Sunday, May 18, 2014

मुझ से छेड़छाड़ करके कोई भी दल नतीजों को अपने पक्ष में मोड़ सकता है


( यह लेख शायद प्रकाशित तो 16 मई के बाद हो पाये पर यह लेख लिखा तब गया है जब चुनाव के नतीजे आना बाकी हैं - ऐसा बताना इसलिए ज़रूरी है ताकि मेरी निष्पक्षता पर सवाल न उठाया जा सके कि चुनाव के नतीजों से नाखुश हो कर मैं ईवीएम की कमियाँ गिना रहा हूँ।)
मैं इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन हूँ, प्यार से मुझे ईवीएम भी कहते हैं।  लगभग 20 साल पहले जब भारत के चुनावों में मेरा पदार्पण हुआ था तो मेरा स्वागत बड़े जोर-शोर से हुआ था।  चुनावों में होने वाले धांधली पर नकेल कसने की मेरी क्षमता की बड़ी सराहना हुई और देश भर में होने वाले चुनावों में मेरे इस्तेमाल की पुरज़ोर वकालत हुई।  धीरे-धीरे कागज़ पर ठप्पा लगा कर वोट देने की पारम्परिक प्रणाली को मैंने पीछे छोड़ दिया और मेरा नाम "स्वच्छ चुनाव" का प्रयाय बन गया। चुनाव में कोई भी पार्टी जीतती, जीत का सेहरा मेरे ही सर पर बाँधा जाता और मुझे निष्पक्ष चुनाव करवाने का ज़रूरी औजार माना जाने लगा। 

पर समय हमेशा एक सा नहीं रहता।  16 मई 2014 का चिर-प्रतीक्षित दिन आएगा और जब मेरा कलेजा फाड़ कर चुनावी नतीजे निकाले जायेंगे तब जीत चाहे किसी भी दल या गठबंधन की दर्ज हो मुझे मेरी हार साफ़ नज़र आ रही है। 

इसका एक बड़ा कारण तो यह है कि यह चुनाव बेहद अहम और पूर्ववर्ती चुनावों से काफी अलग हैं। चुनाव प्रचार के दौरान भी जिस तरह की कटुता देखने को मिली है उससे यह बात तो पक्की है कि कोई भी दल अपनी हार और विरोधी की जीत को आसानी से स्वीकार नहीं कर पायेगा और चुनाव आयोग और मुझ पर पक्षपात के आरोप अवश्य लगेंगे।

इससे पहले भी कई बार यह आरोप लगे हैं कि ईवीएम, यानि मैं , इतनी विश्वसनीय नहीं हूँ और मुझ से छेड़छाड़ करके कोई भी दल नतीजों को अपने पक्ष में मोड़ सकता है - पर मेरी वकालत करने वालों ने और खुद चुनाव आयोग ने ऐसे आरोपों को राजनीति से प्रेरित करार दे कर किनारे कर दिया। 

पर शायद समय आ गया है कि राजनैतिक दुर्भावना को ही हमेशा अपनी ढाल बनाने की आदत से बच कर मैं खुद अपने गरेबान में झाँकने की कोशिश करुँ। 

1. इस बात से तो हर कोई इत्तफाक रखता ही होगा कि जब 1980 के दशक में मेरा जन्म हुआ था तब से आज तक टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भरी बदलाव आ चुके हैं।  मेरा डिज़ाइन तो लगभग वही है जो मेरे जन्म के समय था,लेकिन पिछले 20 सालों में बदली तकनीक, जो सस्ती और आसान भी हो चुकी है, बड़े आराम से उन सेंधमारों के हाथ की ताकत बन चुकी है जो बड़े आराम से मेरे पुराने और बेकार हो चुके सुरक्षा घेरे को तोड़ सके।  इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि राजनैतिक दल अथवा कोई 'समझदार' नेता चंद पैसे में मेरी कमियों का फायदा उठा कर नतीजों पर प्रभाव डाल सकता है। 

जानकारों का मानना है चुनाव से पहले, वोट डालने के समय और बाद में जब बंद मशीनें सुरक्षित कमरों में सो रही होती हैं और मतगणना के दिन का इंतज़ार कर रही होती है तब भी दूर बैठा कोई सेंधमार मुझ से छेड़छाड़ कर सकता है। 

2. मेरी वकालत करने वाले हमेशा यह दलील देते रहे हैं कि मेरे आने से बूथ पर कब्जा होने की घटनाएं बहुत कम हो गई है पर ऐसी खबरें हर तरफ से आ रहीं हैं कि बूथ पर कब्जा करना कम नहीं हुआ है बल्कि और आसान हो गया है। यह सब इतनी चतुराई से और चुपचाप हो जाता है कि ऊपर से देखने पर लगता है कि कुछ हुआ ही नहीं पर अंदरखाने गड़बड़ हो भी जाती है। यह खबरें भी आई हैं कि बूथ पर चुनाव करवाने वाले अफसरों के दल में भी लोग मेरे बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते और ऐसी स्थिति में जानबूझ कर अथवा अनजाने में भी गलतियाँ होने की सम्भावना बनी रहती है। 

3. ऐसा नहीं है कि सिर्फ जान बूझ कर ही मेरे साथ छेड़छाड़ की जाती है, जानकारों का मानना है कि अनजाने में भी ऐसी गड़बड़ें हो सकती है जो मेरी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती हैं। जैसे अत्यधिक गर्मी, धूल, नमी और ठण्ड जैसे हालातों में मेरा परीक्षण पूरी तरह से हो सका है या नहीं इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। अत्यधिक गर्मी, या ठण्ड या धूल आदि में मेरे सर्कट में गड़बड़ होने पर बाहर से देखने में कुछ फ़र्क चाहे न दिखे पर वोटों की गिनती यहाँ की वहाँ हो सकती है। 

अंत में मेरी तरफ से चुनाव आयोग से सिर्फ इतनी ही प्रार्थना है कि मेरी विश्वसनीयता बरकरार रखने के लिए जल्दी कुछ कीजिये क्योंकि मेरे कन्धों पर भारत के लोकतंत्र का भविष्य टिका है। और कोई हारे या जीते मैं हारना नहीं चाहती, मेरी जीत का सेहरा मुझे वापिस दिलवाइये।