Showing posts with label पूंजीवाद. Show all posts
Showing posts with label पूंजीवाद. Show all posts

Sunday, October 21, 2012

माफ़ कीजिये कुछ लोग बदलने की बात कर रहे हैं



cartoon_storyजिस समाज में मेहनत करने वाले गरीब और कुर्सियां तोड़ने वाले अमीर हों, जहां सफाई करने वाले छोटी ज़ात और गंदगी करने वाले बड़ी ज़ात के माने जाते हों, जहां सारी कमेरी कौमें छोटी ज़ात कह कर पुकारी जाती हों, जहां शहरों में रहने वाले अमीर शहरी लोग अपने ही देश के गाँव में रहने वालों की ज़मीने छीनने के लिए अपनी फौजें भेज रहे हों, उस समाज को कौन लोकतान्त्रिक मानेगा?
करोड़ों मेहनतकशों को भूख और गरीबी में रख कर उनकी आवाज़ को पुलिस के बूटों तले दबा कर लाई गयी खामोशी को हम कब तक शांति मान सकते हैं.
हमने इस देश की आज़ादी के वक्त वादा किया गया था की गाँव का विकास होगा. गरीब की हालत सुधारी जायेगी. लेकिन अगर उसी गाँव में आज़ादी के बाद विकास तो छोडिये हम अगर गाँव वालों की ज़मीने छीनने के लिए सिर्फ पुलिस को ही भेज रहे हैं तो लोग इस सरकार को किसकी सरकार मानेंगे? लोग इसे किसकी आज़ादी मानेंगे? अगर आजादी से पहले लन्दन के लिए गाँव को उजाड़ा जाता था और अब हमारे अपने शहरों के लिए हमारे ही गाँव पर हमारी अपनी ही पुलिस हमला कर रही हो तो गाँव वाले इसे आज़ादी मानेंगे क्या?
हमने आज़ादी के बाद कौन सा विकास का काम बिना पुलिस के डंडे की मदद से किया है? क्या डंडे के दम पर लाया गया विकास लोगों के द्वारा लाया गया विकास माना जा सकता है?
यह कैसा विकास है? किसके गले को दबा कर? किसकी झोंपड़ी जला कर? किसकी बेटी को नोच कर? किसके बेटे को मार कर? किसकी ज़मीन छीन कर? यह विकास किया जा रहा है? हमें लगता है की इस देश के करोड़ों लोग इस बात को स्वीकार कर लेंगे कि हमारे गाँव के हज़ारों लोगों को उजाड़ कर उनकी ज़मीने कुछ धनपतियों को दे देना ही विकास है. क्या लोगों को यह पूछने का हक नहीं है की हमारी ज़मीन छीन लोगे तो हम कैसे जिंदा रहेंगे?
कल को जब यही लोग गाँव से उजड़ कर मजदूरी करने शहर में आ जाते हैं तब हम यहाँ भी उनकी बस्ती पर बुलडोज़र चलाते हैं. उनकी ज़मीने छीन कर बनाए कारखाने में काम करने जब यह लोग मजदूरी करते हैं और पूरी मजदूरी मांगते हैं तो हमारी लोकतंत्र की पुलिस मजदूरों को पीटती है.
ये कैसी पुलिस है जो कभी गरीब की तरफ होती ही नहीं? ये कैसी सरकार है जो हमेशा अमीर की ही तरफ रहती है. ये कैसा लोकतंत्र है जहां देश के सबसे बड़े तबके को ही सताया जा रहा है. और ये कैसा समाज है जो खुद को सभ्य कहता है पर जिसे यह सब दीखता ही नहीं है. यह कैसे शिक्षित और सभ्य लोग हैं जिनके लिए क्रिकेट और फ़िल्मी हीरो हीरोइनों की शादी ज्यादा महत्वपूर्ण है और देश में चारों ओर फैले अन्याय की तरफ देखने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हो रही है.
ऐसे में हमें क्या लगता है? सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा? माफ़ कीजिये कुछ लोग उधर जंगल में कुछ कानाफूसियाँ कर रहे हैं. कुछ लोग लड़ने और कुछ बदलने की बात कर रहे हैं.
अब ये आप के ऊपर है की आप इस सब को प्रेम से बदलने के लिए तैयार हो जायेंगे या फिर इंतज़ार करेंगे की लोग खुद ज़बरदस्ती से इसे बदलें? लेकिन एक बात तो बिलकुल साफ़ है. आप को शायद किसी बदलाव की कोई ज़रुरत ना हो क्योंकि आप मज़े में हैं. पर जो तकलीफ में है वह इस हालत को बदलने के लिए ज़रूर बेचैन है.
और हाँ यह लेख किसी कम्युनिस्ट द्वारा नहीं लिखा गया है. अगर आपका विश्वास किसी गांधी या किसी महापुरुष या किसी धर्म में है तो मैंने जो कुछ भी ऊपर कहा है वह सब आपको आपके धर्म और महापुरुषों की शिक्षाओं में आपको मिल जायेगा.

Sunday, October 07, 2012

आर्थिक सुधारों ने भारत को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया है



इस मायने में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों ने भारत को सचमुच दो हिस्सों – इंडिया और भारत में बाँट दिया है. आर्थिक सुधारों का असली फायदा इंडिया और उसके मुट्ठी भर अमीरों, उच्च और मध्य वर्ग को मिला है जबकि इस ‘इंडिया’ के बेलगाम उपभोग की असली कीमत ८० फीसदी भारतीयों और देश के जल-जंगल-जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को चुकानी पड़ रही है.
यह किसी से छुपा नहीं है कि इन दो दशकों में जब देश “तेजी से तरक्की कर रहा था”, वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ के मुताबिक, सोलह वर्षों (१९९५-२०१०) में कोई २.५ लाख से ज्यादा किसान बढ़ते कृषि संकट के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हुए. खासकर २००२ से २००६ के बीच औसतन हर साल १७५०० किसानों ने आत्महत्या की है.
इसकी वजह किसी से छुपी नहीं है. आर्थिक सुधार के इन वर्षों में कृषि को उसके हाल पर छोड़ दिया गया. किसानों को न सिर्फ खाद, बिजली और बीज आदि की बढ़ी कीमतें चुकानी पड़ी, उन्हें उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य नहीं मिला बल्कि उन्हें डब्ल्यू.टी.ओ के बाद बाजार में सस्ते विदेशी कृषि उत्पादों से मुकाबला करना पड़ा.

इसका सबसे बुरा प्रभाव नगदी फसलों के किसानों पर पड़ा है. यही नहीं, आर्थिक सुधारों के तहत सब्सिडी कटौती के कारण कृषि में सरकारी निवेश घटा और उसके कारण कृषि की उत्पादकता वृद्धि में भी गिरावट आ रही है. आश्चर्य नहीं कि जिन वर्षों में जी.डी.पी की वृद्धि दर औसतन ८ फीसदी के आसपास थी, उन वर्षों में भी कृषि की वृद्धि दर औसतन मात्र २ फीसदी के आसपास थी.

नतीजा यह कि जी.डी.पी में कृषि का योगदान घटते-घटते १४.८ फीसदी से भी कम रह गया है जबकि कृषि पर अब भी देश की ५४ फीसदी आबादी निर्भर है. इसका अर्थ यह हुआ कि देश में जी.डी.पी के रूप में पैदा होनेवाली कुल समृद्धि में सिर्फ १४.८ फीसदी हिस्सा ही कृषि क्षेत्र में आता है लेकिन उसपर देश की कुल ५४ फीसदी से अधिक लोगों की आजीविका निर्भर है.
इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की स्थिति कितनी बद से बदतर होती जा रही है. उसपर एक तो करेला, उसपर नीम चढ़े की तरह पिछले कुछ वर्षों में किसानों से विकास के नामपर उद्योग, सेज, हाईवे, बिजलीघर, रीयल इस्टेट आदि बनाने के लिए ८० लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन जबरदस्ती ली गई है. योजना आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि यह कोलंबस के बाद दुनिया में जमीन की सबसे बड़ी लूट है.
लेकिन यह लूट सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है. सच यह है कि आर्थिक सुधारों के नामपर उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की आड़ में खुले बाजार को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया है, उसमें ‘जल-जंगल-जमीन से लेकर प्राकृतिक संसाधनों’ की कारपोरेट लूट ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं.
असल में, देश में डालर अरबपतियों और करोड़पतियों की संख्या यूँ ही नहीं बढ़ रही है. यह कोई जादू नहीं है. यह वास्तव में आर्थिक सुधारों से ज्यादा आर्थिक सुधारों के नामपर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को दी जा रही रियायतें, छूट और सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों के बेलगाम हस्तान्तरण के कारण संभव हुआ है. अकेले २-जी और कोयला आवंटन में कोई ३.६२ लाख करोड़ रूपयों से अधिक की सार्वजनिक संपत्ति बड़ी कंपनियों और नेताओं के रिश्तेदारों/करीबियों को बाँट दी गई.

हैरानी की बात नहीं है कि आर्थिक सुधारों के नामपर यह कहते हुए कि पैसे पेड पर नहीं उगते, सब्सिडी कटौती का सारा बोझ आम आदमी और गरीबों पर डाला जा रहा है, उस समय देश के कार्पोरेट्स, बड़े निवेशकों, अमीरों, उच्च मध्य और मध्य वर्ग को टैक्स छूटों, रियायतों और कटौतियों के जरिये सालाना कोई ५.१५ लाख करोड़ से अधिक की सब्सिडी दी जा रही है. तर्क यह दिया जाता है कि यह देश के ‘तेज विकास’ के लिए जरूरी है.
लेकिन इस ‘तेज विकास’ का हाल यह है कि यह ‘रोजगारविहीन विकास’ (जाब्लेस ग्रोथ) है. खुद सरकारी रिपोर्टें कह रही है हैं कि देश में तेज जी.डी.पी वृद्धि दर के बावजूद रोजगार वृद्धि की दर बहुत मामूली या नगण्य है. संगठित क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है. नए रोजगार के अवसर असंगठित क्षेत्र में पैदा हुए हैं जहाँ वेतन-सेवाशर्तों आदि के मामले में श्रम कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही है. ठेका और अस्थाई श्रमिकों की तादाद बढ़ी है और उन्हें जिन बदतर स्थितियों में काम करना पड़ता है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
सच पूछिए तो आज नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की असलियत खुल चुकी है. खासकर देश के करोड़ों गरीबों, किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों, दलितों, पिछडों और अल्पसंख्यकों ने अपने कड़वे अनुभवों से जान लिया है कि आर्थिक सुधारों की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है लेकिन इसकी मलाई मुट्ठी भर अमीर-अभिजात्य लोग उड़ा रहे हैं.

यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के हर कोने में किसान, आदिवासी, दलित और गरीब ‘जल-जंगल-जमीन और खनिजों’ की लूट के खिलाफ डटकर खड़ा हो गया है. किसान और आदिवासी किसी भी नए प्रोजेक्ट के लिए जमीन देने को तैयार नहीं हैं और वे लड़ने और मरने-मारने पर उतारू हैं. श्रमिकों की बेचैनी फूटने लगी है. मारुति में श्रमिकों का आंदोलन अपवाद नहीं है.

और तो और आर्थिक सुधारों का मुखर समर्थक रहा मध्य और निम्न मध्य वर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा अब इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करने लगा है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन इस प्रवृत्ति की एक मिसाल है.

यही नहीं, खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के मुद्दे पर जिस तरह से मध्यवर्गीय व्यापारियों का एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतर आया है, उससे साफ़ हो गया है कि देश में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के समर्थकों की संख्या दिन पर दिन घटती जा रही है. इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहे जितने दावे करें लेकिन सच्चाई पर पर्दा डालना अब संभव नहीं रह गया है.

Sunday, October 23, 2011

कारपोरेट विरोधी विश्वलहर: भारत में एक बेसुरा राग



पिछले तीस साल से वाशिंगटन आमराय की घोषणा पत्र के बाद भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को विश्व बैक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन और दुनिया की ताकतवर तिकड़ी संयुक्त राज्य अमरीका, यूरोपीय संघ और जापान ने दुनिया पर लादा है और जो कारपोरेटी कहर दुनिया ने झेला है, उसके खिलाफ अब पूरी दुनिया में एक एक करके विरोध की आवाजे उठने लगी है। 1984 में दुनिया की सबसे बडी कारपोरेट त्रासदी भोपाल गैस काण्ड में प्रकट हुई तभी से भारत के कुछ संवेदनशील समाजकर्मी आजादी बचाओ आंदोलन के नाम से कारपोरेट जगत का लगातार विरोध कर रहे है और जहां उनकी ताकत बन जाती है वहां से कारपोरेटों को उखाड भी रहे हैं। 1995 में मैक्सीको में मुद्रा संकट के आते ही लातिनी अमरीका में एक के बाद एक देश में कारपोरेटों के खिलाफ संघर्ष तेज हुए और महाद्वीप ने कारपोरेट समर्थक सत्ताओं का सफाया करके नयी जन समर्थक सरकारें गठित की उस महाद्वीप में तो कारपोरेटों ने एक देश अर्जेण्टीना को दिवालिया देश घोषित करा दिया था। कारपोरेट विकास माॅडल ने दुनिया में मन्दी, महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी और गैर बराबरी फैला दी है। पिछले 10 महीने से कारपोरेट विरोधी लहर उत्तरी अफ्रीका, मध्य एशिया और लातिनी अमरीका में फैल गयी है। ट्यूनीशिया से शुरू हुआ महंगाई, बेरोजगारी और अधिनायकवाद के खिलाफ युवाओं का आंदोलन मिश्र, यमन, सीरिया और लीबिया तक फैल गया है। ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया में आंदोलनकारियों ने तानाशाहों की गददी उखाड दी है और उन्हें देश से बाहर भागने या जेल में सीकचों में बंद करने या मौत के घाट उतारने के लिए मजबूर कर दिया है। इजराइल में लाखों लोग महगाई के खिलाफ सडकों पर निकल आये हैं। जापान में फुकूशिमा हादसे के लिए जिम्मेदार न्यूक्लियर कंपनी के खिलाफ दसियों हजार जापानी नागरिकों की सड़कों पर उतर पडें है। पिछले पाँच महीने से चिली में विद्यार्थी कुशिक्षा और महंगाई के खिलाफ आदोलन कर रहे हैं। यूरोप में तो इन दिनों घमासान मचा हुआ है। कारपोरेट कंपनियों और बैंकों की बदौलत ग्रीस, पुर्तगाल, आयरलैड, स्पेन, इटली जैसे देश दिवालिया होने के कगार पर है। एक तरफ महंगाई बेरोजगारी से आम आदमी की जिंदगी दूभर कर दी है तो दूसरी तरफ डूबती बैंकों कम्पनियों को बेल आउट किया जा रहा है। दुनिया के अन्य कोनों से भी ऐसी खबरे आ रही है हांलांकि कारपोरेट नियंत्रित मीडिया ऐसी खबरों को दबाता है।
कारपोरेट विरोध की ताजी नयी कड़ी
भस्मासुर को सिर पर हाथ रखते ही भस्म करने की ताकत देने के बाद जब भस्मासुर ने शिव के ही सिर पर हाथ रखने की अजमायश की तो शिव इधर उधर भागने लगे। ठीक वैसे ही संयुक्त राज्य अमरीका ने कारपोरेटों को लालच फैलाकर लूट करने की ताकत दी, वे ही कारपोरेट अब अमरीका पर ही अपना जादू अजमाने लगे है और अब अमरीकी सड़क पर निकलने लगे हैं। कारपोरेटों का मक्का न्यूयार्क की वाल स्ट्रीट है। सभी बडी कम्पनियां वाल स्ट्रीट के स्टाॅक मार्केट में रजिस्टर होती है और वहीं से उनकी ताकत नापी जाती है। वाल स्ट्रीट की कम्पनियां ही अमरीकी और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तो नियंत्रित करती ही है, वे अमरीका की राजनीति को भी चलाती है। जो वाल स्ट्रीट कम्पनियां जार्ज बुश के शासन को नियंत्रित कर रही थीं वे ही बराक ओबामा के शासन पर हावी है। इसलिए मंदी की तरफ से बडे़ बडे़ कारपोरेटों, बैकों और कंपनियों को बचाने के लिए बुश ने बेलआउट में हजारों अरब डालर दिये, ओबामा ने भी वही किया। एक तरफ बैंको और कंपनियों को सरकारी मदद दी जा रही है मंदी से बचाने के लिए, वहीं आज अमरीकी बेरोजगारी की मार झेल रहा है। तीन साल तक अमरीकियों ने सहा पर अब सब्र का बंध टूट गया है। १५ सितम्बर से वालस्टीट घेरो आन्दोलन शुरू कर दिया है। आन्दोलनकारी कह रहे है कि वाल स्ट्रीट यानी उसकी कंपनीयों से कारपोरेटी लालच, बेरोजगारी और महंगाई अमरीका में फैली है जिससे जनजीवन तबाह हो गया है। यह आंदोलन अमरीका के अन्य शहरों वाशिंगटन डीसी, बोस्टन, सान फ्रान्सिस्कों, लास एंजलिस, बाल्टीमोर, मेमफिस में भी फैल गया है। पिछले 3-4 दिन से वाल स्ट्रीट घेरों की तर्ज पर डीसी का विरोध करो आंदोलन वाशिंगटन से शुरू हो गया है। पहले दिन कोई 200 प्रदर्शनकारियों ने व्हाइट हाउस पर मार्च किया पर अब पूरे देश से लोग वाशिंगटन आने लगे है। आंदोलनकारियों ने ऐलान किया है कि यह आंदोलन 4 महीने तो चलेगा ही। अमरीका से शुरू हुआ कारपोरेट विरोधी आन्दोलन दुनिया के 82 देशों के 941 शहरों में फैल गया है। सब जगह आन्दोलन अहिंसक है, केवल रोम में हिंसा भड़क उठी है। विश्वभर में एक राग, भारत में एक बेसुरा राग: भारत में कारपोरेटी लूट और गुलामी के खिलाफ आजादी बचाओ आंदोलन और अन्य कई संगठन संघर्ष कर रहे हैं। न्यूक्लियर प्लांटों के खिलाफ फतेहाबाद (हरियाणा) कूडनकुलम (तमिलनाडु), जैतापुर (महाराष्ट्र), मीठीबिरडी (गुजरात) में आंदोलन चल रहे है। हजारीबाग नेल्लोर (आंध्र प्रदेश), छिदंवाडा (म0प्र0), चन्द्रनगर (विदर्भ), और कटनी (म0प्र0) मे थर्मल पावर प्लाटों और कोयले की खदानों के खिलाफ किसान संघर्षरत है ; पोस्कों के खिलाफ उडीसा में आंदोलन चल रहा है तो भूमि अधिग्रहण के खिलाफ ग्रेटर नोयडा बडे़ बांधों के खिलाफ उत्तरखण्ड में आंदोलन चल रहे हैं। जगह जगह किसान अपनी जमीन बचाने के लिए लड़ रहे हैं और पुलिस की गोली से शहीद हो रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में एक कानून बनवाने के लिए बेसुरा राज अन्ना टीम ने छेड़ दिया है और देश केन मध्यवर्गीय क्षेत्र में भटकाव की स्थिति पैदा कर दी है। कारपोरेटी मीडिया के समर्थन पर खड़ा किया गया यह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन बडी चतुराई से भ्रष्टाचार की जननी कारपोरेट को बचाता हुआ भ्रष्टाचार की दाई की ओर निशाना साध रहा है। उदाहरण के लिए हाल के हिसार लोकसभा उपचुनाव में अन्ना की टीम के सरकारी दिमाग वाले और एन.जी.ओ. संस्कृति वाले नेता वहां के जीवन के हमेशा के लिए संकट में डालने वाले परमाणु प्लांट के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोले जबकि पिछले 425 दिनों से किसान वहां धरने पर बैठे हुए हैं और तीन किसान शहीद हो गये हैं। भ्रष्टाचार हटाने का कोई कार्यक्रम देने में असफल नेता एक पार्टी को हराने का एकमात्र कार्यक्रम कर रहे है। मजे की बात यह है कि बीच बीच में कारपोरेट घरानों के संगठन भी भ्रष्टाचार खत्म करने की आवाज उठाते हैं। यह सही है कि अन्ना के आंदोलन ने देश में चल रहे जमीनी आंदोलनों को क्षति पहुंचायी है। जमीनी आंदोलन दुनिया में उठी कारपोरेट विरोधी लहर में शामिल होकर निर्णायक लडाई में कामयाब होंगे।
(अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के गणितज्ञ प्रो0 बनवारी लाल शर्मा, आजादी बचाओ अन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक हैं)

Saturday, October 22, 2011

हत्या करे पुलिस, बदनाम हों नक्सली




सरकार और पुलिस ने मुसीबत में पडी महिलाओं की मदद करने की सजा के तौर पर हमें अदालत में नक्सली कहा. हांलाकि  अब अदालत में इसी मामले में पुलिस की धज्जियां उड़ रही हैं .पर सरकार अपने कहे पर माफी मांगने को तैयार नहीं है...
हिमांशु कुमार
दंतेवाडा में ये एक आम बात है. पुलिस अपने कुकर्मो को नक्सलियों के सिर मढ़ देती है. पुलिस की बात तो मीडिया छाप देती हैं और आम लोग ये मान कर चुप हो जाते हैं की ' नक्सली तो हैं ही क्रूर '. अपनी बात को सिद्ध करने के लिए मैं एक ऐसा मामला यहाँ आपके सामने रख रहा हूँ . इस मामले में आज एक पुलिस सब इन्स्पेक्टर घनश्याम पटेल जेल में है और उसकी ज़मानत की अर्जी छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने ठुकरा दी है. दो आरोपी एसपीओ  कोसा एवं फोटू फरार हैं .

इस मामले की मेरे द्वारा मेधा पाटकर को जानकारी दी गयी थी. मेधा पाटकर ने तत्कालीन डी. जी. पी.  विश्वरंजन को इस विषय में चिट्ठी लिखी थी तो विश्वरंजन ने जवाब दिया था हिमांशु की तो आदत है झूठ बोलने की.ये घटना तो नक्सलियों ने ही की है. लेकिन आज उसी घटना में उन्ही की पुलिस बल का सब इन्स्पेक्टर जेल में है. तो कौन झूठ बोल रहा था?

घटना 18 मार्च 2007 को हुई. सलवा जुडूम केम्प माटवाडा जिला बीजापुर में सब इंस्पेक्टर घनश्याम पटेल और 15 अन्य एस पी ओ ने मिल कर तीन आदिवासीयों को पहले डंडो से मारा और अंत में आँखों में चाक़ू घोंप कर पत्थर से सिर कुचल कर मार डाला और लाशें ले जाकर पास में नदी के किनारे रेत में दफना दी और मीडिया को बुला कर बता दिया कि इन तीन लोगों की हत्या नक्सलियों ने कर दी है.

अखबारों ने समाचार प्रकाशित भी कर दिया. मरने वाले इन तीनो आदिवासियों का कसूर ये था कि ये भूख के मारे अपने गाँव में सुबह जाकर महुआ बीनते थे उसे बेच कर चावल लाकर अपने बच्चों को खिलाते थे . और शाम को वापिस सलवा जुडूम केम्प में आ जाते थे. मारने वाले पुलिस और एसपीओ को ये गुस्सा था की ये लोग गाँव जायेंगे तो धीरे-धीरे सारा सलवा जुडूम कैंप अपने गाँव में वापिस चला जायेगा . और फिर ये एस पी ओ नक्सलियों से बचने के लिए किस के बीच में छिपेंगे?

इस घटना पर मेरा साथी कोपा कुंजाम बेचैन हो गया . वह उन दिनों उसी क्षेत्र में सामुदायिक स्वास्थ्य का काम कर रहा था और इस हत्याकांड वाला ये सलवा जुडूम केम्प उसी के क्षेत्र में आता था. कोपा अचानक अंतर्ध्यान हो गया और तीन दिन के बाद मृतकों के भाई और पत्नियों के साथ प्रगट हो गया. हमने मीडिया को बुलाया और कहा कि भाई इनकी पत्नियों से बात कर लो . इसके बाद मीडिया में तूफ़ान आ गया . दंतेवाडा, जगदलपुर, कांकेर , बिलासपुर सब जगह इन विधवा आदिवासी महिलाओं के साक्षात्कार छपने लगे . सरकार बैकफुट पर आ गयी.

हमने ये मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में दायर किया. सरकार ने अदालत में अपने जवाब में लिखा  कि " ये महिलाए वनवासी चेतना नामक एन. जी. ओ. के कब्ज़े में हैं .... इन महिलाओं द्वारा पुलिस में नक्सलियों के विरुद्ध ऍफ़. आई. आर. दर्ज कराने के बाद नक्सलियों ने इन महिलाओं को पुलिस पर झूठा आरोप लगाने के लिए कहा ..... नक्सलियों ने इन महिलाओं को लाठियों से पीटा है ... इसलिए ये महिलाएं पुलिस पर झूठा आरोप लगा रही हैं.

तो इस तरह सरकार और पुलिस ने इन मुसीबत में पडी महिलाओं की मदद करने की सजा के तौर पर हमें अदालत में नक्सली कहा. हांलाकी अब अदालत में इसी मामले में पुलिस की धज्जियां उड़ रही हैं . पर सरकार अपने कहे पर माफी मांगने को तैयार नहीं है .हमने क़ानून की मदद की थी जिसके लिए हमें प्रशस्ति पत्र मिलना चहिये और अदालत में हमें नक्सली कहने वाले पर कार्यवाही की जानी चाहिए . पर जाने दीजिये . इतना बड़ा दिल सरकार में किसका है ? हमें तो इनाम के तौर पर ये मिला कि कोपा को जेल में डाल दिया गया और हमारे आश्रम पर बुलडोज़र चला दिया गया . खैर .   

इस घटना की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी की और राष्ट्रीय मानवाधिकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि पुलिस के दावे पर विश्वास करना कठिन कि इन आदिवासियों की हत्या नक्सलियों ने की है.. क्योंकि घटना स्थल के सामने थाना है ... और घटनास्थल के पीछे सी. आर. पी. ऍफ़ का एक बड़ा केम्प है ... इसलिए नक्सलियों का वहां आकर इनकी हत्या करना असम्भव है... नक्सलियों के विरुद्ध ऍफ़. आई. आर. लिखने वाले अधिकारी सब इन्स्पेक्टर घनश्याम पटेल ही हत्या का आरोपी है. मृतकों की विधवाओं ने हमसे मिलकर इस पुलिस अधिकारी और एस पी ओ के विरुद्ध अपने पति की हत्या का आरोप लगाया है.

इसलिए इसके द्वारा लिखी गयी ऍफ़ आई आर की जांच आवश्यक है ....... और अभी हाई कोर्ट में भी इस पुलिस अधिकारी की ज़मानत अर्जी खारिज करते समय कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि क्योंकी आवेदक (सब इन्स्पेक्टर घनश्याम पटेल) ही ऍफ़ आई आर लिखने वाला है और आवेदिका ने उसी के विरुद्ध हत्या का आरोप लगाया है इसलिए ज़मानत का आवेदन निरस्त किया जाता है...
 
अब सवाल ये उठता है कि अदालत में क्या सरकार कुछ भी मनगढ़ंत कहानियां सुना सकती है. अदालत की गरिमा की रक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी है कि नहीं. सरकार को जनता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है. सरकार कमजोरों को मारेगी और अदालतों में झूठ बोलेगी तो लोग कहाँ जायेगे ?

Friday, October 21, 2011

बर्बर अमरीका के हाथों तबाह एक और राष्ट्र - लीबिया




जिस धज से कोई मकतल को गया वो शान सलामत रहती है,
ये जान तो आनी-जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं.--फैज़
 
लीबिया पर नाटो के हमले के बाद गद्दाफी की हार तय थी. अचरज यह नहीं कि गद्दाफी को क़त्ल कर दिया गया या अमरीकी चौधराहट में नाटो की दैत्याकर फौज के दम पर वहाँ के साम्रज्यवादपरस्त बागियों ने लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया. अचरज तो यह है कि गाद्दफी और उनके समर्थक नौ महीने तक उस साम्राज्यवादी गिरोह की बर्बरता के आगे डटे रहे. फिदेल कास्त्रो ने 28 मार्च 2011को अपने एक विमर्श में कहा था कि...

"उस देश (लीबिया) के नेता के साथ मेरे राजनीतिक या धार्मिक विचारों का कोई मेल नहीं है। मैं मार्क्सवादी-लेनिनवादी हूँ और मार्ती का अनुयायी हूँ, जैसा कि मैंने पहले ही कहा है।

मैं लीबिया को गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के एक सदस्य और संयुक्त राष्ट्रसंघ के लगभग 200 सदस्यों में से एक सम्प्रभु देश मानता हूँ।

कोई भी बड़ा या छोटा देश, एक ऐसे सैनिक संगठन की वायु सेना द्वारा जघन्य हमले का इस तरह शिकार नहीं हुआ था, जिसके पास हजारों लड़ाकू बमवर्षक विमान, 100 से भी अधिक पनडुब्बी, नाभिकीय वायुयान वाहक और धरती को कई बार तबाह करने में सक्षम शस्त्र-अस्त्रों का जखीरा है। हमारी प्रजाति के आगे ऐसी परिस्थिति कभी नहीं आयी और 75 साल पहले भी इससे मिलती-जुलती कोई चीज नहीं रही है जब स्पेन को निशाना बनाकर नाजी बमवर्षकों ने हमले किये थे।

हालाँकि अपराधी और बदनाम नाटो अब अपने ‘‘लोकोपकारी’’ बमबारी के बारे में एक ‘‘खूबसूरत’’ कहानी गढ़ेगा।

अगर गद्दाफी ने अपनी जनता की परम्पराओं का सम्मान किया और अन्तिम साँस तक लड़ने का निर्णय लिया, जैसा कि उसने वादा किया है और लीबियाई जनता के साथ मिलकर मैदान में डटा रहा जो एक ऐसी निकृष्टतम बमबारी का सामना कर रही है जैसा आज तक किसी देश ने नहीं किया, तो नाटो और उसकी अपराधिक योजना शर्म के कीचड़ में धँस जायेगी।

जनता उसी आदमी का सम्मान करती है और उसी पर भरोसा करती है जो अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।...अगर वे (गद्दाफी) प्रतिरोध करते हैं और उनकी (नाटो) माँगों के आगे समर्पण नहीं करते तो वे अरब राष्ट्रों की एक महान विभूति के रूप में इतिहास में शामिल होंगे।"

गद्दाफी ने फिदेल को हू-ब-हू सही साबित किया और पलायन की जगह संघर्ष का रास्ता अपनाया।

लीबियाई जनता पर बर्बर नाजी-फासीवादी हमले का प्रतिरोध करते हुए जिस तरह गद्दाफी ने शहादत का जाम पिया, वह निश्चय ही उन्हें साम्राज्यवाद-विरोधी अरब योद्धाओं की उस पंक्ति में शामिल कर देता है जिसमें लीबियाई मुक्तियोद्धा उमर मुख़्तार का नाम शीर्ष पर है। गद्दाफी की साम्राज्यवादविरोधी दृढता को सलाम 

आतंकी और बर्बर अमेरिका का एक और शिकार गद्दाफी मात्र दो बूंद तेल के लिए




जैसे दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी देश अमेरिका ने पहले बिना बात सद्दाम और उसके देश इराक से दो युद्ध किये और सद्दाम और उसके देश इराक को खत्म करके वहां का तेल पी गया। आपको याद होगा कि युद्ध के बाद इराक में कोई रसायनिक हथियार नहीं मिले थे, जिस बात को लेकर ही अमेरिका और उसकी रखेल संस्था यू.एन.ओ. ने इराक पर युद्ध किया गया था।

अब बिना कारण लीबिया को तबाह करके, झूँठे इल्जाम लगा करमुअम्मर गद्दाफी को व्यर्थ बदनाम किया और आज उसे मार डाला है और अब वो अमेरिका लीबिया का तेल पीयेगा, जिसका वो दशकों से प्यासा था।
मैं लीबिया में 12 वर्ष रहा हूँ। वहां नागरिको को संपूर्ण शिक्षा (जिसमें विदेश में जाकर शिक्षा लेना भी शामिल है), चिकित्सा (जिसमें विदेश में जाकर उपचार लेने का खर्चा  भी शामिल है) और लोगो को घर बना कर देना सब कुछ सरकार करती है। उसने पूरे देश में नई सड़कें (जिन पर कोई टोल नहीं लगता है), अस्पताल, स्कूल, मस्जिदें, बाजार बस कुछ नया बनवाया था। मुझसे भी  पूरे 12 वर्षो में  नल, बिजली, टेलीफोन का कोई पैसा नहीं लिया। मझे खाने पीने, पेट्रोल, सब्जी, फल, मीट, मुर्गे, गाड़ियां, फ्रीज, टीवी, बाकी घर की सुविधाएं, एयर ट्रेवल और सब कुछ सुविधाएँ मुफ्त में मिली हुई थी। उसने लीबिया जो एक रेगिस्तान है, को हरा भरा ग्रीन बना दिया था। एक बार हमारे भारत के राजदूत ने मेरे डायरेक्टर को कहा था कि हम भारतवासी हरे भारत को काट कर रेग्स्तान बना रहे हैं और मैं यहां आकर देखता हूँ कि आपने रेगिस्तान को हरा भरा बना दिया है।
गद्दाफी ने लीबिया में मेन मेड रीवर बनवाई थी जो दुनिया का सबसे मंहगा प्रोजेक्ट है, जिसके बारे में कहा गया था कि यह प्रोजेक्ट इतना अनाज पैदा कर सकता है जिससे पूरे अफ्रीका का पेट भर जाये, और जिसका ठेका कोरिया को दिया गया था। जब गद्दाफी यह ठेका देने कोरिया गया था तो उसके स्वागत में कोरिया ने चार दिन तक स्वागत समारोह किये थे और उसके स्वागत में चालीस किलोमीटर लंबा कालीन बिछाया था। इस ठेके से कोरिया ने इतना कमाया था कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था जापान जैसी हो गई थी। मुझ पर विश्वास नहीं हो तो गूगल की पुरानी गलियों में जाओ, आपको सारे सबूत मिल जायेंगे।
मैं उस महान शासक को श्रद्धांजलि देता हूँ और उसकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करता हूँ।  उसे मिस्र के जमाल अब्दुल नासर नें मात्र 28 वर्ष की उम्र में लीबिया का शासक बना दिया था। वह भारत का अच्छा मित्र था। मालूम हो कि गद्दाफी ने 41 साल तक लीबिया पर राज किया है।
गद्दाफी था महान नदी निर्माता
लीबीया और गद्दाफी का नाम आजकल हम सिर्फ इसलिए सुन रहे हैं क्योंकि गद्दाफी को गद्दी से हटाने के लिए अमेरिका बमबारी कर रहा है. लेकिन गद्दाफी के दौर में उनके  काम का जिक्र करना भी जरूरी है जो न केवल लीबीया बल्कि विश्व इतिहास में अनोखा है. गद्दाफी की नदी. अपने शासनकाल के शुरूआती दिनों में ही उन्होंने एक ऐसे नदी की परियोजना पर काम शुरू करवाया था जिसका अवतरण और जन्म जितना अनोखा था शायद इसका अंत उससे अनोखा होगा.
लीबिया की गिनती दुनिया के कुछ सबसे सूखे माने गए देशों में की जाती है। देश का क्षेत्रफल भी कोई कम नहीं। बगल में समुद्र, नीचे भूजल खूब खारा और ऊपर आकाश में बादल लगभग नहीं के बराबर। ऐसे देश में भी एक नई नदी अचानक बह गई। लीबिया में पहले कभी कोई नदी नहीं थी। लेकिन यह नई नदी दो हजार किलोमीटर लंबी है, और हमारे अपने समय में ही इसका अवतरण हुआ है! लेकिन यह नदी या कहें विशाल नद बहुत ही विचित्र है। इसके किनारे पर आप बैठकर इसे निहार नहीं सकते। इसका कलकल बहता पानी न आप देख सकते हैं और न उसकी ध्वनि सुन सकते हैं। इसका नामकरण लीबिया की भाषा में एक बहुत ही बड़े उत्सव के दौरान किया गया था। नाम का हिंदी अनुवाद करें तो वह कुछ ऐसा होगा- महा जन नद।
हमारी नदियां पुराण में मिलने वाले किस्सों से अवतरित हुई हैं। इस देश की धरती पर न जाने कितने त्याग, तपस्या, भगीरथ प्रयत्नों के बाद वे उतरी हैं। लेकिन लीबिया का यह महा जन नद सन् 1960 से पहले बहा ही नहीं था। लीबिया के नेता कर्नल  गद्दाफी ने सन् 1969 में सत्ता प्राप्त की थी। तभी उनको पता चला कि उनके विशाल रेगिस्तानी देश के एक सुदूर कोने में धरती के बहुत भीतर एक विशाल मीठे पानी की झील है। इसके ऊपर इतना तपता रेगिस्तान है कि कभी किसी ने यहां बसने की कोई कोशिश ही नहीं की थी। रहने-बसने की तो बात ही छोड़िए, इस क्षेत्र का उपयोग तो लोग आने-जाने के लिए भी नहीं करते थे। बिल्कुल निर्जन था यह सारा क्षेत्र।
नए क्रांतिकारी नेता को लगा कि जब यहां पानी मिल ही गया है तो जनता उनकी बात मानेगी और यदि इतना कीमती पानी यहां निकालकर उसे दे दिया जाए तो वह हजारों की संख्या में अपने-अपने गांव छोड़कर इस उजड़े रेगिस्तान में बसने आ जाएगी। जनता की मेहनत इस पीले रेगिस्तान को हरे उपजाऊ रंग में बदल देगी। अपने लोकप्रिय नेता की बात लोक ने मानी नहीं। पर नेता को तो अपने लोगों का उद्धार करना ही था। कर्नल गद्दाफी ने फैसला लिया कि यदि लोग अपने गांव छोड़कर रेगिस्तान में नहीं आएंगे तो रेगिस्तान के भीतर छिपा यह पानी उन लोगों तक पहुंचा दिया जाए। इस तरह शुरू हुई दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महंगी सिंचाई योजना। इस मीठे पानी की छिपी झील तक पहुंचने के लिए लगभग आधे मील की गहराई तक बड़े-बड़े पाईप जमीन से नीचे उतारे गए। भूजल ऊपर खींचने के लिए दुनिया के कुछ सबसे विशालकाय पंप बिठाए गए और इन्हें चलाने के लिए आधुनिकतम बिजलीघर से लगातार बिजली देने का प्रबंध किया गया।
तपते रेगिस्तान में हजारों लोगों की कड़ी मेहनत, सचमुच भगीरथ-प्रयत्नों के बाद आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिसका सबको इंतजार था। भूगर्भ में छिपा कोई दस लाख वर्ष पुराना यह जल आधुनिक यंत्रों, पंपों की मदद से ऊपर उठा, ऊपर आकर नौ दिन लंबी यात्रा को पूरा कर कर्नल की प्रिय जनता के खेतों में उतरा। इस पानी ने लगभग दस लाख साल बाद सूरज देखा था।
कहा जाता है कि इस नदी पर लीबिया ने अब तक 27 अरब डालर खर्च किए हैं। अपने पैट्रोल से हो रही आमदनी में से यह खर्च जुटाया गया है। एक तरह से देखें तो पैट्रोल बेच कर पानी लाया गया है। यों भी इस पानी की खोज पैट्रोल की खोज से ही जुड़ी थी। यहां गए थे तेल खोजने और हाथ लग गया इतना बड़ा, दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात भूजल भंडार।
बड़ा भारी उत्सव था। 1991 के उस भाग्यशाली दिन पूरे देश से, पड़ौसी देशों से, अफ्रीका में दूर-दूर से, अरब राज्यों से राज्याध्यक्ष, नेता, पत्रकार जनता- सबके सब जमा थे। बटन दबाकर उद्घाटन करते हुए कर्नल गद्दाफी ने इस आधुनिक नदी की तुलना रेगिस्तान में बने महान पिरामिडों से की थी। वे उस दिन अपने दो शत्रु देशों- अमेरिका और इंग्लैंड के खिलाफ भी जहर उगलने से नहीं चूके थे। उन्होंने इस नदी को एक क्रांतिकारी नदी की संज्ञा दी थी और एक ही सांस में कह डाला था कि क्रांतिकारी जनता ऐसे शत्रुओं को ठिकाने लगा देगी।
वे भला यह बात कैसे बता पाते कि इस क्रांतिकारी योजना का सारा काम उनके शत्रु देशों की कंपनियों ने ही किया है। दक्षिणी-पश्चिमी लंदन के एक कीमती मोहल्ले में बनी एक बहुमंजिली इमारत की चैथी मंजिल पर था, इस नई नदी को रेगिस्तान में उतारने वाली कंपनी का मुख्यालय। ‘अमेरिकी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन हैलीबर्टन’ की यूरोपी शाखा ‘ब्राउन एंड रूट्स’ नामक कंपनी इसी जगह से काम करती थी। ब्राउन एंड रूट्स ने ही इस महा जन नद की पूरी रूपरेखा तैयार की थी।
लेकिन आज यही सारा संसार लीबिया के इस लोकप्रिय बताए गए नेता के खिलाफ वहां की जनता का साथ देने में जुट गया है। तब भी पर्यावरण का हित देखते तो यह पूरी योजना, महा जन नद लोक विरोधी ही दिखती।
लोग बताते हैं कि इन नद से पैदा हो रहा गेहूं आज शायद दुनिया का सबसे कीमती गेहूं है। लाखों साल पुराना कीमती पानी हजारों-हजार रुपया बहाकर खेतों तक लाया गया है-तब कहीं उससे दो मुट्ठी अनाज पैदा हो रहा है। यह भी कब तक? लोगों को डर तो यह है कि यह महा जन नद जल्दी ही अनेक समस्याओं से घिर जाएगा और रेगिस्तान में सैकड़ों मीलों में फैले इसके पाईप जंग खाकर एक भिन्न किस्म का खंडहर, स्मारक अपने पीछे छोड़ जाएंगे।
Benghazi, Libya
लीबिया में इस बीच राज बदल भी गया तो नया लोकतंत्र इस नई नदी को बहुत लंबे समय तक बचा नहीं सकेगा। और देशों में तो बांधों के कारण, गलत योजनाओं के कारण, लालच के कारण नदियां प्रदूषित हो जाती हैं, सूख भी जाती हैं। पर यहां लीबिया में पाईपों में बह रही इस विशाल नदी में तो जंग लगेगी। इस नदी का अवतरण, जन्म तो अनोखा था ही, इसकी मृत्यु भी बड़ी ही विचित्र होगी।
(फ्रेड पीयर्स का यह लेख गांधी मार्ग में प्रकाशित हुआ है. प्रस्तुति अनुपम मिश्र.)

क्या आप अमेरिका के राष्ट्रपति की अय्याशियां भूल गये
Love Letter from Monica Lewinsky to Bill Clinton
A letter from Monica S. Lewinsky to President Clinton, dated June 29, 1997, which was part of the evidence gathered by Kenneth W. Starr.
29 June 1997
Dear Handsome,
I really need to discuss my situation with you. We have not had any contact for over five weeks. You leave on Sat. and I leave for Madrid with the SecDef on Monday returning the 14th of July. I am then heading out to Los Angeles for a few days. If I do not speak to you before I leave, when I return it will have been two months since we last spoke. Please do not do this. I feel disposable, used and insignificant. I understand your hands are tied but I want to talk to you and look at some options. I am begging you one last time to please let me visit briefly Tuesday evening. I will call Betty Tuesday afternoon to see if it is o.k. - M




Monday, October 17, 2011

बदलते परिवेश में बदलती पत्रकारिता



कल देश गुलाम था पत्रकार आजाद, लेकिन आज देश आजाद है और पत्रकार गुलाम। देश में गुलामी जब कानून था तो पत्रकारिता की शुरुआत कर लोगों के अंदर क्रांति को पैदा करने का काम हुआ। आज जब हमारा देश आजाद है तो हमारे शब्द गुलाम हो गए हैं। कल जब एक पत्रकार लिखने बैठता था तो कलम रुकती ही नहीं थी, लेकिन आज पत्रकार लिखते-लिखते स्वयं रुक जाता है, क्योंकि जितना डर पत्रकारों को बीते समय में परायों से नहीं था, उससे ज्यादा भय आज अपनों से है।

गुलाम देश में अंग्रेजों का शासन था; तब कागज-कलम के जरिए कलम के सिपाही लोगों को यह बताने को आजाद थे कि गुलामी क्या है और लोग इससे किस प्रकार छुटकारा पा सकेंगे। पर आज अगर सरकार या व्यवस्था से कोई परेशानी है तो उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठा पाता और कोशिश करने पर निजी जरूरतों का आगे कर कलम की ताकत को खरीदने की कोशिश की जा रही है। बीते समय पत्रकारिता के प्रति लोग शौक से जुड़ते थे लेकिन आज यह शौक जरूरत का रूप ले चुकी है और व्यवसाय की परिपाटी का फलीभूत कर रही है। आज एक जुनूनी पत्रकार जब किसी खबर को उकेरता है तो वह खबर उच्च अधिकारियों व अन्य के पास से गुजरते हुए समय के बीतते क्रम में मरती जाती है या फिर लाभ प्राप्ति की मंशा के नीचे दब जाती है। ऐसे में जुनून के साथ अपने कार्य को निभाने वाला पत्रकार भी मेहनत पर पानी फिरता देख, केवल खबर बनाने का कोरम पूरा कर पैसा कमाने में जुट जाता है।

पत्रकारिता के इस बदलते स्वरूप का जिम्मेदार केवल पत्रकार का स्वभाव और उसकी जरूरतें ही नहीं है वरन्‌ इसका असली जिम्मेदार हमारा आज का पाठक वर्ग भी है। जो इस बदलते परिवेश के साथ इतना बदल गया है की उसने समाचार पत्र और पत्रकारों के शब्दों को एक कलमकार की भावनाओं से अलग कर दिया है। इसी का नतीजा है कि आज पत्रकार अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं लिख सकता है क्योंकि वह अपने पाठक का गुलाम होता है और उसे वही लिखना पड़ता है जो उसका पाठक चाहता है। इससे अलग अगर कोई पत्रकार अपनी जीवटता दिखाते हुए खबर से तथ्यों को उजागर करने का मन बनाता भी है तो वह खबर समाचार पत्र समूह के उसूलों और विज्ञापनों की बोली की भेंट चढ़कर डस्टबीन की शोभा बढ़ाती है। अगर इन बातों की छननी से वह खबर छन कर मूल बातों समेत बच जाती है तब कहीं जाकर वह खबर पेज पर अंकित हो पाती है। ऐसे में उक्त पत्रकार भगवान को धन्यवाद देता है कि चलों खबर छप गयी, पर इस खबर के प्रति पत्रकार की ईमानदारी और मेहनत पीछे छूट जाती है और उसकी जगह संपादक व उच्च अधिकारी की प्रतिबद्धता ले लेती है।

आज की पत्रकारिता पर बाजार और व्यवसाय का दबाव बढ़ गया है। जिस कारण लोगों को जागरूक करने की अपनी आधारशिला से ही मीडिया भटक चुकी है और पेड न्यूज का रूप लेती जा रही है। मीडिया में 'पेड न्यूज' का बढ़ता चलन देश एवं समाज के लिए ही नहीं अपितु पत्रकारिता के लिए भी घातक है। 'पेड न्यूज' कोई बीमारी नहीं बल्कि बीमारी का लक्षण है। इसका मूल कहीं और है। इस दिशा में सकारात्मक रुप से सोचने की आवश्यकता है। मीडिया समाज का एक प्रभावशाली अंग बन गया है लेकिन आज इस आधारस्तंभ पर पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जो देश एवं समाज के लिए घातक है।

आज की मीडिया समाज को इस कदर प्रभावित कर चुकी है कि वह चाहे किसी को भी राजा और रंक की श्रेणी में खड़ी कर सकती है। लेकिन विडम्बना यह है कि इतनी शक्ति होने बाद भी मीडिया को हर ओर से आलोचना ही सुननी पड़ती है क्योंकि उसकी दिशा भ्रमित है या फिर ये कहा जाये कि वह नकारात्मकता को ही आत्मसात कर चुकी है। हाल फिलहाल की घटनाओं पर नजर दौड़ाये तो गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे सबसे मजबूत पक्ष के रूप में उभरते हैं पर वास्तविकता कुछ और ही है। भ्रष्टाचार के मुददे को लेकर अनशन करने वाले अन्ना मीडिया की विशेष कृपा के आधार पर "भ्रष्टाचार' जैसे प्रमुख मुद्‌दे से काफी बड़े हो गये। उनके अनशन के एक दिन पहले दिल्ली स्थिति जंतर मंतर के पास इलेक्ट्रानिक मीडिया के 74 ओ.वी. वैन के रेले इकट्‌ठा हो गये, जैसे उस दिन प्रधानमंत्री देश को संबोधित करने वाले हों। मीडिया के इस विशिष्ट मेहमाननवाजी के कारण ही आज गली-गली में अन्ना की धूम मची हुई है। आखिर कौन है यह अन्ना हजारे, क्या कोई महात्मा है? देवदूत है? या फिर सरकार के सामानांतर शक्ति रखने वाले बंदा है? जो देश के लोगों को उसके पीछे चलने की बातें करता है और देश आंख मूदे उसके साथ हो लेती हैं। देश की आम जनता तो चलों सरकार के निकम्मेपन से त्रस्त थी और बदलाव की बयार के साथ बह चली पर बुद्धिजीवियों का गढ़ कही जाने वाली मीडिया भी अन्नामय हो चली थी कि जैसे इसमें मीडियाकर्मियों का अपना स्वार्थ निहीत हो।

कहने को तो पत्रकारिता देश का चौथा स्तम्भ है। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका जैसे देश के महत्वपूर्ण स्तंभों पर नजर रखने का कार्य करने वाली खबरपालिका आज अपने मूलकार्य से विमुख हो चुकी है। अपने प्रारम्भ में मिशन के तहत लोगों के बीच अपनी भूमिका का निर्वाह करने वाली पत्रकारिता समय के साथ बदलते हुए प्रोफेशन के रूप में भी परिवर्तित हुई। परिवर्तन का यह दौर यहीं नहीं थमा, वर्तमान समय में पत्रकारिता का स्वरूप कमीशन के तौर पर उभरा है। ऐसे में आज की पत्रकारिता को किसी भी तरह से पूर्व के मिशन और एम्बीशन के साथजोड़ कर देखना सही नहीं है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है और मीडिया भी उसी का पालन कर रही है। स्पेक्ट्रम घोटाले बाद तो पत्रकारिता और पत्रकार होने का मतलब भी बदल गया था। अक्सर मजाक के बीच गंभीर मुद्रा में यह कहा जाता कि नीरा राडिया जैसे कारपोरेट लाबिस्टों से संबंध रखने वाले ही बड़े पत्रकारों की श्रेणी में आते हैं। कल का यह मजाक अब लोगों के दिलो-दिमाग पर हावी हो गया है, खबरों के अन्वेषण की जगह उसे खरीदने-बेचने का काम चल निकला है।

वर्तमान की पत्रकारिता को परिभाषित किया जाना हो तो उसे मानवीय संवेदनाओं को बेचने के अनवरत क्रम को शिद्‌दत से फैलाने का उपक्रम की संज्ञा दी जा सकती है। समाचार पत्र हो या फिर खबरिया चैनल सबमें आपस में टीआरपी की जंग छिड़ी हुई है, जिसके चलते सामाजिक सरोकारों से अलग केवल सामाजिक विषमता को फलने-फूलने का मौका मिल रहा है। शक्ति का दंभ और स्वयंभू होने के भाव ने आज मीडिया को सामाजिक प्रहरी के स्थान पर निर्णायक की भूमिका में दिखती प्रतीत होती हैं। मीडिया के इस चलन ने खबरों के प्रति पाठकों के नजरिये को बदल दिया है। अब पाठकों के बीच मीडिया सूचना देने के बजाय अपना विचार परोसने में लगी हुई है।

मूलतः पत्रकारिता की प्रक्रिया ऐसी होती है जिसमें तथ्यों को समेटने, उनका विश्लेषण करने फिर उसके बाद उसकी अनुभूति कर दूसरों के लिए अभिव्यक्त करने का काम किया जाता है। ऐसे में इसका परिणाम दुख, दर्द, ईष्या, प्रतिद्वंद्धिता, द्वेष व असत्य को बांटना हो सकता है अथवा सुख, शांति, प्रेम, सहनशीलता व मैत्री का प्रसाद हो सकता है। कौन सा विकल्प चुनना है यह समाज को तय करना होता हैं। वर्तमान में इन विषयों का गहन अध्ययन करने की आवश्यकता है, जिसके आधार पर एक वैकल्पिक पत्रकारिता के दर्शन की प्रस्तुति पूरी मानवता को दी जाए। यह इसलिए क्योंकि वर्तमान मीडिया ऐसे समाज की रचना करने में सहायक नहीं है। पत्रकारिता की यह कल्पना बेशक श्रेष्ठ पुरुषों की रही हो परन्तु इसमें हर साधारण मानव की सुखमय और शांतिपूर्ण जीवन की आकांक्षा के दर्शन होते हैं। वर्तमान में पत्रकारिता एक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। इस क्षेत्र में सुधार के लिए स्तरीय प्रशिक्षण और व्यापक अनुसंधान की जरुरत है। समाज और राष्ट्रहित में मीडिया को विरोध की सीमा और समर्थन की मर्यादा निर्धारित करनी चाहिए। उदारीकरण के कारण बाजारवाद का प्रभाव बढ़ा है। पत्रकारिता भी इससे मुक्त नहीं है, लेकिन स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। यह संक्रमणकाल है। अच्छाई और बुराई के इस संक्रमण में अन्ततः अच्छाई की विजय होगी, इसके लिए अच्छाई के पक्षधरों को मुखर होना पड़ेगा।

Sunday, September 25, 2011

मुसलमान ही नहीं, प्रजातंत्र भी खतरे में है



भारत के मुसलमान देश के सबसे पीड़ित और शोषित वर्गों का हिस्सा बन चुके हैं. राजनीति में मुसलमान हाशिए पर हैं. प्रशासन, सेना और पुलिस में मुसलमानों की संख्या शर्मनाक रूप से कम है, न्यायालयों में मुसलमानों की उपस्थिति बहुत कम है और बाकी कसर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की आर्थिक नीति ने पूरी कर दी है, जिसकी मार मुसलमानों पर सबसे ज़्यादा पड़ रही है. डॉ. भीमराव अंबेदकर ने सामाजिक असमानता को प्रजातंत्र के लिए खतरा बताया था. मुसलमान सामाजिक समानता से कोसों दूर हैं और न ही उनकी राजनीतिक प्रजातंत्र में हिस्सेदारी है. मुसलमानों के पिछड़ेपन की वजह आज भारत के वेलफेयर स्टेट होने पर सवाल खड़ा कर रही है. यह प्रजातंत्र पर एक बदनुमा दाग बन कर उभर रहा है. एक सफल राजनीतिक प्रजातंत्र के लिए सामाजिक प्रजातंत्र ज़रूरी हिस्सा है. जब तक सामाजिक प्रजातंत्र का आधार न मिले, राजनीतिक प्रजातंत्र चल नहीं सकता. स्वतंत्रता को समानता से अलग नहीं किया जा सकता और न समानता को स्वतंत्रता से. इसी तरह स्वतंत्रता और समानता को बंधुत्व से अलग नहीं किया जा सकता. भारत एक विरोधाभासी जीवन में प्रवेश कर चुका है. राजनीतिक समानता को एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत समझ लिया गया है, जबकि समाज में आर्थिक और सामाजिक असमानता है. भारत का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग पहले से ज्यादा शोषित, पहले से कहीं ज़्यादा पीड़ित और सत्ता से दूर चला गया है. यह देश में प्रजातंत्र के लिए खतरे की घंटी है. अफसोस की बात यह है कि देश चलाने वाले इस खतरे से बिल्कुल अंजान हैं.

1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो कुछ लोगों ने भारत को अपना देश मानकर पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया. इन लोगों ने भारत को ही अपना वतन माना और मुस्लिम लीग की बातों पर भरोसा नहीं किया. इन लोगों ने भारत में रहने का फैसला अपनी मर्ज़ी से किया था. उन्हें  यहां की गंगा-जमुनी तहज़ीब ज़्यादा पसंद आई. साठ से ज़्यादा साल गुज़र गए. इस देश से मोहब्बत करने का ईनाम यह मिला है कि आज भारत का मुसलमान देश के सबसे पीड़ित और पिछड़े समाज में तब्दील हो गया है. मुसलमान नौजवान बेरोज़गारी के साथ-साथ तिरस्कार का भी सामना कर रहे हैं. देश के राजनीतिक दलों को मुसलमानों का वोट तो चाहिए, लेकिन जब उनकी समस्याओं को हल करने का व़क्त आता है तो वे मौन धारण कर लेते हैं. यही वजह है कि सरकार के सौतेले रवैये की वजह से आज मुसलमानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है.

आज़ादी की लड़ाई के दौरान ही यह तय हो गया था कि आज़ाद भारत एक रिप्रेजेंटेटिव डेमोक्रेसी और वेलफेयर स्टेट होगा. यह भारत की सामाजिक संरचना के हिसाब से सबसे उचित व्यवस्था थी. गांधी, नेहरू और तमाम नेताओं ने यही सोचा था कि अंग्रेजों की हुक़ूमत से आज़ादी के बाद सरकार ग़रीब जनता के विकास के लिए काम करेगी. दुनिया भर में मौजूद सभी शासन प्रणालियों में प्रजातंत्र को सबसे बेहतर इसलिए माना गया है, क्योंकि इस व्यवस्था के अंतर्गत शासन में हर वर्ग और समुदाय का अधिकार सुरक्षित रहता है और उनकी समान हिस्सेदारी होती है. अल्पसंख्यकों के साथ-साथ ग़रीब और पिछड़े वर्गों की भी सरकार चलाने में हिस्सेदारी प्रजातंत्र को दूसरी किसी व्यवस्था से अलग बनाती है. यही वजह है कि भारत के संविधान निर्माताओं में मतैक्य था कि आज़ाद भारत में प्रजातांत्रिक सरकार बनेगी, जिसमें छोटे-बड़े सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी होगी. आज हमारे सामने भारत में प्रजातंत्र की साख खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है. प्रजातांत्रिक व्यवस्था के बारे में कई लोगों को यह भ्रम है कि यह बहुमत पर आधारित है. जब यूरोप में प्रजातंत्र का विकास हुआ, तब प्रजातंत्र का रूप अलग था. उस व़क्त बहुमत का सिद्धांत प्रजातंत्र का मूलमंत्र था. लेकिन दुनिया की स्थिति में बदलाव हुआ. पूंजीवाद और उदार प्रजातंत्र की आंधी में बहुमत के नाम पर सरकार निरंकुश होती चली गई. ग़रीब किसान और मज़दूर सत्ता से दूर चले गए. इसके विरोध में मार्क्सवादी विचारधारा का फैलाव हुआ. नतीजा यह हुआ कि पूरे यूरोप में प्रजातंत्र का चेहरा बदलने लगा. लेजेफेयर स्टेट का चरित्र बदला, वेलफेयर स्टेट की स्थापना हुई, जिसमें अल्पसंख्यकों को भी तरजीह मिलने की व्यवस्था लागू हुई. भारत के संविधान निर्माताओं ने ग़रीबों, किसानों एवं मज़दूरों के विकास के लिए प्रजातंत्र और वेलफेयर स्टेट स्थापित किया. मुसलमानों की हालत इस बात की गवाह है कि भारत का प्रजातंत्र और वेलफेयर स्टेट अपने एजेंडे से विमुख हो चुका है. जिस वजह से संविधान निर्माताओं ने इसे अपनाया था, उसमें भारत विफल हो गया है.

ग़रीब मुसलमानों के बारे में जो सच्चाई है, वह कलेजा दहला देने वाली है. ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीबी रेखा के नीचे वाले 94.9 फीसदी मुसलमानों को मुफ्त अनाज नहीं मिल रहा है. सिर्फ 3.2 फीसदी मुसलमानों को सब्सिडाइज्ड लोन का लाभ मिल रहा है. स़िर्फ 2.1 फीसदी ग्रामीण मुसलमानों के पास ट्रैक्टर हैं और स़िर्फ 1 फीसदी के पास हैंडपंप की सुविधा है. शिक्षा की स्थिति और भी खराब है. गांवों में 54.6 फीसदी और शहरों में 60 फीसदी मुसलमान कभी किसी स्कूल में नहीं गए. पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की संख्या 25 फीसदी से ज़्यादा है, लेकिन सरकारी नौकरी में वे स़िर्फ 4.2 फीसदी हैं. जबकि यहां वामपंथियों की सरकार है, फिर भी राज्य की सरकारी कंपनियों में काम करने वाले मुसलमानों की संख्या शून्य है. सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों में मुसलमानों  की संख्या बहुत ही कम है. मुसलमानों की बेबसी का आंकड़ा जेलों से मिलता है. हैरानी की बात यह है कि मुसलमानों की संख्या जेल में ज़्यादा है. महाराष्ट्र में 10.6 फीसदी मुसलमान हैं, लेकिन यहां की जेलों में मुसलमानों की संख्या 32.4 फीसदी है. दिल्ली में 11.7 फीसदी मुसलमान हैं, लेकिन जेल में बंद 27.9 फीसदी क़ैदी मुसलमान हैं.

मुसलमानों पर हुए सारे रिसर्च का नतीजा एक ही है. इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकार के किसी भी विभाग में मुसलमानों की हिस्सेदारी जनसंख्या के अनुपात में नहीं है. प्रशासनिक सेवाओं में मुसलमानों की संख्या दयनीय है. देश में स़िर्फ 3.22 फीसदी आईएएस, 2.64 फीसदी आईपीएस और 3.14 फीसदी आईएफएस मुसलमान हैं. इससे भी ज़्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि सिखों और ईसाइयों की आबादी मुसलमानों से कम है, लेकिन इन सेवाओं में दोनों की संख्या मुसलमानों से ज़्यादा है. देश के सरकारी विभागों की हालत भी ऐसी ही है. ज्यूडिसियरी में मुसलमानों की हिस्सेदारी स़िर्फ 6 फीसदी है. जहां तक बात राजनीति में हिस्सेदारी की है तो यहां भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं. आज़ादी के साठ साल के बाद भी अब तक स़िर्फ सात राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री बन पाए हैं. हैरानी की बात यह यह है कि जम्मू-कश्मीर के फारुख़ अब्दुल्ला के अलावा देश में एक भी ऐसा मुस्लिम मुख्यमंत्री नहीं बन पाया, जो पांच साल तक शासन कर सका हो. राजनीति में मुसलमान हाशिए पर हैं, इस बात की गवाह लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की मौजूदा संख्या है. फिलहाल लोकसभा में 543 सीटों में स़िर्फ 29 सांसद मुसलमान हैं. सामाजिक पिछड़ेपन के साथ-साथ प्रजातंत्र के विभिन्न स्तंभों में भी मुसलमान हाशिए पर हैं.

जिस देश का सबसे बड़ा अल्पसंख़्यक समुदाय पिछड़ा, अशिक्षित, कमज़ोर और ग़रीब रह जाए तो उसका कभी भी विकास नहीं हो सकता. सरकार किसी भी पार्टी की हो, अगर वह भारत का विकास चाहती है तो हर ग़रीब और पिछड़े समुदाय को विकास की धारा से जोड़ना उसका दायित्व बन जाता है. अशिक्षा मुस्लिम समाज का सबसे बड़ा अभिशाप है. हैरानी की बात यह है कि आज़ादी के इतने साल बीत जाने के बावजूद मुस्लिम नेताओं और सरकार को इस अभिशाप का एहसास नहीं है. मदरसों को बेहतर बनाने की बात होती है तो हिंदू और मुस्लिम कट्टरवादी संगठन एक साथ इसका विरोध करते हैं. और जो सेकुलर और प्रोग्रेसिव कहलाने वाली पार्टियां हैं, उन्हें यह लगता है कि जब तक मुसलमान अशिक्षित रहेंगे, तब तक उन्हें वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. अब इस बात पर तो स़िर्फ दु:ख ही व्यक्त किया जा सकता है कि आज़ादी के 60 साल  के बाद भी हमारी सरकार इस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है कि मुसलमानों की अशिक्षा कैसे दूर की जाए और मदरसों को कैसे बेहतर बनाया जाए. अब इंतजार अगले 60 साल  का है, जिसमें दुनिया कहां से कहां निकल जाएगी और तब तक भारत में इस विषय पर हम बहस ही करते रह जाएंगे.

निजीकरण, वैश्वीकरण और आर्थिक उदारवाद का देश के ग़रीब मुसलमानों पर सबसे बुरा असर हुआ है. पिछले दो दशकों से भारत नव उदारवाद की आर्थिक नीति की चपेट में  है. इसका सबसे बुरा असर मुसलमानों पर पड़ा है, खासकर बुनकर, दस्तकार, कारीगर और कढ़ाई-रंगाई आदि करने वाले लोग इस आर्थिक नीति की वजह से हाशिए पर आ गए हैं. वे बेरोज़गार हो गए हैं. इसका नतीजा यह है कि ग़रीबी की वजह से उनके बच्चे स्कूल से दूर चले गए हैं. अब शिक्षा के निजीकरण से ग़रीब अल्पसंख्यक पढ़ाई-लिखाई से वंचित रह जाएंगे. सरकार एक तरफ सरकारी नौकरियों में कटौती कर रही है. उसकी नीतियों और बदलती आर्थिक व्यवस्था में देश के पढ़े-लिखे लोग सरकारी नौकरी छोड़ ज़्यादा पैसे और सफलता के लिए प्राइवेट नौकरी की ओर जा रहे हैं. समझने  की बात यह है कि ऐसे में अगर 10 साल के बाद मुसलमानों को रिजर्वेशन दे भी दिया जाता है तो भी अल्पसंख्यक पिछड़े ही बने रहेंगे और देश का दूसरा वर्ग आगे निकल जाएगा.

हम जब भी मुसलमानों की बात करते हैं तो उन्हें एक पैन इंडियन समाज मान लेते हैं. यह सत्य नहीं है और यह खतरनाक भी है. भारत का मुस्लिम समाज किसी दूसरे धर्म की तरह सजातीय नहीं है. मुस्लिम समाज भी दूसरों की तरह आर्थिक, सामाजिक, भाषाई, एथनिक, क्षेत्रीय और जातिगत आधार पर बंटा हुआ है. भारत में जैसे हिंदू समाज है, वैसे ही मुस्लिम समाज भी है. दूसरे धर्मों के ग़रीब और पिछड़े लोगों को जिस तरह से सरकारी योजनाओं का फायदा मिल रहा है, वह फायदा मुसलमानों को भी मिलना चाहिए. भारत में मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति और जनजातियों से भी खराब है. वजह सा़फ है कि ग़रीबी की मार दोनों पर है, लेकिन एक के लिए सरकार की मदद मौजूद है और मुसलमानों को उनकी क़िस्मत के सहारे छोड़ दिया गया है. अब देश चलाने वालों और मुस्लिम समाज के रहनुमाओं के सामने यह सवाल है कि ग़रीबों के बीच भी धर्म के नाम पर भेदभाव क्यों किया जा रहा है.

मुसलमानों के पिछड़ेपन के मूल में मुस्लिम नेताओं की भी भूमिका रही है. समस्या यह है कि सामाजिक-आर्थिक विकास के मुद्दों के बजाय ज़्यादातर मुस्लिम नेता धार्मिक एवं सांस्कृतिक जैसे भावनात्मक मुद्दों को आगे रखते हैं. जब भी हम मुसलमानों के हालात के बारे में बात करते हैं तो मसला मुस्लिम पर्सनल लॉ, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चरित्र और उर्दू ज़ुबान पर आकर खत्म हो जाता है. मुस्लिम नेताओं के बीच सामाजिक एवं आर्थिक विकास बहस का मुद्दा नहीं है. शुरुआत से ही मुसलमान अपने अधिकार से ज़्यादा सुरक्षा को लेकर चिंतित रहे, लेकिन इसे बदलने की ज़रूरत है. यह समझने की ज़रूरत है कि अगर अधिकार होंगे तो सुरक्षा खुद बखुद हो जाएगी. जब तक मुसलमान बेरोज़गार, ग़रीब और सत्ता में भागीदारी से दूर रहेंगे, तब तक कोई सरकार, कोई पार्टी एवं कोई नेता उन्हें सुरक्षा नहीं दे सकता. इसलिए अधिकार की लड़ाई ही व़क्तकी मांग है, वरना देर हो जाएगी.

जितनी भी सेकुलर पार्टियां हैं, वे सब अपने चुनावी घोषणापत्र में मुसलमानों के रिजर्वेशन की बात दोहराती हैं और सरकार बनते ही उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. चौथी दुनिया अ़खबार ने जब दो साल से संसद की अलमारी में सड़ रही रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट छापी तो लोकसभा और राज्यसभा में हंगामा मच गया. लेकिन सरकार ने इसके बावजूद इसे पेश नहीं किया. इसके बाद जब संपादक संतोष भारतीय ने यह कहकर ललकारा कि राज्यसभा नपुंसक लोगों का क्लब बन गई है तो चौथी दुनिया के एडिटर को प्रिवेलेज नोटिस थमा दिया गया. इसके बाद जब मुलायम सिंह ने लोकसभा में आवाज़ उठाई और सदन की कार्यवाही न चलने देने की धमकी दी, तब सरकार ने रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट संसद में पेश की. स़िर्फ पेश की, कोई कार्रवाई नहीं की. रिपोर्ट लागू करने की अब तक कोई सुगबुगाहट भी नहीं है. यह सरकार वही है, जिसके मुखिया मनमोहन सिंह ने कुछ साल पहले यह कहा था कि देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का ज़्यादा अधिकार है. सरकार की यह कैसी मजबूरी है कि वह वादा़फरामोशी पर आमादा है. मुसलमान किस पर भरोसा करें. यह क्यों न मान लिया जाए कि राजनीतिक दल चाहे वे किसी भी विचारधारा के हों, मुसलमानों के विकास के लिए बातें तो करते हैं, लेकिन अमल नहीं करते.

सरकार कहती है कि मुसलमानों को रिजर्वेशन देने के लिए संसद में सर्वसम्मति की ज़रूरत है. तो क्या सरकार जो भी बिल पास कराती है, उसमें सभी पार्टियों की सहमति होती है? क्या भारत-अमेरिका परमाणु संधि में सभी पार्टियों की सहमति थी? क्या महिला आरक्षण बिल को लेकर सभी दलों में सहमति है? फिर भी सरकार ने क़दम उठाया, बिल को पेश किया. लेकिन जब बात ग़रीब और पिछड़े मुसलमानों के विकास की होती है तो हर सरकार बहाना ढूंढने लग जाती है. सोचने वाली बात यह है कि जब मुसलमानों से जुड़ा भावनात्मक मामला आता है तो देश में ज़बरदस्त आंदोलन शुरू हो जाता है. यह अच्छी बात है. लेकिन जब इन्हीं मुसलमानों के लिए रोज़गार, शिक्षा और विकास की बात आती है तो पता नहीं क्यों, लोगों को सांप सूंघ जाता है. बाबरी मस्जिद की शहादत की बात को ही ले लीजिए. देश की सारी सेकुलर पार्टियां एक हो गईं. हिंदू हो या मुसलमान, समाज के रहनुमा सड़कों पर उतर आए. भाजपा और आरएसएस के खिलाफ़ देशव्यापी आंदोलन शुरू हो गया, लेकिन यही लोग सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट पर चुप्पी साध कर बैठ गए हैं.

देश के सामने एक गंभीर खतरा मंडरा रहा है. प्रजातंत्र खतरे में है, लेकिन इस खतरे का आभास न तो सरकार को है और न ही राजनीतिक दलों को. समाज में फैली असमानता को चिन्हित करने और उसके उपाय निकालने के बजाय देश चलाने वाले चुप हैं या फिर इस मसले को टालने का फैसला कर लिया गया है. इस खतरे की वजह है मुसलमानों का पिछड़ापन, उनकी बेरोजगारी और अशिक्षा. मुसलमानों की हालत साल दर साल बदतर होती जा रही है. एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा जैसी पार्टियों से खतरा है तो दूसरी तरफ वे दल हैं, जो मुसलमानों को वोटबैंक समझ कर इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उनकी रोज़मर्रा की समस्याओं को हल करने के बजाय टालमटोल का खेल खेलते हैं. एक तरफ अमेरिका और यूरोप की सरकारें मुसलमानों को आतंकी क़रार देने में जुटी हैं तो दूसरी तरफ आर्थिक नीति और महंगाई ने मुसलमानों के हौसले को तोड़ कर रख दिया है. एक तरफ सच्चर कमेटी और रंगनाथ कमीशन की रिपोर्ट है, जो मुसलमानों के लिए आशा की किरण बनकर सामने आती है तो दूसरी तरफ इन रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डालने वाली सरकार. मुसलमान हर तरफ से नुकसान ही झेल रहा है. यह नुकसान स़िर्फ मुसलमानों का नहीं है, यह देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था के आधार और विचार को चुनौती दे रहा है. यह चुनौती भारत में प्रजातंत्र की साख को खत्म करने की ताक़त रखती है. समझने वाली बात यह है कि जिस व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के अधिकार, सत्ता में उनकी हिस्सेदारी और विकास सुनिश्चित नहीं हैं, वह प्रजातंत्र के नाम पर धोखा है. सत्य तो यह है कि आज स़िर्फ मुसलमान ही नहीं, हमारा प्रजातंत्र भी खतरे में है.

:: ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::  ::
मो. रफीक चौहान (एडवोकेट)