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Saturday, December 17, 2011

एक अहिंसक वीरांगना- ईरोम शर्मीला


 
एक अहिंसक वीरांगना- ईरोम शर्मीला
आजकल मणिपुर जनता और देश भी इरोम शर्मिला के 11 साल से चल रहे आमारण अनशन से जूझ रही है। वह एक कृत्रिम जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य है। अस्पताल उसका मजबूरी का घर बना हुआ। संभवतः विश्व की वह सबसे लंबा अनशन है जो किसी व्यक्ति वह भी एक महिला ने, अपने लोगों के ऊपर हुए अत्याचार के विरोध में किया है। यह दिसंबर 11 का है और इरोमा ने यह अनशन नवंबर 2000 में मणिपुर के मलोम नगर में सेना  द्वारा आर्मड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट के चलते दस लोगों को गोलियों की भेंट चढ़ा दिया था। आज शर्मीला के अनशन ने मणिपुर को संसार के नक्शे पर ला दिया। उस समय इरोम शर्मीला 28 वर्ष की रही होगी। अब वह 40 साल के लगभग है। उसे लोग अब आयरन लेडी के नाम से पुकारते हैं। अस्पताल में वह अपने संबधियों और मित्रों की जगह सिपाहियों से घिरी रहती है। हर पंद्रह रोज़ में एंबुलेंस में एरोमा को हाज़री देने कचहरी जाना पड़ता है। अगर उससे कोई पूछता है कि क्या तुम अपना अनशन तो़ड़ने के लिए राज़ी वह बिना हिचके इनकार कर देती है, नहीं। उसकी नाक में ट्यूब लगा है जिसके ज़रिए उसे खाना पंहुंचाया जाता है, कृत्रिम खाना। इसी वजह से अब उसका वज़न, बताया जाता है, 37 किलो रह गया। 11 साल में शायद सब खाद्य-पदार्थों का स्वाद भी भूल गई होगी। यह कोई कम बड़ी तपस्या नहीं कि युवा अवस्था में जब सब से अधिक खाने पीने के प्रति बच्चे समर्पित होते हैं एरोमा शर्मीला ने अपने लोगों के लिए उसे भी त्याग दिया। कितने दिन तक वह इस अनशन को इसी तरह जिएगी इसकी किसे चिंता है? और क्यों हो? यह सबसे बड़ा तप है युवावस्था में सारे आकर्षण छोड़कर शरीर को काष्टवत बना लेना और अपने मूल्यवान युवा जीवन के 11 वर्ष अनशन करते हुए, नाक के ज़रिए कृत्रिम भोजन लेकर जीवित रहने के लिए बाध्य होना। यह देश जो अपने को करूणा का स्रोत कहते नहीं अघाता फिर एक महिला पर यह अन्याय कैसे बर्दाश्त करता है?

ईरोमा शर्मीला जैसा कि पहले भी कहा गया अब 39 वर्ष की हो चुकी है। अविवाहित तो है ही पर उसने अपनी सब मानवीय भावनाओं और शारीरिक मूल वासनाओं का परित्याग किया हुआ है। ऐसा नहीं कि उसके मन में कोमल भावनाएं नहीं हैं। उसने एक ब्रिटिश पत्रकार से अपनी इन भावनाओं को प्रकट किया है। गोआ मूल के ब्रिटिशर डेस्मेंड कोटिनो से उसका पूरे एक वर्ष तक पत्र व्यवहार रहा है। पिछले मार्च में वह केवल एक बार उससे मिली भी है। वह भी सामान्य मनुष्य का सा जीवन जीना चाहती है। लेकिन जिस AFSPA कानून को वापिस लिए जाने के लिए वह 11 साल से हर तरह का कारावास जीवन जी रही है, जो उसकी पहली शर्त है, उसकी वापसी की निकट भविष्य में कोई आशा नज़र नहीं आती। भारत सरकार एक पूंजीपति की एयरलाइन्स बचाने के लिए तो सक्रिय हो सकती है, पर 11 साल से कारावास में अपने प्रदेश के नागरिकों की सुरक्षा  के लिए मार्शल लॉ जैसै AFSPA को वापिस लिए जाने की प्रतीक्षा में अनशन करने वाली वीरांगना से बात करने के लिए तैयार नहीं। AFSPA को वापिस लेने की मांग केवल मणिपुर में ही नहीं जेके में भी उठ रही है। वहां के मुख्यमंत्री ने इस सवाल को उठाया है।

यह बहुत बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि मणिपुरी की सिविल सोसायटी के लोग उसकी इस प्रेम भावना को वितृष्णा से देखते हैं। उनका ख्याल है कि प्रेम उनके बीच साजिशन रोपा गया है। इस घटना से शायद मणिपुरवासियों के अहं को चोट पहुंची है। क्या शर्मीला को अपनी निजी जीवन के बारे में कल्पनाएं सजोने और आकांक्षाऐं रखने का कोई अधिकार  नहीं है? खासतौर से जब वह यह कह चुकी है कि वह तब तक विवाह नहीं करेगी जब तक यह काला कानून वापिस नहीं होगा। यह इंताह है कि कि जिस अखबार मे शर्मीला के इंटरव्यू छपते हैं उनका मणिपुर में बहिष्कार किया जाता है। आखिर कब तक सिविल सोसायटी उसके साथ ऐसा कठोर व्यवहार करती रहेगी। वह क्या यह नहीं समझती कि उनके इस आंदोलन को सबसे अधिक प्रतिष्ठा इस अनशन ने दिलाई है। जे के भी इस कानून को वापिस लेने के लिए आवाज़ उठा रहा है लेकिन वहां अभी तक कोई शर्मीला नहीं पैदा हुई। वहां के मुख्यमंत्री इस सवाल को उठा रहे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व कश्मीर से ‘शर्मीला बचाओ’ यात्रा एक कश्मीरी सज्जन फैज़ल भाई के नेतृत्व में चलकर कई राज्यों से होकर मणिपुर गई है। उसमें मधयप्रदेश, पंजाब,गुजरात आदि प्रदेशों के प्रतिनिधि सम्मिलित हैं। काशमीर के कुछ ऐसे युवा कार्यकर्ता भी शामिल थे जिन्हें इस कानून के अंतर्गत उठाकर दो दो तीन साल गिरफ्त में रखा गया था। स्वाभाविक है शर्मीला के अनशन की सहानुभूति लहर कश्मीर तक पहुंची है। वह यात्रा कानपुर भी आई थी, उसकी बैठक हरिहर शास्त्री भवन में हुई थी। उसकी इध्यक्षता का अवसर मुझे दिया गया था। गुजरात भी एक खामोश दमन का शिकार बताया जाता है। यह अच्छा संकेत नहीं है।

अभी AFSPA को हटाने की सुरसुराहट भी नहीं है। ऐसा लगता है शर्मीला को अपने प्रण के अनुपालन में अपना अनशन  पता नहीं कब तक जारी रखना पड़े। अगर ऐसा हुआ तो उसके जीवन के साथ उसका प्रेम भी बलि चढ़ जाएगा। गृहमंत्री का कहना है कि सरकार भी इस मामले पर एकमत नहीं है। सेना को अगर इस मसले पर निर्णय लेना है तो कोई भी अपने दमनात्मक अधिकारों को जल्दी छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता। हत्या या दंड सत्ता का सबसे बड़ा हथियार होता है। खासतौर से उस जब कानूनन भी अधिकार प्राप्त हो।

11 साल के दौरान, जैसा कि पहले कहा गया, वह बहुत कमज़ोर हो गई है। स्नायु तंत्र भी प्रभावित हुआ है। उससे कुछ मित्रों ने कहा कि तुम सोनिया जी को सख्त शब्दों में पत्र लिखो। तो वह रोने लगी ‘मैं कुछ भी सख्त लिखकर किसी का दिल नहीं दुखाना चाहती। मै जैसे जी रही हूं जी लूंगी।‘ वह मन से पूरी तरह गांधीवादी है। मनसा वाचा कर्मणा वह अहिंसा में विश्वास करती है। ऐसी स्त्री को ऐसी हालत में कैंद में रखना और उसके सपनों में को शनैः शनैः तोड़ना कितना मानव विरोधी है और कहां तक जायज़ है। सरकार लोहे की जंज़ीर ही नहीं होती उसका एक पक्ष संवेदनशीलता से भी जुड़ा होना चाहिए। जो सरकारें दमन के सहारे चलती हैं उनका अशहर स्टालिन, मुसोलीनी और गद्दाफी जैसे तानाशाहों की तरह होता है। इस तरह के कानून अनन्तकाल तक नहीं बने रह सकते। जब बदलाव आता है तो बड़ी बड़ी चट्टानें ढह जाती है। अनशन की परंपरा और अहिंसा की पुकार के चलते ही अंततः इस तरह के कानून रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाते हैं। कानून संवेदना विहीन ज़रूर होते हैं पर उन्हें इन्सानों की बेहतरी के लिए इस्तेमाल किया जाए तो समाज को जोड़ने के काम आते हैं। सहनशीलता और मौन अंततः इंसानों के पक्षधर बनकर सामने आते हैं। मुझे बार बार बर्मा की सू की की याद आती है। वह बिना उफ़् किए गांधी की तरह हर दमन को अपने हिस्से की रोटी समझ कर हज़म करती रही है। लेकिन मणिपुर वासी यह भारतीय वीरांगना भी किसी भी हाल उनसे कम नहीं। 11 वर्ष तक भूखा रहकर जेल की यातना सहना और अपने व्यक्तिगत सुखों को बिसार कर अपनी सांसों को  समाज के नाम मौरूसी कर देना, उसे और भी ऊपर भी ऊपर उठा देता है। हम जिस दुनिया में रह रहे हैं उस दुनिया में इस तरह के बलिदानों का कोई मूल्य नहीं। शायद इसी मूल्यहीनता के कारण ही मणिपुर की सिविल सोसायटी और देश के समर्थन के बावजूद शर्मीला आज इतने बड़ा बलिदान के बाद अकेली है। शर्मीला बचाओ यात्रा और दस दिसंबर को दिल्ली के राजघाट पर देश भर की हज़ारों महिलाओं का उपवास, हो सकता है इस राजनीतिक जड़ता को तोड़ने में कामयाब हो सके। आमीन!

Tuesday, December 13, 2011

इरोम शर्मीला-एक दृढ़ इच्छाशक्ति का नाम



गत 11 वर्षों से मणिपुर में विशेष सशस्त्र बल अधिकार अधिनियम के विरूध्द भूख-हड़ताल करने वाली इरोम चानू शर्मीला भारतीय महिलाओं के लिए मिसाल है। उन्होंने अपने निरक्षर मां के साथ यह अनुबंध कर लिया है कि जब तक वह इस सामाजिक-राजनीतिक लक्ष्य को पर्याप्त नहीं कर लेतीं, तब तक एक-दूसरे से नहीं मिलेंगी।

प्रश्न यह उठता है कि देश के भिन्न-भिन्न भागों में सशस्त्र बलों को दिए जाने वाले विशेषाधिकार मानवाधिकारों का हनन क्यों करते? वे निर्दोष, निरपराध व्यक्तियों की हत्या, संपत्ति की लूट तथा महिलाओं के साथ बलात्कार का अधिकार क्यों देते? यदि इस प्रकार के कानून-अधिनियम सरकार द्वारा बनाए गए हैं तो सरकार को एक समिति का गठन कर विचार करना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार के कानून सामाजिक समरसता को हानि ही पहुंचाते हैं।

इरोम चानू शर्मीला ने सत्याग्रह के इन साधनों का प्रयोग क्यों किया? यह इसलिए कि भारतीय संस्कृति में इसका बार-बार प’योग किया गया है।

2 नवम्बर, 2000 को असम रायफल्स ने मणिपुर की राजधानी इंफाल के समीप मलोम कस्बे में बस की प्रतीक्षा कर रहे दस निर्दोष नागरिकों की अंधाधुंध गोलियों की वर्षा करके हत्या कर दी। इसमें सीनियर सिटिजन 62 वर्षीया लेसंगबम इबेतोमी तथा सिनम चंद्रमणि भी मारी गयीं। इन दस व्यक्तियों की हत्या ने इरोम चानू शर्मीला को हिलाकर रख दिया। वे कवयित्री, पत्रकार तथा समाजसेवी के साथ स्त्री भी है। बड़ी परेशान रही शर्मीला ने अध्ययन किया कि भारतीय सुरक्षा बलों को यह विशेषाधिकार पर्याप्त है कि वे कहीं भी किसी भी समय बिना वारंट के घुसकर तलाशी और गोलियां चला सकते हैं तथा वे निरपराध जनों को गिरफ्तार कर सकते हैं। एक नवम्बर, 2000 को यह घटना घटी। लगातार मंथन के बिना 3 नवम्बर, 2000 को इन्होंने अन्न जल ग’हण किया और 4 नवम्बर, 2000 को भूख हड़ताल पर बैठ गयीं। सरकार ने उन्हें तीसरे दिन गिरफ्तार कर लिया तथा धारा-309 के तहत आत्महत्या करने के आरोप मढ़ते हुए जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के वार्ड में रखा है और वहीं उनके नाक में जबरन तरल पदार्थ दिया जाता है।

जब सन् 2004 में मणिपुर लिबरेशन आर्मी की सदस्या होने के आरोप में थंगियम मनोरमा के साथ सामूहिक बलात्कार तथा नृशंस हत्या हुई तो इसकी चर्चा सारे भारत में हुई। मणिपुरी महिलाओं ने असम रायफल्स के मुख्‍यालय कांग्ला फोर्ट पर नग्न होकर विशाल प्रदर्शन किया तथा उन्होंने त’तियों पर लिखा था – ”भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो”। इस प्रदर्शन ने दुनिया का ध्यान अन्यायी और अत्याचारी विशेषाधिकार सशस्त्र बल अधिनियम की तरफ खींचा।

दिल्‍ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल के लिए होने वाला अनशन तो प्रमुखता से मीडिया में स्थान पा जाता है पर पूर्वोत्तर पर क्यों नहीं? इरोम चानू शर्मीला पर मीडिया कवरेज क्यों नहीं? क्योंकि वह पूर्वोत्तर से है या वो एक स्त्री है? यह सवाल देश की आधी आबादी तथा बुध्दिजीवियों से किया जा सकता है।

यह भी बता दूं कि इरोम चानू शर्मीला के आदर्श राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को अपने सत्याग्रही साधनों द्वारा सास्टांग दंडवत करा दिया था। जब उन्होंने महात्मा गांधी की समाधि पर श्रध्दांजलि अर्पित की तो उन्हें गिरफ्तार कर दिल्‍ली के एक अस्पताल में ले जाकर तथा पुन: मणिपुर भेज दिया गया। अहिंसक सत्याग्रह के माध्यम से क्रांति का बिगुल फूंकने वाली यह महिला नारीवादियों के लिए क्रांति की मिसाल है।

शर्मीला के अहिंसक सत्याग्रह का ही परिणाम है कि भारत सरकार ने सन् 2004 में उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया कि क्या इस कानून को समाप्त कर दिया जाना चाहिए या इसमें संशोधन की जरूरत है। 2005 में आयोग ने यह सुझाव दिया कि इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए तथा इसके कई प्रावधानों को समायोजित किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार ने इस आयोग की अनुशंसा पर ध्यान नहीं दिया। अत: जरूरी है कि सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया जाए।

इरोम चानू शर्मीला का कहना है कि जब तक भारत सरकार विशेषाधिकार अधिनियम – 1958 को समाप्त नहीं कर देती, तब तक मेरा यह आंदोलन जारी रहेगा। उसका यह भी कहना है कि यह कानून वर्दीधारियों को बिना किसी सजा के भय के बलात्कार, अपहरण और हत्या करने का अधिकार देता है। यह कानून 1958 में नगालैंड में लागू था तथा यह 1980 से मणिपुर में भी लागू है।

Wednesday, November 02, 2011

देश के नक्कारखाने में पूर्वोत्तर की चीखें


सुदूर पूर्वोत्तर राज्यों की आवाज दिल्ली आते-आते  कितनी कमजोर हो जाती हैं, इसका ताजा उदाहरण बना हुआ है मणिपुर। आमतौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों की ओर दिल्ली यानी केंद्र सरकार और मीडिया के एक बड़े वर्ग का ध्यान तभी जाता है जब वहां कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आती है या फिर कोई पड़ोसी देश उन सीमावर्ती राज्यों के साथ कोई छेड़खानी करता है। राष्ट्रीय या अखिल भारतीय कहे जाने वाले राजनीतिक दलों या फिर राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता की जोड़तोड़ में शामिल दलों को भी केंद्र में सरकार बनाते या गिराते वक्त ही याद आता है कि पूर्वोत्तर के राज्य भी भारत का ही हिस्सा है, क्योंकि उन्हें वहां से निर्वाचित क्षेत्रीय दलों के सांसदों का समर्थन चाहिए होता है। इसके अलावा उन राज्यों में दैनिक जनजीवन में क्या कुछ होता है और वहां लोगों को किन आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है, इससे किसी का कोई सरोकार नहीं होता। यह तथ्य एक बार नहीं, कई बार साबित हुआ है और इस समय मणिपुर के हालात से एक बार फिर साफ-साफ साबित हो रहा है।


बीते कई वर्षों से जारी उग्रवाद और अलगाववाद की लपटों में  बुरी तरह झुलस रहा पूर्वोत्तर का छोटा सा लेकिन खूबसूरत मणिपुर राज्य इस समय अपने सबसे मुश्किल भरे दौर से गुजर रहा है। इस बार उसके सामने संकट उग्रवाद का नहीं बल्कि विभिन्न स्थानीय समुदायों के बीच अपनी पहचान और वर्चस्व को लेकर बढ़ते तनाव का है। एक अलग जिले के गठन के सवाल पर राज्य के कूकी और नगा समुदाय एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। कूकी समुदाय का संगठन 'द सदर हिल्स डिस्ट्रिक्ट डिमांड कमेटी' नगा बहुल सेनापति जिले को विभाजित कर सदर हिल्स जिले के गठन की मांग कर रहा है। सदर हिल्स इलाका कुकी बहुल सब-डिविजन है। कूकी समुदाय की इस मांग का नगा समुदाय का संगठन 'द युनाइटेड नगा काउंसिल' विरोध कर रहा है। मणिपुर घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले दो रास्ते हैं जिनमें से एक रास्ता कूकी बहुल इलाके से गुजरता है जबकि दूसरा नगा बहुल इलाके से। दोनों संगठनों ने अपनी-अपनी मांग को लेकर इन रास्तों पर पिछले तीन महीने से भी ज्यादा समय से आर्थिक नाकेबंदी लागू कर रखी है, जिसके चलते मणिपुर घाटी के बाशिंदों खासकर मैतेई समुदाय के लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। इस प्रकार राज्य के तीनों प्रमुख समुदाय एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं।

आर्थिक नाकेबंदी की वजह से राज्य के इस इलाके में रसोई गैस, पेट्रोल, डीजल, दवाइयां जैसी जरूरी वस्तुओं का अभाव हो गया है और कालाबाजारियों और जमाखोरों की बन आई है। वे मनमाने दामों पर चीजें बेच रहे हैं जिसके चलते रसोई गैस का सिलेंडर 1800 स्र्पए में तथा पेट्रोल 100 स्र्पए और डीजल 80 स्र्पए प्रति लीटर में भी मुश्किल से उपलब्ध हो रहा है। आलू और प्याज 50 से 60 स्र्पए किलो तक मिला रहा है। हालात विस्फोटक हो गए हैं और भयावह खूनखराबे को न्योता दे रहे हैं। इस मौके का फायदा उठाने के लिए राज्य में पहले से सक्रिय उग्रवादी संगठन भी तैयार बैठे हैं। अफसोस की बात यह है कि राज्य सरकार किसी समाधान पर नहीं पहुंच पा रही है और केंद्र सरकार भी मूकदर्शक बनी हुई है। सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं, एक राजनीतिक दल के तौर पर कांग्रेस की चुप्पी भी कम अफसोसनाक नहीं है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में किसानों पर लाठीचार्ज होता है तो वहां पदयात्रा करने पहुंच जाते हैं। बिहार में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग होती है तो वे वहां का भी दौरा कर आते हैं, लेकिन उन्हें मणिपुर बिल्कुल याद नहीं आता।

देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी और जल्द से जल्द जैसे भी हो, सत्ता में आने को बेताब भारतीय जनता पार्टी के एजेंडा में भी मणिपुर या पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए कोई खास जगह नहीं है। हां कभी-कभी उसे असम की याद जरूर आ जाती है। वहां वह बांग्लादेशी शरणार्थियों और वहां के कथित घुसपैठियों का मुद्दा उठा कर राज्य की राजनीति में साम्प्रदायिक धु्रवीकरण की कोशिश करती रहती है। लेकिन मणिपुर या अस्र्णाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड में उसके लिए इस तरह की राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं रहती है, इसलिए इन राज्यों की ओर सामान्यतया उसका ध्यान नहीं जाता है। हां, इन राज्यों में ईसाई मिशरियों की गतिविधियों और यदा-कदा होने वाली धर्मातंरण की घटनाओं को लेकर वह अपनी हिन्दुत्व जनित परेशानी का इजहार जरूर कर देती है। जहां तक वामपंथी दलों और विभिन्न दलों में बंटे समाजवादियों की बात है तो वामपंथी तो अभी तक पश्चिम बंगाल और केरल में मिली हार के सदमे से ही उबर नहीं पाए हैं और समाजवादियों के लिए तो अब मानो उत्तर प्रदेश और बिहार ही पूरा देश है। डॉ. लोहिया, मधु लिमए और सुरेंद्र मोहन के बाद मणिपुर जैसे सवालों पर सोचने और बोलने वाला कोई नेता या चिंतक अब समाजवादियों में है ही नहीं।

सवाल सिर्फ मणिपुर में इन दिनों चल रही आर्थिक नाकेबंदी का ही नहीं है, पूर्वोत्तर के राज्यों से जुड़ा इस तरह का जब भी कोई मामला आता है तो क्या सरकार, क्या राजनीतिक दल और क्या मीडिया कोई भी उसे कभी गंभीरता से नहीं लेता। मणिपुर की ही इरोम शर्मिला चानू हैं जिनके अनशन को आगामी चार नवंबर ग्यारह वर्ष पूरे हो रहे हैं। उनकी मांग है कि मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटाया जाए क्योंकि इस कानून की आड़ में वहां तैनात सशस्त्र बलों के जवान निर्दोष लोगों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करते हैं और उनके द्वारा महिलाओं का अपहरण और बलात्कार किया जाना आम बात है। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में यह कानून लागू है। इरोम शर्मिला के आरोपों की जांच करने की जहमत भी कभी सरकार ने नहीं उठाई। मणिपुर हो या जम्मू-कश्मीर जब भी वहां तैनात सशस्त्र बलों पर फर्जी मुठभेड़ में किसी को मार दिए जाने, लूटपाट करने या महिलाओं से बलात्कार करने के आरोप लगते हैं और उनकी जांच कराने की मांग उठती है तो सरकार का एक ही घिसापिटा जवाब होता है कि ऐसा करने से सशस्त्र बलों का मनोबल गिरेगा। जनता के मनोबल का क्या होगा, इस बारे में सरकार कभी नहीं सोचती। अपने इसी रवैये के चलते दिल्ली में भ्रष्टाचार और जन लोकपाल के सवाल पर अनशन करने वाले अण्णा हजारे और बाबा रामदेव के आगे सिर के बल खड़ी हो जाने वाली सरकार और उनके अनशन का चौबीसों घंटे लाइव प्रसारण करने वाले टीवी चैनलों ने कभी शर्मिला की सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। अण्णा हजारे और बाबा रामदेव की पालकी के कहार बनने को आतुर रहने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी कभी शर्मिला से मिलना मुनासिब नहीं समझा। सिर्फ इसलिए कि मणिपुर छोटा सा राज्य है और वहां से लोकसभा के सिर्फ दो सदस्य चुने जाते हैं।

दरअसल, असम के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी सभी राज्यों की आबादी जनजाति बहुल है। वहां के लोगों की कद-काठी और चेहरे-मोहरे, उनकी संस्कृति, उनकी सामाजिक परंपराए, रीति-रिवाज और उनकी भाषाएं शेष भारत के लोगों से काफी अलग है। इसीलिए न तो शेष भारत खासकर उत्तर भारत के लोग उन्हें अपनी ही तरह भारत का नागरिक मानते हैं और न ही वे लोग शेष भारत के लोगों के साथ अपना जुड़ाव कायम कर पाते हैं। इस दूरी को पाटने और समूचे पूर्वोत्तर के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार की ओर से भी राजनीतिक व सामाजिक संगठनों की ओर से भी कभी कोई संजीदा पहल नहीं की गई। कहने की आवश्यकता नहीं कि पूर्वोत्तर को हम सिर्फ भारतीय भू भाग का हिस्सा भर मानते हैं। भावनात्मक तौर पर यह अलगाव ही भौगोलिक अलगाव को बढ़ावा देता है। इस अलगाव के चलते ही कभी चीन अस्र्णाचल पर अपना दावा कर देता है तो कभी नगालैंड और मिजोरम के लोग देश से अलग होने की बात करते हैं। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बने अलगाववादी संगठन और वहां चलने वाली उग्रवादी गतिविधियों के लिए सबसे ज्यादा अगर कोई जिम्मेदार है तो वह है केंद्र सरकार और राजनीतिक दलों का उपेक्षित रवैया तथा शेष भारत के लोगों की तंगदिली और स्वार्थीपन।

Tuesday, November 01, 2011

अफ्स्पा पर दाएं-बाएं करती यू.पी.ए सरकार


यू.पी.ए सरकार का मौके गंवाने में कोई सानी नहीं है. कश्मीर समस्या इसकी एक और मिसाल है. यह सचमुच हैरानी की बात यह है कि कश्मीर में अनुकूल राजनीतिक हालात होने के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार साहसिक राजनीतिक पहलकदमी लेने से हिचकिचा रही है.
चिंता की बात यह है कि खुद गृह मंत्रालय का दावा है कि कश्मीर में हालात पहले से बेहतर हुए हैं. आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है. लेकिन इसके बावजूद केन्द्र सरकार न सिर्फ मानसिक रूप से कोई साहसिक राजनीतिक पहलकदमी के लिए तैयार नहीं दिख रही है बल्कि लगातार परस्पर विरोधी संकेत दे रही है.
इससे स्थिति के फिर से बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है. ऐसा लगता है कि वह कश्मीर के मामले में एक कदम आगे और दो कदम पीछे की रणनीति पर चल रही है. इसका नतीजा यह हुआ है कि कश्मीर मामले में यू.पी.ए सरकार की स्थिति नौ दिन चले अढाई कोस की है.
उदाहरण के लिए, कश्मीर घाटी से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट यानी अफ्स्पा) को हटाने के मुद्दे को ही लीजिए. इस मुद्दे पर केन्द्र और राज्य सरकार के अंदर भ्रम और मतभेद की स्थिति यह है कि बाएं हाथ को पता नहीं है कि दायाँ हाथ क्या कर रहा है?
हैरत की बात नहीं है कि खुद केन्द्र सरकार और राज्य की उमर अब्दुल्ला सरकार के अंदर से इस मुद्दे पर जिस तरह से परस्पर विरोधी बयान आ रहे हैं और खुली राजनीति शुरू हो गई है, उससे लगता नहीं है कि इनमें से कोई भी वास्तव में अफ्स्पा को राज्य से हटाने के मुद्दे पर गंभीर है.
अफ्स्पा के मुद्दे पर कई मुंह से बोलती सरकार न सिर्फ अपना ही मजाक उड़ा रही है बल्कि घाटी में एक बड़ी राजनीतिक पहलकदमी लेने के लिए अनुकूल माहौल बनाने का मौका चूक रही है. इसका फायदा किसे होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है.
ऐसा नहीं है कि राज्य से अफ्स्पा हटा लेने से कश्मीर का मुद्दा रातों-रात सुलझ जाएगा या वहां पूरी तरह से अमन-चैन आ जाएगा या फिर वहां की सभी राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक समस्याएं खत्म हो जाएँगी.
असल में, कश्मीर मुद्दे के स्थाई राजनीतिक समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों, संगठनों और समूहों से बातचीत का रास्ता साफ़ करने के लिए जरूरी है कि कश्मीर घाटी का पूरी तरह से वि-सैन्यीकरण किया जाए. इस वि-सैन्यीकरण की दिशा में पहला कदम अफ्स्पा को हटाना है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि अफ्स्पा हटाने से कश्मीर घाटी में लोगों में भरोसा पैदा करने और अनुकूल राजनीतिक माहौल बनाने में मदद मिलेगी.
सच यह है कि अफ्स्पा का समय पूरा हो चुका है. इसकी वजह यह है कि न सिर्फ कश्मीर में बल्कि देश के अन्य हिस्सों खासकर मणिपुर में अफ्स्पा एक काले कानून के रूप में बदनाम हो चुका है.

दरअसल, यह आंतरिक अशांति और उग्रवाद से निपटने के नाम पर सेना को इतने व्यापक और असीमित अधिकार दे देता है कि वह बिना वारंट के किसी के भी घर में घुसकर तलाशी ले सकती है, शक के बिना पर गिरफ्तार कर सकती है, गोली चला और मार सकती है. इस कानून के तहत सैन्य अधिकारियों को इन फैसलों के लिए उन्मुक्ति मिली हुई है.
आश्चर्य नहीं कि इस कानून के बेजा इस्तेमाल और सेना पर मानवाधिकार हनन के अनेकों गंभीर आरोप लगते रहे हैं. इस कारण पिछले एक-डेढ़ दशक से इस कानून को खत्म करने की मांग रह-रहकर उठती रही है.
खासकर मणिपुर से अफ्स्पा को हटाने की मांग को लेकर पिछले एक दशक से अधिक समय से अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला के ऐतिहासिक प्रतिरोध ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है. सच पूछिए तो किसी भी लोकतान्त्रिक मुल्क में अफ्स्पा जैसे कानून का होना न सिर्फ शर्मनाक है बल्कि उस लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
हैरानी की बात यह है कि इस कानून की समीक्षा के लिए खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी.पी. जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यी समिति का गठन किया था जिसने जून’२००५ में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी. इस समिति ने अफ्स्पा को खत्म करने की सिफारिश की थी.
कहने की जरूरत नहीं है कि उसके बाद से ही देश में अफ्स्पा की प्रासंगिकता और उसे रद्द करने के मुद्दे पर सरकार के अंदर और बाहर बहस और चर्चा चल रही है. लेकिन देश में जनवाद और इंसाफपसंद लोगों के बीच इस कानून को खत्म करने को लेकर आमराय होने के बावजूद केन्द्र सरकार कोई ठोस फैसला करने में हिचकिचा रही है.
यही नहीं, कश्मीर मामले के राजनीतिक समाधान की संभावनाओं का पता लगाने के लिए वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडगांवकर के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में अफ्स्पा को हटाने की सिफारिश की है. लेकिन ऐसा लगता है कि इस मुद्दे पर मनमोहन सिंह सरकार का एजेंडा भाजपा-आर.एस.एस और सैन्य प्रतिष्ठान से जुड़े आक्रामक तत्व तय कर रहे हैं.
यही कारण है कि वह कश्मीर मुद्दे पर बड़ी राजनीतिक पहलकदमी तो दूर घाटी से अफ्स्पा हटाने तक का फैसला नहीं कर पा रही है. मजे की बात यह है कि उमर सरकार का प्रस्ताव तो अफ्स्पा को शुरुआत में घाटी के सिर्फ दो जिलों से हटाने भर का है.
अगर यू.पी.ए सरकार कश्मीर जैसे जटिल और संवेदनशील मुद्दे के हल की दिशा में इतना मामूली सा राजनीतिक जोखिम उठाने का भी साहस नहीं दिखा सकती तो उसे समझ लेना चाहिए कि वह बड़े राजनीतिक संकट को दावत दे रही है. उसे याद रखना चाहिए कि ‘मुदहूँ आँख, कतहूँ कछु नाहिं’ और समस्याओं को लटकाने की नीति से चीजें बेहतर नहीं होती बल्कि बिगड़ती हैं.
कश्मीर मसला इसका सबसे त्रासद उदाहरण है जहाँ आज़ादी के बाद से एक के बाद दूसरी केन्द्र और राज्य सरकारों ने पहले सत्ता के लिए राजनीतिक छल, जोड़तोड़ और मनमानी से हालात खराब किये और बाद में आतंकवाद से निपटने के नाम पर राजनीति, जनतंत्र और मानवाधिकारों को ताक पर रखकर कमान सेना को सौंप दी.
लेकिन ऐसा करते हुए वे इतिहास का सबसे बड़ा सबक भूल गईं. इतिहास गवाह है कि राजनीतिक मसलों का समाधान बंदूक से नहीं राजनीति से ही निकलता है. लेकिन ऐसी राजनीति साहस, विवेक, दूरदृष्टि और प्रतिबद्धता मांगती है. अफसोस की आज की राजनीति में ये सबसे दुर्लभ चीजें हैं. यू.पी.ए सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है.

Wednesday, October 19, 2011

उम्र 34 वर्ष-11 साल से जारी है अनशन, सुध लेने वाली कोई नहीं






इंफाल (मणिपुर). शहर का जवाहरलाल नेहरू अस्पताल। एक कॉरिडोर के चैनल परताला लगा है। यह जेल में तब्दील है। भीतर छोटे से वार्ड में हैं 34 वर्षीय इरोम चानूशर्मिला। 11 बरस बीत गए। पानी की एक बूंद तक गले से नहीं उतरी। नाक में लगी फीडिंग टच्यूब के जरिये तरल भोजन पर जिंदा यह औरत हड्डियों के ढांचे में ही बची है।




इरोम एकदम अकेली हैं। किसी से मिल तक नहीं सकतीं। घरवालों और साथी आंदोलनकारियों से भी नहीं। उनकी मांग एक ही है- आम्र्ड फोर्स (स्पेशल पॉवर्स) एक्ट 1958 खत्म हो। इसके उलट सरकार ने खुदकशी की कोशिश (आईपीसी की धारा 309) के आरोप में उन्हें कैद कर रखा है। अन्ना ने अपने आंदोलन में इरोम को भी बुलावा भेजा। इरोम ने जवाब भेजा- मैं इस वक्त कैद में हूं। निकल नहीं सकती। यहीं से समर्थन दूंगी।

इरोम कॉरिडोर में धीरे-धीरे टहल रही हैं। चैनल की तरफ देखा। मुस्कराईं। वापस मुड़ गईं। पुलिस हर 14 दिन में हिरासत बढ़ाने के लिए अदालत ले जाती है। एक साल से ज्यादा जेल में कैद नहीं रख सकते, इसलिए पुलिस बीच-बीच में दो-तीन दिन के लिए छोड़ने की रस्म भी बदस्तूर निभाती रही है। इस दौरान भी वे आधा किलोमीटर दूर स्थित घर नहीं जातीं। वहीं एक टेंट में रहती हैं। बांस की खपच्चियों और टीन का बना टेंट उनके समर्थकों का ठिकाना है।



दो-तीन दिन बाद पुलिस उन्हें फिर जेल में डाल देती है। वह भले ही मकसद में अन्ना जैसी कामयाब न हो पाई हों लेकिन दो वर्ल्ड रिकॉर्ड जरूर बन गए हैं - सबसे लंबी भूख हड़ताल का और सबसे ज्यादा बार जेल जाकर रिहा होने का। वह पढ़ने की शौकीन हैं। कविताएं लिखती हैं। योग करती हैं।

पानी पीती नहीं इसलिए ब्रश की जगह सूखी रूई से दांत साफ करती हैं। कमरे में एक ही खिड़की है, घंटों वहां बैठ बाहर ताकती हैं। चार घंटे सोती हैं। बाकी समय किताबें। मां ने बताया-उसका प्रण है कि जब तक मांग पूरी नहीं होगी, घर में दाखिल नहीं होऊंगी। भा ईसिंघाजीत को एग्रीकल्चर अधिकारी की नौकरी छोड़नी पड़ी। मां ने भी फैसला किया है भूख हड़ताल खत्म होने तक वह बेटी से नहीं मिलेंगी ताकि, उसका जज्बा कमजोर न हो।


इसलिए अनशन पर सुरक्षा बलों द्वारा 10 लोगों की हत्या की प्रत्यक्षदर्शी शर्मिला की मांग है कि आम्र्ड फोर्स (स्पेशल पॉवर्स) एक्ट 1958 को हटाया जाए, क्योंकि यह कानून सुरक्षाबलों को बिना किसी कानूनी कार्रवाई के गोली मारने का अधिकार देता है।



अन्ना ----------------- शर्मिला
अनशन के दिन - 10 दिन - दस साल 9 महीने
समर्थन - लाखों की भीड़ - मुट्ठी भर लोग
खास समर्थक - देश के युवा - कुछ बूढ़ी महिलाएं
अनशन कैसा - पानी पीकर - बिना पानी पिए
प्रचार - टोपी, पोस्टर, बैनर - चुनिंदा पोस्टर
इरोम के नाम दो वर्ल्ड रिकॉर्ड हैं-
एक सबसे लंबी भूख हड़ताल
दूसरा सबसे ज्यादा बार जेल से रिहा होने और मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने।



इरोम को पढ़कर, देखकर और सुनकर, सरकार की संवेदना तो नही जगी, क्या इस देश से मानवता नाम की चीज खत्म हो गयी? सरकार भी अजीब है, इसे सिर्फ वोट और भीड़  का भय होता है| सरकार के संविधान में नैतिकता, मानवता और इंसानियत के लिए कोई जगह नही, सिर्फ उनका अजेंडा लागू होना चाहिए| लेकिन मीडिया के टीम से मैं जानना चाहता हूँ कि क्या वे ३ महीने लगातार इरोम के मुद्दों को लेकर लाइव टेलेकास्ट दुनिया को दिखायेंगे?



३४ वर्ष की संवेदनशील क्रन्तिकारी नायिका जो १० साल से पानी तक नहीं पी है, क्या उसके लिए कभी टीम अन्ना जैसी संस्था या किसी अन्य की ऑंखें खुलेगी या नहीं? यह एक सच है कि जहाँ मीडिया और ग्लैमर नहीं, धन का समागम नहीं, वहाँ इस देश के नौजवान नज़र नहीं आते| आज ने नौजवानों को चाहिए ग्लैमर और पैसे| मीडिया को आप किसी हिस्से से हटा दीजिए और कोई बड़ी आंदोलन कर के दिखा दीजिए तो मैं राजनीति छोड़ दूँगा| मैं खास तौर पर मनमोहन सिंहसोमनाथ चटर्जी, मेघा पाटेकरअब्दुल कलाम, अरुंधती रॉय, स्वामी अग्निवेश और मानवाधिकार के टीम से आग्रह करूँगा की मानवता और मणिपुर के लिए इस मुद्दे का हल निकलने का प्रयास करें|

Friday, October 14, 2011

लोकतंत्र बचाओ, आफसपा हटाओ




अन्ना के मात्र ११ दिनों के अनशन ने जहाँ पुरे देश की जनता को प्रभावित किया वहीँ भारतीय संसद भी इसके दबाव में आगई. जबकि मणिपुर की एक महिला इरोम शर्मिला चाणु का ११ वर्षों का अनशन (भूख हड़ताल) पर है पर भारतीय जनमानस और यहाँ की संसद तक इसकी आवाज नहीं पहुंची. इरोम ११ सालों से अनशन पर हैं.

अमानवीय, अप्रजातांत्रिक कला कानून आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पवार एक्ट (AFSPA) 53 साल पूरा कर चूका है, और आज भी अस्तित्व में है. जबकि भारत को एक गणतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और सम्प्रभु राष्ट्र हुए 61 साल हो चुके हैं. 11 Sep. 1958 महामहिम राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद या कानून अस्तित्व में आया, तब से लेकर अब तक यह कानून शांत जनसंचार समुदाय की उदासीनता झेल रहा है और यही विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सच्चाई है. २०वीं सदी के इतिहास में निश्चय ही यह एक दुखद दिन था और यह मानवीयता, लोकतंत्र के सिधान्तों और यहाँ की जनता पर एक आघात था.

तब से लेकर अब तक यह कानून बिना किसी न्यायिक पुनर्विलोकन के यह कानून उतर-पूर्व के राज्यों में लागु है. हमलोग को इस आफसपा को समझने का वक्त आ गया है, यह कानून 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा इस्तेमाल में लाया गया था. यह कानून 1958 में उतर-पूर्व के राज्यों में भारतीय गणतंत्र के नौवें साल में लगाया गया था और यह दिन स्वाधीन भारत के लिए एक शर्मनाक दिन था. यह पूर्णरूप से राज्य समर्थित आतंकवाद और नस्लभेदी कानून है. लोकतंत्र और सभ्य समाज में आफसपा की कोई जगह नहीं है. यह कानून निश्चय ही लोकतंत्र के महत्वपूर्ण संस्था न्यायपालिका पर कुठाराघात है. भारत की सभी लोकतांत्रिक संस्था राष्ट्री सुरक्षा और अपने शक्ति के अधिकार क्षेत्र के नाम पर इसे न्याययोचित बताती है और इस उत्पीडन की सहभागी बनी बैठी है. कार्यपालिकीय सुरक्षातंत्र इस कानून की आड़ में हत्या, प्रताडना और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम दे रहें हैं और उच्चतम न्यायलय ने भी इसे उचित ठहराया वहीँ दूसरी तरफ इमेज और लाभ के नाम पर भारतीय जनसंचार समुदाय (मिडिया) ने आम जनता को इस पूरी घटना से दूर रखा और आज भी आम भारतीय इस संघर्ष पर चुप्पी साधे हुए हैं और इसकी उपेक्षा कर रहें हैं. इस पूरी प्रक्रिया में उस प्रांत के लोग अन्याय और दुखद जिंदगी जी रहें हैं.

53 साल से लागु इस आफसपा कानून की अब अति हो चुकी है. आज हम एक जुट हैं और हमारा पूरा समर्थन इरोम और वहाँ के लोगों के साथ है. अब समय अगया है की इस कानून को समाप्त होना चाहिए. भारत सरकार को इस कानून को समाप्त करना चाहिए जिससे इस प्रांत की समस्याएं जिसे सरकार ने ही खड़ी की है इसके समाधान के लिए रास्ता खुल सके.

Save Democracy, Repeal AFSPA.

Monday, June 27, 2011

शर्मीला के आवाज में आवाज मिलाना ही सच्ची देशभक्ति है.




शायद उन्हें सात बहने इसलिए कहा जाता है कि आम तौर पर इस देश में बेटियों और बहनों को तमाम जुल्मो सितम सहते हुए भी ख़ामोश रहने की जो आदत डाली गयी है वो आदत ये बहनें भी सीख लेंऔर शायद ये आदत उन्होंने सीख भी ली है और हमने ये मान भी लिया है | अगर ऐसा नहीं होता तो लोकपाल के नाम पर अन्ना के अनशन और बाबा रामदेव द्वारा आम आदमी के स्वाभिमान को जगाने की मुहिम में पगलाई भीड़ शर्मीला के हठ पर अपने होंठ सीए नहीं बैठती इन भगिनी प्रदेशों से एक मणिपुर की इरोम आम आदमी और मानवीयता के खिलाफ पिछले ५३ साल से इस्तेमाल किये जा रहे भारतीय सेना विशेषाधिकार अधिनियम को हटाये जाने को लेकर 11 सालों से भूख हड़ताल पर बैठी है क्या उसके इस हठ तप को लेकर हमारा स्वाभिमान नहीं जागता? एक तरफ सत्ता खुलेआम उत्तर पूर्व में मानवाधिकारों को आर्मी के बूटों से रौंदवाने पर आमादा है दूसरी तरफ हम उम्मीद कर रहे हैं कि यही सरकार भ्रष्टाचार का खात्मा करके लोकप्रिय लोकतंत्र की स्थापना करेगी|क्या आप इसे ईमानदारी कहेंगे कि कलावती से लेकर भट्टा परसौल की कृष्णा तक को लेकर टेसुयें बहाने वाले भारत भाग्य विधाता खानदान से ताल्लुक रखने वाले राहुल गांधी ने आज तक शर्मीला के सन्दर्भ में एक बार भी अपनी जुबान नहीं खोली है |संसद में महिला आरक्षण के मामले में क्रिचदार साड़ी में भाषण देने वाली सोनियाशबानासुषमा और अन्य महिला सांसद पिछले ११ वर्षों में शर्मीला को लेकर एक सवाल भी उठाने की जुर्रत नहीं दिखा पायी हैंमीडिया भीड़ और भाषा के आधार पर इतना बटा हुआ है कि उससे उम्मीद करना बेमानी है ख़बरें वहीँ हैं जिनमे या तो भीड़ हो या जो भीड़ बटोरे |

भारतीय सेना विशेषाधिकार अधिनियम जो जम्मू कश्मीर के अलावाअसममणिपुरअरुणांचल प्रदेशमेघालयमिजोरम और त्रिपुरा में लागू है ने पिछले हफ्ते अपना एक और साल पूरा कर लियायह कानून कांग्रेस और ख़ास तौर से नेहरु परिवार की देन है और इसमें और आपातकाल में कोई ख़ास अंतर नहीं हैख़ास तौर से इसका रूप और भी वीभत्स इसलिए है कि इसमें सीधे तौर पर न सिर्फ एक क्षेत्र और राज्य को अशांत घोषित कर उसे सेना को सौंप दिया जाता है बल्कि आम आदमी पर भी शासन करने का अधिकार सेना को दे दिया जाता है और निश्चित तौर पर आदिकाल से ये होता आया है कि जब कभी सेना बर्बर होती है तो उसका पहला शिकार महिलायें और फिर युवा होते हैं ,मणिपुर में भी यही हो रहा है कश्मीर में भी यही हो रहा है |दुखद ये है कि आहत होने के बावजूद यहाँ की महिलायें उफ़फ् तक नहीं कर सकती|गाँधी ,चेव ग्वेरा को अपना आदर्श मानने वाली इरोम जब ये कहती है कि क्या एक सभ्य समाज में इस कानून को स्वीकार किया जाना चाहिए ?तो उसका ये सवाल सिर्फ सरकार से नहीं होता ,देश की उस जनता से भी होता है जो खामोश ,रहने सहने और खुद से बाबस्ता जिंदगी जीने की आदि हो चुकी है |

बहुत ही अजीबो गरीब है कि अरुंधती के मामले में ताल ठोक कर हो हल्ला मचाने वाले तमाम वामपंथी शर्मीला के मामले में वैसी अधीरता नहीं दिखाते |अरुंधती खुद कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़ तक मानवाधिकारों की हत्या को लेकर हो हल्ला मचाती हैं लेकिन उनके एजेंडे से उत्तर-पूर्व गायब रहता है साफ़ प्रतीत होता है कि शर्मीला के मामले को लेकर ये अजीबो गरीब चुप्पी किसी साजिश का हिस्सा है इस साजिश में कुछ हो चाहे न होनेतृत्व के संकट से जुड़ा डर तो साफ़ नजर आता हैअरुंधती और उन जैसे तमाम लोग जानते हैं ये स्वाभिमानी बहने अपना नेतृत्व किसी को नहीं देंगीऔर न ही वो तरीका अपनाएंगी जो अरुंधती जैसे लोग अपनाते हैं उनकी नेता कोई है तो शर्मीला है सिर्फ शर्मीला ,उनके लिए पल -पल मरती हुई |अब तक देश में जितने भी जनांदोलन हुए हैंलोगों ने जीते हुए किये हैंकिसी ने मरते हुए कोई आन्दोलन नहीं कियाइस एक  बातसे शर्मीला का सत्याग्रह गांधी से भी महान हो जाता हैमगर अफ़सोस है कि गोरों को तो गाँधी का सत्याग्रह झुकने पर मजबूर कर देता थालेकिन अपने देश में अपनी ही सरकार शर्मीला के इस सत्याग्रह पर ख़ामोशी से बैठकर तमाशा देखती रहती हैऔर अलगाववाद के संभावित खतरे की दुदंभी बजा करके आफ्प्सा की धार और पैनी करती रहती है |

बाबा रामदेव के स्वास्थ्य की पल-पल खबर मिडिया में प्रसारित हो रही थी. उनके स्वास्थ्य बुलेटिन जारी किए जा रहे थे. सिर्फ नौ दिन के उपवास में उनके अंग-प्रत्यंगों पर होने वाले दुष्प्रभावों की चर्चा की जा रही थी. १० साल के उपवास सेशर्मीला के लीवर-किडनी-ह्रदय पर क्या असर हुआ है… इस से किसी को सरोकार नहीं. इसलिए कि वो एक आम इंसान हैं?? यानि कि किसी आम इंसान को अपनी आवाज़ उठाने का कोई हक़ नहीं??
बहुत मुमकिन है इन दिनों बीमार चल रही शर्मिला की साँसें कभी किसी वक्त थम जाए  कमोजर पड़ती जा रही उसकी हड्डियों को ढंकी त्वचा अब थकने लगी हैंशिराओं से होकर गुजरने वाले रक्त की रफ़्तार अब धीमी पद रही है ये बात दीगर है कि शर्मीला फिर भी मुस्कुरा रही है ईश्वर न करे अगर शर्मीला को कुछ हुआ तो आने वाली पीढ़ी और मानवता शायद ही हम आम हिन्दुस्तानियों को कभी माफ़ कर पाएसत्ता अपना चरित्र नहीं छोड़ सकती ये तय है सिर्फ अख़बारों में पैसे देकर महापुरुषों के नाम पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर देने और पुण्य तिथियाँ मनाकर खुद को राष्ट्रवादी साबित करने वाले हम आप गाँधीभगत सिंहचन्द्र शेखर और न जाने कितनो को खो चुके हैं, अगर सत्ता का चरित्र जन -विरोधी है तो उसके खिलाफ संघर्ष कर रहे जननायकों के आवाज में आवाज मिलाना ही सच्ची देशभक्ति है अब इसमें हमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि मणिपुर समेत समूचे उत्तर -पूर्व में लोकतंत्र का जो स्वरुप में है वो पूरी तरह से जनजमीन और जंगल विरोधी है.

जनर्लिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (जेयूसीएस)
09873672153,07503000208,08802268097