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Saturday, March 15, 2014

नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला


मुझे भाजपा के नंदू श्री नरेंद्र भाई मोदी से कोई दुश्मनी नहीं है। कांग्रेस मेरे लिए कोई दूध की धुली हुई पार्टी नहीं है। न ही बसपा से मायावती जी मेरा भला चाहती। लालू के डुप्लीकेट अरविन्द केजरीवाल तो सबसे महान है। मुझे तो हमाम में सारे नंगे लगते हैं। जैसे चोर-चोर मौसेरे भाई। ये बातें मेंने इसलिए कही कि ये लेख और बयानों को पढ़ने वाले मेरे भाई-बंधू और माताएं-बहनें ये न समझे कि मैं किसी विशेष राजनितिक दल या किसी नेता का अंदरखाने प्रचार कर रहा हूँ। क्योंकि ऐसे आरोप मेरे ऊपर हमेशा लगते रहे हैं। लेकिन सारी पार्टियां और नेता ये बात जान लें कि हम जिसे भी समर्थन करेंगे तो सीना ठोंक कर करेंगे।
इन सभी बातों से दूर चलो अब मुद्दे पर आते हैं। मैंने क्यों कहा "नकली नमो चाय बनाम असली चाय वाला". भाइयों-बहनों ये जुमला भी एक जीता-जागता सच है। इस जुमले पर तो मैं गीत भी लिखने वाला हूँ। लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर और अपनी अंधभक्ति से ऊपर उठकर देखोगे तो ही आपको "असली चाय वाला" दिखेगा और चाय पीने में मज़ा भी आएगा। फिर आप किसी को मुफ्त में चाय पिलाओगे तो भी मज़ा ही आएगा। भाइयों-बहनों आगे पढ़ने से पहले अपने खुराफाती दिमाग को मोदी साहब से और अन्य किसी नेता से दूर ले जाना। एक पल के लिए आप किसी के कार्यकर्ता नहीं बल्कि एक "मानव" बनकर सोचना। क्या सच है और क्या गलत? 
हमारे भाजपा के "नंदू" श्री नरेंद्र भाई मोदी जी आजकल पुरे देश में चाय की "घुग्गी" लगाते हुए घूम रहे हैं। कहने को तो भाई साहब "रैली" करते हैं, लेकिन लगा रहे हैं "चाय की घुग्गी". अरे भई रेहडी लेकर गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर अगर चाय मुफ्त में पिलाते घूमते तो मैं समझता कि हाँ आपने चाय वालों का मान-सम्मान बढ़ाया है और महनत भी चौखी की है। पर क्या करें ये कहते हुए मुझे अतयंत दुःख हो रहा है कि "चाय मुफ्त में वो भी रेहड़ी लेकर अगर मोदी जी गाँव-गाँव, गली-गली, शहर-शहर घुमते तो कुड़ते-पजामे पर सलवटें नहीं पड़ जाती, इतना ही नहीं सर्दी के मौसम में पसीना सर से निकल कर निचे दरारों तक पहुँच जाता" उसे कहते हम कि भाई मोदी साहब तो महान हैं। लेकिन अब कैसे महान कहें मोदी साहब को। यहाँ तो गिरी हुई घटिया राजनीति हो रही है। चाय वालों का सरेआम मज़ाक बनाया जा रहा है और चाय वाले बंधू है कि कुछ बोल नहीं सकते। क्या मोदी जी ने गुजरात में किसी चाय वाले की गरीबी दूर करके उसे दूकान में बैठाया है? खामखां बेमतलब स्वार्थी रूप में चाय वालों का इस्तेमाल ही कर रहे नरेंद्र मोदी जी। अरे कोई तो बताये भाई क्या आज तक किसी चाय वाले का मोदी साहब ने कोई भला किया है? ये जो छुटभैये नेता मोदी की नमो चाय मुफ्त में बांटते घूम रहे, क्या वो सारी जिंदगी ऐसे मुफ्त चाय पिलाते रहेंगे? नहीं न। मोदी चुनाव हारे या चुनाव जीते, इससे भाई कोई मतलब नहीं है। सवाल तो ये है कि क्या मोदी जी और मोदी जी वाले छुटभैये चुनाव के बाद ऐसे मुफ्त चाय पिलायेंगे? हारने के बाद भी और जीतने के बाद भी। गुड़गांव में तो छुटभैये नेताओं ने तो "चाय पर चर्चा" कर डाली. कोई पूछे इन स्वार्थी भाजपाई घोड़ों से कि क्या ऐसे "चाय पर चर्चा" होती है भला? बेवकूफ बनाने का धंधा खोलकर बैठ गए हैं। बड़े-बड़े होटलों में और चौपालों पर चाय पर चर्चा करते नहीं थक रहे। किस बिरादरी की और किस गरीब के उद्धार की चर्चा कर रहे हो भाई? मोदी जी को कैसे लाल-किले तक पहुँचाया जाये। इसी का तो ठेका ले रखा है तुमने। इसी ठेके के आधार पर मुफ्त चाय की चुस्की लगाते हो और फ़ालतू की "चर्चा" करते हो। देश की मुंह फाड़े पड़ी समस्याओं के बारे में चर्चा की है कभी? क्या कभी किसी चाय वाले को गले से लगाया है आपने? चाय वाले से मुख्यमंत्री बने श्री मोदी जी ने क्या कभी चाय वालों की व्यथा सुनी? क्या कभी अपनी ही बिरादरी के चाय वालों से अपने फूटे मुह से बात की मोदी जी ने? नहीं न। तो क्यों फिर खामखां का ढोल पीटते घूम रहे हो? नमो चाय... नमो चाय...
सच तो ये है कि मोदी साहब और उनके गुर्गे छुटभैये नेताओं ने चाय वालों का तो रोज़गार भी छीन लिया है। बुरा मानो या भला, आपको अपने आप पता चल जायेगा। अपने भाई सतपाल तंवर को आगे-आगे पढ़ते जाओ...
मैं आपको एक दिन की घटना बताता हूँ। हुआ यूँ कि मैं रोड पर से गुजर रहा था। मुझे एक चाय वाला दिखा। कुछ अटपटा सा था। क्योंकि वहाँ मोदी साहेब के बैनर लगे हुए थे। उन बैनर पर गुड़गांव के एक छुटभैये नेता का फोटो भी लगा था। वो छुटभैया नेता गुड़गांव जिले की एक विधानसभा से भाजपा की टिकट मांगता है। मुझे थोडा ओर अच्छा लगा, मैंने ड्राईवर को बोलकर गाडी रुकवाई और ड्राईवर के साथ-साथ सभी साथियों को भी कह दिया कि आराम से पेड़ के निचे गाडी खड़ी कर आराम फरमाओ। मैं 10 मिनट में आता हूँ। बस फिर क्या था दोस्तों, मैं पहुँच गया उसी चाय वाले भैया के पास। पहले तो गरमागरम चाय का आर्डर दिया और फिर इत्मीनान से बैठकर स्थिति को भांपने लगा। बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया और चाय वाले भैया से घुलने-मिलने की कोशिश की। इस दौरान भाई हम तो चाय वाले भैया से घुल-मिल गए। लेकिन चाय वाला भैया थोडा परेशान सा लगा। बस मैं एक ही झटके में मुद्दे की बात पर आ गया। पूछ ही डाला चाय वाले भैया से, " कि भैया ये तो बताओ कि ये मोदी जी के बैनर लगाने से क्या आपकी बिक्री ज्यादा होती है?" मेरा ये दनदनाता हुआ सवाल सुनकर चाय वाला भैया सकपका गया। मैं भी यार खुलकर बोल रहा था। क्योंकि उसका चाय का खोखा सूना पड़ा था। वहाँ पर परिंदा भी पर नहीं मार रहा था। मेरे इस सवाल पर वो चौंका ज़रूर लेकिन इस बीच बात थम गयी। क्योंकि मेरी चाय बन गयी थी। मैंने भी चुपचाप चाय का गिलास पकड़ा और एक चुस्की ली। गला खांस कर मैंने फिर वही सवाल दोहरा दिया। उस चाय वाले ने इधर-उधर की बातें करके बात घुमा दी। मैं भी भाई राजनीति के दांव-पेंच जानता हूँ। मैं कहाँ चुप रहने वाला था। आ गया चाय वाला भाई मेरी बातों में और कह दिया सारा राज़ उस छुटभैये नेता और मोदी का। 
चाय वाला भैया बोला, "भाई साहब दिन में आराम से 500-1000 रूपये कमा लेता था लेकिन ये बैनर लगने के बाद 100 रुपए की बिक्री भी मुश्किल से होती है। इससे पहले मैं एक कम्पनी के बहार 12 साल खोखा लगाता था, इसके अलावा कम्पनी वाले भी एक दिन में 2200 रुपए तक की चाय मंगवा ही लेते थे, महीने की 10 तारीख तक उनका हिसाब हो जाता था। मेरा पूरा बचपन चाय बेचने में ही बीता है।" मैंने पूछा, "फिर वहाँ आप 12 साल से खोखा लगाते थे तो वहाँ से छोड़ कर यहाँ क्यूँ और कैसे आ गए?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब एक दिन कुछ लड़के आये और चाय पीकर गए. मैं 7 रुपए की एक चाय बेचता था। उन्होंने 7 रुपए के बदले 10 रुपए दिए। एक बार तो मैंने मना किया। लेकिन उन्होंने जबर्दस्ती मेरे हाथ में थमा दिए और कहा कि हम "फलां-फलां" नेता के आदमी हैं और मोदी जी के समर्थक हैं।"
मैंने भी गहरे रूप में ध्यानमग्न होकर पूछा कि, "भैया फिर क्या हुआ?" तो उस चाय वाले ने बताया कि, "भाई साहब ऐसे करके वो हर 2-4 दिन में चाय पीने के बहाने आने लगे और एक दिन कहा कि तुम हमारे साथ चलो वहाँ बिक्री भी ज्यादा होगी, किराया भी नहीं लेंगे, सेक्टर की मार्किट है, तुम्हारा खोखा खूब चलेगा और इस "फलां-फलां" नेता के पास लोग-बाग़ आते रहते हैं, सारी चाय तुमसे ही मंगवाया करेंगे।"
मुझे ओर भी बहुत कुछ जानने की इच्छा में समय का ही भान नहीं रहा। पीछे मुड़कर देखा तो मेरे साथी मेरे दैर होने की अवस्था में मेरे पीछे आकर खड़े हो गए थे। मैंने कहा, "मैं यहीं हूँ चिंता मत करो, आराम से बैठो।" उनके बताने पर मैंने अपना फोन देखा तो 8-10 मिस कॉल आयी हुई थी। साथी अपने फोन पर फोन कर रहे थे। जवाब नहीं मिलने पर ढूँढ़ते हुए चले आये। वैसे भी मोबाइल वाइब्रेशन पर था। दूसरा चाय वाले भैया की कहानी इतनी इंटरेस्टिंग थी कि कहाँ फोन का पता लगता। खैर मेरे कहने पर सभी लोग वापिस होकर दूर हट कर एकांत में खड़े हो गए।
मैं भी वापिस टॉपिक पर आ गया और पूछा, "हाँ भाई आगे क्या हुआ..."
चाय वाले भैया ने बताया कि उसने उन मोदी समर्थक लोगों पर विश्वास कर लिया और जगह देखने की इच्छा जाहिर की। नतीजन जहाँ अभी चाय वाला भैया बैठा है उसे वो जगह मोदी समर्थकों ने दिखा दी। जगह चाय वाले भैया को पसंद आ गयी। वहाँ से ज्यादा बिक्री होने पर भी विश्वास हो गया क्योंकि जगह गुड़गांव के एक पाश सेक्टर की मार्किट की थी। नतीजन इस सप्ताह के अंदर-अंदर चाय वाले ने अपना खोखा एक नामी कम्पनी के सामने से हटाकर उस नेता के घर के सामने लगा लिया। नेता का घर भी, मार्केट भी, नेता के पास आने वाले लोग भी सभी चाय पीने लगे।
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "ये तो अच्छी बात है, फिर क्या हुआ?"
चाय वाले ने बताया कि, "अच्छी बात क्या भाई साहब, पता नहीं कौन सी घडी थी जो मैं अपनी 12 साल पुरानी जगह छोड़ कर जो यहाँ आ गया।"
इतना कहते ही चाय वाला भाई रो पड़ा। मैंने उसको ढाढस बंधाया और कहा, "भाई बात बताओ कैसे? आखिर कैसे और किस रूप में आपके साथ बुरा हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "भाई साहब शुरू में 1 हफ्ता मैं निश्चिंत था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक सप्ताह बाद सामने वाले "नेता" ने अपने बैनर मेरे खोखे पर लगा दिए।"
मैंने पूछा फिर क्या हुआ?
चाय वाले भैया ने खखारकर थूक निगलते हुए जवाब दिया, "भाई साहब बैनर लगाने के बाद राह चलते ग्राहकों में कमी आ गयी। काफी लोग तो पास आकर, थोडा हंसकर दूर निकल जाते। उस समय मैंने समझा कुछ नहीं, नॉर्मल बात होगी। लेकिन मुझे तब सच्चाई का पता चला जब में पढ़ने वाले बच्चों से बात की। कुछ एक पढ़ने वाले बच्चे यहाँ पी०जी० में रहते हैं, 2-4 दिन से उन्होंने मेरे पास उनका आना शुरू हुआ था।
लेकिन ये बैनर लगाने के बाद उन्होंने आना बंद कर दिया। मैंने ये बात अपने दिमाग में रख ली। एक दिन वो बच्चे सामने से गुज़र रहे थे। तो मैंने उनसे पूछा कि बेटा अब चाय पीने क्यों नहीं आते तो उन्होंने कहा कि अंकल आप मोदी जी को चाय पिलाते हो उन्हें ही पिलाओ। हम नहीं पियेंगे। आपके यहाँ तो राजनीति होती है। हम क्यों शामिल हों आपकी राजनीति में? मैंने कहा मोदी के बैनर लगने से आपको क्या दिक्कत है? तो उन बच्चों ने कहा कि हम मोदी से नफरत करते हैं क्योंकि वो झूठे हैं। गुजरात में गरीबी की हद है, हम टूर पर गए थे तो देखा था। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मोदी टी०वी० पर सिर्फ झूठ का प्रचार करते हैं। हमें झूठे के बैनर तले बैठ कर चाय नहीं पीनी। थोडा आगे जाकर पी लेंगे। अपने रूम पर बनाकर पी लेंगे। लेकिन मोदी के बैनर नीचे बैठकर चाय नहीं पीयेंगे।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
तो चाय वाले भैया ने बताया कि उन्होंने बात आयी-गयी कर दी। कोई ज्यादा अफ़सोस नहीं जताया। लेकिन हद तो तब हो गयी जब भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये नेता ने अपनी गिरी हुई औकात दिखा दी। सुनिये चाय वाले भैया की ही जुबानी :-
 
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस 'फलां-फलां' नेता से उसका 4 रुपए प्रति चाय में सौदा तय हुआ। मेरे काफी प्राथना करने के बावजूद भी उसने इससे ज्यादा रुपए देने से मना कर दिया। परन्तु बहार भी ज्यादा बिक्री न होने के कारण मुझे बहार के रेट भी 7 रुपए से घटाकर 6 रुपए करने पड़े। यानि नेता जी 3 रुपए नुक्सान में और राह चलते लोगों को 1 रुपए नुक्सान में मुझे चाय पिलानी पड़ी। शुरू के 1 या सवा हफ्ते इस नेता ने चाय के नगद रुपए दिए। उसके बाद उधार करनी शुरू कर दी। मैंने कहा कि साहब 15-20 दिन में हिसाब हो जाये तो ठीक रहेगा। मुझे भी सामान लाना पड़ता है। इस पर उन्होंने कहा ठीक है कर देंगे। लेकिन महीना बीत गया। कोई हिसाब नहीं किया। आज-कल आज-कल करते करते दूसरा महीना भी बीत गया। मैंने पैसे मांगे तो नेता जी ने चुनाव के बाद हिसाब करने को बोला। मैं बहुत गिड़गिड़ाया लेकिन वो नहीं माना। इस दौरान नेता जी ने "चाय पर चर्चा" भी खूब की और इन महीनों में नेता जी ने खूब "मोदी टी स्टाल" लगवायी और "नमो चाय" मुफ्त में पिलाई। एक दिन में 5000-6000 रुपए की चाय मैं लोगों को पिलाने लगा। उसका रुपया नेता जी अपने खाते में चढ़वाते थे क्योंकि वो मोदी के नाम से "नमो चाय" जनता को मुफ्त पिलवाते थे।"
मैंने उत्सुकतावश पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया ने बताया कि, "इस दौरान एक सरकारी विभाग वाले आकर मुझसे हफ्ता मांगने लगे। क्योंकि ये सरकारी जगह थी। ये जगह नेता जी की नहीं थी। इस पर मैंने नेता जी का नाम लिया तो उन्होंने कहा कि, "वो क्या करेगा? ये जगह उसके बाप की नहीं, सरकारी है।" नतीजन मैंने उनको 50 रुपया दिन का हफ्ता देना शुरू कर दिया।"
मैंने पूछा, "फिर क्या हुआ?"
चाय वाले भैया का गला भर आया। वो फूट-फूट कर रोने लगा। "भाई साहब मेरे साथ धोखा हुआ है। मैं तो लुट गया।" मैंने उसे गले लगाया और समझाया। इस पर उसे थोडा तसल्ली मिली। लेकिन 2 पल की तसल्ली फिर से गम में बदल गयी। अपने उबड़-खाबड़ हाथों से उसने अचानक अपना चेहरा ढंका और फिर उसका दुःख उसके गले और आँखों से फूट पड़ा। नाक बहने लगी। नाक भी निचे तलक लटक आयी। मैंने अपना रूमाल निकाला और चाय वाले भैया का नाक पोंछा।
मैंने कहा, "इत्मीनान से बैठो भाई। मैं आपके साथ हूँ।"
चहेरे पर उसके बदले की आग और गुस्से के भाव साफ़ झलक आये। चाय वाले भैया बोले :-
"चाय मेरी, चीनी मेरी, पत्ती मेरी, पतीला मेरा, अदरक मेरी, इलायची मेरी, दूध मेरा, छलनी मेरी, चम्मच मेरी, गिलास मेरा, कप मेरा, गैस मेरी, महनत मेरी, खून मेरा, पसीना मेरा। सब कुछ पी गया ये "फलां-फलां" नेता और जनता को भी पिलाया। क़र्ज़ चढ़ा मेरे सर पे और मुफ्त चाय पिला कर भला बन रहा है ये नेता। भाई साहब मेरा तो सब कुछ लूट लिया मोदी और मोदी के कुत्तों ने।" (नोट : "कुत्ता शब्द चाय वाले के द्वारा इस्तेमाल किया गया है, जिसे आप तक पहुँचाना मेरा फ़र्ज़ है)
इस पर मैंने चाय वाले भैया से हिसाब-किताब पूछा। तो चाय वाले भाई ने अपनी पत्थर की बनी सीट पर पड़े एक मैले-कुचेले तकिये के निचे से एक फटी पुराणी कॉपी निकाल कर उसमें एक कपडे की कत्तर से बंधी हुई नेता के द्वारा लिखी गयी चाय की पर्चियां और कुल जोड़ा गया हिसाब मेरे सामने रख दिया।
बाप रे!
हिसाब देख कर तो मेरे पैरों तले की जमीन ही खिसक गयी। सवा 3 महीने का उधार 4 लाख 65 हज़ार 437 रुपया देख कर मेरे होंश उड़ गए।
बस मुझे तो मुद्दा चाहिए था और एक गरीब का भला करने का मौका। फर्क ये रहा कि मेरी आँख से आंसू निकले नहीं लेकिन कसर रही नहीं। लेकिन मेरी आँखों में भाजपा के उस छुटभैये नेता और मोदी के लिए गुस्से के लाल डोरे ज़रूर तैर रहे थे।
मैंने चाय वाले भैया की पीठ पर हाथ रखा और कहा आप चिंता मत करो मैं आपकी मदद करूँगा। ये मेरी जिम्मेवारी है।
इतना कह कर मैंने नेता जी के दरबार की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए। इस दौरान चाय वाल भैया थोडा घबराया लेकिन मैंने उसको हाथ से इशारा करके तसल्ली रखने को कहा। मुझे देख कर दूर खड़े मेरे साथी भी मेरे पीछे-पीछे नेता जी के दरबार की तरफ चले आये।
सबसे पहले मेरा सामना नेता जी के यहाँ भाड़े के टट्टुओं से हुआ, नेता जी से मिलने की इच्छा जाहिर करने पर एक टट्टू बोला : कहाँ से आये हो, क्या नाम है, "भाई साहब" से क्यों मिलना है। इस पर मैंने बड़े इत्मीनान से कहा कि भाई जी मेरा नाम "सतपाल तंवर" है और मैं "भाई साहब" का ही एक चाहने वाला हूँ। इस पर वो बोले "भाई साहब" तो मीटिंग में हैं, समय लग जायेगा... वो भाड़े के छछूंदर इतना बोल ही रहे थे कि सामने की गैलरी में से अपने बाल संभालती हुई, दुप्पटा ठीक करती हुई और अपना लाल रंग का सूट निचे की तरफ खींच कर "सामने" से "फ्रंट" का उभरा हुआ बैलेंस सही करती हुई एक मोटी सी-काली सी औरत आती दिखाई पड़ी। थोडा बहार की तरफ नजदीक आयी तो देखा नेता जी के भाड़े के छछूंदर उसकी तरफ हल्का-हल्का मुस्कुराते हुए बढे। ओर थोडा नजदीक आयी। तो मुझे समझने में दैर नहीं लगी। ये तो वाही औरत थी जो कभी गुड़गांव के सरकारी हस्पताल और नगर निगम कार्यालय के आसपास, कभी झाड़सा रोड पर और कभी मोर चौक के आसपास सरेआम ग्राहकों को लुभाती देखी जा सकती है। काफी बार रोड पर से गुजरते हुए मैंने उसे देखा है। एक टैम्पू ड्राइवर ने बताया था कि ये गुड़गांव की सबसे पुराणी "सेक्स वर्कर" है। मेरी तरफ एक नज़र देख कर वो बहार पहले से ही खड़े रिक्शॉ में बैठ कर निकल गयी।
फिर नेता जी के टट्टुओं में से एक टट्टू की आवाज मेरे कानों में गूंजी। वो बोल रहा था कि "भाई साहब" फ्री हो गए हैं। मेरे हाथ में उस टट्टू ने एक पर्ची थमाते हुए कहा कि आप इस पर्ची पर अपना नाम लिख दो। मैं "भाई साहब" को देकर आता हूँ। मैंने वैसे ही किया जैसा उस टट्टू ने कहा। वो 5 मिनट बाद बाहर निकल कर आया। अबकी बार उसकी भाषा में कुछ अखड़पन नहीं बल्कि आदर झलक रहा था। वो बोला कि सर आपको भाई साहब अंदर बुला रहे हैं। हम भी उस टट्टू के बताये अनुसार नेता जी के घोंसले की तरफ चल पड़े। सोफे पर बैठे नेता जी बड़े ही विनम्र स्वभाव से हाथ जोड़कर गले लग गए। बदले में हमने भी थोडा सा प्यार दिखाया और बैठ गए सोफे पर। नेता जी ने चाय का ऑर्डर दिया। बहार से चाय बनकर आ गयी। इस दौरान चाय भी पी और नेता जी से पहली मुलाक़ात थी तो उन्होंने भी उस चाय की प्याली को "नमो चाय" कहकर ही सम्बोधित किया। हमने भी चुपचाप सुना। इधर-उधर की बातें होने के साथ-साथ चुनाव का ज़िक्र चल ही पड़ा। हम तो बनकर गए थे चाय वाले भैया की आवाज। नेता जी तो हमसे वोट और सपोर्ट ही मांगने लग गए। मुझे भी मुद्दे पर आना था। बस 4 रुपए के हिसाब से 7 लोगों के 28 रुपए सामने पड़ी मेज पर डाल दिए। ये देखकर नेता जी थोडा सकपकाया। मैंने कहा उठाओ "भाई साहब".
नेता जी चौंकते हुए बोले, "ये क्या है?"
तो मैंने भी नेता जी को मतलब समझा ही दिया। 4 रुपए के हिसाब से हम 7 लोगों के 28 रुपए हुए। उस गरीब चाय वाले भैया को अभी ये रुपए पहुंचाओ। नेता जी बोले नहीं तंवर साहब आप हमारे घर आये हैं। आप महमान हैं। हम आपको चाय पिलायेंगे और तंवर आपको कैसे पता कि हम एक चाय के 4 रुपए देते हैं। इस पर मैंने नेता जी को जवाब दिया कि "भाई साहब" मुझे तो बहुत कुछ पता है। ये पोल कहीं जनता में न खुल जाये। इसलिए सबसे पहले ये 28 रुपया उठाकर चाय वाले के पास पहुंचाओ। हम आपके पास किसी गरीब की बद्दुआ लेने नहीं आये। आगे की बात बाद में करेंगे। पहले ये 28 रुपया चाय वाले तक पहुंचाओ। 
नेता जी के चहेरा थोडा सफ़ेद पड़ गया और बहार से अपने एक भाड़े के छछूंदर को आवाज लगाकर 28 रुपया उस चाय वाले के पास उसने भिजवा दिया। मैं वहाँ बैठा मन ही मन सोच रहा था कि चाय वाले भैया का थोडा होंसला तो बढ़ेगा। इतनी देर में नेता जी बोले "क्या हुआ तंवर साहब, पहली बार आये और नाराज़गी में आये।"
बस फिर क्या था। जो मन में आया वो बका। नेता जी तो नेता जी ठहरे। विरोध कर नहीं सकते थे। वोटों का लालच जो था। अब इसी की आड़ में मैंने भी नेता जी का कोई बहाना नहीं सुना और चाय वाले भैया का हिसाब फाइनल करने की तारीख मांग ली। काफी कुर-कुर करने के बाद भाजपा के उस मोदी समर्थक छुटभैये कुकडूं नेता ने 9 दिन बाद हिसाब का दिन मुक्करर कर दिया। इसी के साथ हम भी उठ खड़े हुए और चेतावनी देकर निकल चले। इतना भी कह दिया कि चाय वाले भैया का ख्याल रखना इसे कुछ हुआ तो आप जिम्मेवार होंगे।

अब दोस्तों 9 दिन बाद का इंतज़ार है। यदि भाजपा के उस छुटभैये नेता ने तय समय के अनुसार चाय वाले भैया का रुपया नहीं दिया तो उसका नाम मीडिया में उजागर करके उसकी पोल खोलनी है। बस आप इंतज़ार करियेगा और पढ़ते रहिएगा हरियाणा की माटी के लाल अपने भाई सतपाल को।
 
लेखक "नवाब सतपाल तंवर" 

Monday, January 13, 2014

बर्बर पूँजीवादी लूट को छिपाने के लिये भ्रष्टाचार के मुद्दे का इस्तेमाल


आप’ पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को कभी कठघरे में खड़ा नहीं करती। केजरीवाल ने एक कॉरपोरेट घराने के ‘काम करने के तरीकों’ पर सवाल उठाना शुरू किया था, लेकिन इस मुद्दे पर जल्द ही वह चुप्पी साध गये। बाकी कॉरपोरेट घरानों पर केजरीवाल ने कभी मुँह तक नहीं खोला। उल्टे पूँजीपति वर्ग को भी वह ‘विक्टिम’ और पीड़ित के रूप में दिखलाते हैं! अपने घोषणापत्र में केजरीवाल लिखते हैं कि काँग्रेस और भाजपा जैसी भ्रष्ट पार्टियों के कारण मजबूर होकर पूँजीपतियों को भ्रष्टाचार करना पड़ता है! यह दोगलेपन की इन्तहाँ नहीं तो क्या है? आप देख सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को किस प्रकार नंगी और बर्बर पूँजीवादी लूट को छिपाने के लिये इस्तेमाल किया गया है। पूँजीपति जो श्रम कानूनों का उल्लंघन करते हैं क्या वह मजबूरी के कारण करते हैं? ठेकाकरण क्या वह भ्रष्टाचार से मजबूर होकर करते हैं? यह तो पूरी तस्वीर को ही सिर के बल खड़ा करना है। वास्तव में, सरकार (चाहे किसी की भी हो!) और पूँजीपति वर्ग मिलकर मज़दूरों के विरुद्ध लूट और हिंसा को अंजाम देते हैं! केजरीवाल की इस महानौटंकी के पहले अध्याय के लिखे जाते समय ही दिल्ली के पड़ोस में मारुति सुजुकी के मज़दूरों का संघर्ष चल रहा था लेकिन केजरीवाल ने इस पर एक शब्द नहीं कहा; दिल्ली में ही मेट्रो के रेल मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी और ठेका प्रथा ख़त्म करने के लिये संघर्ष चल रहा था, इस पर भी केजरीवाल ने एक बयान तक नहीं दिया! क्या केजरीवाल को यह सारी चीज़ें पता नहीं है? ऐसा नहीं है! यह एक सोची-समझी चुप्पी है! मज़दूरों के लिये कुछ कल्याणकारी कदमों जैसे कि पक्के मकान देना आदि की बात करना एक बात है, और मज़दूरों के सभी श्रम अधिकारों के संघर्षों को समर्थन देना एक दूसरी बात। केजरीवाल कहीं भी पूरी पूँजीवादी व्यवस्था और पूँजीपति वर्ग पर हमला नहीं करते। उनके लिये पूँजीपति वर्ग शासक वर्ग नहीं है; मेहनतकश जनता तो ख़ैर शासक वर्ग है ही नहीं! तो फिर शासक वर्ग है कौन? यह एक भ्रष्ट राजनीतिक व नौकरशाह वर्ग है जो किसी वर्ग की नुमाइन्दगी नहीं करता, बल्कि अपनी ही सेवा में संलग्न है! और पूँजीपति वर्ग और मज़दूर वर्ग एक दूसरे के दुश्मन नहीं है, बल्कि वे दोनों ही पीड़ित वर्ग है; भ्रष्टाचारियों से पीड़ित! यहाँ भी आप देख सकते हैं कि असली सवाल को ढाँपने के लिये भ्रष्टाचार के जुमले का कैसे इस्तेमाल किया गया है। केजरीवाल के लिये इस पूरी व्यवस्था में कोई दिक्कत नहीं है! बस इसमें से भ्रष्टाचार के सफ़ाये की ज़रूरत है! अगर ग़रीबों को रोटी और रोज़गार नहीं मिलता तो यह पूँजीवादी व्यवस्था की समस्या नहीं है; पूँजीवादी व्यवस्था तो उन्हें रोटी और रोज़गार देती है, लेकिन वह भ्रष्टाचारियों के कारण उन तक पहुँच नहीं पाता! इसलिये समस्या आपूर्ति की है! केजरीवाल इस समस्या को कैसे दूर करेंगे? एक साक्षात्कार में वह कहते हैं कि पटेल जैसी राजनीति करके; शास्त्री जैसी राजनीति करके! नेहरू का नाम सोचे-समझे तौर पर इस सूची से ग़ायब है। समझने वाले समझ सकते हैं कि क्यों!

इस समूचे आदर्शवादी भ्रष्टाचार-विरोध का मिश्रण किया जाता है अन्धराष्ट्रवादी जुमलों के साथ। ‘आप’ का एक चुनाव उम्मीदवार एक सैनिक था, जो कि सीमा पर झड़प में विकलाँग हो गया था। उससे केजरीवाल ने कहा कि आप अब तक देश के बाहर के आतंकवादियों से लड़ रहे थे, अब आप ‘आप’ की ओर से चुनाव लड़कर देश के भीतर के आतंकवादियों के विरुद्ध लड़िये। यह पूरी जुमलेबाज़ी और भाषा एक दक्षिणपंथी अन्धराष्ट्रवाद की है। इसमें वास्तविक मुद्दों और सच्चाइयों को आदर्शवादी, अन्धराष्ट्रवादी और प्रतिक्रियावादी जुमलों के तहत छिपा दिया गया है।
आप’ तृणमूल और भागीदारीपूर्ण जनवाद की बात करती है। ‘आप’ का कहना है कि वह सत्ता में आयेगी तो स्थानीय विकास कार्यों आदि को लेकर मोहल्ला सभाओं को सारे अधिकार दे देगी। यह एक राजनीतिक जनवाद की बात है। लेकिन अगर मौजूदा सम्पत्ति सम्बन्धों, असमानतापूर्ण सामाजिक-आर्थिक सम्बन्धों को और उत्पादन के साधन पर मालिकाने और नियन्त्रण तक पहुँच के सम्बन्धों को छेड़े बग़ैर मोहल्लों में सभाएँ बनाकर उन्हें नियन्त्रण सौंप भी दिया जाये, तो अन्ततः उसमें किन लोगों की चलेगी? ज़ाहिर सी बात है, मोहल्लों में रहने वाले ठेकेदारों, दल्लों, छुटभैया मालिकों, पैसे वालों, और अमीरों की ही चलेगी! आम ग़रीब और निम्न मध्यवर्गीय आबादी उनके पीछे-पीछे चलेगी। ऐसे में, यह राजनीतिक जनवाद का अधिकार भी अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता जब तक कि आर्थिक सम्बन्धों को भी आमूल-चूल रूप में न बदला जाये! लेकिन ‘आप’ तो इन सम्बन्धों को किसी भी तरह से बहस और चर्चा से दूर रखना चाहती है!

आप’ की पूरी राजनीति वास्तव में देश की आम मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी की समस्याओं के मूल कारणों को छिपाने और ढँकने का काम ज़्यादा करती है। इसके लिये जिस उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है वह है भ्रष्टाचार-विरोध, देश-सेवा आदि के नाम पर की जाने वाली प्रतिक्रियावादी, दक्षिणपंथी राजनीति। ‘आप’ एक ऐसी पूँजीवादी व्यवस्था की हिमायत करती है जिसमें कोई भ्रष्टाचार न हो, सभी नागरिक सम्भावित उद्यमी हों, मुक्त व्यापार और मुक्त प्रतिस्पर्द्धा हो, उपयुक्ततम की उत्तरजीविता हो, और यह सारा क्रिया-व्यापार अपनी सैद्धान्तिक शुद्धता में चले! यह एजेण्डा आज के दौर में एक तकनोशाहाना कुशलता वाले उद्यमी पूँजीवाद का सपना दिखाता है जो कि उद्यमी बनने की आकाँक्षा रखने वाले टुटपुँजिया वर्गों को आकृष्ट करता है। ज़ाहिर है, यह एक शेखचिल्लीवादी सपना है जो कभी पूरा नहीं हो सकता। लेकिन इसी रूप में इस राजनीति का चल पाना बहुत मुश्किल है। इसके कारणों की चर्चा हम ‘आप’ के घोषणापत्र के मुद्दों के चरित्र और उसके सामाजिक आधार के चरित्र के द्वारा कर सकते हैं।

आप’ का क्या होगा, जनाबे-आली!

आप’ आज भारतीय पूँजीवाद की ज़रूरत है। लेकिन ‘आप’ का पूरा राजनीतिक घोषणापत्र, माँगपत्रक और यहाँ तक कि उसका सामाजिक आधार मूलतः योगात्मक (एग्रीगेटिव) है; यानी कि उनमें कोई जैविक एकता नहीं है। ‘आप’ ने उच्च मध्यवर्गीय प्रतिक्रियावाद के वर्चस्व को निम्न मध्यवर्गीय आदर्शवाद पर स्थापित किया और एक ऐसा माँगपत्रक तैयार किया है जो कि प्रकृति से ही एक योगात्मक समुच्चय है और उसके पीछे कोई एक सुसंगत विचारधारात्मक दृष्टि नहीं है। अगर ‘आप’ पार्टी इनमें से कुछ मुद्दों और वायदों पर ही अमल शुरू करती है, तो एक ओर ‘आप’ पार्टी के भीतर ही टूट-फूट और बिखराव की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी, वहीं उसके सामाजिक आधार में भी बिखराव शुरू हो जायेगा। मिसाल के तौर पर, ‘आप’ ने छोटे मालिकों और व्यापारियों को ‘सरकार द्वारा वसूली’ और भ्रष्टाचार से छूट दिलाने का वायदा किया है; यही कारण है कि छोटे मालिकों और व्यापारियों के वोट बड़े पैमाने पर ‘आप’ को मिले। लेकिन साथ ही, ‘आप’ ने ठेका प्रथा समाप्त करने और दिल्ली के साढ़े तीन लाख ठेका कर्मचारियों को स्थायी करने का वायदा भी किया है। लेकिन इन साढ़े तीन लाख ठेका कर्मचारियों की मेहनत को ही लूटने का काम तो ये छोटे मालिक और ठेकेदार सबसे ज़्यादा करते हैं। ठेका प्रथा का अगर कोई सबसे बड़ा लाभप्राप्तकर्ता है, तो वह छोटा मालिक और ठेकेदार वर्ग है। स्पष्ट है कि ये दोनों वायदे अन्तर्विरोधी हैं और इन पर अमल के साथ ही छोटा मालिक वर्ग ‘आप’ का साथ छोड़कर निरंकुश तरीके से भूमण्डलीकरण, निजीकरण, ठेकाकरण की नीतियों को लागू करने वाली फासीवादी ताक़तों के पक्ष में जा खड़ा होगा।

उसी प्रकार ‘आप’ का यह वायदा कि वह बिजली के बिल आधे कर देगी एक ही सूरत में सम्भव है। वह यह है कि विद्युत वितरण का निजीकरण समाप्त किया जाय और उसके बाद भी सरकारी ख़ज़ाने से पर्याप्त सब्सिडी दी जाय। उसी प्रकार हर दिन हर नागरिक को 700 लीटर मुफ़्त पानी भी तभी दिया जा सकता है, जब सब्सिडी दी जाय। ऐसी सब्सिडी देने के लिये राजस्व सिर्फ़ भ्रष्टाचार ख़त्म करने से आ ही नहीं सकता है। यह केवल कर का बोझ दिल्ली के अमीरज़ादों पर डालकर ही सम्भव है, क्योंकि मेहनतकश आबादी पर प्रत्यक्ष करों का बोझ डाला ही नहीं जा सकता है और अप्रत्यक्ष कर पहले से ही काफ़ी ज़्यादा हैं। ऊपर से, ‘आप’ वैट को भी ख़त्म करने की बात कर रही है। अगर कराधान का बोझ दिल्ली के उच्च मध्यवर्ग पर बढ़ता है, तो वह भी जल्द ही ‘आप’ से छिटक जायेगा।

स्पष्ट है, अगर ‘आप’ अपने वायदों के 20 प्रतिशत पर भी अमल करती है, तो उसके संगठन और सामाजिक आधार का बिखराव शुरू हो जायेगा। ऐसे में, या तो ‘आप’ खुलकर पूँजीवादी व्यवस्था और खुली उदारवादी नीतियों के समर्थन में खड़ी होगी, जिस सूरत में वह अप्रासंगिक हो जायेगी क्योंकि यह काम करने वाली मुख्य धारा की पूँजीवादी पार्टियाँ पहले से मौजूद हैं; या फिर, उसका हश्र वही होगा जो जनता पार्टी का हुआ थाः वह खण्ड-खण्ड हो जायेगी और उसके ज़्यादातर धड़े अन्ततः मोदी के फासीवादी उभार के साथ जा खड़े होंगे। ‘आप’ का भविष्य फिलहाल इसी रूप में दिख रहा है, बशर्ते कि वह अपने मुख्य राजनीतिक मुद्दे भ्रष्टाचार को छोड़कर काँग्रेस, भाजपा जैसी ही एक चुनावी पार्टी न बन जाये। मौजूदा राजनीतिक माँगपत्रक और घोषणापत्र के साथ इसी रूप में यह पार्टी बनी नहीं रह सकती है क्योंकि उसका योगात्मक चरित्र इस बात ही इजाज़त ही नहीं देता है।

लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि आज भारतीय पूँजीपति वर्ग के लिये ‘आप’ की प्रासंगिकता नहीं है। वास्तव में, पूँजीवादी राजनीति और अर्थव्यवस्था जिस संकट से गुज़र रही है और विश्वसनीयता का संकट जिस हद तक जा पहुँचा है, उसमें ‘आप’ की सख़्त ज़रूरत है। यह पूँजीवादी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किये बग़ैर जनता के गुस्से को निकलने का एक सुरक्षित ‘आउटलेट’ देती है। इस रूप में ‘आप’ आज एक नये अर्थ और रूप में वही भूमिका निभा रही है जो एक दौर में जेपी आन्दोलन और फिर जनता पार्टी ने निभायी थी।

जैसा कि हम पहले इंगित कर आये हैं, ‘आप’ के उभार में योगेन्द्र यादव और आनन्द कुमार जैसे समाजवादी मदारी जो भूमिका निभा रहे हैं, वह वास्तव में वही भूमिका है, जो कि पूँजीवादी व्यवस्था को संकट के दौर में बचाने के लिये सभी समाजवादी (हर ब्राण्ड के!), सुधारवादी और संशोधनवादी निभाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि ‘आप’ जैसी किसी भी परिघटना की प्रासंगिकता उसी रूप में दीर्घकालिक नहीं हो सकती है। या तो वह अपना रूप बदलकर पारम्परिक चुनावी पूँजीवादी पार्टी बनकर किसी हद तक कायम रख सकती है, या फिर उसकी नियति में बिखराव होता है। ऐसे बिखराव के बाद कुल मिलाकर फायदा फासीवादी राजनीति को ही पहुँचता है। जैसा कि जनता पार्टी के बिखराव के बाद हुआ था। भारत में चुनावी राजनीति के दायरे में सही मायने में दक्षिणपंथी उभार के लिये तो जयप्रकाश नारायण और उसके लग्गू-भग्गुओं को ही दोषी ठहराया जाना चाहिए, जिसने ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का भ्रामक नारा देकर जनता की क्रान्तिकारी ऊर्जा को सुरक्षित चैनलों में दिशा-निर्देशित कर दिया और अन्ततः यह सबकुछ दक्षिणपंथी फासीवादी राजनीति के पक्ष में जा खड़ा हुआ।

इसलिये ‘आप’ की पूरी परिघटना में कुछ भी अनोखा और नया नहीं है। आज के पूँजीवादी संकट के दौर में आदर्शवादी, प्रतिक्रियावादी मध्यवर्गीय राजनीति का पूँजीपति वर्ग द्वारा इस्तेमाल किया जाना लाज़िमी है। पूँजीवादी संकट विद्रोह की तरफ़ न जा सके, इसके लिये पूँजीपति वर्ग हमेशा ही टुटपुँजिया वर्ग के आत्मिक व रूमानी उभारों का इस्तेमाल करता रहा है। कभी यह खुले फासीवादी उभार के रूप में होता है, तो कभी ‘आप’ जैसे प्रच्छन्न, लोकरंजकतावादी प्रतिक्रियावाद के रूप में। और अन्त में उसकी नियति भी वही होती है जिसकी हमने चर्चा की है।

अब यह देखना काफ़ी मनोरंजक और दिलचस्प होगा कि यह पूरी प्रक्रिया कैसे घटित होगी।
(समाप्त)

अभिनव सिन्हा, लेखक “मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आव्हान पत्रिका के संपादक हैं।

Monday, October 22, 2012

अगर सर्वोच्च न्यायलय क़ानून का पालन नहीं करेगा तो न्याय पाने का क्या रास्ता बचेगा?


कानून के मुताबिक अगर कहीं कोई जुर्म हो तो एक नागरिक को उसकी जानकारी तुरंत पुलिस को देनी चाहिए ! क़ानून आगे कहता है की पुलिस अधिकारी तुरंत उस नागरिक द्वारा दी गयी सूचना को लिखेगा ! यही सूचना ऍफ़आईआर मानी जायेगी ! अगर वहाँ कोई पुलिस अधिकारी नहीं है या वह ऍफ़आईआर लिखने से इनकार  करता है तो वह नागरिक जुर्म की सूचना निकट के मजिस्ट्रेट को देगा ! मजिस्ट्रेट तुरंत पुलिस को इस सूचना से अवगत कराएगा और उसे मामले की जांच कर के अदालत के सामने पेश करने के लिए कहेगा !

अगर कोई मेरा हाथ तोड़ दे ! और मैं इसकी सूचना किसी पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को दूं तो वह एक डाक्टर से मेरे हाथ की जांच करवाएंगे ! जांच में अगर मेरे हाथ की हड्डी टूटी हुई होगी तो जिस पर मैंने इलज़ाम लगाया है उसे गिरफ्तार किया जाएगा और उसे अदालत के सामने पेश किया जायेगा !

सोनी सोरी ने नाम लेकर कहा की अंकित गर्ग जो की दंतेवाडा का एस पी है उसने आठ अक्टूबर की रात को दंतेवाडा थाने के नए भवन में मुझे निवस्त्र किया , मुझे पैर के तलवों में बिजली का करेंट लगाया और मेरे शरीर के भीतर यह सब भर दिया ! सुप्रीम कोर्ट ने कोलकता मेडिकल कालेज से जांच का आदेश दिया ! जांच में सोनी सोरी के आरोप सही पाए गए ! डाक्टरों ने सोनी सोरी के गुप्तांगों से पत्थर के टुकड़े निकाल कर सर्वोच्च न्यायलय को अपनी रिपोर्ट के साथ भेज दिए ! इसके अलावा दंतेवाडा अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट में भी सोनी के तलवों में काले निशान दर्ज़ हैं इसलिए सोनी के आरोपों की पुष्टि दो दो अस्पतालों ने कर दी !

इसके बाद कानूनन जज को एस पी अंकित गर्ग को गिरफ्तार करने और और उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश देना चाहिए था ! 

सोनी सोरी के साथ एक जुर्म हुआ ! उसने देश के सबसे बड़े मजिस्ट्रेट अर्थात सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को इसके बारे में बताया ! जज ने डाक्टर से  की इसकी जांच करने के लिए कहा ! डाक्टर ने सोनी सोरी के इल्जामों को सच पाया ! जज के पास जुर्म के सम्बन्ध में और इस सूचना के बारे में विश्वास करने के काफी पक्के सबूत भी आ गए हैं की उसके सामने की गयी शिकायत में आगे जांच किये जाने की ज़रुरत है ! लेकिन आज तक जज ने इस मामले में आगे जांच करने का आदेश क्यों नहीं दिया ?

हमें कोई यह समझाए की इस देश का सर्वोच्च न्यायलय अगर बुनियादी क़ानून का पालन नहीं करेगा तो लोगों के पास न्याय पाने का क्या रास्ता बचेगा ?
क्या क़ानून में यह देख कर न्याय किया जाता है की सामने कौन खड़ा है ? नहीं ! क़ानून की आँखों पर पट्टी बंधी रहती है ! क़ानून के हाथ में तराजू रहता है जिसमे वह सबूतों को तौलता है और इन्साफ कर देता है !

क्या सोनी की जगह कोई दिल्ली की बड़ी जाति की लडकी के गुप्तांगों में कोई पुलिस आफिसर ऐसे ही पत्थर भर देता तो सुप्रीम कोर्ट का यही रुख रहता जो उसका सोनी सोरी के प्रति है ? क्या मीडिया ऐसे ही खामोशी अख्तियार करता जैसे अभी है ? क्या महिला आयोग तब भी ऐसे ही चुप होकर केस बंद कर के बैठ जाता

अगर हम आदिवासियों के साथ ऐसे ही अन्याय करने के मामले में एकमत हो गए हैं ! अगर हमने तय ही कर लिया है की हमारी अदालत, सरकार , मीडिया आदिवासियों के लिए नहीं है ! उनकी महिलाओं के साथ हमारा यह व्यवहार हमें स्वीकार है तो माफ़ कीजियेगा अपने आज़ाद मुल्क होने और इस देश के सब लोगों को सामान मानने के अपने दावे के झूठ को स्वीकार कीजिये और मानिए की हम अभी भी एक राष्ट्र नहीं बने हैं ! नागरिकों की समानता अभी हमारे मन और व्यवहार में नहीं है और हम जानते ही नहीं हैं की असल में देश किसे कहते हैं और देश भक्ति क्या होती है !
झंडे की जय और सेना की जय ही देश भक्ति नही होती बल्कि यह उससे कहीं ज्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी का नाम है !देश का मतलब पुलिस सेना और झंडे के साथ साथ यहाँ के करोड़ों लोग भी होते हैं ! और ये करोड़ों लोग हैं दलित , आदिवासी ,मजदूर , मेहनतकश औरतें और गाँव वाले  !

मुझे कहने दीजिये की अपने देश के लोगों के बारे में हमारी यह सोच इस देश की एकता के लिए असली खतरा है !

Monday, September 03, 2012

सात साल की सुप्रिया को महज 25 रूपये में बेच डाला एक मां ने…


संसद में लाखों करोड़ के कोयला घोटाले का शोर है. ट्विटर पर करीब 50 लाख करोड़ के थोरियम की चोरी के चर्चे हैं. और पश्चिम बंगाल में एक मां ने अपनी तीन बेटियों को मात्र 155 रुपये में बेच दिया. ये भारत का सच है. वो सच जिससे लाख चाहकर भी हम नज़र नहीं फेर सकते.
30 साल की पूर्णिमा हल्दर का पति शराबी है. शराबी पति ने 15 दिन पहले पूर्णिमा और तीन बेटियों को घर से निकाल दिया था, जिसके बाद से वो दर दर भटक रही थी. कई दिन की भूख जब तड़प बन गई तो इस मां की ममता मर गई और उसने बेटियां बेचकर भूख शांत की. बेटियां बेचने की बात पूर्णिमा ने कोलकाता के डायमंड हार्बर रेलवे स्टेशन पर खोमचे वालों को बताईं. खोमचे वालों ने यह जानकारी पुलिस को दी. फिलहाल पुलिस ने तीनों लड़कियों को बरामद और पूर्णिमा के पति को गिरफ्तार कर लिया है.

जिस देश में कोयला लाखों करोड़ का बिक रहा हो, वहां बेटियों की कीमत कितनी सस्ती है इसका अंदाजा आपको पूर्णिमा की बेटियों की कीमत सुनकर लग जायेगा. इस भूखी मां ने साढ़े तीन साल की अपनी छोटी बेटी रमा को 33 रूपये में, सात साल की सुप्रिया को महज 25 रूपये में सबसे बड़ी बेटी 9 साल की प्रिया को 100 रूपये में बेच दिया. यानि 3 बेटियों के बदले पूर्णिमा को 155 रूपये मिले.
हालांकि सरकारी महकमा ने महिला के तंगहाली के दावे को खारिज किया है. दक्षिणी 24 परगना के ज़िलाधिकारी ने कहा कि ‘हम यह जांचने की कोशिश कर रहे हैं कि इस घटना के लिए कौन से कारण ज़िम्मेदार हैं.’ बहरहाल, कोलकाता की ये घटना कोई नहीं है. इससे पूर्व भी इस तरह के कई घटना इस देश में घटित हो चुके हैं.
आज से ठीक एक महीना पूर्व झारखंड के मनोहरपुर में गरीबी से तंग आकर एक मां द्वारा अपने जुड़वा बच्चों को बेचने का मामाला प्रकाश में आया था. अगस्त महीने में ही राजस्थान के श्रीगंगानगर में आठ दिन के एक मासूम बच्चे को उसके मां-बाप ने इसलिए बेच दिया क्योंकि उनके पास अपने दूसरे बेटे के इलाज के लिए पैसे नहीं थे. जुलाई के महीने में बिहार के अररिया जिले के फारबिसगंज में सुशासन और विकास के दावे करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज में गरीबी से मजबूर एक मां ने अपने दूधमुंहे बच्चे को महज़ 62 रुपये में बेच दिया था. वहीं पिछले महीने बेंगलुरू में एक मां अपने अजन्में बच्चे को बेचने के लिए मजबूर थी. मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक शोभा नामक महिला बच्चे के लिए खरीददार खोज रही थी. क्योंकि शोभा के पास अपने बच्चे के पालन पोषण के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए वह ऐसे खरीददार की तलाश कर रही थी, जो उसके अजन्में बच्चे को सही पालन-पोषण दे सके.
ऐसे न जाने कितने मामले हर महीने मीडिया के माध्यम से प्रकाश में आते हैं. और न जाने उससे कई गुना अधिक दब जाते हैं, जिन पर मीडिया या किसी की भी नज़र नहीं पड़ती.
आज़ादी के 65 वर्ष पूरे होने के बाद भी देश में एक लाख से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है. आज भी लगभग 30 प्रतिशत भारतीय निर्धनता की रेखा तले जीते हैं. लाखों को दो जून की रोटी भी नहीं मिल पा रही है. करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं. आज भी स्कूल, चिकित्सा, मकान और अन्य बुनियादी सुविधाओं से करोड़ों लोग वंचित हैं.
आखि़र यह कैसी विडंबना है. लोकतंत्र का आधार मानव जीवन का मूल्य और व्यक्तियों के बीच समानता को माना जाता है, किन्तु हमारा सामाजिक जीवन और चिंतन आज भी सामंतवादी हैं. आज भी मनुष्य के जीवन की अलग-अलग कीमतें लगती हैं. कहीं एक बच्चे का प्रतिदिन का खर्च 500 रूपये है तो कहीं मात्र 25 रूपये में गरीब माएं अपने बच्चे को बेच डालती हैं.
यह जीवन के अलग रंग हो सकते हैं लेकिन सबसे बुनियादी सवाल यही है कि जब संसद में पौने दो लाख करोड़ रुपये के घोटाले की गूंज होती है. ट्विटर पर 50 लाख करोड़ के थोरियम घोटाले का शोर होता है तब देश का भविष्य चंद सिक्कों में बिक जाता है? आखिर ऐसा क्यों हैं? क्यों भारत में जीवन इतना सस्ता और घोटाले इतने महंगे हैं? सबसे बड़ा सवाल यह  है कि भूख और गरीबी की भट्टी में तप रहे लोगों के हिस्से का कोयला कहां हैं? आपके पास कोई जवाब हो तो जरूर दीजियेगा… मुझे तो यह संसद के शोर में दिख रहा है.

Wednesday, March 28, 2012

बाजार की गिरफ़्त में मीडिया



आज पूरी दुनियाँ पर बाजारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाजार बहुत ही तेजी के साथ समस्त संसाधनों पर अपना कब्जा जमाता जा रहा है। चाहे वह प्राकृतिक संसाधन हो या गैर प्राकृतिक हो। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाजार की गिरफ़्त में आ गए हैं यहाँ तक की इंसान भी बाजार की एक वस्तु मात्र बनकर रह गया है।

पूँजीवादी सभ्यता ने साहित्य, कला, संस्कृति यहाँ तक की ज्ञान को भी बाजार की वस्तु बनाकर रख दिया है। दुनिया के सामने सच की तस्वीर रखने का दावा करने वाली हमारी मीडिया, समाचार पत्र भी आज बाजार की गिरफ्त में आ गए हैं। कभी-2 तो ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता पत्रकारिता न होकर पूँजीपतियों और सरकारों की चाटुकारिता करती नजर आती है। खास तौर से भारत की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा शोषकों और साम्राज्यवादी ताकतों की ही वकालत करता दिखाई देता है। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि आज की पत्रकारिता इन्हीं पूँजीपतियों, भ्रष्टाचारियों और जमाखोरों के विज्ञापन के बलबूते जीवित है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि आज का प्रकाशक, सम्पादक और पत्रकार जनसेवक नहीं अपितु वह देश के बड़े अमीरों की कतार में खड़ा होना चाहता है। आज का प्रकाशक, सम्पादक व मीडिया कर्मी यह पूरी तरह से भूल गया है कि पत्रकारिता के मायने क्या होते हैं और पत्रकारिता किसे कहते हैं।

भूमण्डलीकरण के इस वर्तमान दौर में भारतीय पत्रकारिता ने बाजार की शक्तियों के सामने घुटने टेक दिए हैं वैसे तो भारतीय पत्रकारिता का दायरा बहुत बड़ा है। यही नहीं भारत में तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ भी कहा जाता है। इसके बावजूद भी भारतीय पत्रकारिता पूरी ईमानदारी के साथ जनहित में खड़ी होती नजर नहीं आती। पूरा मीडिया जगत जनसरोकारों की जगह बाजार से सरोकार रखने लगा है। अंग्रेजी पत्रकारिता तो तमाम सामाजिक सरोकारांे और नैतिक मूल्यों से पल्ला झाड़कर सीधे-2 बाजार से जुड़ गई है। लेकिन वर्तमान समय में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार भी अंग्रेजी पत्रकारिता के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं और इसके चलते उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गई है। भूमण्डलीकरण और साम्राज्यवादी नीतियों के चलते भारत के आम आदमी का जीवन कष्टों का पर्याय बन गया है। इससे इनका कोई नाता नहीं है। साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ संघर्षरत श्रमिकों, किसानों व जन सामान्य के कष्टों से उदासीन हमारे भारतीय भाषाओं के बड़े कहे जाने वाले अखबार आम जनता के संघर्ष से कहीं भी जुड़े हुए दिखाई नहीं देते। सत्तासीन राजनैतिक पार्टियों के जोड़-तोड़ की राजनीति में ही मशगूल हैं। जनता के दर्द से इनका कोई भी लेना देना नहीं रह गया है।

जहाँ तक क्षेत्रीय अखबारों का प्रश्न है वे अपनी साधन हीनता के चलते अपने अस्तित्व को ही बचाने में लगे रहते हैं लेकिन अब इन अखबारों के प्रकाशकों के अंदर भी बाजारवादी मानसिकता घर करने लगी है जो कभी परिवर्तन कामी आन्दोलनकारी भूमिका निभाने की इच्छा रखते थे। अब यह भी बाजार के रंग में रंगने लगे हैं। वर्तमान समय में इन अखबारों के प्रकाशक और पत्रकार स्थानीय व्यापारियों, माफियाओं, सांसदों, मंत्रियों, और छुट-भइये नेताओं के विज्ञापन के नाम पर मोटी रकम काटने के चक्कर में इनकी दलाली व चापलूसी करते फिरते हैं। स्थानीय स्तर पर फूट रहे जन-आन्दोलनों और संघर्षों की रिर्पोटिंग न के बराबर ही करते हैं। यदि करते भी हैं तो आलोचनात्मक रिर्पोटिंग करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि यह जन आन्दोलनों को उत्साहित करने की जगह हतोत्साहित करते नजर आते हैं। भारत जैसे देश में, जिसे कृषि प्रधान देश कहा जाता है, जिस देश की 60 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है उस देश में लगभग 40 हजार किसानों ने पिछले एक दशक के अंदर आत्महत्याएँ कर लीं। बेरोजगारी की मार से आज का शिक्षित युवा वर्ग आत्महत्या करने को विवश है, आई।टी. जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आज देश में शिक्षा का निजीकरण दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का व्यक्तिगत क्षेत्र में विलय होता जा रहा है लेकिन वर्तमान समय में पूरे देश की मीडिया मौन खड़ी है। आज जनता शासक वर्ग के खिलाफ दिनों दिन हथियार उठाती जा रही है। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें अपने दमनात्मक अभियानों से उन जन आन्दोलनों को कुचलने का असफल प्रयास कर रही हैं। फिर भी ये जन आन्दोलन दिनो दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह बात जुदा है कि आज का जन आंदोलन संगठित न होकर अनेक धाराओं में बँटा हुआ है और जनता का भारी समर्थन जुटाने में असफल है। इसके पीछे शासक वर्ग द्वारा मीडिया के माध्यम से किया जा रहा दुष्प्रचार, ज्यादा कारगर साबित हुआ, क्योंकि मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा, केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, पूँजीपतियों व साम्राज्यवादी ताकतों से संचालित होता है और शासक वर्ग यह कभी नहीं चाहता है कि उसके खिलाफ खड़ा हो रहा कोई भी जन आन्दोलन मजबूत हो और उनकी शोषण परक व्यवस्था को नेस्तानाबूद कर जनता के लिए एक शोषण विहीन शासन व्यवस्था का निर्माण करे इसके लिए देश में जन सरोकारी मीडिया की अत्यन्त आवश्यकता है जो बाजार के चंगुल से मुक्त हो, जो जनता के अधिकारों के लिए काम करे, जो मानवीय संस्कृति, साहित्य, कला और शिक्षा का निर्माण करे और व्यापक जनता के पक्ष में खड़ी होकर जनपक्षधरता की बात करे, एक जनसंस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा करे। सही मायने में वही पत्रकारिता एक श्रेष्ठ पत्रकारिता होगी जो वास्तव में मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त कर एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करने में अपनी महती भूमिका अदा करेगी।

Friday, June 10, 2011

बाबा रामदेव पर भ्रष्टाचार का नवग्रह

बाबा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों में से नौ को यहाँ  प्रस्तुत किया जा रहा है....

1.
हरिद्वार कोतवाली में हुआ मामला दर्ज-  यह वर्ष 2002-2003 की बात है जब स्वामी रामदेव का हरिद्वार के अधिवक्ता से विवाद हो गया था। यह विवाद शंकर देव आश्रम में कब्जे को लेकर हुआ था। जिसमें स्वामी रामदेव ने बाली नामक एक अधिवक्ता के सर पर भारी प्रहार कर दिया था। बाद में लहूलुहान अधिवक्ता ने कोतवाली हरिद्वार में स्वामी रामदेव पर जान से मारने की नीयत से हमला करने का मामला दर्ज कराया।

2. श्रमिकों का शोषण -हरिद्वार स्थित दिव्य योग ट्रस्ट जिसके सर्वेसर्वा स्वामी रामदेव हैं, उन दिनों चर्चा में आई जब दिव्य योग फार्मेसी में श्रमिकों को बाहर का रास्ता दिखाया गया । इस प्रकरण की शुरूआत 5 मई 2005 में जब हुई तब स्वामी रामदेव के भाई राम भारत ने दिव्य फार्मेसी के उन 90 श्रमिकों को सेवामुक्त कर दिया जो न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे थे। मजदूरों का 16 दिन तक हरिद्वार स्थित कलक्ट्रेट परिसर में धरना प्रदर्शन चला। 21 मई 2005 को श्रमिकों से समझौता कर धरना खत्म करवा दिया गया। समझौते के तहत फार्मेसी में 5 मई 2005 से पूर्व की स्थिति बहाल कर दी जायेगी। साथ ही किसी भी कर्माचरी के खिलाफ बदले की भावना के अंतर्गत कोई कार्रवाही नहीं की जायेगी। लेकिन मजदूर तब सकते में आ गए जब अगले ही दिन उन्होंने फार्मेसी के गेट पर ताला जड़ा देखा। इसके बाद वर्षों तक कई बार मजदूरों ने आंदोलन किया लेकिन उन्हें आज तक दिव्य योग फार्मेसी में नौकरी पर बहाल नहीं किया गया। कई मजदूरों की हालत बेहद खस्ता हाल हो गई और वे सड़कों पर आ गए। अपने जीवनयापन के लिए वे सब्जी की ठेलियां लगाने पर मजबूर हुए।

3. सुधीर के परिवार का उत्पीड़न -मजदूर हितों की बात करने वाले तथा आश्रम संबंधी सच को कहने वाले सुधीर के विरुद्ध झूठे आरोप लगाकर उसे तथा उसके परिवार को उत्पीड़ित किया गया। सुधीर का कसूर यह भी था कि वह दिव्य योग ट्रस्ट के संस्थापकों में से एक रहे आचार्य करमवीर का रिश्तेदार था। जिसका खामियाजा उसे झूठे मुकदमे और पुलिस तथा गुण्डों के खौफ से भुगतना पड़ा। दिव्य योग  फार्मेसी के मैनेजर पद पर रहे सुधीर पर स्वामी रामदेव की हत्या का षड्यंत्र जैसे संगीन आरोप लगाए गए जो बाद में सिद्ध नहीं हो सके। स्वामी रामदेव पर आरोप हैं कि उन्होंने गुंडों को  पुलिसवर्दी में सुधीर के घर तोड़फोड़ करने के लिए भेजा। भयभीत सुधीर और उसके परिजनों को घर छोड़कर भागना पड़ा था।

4. दवाओं में मानव खोपड़ी का इस्तेमाल -स्वामी रामदेव की दिव्य योग फार्मेसी में कई सनसनीखेज खुलासे हुए। जिनमें मिर्गी के इलाज के लिये तैयार होने वाली कुल्या भस्म में मानव खोपड़ी के चूर्ण के इस्तेमाल सहित वन्य जीव उदबिलाव के अण्डकोष को यौन शक्ति बढ़ाने वाली दवाई यॉवनावृत वटी में मिलाया जाता था। इसके अलावा दमा की बीमारी में काम आने वाली  शृंगभस्म में हिरण और बारहसिंगा के सींग का चूर्ण मिलाए जाने की भी चर्चा रही। दिव्य योग  फार्मेसी के मजदूरों ने केवल इसका खुलास किया बल्कि उन्होंने फार्मेसी से हिरण के सींग और  उदबिलाव के अण्डकोष तक मीडिया के समक्ष प्रस्तुत किए। बाद में इस मुद्दे को लेकर वन्य जीव प्रेमी मेनका गांधी और माकपा सांसद वृंदा करात सामने आई। लेकिन वोट बैंक की राजनीति के बाद में दोनों इस मामले के प्रति उदासीन हो गई।

 5. भाई-भतीजावाद  -हरिद्वार में दिव्य योग ट्रस्ट के तत्कालीन उपाध्यक्ष आचार्य करमवीर ने जब दिव्य योग  फार्मेसी में हो रही अवैध गतिविधियों और परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 28 मार्च 2005 को जारी एलआईयू हरिद्वार की एक रिपोर्ट में बाकायदा इसका खुलासा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार स्वामी रामदेव ने अपने भाई रामभारत को फार्मेसी प्रमुख बनाया तथा बहनोई डॉ  यशदेव शास्त्री को ऋषि आफसेट प्रिंटिंग प्रेस बनाकर दी। रामदेव अपने परिजनों को दिव्य योग फार्मेसी तथा अन्य संस्थानों में लाकर स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। इससे आश्रम के अन्य लोगों खासकर आचार्य करमवीर में खासा रोष है।

6. ‘दि संडे पोस्टपर मुकदमा - आश्रम संबंधी सच सामने लाने से नाराज होकर दिव्य योग ट्रस्ट की तरफ से वर्ष 2005 में दि संडे पोस्टके खिलाफ भारतीय प्रेस परिषद में मामला दर्ज कराया गया था। इसके चलते 14 सितंबर 2005 को भारतीय प्रेस परिषद की सचिव विभा भार्गव ने दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट बनाम दि संडे पोस्टका नोटिस भिजवाया। जिसमें समाचार पत्र पर आरोप लगाए गए कि स्वामी रामदेव और दिव्य योग  फार्मेसी से संबंधित खबरें तथ्य विहीन तथा प्रेस काउंसिल एक्ट 1978 एवं प्रेस काउंसिल रेगुलेशन 1979 में निहित नियमों और उद्देश्यों के विपरीत हैं। इसके जवाब में बताया गया कि समाचार पत्र में जो खबरें  प्रकाशित की गई वे पूरी खोजबीन एवं आश्रम में कार्यरत मजदूरों के बयानों तथा तथ्यों पर आधारित थी। बाद में भारतीय प्रेस परिषद ने इस मामले पर दि संडे पोस्टका पक्ष लिया।

7. सुरक्षा लेने के मामले में - मई 2006 में हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर में स्वामी रामदेव के साथ हेलिकॉप्टर में सवार होकर पहुंचे  गौरव  अग्रवाल से क्या वाकई स्वामी रामदेव की जान को खतरा था या जेड प्लस की सुरक्षा पाने के लिए किया गया एक और ड्रामा। इस ड्रामे में अब तक सुधीर कुमार, दीपु भट्ट और आंदोलनरत श्रमिकों के अलावा ई-मेल के धमकी भरे पत्रों को इस्तेमाल करने की असफल कोशिश की गई। भले ही रामदेव यह ऐलान कर चुके कि उन्होंने जेड श्रेणी की सुरक्षा के लिए सरकार से मांग नहीं की। मगर वास्तविकता यह है कि वे पहले भी यह मांग कर चुके हैं और इसके लिए साजिश रचने की बातें भी सामने आई हैं। इस संबंध में गृह मंत्रालय ने उत्तराखण्ड सरकार से जवाब तलब किया कि क्या वाकई स्वामी रामदेव को जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा की जरूरत  है। इसके तहत सरकार ने हरिद्वार की एलआईयू को जांच करने के आदेश दिए। एलआईयू की 17/05, 28 मार्च 2005 को जारी की गई जिसमें स्पष्ट कहा गया कि स्वामी रामदेव को परोक्ष रूप से कोई भय होना ज्ञात नहीं हुआ है उन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनियों से कथित प्रतिस्पर्धा के चलते एवं अपने निजी कार्यों से जीवन भय की आशंका प्रकट की थी।

 8. शंकर देव का रहस्य - स्वामी शंकर देव महाराज वह साधु थे जिन्होंने स्वामी रामदेव को न केवल अपने आश्रम में आश्रय दिया बल्कि आश्रम की संपत्ति भी उनके ट्रस्ट के नाम कर दी। लेकिन बाद में शंकर देव की स्थिति ऐसी हो गई कि उनके दुखों तक को स्वामी रामदेव को देखने की फुर्सत नहीं मिली। यह चौंकाने वाली बात है कि एक तरफ श्ंकर देव महाराज की देन आश्रम को करोड़ों की दवाइयों का कारोबार हो रहा था वहीं दूसरी तरफ वे इलाज के लिए तरसते रहे और लोगों से उधार लेकर काम चलाते रहे। दो साल पूर्व आहत होकर उन्होंने आचार्य करमवीर से स्वामी रामदेव की शिकायत की थी। तब करमवीर ने उनका इलाज कराया। इसके बाद शंकर देव का कोई अता-पता नहीं है। शंकर देव कहां गए? इस संबंध में हरिद्वार के कई साधु संतों ने स्वामी रामदेव पर आरोप लगाए कि उन्होंने संपत्ति के लालच में उनकी हत्या करा दी।

 9. रेवन्यू चोरी - एक तरफ तो वे देश के धन्नासेठों द्वारा कर चोरी करके अरबों रुपये का काला धन विदेशी बैंकों में जमा कराने की बात करते हैं वहीं दूसरी तरफ उनके पंतजलि योगपीठ के खिलाफ भी रेवन्यू चोरी के मामले दर्ज हैं। इस बाबत राजस्व विभाग ने पतंजलि योगपीठ और आचार्य बालकृष्ण पर मामले दर्ज किए हैं। राजस्व विभाग का कहना है कि बाबा और उसके सहयोगी बालकृष्ण ने रेवन्यू चोरी करके करीब 60 लाख का चूना सरकार को लगाया है
आकाश नागर
खोजी पत्रकारिता कर कई महत्वपूर्ण मामले उजागर करने वाले आकाश नागर इस समय द  सन्डे पोस्ट के रोमिंग असोसिएट एडिटर हैं.