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Saturday, March 15, 2014

नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला


मुझे भाजपा के नंदू श्री नरेंद्र भाई मोदी से कोई दुश्मनी नहीं है। कांग्रेस मेरे लिए कोई दूध की धुली हुई पार्टी नहीं है। न ही बसपा से मायावती जी मेरा भला चाहती। लालू के डुप्लीकेट अरविन्द केजरीवाल तो सबसे महान है। मुझे तो हमाम में सारे नंगे लगते हैं। जैसे चोर-चोर मौसेरे भाई। ये बातें मेंने इसलिए कही कि ये लेख और बयानों को पढ़ने वाले मेरे भाई-बंधू और माताएं-बहनें ये न समझे कि मैं किसी विशेष राजनितिक दल या किसी नेता का अंदरखाने प्रचार कर रहा हूँ। क्योंकि ऐसे आरोप मेरे ऊपर हमेशा लगते रहे हैं। लेकिन सारी पार्टियां और नेता ये बात जान लें कि हम जिसे भी समर्थन करेंगे तो सीना ठोंक कर करेंगे।
इन सभी बातों से दूर चलो अब मुद्दे पर आते हैं। मैंने क्यों कहा "नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला". भाइयों-बहनों ये जुमला भी एक जीता-जागता सच है। इस जुमले पर तो मैं गीत भी लिखने वाला हूँ। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर और अपनी अंधभक्ति से ऊपर उठकर देखोगे तो ही आपको "असली चाय वाला" दिखेगा और चाय पीने में मज़ा भी आएगा। फिर आप किसी को मुफ्त में चाय पिलाओगे तो भी मज़ा ही आएगा। भाइयों-बहनों आगे पढ़ने से पहले अपने खुराफाती दिमाग को मोदी साहब से और अन्य किसी नेता से दूर ले जाना। एक पल के लिए आप किसी के कार्यकर्ता नहीं बल्कि एक "मानव" बनकर सोचना। क्या सच है और क्या गलत? 
हमारे भाजपा के "नंदू" श्री नरेंद्र भाई मोदी जी आजकल पुरे देश में चाय की "घुग्गी" लगाते हुए घूम रहे हैं। कहने को तो भाई साहब "रैली" करते हैं, लेकिन लगा रहे हैं "चाय की घुग्गी". अरे भई रेहडी लेकर गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर अगर चाय मुफ्त में पिलाते घूमते तो मैं समझता कि हाँ आपने चाय वालों का मान-सम्मान बढ़ाया है और महनत भी चौखी की है। पर क्या करें ये कहते हुए मुझे अतयंत दुःख हो रहा है कि "चाय मुफ्त में वो भी रेहड़ी लेकर अगर मोदी जी गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर घुमते तो कुड़ते-पजामे पर सलवटें नहीं पड़ जाती, इतना ही नहीं सर्दी के मौसम में पसीना सर से निकल कर निचे दरारों तक पहुँच जाता" उसे कहते हम कि भाई मोदी साहब तो महान हैं। लेकिन अब कैसे महान कहें मोदी साहब को। यहाँ तो गिरी हुई घटिया राजनीति हो रही है। चाय वालों का सरेआम मज़ाक बनाया जा रहा है और चाय वाले बंधू है कि कुछ बोल नहीं सकते। क्या मोदी जी ने गुजरात में किसी चाय वाले की गरीबी दूर करके उसे दूकान में बैठाया है? खामखां बेमतलब स्वार्थी रूप में चाय वालों का इस्तेमाल ही कर रहे नरेंद्र मोदी जी। अरे कोई तो बताये भाई क्या आज तक किसी चाय वाले का मोदी साहब ने कोई भला किया है? ये जो छुटभैये नेता मोदी की नमो चाय मुफ्त में बांटते घूम रहे, क्या वो सारी जिंदगी ऐसे मुफ्त चाय पिलाते रहेंगे? नहीं न। मोदी चुनाव हारे या चुनाव जीते, इससे भाई कोई मतलब नहीं है। सवाल तो ये है कि क्या मोदी जी और मोदी जी वाले छुटभैये चुनाव के बाद ऐसे मुफ्त चाय पिलायेंगे? हारने के बाद भी और जीतने के बाद भी। गुड़गांव में तो छुटभैये नेताओं ने तो "चाय पर चर्चा" कर डाली. कोई पूछे इन स्वार्थी भाजपाई घोड़ों से कि क्या ऐसे "चाय पर चर्चा" होती है भला? बेवकूफ बनाने का धंधा खोलकर बैठ गए हैं। बड़े-बड़े होटलों में और चौपालों पर चाय पर चर्चा करते नहीं थक रहे। किस बिरादरी की और किस गरीब के उद्धार की चर्चा कर रहे हो भाई? मोदी जी को कैसे लाल-किले तक पहुँचाया जाये। इसी का तो ठेका ले रखा है तुमने। इसी ठेके के आधार पर मुफ्त चाय की चुस्की लगाते हो और फ़ालतू की "चर्चा" करते हो। देश की मुंह फाड़े पड़ी समस्याओं के बारे में चर्चा की है कभी? क्या कभी किसी चाय वाले को गले से लगाया है आपने? चाय वाले से मुख्यमंत्री बने श्री मोदी जी ने क्या कभी चाय वालों की व्यथा सुनी? क्या कभी अपनी ही बिरादरी के चाय वालों से अपने फूटे मुह से बात की मोदी जी ने? नहीं न। तो क्यों फिर खामखां का ढोल पीटते घूम रहे हो? नमो चाय... नमो चाय...
सच तो ये है कि मोदी साहब और उनके गुर्गे छुटभैये नेताओं ने चाय वालों का तो रोज़गार भी छीन लिया है। बुरा मानो या भला, आपको अपने आप पता चल जायेगा। अपने भाई सतपाल तंवर को आगे-आगे पढ़ते जाओ...
मैं आपको एक दिन की घटना बताता हूँ। हुआ यूँ कि मैं रोड पर से गुजर रहा था। मुझे एक चाय वाला दिखा। कुछ अटपटा सा था। क्योंकि वहाँ मोदी साहेब के बैनर लगे हुए थे। उन बैनर पर गुड़गांव के एक छुटभैये नेता का फोटो भी लगा था। वो छुटभैया नेता गुड़गांव जिले की एक विधानसभा से भाजपा की टिकट मांगता है। मुझे थोडा ओर अच्छा लगा, मैंने ड्राईवर को बोलकर गाडी रुकवाई और ड्राईवर के साथ-साथ सभी साथियों को भी कह दिया कि आराम से पेड़ के निचे गाडी खड़ी कर आराम फरमाओ। मैं 10 मिनट में आता हूँ। बस फिर क्या था दोस्तों, मैं पहुँच गया उसी चाय वाले भैया के पास। पहले तो गरमागरम चाय का आर्डर दिया और फिर इत्मीनान से बैठकर स्थिति को भांपने लगा। बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया और चाय वाले भैया से घुलने-मिलने की कोशिश की। इस दौरान भाई हम तो चाय वाले भैया से घुल-मिल गए। लेकिन चाय वाला भैया थोडा परेशान सा लगा। बस मैं एक ही झटके में मुद्दे की बात पर आ गया। पूछ ही डाला चाय वाले भैया से, " कि भैया ये तो बताओ कि ये मोदी जी के बैनर लगाने से क्या आपकी बिक्री ज्यादा होती है?" मेरा ये दनदनाता हुआ सवाल सुनकर चाय वाला भैया सकपका गया। मैं भी यार खुलकर बोल रहा था। क्योंकि उसका चाय का खोखा सूना पड़ा था। वहाँ पर परिंदा भी पर नहीं मार रहा था। मेरे इस सवाल पर वो चौंका ज़रूर लेकिन इस बीच बात थम गयी। क्योंकि मेरी चाय बन गयी थी। मैंने भी चुपचाप चाय का गिलास पकड़ा और एक चुस्की ली। गला खांस कर मैंने फिर वही सवाल दोहरा दिया। उस चाय वाले ने इधर-उधर की बातें करके बात घुमा दी। मैं भी भाई राजनीति के दांव-पेंच जानता हूँ। मैं कहाँ चुप रहने वाला था। आ गया चाय वाला भाई मेरी बातों में और कह दिया सारा राज़ उस छुटभैये नेता और मोदी का। 
चाय वाला भैया बोला, "भाई साहब दिन में आराम से 500-1000 रूपये कमा लेता था लेकिन ये बैनर लगने के बाद 100 रुपए की बिक्री भी मुश्किल से होती है। इससे पहले मैं एक कम्पनी के बहार 12 साल खोखा लगाता था, इसके अलावा कम्पनी वाले भी एक दिन में 2200 रुपए तक की चाय मंगवा ही लेते थे, महीने की 10 तारीख तक उनका हिसाब हो जाता था। मेरा पूरा बचपन चाय बेचने में ही बीता है।" मैंने पूछा, "फिर वहाँ आप 12 साल से खोखा लगाते थे तो वहाँ से छोड़ कर यहाँ क्यूँ और कैसे आ गए?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब एक दिन कुछ लड़के आये और चाय पीकर गए. मैं 7 रुपए की एक चाय बेचता था। उन्होंने 7 रुपए के बदले 10 रुपए दिए। एक बार तो मैंने मना किया। लेकिन उन्होंने जबर्दस्ती मेरे हाथ में थमा दिए और कहा कि हम "फलां-फलां" नेता के आदमी हैं और मोदी जी के समर्थक हैं।"
मैंने भी गहरे रूप में ध्यानमग्न होकर पूछा कि, "भैया फिर क्या हुआ?" तो उस चाय वाले ने बताया कि, "भाई साहब ऐसे करके वो हर 2-4 दिन में चाय पीने के बहाने आने लगे और एक दिन कहा कि तुम हमारे साथ चलो वहाँ बिक्री भी ज्यादा होगी, किराया भी नहीं लेंगे, सेक्टर की मार्किट है, तुम्हारा खोखा खूब चलेगा और इस "फलां-फलां" नेता के पास लोग-बाग़ आते रहते हैं, सारी चाय तुमसे ही मंगवाया करेंगे।"
मुझे ओर भी बहुत कुछ जानने की इच्छा में समय का ही भान नहीं रहा। पीछे मुड़कर देखा तो मेरे साथी मेरे दैर होने की अवस्था में मेरे पीछे आकर खड़े हो गए थे। मैंने कहा, "मैं यहीं हूँ चिंता मत करो, आराम से बैठो।" उनके बताने पर मैंने अपना फोन देखा तो 8-10 मिस कॉल आयी हुई थी। साथी अपने फोन पर फोन कर रहे थे। जवाब नहीं मिलने पर ढूँढ़ते हुए चले आये। वैसे भी मोबाइल वाइब्रेशन पर था। दूसरा चाय वाले भैया की कहानी इतनी इंटरेस्टिंग थी कि कहाँ फोन का पता लगता। खैर मेरे कहने पर सभी लोग वापिस होकर दूर हट कर एकांत में खड़े हो गए।
मैं भी वापिस टॉपिक पर आ गया और पूछा, "हाँ भाई आगे क्या हुआ..."
चाय वाले भैया ने बताया कि उसने उन मोदी समर्थक लोगों पर विश्वास कर लिया और जगह देखने की इच्छा जाहिर की। नतीजन जहाँ अभी चाय वाला भैया बैठा है उसे वो जगह मोदी समर्थकों ने दिखा दी। जगह चाय वाले भैया को पसंद आ गयी। वहाँ से ज्यादा बिक्री होने पर भी विश्वास हो गया क्योंकि जगह गुड़गांव के एक पाश सेक्टर की मार्किट की थी। नतीजन इस सप्ताह के अंदर-अंदर चाय वाले ने अपना खोखा एक नामी कम्पनी के सामने से हटाकर उस नेता के घर के सामने लगा लिया। नेता का घर भी, मार्केट भी, नेता के पास आने वाले लोग भी सभी चाय पीने लगे।
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "ये तो अच्छी बात है, फिर क्या हुआ?"
चाय वाले ने बताया कि, "अच्छी बात क्या भाई साहब, पता नहीं कौन सी घडी थी जो मैं अपनी 12 साल पुरानी जगह छोड़ कर जो यहाँ आ गया।"
इतना कहते ही चाय वाला भाई रो पड़ा। मैंने उसको ढाढस बंधाया और कहा, "भाई बात बताओ कैसे? आखिर कैसे और किस रूप में आपके साथ बुरा हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब शुरू में 1 हफ्ता मैं निश्चिंत था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक सप्ताह बाद सामने वाले "नेता" ने अपने बैनर मेरे खोखे पर लगा दिए।"
मैंने पूछा फिर क्या हुआ?
चाय वाले भैया ने खखारकर थूक निगलते हुए जवाब दिया, "भाई साहब बैनर लगाने के बाद राह चलते ग्राहकों में कमी आ गयी। काफी लोग तो पास आकर, थोडा हंसकर दूर निकल जाते। उस समय मैंने समझा कुछ नहीं, नॉर्मल बात होगी। लेकिन मुझे तब सच्चाई का पता चला जब में पढ़ने वाले बच्चों से बात की। कुछ एक पढ़ने वाले बच्चे यहाँ पी०जी० में रहते हैं, 2-4 दिन से उन्होंने मेरे पास उनका आना शुरू हुआ था।
लेकिन ये बैनर लगाने के बाद उन्होंने आना बंद कर दिया। मैंने ये बात अपने दिमाग में रख ली। एक दिन वो बच्चे सामने से गुज़र रहे थे। तो मैंने उनसे पूछा कि बेटा अब चाय पीने क्यों नहीं आते तो उन्होंने कहा कि अंकल आप मोदी जी को चाय पिलाते हो उन्हें ही पिलाओ। हम नहीं पियेंगे। आपके यहाँ तो राजनीति होती है। हम क्यों शामिल हों आपकी राजनीति में? मैंने कहा मोदी के बैनर लगने से आपको क्या दिक्कत है? तो उन बच्चों ने कहा कि हम मोदी से नफरत करते हैं क्योंकि वो झूठे हैं। गुजरात में गरीबी की हद है, हम टूर पर गए थे तो देखा था। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मोदी टी०वी० पर सिर्फ झूठ का प्रचार करते हैं। हमें झूठे के बैनर तले बैठ कर चाय नहीं पीनी। थोडा आगे जाकर पी लेंगे। अपने रूम पर बनाकर पी लेंगे। लेकिन मोदी के बैनर नीचे बैठकर चाय नहीं पीयेंगे।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
तो चाय वाले भैया ने बताया कि उन्होंने बात आयी-गयी कर दी। कोई ज्यादा अफ़सोस नहीं जताया। लेकिन हद तो तब हो गयी जब भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये नेता ने अपनी गिरी हुई औकात दिखा दी। सुनिये चाय वाले भैया की ही जुबानी :-
 
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस 'फलां-फलां' नेता से उसका 4 रुपए प्रति चाय में सौदा तय हुआ। मेरे काफी प्राथना करने के बावजूद भी उसने इससे ज्यादा रुपए देने से मना कर दिया। परन्तु बहार भी ज्यादा बिक्री न होने के कारण मुझे बहार के रेट भी 7 रुपए से घटाकर 6 रुपए करने पड़े। यानि नेता जी 3 रुपए नुक्सान में और राह चलते लोगों को 1 रुपए नुक्सान में मुझे चाय पिलानी पड़ी। शुरू के 1 या सवा हफ्ते इस नेता ने चाय के नगद रुपए दिए। उसके बाद उधार करनी शुरू कर दी। मैंने कहा कि साहब 15-20 दिन में हिसाब हो जाये तो ठीक रहेगा। मुझे भी सामान लाना पड़ता है। इस पर उन्होंने कहा ठीक है कर देंगे। लेकिन महीना बीत गया। कोई हिसाब नहीं किया। आज-कल आज-कल करते करते दूसरा महीना भी बीत गया। मैंने पैसे मांगे तो नेता जी ने चुनाव के बाद हिसाब करने को बोला। मैं बहुत गिड़गिड़ाया लेकिन वो नहीं माना। इस दौरान नेता जी ने "चाय पर चर्चा" भी खूब की और इन महीनों में नेता जी ने खूब "मोदी टी स्टाल" लगवायी और "नमो चाय" मुफ्त में पिलाई। एक दिन में 5000-6000 रुपए की चाय मैं लोगों को पिलाने लगा। उसका रुपया नेता जी अपने खाते में चढ़वाते थे क्योंकि वो मोदी के नाम से "नमो चाय" जनता को मुफ्त पिलवाते थे।"
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस दौरान एक सरकारी विभाग वाले आकर मुझसे हफ्ता मांगने लगे। क्योंकि ये सरकारी जगह थी। ये जगह नेता जी की नहीं थी। इस पर मैंने नेता जी का नाम लिया तो उन्होंने कहा कि, "वो क्या करेगा? ये जगह उसके बाप की नहीं, सरकारी है।" नतीजन मैंने उनको 50 रुपया दिन का हफ्ता देना शुरू कर दिया।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया का गला भर आया। वो फूट-फूट कर रोने लगा। "भाई साहब मेरे साथ धोखा हुआ है। मैं तो लुट गया।" मैंने उसे गले लगाया और समझाया। इस पर उसे थोडा तसल्ली मिली। लेकिन 2 पल की तसल्ली फिर से गम में बदल गयी। अपने उबड़-खाबड़ हाथों से उसने अचानक अपना चेहरा ढंका और फिर उसका दुःख उसके गले और आँखों से फूट पड़ा। नाक बहने लगी। नाक भी निचे तलक लटक आयी। मैंने अपना रूमाल निकाला और चाय वाले भैया का नाक पोंछा।
मैंने कहा, "इत्मीनान से बैठो भाई। मैं आपके साथ हूँ।"
चहेरे पर उसके बदले की आग और गुस्से के भाव साफ़ झलक आये। चाय वाले भैया बोले :-
"चाय मेरी, चीनी मेरी, पत्ती मेरी, पतीला मेरा, अदरक मेरी, इलायची मेरी, दूध मेरा, छलनी मेरी, चम्मच मेरी, गिलास मेरा, कप मेरा, गैस मेरी, महनत मेरी, खून मेरा, पसीना मेरा। सब कुछ पी गया ये "फलां-फलां" नेता और जनता को भी पिलाया। क़र्ज़ चढ़ा मेरे सर पे और मुफ्त चाय पिला कर भला बन रहा है ये नेता। भाई साहब मेरा तो सब कुछ लूट लिया मोदी और मोदी के कुत्तों ने।" (नोट : "कुत्ता शब्द चाय वाले के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, जिसे आप तक पहुँचाना मेरा फ़र्ज़ है)
इस पर मैंने चाय वाले भैया से हिसाब-किताब पूछा। तो चाय वाले भाई ने अपनी पत्थर की बनी सीट पर पड़े एक मैले-कुचेले तकिये के निचे से एक फटी पुराणी कॉपी निकाल कर उसमें एक कपडे की कत्तर से बंधी हुई नेता के द्वारा लिखी गयी चाय की पर्चियां और कुल जोड़ा गया हिसाब मेरे सामने रख दिया।
बाप रे!
हिसाब देख कर तो मेरे पैरों तले की जमीन ही खिसक गयी। सवा 3 महीने का उधार 4 लाख 65 हज़ार 437 रुपया देख कर मेरे होंश उड़ गए।
बस मुझे तो मुद्दा चाहिए था और एक गरीब का भला करने का मौका। फर्क ये रहा कि मेरी आँख से आंसू निकले नहीं लेकिन कसर रही नहीं। लेकिन मेरी आँखों में भाजपा के उस छुटभैये नेता और मोदी के लिए गुस्से के लाल डोरे ज़रूर तैर रहे थे।
मैंने चाय वाले भैया की पीठ पर हाथ रखा और कहा आप चिंता मत करो मैं आपकी मदद करूँगा। ये मेरी जिम्मेवारी है।
इतना कह कर मैंने नेता जी के दरबार की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। इस दौरान चाय वाल भैया थोडा घबराया लेकिन मैंने उसको हाथ से इशारा करके तसल्ली रखने को कहा। मुझे देख कर दूर खड़े मेरे साथी भी मेरे पीछे-पीछे नेता जी के दरबार की तरफ चले आये।
सबसे पहले मेरा सामना नेता जी के यहाँ भाड़े के टट्टुओं से हुआ, नेता जी से मिलने की इच्छा जाहिर करने पर एक टट्टू बोला : कहाँ से आये हो, क्या नाम है, "भाई साहब" से क्यों मिलना है। इस पर मैंने बड़े इत्मीनान से कहा कि भाई जी मेरा नाम "सतपाल तंवर" है और मैं "भाई साहब" का ही एक चाहने वाला हूँ। इस पर वो बोले "भाई साहब" तो मीटिंग में हैं, समय लग जायेगा... वो भाड़े के छछूंदर इतना बोल ही रहे थे कि सामने की गैलरी में से अपने बाल संभालती हुई, दुप्पटा ठीक करती हुई और अपना लाल रंग का सूट निचे की तरफ खींच कर "सामने" से "फ्रंट" का उभरा हुआ बैलेंस सही करती हुई एक मोटी सी-काली सी औरत आती दिखाई पड़ी। थोडा बहार की तरफ नजदीक आयी तो देखा नेता जी के भाड़े के छछूंदर उसकी तरफ हल्का-हल्का मुस्कुराते हुए बढे। ओर थोडा नजदीक आयी। तो मुझे समझने में दैर नहीं लगी। ये तो वाही औरत थी जो कभी गुड़गांव के सरकारी हस्पताल और नगर निगम कार्यालय के आसपास, कभी झाड़सा रोड पर और कभी मोर चौक के आसपास सरेआम ग्राहकों को लुभाती देखी जा सकती है। काफी बार रोड पर से गुजरते हुए मैंने उसे देखा है। एक टैम्पू ड्राइवर ने बताया था कि ये गुड़गांव की सबसे पुराणी "सेक्स वर्कर" है। मेरी तरफ एक नज़र देख कर वो बहार पहले से ही खड़े रिक्शॉ में बैठ कर निकल गयी।
फिर नेता जी के टट्टुओं में से एक टट्टू की आवाज मेरे कानों में गूंजी। वो बोल रहा था कि "भाई साहब" फ्री हो गए हैं। मेरे हाथ में उस टट्टू ने एक पर्ची थमाते हुए कहा कि आप इस पर्ची पर अपना नाम लिख दो। मैं "भाई साहब" को देकर आता हूँ। मैंने वैसे ही किया जैसा उस टट्टू ने कहा। वो 5 मिनट बाद बाहर निकल कर आया। अबकी बार उसकी भाषा में कुछ अखड़पन नहीं बल्कि आदर झलक रहा था। वो बोला कि सर आपको भाई साहब अंदर बुला रहे हैं। हम भी उस टट्टू के बताये अनुसार नेता जी के घोंसले की तरफ चल पड़े। सोफे पर बैठे नेता जी बड़े ही विनम्र स्वभाव से हाथ जोड़कर गले लग गए। बदले में हमने भी थोडा सा प्यार दिखाया और बैठ गए सोफे पर। नेता जी ने चाय का ऑर्डर दिया। बहार से चाय बनकर आ गयी। इस दौरान चाय भी पी और नेता जी से पहली मुलाक़ात थी तो उन्होंने भी उस चाय की प्याली को "नमो चाय" कहकर ही सम्बोधित किया। हमने भी चुपचाप सुना। इधर-उधर की बातें होने के साथ-साथ चुनाव का ज़िक्र चल ही पड़ा। हम तो बनकर गए थे चाय वाले भैया की आवाज। नेता जी तो हमसे वोट और सपोर्ट ही मांगने लग गए। मुझे भी मुद्दे पर आना था। बस 4 रुपए के हिसाब से 7 लोगों के 28 रुपए सामने पड़ी मेज पर डाल दिए। ये देखकर नेता जी थोडा सकपकाया। मैंने कहा उठाओ "भाई साहब".
नेता जी चौंकते हुए बोले, "ये क्या है?"
तो मैंने भी नेता जी को मतलब समझा ही दिया। 4 रुपए के हिसाब से हम 7 लोगों के 28 रुपए हुए। उस गरीब चाय वाले भैया को अभी ये रुपए पहुंचाओ। नेता जी बोले नहीं तंवर साहब आप हमारे घर आये हैं। आप महमान हैं। हम आपको चाय पिलायेंगे और तंवर आपको कैसे पता कि हम एक चाय के 4 रुपए देते हैं। इस पर मैंने नेता जी को जवाब दिया कि "भाई साहब" मुझे तो बहुत कुछ पता है। ये पोल कहीं जनता में न खुल जाये। इसलिए सबसे पहले ये 28 रुपया उठाकर चाय वाले के पास पहुंचाओ। हम आपके पास किसी गरीब की बद्दुआ लेने नहीं आये। आगे की बात बाद में करेंगे। पहले ये 28 रुपया चाय वाले तक पहुंचाओ। 
नेता जी के चहेरा थोडा सफ़ेद पड़ गया और बहार से अपने एक भाड़े के छछूंदर को आवाज लगाकर 28 रुपया उस चाय वाले के पास उसने भिजवा दिया। मैं वहाँ बैठा मन ही मन सोच रहा था कि चाय वाले भैया का थोडा होंसला तो बढ़ेगा। इतनी देर में नेता जी बोले "क्या हुआ तंवर साहब, पहली बार आये और नाराज़गी में आये।"
बस फिर क्या था। जो मन में आया वो बका। नेता जी तो नेता जी ठहरे। विरोध कर नहीं सकते थे। वोटों का लालच जो था। अब इसी की आड़ में मैंने भी नेता जी का कोई बहाना नहीं सुना और चाय वाले भैया का हिसाब फाइनल करने की तारीख मांग ली। काफी कुर-कुर करने के बाद भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये कुकडूं नेता ने 9 दिन बाद हिसाब का दिन मुक्करर कर दिया। इसी के साथ हम भी उठ खड़े हुए और चेतावनी देकर निकल चले। इतना भी कह दिया कि चाय वाले भैया का ख्याल रखना इसे कुछ हुआ तो आप जिम्मेवार होंगे।

अब दोस्तों 9 दिन बाद का इंतज़ार है। यदि भाजपा के उस छुटभैये नेता ने तय समय के अनुसार चाय वाले भैया का रुपया नहीं दिया तो उसका नाम मीडिया में उजागर करके उसकी पोल खोलनी है। बस आप इंतज़ार करियेगा और पढ़ते रहिएगा हरियाणा की माटी के लाल अपने भाई सतपाल को।
 
लेखक "नवाब सतपाल तंवर" 

Monday, September 03, 2012

सात साल की सुप्रिया को महज 25 रूपये में बेच डाला एक मां ने…


संसद में लाखों करोड़ के कोयला घोटाले का शोर है. ट्विटर पर करीब 50 लाख करोड़ के थोरियम की चोरी के चर्चे हैं. और पश्चिम बंगाल में एक मां ने अपनी तीन बेटियों को मात्र 155 रुपये में बेच दिया. ये भारत का सच है. वो सच जिससे लाख चाहकर भी हम नज़र नहीं फेर सकते.
30 साल की पूर्णिमा हल्दर का पति शराबी है. शराबी पति ने 15 दिन पहले पूर्णिमा और तीन बेटियों को घर से निकाल दिया था, जिसके बाद से वो दर दर भटक रही थी. कई दिन की भूख जब तड़प बन गई तो इस मां की ममता मर गई और उसने बेटियां बेचकर भूख शांत की. बेटियां बेचने की बात पूर्णिमा ने कोलकाता के डायमंड हार्बर रेलवे स्टेशन पर खोमचे वालों को बताईं. खोमचे वालों ने यह जानकारी पुलिस को दी. फिलहाल पुलिस ने तीनों लड़कियों को बरामद और पूर्णिमा के पति को गिरफ्तार कर लिया है.

जिस देश में कोयला लाखों करोड़ का बिक रहा हो, वहां बेटियों की कीमत कितनी सस्ती है इसका अंदाजा आपको पूर्णिमा की बेटियों की कीमत सुनकर लग जायेगा. इस भूखी मां ने साढ़े तीन साल की अपनी छोटी बेटी रमा को 33 रूपये में, सात साल की सुप्रिया को महज 25 रूपये में सबसे बड़ी बेटी 9 साल की प्रिया को 100 रूपये में बेच दिया. यानि 3 बेटियों के बदले पूर्णिमा को 155 रूपये मिले.
हालांकि सरकारी महकमा ने महिला के तंगहाली के दावे को खारिज किया है. दक्षिणी 24 परगना के ज़िलाधिकारी ने कहा कि ‘हम यह जांचने की कोशिश कर रहे हैं कि इस घटना के लिए कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं.’ बहरहाल, कोलकाता की ये घटना कोई नहीं है. इससे पूर्व भी इस तरह के कई घटना इस देश में घटित हो चुके हैं.
आज से ठीक एक महीना पूर्व झारखंड के मनोहरपुर में गरीबी से तंग आकर एक मां द्वारा अपने जुड़वा बच्चों को बेचने का मामाला प्रकाश में आया था. अगस्त महीने में ही राजस्थान के श्रीगंगानगर में आठ दिन के एक मासूम बच्चे को उसके मां-बाप ने इसलिए बेच दिया क्योंकि उनके पास अपने दूसरे बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं थे. जुलाई के महीने में बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज में सुशासन और विकास के दावे करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज में गरीबी से मजबूर एक मां ने अपने दूधमुंहे बच्चे को महज़ 62 रुपये में बेच दिया था. वहीं पिछले महीने बेंगलुरू में एक मां अपने अजन्में बच्चे को बेचने के लिए मजबूर थी. मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक शोभा नामक महिला बच्चे के लिए खरीददार खोज रही थी. क्योंकि शोभा के पास अपने बच्चे के पालन पोषण के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए वह ऐसे खरीददार की तलाश कर रही थी, जो उसके अजन्में बच्चे को सही पालन-पोषण दे सके.
ऐसे न जाने कितने मामले हर महीने मीडिया के माध्यम से प्रकाश में आते हैं. और न जाने उससे कई गुना अधिक दब जाते हैं, जिन पर मीडिया या किसी की भी नज़र नहीं पड़ती.
आज़ादी के 65 वर्ष पूरे होने के बाद भी देश में एक लाख से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है. आज भी लगभग 30 प्रतिशत भारतीय निर्धनता की रेखा तले जीते हैं. लाखों को दो जून की रोटी भी नहीं मिल पा रही है. करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं. आज भी स्कूल, चिकित्सा, मकान और अन्य बुनियादी सुविधाओं से करोड़ों लोग वंचित हैं.
आखि़र यह कैसी विडंबना है. लोकतंत्र का आधार मानव जीवन का मूल्य और व्यक्तियों के बीच समानता को माना जाता है, किन्तु हमारा सामाजिक जीवन और चिंतन आज भी सामंतवादी हैं. आज भी मनुष्य के जीवन की अलग-अलग कीमतें लगती हैं. कहीं एक बच्चे का प्रतिदिन का खर्च 500 रूपये है तो कहीं मात्र 25 रूपये में गरीब माएं अपने बच्चे को बेच डालती हैं.
यह जीवन के अलग रंग हो सकते हैं लेकिन सबसे बुनियादी सवाल यही है कि जब संसद में पौने दो लाख करोड़ रुपये के घोटाले की गूंज होती है. ट्विटर पर 50 लाख करोड़ के थोरियम घोटाले का शोर होता है तब देश का भविष्य चंद सिक्कों में बिक जाता है? आखिर ऐसा क्यों हैं? क्यों भारत में जीवन इतना सस्ता और घोटाले इतने महंगे हैं? सबसे बड़ा सवाल यह  है कि भूख और गरीबी की भट्टी में तप रहे लोगों के हिस्से का कोयला कहां हैं? आपके पास कोई जवाब हो तो जरूर दीजियेगा… मुझे तो यह संसद के शोर में दिख रहा है.

Tuesday, June 28, 2011

रसोई गैस-डीजल-केरोसीन और पेट्रोल की मंहगाई




मंहगाई का असली कारण रसोई गैस का 
कार में उपयोग

सरकार जब-जब भी रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाती है, सरकार की ओर से हर बार रटे-रटाये दो तर्क प्रस्तुत करके देश के लोगों को चुप करवाने का प्रयास किया जाता है| पहला तो यह कि कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ गये हैं, जो सरकार के नियन्त्रण में नहीं है| दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को भारी घाटा हो रहा है| इसलिये रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाना सरकार की मजबूरी है| राष्ट्रीय मीडिया की ओर से हर बार सरकार को बताया जाता है कि यदि सरकार अपने करों को कम कर दे तो रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढने के बजाय घट भी सकती हैं और आंकड़ों के जरिये यह सिद्ध करने का भी प्रयास किया जाता है कि रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को कुल मिलाकर घाटे के बजाय मुनाफा ही हो रहा है, फिर कीमतें बढाने की कहॉं पर जरूरत है|

मीडिया और जागरूक लोगों की ओर से उठाये जाने वाले इन तर्कसंगत सवालों पर सरकार तनिक भी ध्यान नहीं देती है और थोड़े-थोड़े से अन्तराल पर रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें लगातार और बेखौप बढाती ही जा रही है| जिससे आम गरीब लोगों की कमर टूट चुकी है| लेकिन इन लोगों में सरकार के इस अत्याचार का संगठित होकर प्रतिकार करने की क्षमता नहीं है| मध्यम एवं उच्च वर्ग जो हर प्रकार से प्रतिकार करने में सक्षम है, वह एक-दो दिन चिल्लाचोट करके चुप हो जाता है|

राजनैतिक दल भी औपचारिक विरोध करके चुप हो जाते हैं| क्योंकि राजनेता तो सभी दलों के एक जैसे हैं| उन्हें सत्ता से बाहर होने पर ही जनता की तकलीफें नरज आती हैं| मोरारजी देसाई के छोटे से कार्यकाल को छोड़ दिया जाये तो यह बात पूरी तरह से सच है कि सत्ता में आने पर किसी भी राजनैतिक दल के नेताओं को आम लोगों की गम्भीर समस्याएँ भी नजर ही नहीं आती हैं| इसीलिये अन्य अनेक जीवन रक्षक जरूरी वस्तुओं की कीमतों में परोक्ष वृद्धि के साथ-साथ रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें प्रत्यक्ष रूप से बढने का सिलसिला लगातार चलता रहता है|

मैं समझता हूँ कि अब आम-अभावग्रस्त लोगों को इस दिशा में कुछ समाधानकारी मुद्दों को लेकर सड़क पर आने की जरूरत है, क्योंकि राजनैतिक लोगों से इस समस्या के बारे में आम लोगों के साथ खड़े होने की आशा करना अपने आपको धोखा देने के समान है| बल्कि जनता को अपने आन्दोलन से राजनैतिक लोगों को अलग भी रखना चाहिये| केवल दो बातें ऐसी हैं, जिन्हें देश के आम-अभावग्रस्त लोगों को देश की अंधी-बहरी सरकार को समझाने की जरूरत है:-
1. रसोई गैस एवं केरोसीन की कुल खपत का करीब 40 प्रतिशत व्यावसायिक उपयोग हो रहा है, जिसके लिये मूलत: इनकी कालाबाजारी जिम्मेदार है| जिसमें सरकार के अफसर भी शामिल हैं, क्योंकि उनको हर माह रसोई गैस एवं केरोसीन की कालाबाजारी करने वालों और इनका व्यावसायिक उपयोग करने वालों की ओर से कमीशन मिलता है| जिसकी रोकथाम के लिये सरकार कोई प्रयास नहीं करके रसोई गैस एवं केरोसीन की कीमतें बढकार जनता पर अत्याचार करती है| जबकि कालाबाजारी करने वालों, व्यावसायिक उपयोग करने वालों और सम्बन्धित सरकारी अमले को कठोर सजा मिलनी चाहिये|

2. रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की आपूर्ति करने वाली कम्पनियों के कर्मचारियों और अफसरों को जिस प्रकार की सुविधा और वेतन दिया जा रहा है, वह उनकी कार्यक्षमता से कई गुना अधिक है| जिसका भार अन्नत: देश की जनता पर ही पड़ता है| जब सरकार रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के मामले में इन कम्पनियों की ओर से हस्तक्षेप कर सकती है तो इन कम्पनियों के खर्चों को नियन्त्रित करने के लिये हस्तक्षेप क्यों नहीं करती है? जब भी इस बारे में सरकार से नियन्त्रण की बात की जाती है तो सरकार इसे कम्पनियों का आन्तरिक मामला कहकर पल्ला झाड़ लेती है, जबकि कम्पनियों द्वारा अर्जित धन की बर्बादी के कारण होने वाले घाटे की पूर्ति के लिये सरकार रसोई-गैस, डीजल, केरोसीन और पेट्रोल की कीमतें बढाने के लिये इन कम्पनियों की ओर से जनता पर भार बढाने में कभी भी संकोच नहीं करती है|