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Saturday, October 20, 2012

महान लोकतंत्र कि सौतेली संताने



सीता की उम्र लगभग सत्रह साल ! शाम को अपने घर में बर्तन साफ़ कर रही थी! तभी सलवा जुडूम और सुरक्षा बलों ने गाँव पर हमला बोल दिया !
गाँव के लोग जान बचाने के लिये जंगल की तरफ भागने लगे ! सीता के माँ बाप भी घर पर ही थे ! तभी चार एस पी ओ ( विशेष पुलिस अधिकारी ) ने सीता के घर पर धावा बोल दिया ! एक पुलिस अधिकारी ने सीता की चोटी पकड़ी और घर के भीतर ले कर जाने के लिये घसीटने लगा ! सीता के माता पिता ने बेटी को बचाने की कोशिश की ! दो पुलिस अधिकारियों ने सीता के माँ बाप को बन्दूक के कुंदे से मार कर गिरा दिया ! एक पुलिस अधिकारी ने सीता को पशु की तरह कंधे पर उठा कर घर के भीतर ले जाकर पटक दिया ! चारों पुलिस अधिकारियों ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया ! बूढ़े माँ बाप दरवाजा पीट पीट कर अपनी बेटी को छोड़ देने की प्रार्थना करते रहे !
चारों पुलिस अधिकारियों ने सीता से बलात्कार करने के बाद ! सीता के कान और नाक में पहने नथ और कुंडल खींच लिये ! सीता के पिता ने बैल खरीदने के लिये दस हज़ार रूपये भी घर में पेटी में रखे थे ! पुलिस अधिकारियों ने वो रूपये भी लूट लिये ! इसके बाद सीता को ज़मीन पर पड़ा छोड़ कर चारों पुलिस अधिकारी अपने अन्य साथियों के साथ दूसरे आदिवासियों के घरों में लूटपाट करने चल दिये !
सीता हिम्मती लड़की थी !उसने अगले दिन अपने पिता से कहा कि मैं इस घटना की शिकायत थाने में कराऊंगी और इन चारों को सजा दिलवाऊंगी ! सीता थाने पहुँची ! सीता से बलात्कार करने वाले बलात्कारी थाने में ही थे ! वे चारों बलात्कारी पुलिस अधिकारी सीता को देख कर थानेदार के पास कुर्सियों पर आ कर बैठ गये ! सीता ने अपने साथ घटी बलात्कार की घटना के बारे में थानेदार को बताया ! थानेदार हँसने लगा उसके साथ चारों बलात्कारी भी हँसने लगे ! थानेदार ने कहा जल्दी यहाँ से भाग जा नहीं तो दुबारा बलात्कार हो जाएगा !
सीता और उसके पिता वापिस आ गये ! सीता नी हार नहीं मानी उसे कही से हमारे बारे में पता चला ! सीता हमारे आश्रम आयी ! हमने सीता की शिकायत पुलिस अधीक्षक को भेजी ! पुलिस अधीक्षक ने कार्यवाही तो दूर महीने भर तक कोई जवाब भी नहीं दिया ! फिर हम कोर्ट में गये ! कोर्ट ने चारों आरोपी विशेष पुलिस अधिकारियों को अपना पक्ष रखने के लिये समन भेजा ! ये चारों आरोपी नहीं आये ! कोर्ट ने इन चारों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया ! इन् चारों के नाम हैं किच्चे नंदा जो पुलिस अधीक्षक का बाडी गार्ड है दूसरा है विजय जो कोंटा ब्लाक कांग्रस का अध्यक्ष है ! मंगल और राजू पुलिस अधिकारी हैं और वे भी थाने की भीतर ही रहते हैं !
सरकार ने कोर्ट में कहा कि ये चारों विशेष पुलिस अधिकारी फरार हैं और निकट भविष्य में इनके मिलने की कोई आशा भी नहीं है ! अदालत ने केस को अभिलेखागार में बंद कर के रखने का आदेश दे दिया !
इधर मैं दिल्ली आकर गृह मंत्री श्री चिदम्बरम से मिला और उन्हें दंतेवाड़ा आकर आदिवासियों की शिकायतें सुनने का सुझाव दिया ! चिदम्बरम को मैंने एक सीडी भी सौंपी जिसमे इस बलात्कार कांड का भी ज़िक्र था !
श्री चिदम्बरम के दंतेवाड़ा आकर सीता से मिलने के दो सप्ताह पहले बलात्कारी पुलिस अधिकारी पूरे पुलिस दल बल के साथ सीता के गाँव में आये और सीता और उसकी तीन और बलात्कार पीड़ित सहेलियों समेत उठा कर थाने ले आये ! थाने में फिर से वही बलात्कारों का दौर शुरू हुआ जो पांच दिन चलता रहा ! इस बार थाने में इन्हें पीटा भी गया और पांच दिन तक खाना नहीं दिया गया !
सीता के गाँव से मुझे फोन आया ! मैंने श्री चिदम्बरम को , देश के गृह सचिव को , छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को , छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक को , दंतेवाड़ा के कलेक्टर को और पुलिस अधीक्षक को फोन पर सूचना दी ! मैंने प्रार्थना की कि इन लड़कियों को बचा लीजिए !
लेकिन किसी ने इन लड़कियों को नहीं बचाया !
पांच दिन बाद सीता और उसकी तीन सहेलियों को पुलिस ने वापिस लाकर गाँव के चौराहे पर फेंक दिया और गांव वालों को चेतावनी दी कि अब अगर किसी ने हिमांशु से बात की तो पूरे गाँव को आग लगा देंगे !
इसके बाद मैं सीता और उसकी सहेलियों से मिलने उनके गाँव पहुंचा ! पुलिस विभाग ने मेरे पीछे एक जीप भर कर पुलिस वाले लगा दिये !
गाँव वालों ने रोते हुए हाथ जोड़ कर कहा मैं वापिस चला जाऊं , उन्हें अब मेरी और मदद नहीं चाहिये !
ये बलात्कारी अभी भी खुले आम नए गावों पर हमले कर रहे हैं ! नई लड़कियों के साथ बलात्कार कर रहे हैं ! पिछले साल इन लोगों ने फिर से तीन गावों को जला दिया ! जब स्वामी अग्निवेश इन जले हुए गाँव वालों के लिये राहत सामग्री लेकर दंतेवाड़ा पहुँचे तो इसी विजय के नेतृत्व में विशेष पुलिस अधिकारियों के दल ने स्वामी अग्निवेश के दल पर हमला किया ! बाकी के बलात्कारी भी थाने में ही रहते हैं और नियमित सरकारी वेतन लेते हैं !लेकिन सरकार इन्हें कोर्ट में फरार बताती है !
मैं नहीं जानता सीता और उसकी तीनो सहेलियां अब किस हाल में हैं !
पर इस लड़ाई में सीता नहीं हारी बल्कि इस देश के लोकतंत्र ने सीता के सामने दम तोड़ दिया है !

Saturday, October 13, 2012

नक्सलवाद या राजनीतिक आतंकवाद !



हिन्दुस्तान में राजनीति राष्ट्र की सेवा और विकास का हेतु होने के बजाय लोकतांत्रिक तानाशाही का जरिया मात्र रही है। यह तानाशाही काफी हद तक देश को घुन की तरह चाट चुकी है फिर भी लोकतंत्र में आस्था का डंका पीटने वाले बेशर्मो को इस बात का अंदाजा नहीं है कि उनके पैरों तले जमीन कब की खिसक चुकी है। देश के किसी भी हिस्से में देखिये ये राजनीतिक आतंकवाद फन काढ़े विष वमन कर रहा है। कमोवेश हर जगह के हालात एक जैसे हैं अंतर सिर्फ इतना है कि कुछ जगहों पर इसके विरोध में लोगों ने हथियार तक उठा लिए हैं और कुछ जगहों पर संगठन की कमी के कारण अभी सिर्फ दिलों में बारूद इकट्ठा हो रहा है। गौरतलब है कि जो तस्वीर उभर रही है वह बहुत ही भयानक है और किसी भी समय हकीकत की जमीन पर उतर सकती है। राजनीतिक और प्रशासनिक पर्यवेक्षक शासन और सत्ता के सामने सिर्फ वही तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं जो वह देखना चाहती है। वैसे भी ये इतने प्रैक्टिकल होते हैं कि इनका ध्यान सिर्फ अपने वेतन, भत्ते और हनक बनाने पर ही केन्द्रित रहता है। राजनेताओं द्वारा जिस तरह क़ानून और व्यवस्था को बंधक बनाने की परिपाटी और विरोधियों का दमन करने का चलन अपना लिया गया है वह इस लोकतांत्रिक तानाशाही का निकृष्टतम रूप है। राजनेताओं की इसी राजनीति की प्रतिक्रिया स्वरुप जन्मे हिंसक विरोध को नक्सलवाद की संज्ञा दी जा रही है। नक्सलवाद जाने-अनजाने देशद्रोह तक की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं, और जिन स्थानों पर वे पूरी तरह से नक्सलियों के रूप में चिन्हित कर दिए गए हैं वहां उनका राजनीतिक इस्तेमाल भी धड़ल्ले से हो रहा है। यानी प्रतिक्रिया स्वरुप की जाने वाली हिंसा को अब राजनीतिक हथियार बनाकर नासूर में तब्दील कर दिया गया है। स्पष्ट है कि इन नक्सलियों के हालात अब पाकिस्तान द्वारा पोषित आतकवादियों के समकक्ष है जिनके पास पुनर्वास का कोई रास्ता नहीं है। जग-जाहिर है कि इंसान जब हथियार उठता है और उसके लिए पीछे लौटने के दरवाजे बंद हो जाते हैं तो वह जेल में मरने के बजाय आज़ाद जिन्दगी जीते हुए एन्काउन्टर होने की सबसे बड़ी और अदम्य इच्छा पाल लेता है।
नक्सलवाद की जड़ों और उनके प्रभावों पर केन्द्रित ना रहते हुए मेरा मकसद राजनीतिक आतंकवाद से पनप रहे आक्रोश और बेहद चिंताजनक विचारधारा की तरफ ध्यान आकृष्ट करना है। राजनीति अब राज्य और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरी तरह से भुलाकर आम आदमी और स्थानीय क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व कायम करने का साधन बन गई है प्रशासनिक कार्यों में बेढंगे और निहायत घटिया स्तर पर हस्तक्षेप करना राजनेताओं का प्रमुख उद्देश्य बना हुआ है। चुनावों के बाद सबसे पहले उन लोगों की लिस्ट बनती है जिन्होंने चुनाव में विरोध किया हो, और उनके दमन की योजनायें तैयार की जाती है, (बहुतेरे नेता इसे बाकायदा नाकाबंदी की संज्ञा देते है) उसके बाद बारी आती है अपने लोगों (जाहिर सी बात है इनमे कोई शरीफ आदमी नहीं होता) को कमाई करवाने और उनका रोब-दाब बढ़ाने की, सो स्थानीय प्रशासन से बाकायदा उनकी पहचान कराई जाती है कि ये आज से आपके नए दामाद हैं। और फिर बारी आती है सगे-सम्बन्धियों और आर्थिक हितैषियों की जिन्हें नाली, खडंजे, सड़के और जितने भी सरकारी निर्माण के ठेके पट्टे (यहाँ तक की बीयर और शराब की दुकानों के लाइसेंस तक) उन्हें सौंपने की। जिन लोगों की तनिक भी दिलचस्पी इन चीजों में होगी उन्होंने अक्सर क्षेत्र के माननीयों को अपने हाथों से सार्वजनिक उपक्रम (शिक्षा, चिकित्सा, खाद्य, निर्माण एवं आपदा प्रबंधन विभाग आदि) के कार्य बांटते देखा होगा। बात सिर्फ यहीं तक सीमित होती तो भी स्थिति विस्फोटक न होती। अपराधियों को संरक्षण देकर जिस तरह का असुरक्षित वातावरण पैदा किया जा रहा है वह लोकतंत्र से स्वास्थ्य के लिए बिलकुल भी लाभदायक नहीं है। दमन और विद्वेष की नीव पर खडी सरकारें हर घर में नक्सली पैदा करने की कोशिश करती नजर आ रही हैं। इन राजनेताओं को इतना भी समझ में नहीं आता है कि ये वास्तव में उस पद के हकदार भी नहीं है जिस पर बैठकर ये इतराते हैं और तानाशाहों जैसी भोंडी हरकतें करते हैं। कुछेक नेताओ को छोड़कर सारे राजनेताओं की हालत ये है कि उन्हें विधायक या संसद इसलिए बनने का मौका मिला क्योंकि मतदाता मतदान करने ही नहीं आया। महज २० से २५ प्रतिशत वोटों को पाकर राजनेता बन गए इन राजनीतिज्ञों को कमाई और राजनीतिक ताकत को छोड़कर राजनेता के किसी फ़र्ज़ का ककहरा तक नहीं आता है। शिक्षित युवाओं और सभ्य हिन्दुस्तानियों के दिल पर क्या गुजरती होगी जब उनके द्वारा चुने गए नेता भारत की जनता और भारत माता में अपनी निष्ठा की बात न कहकर व्यक्ति विशेष में अपनी निष्ठा का ढोल पीटता है? शायद ये बात आज कोई राजनेता नहीं सोचता; हिन्दुस्तान की अधिकाँश जनता भी शायद इस छोटी सी बात की गंभीरता को नहीं समझ पाती और हर बार छली जाती है। लेकिन जिस तरह शिक्षा और संचार के माध्यमों का विकास हो रहा है आज इस देश की जनसँख्या का एक बहुत बड़ा युवा तबका राजनीति की दशा और दिशा पर निगाह रखता है और हर रोज उसका असंतोष बढ़ता जाता है, मैं इसी असंतोष को नक्सलवाद के बीज के रूप में देखता हूँ जो आगे चलकर बहुत ही विकराल रूप ले सकता है। ये राजनीतिक आतंकवाद यदि इसी तरह जारी रहा तो विस्फोट बहुत दूर नहीं है, असंतोष यदि ब्रिटेन में राजा और रानी का सार्वजानिक क़त्ल करवा कर कामनवेल्थ की स्थापना कर सकता है तो हिन्दुस्तान में पूर्ण शुद्धिकरण का नाद करके लोकतांत्रिक-अधिनायक की व्यवस्था भी दे सकता है।

Sunday, July 22, 2012

मैं जेल से लिंगा कोडोपी बोल रहा हूँ



तुमने मुझे धकेल दिया जेल की कोठरी के अँधेरे में,
क्योंकि राष्ट्रपति भवन के,
विशालकाय गणतंत्र के गुम्बद पर
चमचमाता हुआ प्रकाश पुंज,
मेरी ही जमीन छीनकर बनाये गये,
बिजलीघर में तैयार बिजली से दमदमाता है ,

मेरी आजादी को खतरा बताया गया,
गणतन्त्र के उस विशालकाय गुम्बद के
बल्ब की रौशनी के लिये,
पुलिस की कितनी लाठियां टूटी मुझपर,
अब याद नहीं,

मार खाते हुए रोने का विकल्प नहीं था मेरे सामने ,
क्योंकि मेरी आँखों के आंसू
ताड़मेटला गाँव में थाने से बलात्कार होकर लौटी
लड़की की कहानी सुनने के बाद,
बहकर समाप्त हो चुके थे,
सिर्फ खून उतर आया था मेरी आँखों में पुलिस से पिटते समय,

लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा के लिये ,
सभ्य लोगों को जरूरी लगता है ,
हमे लगातार हमारी हैसियत का
अहसास कराते जाना,
और हमारी औरतों के शरीर में ,
तुम्हारे राष्ट्र का पौरुष,
और कंकड,पत्थर भर दिये जाना ,
उस रात तुमने मेरी बुआ सोनी सोरी को नहीं
अपने लोकतन्त्र को नंगा किया था थाने में,

मैं लडूंगा, क्योंकि न लड़ने का विकल्प तुमने छीन लिया मुझसे,
मैं मरूँगा नहीं,
क्योंकि मुझे शपथ लगी है उन सबकी,
जिनकी इज्जत लूटी, जिनके घर जले ,
जिनके बच्चे मरे और वो रो न सके ,
हाथ मेरे अब जुडेंगे नही ,
गर्दन मेरी अब झुकेंगी नही,
जंग मेरी अब रुकेगी नहीं ,
मैं मरूँगा नहीं, लडूंगा मैं अब ,
हर पेंड़ की छाँव में, हर पहाड़ी पर
जंगल के हर मोड पर ,
तुम मुझे ही पाओगे,

तुम्हारी हर लाठी,
तुम्हारे लोकतन्त्र पर ही चली है ,
तुम्हारी हर गोली ने तुम्हारी ही संस्कृति को मारा है,
तुम्हारी हर जेल में तुम्हारा ही लोकतन्त्र कैद है ,
मैं ना पिटा हूँ, ना मरा हूँ और न कैदी ही हूँ,
मेरी बुआ की कोख से निकले पत्थर के नीचे,
दब गया है तुम्हारा गणतन्त्र, संविधान और लोकतन्त्र,
मेरी बुआ रोज पीटती है तुम्हें, सुबह से शाम तक,
देखो कितने अपमानित, पीड़ित और बेचारे दिख रहे हो तुम सब,
मैं और मेरी बुआ जेल से खिल्ली उड़ा रहे हैं तुम्हारी,

तुम हांफ रहे हो,
दम घुट रहा है तुम्हारे नकली लोकतन्त्र का,
मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं,
मैंने तुम्हारे ढोंग के मुखौटों को,
मक्कारी और शराफत की
नकाब को फाडकर फेंक दिया है और
तुम्हारा राष्ट्र, संस्कृति और लोकतन्त्र नंगा हो चुका है,
ताड़मेटला की उस बलात्कृत लड़की के सामने,

देखो मेरी आँखों में झांककर देखो
तुम्हें मेरी आँखों में गुस्सा और
मुझे तुम्हारी आँखों में घबराहट और
डर दिखाई दे रहा है,

Wednesday, December 07, 2011

जज के नाम सोनी सोरी का पत्र


 
छत्तीसगढ़ के रायपुर जेल में बंद सोनी सोरी ने केस की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के जज और अपने दिल्ली के वकील कोलीन गोंजाल्विस के नाम जेल से पत्र लिखा है। स्कूल शिक्षिका सोनी सोरी पर छत्तीसगढ़ पुलिस ने आरोप लगाया है कि वह एस्सार कंपनी से माओवादियों के लिए धन उगाही करती थीं। छत्तीसगढ़ पुलिस के अनुसार सोनी सोरी लंबे समय से फरार चल रही थीं, जबकि शिक्षिका सोनी सोरी ने अदालत में रोज स्कूल जाने का प्रमाण लगाया है और अपने निर्दोष होने के कई दूसरे प्रमाणों का भी पत्र में हवाला दिया है। गौरतलब है कि सोनी सोरी के गुप्तांगों में दंतेवाड़ा एसपी अंकित गर्ग के इशारे पर स्थानीय पुलिस द्वारा पत्थर डाले जाने की खबर को जनज्वार ने प्रमुखता से उठाया। जनज्वार में खबर प्रकाशित होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गयी है कि आखिर अदालत दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही के लिए और किन प्रमाणों और तथ्यों का इंतजार कर रही है। खासकर तब जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मेडिकल जांच के लिए कोलकाता भेजी गयीं सोनी सोरी के गुप्तांगों से पत्थर निकालकर कोलकाता के एनआरएस अस्पताल के डाक्टरों ने सुपरिटेंडेंट के नेतृत्व में पत्थरों को सिलबंद कर सुप्रीम कोर्ट के हवाले कर दिया है। इन पत्थरों को सोनी सोरी के वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता कोलीन गोंजाल्विस को भी अदालत में सीलबंद ही दिखाया गया। सोनी सोरी के गुप्तांगों में ये पत्थर करीब 20 दिन तक रहे। छत्तीसगढ़ मेडिकल जांच में वहां के डाक्टरों ने राज्य सरकार के दबाव में रिपोर्ट दी थी कि सोनी सोरी ठीक हैं। ऐसे में सोनी सोरी का यह पत्र बेहद मौजू है, जिसे यहाँ हम पठनीयता की दृष्टि से मामूली परिवर्तनों के साथ हु-ब-हु प्रकाशित कर रहे हैं. आदिवासी शिक्षिका होने के नाते उनकी हिंदी बेहतर नहीं है, उम्मीद है पाठक इसका ख्याल करेंगे... जनज्वार सम्पादक  

सोनी सोरी सोढ़ी का पत्र

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1. डेढ़ साल से पुलिस क्या कर रही थी। डेढ़ साल से गिरफ्तारी वारंट बनाकर रखी तो हमें आरेस्ट क्यों नहीं किया। अब पुलिस कह रही है कि हम हमेशा फरार रहते थे। यदि ऐसी बात थी तो फिर पुलिस वालों ने न्यायालय को मेरे फरार होने की जानकारी क्यों नहीं दी, जिससे न्यायालय मेरे शिक्षा विभाग को नोटिस जारी करती। आखिर मुझे शिक्षा विभाग किस आधार पर वेतन की पात्रता दिया।

2. पुलिस हमें मारना क्यों चाहती है? नोट कांड केस में भी दिनांक 11.9.2011 को भी हमपर फायरिंग की गयी थी और हम अपने आप को कैसे बचा पाये, यह हम ही जानते हैं। उसके बाद हमें पुलिस वालों ने फरार करार देकर झूठा केस में फंसाने की कोशिश की। इन बातो को मैंने न्यायालय में भी बताया था। पिछला जख्म को भी दिखाया कि हम पर पुलिस ने आत्याचार किया है। हम दिल्ली से वापस नहीं जायेंगे, हम अपनी लड़ाई दिल्ली न्यायालय से लड़ेगे, फिर भी न्यायालय मेरी बातों पर विश्वास ना करते हुए छत्तीसगढ़ पुलिस को सौंप दिया और आज मेरी इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है। न्यायालय, पुलिस प्रशासन, सरकार या मैं।

सुप्रिमकोर्ट न्यायालय से जानना चाहती हूँ । हमें रिमांड में रखकर दन्तेवाड़ा थाने में एस.पी. अंकित गर्ग इतना भयानक रूप से करंट देकर मानसिक शारीरिक से प्रताड़ना क्यों किया। जो जख्म अनदोरूनी में मुझे दिये उसे चाहकर भी मैं भूल नहीं सकती। यदि मैं गुनाहगार थी तो पूछताछ करके न्यायालय में पेश करना था न्यायालय हमें फैसला करती की सजा देना या ना देना। जज साहब ये कैसा कानून, कैसा इन्साफ, बेगुनाह होते हुए भी सजा काट रही हूं। मेरी गलती क्या है?

3. जब नक्सलबादी हम पर आत्याचार करते या मारते तो सरकार से हम शिकायत करते और सरकार हमें मदद करती, ऐसा मेरा मानना है। पर सरकार के आदमियों द्वारा अत्याचार करने पर हम शिकायत कहां जाकर करें। सरकार का ही व्यक्ति ये बोले की तुम कहीं पर भी शिकायत नहीं कर सकती सरकार न्यायालय ये सब हमारे अन्डर में है। तो आप ही बताईये जज साहब हम जैसे लोग पुलिस वाले के आत्याचार से लाचार कहां जायें।

4. मैंने अपने देश के राष्ट्र ध्वज तिरंगा झण्डा के लिए नक्सल से बहस की। अपनी आश्रम शाला जबेली में झंडा फहराया, जबकि कुछ स्कूल में 15 अगस्त को काला झण्डा फहराया गया। इस पर भी एस.पी. अंकित गर्ग मुझे बहुत ही गंदी शब्दों की गाली दिया और कहा तुम एक मामूली आदिवासी महिला झण्डा के बारे में ऊंची-ऊंची बातें करती हो, तुम्हारी औकात क्या है।

क्या मैंने अपनी मिली शिक्षा के आधार पर बहस करके जो झण्डा फहराया था, मेरी गलती थी जज साहब। नक्सलवाद की समस्या को केवल बंदूक की नोक से खत्म नहीं किया जा सकता, इससे जीवन ही खत्म हो जायेगा। पर शिक्षा की ताकत बंदूक की ताकत से ज्यादा ताकतवर है। मैं इतने वर्ष से नक्सलवाद क्षेत्र में एक अच्छी शिक्षा का विकास करने की कोशिश कर रही हूं। इस शिक्षा की ताकत से कामयाब भी रही, जिससे उस क्षेत्र में शांति बनी रही पर पुलिस प्रशासन शांत वातावरण नहीं चाहता। हमें किसी ना किसी बहाना से बेगुनाह होने के बाद भी जेल में डाल रखा और मेरी मान सम्मान इज्जत को भी छीन लिये। मेरे तीन बच्चे अनाथ की तरह जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिये। आज मेरे बच्चे हर सुख, खान-पान, माता-पिता से वंचित है। मैं अपने बच्चों के लिए कुछ नहीं कर पा रही हूँ । जज साहब ये कैसा न्याय है।

5. पुलिस को खबर मिलने पर मेरे आश्रम शाला जबेली में आकर वह जानकारी क्यों नहीं लिया कि मैडम (सोनी सोरी) उस घटना वाले दिन आश्रम में थी या नहीं। जज साहब मैं 100-150 बच्चों -विद्यार्थी के बीच रात, दिन अपनी आश्रम शाला जबेली में सेवा देती हूं। बच्चों को हमने हमेशा सच्चाई की शिक्षा दी है। मेरे विद्यार्थी झूठ कभी नहीं बोलेंगे फिर पुलिस कभी इन विद्यार्थियों से पूछताछ क्यों नहीं किया। आज पुलिस फर्जी केस बनाकर न्यायालय को पेश कर रही है। कानून की सीख देने वाले व्यक्ति लोग झूठी नींव बनाकर चल रहे हों तो अनेक हम जैसे बेगुनाह अपराधी बनकर रह जायेंगे।

6. यदि मैं नक्सलवाद की समर्थक थी तो अपने पिता की घर-संपती  नक्सलवादियों द्वारा लूट लिये जाने पर क्यों नहीं बचा सकी। मैंने क्यों नहीं बचाया जब मेरे पिता को नक्सलवादी पैर में गोली मार दिये। आज की स्थिति में वह चलने योग्य नहीं हैं। इस सच्चाई को पुलिस-अदालत अच्छी तरह से जानती है। फिर भी अपने आंखो में पट्टी बांधकर रह रहे हैं। मेरे पिता ने तो कोर्ट में घुसकर बयान दिया, फिर भी न्यायालय अनसूनी कर दी जज साहब। ऐसी स्थिति में हम कहां जाय। अब हमारी आखिरी उम्मीद विश्वास सुप्रीम कोर्ट न्यायालय पर है।

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जज साहब मैं अपनी तरफ से सच्चाई के साथ सच को पेश करने की कोशिश किया 1. नोट कांड में भी सबूत पेश किया जिसमें मानकर नाम का पुलिस वाला  शामिल है। 2. बाकी केस में भी सबूत पेश करने की कोशिश किया। जैसे कि आश्रम शाला के विद्यार्थी से पूछताछ, शिक्षा विभाग अधिकारी, वेतन पर्ची दैनिक उपस्थिति पंजी रजिस्टर। इससे ज्यादा सच्चाई और कहां से पेश करूं, सच तो इतना ही है। जज साहब मेरी सच्चाई की कथन पर गौर किजिएगा, आपसे मेरा निवेदन है।

प्रार्थी

गुप्तांगों में एसपी ने पत्थर भर डाले थे !


 
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माननीय न्यायाधीश महोदय,
सर्वोच्च न्यायालय,
नईदिल्ली

यह पत्र मैं आपको सोनी सोरी नाम की आदिवासी लड़की के सम्बन्ध में लिख रहा हूँ, जिसके गुप्तांगो में दंतेवाडा के एस.पी. ने पत्थर भर दिये थे और जिसका मुकदमा आपकी अदालत में चल रहा हैІ उस लड़की की मेडिकल जाँच आपके आदेश से कराई गई और डाक्टरों ने उस आदिवासी लड़की के आरोपों को सही पाया और डाक्टरी रिपोर्ट के साथ उस लड़की के गुप्तांगो से निकले हुए तीन पत्थर भी आपको भेज दिये І

दिनांक 02-12-2011 को अपने वो पत्थर देखने के बाद भी उस आदिवासी लड़की को छत्तीसगढ़ के जेल में ही रखने का आदेश दिया और छत्तीसगढ़ सरकार को डेढ़ महीने का समय जवाब देने के लिए दिया हैІ

जज साहब मेरी दो बेटियाँ हैं अगर किसी ने मेरी बेटियों के साथ ये सब किया होता तो मैं ऐसा करने वाले को डेढ़ महीना तो क्या डेढ़ मिनट की भी मोहलत न देता! और जज साहब अगर यह लड़की आपकी अपनी बेटी होती तो क्या उसके गुप्तांगों में पत्थर डालने वालों को भी आप पैंतालीस दिनों का समय देते? और क्या उससे ये पूछते कि आपने मेरी बेटी के गुप्तांगों में पत्थर क्यों डाले? पैंतालीस दिन के बाद आकर बता देना और तब तक तुम मेरी बेटी को अपने घर में बंद कर के रख सकते हो !

पत्थर डालने वाले उस बदमाश एस. पी. को पता है कि उसकी रक्षा करने के लिये आप यहाँ सुप्रीमकोर्ट में बैठे हुए हैं इसलिए वह बेफिक्र होकर खुलेआम इस तरह की हरकत करता है और आपके कल के आदेश ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है, कि इस तरह से हरकत करने वालों की रक्षा सुप्रीमकोर्ट लगातार उसी तरह करता रहेगा जिस प्रकार वो अंग्रेजों के समय से सरकारी पुलिस की रक्षा के लिए करता रहा हैІ

जज साहब ये अदालत उस आदिवासी लड़की की रक्षा के लिए बनायी गयी थी उस बदमाश एस.पी. के लिए नहीं І ये इस लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च न्यायालय है और इसका पहला काम देश के सबसे कमजोर लोगों की रक्षा सबसे पहले करने का है  आपको याद रखना पड़ेगा कि इस देश के सबसे कमजोर लोग महिलायें, आदिवासी, दलित, भूख से मरते हुए करोडों लोग हैं और इस अदालत को हर फैसला इन लोगों के हालत को बेहतर बनाने के लिए देना पड़ेगाІ लेकिन आजादी के बाद से इन सभी लोगों को आपकी तरफ से उपेक्षा और इनकी दुर्गति के लिए जिम्मेदार लोगों को संरक्षण दिया गया हैІ

मेरे पिताजी इस देश के आजादी के लिए लड़े थेІ उन सभी आजादी के दीवानों के क्या सपने थे? उन लोगों ने कभी कल्पना भी की होगी कि आज़ादी मिलने के बाद एक दिन इस देश की सर्वोच्च न्यायालय एक आदिवासी बच्ची के बजाय उसपर अत्याचार करनेवाले को संरक्षण प्रदान करेगीІ

हमें बचपन से बताया गया इस देश में लोकतंत्र है. इसका मतलब है करोडों आदिवासियों, करोडों दलितों, करोडों भूखों का तंत्र І लेकिन आपके सारे फैसले इन करोडों लोगों को बदहाली में धकेलने वाले लोगों के पक्ष में होते हैं І आपको जगतसिंहपुर उडीसा में अपनी जमीन बचाने के लिए गर्म रेत पर लेटे हुए औरतें व बच्चे दिखाई नहीं देते? उनके लिए आवाज उठाने वाले कार्यकर्ता अभय साहू को जमीन छीनने वाले कंपनी मालिकों के आदेश पर सरकार द्वारा गिरफ्तारी आपको दिखाई नहीं देती?

आपकी अदालत में गोम्पाड गांव में सरकारी सुरक्षाबलों द्वारा तलवारों से काट डाले गये सोलह आदिवासियों का मुकदमा पिछले दो साल से घिसट रहा हैІ इस अदालत में उन आदिवासियों को लाते समय मुझे एक नक्सलवादी नेता ने चुनौती दी थी और कहा था कि इन आदिवासियों की हत्या करने वाले पुलिसवालों को अगर तुम सजा दिलवा दोगे तो मैं बंदूक छोड़ दूँगाІ

लेकिन मैं हार गयाІ इस अदालत में आने के सजा के तौर पर पुलिस ने उन आदिवासियों के परिवारों का अपहरण कर लिया और वे लोग आज भी पुलिस की अवैध हिरासत में हैं І आपने दोषियों को अब तक सजा न देकर इस देश की सरकार को नहीं जिताया, आपने मुझे चुनौती देने वाले उस नक्सलवादी को जीता दियाІ अब मैं किस मुंह से उस नक्सलवादी के सामने इस देश के महान लोकतंत्र और निष्पक्ष न्यायतंत्र की डींगे हांक सकता हूँ? और उसके बन्दूक उठाने को गलत ठहरा पाऊँगा ?

अगर इस देश में तानाशाही होती तो हमें संतोष होता, हम उस तानाशाही के खिलाफ लड़ रहे होते, परन्तु हमसे कहा गया कि देश में लोकतंत्र है परन्तु इस तंत्र की प्रत्येक संस्था, विधायिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका मिलकर करोडों लोगों के विरुद्ध और कुछ धनपशुओं के पक्ष में पूरी बेशर्मी के साथ कार्य कर रहे हैंІ इसे हम लोकतंत्र नहीं लोकतंत्र का ढोंग कहेंगे और अब हम लोकतन्त्र के नाम पर इस ढोंगतंत्र को एक दिन के लिए भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं І

आज मैं प्रण करता हूँ कि आज के बाद किसी गरीब का मुकदमा लेकर आपकी अदालत नहीं आऊंगाІ अब मैं जनता के बीच जाऊंगा और जनता को भड़काऊगा कि वह इस ढोंगतंत्र पर हमला करके इसे नष्ट कर दें ताकि सच्चे लोकतन्त्र की ईमारत खड़ी करने के लिए स्थान बनाया जा सकेІ

अगर आप इस लड़की को इसलिए न्याय नहीं दे पा रहे हैं कि उससे सरकार नाराज हो जाएगी और उससे आपकी तरक्की रुक जायेगी І तो ज़रा इतिहास पर नजर डालिए  इतिहास गलत फैसला देने वाले न्यायाधीशों को कोई स्थान नहीं देता І सुकरात को सत्य बोलने के अपराध की सजा देने वाले न्यायाधीश का नाम कितने लोगों को याद है?

जीसस को चोरों के साथ सूली पर कीलों के साथ ठोक देने वाले जज को आज कौन जानता है? आपके इस अन्याय के बाद सोनी सोरी इतिहास में अमर हो जायेगी और इतिहास आपको अपनी किताब में आपका नाम लिखने के लिए एक छोटा सा कोना भी प्रदान नहीं करेगा І

हाँ अगर आप संविधान की सच्ची भावना के अनुरूप इस कमजोर, अकेली आदिवासी महिला को न्याय देते हैं तो सत्ताधीश भले ही आपको तरक्की न दें लेकिन आप अपनी नजरों में, अपनी परिवार के नजरों में और इस देश के नजरों में बहुत तरक्की पा जायेंगेІ

अगर आप इस पत्र को लिखने के बाद मुझे गिरफ्तार करते हैं तो मुझे गिरफ्तार होने का जरा भी दुःख नहीं होगा क्योंकि उसके बाद मैं कम से कम अपनी दोनों बेटियों से आँख मिलाकर बात तो कर पाउँगा, और कह पाउँगा कि मैं सोनी सोरी दीदी के साथ होनेवाले अत्याचारों के समय डर के कारण चुप नहीं रहा, और मैंने वही किया जो एक पिता को अपनी बेटी के अपमान के बाद करना चाहिए थाІ