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Thursday, February 18, 2016

देश में चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है, ऐसा पक्षपात क्यों, और कैसे ??

 महात्मा गांधी ने अक्तूबर, 1931 में डा. बीआर अंबेडकर के बारे में कहा था, “उनके पास नाराज़ होने, कटु होने की तमाम वजहें हैं. वे हमारा सिर नहीं फोड़ रहे हैं तो ये उनका आत्म संयम है.”

इस बयान से ज़ाहिर है कि अंबेडकर और उनके समुदाय के साथ हुए अत्याचारों की पृष्ठभूमि में उनके द्वारा कटु शब्दों के इस्तेमाल को महात्मा गांधी ग़लत नहीं मानते थे.
बहरहाल, मैं अभी सतारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ एक दूसरे विश्वविद्यालय में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बारे में सोच रहा हूं.
दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफ़ज़ल गुरू की बरसी के मौक़े पर हुई विरोध सभा के मुद्दे पर कुछ छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज कराया गया है.
देशद्रोह “वह अपराध है जिसके तहत कुछ कहने, लिखने और कुछ अन्य काम करने से सरकार की अवज्ञा करने को प्रोत्साहन मिलता है.’’

पूर्वी दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के सांसद महेश गिरी ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराई है. उन्होंने अपनी लिखित शिकायत में इन छात्रों को संविधान विरोधी और देशद्रोही तत्व कहा है.

गिरी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भी ख़त लिखकर, “इस तरह के शर्मनाक और भारत विरोधी गतिविधियों के दोबारा नहीं होने देने के लिए अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की अपील की थी.”

यह हैदराबाद में हुई घटना को दुहराने जैसा लग रहा है, जहां बीजेपी ने याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर सख़्त कार्रवाई की थी. इस मामले का दुखद पहलू ये रहा है कि एक छात्र ने आत्महत्या कर ली.

हालांकि जेएनयू ने कहा कि उसने इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और उसने मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है.

लेकिन इस कमेटी में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. छात्र संघों का कहना है कि जांच कमेटी में उपेक्षित और हाशिए पर रहे समुदायों का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया है.

मेरे ख़्याल से भारतीय जनता पार्टी के सामने इस मामले में विकल्प था, छात्रों पर आरोप लगाने के बदले, उसे इस मुद्दे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, जो सीधे जाति से जुड़ा पहलू है.

हैदराबाद में याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ दलित क्यों विरोध प्रदर्शन कर रहे थे? जेएनयू में मुस्लिमों पर इतना ध्यान क्यों है?

जब भी किसी कमेटी से जांच कराने की बात होती है तो छात्र हाशिए पर रहे समुदायों के प्रतिनिधियों की बात क्यों करते हैं? हक़ीक़त यही है कि भारत में दलितों और मुस्लिमों को ही सबसे ज़्यादा फांसी की सज़ा दी गई है.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़, मृत्युदंड पाने वालों में कुल 75 फ़ीसदी और चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है. ऐसे में पक्षपात का मुद्दा उभरता है.

मालेगांव धमाकों का उदाहरण देते हुए कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि अगर चरमपंथी गतिविधियों में सवर्ण हिंदुओं के शामिल होने का मामला हो तो सरकार सख़्ती नहीं दिखाती है.

बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी देने की जल्दी नहीं है. राजीव गांधी के हत्यारों की सज़ा कम कर उसे उम्रक़ैद में तब्दील कर दिया गया है.

इन लोगों को भी चरमपंथ का दोषी पाया गया था. लेकिन सबको समान क़ानून से कहां आंका जा रहा है?

इन सबमें मायाबेन कोडनानी को छोड़ ही दें, जिन्हें 95 गुजरातियों की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था, लेकिन वे जेल में भी नहीं हैं.

दूसरा मुद्दा आर्थिक है.
दलित और मुस्लिम ग़रीब लोग हैं. अदालत में सुनवाई के दौरान अफ़ज़ल गुरु को लगभग नहीं के बराबर क़ानूनी प्रतिनिधित्व मिल पाया था.

इन वास्तविकताओं को देखते हुए, इसमें बहुत अचरज नहीं होना चाहिए कि दलित, मुस्लिम और उनके समर्थक सरकार का विरोध कर रहे हैं. उन्हें नाराज़ होने का पूरा हक़ है.
सवर्ण इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि हर भारतीय को इस भ्रम में जीना चाहिए कि हम एक पूर्ण समाज हैं और हर किसी को इसके सामने झुकना चाहिए.

हिंदुत्व मध्यम वर्ग और उच्च वर्गों के लिए मसला है. यह आरक्षण से घृणा करता है क्योंकि उसे लगता है कि यह उनको मिल रही सुविधाओं में अतिक्रमण है.

यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण को पसंद नहीं करता और इस मुद्दे पर संघ के बयानों के चलते चुनावों में बीजेपी मुश्किल में आई थी.

प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया भी विपक्ष पर झूठ गढ़ने का आरोप रहा है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई बिलकुल साफ़ है.

दलित अपनी आवाज़ उठा रहे हैं और अपने हक़ के लिए खड़े हो रहे हैं. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. अगर उनकी भाषा में असंयम हो तो भी उन्हें अपराधी की तरह से नहीं देखा जा सकता.

सरकार के लिए अहम ये है कि उनसे जुड़े, उनकी बात सुने, उनके तर्क सुने, केवल उनके नारों पर नहीं जाए.

लेख की शुरुआत में मैंने गांधी जी की बुद्धिमता का उदाहरण दिया है. उसकी तुलना हिंदुत्व के नेताओं की पहले हैदाराबाद और फिर दिल्ली में की गई कार्रवाई से करके देखिए.

हमें इस मामले पर परिपक्व समझ दिखाना चाहिए, जब तक सरकार इस दिशा में कोशिश करती भी नहीं दिखेगी तब तक हमें इस बात पर अचरज नहीं होना चाहिए कि अब तक दबे और पीड़ित रहे लोग सरकार की अवज्ञा के लिए प्रोत्साहित करने वाले काम करते रहेंगे.

Saturday, September 26, 2015

मोदी की अगली पारी के लिए संघ प्रमुख ने आरक्षण समीक्षा का शिगूफ़ा छोड़ा है!


RSS के स्वयंसेवकों को तमाम नेताओं की तरह ज़ुबानी तीर चलाने (Verbal Diarrhea) की बीमारी कभी नहीं होती. संघ में ऐसे संक्रमण से बचाव के लिए नियमित टीकाकरण होता रहता है, ताकि ज़ुबान कभी बेलग़ाम न हो. संघ के ऐसे आन्तरिक अनुशासन का कोई अपवाद नहीं होता. वहाँ से हरेक बात लम्बे चिन्तन, विचार-विमर्श और दूरगामी नफ़ा-नुक़सान को परखने के बाद ही सामने आती है. मोहन भागवत ने ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ का शिगूफ़ा किसी टुटपुंजिए नेता की तरह नहीं छोड़ा था. उनकी ज़ुबान फिसलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. तो फिर क्या वजह थी कि संघ और बीजेपी के प्रवक्ताओं को अपने ‘आदर्श पुरुष’ के बयान पर सफ़ाई देने के लिए आगे आना पड़ा? अगर आपको लगता है कि ये सारी क़वायद सिर्फ़ बिहार चुनाव को लेकर माहौल बिगड़ने की आशंका को देखते हुए की गयी, तो आप आंशिक सत्य ही जानते हैं. इसीलिए भागवत के बयान को गहराई से समझना ज़रूरी है.
  


राम-मन्दिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता जैसे तीन मुद्दों के बाद भागवत ने अब ‘राष्ट्रीय महत्व’ के जिस चौथे मुद्दे पर अपनी मोहर लगायी है उसे आप ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ कह सकते हैं. ‘ग़ैर-सरकारी सामाजिक संगठन’ संघ के अघोषित काम चाहे जो हों, लेकिन घोषित काम सिर्फ़ ‘राष्ट्रीय महत्व’ के मुद्दों को तलाशना और जागरूकता फ़ैलाना ही है. इसीलिए जब इसका मुखिया ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ की बात करता है, तो वो बहुत बड़ी हो जाती है. क्रीमी-लेयर, आर्थिक आधार और समीक्षा की बातें नयी तो हैं नहीं, तो फिर भागवत को बोलने की क्या पड़ी थी?

काँग्रेस के मनीष तिवारी आज पार्टी के प्रवक्ता नहीं हैं. उनका बयान काँग्रेस का नज़रिया नहीं है. मनीष ने 2014 में ख़राब सेहत के नाम पर लुधियाना सीट से कन्नी काट ली थी. शायद, मोदी लहर उन्हें दिख गयी थी. वर्ना, क्या नेता जेल में रहकर चुनाव नहीं लड़ते हैं? मनीष की ही तर्ज़ पर काँग्रेस के पूर्व मीडिया प्रभारी और महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने भी 2014 के चुनाव से पहले ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ का मुद्दा छेड़ा था. उनका बयान भी निजी राय थी, पार्टी का नज़रिया नहीं. थोड़े समय बाद जनार्दन, मीडिया प्रभारी नहीं रहे. लेकिन तब न तो मायावती ने तीखे तेवर दिखाये थे, न जेडीयू ने और न ही लालू यादव ने संस्कृत-निष्ठ ग़ाली दी थी कि ‘माँ का दूध पीया है तो ख़त्म करके दिखाओ, किसकी कितनी ताक़त है, पता लग जाएगा’ यानी  ‘If you’re the true son of your mother, go ahead and end it, you’ll learn whose strength is stronger.’


लालू का ये तेवर अत्यधिक तीखा है. अँग्रेज़ी अनुवाद से इसका सही भाव नहीं समझा जा सकता. क्योंकि अँग्रेज़ी में ‘माँ के दूध’ की महिमा वैसी नहीं है, जैसी भारतीय संस्कृति में पन्ना धाय ने स्थापित की है. हिन्दी में ‘माँ के दूध’ को ललकारने से बड़ी कोई और चुनौती नहीं होती. यहाँ पुत्र का सबसे बड़ा कर्त्तव्य ‘माँ के दूध’ का ही क़र्ज़ उतरना होता है. भारतीय सैनिक भी जब सर्वोच्च बलिदान की राह पर होता है तो वो आँखों ही आँखों में तिरंगे को चूमकर ‘माँ के दूध’ का क़र्ज़ उतरता है. इसीलिए लालू ने मोदी को ललकारा है कि वो बताएँ कि संघ प्रमुख के बयान पर उनकी क्या राय है? नरेन्द्र मोदी ने पार्टी से सफ़ाई दिलवा दी कि वो ‘आरक्षण’ पर वैसे ही चूँ तक नहीं करेंगे, जैसे उन्होंने ललित मोदी काँड और व्यापम घोटाले पर अपने होठ सिल लिये थे. ख़ामोशी भी हथियार है. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने इसे बखूबी आज़माया. अब मोदी उनसे इतना तो सीख ही सकते हैं.

आरक्षण नीति को बदलने की बात मोहन भागवत ने अनायास नहीं की. 1981 में संघ ने प्रतिनिधि सभा में आरक्षण पर जो प्रस्ताव पारित किया, हूबहू वही बातें अब भागवत ने दोहरायी हैं. उस दौर में बीजेपी और संघ को लगा कि आरक्षण की मुख़ालफ़त से उसकी दाल नहीं गलेगी. तब काँग्रेस का वोट-बैंक हथियाने वाली पार्टियाँ जैसे जनता दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का जन्म नहीं हुआ था. इसीलिए तब संघ ने राम मन्दिर का मुद्दा ढूँढा. इससे बीजेपी के दिन फिर गये थे. लेकिन अब संघ को ये चिन्ता सता रही है कि अगली बार मोदी लहर की सवारी तो मुमकिन होगी नहीं, क्योंकि राजनीति में एक ही मुद्दा बार-बार परवान नहीं चढ़ता. मोदी विकास की चाहे जितनी डुगडुगी बजा लें लेकिन अगले चुनाव तक उनके बहुत सारे सपने टूट चुके होंगे. ‘अच्छे दिन’ की कलई खुल चुकी होगी. लिहाज़ा, नया नारा ज़रूरी है.

‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ में संघ को नया नारा दिख रहा है. इसीलिए हार्दिक पटेल जैसे नौसिखिए को रातों-रात नायक बनाया गया. गुजरात के उस पटेल समुदाय को पूरी ताक़त से आरक्षण विरोधी मुहिम को चमकाने के काम पर लगा दिया गया, जो बीजेपी और संघ के साथ है और जिसके ज़्यादातर लोग सम्पन्न हैं. नारा गढ़ा गया कि ‘हमें भी दो, नहीं तो किसी को नहीं’. रणनीति देश को ये दिखाने की बनी कि आरक्षण से कमज़ोरों का भला तो हुआ नहीं, सम्पन्न और ‘लूटे’ जा रहे हैं. लिहाज़ा, उन्हें संगठित होने की ज़रूरत है, जिन्हें लूटा जा रहा है. संघ चाहता है कि अगले चुनाव तक ये तबक़ा संगठित होकर उबलने लगे और वो उसकी तपिस से अपनी सियासी रोटियाँ सेंककर वैसे ही आगे बढ़ जाए जैसे कभी ‘राम मन्दिर’ के सहारे बढ़ी थी.

राजनीति में ‘सब जायज़ है’ का नुस्ख़ा चलता है. जिसका नुस्ख़ा हिट हो जाए, वही सिकन्दर. नुस्ख़े और वोट-बैंक की ऐसी ही मजबूरी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को सताया था. बोफ़ोर्स तोप सौदे को गरमाकर वो प्रधानमंत्री तो बन गये लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि उनके पास कोई वोट-बैंक नहीं है. तब मंडल आयोग की रिपोर्ट को झाड़-पोंछकर निकाला गया. इससे OBC का नया वोट-बैंक बना. वैसी ही ज़रूरत और चुनौती आज संघ को सता रही है. ऐसी ही तकलीफ़ ने अरविन्द केजरीवाल को बेचैन कर रखा है, तभी तो वो पहले दिन से ही पूर्ण राज्य की माँग को लेकर नरेन्द्र मोदी से टकराने लगे. इसीलिए मोहन भागवत का बयान बहुत दूरदर्शी है. अब ये जनता पर है कि वो उनके या केजरीवाल के नुस्ख़ों पर कैसे प्रतिक्रिया करती है? लेकिन ये तो तय है कि आरक्षण का शिगूफ़ा आने वाले दौर में खूब गुल खिलाएगा. ये आग अब रोके नहीं रूकेगी. भीतर ही भीतर इसे लगातार सुलगाये रखा जाएगा.

मुकेश कुमार सिंह

Wednesday, June 04, 2014

मीडिया तुम्हारी जात क्या है बॉस ?


religion-of-indian-mediaमीडिया की जात क्या है? क्या मीडिया की भी कोई जाति होती है?यदि नहीं तो मीडिया में दलितों (पिछड़े-मुस्लिम-महिला) के मुद्दे क्यों नहीं सार्थकता से उठते? हाशिये पर खड़े समाज पर मीडिया क्यों ध्यान नहीं देता ? भुत-प्रेत,  राखी-मीका,  जुली-मटुकनाथ पर पैकेज बनाने वाला मीडिया क्यों दलितों की अनदेखी करता है? जो सरोकारों के साथ चलने का दावा करते हैं उनके प्रयास भी महज रस्म अदायगी क्यों होते हैं?

क्या बाजारवाद के इस दौर में महज इसलिए दलितों की खबरों को जगह नहीं मिलती है क्योकिं उनके सरोकार मध्यवर्गीय विज्ञापन देने वाली कंपनियों के सरोकारों से मेल नहीं खाती? तो क्या बाजारवाद के इस दौर में मीडिया “समाचार वही जो व्यापार बढ़ाये” के मुनाफे के तहत काम करता है? क्या भारतीय मीडिया नवपूंजीवाद के लाभ-हानि के दवाब के तहत काम करता है? यह सभी मीडिया के लिए भले सही न हो परन्तु भूमंडलीकरण के इस दौर में लोकतांत्रिक आग्रह कमजोर हुएं है. इसी का परिणाम है की मीडिया मिशन से कमीशन की तरफ छलांग लगा चुका है.

लोगों से सवाल पूछने वाला मीडिया समूह खुद सवालों के घेरे में आ गया है. क्यों नहीं दलितों के प्रति भारतीय मीडिया का रवैया अभी भी बदला है? न किसी सफाई कर्मचारी की मौत को लेकर सवाल उठाये जातें हैं और न ही कोई पैकेज बनाएं जातें है?क्यों नहीं दलितों के प्रति  हिंसा और बलात्कार की घटना पर्याप्त ध्यान खीच पाती हैं? क्यों नहीं आदिवासी महिलायों की खबरें जगह पाती है? क्यों नहीं मुस्लिमों की बेगुनाह रिहाई खबर बन पाती है? भारतीय मीडिया क्यों नहीं दलितों-पीड़ितों-शोषितों की तरफ अपने आप को खड़ा पाता है?

सीएनएन-आईआबीएन-7 के वरीय समाचार संपादक आकाश,  दलितों की भारतीय मीडिया में उपेक्षा के प्रश्न पर कहतें है- “आरक्षण की सहायता से कार्यपालिका,  न्यायपालिका और विधायिका में दलित तो आये परन्तु आज भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के चौथे खंभे में दलितों की संख्या नगण्य है” इस कथन के समर्थन में कई आंकड़े भी हैं जो इसकी पुष्टि करते हैं.

आजादी के इतने बर्षो के बाद भी दलित वर्ग मीडिया से लगभग गायब है.

मीडिया में जाति की हिस्सेदारी पर बहस खड़ा करना इस लेख का मतलब नही है.  मूल प्रश्न यह है कि मीडिया में दलितों के मुद्दे को जगह क्यों नहीं दी जाती? खैरलांजी घटना इसका उदहारण है जिसको भारतीय मीडिया ने शुरू में कवर नहीं किया था.

प्रसंगवश

1. हरियाणा के हिसार जिले स्थित भागाणा में 23 मार्च को 15-18 वर्ष की अगवा की गई चार मासूम लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की गई. घटना के बाद न्याय की मांग लेकर पीडितायें अपने परिजनों और गावं के 90 दलित परिवारों के साथ जंतर-मंतर पर धरणा दे रहें हैं. यह मुख्यधारा की मीडिया के लिए कोई खबर नहीं है.

2. नागपुर में दलित को जिन्दा जला दिया जाता है और यह मुख्यधारा की मीडिया में खबर नहीं बन पाती है.

3. आतंकवादी बमविस्फोट के झूठे आरोप में दस बरस की सजा काट कर बाहर निकले बेगुनाह मुस्लिमों की तरफ से कोई भी मीडिया समूह सवाल नहीं खड़े करता है.

4. दलित महिलायों को शोषण का शिकार बनना पड़ता है पर वो खबर नहीं बनती. आदिवासी लड़कियां गायब होती हैं, यह खबर नहीं बनती. क्यों ‘सभी के लिए न्याय’ ‘कुछ के लिए अथाह मुनाफे’ के आगे  बेबस नजर आता है? क्या इसके पीछे सिर्फ बाजार का अर्थशास्त्र है या समाजशास्त्र भी है?

सवाल उठता है की क्या मीडिया में इनके मुद्दे कोई मायने नहीं रखतें? क्या मीडिया की कोई जबाबदेही नहीं है? क्या पूंजी और बाजार अब मीडिया के सरोकारों और मिशन को संचालित करेगा? क्या अब मीडिया में सरोकारों को कमीशन से परखा जायेगा. तब किसी भी समाचार को लिखा/प्रसारित किया जाएगा.

छोटे-छोटे और गैरजरूरी मुद्दों को तानने वाला मीडिया अब तक भगाणा के मुद्दों पर खामोश क्यों है? दलित हिंसा पर अब तक क्यों नहीं कोई पैकेज बनती दिख रही है? क्यों नहीं अक्षरधाम बम विस्फोट के बेगुनाह सजायाफ्ता आरोपिय के समर्थन में कोई उसके बेगुनाही की कीमत का हिसाब मांग रहा है?

लोकतंत्र,   विकास और न्याय के पक्ष में मीडिया कब खड़ा होगा?

~मुकेश कुमार

Saturday, July 20, 2013

जातिप्रथा, भारतीय मुसलमान और इस्लाम


मुसलमानों की सामाजिक सरंचना धर्म और कुरआन के निर्देशों पर आधारित समझी जाती है, कुरआन जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है और यह बतलाता है की जन्म, वंश और स्थान के आधार पर सभी मुसलमान बराबर हैं और मुसलमानों में हिन्दुओ जैसी कोई बंद जाति व्यवस्था नहीं है। यह एक सैधांतिक बात है परन्तु जब हम मुसलमानों को व्यवहार की द्रष्टि से देखते हैं तो पता चलता है कि किसी ना किसी रूप में मुस्लिम समाज में भी जाति व्यवस्था कि जड़ें गहरे तक पायी जाती है और सभी मुसलमान खुद को एक नहीं मानते हैं। केवल इतना ही नहीं, विवाह इत्यादी में भी एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने में भी कुछ सामजिक और जातीय नियमों का पालन करते हैं। अर्थात विवाह सम्बन्ध स्थापित करने में भी मुसलमान पूर्ण स्वतंत्र नहीं है। कुछ ऐसा प्रतीत होता है की भूगोलिक प्रजातीय, जनजातीय और राजनैतिक विभेदों के परिणाम स्वरुप मुस्लिम समाज में भी सामाजिक संस्तरण की व्यवस्था विध्यमान है। भारतीय मुसलमानों पर अरब/ तुर्की और फारस के मुसलमानों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव है। फलस्वरूप इनमें भी एक ऐसा सामाजिक संस्तरण (social stratification) पनप गया है जिसको समझा जाना आवश्यक है।

भारत में सामाजिक संस्तरण के विकसित होने का कारण हिन्दुओं का मुस्लिम में परिवर्तित होना रहा। यधपि परिवर्तित मुसलमान पूर्णतया अपने मूल जाति-धर्म को नहीं छोड़ नहीं पाए और न ही पूर्णतया परिवर्तित हुए। हां सम्बन्ध दोनों ओर रखा! मुस्लिम सामाजिक सरंचना के सम्बन्ध में दो तथ्य उल्लेखित किया जाना जरूरी है। पहला, मुस्लिम समाज में सामाजिक संस्तरण व्यवहार में विध्यमान है। और दूसरा, मुस्लिम प्रशासकों ने अपनी ओर से हिंदू जनसख्या के भाग को मुस्लिम जनसँख्या में परिवर्तित होने की पूरी पूरी छूट भी दी थी।

उपरोक्त दो तथ्यों से फिर दो तथ्य सामने आ जाते हैं, पहला, मुस्लिम समाज में वो मुसलमान जिनके पूर्वज विदेश से आकार बसे। और दूसरा, वो मुसलमान जो अपनी जाती या धर्म परिवर्तित करके मुसलमान बन गए।मोटे तौर पर भारतीय मुसलमानों को तीन स्तरों में विभक्त किया जा सकता है। पहला, उच्च जाती के मुसलमान जिन्हें अशरफशब्द से पुकारा जाता है। दूसरा, धर्म परिवर्तन द्वारा बने मुसलमान और तीसरा, जिनको व्यवसाय के परिवर्तन स्वरुप मुसलमानों में शामिल किया गया-(डा० अंसारी के अनुसार)

इस सम्बन्ध में दूसरी विचारधारा प्रसिद्द विद्वान नजमुल करीम साहब की है इनके अनुसार भारतीय मुसलमानों को हिन्दुओ की भाँती चार खंडों में विभक्त किया गया है- सैय्यद, मुग़ल, शैख़ और पठान।

डा. अंसारी ने संस्तरण में जो उपरोक्त विचार दिए हैं इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि अशरफ मुसलमानों में वो मुसलमान आते हैं जो विदेशो से आकार भारत में बस गए और ये लोग खुद को भारतीय मुस्लिम जाति संस्तरण में सबसे ऊँचा मानते थे। इस सम्बन्ध में अंसारी आगे बतलाते हैं की अशरफशब्द अरबी भाषा के शरीफ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है आदरणीयअर्थात वे मुसलमान आदरणीय हैं जो अशरफ मुसलमान है! धर्म परिवर्तित वे मुसलमान हैं जो मूलतः हिन्दुओं की उच्च जातियों से परिवर्तित हैं। इन्होंने अपनी स्थिति अशरफ मुसलमानों से ऊँची समझी और व्यवसायिक मुसलमानों से खुद को ऊपर माना!

डा. अंसारी के अनुसार श्रेष्ट मुसलमानों ओर व्यवसायिक मुसलमानों के बीच का यह वर्ग है। डा. अंसारी के अनुसार तीसरे मुसलमान वे हैं जो प्रारंभ में हिंदू थे जिनके पूर्वजो ने कुछ मुसलमान व्यवसाय अपना लिए और फिर वे मुसलमान बन गए। ये मुसलमान भारत के सभी प्रान्तों में पाए जाते हैं।

नजमुल करीम साहब के अनुसार, सैय्यद मुसलमानों में, वे लोग अपने को मानते हैं, जो मुस्लिम समाज में हिंदुओं की तरह ब्राह्मणों का स्तर रखते हैं। वैसे 'सैयद' का शाब्दिक अर्थ "राजकुमार" से है। ये लोग अपने नाम के आगे मीर और सैय्यद शब्दों का प्रयोग करते हैं। सैय्यदों में अनेको उपजातिया हैं, जिनमें असकरी, बाकरी, हसीनी, हुसैनी, काज़मी, तकवी, रिज़वी, जैदी, अल्वी, अब्बासी, जाफरी और हाशमी जातियां आती हैं।

शैख़ जातियों में, उस्मानी सिद्दीकी, फारुखी , खुरासनी, मलिकी और किदवई इत्यादी जातियां आती हैं। इनका सैय्यदों के बाद दूसरा स्थान है। शैख़ शब्द का अर्थ है मुखिया, परन्तु व्यवहार में मुसलमानों के धार्मिक गुरु शैख़ कहलाते थे, भारत के सभी प्रान्तों में ये लोग पाए जाते हैं।

मुगुल लोगों में, उजबेक, तुर्कमान, ताजिक, तैमूरी, चंगताई, किब और जिंश्वाश जाति के लोग आते हैं। माना जाता है कि ये लोग मंगोलिया में मंगोल जाती के लोग हैं और अपने नाम के आगे 'मिर्ज़ा' शब्द का प्रयोग करते हैं।

पठानों में, आफरीदी, बंगल, बारक, ओई, वारेच्छ, दुर्रानी, खलील, ककार, लोदहो, रोहिल्ला और युसुफजाई इत्यादी आते हैं। इनके पूर्वज अफगानिस्तान से आये थे। अधिकांशतः ये लोग अपने नाम के पीछे 'खान' शब्द का प्रयोग करते हैं।

राजस्थान के मुस्लिम राजपूतों में तलवार के बल पर और मनसबदारी, ऊँचे ओहदों, धन, प्रशासन और सरकारी सम्मान इत्यादि के लालच में और वैवाहिक संबंधो के कारण बहुत राजपूत जातियां मुस्लमान बनी। इन लोहों में मुसलमान होने से पहले ही ऊँच-नीच का भेदभाव अत्यंत तीव्र था और मुसलमान होने के बाद भी इन्होंने जातिगत भेदभाव बनाये रखा। इसी कारण ये अपने से निचली जातियों में खान पान और वैवाहिक सम्बन्ध नहीं रखते, जो आज भी बरकरार है। ये केवल अपने सामान और ऊँची अशरफी जातियों तक सीमित हैं। इन जातियों में, चंदेल, तोमर, बरबुजा, बीसने, भट्टी, गौतम, चौहान, पनबार, राठौर, और सोमवंशी हैं।

मुसलमानों में कुछ जातियों को व्यवसाय के आधार पर भी समझा जा सकता है, इनमें अंसारी (जुलाहे/बुनकर), कुरैशी (कसाई) छीपी, मनिहार, बढाई, लुहार, मंसूरी (धुनें) तेली, सक्के, धोबी नाई (सलमानी ), दर्जी (इदरीसी), ठठेरे जूता बनाने वाले और कुम्हार इत्यादी शामिल हैं। ये व्यावसायिक जातियां थी जो पहले हिंदू थी और बाद में मुसलमान में परिवर्तित हो गईं। इसके अतिरिक्त अनेक व्यवसायिक जातियां है जैसे-आतिशबाज़, बावर्ची, भांड, गद्दी, मोमिन, मिरासी, नानबाई, कुंजडा, दुनिया, कबाड़ियों, चिकुवा फ़कीर इत्यादी।

मुसलमानों में अस्पृश्य जातियां भी है। हालाँकि पैगम्बर मुहम्मद (S.A.W.) ने मनुष्यों में भेदभाव नहीं माना था, परन्तु भारतीय समाज की दशा में ये अलग तरह से सामने आया और मुस्लिमो में भी छुआछूत और भेदभाव की बाते सामने आईं। यद्यपि ये हिन्दुओं जैसी कठोर नहीं थी, फिर भी अशरफ और राजपूत जातियां इनसे दूर ही रहीं। इन जातियों में अनेक उपजातियां मिलती है जैसे- गाजीपुरी, रावत, लाल बेगी, पत्थर फोड, शेख, महतर, बांस फोड और वाल्मीकि इत्यादी।

इस प्रकार आसानी से समझा जा सकता है कि भारतीय मुस्लिमों में जातीय व्यवस्था के भारत के संदर्भ में क्या आधार रहे हैं।

~फरहाना अंसारी

Tuesday, December 04, 2012

मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको




आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी इक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजू पार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाँहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा, 'काका, तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िंदा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें'

बोला कृष्ना से - 'बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से'

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए सरपंच के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लंबी नोक पर
देखिए सुखराज सिंह बोले हैं खैनी ठोंक कर

'क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
न पुट्ठे पे हाथ रखने देती है, मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी'

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुरज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी सँभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेर कर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
'जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने'

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोल कर
इक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर, 'माल वो चोरी का तूने क्या किया?'

'कैसी चोरी माल कैसा?' उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा

होश खो कर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आँधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देख कर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे

'कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं'

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल-से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, 'इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा'

इक सिपाही ने कहा, 'साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें'

बोला थानेदार, 'मुर्गे की तरह मत बाँग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टाँग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है'

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
'कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल'

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म, संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लँगोटी के लिए
बेचती हैं जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए


~अदम गोंडवी