से जुड़े लोग सहसा विकास पर पैबंद जैसे दिखने लगेंगे। ऐसे लोगों का अपनी ही जमीन पर अचानक मिसफिट हो जाना इस तथाकथित विकास की सबसे बड़ी त्रासदी है।

दिल्ली की महायोजना ने समीपवर्ती राज्यों से सटे इलाकों को कृषि क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र हरित क्षेत्र सहित अन्य श्रेणियों में विभक्त कर रखा है। हुडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद इत्यादि प्राधिकारों ने भी अपने मास्टर प्लान बनाकर शहरीकरण की प्रक्रिया चला रखी है। ऐसे मास्टर प्लानों में इतनी कड़ाई के नियम रखे जाते हैं, जो किसी भी तरह के अनियंत्रित व अनियोजित निर्माण की इजाजत नहीं देते। लेकिन विडंबना है कि ऐसे ही प्रावधानों के कारण बेतरतीब विकास की गुंजाइश ज्यादा निकलती है। कारण यह कि अपने मास्टर प्लान के मुताबिक आवासीय घर या भूखंड आवंटित करने की प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी व महंगी है कि गरीब लोगों की बात तो दूर, मध्यवर्गीय लोगों के लिए भी अपनी छत एक सपना ही रह जाती है।

इसके कारण ऐसे लोगों को कानून के छिद्रों का सहारा लेकर या फिर गैरकानूनी तरीके से बेतरतीब निर्माण के लिए विवश होना पड़ता है। कानून के छिद्रों का सहारा लेने का उदाहरण दिल्ली में लाल डोरा की जमीनों में या फिर नोएडा में आबादी प्लाटों में होने वाले चालाकीपूर्ण उपयोग व निर्माण के बतौर देखा जा सकता है। यही बात कृषि जमीनों में तथाकथित फार्म हाउस के नाम पर चल रहे धंधे या फिर कारखानों के नाम पर इंडस्ट्रियल क्षेत्रों में आवंटित जमीनों के मनमाने उपयोग में निहित है।

दिलचस्प यह कि दिल्ली-एनसीआर व उसके विस्तारित क्षेत्रों में जमीन की बढ़ती कीमतों का फायदा भूस्वामियों के बजाय जमीन दलालों और बिल्डरों, कारपोरेट घरानों को ज्यादा मिल रहा है। जबकि गांव से अचानक शहर में बदलते इलाको में जमीन बेचकर या जमीन से विस्थापित होकर कम या ज्यादा रकम पाने वाले लोगों के पास जीवन-यापन या रोजगार का कोई दीर्घजीवी व मुकम्मल रास्ता नहीं होने के कारण उनकी वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए अस्तित्व का संकट तत्काल सामने नजर आता है। जमीन बिकने या मुआवजे से मिले रुपयों से चमचमाती स्कार्पियो में दौड़ने की होड़ में उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि उनके नीचे की जमीन किस तेजी से खिसक रही है। किसी सरकार ने किसी महायोजना में इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत नहीं समझी कि गांव से नगर में विकास की प्रक्रिया में आदमी की सदियों से चली आ रही जीवन-पद्धतियों और जीविकोपार्जन के तरीकों का भी ध्यान रखना जरूरी है।

यह प्रक्रिया न तो गुड़गांव को गांव रहने देती है और न ही नगड़ी को सचमुच किसी नगरी में बदलने देती है। गांव-नगर का यह द्वंद्व कहीं सभ्यताओं के संघर्ष में तो कहीं वर्गीय हितों के टकराव में नजर आता है। ऐसे में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब भट्टा पारसौल के लिए उत्सवी सत्याग्रह करते हैं, तो यह प्रहसन के सिवाय कुछ नहीं दिखता। ऐसे मामलों का राजनीतिकरण करने या किसी दल या सरकार को निशाना बनाने से कुछ नहीं होने वाला। मूल समस्या अंग्रेजों के बनाये औपनिवेशिक कानूनों और विकास की शहर-केंद्रित अवधारणा में निहित है। इन पर दूरगामी फैसलों से ही कोई हल निकलेगा, बशर्ते उसके केंद्र में आदमी की चिंता पहले हो।

(विष्‍णु राजगढ़िया। वरिष्‍ठ पत्रकार। सूचना के अधिकार को लेकर पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय। रांची में रहते हैं। उनसे vranchi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Sunday, July 29, 2012

दिल्ली हाई कोर्ट के हुक्म से टीम अन्ना के CIA से कनेक्शन की जांच



दिल्ली हाई कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के वकील मनोहर लाल शर्मा ने एक रिट पेटीशन डाली जिसे नमबर मिला डब्ल्यू पी (सी) ३४१२/२०१२ संविधान के अनुच्छेद २२६ के आधार पर यह पेटीशन दाखिल की गयी है इस पेटीशन में वादी ने बहुत सारे आरोप लगाए हैं जिनमें कुछ तो सहसा अविश्वसनीय लगते हैं  इसी पेटीशन में आरोप है कि टीम अन्ना के कुछ सदस्य सी आई ए से सम्बंधित हैं इस केस में केंद्र सरकार को भी पार्टी बनाया गया है माननीय हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार तीन महीने के अंदर  सभी आरोपों की जांच पूरी कर ले उसके बाद ही मनोहर लाल शर्मा के आरोपों पर माननीय हाई कोर्ट विचार करेगा  यह जांच का आदेश ३० मई २०१२ को दिया  गया था यानी ३० अगस्त २०१२ तक जांच के नतीजे हाई कोर्ट में दाखिल किये जाने हैं  देखिये क्या होता है
 दिल्ली हाई कोर्ट ने ३० मई २०१२ के  दिन एक फैसला सुनाया था जिसमें आदेश दिया गया था कि केंद्र सरकार वादी मनोहर लाल शर्मा की  याचिका में पेश किये गए आरोपों की जांच करे इस केस में केंद्र सरकार को प्रतिवादी नंबर  एक पर रखा गया है केंद्र सरकार के अलावा जो अन्य लोग प्रतिवादी थे  उनके नाम हैं  फोर्ड  फाउंडेशन अन्ना हजारे मनीष सिसोदिया अरविंद केजरीवाल प्रशांत भूषण  शान्ति भूषण और किरण बेदी  माननीय हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पेटीशन में जो भी प्रार्थना की गयी है उसकी जांच प्रतिवादी नंबर  एक  अधिक से अधिक तीन महीने में पूरी करके इस अदालत के सामने हाज़िर हों उसके बाद कोई फैसला लिया जाएगा इस केस में प्रतिवादी नंबर एक पर केंद्र सरकार का नाम दर्ज है  सरकार को जांच करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था
संविधान के अनुच्छेद २२६ के तहत सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट मनोहर लाल शर्मा ने पी आई एल दाखिल किया था जिसमें भारत सरकार के अलावा टीम अन्ना के कुछ सदस्यों को पार्टी बनाया थापेटीशन में आरोप लगाया गया है कि फोर्ड फाउंडेशन एक अमरीकन ट्रस्ट है  जो दुनिया भर में सरकार विरोधी आन्दोलनों को समर्थन देता है फंड देता है और उनके मारफत उन देशों पर अपना एजेंडा लागू करता है फोर्ड फाउंडेशन ने रूस इजरायल अफ्रीका आदि देशों में सिविल सोसाइटी नाम के ग्रुप बना रखे हैं  इन के ज़रिये वे बुद्धिजीवियों पत्रकारों कलाकारों उद्योगपतियों और नेताओं को अपनी तरफ खींचते हैं तरह तरह के आकर्षक नारे देकर लोगों को आकर्षित करते हैं और सरकार के खिलाफ आन्दोलन करवाते हैं पेटीशन में आरोप लगाया गया है कि फोर्ड फाउंडेशन  अमरीकी खुफिया एजेंसी सी आई ए का फ्रंट भी है पेटीशन में लिखा है कि टीम अन्ना के लोग संयुक्त रूप से फोर्ड फाउंडेशन से धन लेते रहे हैंआरोप है कि  फोर्ड फाउंडेशन  के रीजनल डाइरेक्टर ने कुबूल किया है कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल की कबीर नाम की एन जी ओ को फंड दिया था फोर्ड फाउंडेशन के वेबसाईट से भी पता चलता है कि २०११ में ही फोर्ड फाउंडेशन ने कबीर को दो लाख अमरीकी डालर दिया था साथ में सबूत भी पेटीशन के साथ नत्थी है और भी बहुत सारे आरोप हैं जिनपर सहसा विशवास नहीं होता क्योंकि हमारा मानना है कि  देश प्रेम से लबरेज़ टीम अन्ना वाले  और कुछ भी करें  वे सी आई ए से तो पैसा नहीं ले सकते  लेकिन जबा हाई कोर्ट ने आदेश दे दिया है तो सारी बातें जांच के बाद साफ़ हो जायेगीं उम्मीद की जानी चाहिए कि जाँच में ऐसा कुछ न मिले जिस से टीम अन्ना को कोई नुकसान हो.

Friday, December 30, 2011

कारपोरेट घरानों की जीत या जनता की हार



 इस वर्ष 2011 के शुरू मे धड़ाधड़ भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा CAG के प्रयासों के फल स्वरूप  हुआ था।एक एक कर राजनेता जेल भेजे गए। तह मे जाने पर जैसे ही लाभार्थियों मे रत्न टाटाअनिल अंबानीनीरा राडिया जैसे उद्योगपतियों और दलालों के नाम सामने आए और उनके विरुद्ध कारवाई की संभावना बनते दिखी वैसे ही कारपोरेट घरानों ने अपने अमेरिकी संपर्कों के सहयोग से पहले रामदेव फिर अन्ना को आगे करके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू करा दिया। जम कर राजनेताओं और संसदीय संस्थाओं को कोसा गया। ऐसा वातावरण सृजित किया गया जैसे सभी भ्रष्टाचार की जड़ यह संसदीय लोकतन्त्र और राजनेता ही हैं। खाता-पीता सम्पन्न वर्ग जो एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर आराम फरमाता है और वोट डालने भी नहीं जाता है नेताओं के पीछे हाथ धोकर पड़ गया। कारपोरेट मीडिया ने इसी आराम तलब वर्ग के जमावड़े को जन-आंदोलन की संज्ञा दी। परंतु मैंने इसे देश मे तानाशाही लाने का उपक्रम बताया था।
उस समय अमेरिकी प्रशासन ने खुल कर अन्ना आंदोलन का समर्थन किया था। भाजपा सरकार से नियम/कानून विरुद्ध हिमाचल प्रदेश मे चाय बागान लेने वाले वकील साहब ने तब अमेरिकी सरकार के निर्णय का बड़ी ही बेशर्मी से स्वागत किया था। लेकिन अब 20 दिसंबर 2011 को उसी अमेरिकी सरकार के गुप्तचर संगठन CIA ने अन्ना को आर एस एस /हुर्रियत कान्फरेंस के समक्ष तौल दिया है।
जो लोग और खासकर वे विद्वान जो अन्ना/रामदेव का समर्थन करते रहे हैं इस बदलाव का कारण बता सकते हैं? शायद नहीं। जब अमेरिका अर्थ संकट से घिरा था उसके नागरिक असंतोष व्यक्त कर रहे थे -आकूपाई वाल स्ट्रीट उभार पर था तो अमेरिका ने बड़ी ही चतुराई से भारतीय कारपोरेट घरानों से मिल कर भारत मे रामदेव/अन्ना आंदोलन शुरू करा दिये जिससे यहाँ के लोग यहीं उलझे रहें और अमेरिका की आंतरिक दुर्दशा देख कर उससे खिचे नहीं। जून 2011 मे साईबेरिया की एक अदालत मे ISCON के संस्थापक द्वारा व्याख्यायित गीता जो योगीराज श्री कृष्ण की गीता से कहीं से भी मेल नहीं खाती है के विरुद्ध केस वहाँ की सरकार ने चला दिया। ISCON कोई धार्मिक संगठन नहीं है वह तो CIA की ही एक इकाई है लेकिन भारत के बुद्धिमान लोगों की बुद्धि का कमाल देखिये संसद मे भाजपा/सपा/राजद सभी के सांसद उस कृष्ण विरोधी/धर्म विरोधी गीता के बचाव मे एकत्र हो गए और हमारे विदेश मंत्री एस एम कृष्णा साहब ने रूसी सरकार पर दबाव डाला की अदालत उस गीता पर प्रतिबंध न लगाए। इत्तिफ़ाक से रूस मे प्रधानमंत्री ब्लादीमीर पुतिन साहब की चुनावों मे जीत को वहाँ की जनता ने धांधली करार दिया। भारत से संबंध मधुर बनाए रखने के लिए परेशान रूसी सरकार ने अदालत मे कमजोर पैरवी की और अदालत ने रूसी सरकार की याचिका खारिज कर दी। यह जीत भारत की जनता की नहीं अमेरिकी CIA की जीत है कि उसके सहयोगी संगठन को निर्बाध छूट मिल गई। इन्हीं दलों के साथ यू पी मे लोकायुक्त से परेशान बसपा ने भी 'संवैधानिक लोकपाल' का गठन नहीं होने दिया।

अन्ना आंदोलन के दौरान सभी भ्रष्टाचार -अभियुक्त जमानत पर रिहा हो गए। अब इस आंदोलन की जरूरत भी नहीं रह गई। अमेरिकी प्रशासन और CIA ने अन्ना टीम से हाथ खींच लिया। अतः यह पूरी तरह से कारपोरेट घरानों और अमेरिकी नीतियों की जीत है। देश की जनता की यह हार है। लोकपाल मे NGOs और कारपोरेट घरानों को जब तक नहीं शामिल किया जाता तब तक उसका गठन बेमानी ही है।

Tuesday, December 27, 2011

यह स्तर है भारतीय पुलिस सेवा का


 
लखनऊ के पासपोर्ट अधिकारी जयप्रकाश सिंह नर्वदेश्वर लॉ कॉलेज के छात्र भी हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय के सीतापुर रोड स्तिथ परिसर में परीक्षा दे रहे थे। परीक्षा में जयप्रकाश सिंह नक़ल भी कर रहे थे। उड़न दस्ता द्वारा नक़ल करते हुए पकडे जाने पर धमकाया कि तुम सब जानते नहीं हो मै आइ.पी.एस अफसर हूँ। तुम सबको देख लूँगा। इस छोटी सी घटना से आप सभी अंदाजा लगा सकते हैं कि भारतीय प्रशासनिक व पुलिस सेवा के अधिकारियों का वास्तविक स्तर क्या है?

ये सभी अफसर अपने को ईश्वर का साक्षात स्वरूप मानते हैं। घूस खाने से लेकर लम्पट एलेमेन्ट सबकुछ गैर कानूनी ढंग से करने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं हाँ कुछ अफसर ईमानदार हो सकते हैं। लखनऊ के आस पास के जिलों में प्रशासनिक व पुलिस अफसरों के बड़े-बड़े फार्म हाउसेस हैं जो इनकी काली कमाई के स्पष्ट प्रमाण हैं। ये अफसर सुबह से लेकर रात तक जो भी कुछ खर्च करते हैं उसमें से उनके वेतन से एक नया पैसा खर्च नहीं होता है। छोटे जिलों में एक जिलाधिकारी के लिये शहर की तहसील का लेखपाल नियुक्त होता है। जो इनकी पत्नी का साप्ताहिक घरेलू सामान का सप्लाई मुफ्त में करता है। एक लेखपाल के अनुसार सौ पीस पीयर्स साबुन, सौ पीस मार्टीन जैसे आइटम खरीद के देने पड़ते हैं और दूसरा नौकर आस-पास की परचून की दुकान पर उक्त साबुन या आवश्यकता से अधिक सामान वापस कर मेमसाहब को पैसे देता है। जेल अधिकारीयों का काम होता है उनकी गाय को भूसा सप्लाई करना। यह सब प्रशिक्षण उनको किसी प्रशिक्षण महाविद्यालय मे नहीं दिया जाता है बल्कि स्वभावत: उनकी प्रशासनिक सेवा की यह सब हरकतें भी अंग हैं।

Tuesday, December 20, 2011

‘121 करोड़’ के कितने दावेदार?


 भारतीय संविधान में देश की सत्ता के संचालन के लिए संसदीय व्यवस्था को इसी मक़सद से समाहित किया गया ताकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सत्ता का संचालन आम जनता के हाथों से सुनिश्चित हो सके। इसी उद्देश्य से पूरे देश में चुनाव व्यवस्था राष्ट्रीयराज्यस्तरीयस्थानीय निकाय स्तर व पंचायत स्तर तक लागू की गई है। ज़ाहिर है इसी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत् कोई भी जनप्रतिनिधि स्वयं को अपने क्षेत्र विशेष का नुमाईंदा अथवा जनप्रतिनिधि ही समझता है। यदि मोटे तौर पर हम बात करें तो देश की संसद पूरे भारतवर्ष के मतदाताओं की नुमाईंदगी करती है तथा संवैधानिक रूप से यही सांसद 121 करोड़ जनता के वास्तविक निर्वाचित प्रतिनिधि भी हैं। इसी प्रकार राज्य के विकास तथा शासकीय व प्रशासनिक संचालन हेतु किसी राज्य की निर्वाचित सरकार उस राज्य की जनता का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती है। उपरोक्त व्यवस्थाएं किसी बड़बोले या स्वयंभू राष्ट्र हितैषी नेता अथवा संगठन के दावों या वचनों पर आधारित नहीं हैं बल्कि यह हमारे भारतीय संविधान में दर्ज वह व्यवस्थाएं हैं जिनपर हम और हमारा देश गर्व महसूस करता है तथा दुनिया के तमाम देश इस लोकतांत्रिक व्यवस्था से प्रभावित भी होते हैं।

परंतु उपरोक्त तथ्यों से अलग हटकर आए दिन जिसे देखो वही नेता यह दावा पेश करने लगता है कि पूरा देश उसके साथ है या वही 121 करोड़ जनता की आवाज़ है। जब देखो तब इस प्रकार के आधारहीन दावे पेश किए जाने लगते हैं कि जनता निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, सत्तारुढ़ पार्टियों अथवा सरकार के विरुद्ध है और हमारे साथ है। परंतु ऐसे लोग अपने पक्ष में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं पेश कर पाते जिससे यह पता चल सके कि यदि वास्तव में जनता अपनी निर्वाचित सरकार, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध है तो आखिर यही जनता किस प्रकार, किन कारणों से और किस आधार पर तथा किस व्यवस्था के अंतर्गत् इनके साथ है? और यदि थोड़ी देर के लिए यह बात मान भी ली जाए कि चलिए जनता ने अपने किसी प्रतिनिधि को गलती से निर्वाचित कर लिया या किसी ऐसी सरकार को गलती से चुन लिया जोकि जनकल्याण के कार्यों के बजाए देश को लूटने-खसोटने, बेचने-खाने व भ्रष्टाचार जैसे दुव्र्यसनों में मशगूल हो गई तो सवाल यह है कि क्या पूरे देश की ही जनता एक साथ ऐसे ग़लत फ़ैसले अक्सर लेती रहती है?

दूसरा सवाल यह कि यदि जनता अपने जनप्रतिनिधि व अपनी निर्वाचित सरकार के विरुद्ध है भी तो आख़िरकार वही जनता है किसके साथ? क्योंकि सत्ता के विरुद्ध बेलगाम होकर मुंह खोलने वाले सत्ता विरोधी,विपक्षी तथा सत्ता के विरुद्ध साजि़श रचने में लगे तमाम तथाकथित स्वयंसेवी व राष्ट्रवादी संगठन लगभग सभी कहीं न कहीं जनता से मुखातिब होकर यह कहते हुए दिखाई देते हैं कि पूरा देश उन्हीं के साथ है। 121 करोड़ जनता उनके साथ है। गोया जनता की हालत एक ‘फुटबॉल’ जैसी दिखाई देने लगती है।

उदाहरण के तौर पर इन दिनों देश में जनलोकपाल बनाम लोकपाल मुद्दा ज़ोरदार बहस का विषय बना हुआ है। इसी के साथ-साथ विदेशों में जमा भारतीय लोगों का काला धन वापस लाने के लिए भी भारी शोर-शराबा मचा हुआ है। सांप्रदायिकता व जातिवाद से जुड़े तमाम मुद्दे भी जनता के बीच हैं। मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी जैसी समस्याएं भी देश के सामने हैं। परंतु इन सब को लेकर जिस प्रकार की बहस राजनैतिक दलों के मध्य चल रही है तथा इसके अतिरिक्त तमाम गैर राजनैतिक संगठनों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता इनमें से कई विषयों पर का$फी सक्रिय दिखाई दे रहे हैं लगभग वे सभी यह दावा ठोक रहे हैं कि जो कुछ भी वह कह रहे हैं वही जनता की आवाज़ है। चाहे वह अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार के विरुद्ध देश में जनक्रांति पैदा करने का दावा हो अथवा बाबा रामदेव द्वारा भरी जाने वाली सत्ता विरोधी हुंकार हो। काफी दिनों से देश व मीडिया इसी बहस में उलझा पड़ा है तथा देश की जनता को भी इस उलझन में डाले हुए है कि दरअसल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी आवाज़ बनता कौन दिखाई दे रहा है? वह निर्वाचित जनप्रतिनिधि जिसके गुणों से प्रभावित होकर तथा अपने क्षेत्र व देश के विकास की उम्मीद रखकर स्वयं कष्ट उठाकर व लंबी क़तारों में लगकर जिसके पक्ष में मतदान किया या फिर वह जोकि ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ की तरह से देशहित व जनहित का दावा करते हुए स्वयंभू रूप से हमारी आवाज़ बनने की अप्रमाणित रूप से कोशिश कर रहे हैं?

यह सिलसिला किसी एक दल या राज्य को निशाना बनाकर नहीं चल रहा है बल्कि यदि गौर से देखें तो पूरे देश में ही सरकार व सत्ता को अस्थिर करने के प्रयासों की इस प्रकार की एक लहर सी चलती दिखाई दे रही है। हां, चूंकि कांग्रेस पार्टी इस समय देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल है व केंद्र की सत्तारुढ़ यूपीए गठबंधन सरकार का सबसे बड़ा घटक दल भी है तथा इसके अतिरिक्त देश के अधिकांश राज्यों में भी सत्तारुढ़ है इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस पार्टी को निशाना बनाकर ही यह एक सुनियोजित साजि़श रची जा रही हो। परंतु दरअसल इस समय यह राष्ट्रीय स्तर की एक ‘त्रासदी’ कही जा सकती है। क्योंकि अधिकांश प्रदेशों में चाहे वह किसी भी राजनैतिक दल द्वारा संचालित राज्य हों सभी राज्यों में विपक्षी दल अथवा समाजसेवी संगठन अथवा तमाम गैर सरकारी संगठन, सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं। बेशक प्रत्येक राज्य में विरोध के स्वर बुलंद करने के कारण अलग-अलग क्यों न हों परंतु मकसद लगभग सभी जगह एक ही होता है और वह यह कि सत्ता को नीचा दिखाया जाए, उसे बदनाम किया जाए, उसे अस्थिर किया जाए तथा किसी प्रकार इनके हाथों से सत्ता छीनकर उस पर खुद कब्ज़ा किया जाए। और जब यह चक्र पूरा हो जाता है तो पुन: जनता को ही अपना हथियार बनाकर कल के सत्ताधारी आज विपक्ष में आकर फिर अपनी भी भूमिका उसी अंदाज़ में शुरु कर देते हैं यानी उन्हें हटाओ और हमें बनाओ क्योंकि देश हमारे साथ है।

इन हालात में सोचने का विषय यह है कि बात-बात में जनता को या 121 करोड़ लोगों को अपने साथ बताने वाले लोग क्या देश की जनता को बिल्कुल ही मूर्ख समझते हैं या फिर भोली-भाली जनता को वरगला कर वे स्वयं को देश का सबसे बड़ा बुद्धिमान व्यक्ति समझने लगते हैं? आखिर किस आधार पर नेतागण इस तरह की बात कहते सुनाई देते हैं कि पूरा देश उनके साथ है? यहां मैं एक उदाहरण के साथ यह प्रमाणित करने का प्रयास करुंगी कि देश की जनता न तो मूर्ख है न ही इतनी बेवकूफ जितना कि चंद ऐसे लोगों द्वारा समझा जा रहा है जोकि समय-समय पर यह दावा ठोक देते हैं कि पूरा देश उनके पीछे खड़ा है और उनका वचन ही जनता की आवाज़ है।

पिछले दिनों चौधरी भजनलाल की मृत्यु के कारण रिक्त हुई हरियाणा में हिसार लोकसभा संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव संपन्न हुआ। उनके पुत्र कुलदीप बिश्रोई हरियाणा जनहित कांग्रेस से चुनाव लड़े। पूरा देश समझ रहा था कि भारतीय मतदाता चूंकि भावुक भी होते हैं लिहाज़ा चौधरी भजनलाल द्वारा राज्य को दी गई उनकी सेवाओं का एहसान अदा करने की गरज़ से भावनात्मक रूप से कुलदीप बिश्रोई के पक्ष में ही मतदान करेंगे। परंतु चूंकि सत्तारुढ़ कांग्रेस इस उपचुनाव में जनहित कांग्रेस को ‘वाकओवर’ नहीं देना चाहती थी लिहाज़ा उसने अपना प्रत्याशी जयप्रकाश के रूप में खड़ा किया। उधर राज्य की सत्ता के दूसरे सबसे बड़े दावेदार इंडियन नेशनल लोकदल ने अजय चौटाला को यह सोचकर मैदान में उतारा कि यदि किसी तरह हमने बाज़ी मार ली तो राज्य में अगले चुनाव में उनकी सत्ता वापसी के रास्ते काफी हद तक साफ हो जाएंगे। उपरोक्त तीनों ही प्रत्याशियों की चुनावी जंग में शुरु से लेकर अंत तक कुलदीप बिश्रोई का पलड़ा भारी रहा। मीडिया भी पूरी तरह से यह भविष्यवाणी कर रहा था कि कुलदीप बिश्रोई नंबर एक पर चल रहे हैं।

इसी बीच अन्ना हज़ारे ने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए इसी हिसार उपचुनाव में जनता से कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध मतदान करने की अपील कर डाली। चुनाव नतीजों में कुलदीप बिश्रोई के जीतने पर टीम अन्ना के हौसले बुलंद हो गए तथा टीम अन्ना कांग्रेस की हार का श्रेय स्वयं लेने लगी। और साथ ही यह दावा भी किया जाने लगा कि राज्य से अब कांग्रेस के सफाए की जो शुरुआत हुई है वह राष्ट्रीय स्तर पर भी परिलक्षित होगी तथा टीम अन्ना अब कांग्रेस को निगल जाएगी। परंतु इस चुनाव के कुछ ही दिनों बाद इसी क्षेत्र में रतिया नामक एक विधानसभा क्षेत्र में भी उपचुनाव हुआ जहां कांग्रेस पार्टी भारी मतों से विजयी हुई। इस क्षेत्र की जनता ने कांग्रेस पार्टी को इसलिए जिताया क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने रतिया वासियों से क्षेत्र के अभूतपूर्व विकास का वादा किया था। उधर कांग्रेस पार्टी द्वारा चुनाव जीतने के मात्र एक सप्ताह के भीतर ही हुड्डा ने उसी क्षेत्र में एक विशाल धन्यवाद रैली आयोजित कर रतिया के विकास के लिए एक ऐसे पैकेज की घोषणा कर डाली जिसकी शायद क्षेत्र की जनता उम्मीद भी नहीं कर रही थी।

अब जनता के इस प्रकार के निर्णय से क्या प्रतीत होता है? जनता किसके साथ है? क्या क्षेत्र के विकास के पक्ष में ऐसे फैसले लेने वाले मतदाताओं को हम बेवकूफ कह सकते हैं? निश्चित रूप से जनता भ्रष्टाचार, घपलों-घोटालों जैसी बातों से बेहद दु:खी ज़रूर है। परंतु इन सब के साथ-साथ यह जनता उनके क्षेत्र का विकास करने वाले नेताओं को भी बखूबी पहचानती है। लिहाज़ा आम जनता को अपने पीछे खड़ा हुआ बताने वाले लोगों को इस प्रकार के बेतुके दावे कर जनता को गुमराह करने से बाज़ आना चाहिए। देश की जनता विशेषकर मतदाता वास्तव में पहले से अब कहीं अधिक समझदार, जागरूक व निर्णय लेने में सक्षम होते जा रहे हैं। बिना किसी के बताए या दावा ठोके वे स्वयं यह जानते हैं कि वह कब किसके साथ हैं और कब किसके साथ नहीं।