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Monday, April 25, 2011

मिलिये मौलाना बिनायक सेन से


मैंने उनसे पूछा कि आप ने ये हुलिया क्यूँ बनाया हुआ है कि लोग आप को मुसलमान समझते हैं तो उनका जवाब था, दरअसल मैं मुसलमान की तरह इसलिए दिखना चाहता हूँ ताकि समझ सकूं कि हमारे अपने देश में अल्पसंख्यक होने का मर्म क्या होता है...


पिछले शुक्रवार को, सर्वोच्य न्यायलय ने देशद्रोह के आरोप में सजा काट रहे मशहूर नागरिक अधिकार कार्यकर्ता एवं चिकित्सक,डॉक्टर बिनायक सेन को ज़मानत पर रिहा करने का आदेश सुनाया है और वो सोमवार को रिहा भी हो गए हैं.उन पर आरोप है कि उन्होंने देश की सत्ता और संप्रभुता के खिलाफ माओवादियों के साथ मिलकर षडयंत्र रचा और राष्ट्र द्रोही गतिविधिओं में शामिल रहें. इन्ही सब आरापो के आधार पर, गत दिसंबर में छत्तीसगढ़ की एक निचली अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

बीते तीन-चार वर्षो में डॉक्टर बिनायक सेन के बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा गया है-- सकारात्मक और नकारात्मक दोनों. 2007 के मई महीने में पहली बार गिरफ़्तारी के बाद मीडिया में, विशेष कर 'मुख्य- धारा' में जो चीज़े आई वो ज़्यादातर नकारात्मक ही थी. लेकिन धीरे- धीरे ये सिलसिला रुका और सकारात्मक रूप लेने लगा.हाँ, ये और बात है कि छत्तीसगढ़ की मीडिया बिनायक को आज भी 'नक्सली डाकिया' ही मानती और लिखती है.

बिनायक के बारे में जो कुछ भी लिखा या कहा गया है उससे ये बात सामने उभर कर आती है कि डॉक्टर बिनायक सेन के काम और उनकी सोच, छत्तीसगढ़ या अभिवाजित मध्य प्रदेश और आदिवासी समुदाय तक सीमित है. जो कि सरासर ग़लत है. ये सही हैं कि बिनायक छत्तीसगढ़ और वहां आदवासी समुदाय से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं लेकिन उन्हें फ़िक्र सारी दुनिया की रहती थी खास तौर पर शोषित और अल्पसंख्यक वर्गों की.

बिनायक सेन पर आई एक नयी किताब," ए डॉक्टर टु डीफेंड: दी स्टोरी आफ बिनायक" में इसका प्रमाण भी मिलता है. इस किताब में ऐसी कई घटनाओं का ज़िक्र मिलता है जिस से न सिर्फ उनके राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय व्यक्तित्व का पता चलता है बल्कि उनके व्यक्तिगत जीवन के कई अनकहे और अनसुने पहलू मालूम पड़ते हैं,जो बुनयादी तौर उनकी छोटी से छोटी चीज़ के लिए संवेदन शीलता एवं प्रतिबद्धता को दिखाते हैं.

ये महज़ इत्तेफाक नहीं था कि बिनायक स्वास्थ्य का काम करते -करते मानवाधिकार का काम करने लगे, बल्कि ये उन्होंने सोच समझ कर किया था. और इस समझ का कारण वो ये बताते हैं कि बहुत कम उम्र में ही उनको पता चल गया था कि स्वास्थ्य की एक पॉलिटिकल इकॉनोमी भी होती है और उसको संबोधित किये बिना स्वास्थ्य के मसलों को हल नहीं किया जा सकता.

यही नहीं,उनके दाढ़ी बढाने और कुरता पजामा पहने का भी खास कारण था.उनके मित्र डॉक्टर योगेश दीवान बताते हैं कि एक बार वे बिनायक के साथ पुरुलिया जा रहे थे, दोनों सेकंड क्लास डब्बे में सफ़र कर रहे थे, तभी एक सज्जन ने आकर बिनायक से पूछा-- "मौलाना साहब, क्या टाइम हुआ है ?" डॉक्टर योगेश आगे कहते हैं, ’बाद में जब मैंने उनसे पूछा कि आप ने ये हुलिया क्यूँ बनाया हुआ है,कि लोग आप को मुसलमान समझते हैं तो उनका जवाब था,’दरअसल मैं मुसलमान की तरह इसलिए दिखना चाहता हूँ ताकि समझ सकूं कि हमारे अपने देश में अल्पसंख्यक होने का मर्म क्या होता है.’

अभी हाल की एक मुलाकात में, उनकी पत्नी प्रोफेसर इलीना सेन मुझे बताया कि,’जब बाबरी मस्जिद- राम जन्मभूमि का मामला जोरो पर था तो हम सपरिवार अयोध्या गए थे. वहां पहुँचने पर जब हमने अन्दर जाना चाह तो सब को जाने दिया गया लेकिन बिनायक को रोक दिया. जब हमने पूछा कि वो ऐसा क्यूँ कर रहे हैं, तो उनका जवाब था हम बेहतर जानते हैं कि किनको अन्दर जाने देना है और किनको नहीं. मतलब ये था कि बिनायक अन्दर इसलिए नहीं जा सकते हैं क्यूँ कि वो 'मुसलमान' हैं!’

किताब में इस बात का भी उल्लेख है कि पिछली बार जब वो जेल में थे और ग़ाज़ा में निहत्थे फिलिस्तीनियों के मारे जाने की खबर रेडियो पर सुनते थे, तो वहां के हालात को छत्तीसगढ़ के हालात से जोड़ कर देखते थे. मुझे ऐसा लगता है, जब वो इस बार जेल में थे और अरब देशो में हो रहे परिवर्तन के बारे में जब उनको खबर मिलती रही होगी तो वे ज़रूर इस पर सोच रहे होंगे कि इसके सकारात्मक असर दक्षिण-एशिया पर क्या और कैसे पड़ेंगे? मुझे याद है कि पिछले वर्ष अगस्त के महीने जब मेरी उनसे राउरकेला में एक कार्यकम में मुलाकात हुयी तो बहुत देर तक झारखण्ड के हालात के बारे में मालूम करते रहे. वो वहां के हालात को लेकर खासे चिंतित थे.

इस सोमवार,जेल से रिहाई के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी बिनायक उन्होंने ’शांति और न्याय’के लिए लोगों को आगे आने का आह्वान किया. जेल से छूटते ही उनका पहला वाक्य था, “खुली हवा में सांस लेना अच्छा लग रहा है.”साथ ही उन्होंने यह भी आगाह किया कि भले ही ’राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय अभियानों और लोगों के सक्रिय समर्थन से वे रिहा हो गए हैं, लेकिन अभी भी छत्तीसगढ़ और देश के अन्य दूसरे हिस्सों में सैकड़ों-हज़ारों लोग उनकी ही तरह के फ़िल्मी और बेबुनियाद आरोपों के आधार पर क़ैद हैं, और हमें उन सभी लोगों की रिहाई के लिए इस अभियान के दायरे को बढ़ाना होगा.’

उपरोक्त तथ्य बिनायक की चिंताओं से रू-ब-रू तो कराते ही हैं, ये छत्तीसगढ़ सरकार के ’देशद्रोह’ के तुच्छ, वैमनस्य भरे, और आपराधिक आरोपों की कलई भी खोलते हैं. जब बिनायक कहते हैं कि ’मैं अपने दिल से जानता हूं कि मैंने इस देश और देश की जनता के साथ कोई गद्दारी नहीं की’ तो उनकी इस बात पर अविश्वास करने के रत्ती भर भी कोई कारण नहीं है. अगर कोई सरकारों की ’आधिकारिक लाइन’ और उसके समर्थन में दी जाने वाली हास्यास्पद दलीलों का अलमबरदार हो तो तब की बात कुछ और है.


(लेखक महताब आलम मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे activist.journalist@gmail.com     पर संपर्क किया जा सकता है.)

Saturday, April 23, 2011

एक डॉक्टर और हजारों डब्बा भूमिया

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने विनायक सेन को जमानत दे दी। डॉक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन को रायपुर की एक अदालत ने राष्ट्रद्रोह के इल्जाम में आजीवन कैद की सजा दी थी। डॉ.सेन पर नक्सलवादियों के हमदर्द होने का आरोप लगाया गया था और यह भी कहा गया था कि वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)के संदेशवाहक की तरह काम कर रहे थे।


निचली अदालत के फैसले की तीखी आलोचना हुई,जहां अदालती कार्यवाही मजाक बन गई थी। छत्तीसगढ़ सरकार ने कोई ठोस सुबूत पेश करने की बजाय आरोपों और अफवाहों से ही काम चलाया। एक बार तो यह तक कहा गया कि डॉ.सेन के घर में कोई स्टैथोस्कोप नहीं पाया गया, इसलिए वह डॉक्टर नहीं, बल्कि माओवादी हैं।

अगर सुबूत मजबूत होता, तो भी सजा अतार्किक थी। चीन एकाधिकारवादी देश है, जहां लेखक लियू जियाबाओ को सरकार के खिलाफ बयान देने के लिए 10 साल की सजा सुनाई है। लोकतांत्रिक भारत में एक अदालत ने इसी अपराध में विनायक सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई!

विनायक सेन : और कितने अभी जेल में

डॉ. सेन को जमानत देते समय सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रक्रिया की भी आलोचना की,जिसके जरिये उन्हें सजा सुनाई गई थी। सुनवाई करने वाले दो जजों न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी और न्यायमूर्ति चंद्रमौली प्रसाद ने कहा कि किसी के पास माओवादी साहित्य मिल जाने से कोई माओवादी नहीं बन जाता, जैसे कि ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ रखने से कोई गांधीवादी नहीं हो जाता। फैसले को पढ़ते समय मुझे कई वर्ष पहले छत्तीसगढ़ की एक जेल का दौरा याद आ गया।

मई 2006 में मैं निष्पक्ष नागरिकों के एक दल के सदस्य की हैसियत से माओवादियों और सलवा जुड़म के बीच चल रहे गृह युद्ध के नतीजों की पड़ताल करने गया था। सलवा जुड़म वह सशस्त्र गैरसरकारी समूह है, जिसे छत्तीसगढ़ सरकार ने बनवाया है। मैंने अपने कागजात निकालकर देखे, 21 मई, 2006 को मैंने जगदलपुर जेल का दौरा किया था। सन 1919 में बनी उस जेल में विशाल, हवादार और रोशनी से भरपूर कमरे हैं। कमरे एक आंगन के चारों ओर बने हुए हैं, हरेक कमरे में लगभग 50 कैदी रखे गए थे।

वैसे तो भारतीय जेलें आमतौर पर संकरी, भीड़ भरी, अंधेरी और गंदी होती हैं। वह जेल एक अपवाद थी। उसी तरह उस जेल के अधीक्षक भी थे। एक लंबे कद के विचारवान और दयालु शख्स अखिलेश तोमर। तोमर साहब हर सप्ताह कैदियों की ओर से एक नृत्य और संगीत का कार्यक्रम करते थे। इसके अलावा भी मनोरंजन के कई साधन थे, जब हम उस जेल का दौरा कर रहे थे, तब हमने लोगों को कैरम खेलते देखा। उस वक्त जगदलपुर जेल में 1,337 कैदी थे।

सुपरीटेंडेंट के दफ्तर में लगे एक बोर्ड पर इनके नाम अलग-अलग शीर्षकों के तहत रखे गए थे। 184 पुरुष और एक महिला को ‘नक्सलवादी बंदी’ की श्रेणी में रखा गया था। तोमर साहब ने बताया कि यह वर्गीकरण बहुत मोटा-मोटा था। जो कैदी दंतेवाड़ा जिले से आए थे,उन्हें आमतौर पर नक्सलवादी कह दिया जाता था। अधीक्षक ने बताया कि इसका अर्थ यह नहीं कि वे सचमुच नक्सली ही थे।

जेल के दौरे के बाद हमारी टीम को कुछ कैदियों से अलग-अलग बात करने का मौका मिला। मैंने डब्बा भूमिया नामक एक कैदी से बात की, वह 20 से कुछ ऊपर का विनम्र आदिवासी नौजवान था। उसके गांव का नाम बामनपुर था,जो कि भोपालपट्टनम के करीब था। उसने बताया कि वह कैसे जगदलपुर जेल पहुंच गया।

दरअसल, वह एक लिफ्ट इरीगेशन परियोजना में मजदूर था। एक दिन जब वह काम पर था, तब उसे एक सड़क बनाने वाली टीम मिली,जिसने उससे भोपालपट्टनम पुलिस स्टेशन का पता पूछा। वह उनके साथ वहां चला गया,तो पुलिस ने उसे रोक लिया। पुलिस ने उससे उसके गांव में नक्सलियों की उपस्थिति के बारे में पूछताछ की। फिर उन्होंने उसे सलवा जुड़म में भर्ती होने के लिए कहा। उसने कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि उस पर पत्नी, दो छोटे बच्चों और एक विधवा मां की जिम्मेदारी है। इसके बाद उन्होंने उसे गिरफ्तार कर लिया।

इस घटना को तीन महीने हो गए थे। गिरफ्तारी के बाद डब्बा भूमिया को दंतेवाड़ा जेल भेजा गया, जहां से फिर उसे जगदलपुर लाया गया। गिरफ्तारी के बाद से उसने अपने परिवार को नहीं देखा था। मैंने उससे पूछा कि उसका अपने परिवार से संपर्क क्यों नहीं है,तो उसने कहा कि उसके परिजनों ने दंतेवाड़ा तक तो देखा नहीं है, ऐसे में वे जगदलपुर कैसे आ सकते हैं। बहरहाल, उसका एक वकील से संपर्क था, जो एक हफ्ते बाद अदालत में उसकी पैरवी करने वाला था। डब्बा भूमिया को उम्मीद थी कि उस पेशी के बाद उसे जमानत मिल जाएगी और वह अपने परिवार से मिल पाएगा।

मैं नहीं जानता कि उसे जमानत मिल पाई या वह अभी तक जेल में है। एक जानकार ने मुझे बताया कि अदालत में पेशियां अक्सर आखिरी मौके पर रद्द हो जाती हैं,क्योंकि जगदलपुर में फौजदारी अदालतों में कर्मचारियों की कमी है। इसके अलावा तथाकथित नक्सलवादियों के मामलों में विशेष सुरक्षा की जरूरत होती है और वह अक्सर नहीं मिल पाती। यह संभव है कि डब्बा भूमिया बहुत ही शानदार अभिनेता रहा हो,लेकिन मुझे तो वह दंतेवाड़ा के गृह युद्ध का एक शिकार ही लगा।

रायपुर की अदालत की नजरों में डॉक्टर सेन का अपराध यह था कि वह माओवादी कैदियों से बात करते थे और अपने घर पर माओवादी साहित्य रखते थे। इस तरह उनका अपराध दूर की कौड़ी के जरिये मान लिया गया था। इसी दूर की कौड़ी ने डब्बा भूमिया को भी जेल पहुंचा दिया। यह सुना जाता है कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ की जेलों में हजारों डब्बा भूमिया सिर्फ इसलिए जेलों में हैं, क्योंकि वे उन जिलों में रहते हैं, जहां नक्सलवादी और पुलिस एक-दूसरे के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर कहा जाए,तो इन आदिवासियों ने माओ का पढ़ना तो दूर, उसका नाम तक नहीं सुना होगा। जब रायपुर के जज ने विनायक सेन को सजा सुनाई, तो गृह मंत्री ने कहा कि वह ऊंची अदालत में अपील कर सकते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के गृह युद्ध के शिकार आम आदिवासी यह नहीं कर सकते। वे एक क्रूर और मनमानी करने वाली पुलिस के रहमोकरम पर हैं और अदालतें भ्रष्टाचार और दबावों के नीचे झुकी पड़ी हैं।

डब्बा भूमिया जैसे लोगों के लिए नई दिल्ली तो जगदलपुर से भी बहुत दूर है। डॉ. विनायक सेन को जमानत देने के लिए निस्संदेह सुप्रीम कोर्ट की सराहना की जानी चाहिए,लेकिन नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में रहने वाले आम आदिवासियों की बदतर हालत के लिए भारतीय लोकतंत्र बधाई का हकदार नहीं हो सकता।

रामचन्द्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार
(हिन्दुस्तान  से  साभार)

सीमा आजाद का सवाल उठाएंगे विनायक सेन !


मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल अब विनायक सेन की तरह ही माओवादी साहित्य रखने के साथ राजद्रोह के आरोप में इलाहाबाद जेल में बंद पत्रकार सीमा आजाद का सवाल उठाने जा रहा है। पीयूसीएल इस मामले में उत्तर प्रदेश में जन दबाव बनाने के लिए विनायक सेन को आमंत्रित करने जा रहा है ।
पत्रकार सीमा आजाद 
विनायक सेन इस अभियान में शामिल भी होंगे । विनायक सेन ने फोन पर कहा -सीमा आजाद पीयूसीएल में हमारी सहयोगी रही है और मै इस सवाल पर लखनऊ की संगोष्ठी में जरुर आउंगा । सीमा आजाद के मामले की कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी है जिसमे पीयूसीएल की तरफ से रिटायर जस्टिस राजेंद्र सच्चर और संजय पारीख सीमा आजाद की पैरवी करेंगे । पीयूसीएल ने सीमा आजाद की गिरफ्तारी के साथ राजद्रोह की धारा 124 ए को भी चुनौती दी है।

पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह ने जनसत्ता को आज यह जानकारी दी। पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्त्ता सीमा आजाद को करीब साल भर पहले माओवादी साहित्य रखने के साथ माओवादियों से संबंध और राजद्रोह जैसी धाराओं में गिरफ्तार किया गया था। सीमा आजाद की गिरफ्तारी उस समय हुई जब वे दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला देखने के बाद कुछ पुस्तके लकर लौट रही थी । इलाहाबाद की पुलिस को इन पुस्तकों में माओवाद भी नजर आया जिसके बाद कई माओवादी कमांडरों से संपर्क आदि तलाश कर पुलिस ने वे सभी धाराएं लगा दी जिससे जमानत न मिलने पाए।

पुलिस अपनी इस प्रतिभा का इस्तेमाल आमतौर पर राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर पहले से करती रही है। जिसके चलते सीमा आजाद अभी भी जेल में है । पीयूसीएल ने दो महीने पहले सीमा आजाद की गिरफ्तारी और राजद्रोह की धारा 124 ए को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जिसकी कल सुनवाई है । इसके अलावा पीयूसीएल इस मामले में जन दबाव भी तैयार करने जा रहा है ।

चितरंजन सिंह ने कहा - पीयूसीएल मई के अंतिम सप्ताह में लखनऊ में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी करने जा रहा है जिसमे राजद्रोह की धारा 124 ए पर चर्चा होगी । विनायक सेन से लेकर सीमा आजाद तक इसी धारा के तहत देशद्रोही बताए गए । इस संगोष्ठी में विनायक सेन को भी आमंत्रित किया जा रहा है । इससे पहले दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान म सात और आठ मई को राजद्रोह की इस धारा पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई है जिसमे जस्टिस जेएस वर्मा समेत कई मानवाधिकार कार्यकर्त्ता देश भर से आएंगे।

इसका मकसद राजद्रोह की इस धारा के खिलाफ माहौल बनाना है जिसका इस्तेमाल पुलिस अकसर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को फंसाने के लिए करती है । इस बीच विनायक सेन ने राजद्रोह की इस धारा पर सवाल खड़ा करते हुए कहा -यह मुद्दा अब हमारे एजंडा में है और संभवतः केंद्र सरकार भी कुछ पहल करे । सेन ने फोन पर बात करते हुए आगे कहा - सीमा के सवाल और राजद्रोह की इस धारा पर लखनऊ के कार्यक्रम मै जरुर शामिल होऊंगा ।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों जिसमे छत्तीसगढ़ भी शामिल है ,इन राज्यों में पुलिस आमतौर पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवादियों का मुखौटा मानती है जो उनके उत्पीडन का सवाल उठाते है। छत्तीसगढ़ में पुलिस ने करीब आधा दर्जन पत्रकारों को भी माओवादियों का समर्थक मान उनकी सूची बना रखी है । इसी तरह दिल्ली और उत्तर प्रदेश में भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ चुनिंदा पत्रकारों पर पुलिस की नजर है और उनके फोन सर्विलांस पर रखे गए है।

विनायक सेन की रिहाई के बाद सीमा आजाद का मुद्दा उठाकर मानवाधिकार संगठन राजद्रोह की धारा पर राष्ट्रीय बहस भी लगे हाथों शुरू करना चाहते है। मानवाधिकार संगठन इस मुद्दे पर कई कार्यक्रम की योजना बना रहे है । विनायक सेन की रिहाई को लेकर उत्तर प्रदेश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुआ था जिससे मंवाधीकारों का सवाल उठाने वालों के हौंसले बुलंद है ।

(जनसत्ता  से  साभार) 

Sunday, April 17, 2011

बिनायक सेन की रिहाई का मतलब


सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिपणी से न केवल छत्तीसगढ़ सरकार की लचर दलील की बधिया उखेड दी है बल्कि रमन सिंह सरीखी सरकारों की असली नीयत से पर्दा भी उठा दिया है.
-पीयूष पंत 

डॉक्टर सेन की रिहाई के लिए देश-विदेश
में लोग सड़कों पर उतर आए थे.
मानवाधिकार कार्यकर्ता और जन चिकित्सक डाक्टर बिनायक सेन को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत बिनायक सेन, इलिना सेन और उनके परिवार की निजी जीत के साथ- साथ भारतीय लोकतंत्र, जन सरोकार पर गहरी आस्था और नागरिक समाज की अदम्य ऊर्जा की भी जीत है. यह जीत हमारे उस लोकतांत्रिक अधिकार की भी है जिसके तहत हम विचारधारा विशेष का साहित्य पढ़ने या किसी भी तरह की जानकारी हासिल करने के लिए पूरी तरह आज़ाद हैं, यानी कि ज्ञान प्राप्त करने की हमारी जिज्ञासा न केवल हमारा नैसर्गिक बल्कि संवैधानिक अधिकार भी है. 

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी से यह साफ कर दिया है कि विचारधारा विशेष का साहित्य रखने या पढ़ने से ही यह साबित नहीं हो जाता है कि आप उस विचारधारा के अनुयायी भी हैं. वैसे भी ज्ञान कि धारा और सूचना की बयार अविरल बहनी ही चाहिए. किसी भी समाज के सभ्य, प्रगतिशील और विकसित होने की यह पहली शर्त है. इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार का यह बचकाना तर्क कि डाक्टर बिनायक सेन के पास माओवादी साहित्य पाया गया इसलिए वे राज्य के खिलाफ साज़िश में शामिल थे. इसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. उसने इस ओर भी इशारा किया कि माओवादी विचारधारा का अध्ययन करना राज्यविरोधी गतिविधि नहीं है. न ही यह हिंसक विचारधारा है, यह उतनी ही हिंसक हो सकती है जितनी महत्मा गाँधी कि आत्मकथा. 

छत्तीसगढ़ की रमन सिंह की भाजपा सरकार ने केवल माओवादी साहित्य रखने और पढने को संगीन अपराध मानते हुए डाक्टर बिनायक सेन को नक्सली करार दे दिया था. वहां की एक निचली अदालत ने उन्हें देशद्रोही बताते हुए आजीवन कारावास की सजा भी सुना दी थी.

सालों से मानवाधिकारों की रक्षा के लिए मुस्तैद और घने जंगलों में बसे उपेक्षित आदिवासियों को ज़रूरी चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाने में निस्वार्थ भाव से लगे डाक्टर बिनायक सेन के लिए इससे ज्यादा क्रूर मज़ाक और क्या हो सकता था? 

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिपणी से न केवल छत्तीसगढ़ सरकार की लचर दलील की बधिया उखेड दी है बल्कि रमन सिंह सरीखी सरकारों की असली नीयत से पर्दा भी उठा दिया है. 

 
अब एक बार फिर हमारे बीच होंगे डॉक्टर बिनायक सेन
  आम जानकारी यह है कि डाक्टर बिनायक सेन द्वारा राज्य की ओर से प्रायोजित कार्यक्रम सलवा जुडूम की लगातार आलोचना रमन सिंह सरकार को नहीं सुहा रही थी, इसलिए उनकी आवाज को बंद करने के लिए उसे एक हथियार चाहिए था. उसे लगा कि बिनायक सेन को माओवादी घोषित कर आसानी से उन्हें काल कोठरी में डाला जा सकता है. इस तरह सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की आलोचना करने वाले लोकतंत्र के हिमायती लोगों को संदेश भी दिया जा सकता है. वैसे भी मेरे महान देश क़ी सरकारों के लिए जनता के नैसर्गिक और संवैधानिक अधिकारों को कुचलने और उसकी आवाज को दबाने के लिए माओवाद और आतंकवाद रेडिमेड हथियार बन गए हैं. 

भूमंडलीकरण को कॉरपोरेटी लूट का चारागाह बनाने वाली विकसित देशों और कुछ विकासशील देशों की सरकारों के लिए आतंकवाद और माओवाद उम्दा हथियार साबित हुए हैं, न केवल कॉरपोरेटी लूट और सरकारी दलाली के खिलाफ उठती जागरूक जनता की आवाज को कुचलने में बल्कि इन दोनों "वाद" के नाम पर आने वाली राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सहायता से नेता-अधिकारियों की जेबें भरने में भी. 

माओवाद को राज्य के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले दर्शन और माओवादियों को आतंकवादी के रूप में प्रचारित करने वाली सरकारें क्या बताएंगी की सलवा जुडूम जैसे कार्यक्रम चला कर जनता के एक वर्ग को दूसरे के खिलाफ हिंसक व्यवहार अपनाने के लिए प्रेरित कर या फिर कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में सेना द्वारा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ रही जनता पर गोली चलवा कर कौन सी रामधुन सुनवाई जा रही है. शायद ‘वैदिक हिंसा हिंसा न भवती’ की तर्ज़ पर हमारे देश की विभिन्न सरकारें मानने लगी हैं कि सरकारी हिंसा को हिंसा नहीं कहा जा सकता है. 

हमें तो इंतज़ार है उस दिन का जब एक और बिनायक सेन लंबी यंत्रणा झेलते हुए सुप्रीम कोर्ट को यह टिप्पणी करने के लिए मजबूर कर देगा कि लोकतंत्र में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही जनता पर सरकारों द्वारा किया गया किसी भी प्रकार का हमला 'हिंसक' ही माना जाएगा. उस कुकृत्य के लिए जिम्मेदार अधिकारी, मंत्री या फिर मुख्यमंत्री आजीवन कारावास की सजा भुगतेगा. 

फिलहाल तो सुप्रीम कोर्ट न्याय का मान रखने और उन तमाम प्रबुद्ध नागरिकों की संभावित रिहाई का मार्ग प्रशस्त करने के लिए बधाई का पात्र है, जिन्होंने पूंजीवादी विकास की कलई उजागर करने का खामियाजा सीखचों के पीछे जीवन बिता कर भरना पड़ रहा है. 


लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पत्रिका 'लोक संवाद' के संपादक हैं. उनसे panditpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Saturday, April 16, 2011

नारों, गीतों और पोस्टरों के बिनायक सेन


डॉ. बिनायक सेन को रिहा करने की मांग को लेकर निकले जुलुस से लौटे चार महीने से ज़्यादा हो गए हैं। बिनायक सेन को पहली बार 19 या 20 फ़रवरी को त्रिचुरकेरल में देखा था यानि अब से लगभग 15 महीने पहले। फिर आज से साल भर पहले बिनायक सेन को विश्वविद्यालय में गाते हुए सुना था "आसमा पर है खुदा और ज़मी पर हम आज कल वो इस तरफ देखता है कम। "चार महीने पहले चार जनवरी को जो बिनायक सेन का जन्म दिन भी था, इलिना सेन बोलते हुए रुक जाती थीं, तो अचानक बिनायक बोलने लगते थे... पोस्टरों मेंनारों मेंगीतों मेंबरगद के नीचे पसरी चुप्पी में, वक्ताओं के वक्तव्यों मेंअपनी सधी हुई आवाज़ में वो मेरी स्मृतियों में थे और इलिना सेन कि लरजती आवाज़ में मेरे सम्मुख। पता नहीं क्यूँ स्मृतियाँ इतनी गड्डमड्ड हो गई थी। केरल में डॉ. बिनायक को बोलते हुए सुना था और मेरे साथ उस हॉल में बैठे पाँच सौ से ज्यादा लोग और उनके सांसों में गई हवा,उनके आँखों के सामने की रौशनीऔर ३ घंटे का वो पूरा समय इस बात का गवाह है कि डॉ. सेन ने हिंसा का समर्थन कभी नहीं किया। उन्होंने खुले स्वर में कहा था कि वो डॉ. हैं और उनका काम है इलाज करना, 24 दिसंबर को फैसले के बाद भी अपने बयान में बिनायक सेन ने यही कहा। चार जनवरी को भी हम यही दुहरा रहे थे। हम कोई ऐतिहासिक नहीं बल्कि 'इतिहासिककाम कर रहे थे। हम वही कर रहे थे जिसके लिए इतिहास ने हमें तैयार किया था। विश्विद्यालय से जुलुस निकल रहा था और मन हुलस रहा था कि हमारे इतिहास ने जो हमारे मेरे लिए तय कर रखा है हम वह कर रहे हैं। पर सवाल यह था कि एक आदमी जो एक स्वस्थ छतीसगढ़ के सपने देखता है जो मानवाधिकारों की सुरक्षा की लडाइयों में शामिल रहा हैत्रिचुर में जिसका इंतजार वहाँ की सम्पन्न प्रेस आँखें बिछाये कर रही थी। आखिर किन साजिशों के कारण उसे गिरफ्तार किया गया। कहीं यह गिरफ्तारी साजिशन तो नहीं हुई हैअगर यह साजिशन हुई है तो क्या यह संविधान के साथ सरकारों की चार सौ बिसी नहीं हैअगर है तो फिर तो क्या इसका जबाब सिर्फ बिनायक सेन जिंदाबाद का नारा हैमहात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक जनवरी की गुनगुनी धुप में नारों-गानों के साथ वर्धा की सड़कों पर निकलेंगे यह भी शायद इतिहास ने तय कर रखा होगापर मन अगर इतिहास से मुठभेड़ कर रहा था तो इस बात पर की तुमने ने यह सबबकौल ओबामादुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए ही क्यों तय रखा है और अगर इतिहास इतना शक्तिशाली है तो फिर हम कौन हैं जो वर्तमान में जीने का दंभ भरते हैंक्या हम उसी भारत के नागरिक हैं जिसने दुनिया की सबसे हसीन किताब में खुद को लोकतान्त्रिक और समाजवादी राज्य घोषित किया है। जो यह सुनिश्चित करने का दावा करती है कि सौ गुनहगार छुट जाएँ पर एक बेगुनाह को सज़ा न मिले। सवाल सिर्फ बिनायक सेन का होता तो बात उतनी नहीं थी यह सवाल उन सभी लोगों का है जिनके लिए बिनायक काम करते हैं, जिनके बारे में बिनायक सोचते हैं। शुक्रवार को आयी खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार कार्यकर्ता और चिकित्सक बिनायक सेन की जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है। कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा है, "बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता। हम एक लोकतांत्रिक देश हैंबिनायक नकस्लियों से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस बिनाह पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता।" यह देश की सर्वोच्य न्यालय का फैसला है क्या इस फैसले के आलोक में निचली अदालत और उसकी निष्पक्षता पर शक नहीं किया जा सकता है? क्या यह फैसला कहीं- न कहीं यह साबित नहीं करता है कि दोनों अदालतों के पास एक ही मामले को देखने के दो पैमाने थेआज जब देश कि ज़्यादातर मीडिया इस फैसले को लोकतन्त्र की जीत और न जाने क्या क्या घोषित करेगी तब कहीं न कहीं ठहर कर हमें यह भी सोचना होगा की 25 दिसंबर से 15 अप्रैल तक बिनायक को सलाखों के पीछे रखने का जिम्मेदार कौन होगा?
हमें यह भी सोचना होगा की हमारी न्याय प्रणाली में अगर बिनायक सेन जिनके साथ विश्व भर के बुद्धिजीवी लगे थे ऐसा व्यवहार हो सकता है तो फिर उन हजारों लाखों लोगों के साथ क्या होता होगा जो कई सालों में अपने ऊपर लगे आरोपों पर कोई फैसला पाते होंगे और फिर उसी फैसले को ब्रह्म वाक्य की तरह स्वीकार कर लेते होंगे। क्या यह सही समय नहीं है जब देश भर की मीडिया को बिनायक के साथ हुई इस पूरी कानूनी प्रक्रिया का सार्थक विश्लेषण कर देश के सामने रखना चाहिए। फैसले को किसी उत्सव की तरह न लेकर उसे एक मौके की तरह लेना चाहिए। एक ऐसा मौका जब देश की तमाम लोकतान्त्रिक संस्थाओं को अपने गिरेबान में झाँके से नहीं शर्माना चाहिए। क्या यह सही समय नहीं है जब सही अर्थों में लोकतन्त्र और न्याय व्यवस्था को पुनः परिभाषित किया जाना चाहिए?

यह आलेख गुंजेश द्वारा लिखा गया है. जो हिन्दी के युवा कथाकार हैं और अखबारों में राजनैतिक मसलों के स्वतंत्र टिप्पणीकार भी.
सम्पर्क- gunjeshkcc@gmail.com

Friday, April 15, 2011

बिनायक सेन को मिली ज़मानत


सुप्रीम कोर्ट ने मानवधिकार कार्यकर्ता और चिकित्सक बिनायक सेन की ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी है. काग़ज़ी कार्रवाई पूरी होने के बाद उन्हें आज  शाम तक या शनिवार को रिहा होने की उम्मीद जताई जा रही है.

कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा है,"बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता.हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, बिनायक नक्सलियों  से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस बिनाह पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता."

बिनायक सेन के ख़िलाफ़ राजद्रोह का आरोप नहीं बनता. हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, बिनायक नकस्लियों से सहानुभूति रखने वालों में से हो सकते हैं लेकिन इस बिनाह पर उनके ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला नहीं लगाया जा सकता.

कोर्ट का निर्देश

इससे पहले सरकारी वकील ने तर्क देते हुए कहा था कि बिनायक सेन को ज़मानत न दी जाए. वकील के मुताबिक अगर बिनायक सेन को ज़मानत मिली तो वे छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्षदर्शियों को प्रभावित कर सकते हैं जैसा कि अमित शाह ने गुजरात में किया था. इस पर जज ने कहा कि दोनों व्यक्तियों की तुलना नहीं हो सकती और फिर ज़मानत याचिका को मंज़ूरी दे दी.

मामला

बिनायक सेन को पिछले साल रायपुर की एक अदालत ने माओवादियों से सांठ गांठ रखने, उन्हें सर्मथन देने और राजद्रोह के लिए उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.

इस आदेश के ख़िलाफ़ उन्होंने बिलासपुर उच्च न्यायालय का दरवाज़ा भी खटखटाया था लेकिन वहाँ उनकी अर्ज़ी ख़ारिज हो गई थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी. हाई कोर्ट में दाखिल की गई अपील में बिनायक सेन ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाने के बावजूद निचली अदालत ने उन्हें दोषी क़रार देकर सज़ा सुनाई है.

बिलासपुर उच्च न्यायलय में उनके मामले की पैरवी मशहूर वकील राम जेठमलानी ने की थी.जेठमलानी भारतीय जनता पार्टी के सांसद भी हैं और छत्तीसगढ़ में उन्हीं की पार्टी की सरकार है.अदालत मे दाख़िल किए गए अपने हलफ़नामे में छत्तीसगढ़ सरकार ने दावा किया था कि बिनायक सेन ने देश में नक्सलवाद के विस्तार में समर्थन दिया है और इस काम में हर तरह की मदद मुहैया करवाई है.

बिनायक सेन की गिरफ़्तारी और सज़ा का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ा विरोध हुआ है और विश्व की जानी मानी हस्तियों ने भारतीय प्रधानमंत्री से उनकी रिहाई की अपील की थी.
बीबीसी से साभार

Friday, February 25, 2011

फासीवाद के बढ़ते कदम और न्याय की अवधारणा


राष्ट्रीय मानवाधिकार जनसम्मेलन
स्थान- संजरपुर, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

तिथि- 27 फरवरी 2010, रविवार

समय- सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक

साथियों,
पिछले दिनों एक के बाद एक आए न्यायालयों के फैसलों ने मानवाधिकार आंदोलन के सामने चुनौती खडी कर दी है कि जब लोकतंत्र में न्याय पाने के एक मात्र संस्थान न्यायालय भी सत्ता के दबाव में निर्णय दे रहों तो, नागरिकों के मानवाधिकार को कैसे सुरक्षित रखा जाए। वरिष्ठ मानवाधिकार नेता और पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनायक सेन को जिस तरह बिना ठोस सुबूत के रायपुर की एक अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई या फिर पिछले साल पांच फरवरी 2010 को उत्तर प्रदेश की पीयूसीएल की संगठन मंत्री सीमा आजाद को माओवाद के नाम पर गिरफ्तार किया गया, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम लोगों को आतंकवादी या नक्सलवादी बताकर जेलों में सड़ा देना हमारे तंत्र के लिए किताना आसान हो गया है। हकीम तारिक और खालिद की फर्जी गिरफ्तारी पर सवाल उठने के बाद यूपी सरकार ने आरडी निमेश जांच आयोग बैठाया था और जिसे 6 महीने में रिपोर्ट देनी थी। आज दो साल से ज्यादा वक्त गुजर जाने के बाद भी उसने रिपोर्ट नहीं दी।
हम आजमगढ़ के लोग जिन्होंने अपने कई निर्दोष बच्चों को बाटला हाउस से लेकर विभिन्न फर्जी एनकाउंटरों में कत्ल किए जाते, जेलों में सड़ाए जाते और न्याय मिलने की आस में न्यायलय पहुंचे अपने वकीलों को पीटे जाते देखा है, खुद इसके कहीं न सुने जाने वाले गवाह हैं। देश में मानवाधिकार रक्षा के लिए बने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका को भी हमने देखा है कि किस तरह उसने हमारे मासूमों जो बाटला हाउस में मारे गए पर फर्जी जांच रिपोर्ट पेश कर एनकाउंटर के नाम पर सत्ता द्वारा ठंडे दिमाग से की गई हत्या को जायज ठहराया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक को झूठे तर्को के आधार पर लंबे समय तक छुपाया गया।
इस सबके बीच इन्साफ का तराजू साम्प्रदायिक शक्तियों के पक्ष में किस हद तक झुकता चला गया है, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर शरीफ और समझौता एक्सप्रेस जैसे आतंकवादी वारदातों को अंजाम देने वाले संघियांे की आत्मस्वीकृतियों के बावजूद इन्हीं घटनाओं में पुलिस और न्यायलयों ने र्निदोष मुस्लिम नौजवानों को जेलों में कैद कर रखा है। इस दहशत और आतंक के माहौल में पिछले दो सालों से हमारे दर्जनों लड़के लापता हैं और एक आशंका लगातार बनी रहती है कि अगला नंबर किसका है?

इन साझा अनुभवों ने हमारे सामने स्पष्ट कर दिया है कि अब इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त की जा चुकी है। जिसके सबसे ज्यादा शिकार समाज के सबसे दबे-कुचले समूह और उनके सवाल उठाने वाले लोग हो रहे हैं। इस सिलसिले में सबसे अधिक दुखद न्यायालय का राजनीतिक दुरुपयोग है। जिसने देश के अंदर राज्य प्रायोजित आतंकवाद को वैधता देने के लिए यहां तक तर्क दिए हैं कि अगर फर्जी एनकाउंटरों पर न्यायिक जांच होगी तो पुलिस का मनोबल टूटेगा। यानी न्यायपालिका अब खुद ही भारत को एक लोकतांत्रिक देश से सैन्य राष्ट्र में तब्दील करने की फासिस्ट मुहीम की अगुवाई करने लगी है। अयोध्या मुद्दे पर तथ्यों के बजाय धर्मोन्मादी आस्था के आधार पर फैसला हो या बाटला हाउस एनकाउंटर पर जांच की मांग से इसकी पुष्टि होती है कि यह फासीवाद सिर्फ चुनावी रास्ते से नहीं बल्कि कानूनी रास्ते से स्थापित किया जा रहा है।
ऐसे में हम आजमगढ़ के लोग जिन्होंने बाटला हाउस और उसके बाद हुए विभिन्न कथित आंतकवादी वारदातों में अपने लोगों और अपने शहर के प्रति सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका के फासीवादी व्यवहार को देखा है, आज इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि लोकतंत्र में न्याय की पूरी अवधारणा पर ही नए सिरे से बहस जरुरी हो जाती है। इसलिए लंबे समय से राज्य प्रायोजित मानवाधिकार हनन का केंद्र बन चुके आजमगढ़ में हम पूरे देश में चल रहे मानवाधिकार हनन और न्यायपालिका के राजनीतिक इस्तेमाल पर एक राष्ट्रीय जनसम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। इस महत्वपूर्ण आयोजन में हम आपसे शामिल हाने का आग्रह करते हैं।

वक्ता-
हिमांशु कुमार, प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता
शबनम हाशमी, सामाजिक कार्यकर्ता
प्रो. एस. ए. आर. गिलानी, प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय
अनिल चमड़िया, वरिष्ठ पत्रकार
संदीप पाण्डे, मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
एस. आर. दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश
मो. शोएब, अधिवक्ता, लखनऊ
चितरंजन सिंह, राष्ट्रीय सचिव, पीयूसीएल
जमाल अहमद, अधिवक्ता, फैजाबाद
के के राय, अधिवक्ता, इलाहाबाद
डॉ. जावेद अख्तर,
एच ए आजमी, पूर्व विभागाध्यक्ष पत्रकारिता विभाग, बीएचयू
महंत युगलकिशोर शरण शास्त्री, सरयूकुंज अयोध्या, फैजाबाद
जमील आजमी, अधिवक्ता, इलाहाबाद
खालीद शेख, अधिवक्ता, अहमदाबाद, गुजरात
तुलिका श्रीवास्तव, आली
फिरोज मिठीबोलबाला, सामाजिक कार्यकर्ता, महाराष्ट्र
तेजबहादुर यादव, समाजसेवी, आजमगढ़
जावेद मोहम्मद, सामाजिक कार्यकर्ता, इलाहाबाद
अफरोज आलम, सूचना अधिकार कार्यकर्ता, दिल्ली
महताब आलम, मानवाधिकार कार्यकर्ता, रांची

निवेदक- मसीहुद्दीन संजरी (09455571488), शाहनवाज आलम (09415254919), राजीव यादव (09452800752), तारिक शफीक (09454291958), विनोद यादव (09450476417), जितेन्द्र हरि पाण्डेय, सालीम दाउदी, शफीक एडवोकेट, रवि शेखर, विजय प्रताप, सुनील, अंशुमाला सिंह, गंुजन सिंह, फहीम अहमद (प्रधान संजरपुर), मोअज्म शाहबाज, अबु बकर, मो. अकरम, आफताब, अब्दुल्ला, तबरेज, सरफराज कमर, गुलाम अम्बीया, निलेश यादव, राजेन्द्र यादव, कलीम अहमद, आबीद हसन, ग्यासुद्दीन, मुज्जीबुल रहमान, विनय श्रीवास्तव, मो. शाकिर, मो. शाहिद, मो. आसिफ, शमीम अहमद, सरफुद्दीन। 

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (PUCL), शहीद शेख रजब अली सोशल एंड वेलफयर सोसाइटी, डिबेट सोसायटी, कारवां, जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसायटी (JUCS)।

Monday, February 21, 2011

The danger of Being good


he miracle of individual choice may be what is keeping us safe as a society. Some people just choose to be good, no matter what. This is the story of what happens to them
SHOMA CHAUDHURYMANAGING EDITOR
ILLUSTRATION: ANAND NAOREM
THERE IS a dark truth about Indian democracy that very few middle-class Indians understand. There are no certitudes about liberty and opportunity here; no real comforts about the rule of law. In fact, the nature of life in India, literally, is a function of choice.
Nothing demonstrates that more than the story of Dr Binayak Sen. Four years ago, on a cold February morning outside a court in Raipur, a man with gentle eyes and a long grey beard had pressed his face through the iron grill of a jail van and spoken urgently as I stood outside on my toes, straining to hear him. Gun-toting commandos surrounded the van. It had not been easy to push past them to get face time. No one had really heard of Binayak Sen then. It was the first time someone from the national media had come listening. There were many things Sen could have pleaded through that window. He had already been in jail for nine months. He could have urged one to talk up his story in Delhi’s power circles, urged one to start a campaign for him. But, astonishingly, Sen’s urgencies had lain elsewhere.
“You have to go back and write about how we are creating two categories of human beings in this country,” he had said, as the commandos tried to nudge us out of range. “You have to write about the famine and malnutrition rampant everywhere. We are living out the Malthusian theory...”
This did not sound like a man who was a dire national security threat. But Sen had been put in jail for “waging war against the nation” and it took another year and more for him to get bail from the Supreme Court. The freedom was shortlived. On 25 December 2010, a trial court convicted him and sentenced him to life imprisonment. Sen was re-arrested. Last week, the Chhattisgarh High Court refused to suspend the sentence and denied him bail again. He may not have waged war against the nation, it said, but he stood guilty of sedition: Why had he raised his voice against the State?
Binayak Sen could have chosen not to be in jail. Jethwa could have chosen not to be dead



Sen is not an isolated symptom. Two years ago, in May 2009, another man in Chhattisgarh had fallen foul of the State. Himanshu Kumar, a Gandhian from Meerut had spent 17 years working in Dantewada. He had an ashram on the outskirts of the forest where tribals from the deep interiors could come for refuge. Here they learnt how to file FIRs, petition the district collector, interact with forest officials, seek redress. But on 16 May 2009, as Indians elsewhere were celebrating a peaceful General Election — proud symbol of India’s vibrant democracy — a posse of policemen and several bulldozers rolled into Himanshu’s ashram and razed it to the ground. He sat with his wife and daughters under a tree and watched. His elder daughter cried as it rained. When the police were done, not a trace of the 17 years remained. Just a drooping crocus and, ironically, pamphlets in Gondi urging tribals to vote.
For several months more, Himanshu tried to continue his work from a makeshift ashram nearby. Then, as the intimidations piled up, one evening he shed his trademark white kurta, shaved his moustache, disguised himself in red shirt and jeans, scaled the wall of his house and came away to Delhi. He has never gone back.
Just a few months later, in July 2010, environment activist Amit Jethwa had just stepped out of the Gujarat High Court when two men on a motorbike shot him point blank and sped off. Jethwa had been fighting for two years against illegal mines in the Gir Lion Sanctuary, owned by a politician, Dinu Solanki. Solanki’s nephew was later arrested as the prime accused in the murder.
A few months earlier, in February 2010, a young lawyer called Shahid Azmi was shot dead by gunmen in his chamber in Mumbai. Azmi had been fighting unpopular cases, mostly defending poor Muslim boys accused of terrorism. The Crime Branch suspects he was killed on a supari issued by underworld gangster Bharat Nepali, who deems himself a “nationalist” and is allegedly close to some sections of the Indian intelligence establishment.
Shahid was 32 when he was killed; Jethwa was 35. Himanshu is 52. Binayak is 61. But their stories are linked by a profound thr - ead: Binayak Sen could have chosen not to be in jail. Kumar could have chosen not to be in exile. Jethwa could have chosen not to be dead. Azmi could have chosen to be alive
Secure in the cocoon of our privilege, we imagine we have nothing in common with the evil repressions of the Middle East regimes and elsewhere. But the truth is, only a thin membrane separates us from it: individual choice. If you are among those who chase the rewards of the market-place and keep your head down, India is a wondrous, silken place. If you are among those who ask questions, you fall through a chute.

EARLY THIS year, in a gruesome incident, Yashwant Sonawane, additional district collector of Malegaon was burnt to death in broad daylight by local mafia for resisting the pilferage of kerosene. There was Satyendra Dubey earlier, IIT alumni, killed for protecting India’s prestigious highway project, the Golden Quadrilateral. There was S Manjunath, IIM alumnus, killed for sealing pumps adulterating petrol. And just last year, nine RTI activists were murdered for demanding little answers.
Cast an eye over other news items strewn across the years and a landscape of horror opens up. This is the country at the other end of the chute. Government officials humiliated for doing their duty. Police officers cut to size for not toeing the line. Activists maligned and blacklisted. Upright citizens harassed. Over just the last year, TEHELKA has done several stories detailing such cases. Whistle and Be Damned, the story of whistleblowers in India. Dead Right, the story of RTI activists in India. Sanjiv Chaturvedi, forest official in Haryana, hounded like an animal for doing his job. Kuldeep Sharma, police officer in Gujarat, hounded for speaking the truth.
All these stories point to a black fact we must confront: there are no dividends for doing the right thing in India. There is only danger. India’s public culture, in fact, has designed itself into an ugly gene: fear, docility, compliance. And a kind of automated blindness. There is absolutely nothing to pierce this dehumanising membrane except the random and inexplicable ideas of self that pin some individuals to a higher ideal.
Binayak Sen did not need to speak up when the atrocities of the Salwa Judum began in 2005. He had spent 30 years serving the poor in Chhattisgarh, the State had never been angry with him. He could have let 600 villages be evacuated. He could have let three lakh tribals be dispossessed. He could have let corporates swallow the forest whole. If he had stayed silent, he would not have been accused of sedition. He had a choice. He chose.
Himanshu Kumar too could have closed his eyes the day the first raped and maimed tribal girl limped into his ashram. He knew filing hundreds of cases against the police would rouse the beast. He knew he was putting his family in jeopardy. But he chose.
What prevented Amit Jethwa from retreating into a comfortable life like the rest of us and leaving the fate of Gir Sanctuary to the avarice of politicians and the corruption of forest officials? Shahid Azmi was 12 when a Hindu mob accosted him; 16, when he crossed over to Pakistan to train for revenge. Later, disillusioned with militancy, he spent eight years in rigorous imprisonment in Mumbai, and studied for his law exam. When he walked free, he could have slipped through the line into a life of ease. What impelled him to return to the sewer, fighting for people the system had abandoned, trying to staunch the hatred and fear around him?
TEHELKA’s cover story this week, The Danger of Being Good, is a tribute to the precious, quixotic and inspirational idea of the world and self that drives some Indian citizens to still stand up for a moral vision. Duty. Justice. Accountability. Honesty. Democracy. Fairness. Dignity. Empathy. There is nothing in the world around us that suggests these human values are worth defending. There is nothing to pin one to their pursuit except the face in the mirror and the interior dialogue: what sort of human being do I want to be?
If you keep your head down, India is a shining place. Ask questions, and you fall through a chute
The battles in this cover package range from the quotidian to the gigantic. There are dozens we have had to leave out. But meditate on them for a moment, and just this small handful of stories will make you balk at the depraved society they reveal. Corruption in every pore: in excise, in income tax, in ports, in highways, in check dams, in the PDS, in ration cards, in land encroachments, in pollutions of earth and water and sky. Nothing is safe. Greed is the only propeller. We are not a society really: we are a termite nest, eating at ourselves.
As a people then, out of self-preservation if not high ethic, we should be gearing ourselves to protect those who fight this. But both as a people and a State, India has set itself on a contrary path. Every righteous action in this country brings on the wrath of the “system”: its deadly dance of intimidation and seduction; its crushing arsenal of transfers, suspensions, false cases, arrests, sudden deaths and financial squeeze. No one is immune.
This TEHELKA cover then is an alarming reminder that what should have been the norm has become the exception. Doing one’s duty is no longer an imperative in India. Nothing governs us as a society now except the miracle of individual choice. We are secured by the fact that some people choose to be good, no matter what. But there are myriad dangers in that. There is not just the might of the State to confront. There is also the temptation at every turn to just give up, part the skin and slip over into the silken side where one half of India is living a charmed life. If you don’t fight the ugliness of the State, it will behave in benign ways with you. That is one of the hardest lessons being good in India teaches you.
Some people just choose to be good, no matter what. These are the stories of what happens to them
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Friday, February 11, 2011

काले कानून का शिकार


देश में आजादी के बाद भी काले कानूनों का निर्माण हुआ है चाहे वो पोटा के रूप में हो चाहे एन.डी.पी.एस हो या टाडा। आतंकवाद व माओवाद से निपटने के नाम पर विभिन प्रदेशों में काले कानूनों का निर्माण हुआ है। इन काले कानूनों की एक विशेषता है कि यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम व भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता से हट कर इनका विचारण होता है। इसमें कुछ कानूनों में तो यह प्राविधान है कि पुलिस ने अंतर्गत धरा 161 सी.आर.पी.सी के तहत दिया गया बयान या पुलिस के समक्ष किसी भी आत्म स्वीकृति को सजा का आधार बना लिया जाता है। इन कानूनों के तहत यह भी व्यवस्था होती है कि इसमें सभी पुलिस वाले पेशेवर गवाहों की तरह गवाही देते हैं और उसी आधार पर सजा हो जाती है। जैसे एन.डी.पी.एस एक्ट के तहत अधिकांश मामलों में जिस व्यक्ति को जितने दिन जेल में रखना होता है उतनी ही मात्र में मार्फीन या हेरोइन की फर्जी बरामदगी दिखा दी जाती है इसमें भी जमानत आसानी से नहीं मिलती है। सजा, विचारण के पश्चात लगभग तयशुदा होती है। इन वादों में पुलिस की इच्छा ही महत्वपूर्ण है कि वह आपको समाज के अन्दर रखना चाहती है या कारागार में। कई बार ऐसा भी होता है कि पुलिस बेगुनाह नवजवानों को एन.डी.पी.एस एक्ट के तहत हँसते हुए न्यायालय रवाना कर देती है कि जाओ कुछ वर्ष अन्दर रह आओ और ऐसे वादों में न्यायालय के पास पुलिस की बातों को सच मानने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है। बिनायक सेन के मामले में भी यही हुआ है कि छत्तीसगढ़ के काले कानून के तहत उनका वाद चलाया गया और सजा हुई और अब माननीय उच्च न्यायालय ने उनकी जमानत अर्जी ख़ारिज कर दी है। अगर आप यह भी कहते हें कि यह सरकार अच्छी नहीं है सरकार बदल दी जाएगी तो काले कानूनों के तहत आप आजीवन कारवास के भागीदार हो जायेंगे लेकिन प्रश्न यह है कि काले कानूनों के तहत हजारो लाखो लोग जेलों में बंद हैं। जनता अपनी समस्याओं से पीड़ित है कौन इन काले कानूनों का विरोध करे। विधि निर्माण करने वाली संस्थाएं संसद व विधान सभाएं अपने में मस्त हैं उनके पास सरकार बचने व सरकार गिराने के अतिरिक्त समय नहीं है। काले कानून बनाते समय यह संस्थाएं उस पर विचार नहीं करती हैं। नौकरशाही द्वारा तैयार ड्राफ्ट को हल्लागुल्ल के बीच कानून की शक्ल दे दी जाती है और फिर वाही नौकरशाही जिसको चाहे आजाद रखे जिसको चाहे निरुद्ध।

लो क सं घ र्ष !

Friday, February 04, 2011

बिनायक को सजा दिलाने के लिए भाजपा ने की पैरोकारी


छत्तीसगढ़ में रायपुर की एक अदालत ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के उपाध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन सहित नक्सल विचारक नारायण सान्याल और कोलकाता के कारोबारी पीयूष गुहा को भारतीय दंड विधान की धारा 124 ए (राजद्रोह) और 120 बी (षडयंत्र) के तहत उम्रकैद की सजा सुनायी है। श्री सेन को 14 मई 2007 को बिलासपुर में गिरफ्तार किया गया था। बिनायक सेन को देश में समाज सेवा के लिए कई सम्मान मिले हैं। कई अन्य देशों में भी विश्व स्वास्थ्य मिशन आदि के लिए उन्हें कई सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनकी वैचारिक विरोधी रही भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें गंभीर सजा देने के लिए विशेष पैरोकारी की थी।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राज्य और सरकार दोनों को एक ही नहीं माना जा सकता। राज्य तो स्थायी व्यवस्था है, लेकिन सरकारें देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप आती-जाती रहती हैं। व्यवस्था चलाने के लिए इन सरकारों का विधायी अंग कानून भी बनाता है और जिसके अनुरक्षण का दायित्व स्थायी तत्व के रूप में कार्यरत कार्यपालिका के पास होता है। न्यायपालिका को भी राज्य का अंग ही माना जाता है, क्योंकि उसकी सत्ता अलग से नहीं है।
भारतीय संविधान में नागरिकों को मूल अधिकार दिये गये हैं। उसी के अनुच्छेद 19 (1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्रम में ही राजनीतिक संगठनों के बनाने और चलाने का भी अधिकार है। इस अधिकार में प्रतिबंध केवल उपक्रम के लिए ही लगाया जा सकता है। लोक व्यवस्था कानून व्यवस्था का पर्यायवाची नहीं माना जा सकता, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत 1951 में जो परिवर्तन किये गये थे, वे ही सरकारों को सार्वजनिक व्यवस्था के क्रम में कदम उठाने का भी अधिकार देते हैं, पर यह मूल अधिकारों को समाप्त करके नहीं। अंग्रेजों द्वारा बनायी गयी भारतीय दंड विधि की धारा 124 ए में राजद्रोह को यूं परिभाषित किया गया है- ‘जो कोई व्यक्ति लिखित या मौखिक शब्दों, चिन्हों या दृष्टिगत निरूपण या किसी भी तरह से नफरत या घृणा फैलाता है या फैलाने की कोशिश करता है या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ विद्रोह भड़काता है या भड़काने की कोशिश करता है, उसे आजीवन कारावास या उससे कुछ कम समय की सजा दी जायेगी, जिसमें जुर्माना भी लगाया जा सकता है या जुर्माना किया जा सकता है।
इसके साथ ही तीन व्याख्याएं भी दी गयी हैं (1) विद्रोह की अभिव्यक्ति में शत्रुता की भावनाएं और अनिष्ठा शामिल है। (2) बिना नफरत फैलाए या नफरत फैलाने की कोशिश किये, अवज्ञा या विद्रोह भड़काए बिना सरकार के कार्यों की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना जिसमें कानूनी रूप से उन्हें सुधारने की बात हो, तो यह इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं माना जायेगा। (3) बिना नफरत फैलाये या नफरत फैलाने की कोशिश किये, अवज्ञा या विद्रोह भड़काए बिना प्रशासन या सरकार के किसी अन्य विभाग की आलोचना करने वाले मत प्रकट करना इस धारा के अंतर्गत अपराध नहीं माना जायेगा। इसलिए लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण आंदोलन को राजद्रोह की परिभाषा में नहीं रखा जा सकता। यदि ऐसा करने का अधिकार न होगा तब तो लोकतंत्र जो एक दल या विचारक या कार्यक्रम वाले दल द्वारा चलाया जा रहा हो, उसे फिर कैसे हटाया जायेगा। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति के प्रतिबंध के संबंध में भी कुछ मानक बनाये हैं- यानी जहां दबाना आवश्यक है, कोई सामुदायिक हित खतरे में है, लेकिन यह खतरा अटकलों पर नहीं होगा बल्कि पब्लिक आर्डर के लिए आंतरिक रूप से खतरनाक होना जरूरी है। इसी प्रकार 124 ए के अंतर्गत विराग (डिसअफेक्शन) कहा जा सकता है। वह भी इससे सीधा सम्बद्ध है।
इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर इस संबंध में जो निर्णय दिये हैं उसे ‘विराग’ को स्नेह या बुरी भावना से  अलग किया गया, व्यवस्था या अव्यवस्थाओं में अन्तर किया गया है। विद्रोह उकसाने के लिए किसी व्यक्ति को आरोपित करने हेतु अभिव्यक्ति और सरकार के बीच सीधा संबंध होना जरूरी है। गड़बड़ी की आशंका से विद्रोह को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए सरकार के प्रति अनास्था और उसे बदलने का प्रयत्न दोनों अलग-अलग तत्व हैं। अनास्था को अराजकतावाद कहा जा सकता है, जिसमें तर्क यह है कि सरकार व्यक्ति के मूल और स्वाभाविक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाती है और उसके लिए निरंकुशतापूर्ण हो जाती है। जब यह निरंकुशता प्रतीक बन जाये तब इससे कैसे  लड़ा जाये? क्योंकि सारे संहारक अस्त्र तथा उनका संगठित प्रयास सरकार के हाथ में ही होते हैं। इस अराजकतावाद में भी व्यक्ति के सामान्य जीवन व स्थापना का सिद्धान्त अस्वीकार्य नहीं किया गया है।
जब सरकारें होंगी, तब उनके खिलाफ असंतोष भी होगा और वह विभिन्न स्वरूप ग्रहण करेगा। इसके लिए आंदोलन भी होंगे, लेकिन उन्हें कुचलने के लिए राज्य तभी कोई कदम उठा सकता है जब हिंसा को प्रोत्साहित करने के कोई कदम उठाये गये हों। यह केवल भावनाओं पर आधारित नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक और निर्वाचित सरकारों के खिलाफ आंदोलन या अभिव्यक्ति को राजद्रोह का कारण मान लिया जायेगा तब तो यह सरकारों की निरंकुशता ही सुदृढ़ करेगा। उनकी असंवेदनशीलता के परिणामों से ग्रस्त होने से बचने के लिए प्रतिरोध ही तो विकल्प होगा। लेकिन बारीक धारा यही है कि वह हिंसक नहीं होना चाहिए।
इसीलिए जब 124 ए की परिभाषाएं की गयी हैं और कहा गया है कि ‘कानून द्वारा स्थापित सरकारों को उन लोगों से अलग होकर देखना चाहिए जो कुछ समय के लिए कार्य कर रहे हों। इसलिए यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति और उसकी सजा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजद्रोह की सीमाएं निर्धारित करता है कि इसका प्रयोग जनता के मूल अधिकारों को समाप्त करने के लिए नहीं हो सकता। इसी प्रकार सरकार का काम विचारों पर प्रतिबंध लगाना नहीं है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समाज के विभिन्न अंगों व समुदायों को प्रदान की गयी है। केवल समाचार-पत्रों को ही नहीं है। वे भी आम जन समुदाय की श्रेणी में आते हैं।
इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्रम में ही संगठन बनाने और चलाने की आजादी को भी देखा जाना चाहिए। उनकी निष्ठा सरकार के प्रति हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। इसलिए इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर अंतिम निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही होना है। कुल मिलाकर यह निर्णय न केवल भावनाओं, अटकलों और उनके कल्पित परिणामों पर आधारित है, बल्कि अव्यवस्था को साधारण परिभाषा में ही मूल अधिकारों से अलग करके लिया गया है।
लेखक शीतला सिंह स्‍वतंत्र लेखन करते हैं. उनका लिखा यह लेख ब्‍लाग नई पीढ़ी से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.