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Saturday, September 26, 2015

मोदी की अगली पारी के लिए संघ प्रमुख ने आरक्षण समीक्षा का शिगूफ़ा छोड़ा है!


RSS के स्वयंसेवकों को तमाम नेताओं की तरह ज़ुबानी तीर चलाने (Verbal Diarrhea) की बीमारी कभी नहीं होती. संघ में ऐसे संक्रमण से बचाव के लिए नियमित टीकाकरण होता रहता है, ताकि ज़ुबान कभी बेलग़ाम न हो. संघ के ऐसे आन्तरिक अनुशासन का कोई अपवाद नहीं होता. वहाँ से हरेक बात लम्बे चिन्तन, विचार-विमर्श और दूरगामी नफ़ा-नुक़सान को परखने के बाद ही सामने आती है. मोहन भागवत ने ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ का शिगूफ़ा किसी टुटपुंजिए नेता की तरह नहीं छोड़ा था. उनकी ज़ुबान फिसलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. तो फिर क्या वजह थी कि संघ और बीजेपी के प्रवक्ताओं को अपने ‘आदर्श पुरुष’ के बयान पर सफ़ाई देने के लिए आगे आना पड़ा? अगर आपको लगता है कि ये सारी क़वायद सिर्फ़ बिहार चुनाव को लेकर माहौल बिगड़ने की आशंका को देखते हुए की गयी, तो आप आंशिक सत्य ही जानते हैं. इसीलिए भागवत के बयान को गहराई से समझना ज़रूरी है.
  


राम-मन्दिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता जैसे तीन मुद्दों के बाद भागवत ने अब ‘राष्ट्रीय महत्व’ के जिस चौथे मुद्दे पर अपनी मोहर लगायी है उसे आप ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ कह सकते हैं. ‘ग़ैर-सरकारी सामाजिक संगठन’ संघ के अघोषित काम चाहे जो हों, लेकिन घोषित काम सिर्फ़ ‘राष्ट्रीय महत्व’ के मुद्दों को तलाशना और जागरूकता फ़ैलाना ही है. इसीलिए जब इसका मुखिया ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ की बात करता है, तो वो बहुत बड़ी हो जाती है. क्रीमी-लेयर, आर्थिक आधार और समीक्षा की बातें नयी तो हैं नहीं, तो फिर भागवत को बोलने की क्या पड़ी थी?

काँग्रेस के मनीष तिवारी आज पार्टी के प्रवक्ता नहीं हैं. उनका बयान काँग्रेस का नज़रिया नहीं है. मनीष ने 2014 में ख़राब सेहत के नाम पर लुधियाना सीट से कन्नी काट ली थी. शायद, मोदी लहर उन्हें दिख गयी थी. वर्ना, क्या नेता जेल में रहकर चुनाव नहीं लड़ते हैं? मनीष की ही तर्ज़ पर काँग्रेस के पूर्व मीडिया प्रभारी और महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने भी 2014 के चुनाव से पहले ‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ का मुद्दा छेड़ा था. उनका बयान भी निजी राय थी, पार्टी का नज़रिया नहीं. थोड़े समय बाद जनार्दन, मीडिया प्रभारी नहीं रहे. लेकिन तब न तो मायावती ने तीखे तेवर दिखाये थे, न जेडीयू ने और न ही लालू यादव ने संस्कृत-निष्ठ ग़ाली दी थी कि ‘माँ का दूध पीया है तो ख़त्म करके दिखाओ, किसकी कितनी ताक़त है, पता लग जाएगा’ यानी  ‘If you’re the true son of your mother, go ahead and end it, you’ll learn whose strength is stronger.’


लालू का ये तेवर अत्यधिक तीखा है. अँग्रेज़ी अनुवाद से इसका सही भाव नहीं समझा जा सकता. क्योंकि अँग्रेज़ी में ‘माँ के दूध’ की महिमा वैसी नहीं है, जैसी भारतीय संस्कृति में पन्ना धाय ने स्थापित की है. हिन्दी में ‘माँ के दूध’ को ललकारने से बड़ी कोई और चुनौती नहीं होती. यहाँ पुत्र का सबसे बड़ा कर्त्तव्य ‘माँ के दूध’ का ही क़र्ज़ उतरना होता है. भारतीय सैनिक भी जब सर्वोच्च बलिदान की राह पर होता है तो वो आँखों ही आँखों में तिरंगे को चूमकर ‘माँ के दूध’ का क़र्ज़ उतरता है. इसीलिए लालू ने मोदी को ललकारा है कि वो बताएँ कि संघ प्रमुख के बयान पर उनकी क्या राय है? नरेन्द्र मोदी ने पार्टी से सफ़ाई दिलवा दी कि वो ‘आरक्षण’ पर वैसे ही चूँ तक नहीं करेंगे, जैसे उन्होंने ललित मोदी काँड और व्यापम घोटाले पर अपने होठ सिल लिये थे. ख़ामोशी भी हथियार है. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह ने इसे बखूबी आज़माया. अब मोदी उनसे इतना तो सीख ही सकते हैं.

आरक्षण नीति को बदलने की बात मोहन भागवत ने अनायास नहीं की. 1981 में संघ ने प्रतिनिधि सभा में आरक्षण पर जो प्रस्ताव पारित किया, हूबहू वही बातें अब भागवत ने दोहरायी हैं. उस दौर में बीजेपी और संघ को लगा कि आरक्षण की मुख़ालफ़त से उसकी दाल नहीं गलेगी. तब काँग्रेस का वोट-बैंक हथियाने वाली पार्टियाँ जैसे जनता दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का जन्म नहीं हुआ था. इसीलिए तब संघ ने राम मन्दिर का मुद्दा ढूँढा. इससे बीजेपी के दिन फिर गये थे. लेकिन अब संघ को ये चिन्ता सता रही है कि अगली बार मोदी लहर की सवारी तो मुमकिन होगी नहीं, क्योंकि राजनीति में एक ही मुद्दा बार-बार परवान नहीं चढ़ता. मोदी विकास की चाहे जितनी डुगडुगी बजा लें लेकिन अगले चुनाव तक उनके बहुत सारे सपने टूट चुके होंगे. ‘अच्छे दिन’ की कलई खुल चुकी होगी. लिहाज़ा, नया नारा ज़रूरी है.

‘आरक्षण नीति की समीक्षा’ में संघ को नया नारा दिख रहा है. इसीलिए हार्दिक पटेल जैसे नौसिखिए को रातों-रात नायक बनाया गया. गुजरात के उस पटेल समुदाय को पूरी ताक़त से आरक्षण विरोधी मुहिम को चमकाने के काम पर लगा दिया गया, जो बीजेपी और संघ के साथ है और जिसके ज़्यादातर लोग सम्पन्न हैं. नारा गढ़ा गया कि ‘हमें भी दो, नहीं तो किसी को नहीं’. रणनीति देश को ये दिखाने की बनी कि आरक्षण से कमज़ोरों का भला तो हुआ नहीं, सम्पन्न और ‘लूटे’ जा रहे हैं. लिहाज़ा, उन्हें संगठित होने की ज़रूरत है, जिन्हें लूटा जा रहा है. संघ चाहता है कि अगले चुनाव तक ये तबक़ा संगठित होकर उबलने लगे और वो उसकी तपिस से अपनी सियासी रोटियाँ सेंककर वैसे ही आगे बढ़ जाए जैसे कभी ‘राम मन्दिर’ के सहारे बढ़ी थी.

राजनीति में ‘सब जायज़ है’ का नुस्ख़ा चलता है. जिसका नुस्ख़ा हिट हो जाए, वही सिकन्दर. नुस्ख़े और वोट-बैंक की ऐसी ही मजबूरी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को सताया था. बोफ़ोर्स तोप सौदे को गरमाकर वो प्रधानमंत्री तो बन गये लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि उनके पास कोई वोट-बैंक नहीं है. तब मंडल आयोग की रिपोर्ट को झाड़-पोंछकर निकाला गया. इससे OBC का नया वोट-बैंक बना. वैसी ही ज़रूरत और चुनौती आज संघ को सता रही है. ऐसी ही तकलीफ़ ने अरविन्द केजरीवाल को बेचैन कर रखा है, तभी तो वो पहले दिन से ही पूर्ण राज्य की माँग को लेकर नरेन्द्र मोदी से टकराने लगे. इसीलिए मोहन भागवत का बयान बहुत दूरदर्शी है. अब ये जनता पर है कि वो उनके या केजरीवाल के नुस्ख़ों पर कैसे प्रतिक्रिया करती है? लेकिन ये तो तय है कि आरक्षण का शिगूफ़ा आने वाले दौर में खूब गुल खिलाएगा. ये आग अब रोके नहीं रूकेगी. भीतर ही भीतर इसे लगातार सुलगाये रखा जाएगा.

मुकेश कुमार सिंह

Monday, October 29, 2012

धोबी रिजर्वेशन पाए और मुस्लिम धोबी धक्के खाए: यह कैसा इन्साफ है ?



सेकुलरिस्म हिंदुस्तान की ज़रुरत है. ज़रुरत इसलिए क्योंकि हमारे मुल्क में मुक्तलिफ़ मजाहिब को मानने वाले लोग रहते हैं. हमने इरादतन अपने मुल्क का सेकुलर आईन बनाया ताकि सभी मजाहिब के मानने वालों के साथ इन्साफ हो सके. सेकुलर निजाम की ज़रुरत शायद इसलिए भी थी क्योंकि ऐसे निजाम में ही कमजोर, पिछड़े तबको और अकलियतों की तरक्की मुमकिन है. हमारा सेकुलर आईन सरकारों और उसके मुक्तलिफ़ विभागों को यह हिदायत देता है कि वो मजहब के आधार पर किसी भी तरह का कोई भेद भाव नहीं बरतेंगे. लेकिन इस देश में सरकारें आईन के सेकुलर उसूल के खिलाफ कई बार काम करती आयीं हैं. Presidential Order, 1950 , जो कि हिन्दुस्तानी आईन के दफा 341 के तहत लाया गया है, इसकी जीती-जागती मिशाल है. यह 1950 का आर्डर मजहब के आधार पर भेद भाव करता है. इसके तीसरे हिस्से में 1956 से पहले लिखा गया था कि हिन्दू मजहब के मानने वाले दलित समाज के लोग ही सिर्फ Scheduled Caste (SC ) माने जायेंगे. 1956 में इस आर्डर में तब्दीली की गयी और सिख मजहब के मानने वाले दलितों को इसमें शामिल कर लिया गया. इसके बाद 1990 में बौद्ध मजहब के मानने वाले दलित समाज के लोगों को भी इसमें जोड़ दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि सिख और बौद्ध मजाहिब के मानने वाले दलित समाज के लोगों को भी रिजर्वेशन के फायदे हिन्दू दलितों के साथ मिलने शुरू हो गए. लेकिन जो दलित समाज के लोग इस्लाम और इसाई मजाहिब में शामिल हुए उनको यह रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिल पा रहा है क्योंकि यह लोग Presidential Order,1950 के दायरे में शामिल नहीं हैं. इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि जो मजाहिब हिंदुस्तान में पैदा हुए इनके मानने वाले या बाद में इन मजाहिब में शामिल हुए दलित समाज के लोगों को तो रिजर्वेशन का फायदा मिल रहा है और जो दलित समाज के लोग हिंदुस्तान के बहार से आये मजाहिब जैसे इस्लाम और इसाई मजहब में शामिल हुए इनको रिजर्वेशन का हक नहीं है. यह तो साफ़ तौर पर नाइंसाफी है क्योंकि हिंदुस्तान में मजहब बदलने से जात-पात नहीं बदल जाती है. हिन्दू दलित समाज के लोग चाहे वो किसी भी मजहब में अपना मजहब बदल कर गए बदनसीबी से जात-बिरादरी उनके साथ ही गयी. मजहब की तब्दीली के बाद भी दलितों के तालीमी और समाजी हालात वही रहते हैं, इसलिए सिर्फ हिन्दू, सिख और बौद्ध मजाहिब में रहे या गए दलितों को को ही रिजर्वेशन देना और दूसरे मजाहिब जैसे इस्लाम, पारसी और इसाई में गए दलित समाज के लोगों को रिजर्वेशन से महरूम रखना आईनी एतबार से ठीक नहीं है. बड़ी अजीब बात है की हिंदुस्तान में जात-पात के निजाम ने इतनी मजबूत जड़े बना ली हैं कि इंसान अपना मजहब तो बदल सकता है पर जात नहीं. जात उसको ज़िन्दगी भर परेशान करती है और मरने के बाद भी पीछा नहीं छोडती.

1985 में सुप्रीम कोर्ट ने Soosai Versus Union of India 1985 (Supp SCC 590) के फैसले में कहा था कि जात मजहब बदलने के बाद भी जारी रहती है. इसलिए कोई भी दलित समाज का फर्द चाहे सिख, बौद्ध, इस्लाम और इसाई मजहब में जाये उसकी जात उसका पीछा नहीं छोडती. हिन्दुस्तानी समाज में जो नुकसानात जात से जोड़ दिए गए हैं वो उसका पीछा बदले हुए मजहब में भी करते हैं. कोई इसको माने या न माने पर हर धर्म के मानने वाले ज़यादातर लोग जात-बिरादरी के वायरस से आज भी उसी सिद्दत से बीमार हैं जैसा पहले थे और उन्होंने अपनी यह बिमारी आज के मॉडर्न ज़माने में भी कमोवेश जारी रखी हुई है. जात-बिरादरी से जुड़े नुकसानात उतने ही बराबर हैं चाहे दलित समाज के लोग किसी भी मजहब में जायें. फिर क्यों नहीं जो दलित समाज के लोग इस्लाम और इसाई मजहब में जाते हैं उनको Scheduled Caste का फायदा दिया जाता है? यह तो मजहब के आधार पर भेद भाव हुआ. जब मजहब बदलने पर तालीमी और समाजी हालात वही रहते हैं तो फिर यह भेद भाव क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवम्बर, 1992 को अपने Indra Sawhney Versus Union of India (Supp 3 SCC 217 ) के फैसले में माना था कि जात सिर्फ हिन्दुओं तक ही महदूद नहीं है, यह दूसरे मजाहिब के मानने वालों में भी पाई जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने बिलकुल सही पहचान की और यह सच्चाई भी है. हालांकि सिख, बौद्ध, इस्लाम और इसाई मजाहिब में जात-पात का कोइ तजकिरा नहीं है. यह सभी मजाहिब उसूलन इंसानों की बराबरी की बात करते हैं, लेकिन इनके मानने वाले सिखों, बौद्धों, मुसलमानों और इसाईयों में जात-पात देखने को मिलती है. जात-पात समाज की एक कडवी हकीकत के तौर पर हमारे सामने मुंह बाए खड़ी रहती है. जो लोग हिन्दू दलितों से सिख, बौद्ध, मुस्लमान या इसाई बने वो आज भी अपनी जात-बिरादरी का दाग अपने सर पर ढौह रहे हैं. इस हकीकत से कोई इंकार नहीं कर सकता.
दलित समाज से जो लोग मुस्लमान या इसाई बने उनके लिए Scheduled Caste दर्जे की मुफलिफत करने वाले लोग कहते हैं कि यह रिजर्वेशन का फायदा मुसलमानों और इसाईयों को नहीं दिया जा सकता क्योंकि इस्लाम और इसाई मजहब में जात-बिरादरी का कोई तसव्वुर नहीं है. हाँ यह सच है. लेकिन अगर यह तर्क माने तो सिख और बौद्ध मजाहिब भी जात-पात के खिलाफ ही खड़े हुए और इनमे भी जात-पात की मनाही है पर इन मजाहिब के मानने वालों में भी जात-पात पायी जाती है और इसके वावजूद रिजर्वेशन का फायदा उनको मिल रहा है. फिर क्यों नहीं ये फायदा उन दलित समाज के लोगों तक पहुंचना चाहिए जिन्होंने इस्लाम या इसाई मजहब कबूल किया. यह कैसा इन्साफ है कि समाज में हसियत एक पेशा एक और सरकारी फायदों में भेद भाव. क्या यह इंसाफी है कि हिन्दू धोबी को तो रिजर्वेशन मिले लेकिन मुस्लिम धोबी का नहीं, जबकि समाज में इनकी एक ही हसियत है और पेशा भी. इन दोनों में ही तालीमी और समाजी पिछड़ापन है. फिर क्यों नहीं Scheduled Caste से जुड़े फायदे दोनों को ही दिए जाते हैं ?

इस मसले पर बहुत सी कमीशन और कमेटियों की रिपोर्ट आ चुकी हैं. 1969 में एल्यापेरुमल कमेटी ने कहा था Scheduled Caste से जुड़े फायदे गैर-हिन्दू दलितों को भी मिलने चाहिए. मंडल कमीशन ने 1980 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जात-पात हिन्दू मजहब में है पर इसका असर दूसरे धर्मों में भी मिलता है. 1983 में गोपाल सिंह कमीशन ने भी माना था कि Presidential Order,1950 में तरमीम हो ताकि इसके फायदे दूसरे मजहिब में गए दलित समाज के लोगों को भी मिलें. मरकजी अकलियती कमीशन ने भी पुरजोर तरीके से कहा है कि 1950 के आर्डर में तरमीम करके मुस्लिम और ईसाई समाज में गए दलितों को रिजर्वेशन और दूसरे फायदे जो Scheduled Caste को मिलते हैं वो मिलने चाहिए. इस 1950 के आर्डर को गैर-आईनी करारे देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में 3 और मुक्तलिफ़ हाई कोर्ट्स में 7 रिट पेटिसन ज़ैरे गौर हैं. 21 मई 2007 को रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने भी 1950 के आर्डर को गैर-आईनी करार दिया है और अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस आर्डर में मजहब की बुनियाद ख़त्म की जाये और Scheduled Caste उन सभी दलितों को माना जाये जो किसी भी मजहब में चले गए हैं. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह 1950 का आर्डर किसी भी हिन्दू दलित को कोई और मजहब अपनाने से रोकता है और यह हिन्दुस्तानी आईन में दी गयी उसकी मजहबी आजादी के हक की खिलाफ वर्जी है. इससे किसी भी इंसान को अपनी मर्ज़ी का मजहब अख्तियार करने पर रोक लगती है, क्योंकि अगर कोई हिन्दू दलित सिख और बौद्ध मजहब के अलावा कोई और धर्म अख्तियार करेगा तो उसको Scheduled Caste को दिए गए रिजर्वेशन के सारे फायदे से महरूम होना पड़ेगा. यह आईन की दफा 14 , 15 ,16 और 25 के खिलाफ है. आईन के मुताबिक न तो रिजर्वेशन मजहब के आधार पर हो सकता है और ना ही मजहब के आधार पर रिजर्वेशन छीना जा सकता है. लेकिन यह 1950 का आर्डर तो यही कर रहा है कि यह उन दलितों से रिजर्वेशन छीन लेता है जो गैर-हिन्दू मजाहिब जैसे इस्लाम, ईसाईयत, पारसी बगैरह में शामिल हो जाते हैं.

मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में जो लोग दलितों की लडाई लड़ रहे हैं उनको Presidential Order, 1950 को तरमीम कराने की लडाई लड़नी होगी ताकि दलित समाज के लोग जो किसी भी मजहब में हों, जिनको समाज के ज़रिये सदियों के सताने और जुल्मात से जख्म मिले हैं, वो जख्म उनके भर सकें, वो तालीमी इदारों और नौकरियों में आ सकें. अगर दलित समाज के लीडरान ऐसा नहीं करते हैं तो यह सन्देश जायेगा कि दलित सिर्फ हिन्दू और उससे जुड़े मजाहिब से ही हो सकता और उन्ही को फायदा पहुंचे. और आम लोग यह भी सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि जो दलित समाज के लोग दूसरे मजहिब में चले गए उनकी दलित समाज के लीडरान को कोई चिंता नहीं है. मतलब यह निकलेगा कि अब भी दलित सिर्फ हिन्दू समाज में ही बंधा रहना चाहता है और बाबा साहेब भीम राव आम्बेडकर की वर्ण-व्यवस्था के खिलाफ सारे संघर्षों को दलित लीडरान ने भुला दिया है. और अगर ऐसा नहीं है तो दलित समाज के लीडरान को पुख्तगी से Presidential Order , 1950 को तरमीम कराने की लडाई में साना- बसाना खड़े होना पड़ेगा.

सेकूलरिस्म हमारे आईन का अहम् उसूल है.लेकिन 1950 का यह आर्डर इस उसूल के बिलकुल खिलाफ है. इसे जितनी जल्दी दुरुस्त किया जायेगा उतना बढ़िया है. उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर जल्दी ही अपना फैसला सुनाएगा. मरकजी सरकार को भी इस गैर-आईनी आर्डर को जल्द से जल्द तरमीम करके मजहब की बुनियाद Scheduled Caste से हटा लेनी चाहिए. अगर इतनी सारी कमीशन और कमेटी की रिपोर्टों के बाद भी सरकार इस आर्डर को तरमीम नहीं करती है तो यह हमारे मुल्क के सेकुलर निजाम के लिए बढ़िया बात नहीं है. सभी मजाहिब में मौजूद दलित समाज के लोगों का विकास इससे जुडा हुआ है. इससे तालीमी इदारों में, नौकरियों में, सियासी रिजर्वेशन (पंचायतों, municipal corporation , विधान सभा और लोक सभा की सीटों में ) और जो कानून दलितों के ताफ्फुज़ में ,जैसे SC /ST (Prevention of Atrocities) Act , 1989 , Prevention of Civil Liberties Act ,1955, बनाये गए हैं इनका फायदा हर मजहब में मौजूद या गए हुए दलित समाज के लोगों को मिलेगा. सेकुलर आईन और निजाम में फायदे मजहब के आधार पर नहीं बल्कि तालीमी और समाजी हालात के आधार पर दिए जाने चाहिए.
अब्दुल हफीज गाँधी

Thursday, March 22, 2012

'संभल जाओ', वरना मार दूंगा तुमको...

हम एक उनकी आवाज़ छाप रहे हैं, जो इस देश में हिंदुत्‍व के झंडाबरदार हैं। आचार्य गिरिराज किशोर विहिप (विश्‍व हिंदू परिषद) के उपाध्‍यक्ष हैं और उग्र हिंदुत्‍व के परिभाषाकार। ये इंटरव्‍यू समकाल के संवाददाता विश्‍वदीपक ने लिया है। जो है, वो रिकॉर्डेड है। उम्‍मीद है, इनकी ज़बान हम-आप समझेंगे और अंतत: इनकी मंशा भी।
 
पूरी दुनिया के आतंकवाद को इस्‍लामी आतंकवाद कहा जा रहा है। क्‍या आप मानते हैं कि इस्‍लाम से आतंकवाद का संबंध है?
हां, आतंकवाद का संबंध इस्‍लाम से है। अभी तक सारे आतंकवादी इस्‍लाम के हैं। इस्‍लाम आतंकवाद की बुराई नहीं कर रहा है, निंदा नहीं कर रहा है। इसी से यह सिद्ध होता है कि आतंकवाद का संबंध इस्‍लाम से है।
क्‍या सिर्फ मुसलमान ही आतंकवादी होते हैं? हिंदी, ईसाई या किसी और मज़हब को मानने वाले नहीं?
मेरा यह कहना नहीं है। इस समय आतंकवाद मुसलमानों द्वारा ही चलाया जा रहा है।
फलस्‍तीन में जो कुछ इसराइल कर रहा है, क्‍या वह आतंकवाद (यहूदी आतंकवाद) नहीं है?

यहूदी ही क्‍यों, वहां मुसलमान भी कर रहे हैं। फलस्‍तीन में इसराइल जो कर रहा है ठीक कर रहा है। इसराइल 1900 वर्ष बाहर रहने के बाद घर में आया तो भी चैन नहीं लेने दिया फलस्‍तीनियों ने। वास्‍तव में आप लोगों का दृष्टिकोण ही गलत है।
आतंकवादी हिंदू धर्म में भी तो हो सकते हैं।
देखिए अपवाद एक अलग बात है। बाई एंड लार्ज हिंदू धर्म में आतंकवादी नहीं हैं।
आपकी नज़र में आतंकवाद की परि‍भाषा क्‍या है?
आतंकवाद का नज़रिया देश का विरोध...
मतलब, राष्‍ट्रवाद है आपके नज़रिये के मूल में...
हां, कह तो दिया हां।
यहां हिंदुस्‍तान में जितने भी मुसलमान हैं, वे आप द्वारा पारिभाषित राष्‍ट्रवाद की श्रेणी में नहीं आते, तो क्‍या आप पूरी मुसलमान कौम को आतंकवादी मानते हैं?
जब दो जातियों में युद्ध होता है तो उस समय फर्क नहीं किया जाता। सबको एक बराबर रखा जाता है। इंग्‍लैंड और जर्मनी में लड़ाई थी तो सारे जर्मनी वाले इंग्‍लैंड के लिए आतंकवादी थे और इसी तरह इंग्‍लैंड वाले जर्मनी वालों के लिए।
आप यह कहना चाह रहे हैं कि भारत में इस समय हिंदू और मुसलमानों में युद्ध की स्थिति है?
बिल्‍कुल युद्ध की स्थिति आ गयी है। इसमें कोई कमी नहीं है। दस वर्ष बाद फिर से 47 दोहराया जाएगा, देख लेना। और इस बार और बुरा होगा।
तो आप पोप के उस बयान से सहमत हैं, जिसमें उन्‍होंने किसी हवाले से कहा था कि इस्‍लाम हिंसा को प्रोत्‍साहन देता है?
भई, पोप ने क्‍या कहा- मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं यह जानता हूं कि कोई मुसलमान सीधा नहीं है। मुसलमान देश का भला नहीं कर रहा है।
मैं दो उदाहरण आप को याद दिलाना चाहता हूं। ब्रिगेडियर उस्‍मान खान और अब्‍दुल हमीद...
भई अपवाद हर जगह होते हैं। अपवादों की गिनती नहीं होती।
यह तो आपका व्‍यक्तिगत नज़रिया है लेकिन मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि कुछ साल पहले हंस में राजेंद्र यादव ने...
हंस एक कम्‍युनिस्‍ट पत्रिका है।
आप क्‍या कहना चाहते हैं कम्‍युनिस्‍टों के बारे में?
कम्‍युनिस्‍ट देशद्रोही होते हैं।
यदि कम्‍युनिस्‍ट देशद्रोही होते हैं तो फिर देशभक्‍त कौन है? क्‍या सिर्फ कट्टरपंथी हिंदू ही देशभक्‍त होते हैं?
भारत में हिंदू ही है जो देश के बारे में विचार करता है। कम्‍युनिस्‍ट हर चीज़ को रूस और चीन की निगाह से देखता है।
आप उस सिद्धांत को दोहरा रहे हैं जिसके अनुसार धर्म के आधार पर ही देश प्रेम की परिभाषा तय की जाती है?
धर्म की बात ही पक्‍की है, बड़ी है और देश का कानून छोटा है, कच्‍चा है। वे (कम्‍युनिस्‍ट) गद्दार हैं देश के।
भारत के दूसरे क्षेत्रों में भी अलगाववादी, हिंसक गतिविधियां चल रही हैं। पूर्वोत्तर में, कश्‍मीर में और देश के बीचोबीच नक्‍सल प्रभावित क्षेत्र हैं। क्‍या यह सब आतंकवाद नहीं है?
कश्‍मीर में मुसलमान आतंकवाद चला रहा है और असम में भी।
लेकिन असम में तो नगा और मिजो हैं और शायद आप भी जानते हैं कि वे जनजातियां हैं।
ईसाई हैं वे...
क्‍या आप इसे ईसाई आतंकवाद कहेंगे...
ईसाई जो हैं... हैं, झगड़ा कर रहे हैं। यह आतंकवाद ही तो है। जो भी देश से झगड़ा करेंगे वे सब आतंकवादी हैं।
अभी कुछ दिन पहले महाराष्‍ट्र से ख़बर आयी थी कि आरएसएस या बजरंगदल के लोग एक घर में चोरी-छिपे बम बना रहे थे और बाद में बम फट गया था, जिसमें कुछ लोग घायल भी हुए थे?
ये सारी बातें झूठ है। और इतना ज़्यादा अत्‍याचार होने के बाद अगर कोई इसका जवाब दे तो उसमें कोई ग़लत नहीं है।
मतलब यह कि गोधरा में सन 2000 में जो कुछ हुआ था उसे आप आज भी सही ठहराएंगे। तब भी आप लोगों ने इसी तरह की दलीलें दी थीं।
गोधरा में जो हुआ... क्‍या हिंदू कभी अत्‍याचार करता है मुसलमानों पर। क्‍यों आपकी दृष्टि में कोई हिंदू अत्‍याचार करता है क्‍या?
अत्‍याचारी तो कोई भी हो सकता है। उसका हिंदू या मुसलमान होने से क्‍या संबंध...
संबंध है। जिस जाति में यह पढ़ाया जाता है कि इन-इन को मारो हमेशा, वे अत्‍याचारी तो हैं ही। कुरान की लगभग 24 आयतें ऐसी हैं, जो दूसरे धर्म के विरोध में हैं।
रामचरितमानस में एक चौपाई है- ढोल, गंवार, शू्द्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी। इस चौपाई में तो मारने की बात की गयी है?
इसका अर्थ क्‍या है...
तो आपने यह कैसे मान लिया कि आयतों का यही सही अर्थ है?
आयतों का वही अर्थ है जो उन्‍होंने स्‍वयं दिया है। और ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी का अर्थ है कि इतने लोग ताड़ना के अधिकारी हैं। मतलब इन पर हमेशा अनुशासन रखना चाहिए।
आपने अभी कुरान में हिंसा फैलाने वाली आयतों की तो बात की लेकिन आपको हिंदू धर्म में भी सैकड़ों ऐसी चौपाइयां, श्‍लोक और तमाम चीज़ें मिल जाएंगी जिनमें हिंसा फैलाने की बात की गयी है। इनके बारे में आप क्‍या कहेंगे?
जो भी बातें हैं आपस के बारे में हैं। किसी दूसरे धर्म के बारे में नहीं है।
अब तक की बातचीत में आपने हिंसा पर काफी ज़ोर दिया है। शायद आप हिंसा को आतंकवाद का एक पैमाना मानते हैं। लेकिन भारत के पूरे इतिहास में महाभारत युद्ध से बड़ी हिंसा कभी नहीं हुई और कृष्‍ण ने महाभारत का युद्ध करवाया, तो क्‍या आप कृष्‍ण को आतंकवादी कहेंगे?
तुम हद करते हो, यार... बस, जाओ। कोई हिंदू इस तरह की बात नहीं करेगा। युद्ध के माध्‍यम से तो कृष्‍ण ने अधर्म को हटाया...
तो क्‍या इस समय...
अभी, वास्‍तव में मार दूंगा मैं तुम्‍हें... कृष्‍ण के बारे में इस तरह की बात करोगे तो।
तो आप यह कहना चाह रहे हैं कि हिंदू और मुसलमानों के बीच वैसा ही धर्म और अधर्म का युद्ध होने वाला है, जैसा कृष्‍ण के समय में हुआ था?
1947 में मुसलमानों ने देश का विभाजन करा दिया लेकिन फिर भी आप लोगों को अकल नहीं आयी। अब फिर विभाजन होगा।
लेकिन मोटे तौर पर इतिहासकारों का मानना है कि देश का विभाजन कराने में जिन्‍ना और अन्‍य सांप्रदायिक शक्तियों का मुख्‍य हाथ था। इनमें आरएसएस का नाम भी शामिल है।
वे सब बेवकूफ हैं। उन्‍हें कुछ भी मालूम नहीं। और इस तरह का कोई प्रमाण भी नहीं है। वे सब उल्‍टी आंखों से देखते हैं। उनकी आंखों में या तो कम्‍युनिस्‍ट चश्‍मा होता है या मुसलमानों का चश्‍मा।
हिंदू और मुसलमानों में कितने भी मतभेद हों, लेकिन इतने सालों तक साथ रहने की वजह से दोनों का एक सामूहिक सामाजिक जीवन है जहां वे बराबरी से एक दूसरे का साथ निभाते हैं...
देखो, इमामों के साथ मेरी एक बैठक थी। मैंने उनसे कहा कि यदि आपस में आप स्‍थायी मेल चाहते हैं तो चीज़ मुझे खराब लगती हो उसे आप हटा दें और जो आपको ख़राब लगती हो उसे हम हटा दें, तो वे तैयार ही नहीं हुए। कहने लगे कि कुरान से एक शब्‍द भी नहीं हटेगा।
तो, आप लोग तैयार हैं हिंदू धर्मशास्‍त्रों से इस तरह की आपत्तिजनक चीज़ें हटाने के लिए?
हां, हम तैयार हैं। हम दूसरों के बारे में बात करते ही नहीं। जो भी गुण-अवगुण हैं अपने बारे में बताते हैं। और सारा दर्शन हमारा जो है इसी बात पर निर्भर करता है। इस्‍लाम तो दर्शन है ही नहीं। उसमें तो सांसारिक बातें हैं।
तो इस्‍लाम को दर्शन नहीं मानते आप?
कह तो दिया एक बार कि नहीं।
कई रिपोर्टें और सर्वे बताते हैं कि मुसलमान जीवन के हर स्‍तर पर हिंदुओं की अपेक्षा काफी पीछे हैं, इसलिए उनको आरक्षण मिलना चाहिए। क्‍या आप मानते हैं?
नहीं मानते। एक बार आरक्षण से देश का विभाजन हो चुका है। वे देश का दूसरा विभाजन करवाना चाहते हैं। उस समय मुसलमानों का देश की राजनीति में आरक्षण था, इसलिए विभाजन हुआ। अब फिर विभाजन कराना चाहते हैं। आरक्षण किसी भी प्रकार से ख़राब है, चाहे हिंदुओं के लिए हो या मुसलमानों के लिए।
तो हिंदुओं में अनुसूचित जाति, जन‍जाति और पिछड़े वर्ग को बराबरी के लिए जो आरक्षण दिया जा रहा है उसे आप ख़राब मानते हैं?
नहीं वास्‍तव में जो ग़रीब हैं उनको आरक्षण मिलना चाहिए। आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए। अब यह क्‍या मतलब है कि ब्राह्मण है या अपर कास्‍ट है, उससे कोई मतलब ही नहीं है। चाहे बेचारा भूखा मरता हो। और एक पिछड़े वर्ग से है वह चाहे जितना कमाता हो, पैसे से भरपूर हो तब भी उसे आरक्षण मिले। क्रीमी लेयर को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

(बातचीत और भी चली लेकिन आचार्य गिरिराज किशोर ने टेप रिकॉर्डर बंद करवा दिया। इसलिए बाद की बातें रिकॉर्ड नहीं की जा सकीं।)

Wednesday, November 16, 2011

गरीब सवर्णों को ओ बी सी के बराबर मानने की सिफारिश



सवर्ण जातियों के जो लोग इनकम टैक्स नहीं देते उन्हें ओ बी सी जातियों के बराबर माना जाना चाहिए और उन्हें भी वही सुविधा मिलनी चाहिए जो पिछड़ी जाति के लोगों के लिए उपलब्ध है  आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए बनाए गए कमीशन ने अपने सुझाव में कहा है कि इन वर्गों को शिक्षा आवासस्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्रोंमें वही सुविधाएं मिलनी चाहिए जो ओ बी सी को मिलती है हालांकि इस कमीशन की सिफारिशों में नौकारियों में आरक्षण की बात नहीं कही गयी है लेकिन इसे सवर्ण आरक्षण के लिए कोशिश कर रही राजनीतिक पार्टियों के हाथ में एक महत्वपूर्ण हथियार के तौर पर देखा जा रहा है

करीब चार साल पहले केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए मानदंड तय करने के लिये एक आयोग का गठन किया थाइसे यह भी पता करना था कि इन वर्गों का कल्याण कैसे किया जाए  एजेंडा में यह भी था कि क्या इन वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण करना चाहिए कि नहीं  इस आयोग की रिपोर्ट तैयार हो गयी है  इसमें लिखा है कि करीब ६ करोड़ सवर्ण ऐसे हैं जिनको ओ बी सी के बराबर माना जाना चाहिए  कहा गया है कि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों में सभी धर्मों के लोग शामिल किये जाने चाहिए सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को शामिल किये जाने की वकालत बहुत सारी पार्टियां करती रही हैं  उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री तो हर मंच पर यह बात कहती रही हैं इस रिपोर्ट के बाद उनका काम आसान हो जाएगा कांग्रेस और बीजेपी वाले ओ बी सी में अति पिछड़े वर्ग के नाम पर आरक्षण की मांग पहले से ही कर रहे हैं उनकी कोशिश है कि पिछड़ों के लिए उपलब्ध २७ प्रतिशत के आरक्षण में से मुलायम सिंह यादव की पार्टी के मुख्य समर्थक यादवों को केवल ५ प्रतिशत ही आरक्षण दिया जाए  आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के आरक्षण के लिए भी राजनीतिक ज़मीन तैयार हो जाने के बाद बीजेपी वाले समाजवादी पार्टी को कमज़ोर करने की अपनी कोशिश तेज़ कर देगें  अभी कुछ दिन पहले ही केंद्र सरकार के योजना आयोग ने पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों के नाम पर कोटा के अंदर कोटा की बहस शुरू की थी  अब आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों की बात को भी नौकरियों के रिज़र्वेशन की बहस में झोंक कर उत्तर प्रदेश की सबसे मज़बूत विपक्षी पार्टी पर ज़बरदस्त राजनीतिक हमला हो सकता है

आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के कमीशन की रपोर्ट में यह तो लिखा है कि इन वर्गों के सवर्णों को सामाजिक रूप से तो वह अपमान नहीं झेलना पड़ता जो दलित जातियों के लोगों को झेलना पड़ता है इस कमीशन ने देश के २८ राज्यों का दौरा करके अपनी रिपोर्ट तैयार की है और कहा है कि एक करोड़ परिवार इस श्रेणी में आते हैं  अगर प्रति परिवार छः लोगों की संख्या मान ली जाए तो यह आबादी छः करोड़ के आस पास पंहुच जाती है अगर सरकार इन सिफारिशों को स्वीकार कर लेती है तो देश के राजनीतिक माहौल में कुछ उसी तरह का परिवर्तन आ जाएगा जैसा मंडल कमीशन के सुझावों को मान लेने के बाद १९९० में आ गया था.