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Friday, February 05, 2016

गंगाजल, साधू यादव, लोकतंत्र की हत्या, संघ व उच्चतम न्यायालय का मूकदर्शक बना रहना

फिल्म "गंगाजल" में तेजपुर के एसपी अमित कुमार अपने इंस्पेक्टर बच्चा यादव से तमाम केस को दिखाते हुए कहते हैं कि "यह ऐसे तमाम केस जो तुम्हें दिये गये तुमने अपनी इमानदारी और दिन रात की मेहनत और लगन से काम करके इन पर फाइनल रिपोर्ट लगाई और मुजरिमों को अदालत से सज़ा दिलवाई पर जैसे ही "साधू यादव" से संबंधित इन फाईलों की ओर मैं देखता हूँ तो सोचता हूँ कि तुम्हारी इमानदारी और मेहनत को क्या हो जाता है"।

यही सवाल कल मेरे दिमाग में तब गूँजा जब उच्चतम न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध सुनवाई पर टिप्पणी करते हुए कही कि "लोकतंत्र की हत्या हो रही है तो हम मूक दर्शक बन कर नहीं रह सकते" उच्चतम न्यायालय का यह व्यवहार बिल्कुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह था। क्युँकि जब मुसलमानों से संबंधित विषयों पर इसी तरह "लोकतंत्र की हत्या" होती है तो उच्चतम न्यायालय "मूक दर्शक" बन कर सदैव रहा है । आजादी से आजतक कोई एक मामले पर ऐसा फैसला जो देश के मुसलमानों के हक में उच्चतम न्यायालय ने दिया हो मुझे याद नहीं आता, फैसला तो छोड़िए एक टिप्पणी भी हक में आई हो मुझे याद नहीं पड़ती ।

इसी उच्चतम न्यायालय ने "बाबरी मस्जिद" के मामले में यथास्थिति रखने के अपने आदेश, 6 दिसम्बर के पूर्व बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए कल्याण सिंह से लिए "शपथपत्र", संसद को विश्वास में लेने कि "बाबरी मस्जिद" की सुरक्षा की जाएगी, जैसे तमाम संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रयासों को ध्वस्त करते हुए "बाबरी मस्जिद" उसी कल्याण सिंह ने ध्वस्त करा दी और लोकतंत्र की हत्या कर दी तब "उच्चतम न्यायालय" अपने ही आदेश की अवमानना पर "मूकदर्शक" बना रहा और बहुत किया तो लोकतंत्र के उस हत्यारे को मात्र "24 घंटे" की पिकनिक मनाने के लिए जेल भेजती है जो 6 दिसम्बर की घटना पर गर्व करता रहा है बार बार करता रहा है। 

गर्व किस बात का ? उच्चतम न्यायालय के आदेश, शपथपत्र, संसद और संविधान की हत्या पर गर्व, और उच्चतम न्यायालय मूक दर्शक बनकर बैठा रहता है, बिलकुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह जो साधू यादव और उसके पुत्र से संबंधित अपराधों पर चुप्पी साध लेता है ।

मुसलमानों से संबंधित तमाम विषयों पर तमाम न्यायिक जाँच आयोग भारत की ही सरकारों ने बनाए जिसके मुखिया मुसलमान नहीं थे, जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग, जस्टिस सच्चर आयोग, जस्टिस  काटजू आयोग, जस्टिस श्रीकृष्णा आयोग तथा जस्टिस लिब्राहन आयोग इत्यादि इत्यादि आयोग जो कि मुसलमानों से संबंधित मामले और उनके हक, बर्बादी, तबाही, खूनखराबे तथा हक माँगते इन आयोग की रिपोर्ट की वही सरकारें चिता जला देती हैं जिनका उन्होंने ही गठन किया होता है पर उच्चतम न्यायालय सरकार से यह नहीं पूछती कि जब कार्यवाही करना नहीं तो ऐसे ईमानदार पूर्व न्यायाधीशों को आयोग का प्रमुख बनाकर उनका अपमान क्यों किया जाता है ? 
परन्तु यही उच्चतम न्यायालय क्रिकेट के सुधार के लिए बनी जस्टिस लोढ़ा कमेटी की आज से एक महीने पहले आई रिपोर्ट को लागू करने के लिए आदेश पर आदेश सुनाती है तो हैरानी होती है कि उपरोक्त आयोग की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को क्यूँ नहीं दिखते ? या देख कर भी उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनी रहती है ?

लिब्राहन आयोग ने अपनी जाँच में 68 लोगों को दोषी पाया जिन्होंने "बाबरी मस्जिद" को ध्वस्त करने की साजिश रची और ध्वस्त करके "लोकतंत्र" की हत्या की परन्तु 24 वर्ष बाद भी यही उच्चतम न्यायालय "बच्चा यादव" की तरह मूक दर्शक आजतक बना हुआ है जबकि उन 68 दोषियों में कितने तो बिना सज़ा पाए तिरंगे में लपेट कर राजकीय सम्मान के साथ दुनिया से विदा हो गये और उनकी मृत्यु पर "राजकीय शोक" तक मनाया गया ।

क्यों "मूकदर्शक" बन जाती है "उच्चतम न्यायालय" गुजरात के 3000 बेगुनाह लोगों की हत्या पर और उस समय के राज्य के मुखिया जिन पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी और 3000 हत्याएँ बताती हैं कि वह अपनी जिम्मेदारी में विफल हुए, उनके अनेकों अनेक अप्रत्यक्ष और सांकेतिक बयान बताते हैं कि 3000 हत्याएँ उनके ही अप्रत्यक्ष आदेश पर हुईं, तो क्यों "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनकर "क्लीनचिट" पर "क्लीनचिट" देता चला जाता है ? राज्य के मुखिया के रूप में क्या वह इन हत्याओं के जिम्मेदार नहीं ?

गर्भवती महिलाओं के पेट चीरकर अजन्मे शिशु निकाल लिए जाते हैं, उस शिशु को त्रिशूल में गोद कर झंडे की तरह लहराया जाता है तो उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनकर चुप अजन्मे रहा ? गोधरा कांड हो या गुजरात दंगे के लगभग सभी सजायाफ्ता मुजरिमों को जिनको फाँसी पर लटका कर एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए था उनमें गुजरात दंगों के लगभग सभी दोषी "माया कोडनानी तथा बाबू बजरंगी" समेत सबके सब किसी ना किसी आधार पर बाहर घूम रहे हैं, क्यों ? 
और गोधरा के दोषी ऐसी ही घटनाओं के कारण जेल में सड़ रहे हैं क्यों ? उच्चतम न्यायालय क्यों "मूकदर्शक" बनकर बैठ जाती है ? 

हाशिमपुरा में 40 मुसलमानों को पीएसी के जवान भूनकर नहर में फेक देते हैं और लगभग 30 वर्ष मुकदमा चलने के बाद उनको बाईज्जत बरी कर दिया जाता है, हाशिमपुरा हत्याकांड की फाईलों को गायब कर दिया जाता है और "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनी रहती है तो यह भी सवाल नहीं करती कि यदि आरोपी निर्दोष हैं तो 40 लोगों की हत्या करने वाले कौन थे कहाँ हैं ?

कभी "सिमी" तो कभी "इंडियन मुजाहिदीन" जैसे छद्म संगठन जिसका कोई आस्तित्व ही नहीं तो कभी अलकायदा और अब "आइएस" के नाम पर सरकार जब चाहे मुसलमानों को उठाकर आतंकवादी बता देती है और जेलों में ठूसकर देश को अपनी चाकचौबंद व्यवस्था होने का एहसास दिलाती है, 10-10 वर्ष 15-15 वर्ष बाद यह जेल में ज़िन्दगी बर्बाद करके यही "सिमी" "इंडियन मुजाहिदीन" "अलकायदा" और अब "आइएस" के आतंकवादी बिना सबूतों के आधार पर बाईज्जत रिहा हो जाते हैं तो भी "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बन कर बैठी रहती है और एक सवाल नहीं पूछती कि सबके सब आतंकवादियों के विरुद्ध सबूत क्यों नहीं हैं और सबूत नहीं है तो किस आधार पर 10-15 वर्ष जेलों में बंद किये जाते रहे हैं, किस आधार पर उनपर आतंकवादी का टैग गिरफ्तार करते ही लगा दिया जाता है।

महाराष्ट्र के हेमंत करकरे ने संघ के लोगों को 12 आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के सबूत इकट्ठा करके लोगों को गिरफ्तार किया और "सिमी" पर ऐसे ही आरोपों से प्रतिबंध तो लग गया पर "संघ" देश पर शासन कर रहा है और उच्चतम न्यायालय उसी इंस्पेक्टर "बच्चा यादव" की तरह चुप है तो क्यों चुप है ? उच्चतम न्यायालय तो इस देश के लोकतंत्र और न्याय का प्रहरी है ? तो देश के एक वर्ग के साथ ही होता अन्याय उस प्रहरी को क्यों नहीं दिखता ? और दिखता है तो देखकर भी "मूकदर्शक" क्यों बना बैठा रहता है ? बच्चा यादव की तरह।

उसी "गंगाजल" फिल्म में आगे इंस्पेक्टर बच्चा यादव "साधू यादव" के विरुद्ध कार्यवाही करता है तो उसकी आँख फोड़कर हत्या कर दी जाती है । कहीं उच्चतम न्यायालय को यही डर तो नहीं ? जो साधू यादव ( संघ ) के विरुद्ध कार्यवाही से रोक तो नहीं रहा ? कहीं साधू यादव का डर उच्चतम न्यायालय को मुसलमानों से संबंधित मामलों में मूकदर्शक बनने को बाध्य तो नहीं कर रहा है ? या उच्चतम न्यायालय में सब साधु यादव के लोग ही बैठे हैं ?

Friday, December 25, 2015

फिर याद आ रहा है राम मंदिर

Thursday, October 15, 2015

इख़लाक़ ने ही की इख़लाक़ की हत्या

Tuesday, September 22, 2015

वह मुसलमान होकर भी पेशाब करता है


वह दलित होते हुए भी साफ-सफाई से रहता है। वह ब्राह्मण नहीं होने के बावजूद विद्वान है। वह हिन्दू होते हुए भी देशद्रोही है। मोदी के अहम मंत्री महेश शर्मा के मुताबिक अब्दुल कलाम मुसलमान होने के बावजूद महान राष्ट्रवादी और मानवतावादी थे। इन बातों में छुपी श्रेष्ठता की ग्रंथि, पूर्वाग्रह, सांप्रदायिकता और सामंती प्रवृत्ति को आसानी से समझा जा सकता है। संघियों और भगवाधारियों को दलितों का साफ-सुथरा रहना, गैर ब्राह्मणों का पढ़े-लिखे होना भी चौंकाता है। इनसे सहमति रखने वाले मुसलमान राष्ट्रवादी हैं और जो इनसे सहमति नहीं रखते हैं वे जानवर और देशद्रोही हैं। जैसे कोई कहे कि वह हिन्दू होते हुए भी देशद्रोही है, इसका मतलब यह हुआ कि हिन्दू घर में जन्म लेना ही देशभक्त होने का सर्टिफिकेट है। 

आरएसएस और बीजेपी के राष्ट्रवादी खांचे में मोदी भक्त, बेवकूफ, कट्टर हिन्दू और मुस्लिमों के खिलाफ आग उगलने वाले ही फिट बैठ सकते हैं। संघ और बीजेपी के का राष्ट्रवाद उन्माद के करीब की अवधारणा है। इनके राष्ट्रवाद में फिट बैठने के लिए आपको पाकिस्तान को गाली देनी होगी, मुसलमानों पर शक करना होगा, रामायण और महाभारत को इतिहास मानना होगा, वेद-पुराण को विज्ञान मानना होगा, गाय की पूजा करनी होगी और गोमूत्र को पवित्र मानना होगा। नेहरू को भला-बुरा कहना होगा, गांधी को जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करना होगा, गोडसे को इज्जत देनी होगी, ईसाई बच्चे को जिंदा जलाने के बाद चुप रहना होगा, मोदी राज्य में मुस्लिमों को जिंदा जलाने को सहज प्रतिक्रिया के रूप में देखना होगा, मुस्लिम को ही आतंकवादी बताना होगा, असीमानंद की दरिंदगी को देशहित में बताना होगा और प्रज्ञा ठाकुर को इज्जत देनी होगी। इस खांचे में जो फिट बैठेंगे वे महेश शर्मा के लिए राष्ट्रवादी हैं, बाकी सब देशद्रोही। आप मुसलमान हैं तो बहुत सतर्क रहना होगा। गुस्से और नाराजगी के भी धर्म होते हैं। हिन्दू नाराजगी सिस्टम को लेकर हो सकती है लेकिन मुस्लिम नाराजगी आतंकवाद और देशद्रोह की तरफ ही रुख करती है।

क्या महज हिन्दू होना राष्ट्रवादी और मानवतावादी होने का प्रमाण है और मुसलमान हैं तो खुद को राष्ट्रवादी और मानवतावादी साबित करना होगा? मोदी कैबिनेट के मंत्री महेश शर्मा का ऐसा ही मानना है। महेश शर्मा ने इंडिया टुडे को दिये इंटरव्यू से न केवल देश के 17 करोड़ मुसलमानों को शर्मिंदा किया है बल्कि पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को भी बेइज्जत किया है। जब शर्मा से दिल्ली में औरंगजेब रोड के नाम बदलने पर उठे विवाद को लेकर पूछा गया कि उन्होंने कहा कि कलाम के नाम पर रखना बिल्कुल सही फैसला था। शर्मा ने कहा, 'औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एक ऐसे महापुरुष के नाम पर किया है जो मुसलमान होते हुए भी इतना बड़ा राष्ट्रवादी और मानवतावादी इंसान था। एपीजे अब्दुल कलाम, उनके नाम पर किया गया है।' 

महेश शर्मा मोदी कैबिनेट में अहम मंत्री हैं। आरएसएस के प्रयोगशाला में वह तैयार हुए हैं। आरएसएस खुद को जन्मजात राष्ट्रवादी मानता है और दूसरों को इसका सर्टिफिकेट देता है। मानवतावादी होना एक इंसानी प्रवृत्ति है। इसका धर्म से कोई वास्ता नहीं है। एक हिन्दू यदि सहज मानवीय स्वभाव के कारण किसी की हत्या और रेप देखकर आहत और क्रोधित होता है तो क्या मुस्लिम खुश होकर हंसता है? महेश शर्मा ने तो यही कहा कि कलाम मुसलमान होने के बावजूद मानवतावादी थे। किसी मुस्लिम का मानवतावादी होना संघियों को चौंकाता है। दरअसल कलाम बीजेपी को इसलिए प्रिय लगते रहे कि उन्होंने बीजेपी और मोदी के पाप के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोला। वह राष्ट्रपति होने के दौरान भी बीजेपी की सांप्रदायिक नीतियों पर खामोश रहे। बीजेपी को इसीलिए कलाम राष्ट्रवादी दिखते हैं। गुजरात में जब मुसलमानों का कत्लेआम हुआ तब कलाम ही राष्ट्रपति थे। उन्होंने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश नहीं की थी। उन्होंने न ही कभी सार्वजनिक तौर पर इसकी आलोचना की।

जो पीएम गरजते हुए लगातार 'सबका साथ और सबका विकास' की बात करता है उसी का मंत्री देश के करोड़ों लोगों पर संदेह करता है। उसकी वफादारी को संदिग्ध बनाता है। ऐसे में फिर से मोदी का अतीत याद आता है। 15 महीने की मोदी सरकार के दो काम याद नहीं आते लेकिन हिन्दू सात बच्चे पैदा करो, लव जिहाद, एआर रहमान घर वापसी कर लो, पाकिस्तान में घुस कर मारो, असम में मुसलमानों की बढ़ती आबादी देश के लिए खतरा, एक दिन इस देश में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे और अयोध्या में राम मंदिर बनाओ चौतरफा सुनने को मिल रहे हैं। ऐसी बातें कभी मंत्री कहता है तो कभी सांसद लेकिन प्रधानमंत्री खामोश रहता है। महेश शर्मा ने कलाम पर जो टिप्पणी की है वह कुछ इसी तरह की हास्यास्पद टिप्पणी है कि 'वह मुसलमान होकर भी पेशाब करता है'।

आखिरी मोर्चा 

Friday, January 30, 2015

गाँधी या गोडसे: हरिशंकर परसाई


महात्मा गाँधी को चिट्ठी पहुँचे


यह चिट्ठी महात्मा मोहनदास करमचंद गाँधी को पहुंचे. महात्माजी, मैं न संसद-सदस्य हूँ, न विधायक, न मंत्री, न नेता. इनमें से कोई कलंक मेरे ऊपर नहीं है. मुझमें कोई ऐसा राजनीतिक ऐब नहीं है कि आपकी जय बोलूं. मुझे कोई भी पद नहीं चाहिये कि राजघाट जाऊँ. मैंने आपकी समाधि पर शपथ भी नहीं ली.
आपका भी अब भरोसा नहीं रहा. पिछले मार्च में आपकी समाधि मोरारजी भाई ने भी शपथ ली थी और जगजीवन राम ने भी. मगर बाबू जी रह गए और मोरारजी प्रधानमंत्री हो गए. आख़िर गुजराती ने गुजराती का साथ दिया.
जिन्होंने आपकी समाधि पर शपथ ली थी उनका दस महीने में ही ‘जिंदाबाद’ से ‘मुर्दाबाद’ हो गया. वे जनता से बचने के लिए बाथरूम में ही बिस्तर डलवाने लगे हैं. मुझे अपनी दुर्गति नहीं करानी. मैं कभी आपकी समाधि पर शपथ नहीं लूँगा. उसमें भी आप टाँग खींच सकते हैं.
आपके नाम पर सड़कें हैं- महात्मा गाँधी मार्ग, गाँधी पथ. इनपर हमारे नेता चलते हैं. कौन कह सकता है कि इन्होंने आपका मार्ग छोड़ दिया है. वे तो रोज़ महात्मा गाँधी रोड पर चलते हैं.
इधर आपको और तरह से अमर बनाने की कोशिश हो रही है. पिछली दिवाली पर दिल्ली के जनसंघी शासन ने सस्ती मोमबत्ती सप्लाई करायी थी. मोमबत्ती के पैकेट पर आपका फोटो था. फोटो में आप आरएसएस के ध्वज को प्रणाम कर रहे हैं. पिछे हेडगेवार खड़े हैं.
By R.K. Lakshman
एक ही कमी रह गयी. आगे पूरी हो जायेगी. अगली बार आपको हाफ पेंट पहना दिया जायेगा और भगवा टोपी पहना दी जायेगी. आप मजे में आरएसएस के स्वयंसेवक के रुप में अमर हो सकते हैं. आगे वही अमर होगा जिसे जनसंघ करेगा.
कांग्रेसियों से आप उम्मीद मत कीजिये. यह नस्ल खत्म हो रही है. आगे गड़ाये जाने वाले में कालपत्र में एक नमूना कांग्रेस का भी रखा जयेगा, जिससे आगे आनेवाले यह जान सकें कि पृथ्वी पर एक प्राणी ऐसा भी था. गैण्डा तो अपना अस्तितव कायम रखे है लेकिन कांग्रेसी नहीं रख सका.
मोरारजी भाई भी आपके लिए कुछ नहीं कर सकेंगे. वे सत्यवादी हैं. इसलिए अब वे यह नहीं कहते कि आपको मारने वाला गोडसे आरएसएस का था.
यह सभी जानते हैं कि गोडसे फांसी पर चढ़ा, तब उसके हाथ में भगवा ध्वज था और होठों पर संघ की प्रार्थना- नमस्ते सादा वत्सले मातृभूमि. पर यही बात बताने वाला गाँधीवादी गाइड दामोदरन नौकरी से निकाल दिया गया. उसे आपके मोरारजी भाई ने नहीं बचाया.
मोरारजी सत्य पर अटल रहते हैं. इस समय उनके लिए सत्य है प्रधानमंत्री बने रहना. इस सत्य की उन्हें रक्षा करनी है. इस सत्य की रक्षा के लिए जनसंघ का सहयोग जरूरी है. इसलिए वे यह झूठ नहीं कहेंगे कि गोडसे आरएसएस का था. वे सत्यवादी है.
तो महात्माजी, जो कुछ उम्मीद है, बाला साहब देवरास से है. वे जो करेंगे वही आपके लिए होगा. वैसे काम चालू हो गया है. गोडसे को भगत सिंह का दर्जा देने की कोशिश चल रह रही है. गोडसे ने हिंदू राष्ट्र के विरोधी गाँधी को मारा था.
गोडसे जब भगत सिंह की तरह राष्ट्रीय हीरो हो जायेगा, तब तीस जनवरी का क्या होगा? अभी तक यह ‘गाँधी निर्वाण दिवस है’, आगे ‘गोडसे गौरव दिवस’ हो जायेगा. इस दिन कोई राजघाट नहीं जायेगा, फिर भी आपको याद जरूर किया जायेगा.
जब तीस जनवरी को गोडसे की जय-जयकार होगी, तब यह तो बताना ही पड़ेगा कि उसने कौन-सा महान कर्म किया था. बताया जायेगा कि इस दिन उस वीर ने गाँधी को मार डाला था. तो आप गोडसे के बहाने याद किए जायेंगे. अभी तक गोडसे को आपके बहाने याद किया जाता था.
एक महान पुरुष के हाथों मरने का कितना फयदा मिलेगा आपको? लोग पूछेंगे- यह गाँधी कौन था? जवाब मिलेगा- वही, जिसे गोडसे ने मारा था.
एक संयोग और आपके लिए अच्छा है. 30 जनवरी 1977 को जनता पार्टी बनी थी. 30 जनवरी जनता पार्टी का जन्म-दिन है. अब बताइये, जन्मदिन पर कोई आपके लिए रोयेगा? वह तो खुशी का दिन होगा.
आगे चलकर जनता पार्टी पुरी तरह जनसंघ हो जायेगी. तब 30 जनवरी का यह महत्त्व होगा- इस दिन परमवीर राष्ट्रभक्त गोडसे ने गाँधी को मारा. इस पुण्य के प्रताप से इसी दिन जनता पार्टी का जन्म हुआ, जिसने हिंदू राष्ट्र की स्थापना की.
आप चिंता न करें, महात्माजी! हमारे मोरारजी भाई को न कभी चिंता होती है और न वे कभी तनाव अनुभव करते हैं. चिंता क्यों हो उन्हें? किसकी चिंता हो? देश की? नहीं. उन्होंने तो ऐलान कर दिया है- राम की चिड़िया, राम के खेत! खाओ री चिड़िया, भर-भर पेट! तो चिड़िया खेत खा रही है और मोरारजी को कोई चिंता, कोई तनाव नहीं है.
बाकी भी ठीक चल रहा है. आप जो लाठी छोड़ गए थे, उसे चरण सिंह ने हथिया लिया है.
चौधरी साहब इस लाठी को लेकर जवाहरलाल नेहरू का पीछा कर रहे हैं. जहाँ नेहरू को पा जाते हैं, एक-दो हाथ दे देते हैं. जो भी नेहरू की नीतियों की वकालत करता है, उसे चौधरी आपकी लाठी से मार देते हैं.
उस दिन चंद्रशेखर ने कहीं कह दिया कि नेहरू की उद्योगीकरन की नीति सही थी और उससे देश को बहुत फायदा हुआ है.
चरण सिंह ने सुना तो नौकर से कहा- अरे लाना गाँधीजी की लाठी!
लाठी को लेकर चंद्रशेखर को मारने निकल पड़े. बेचारे बचने के लिए थाने गए तो थानेदार ने कह दिया- पुलिस चौधरी साहब की है. वे अगर आपको मार रहे हैं तो हम नहीं बचा सकते.
आप हरिजन वगैरह की चिन्ता मत कीजिये. हर साल कोटा तय रहता है कि इस साल गाँधी जयंती तक इतने हरिजन मरेंगे. इस साल ‘कोटा’ बढ़ा दिया गया था, क्योंकि जनता पार्टी के नेताओं ने राजघाट पर शपथ ली थी.
उनकी सरकार बन गयी. उन्हें शपथ की लाज रखनी थी. इसीलिये हरिजनों को मारने का ‘कोटा’ बढ़ा दिया गया. खुशी है कि ‘कोटे’ से कुछ ज्यादा ही हरिजन मारे गए. आप बेफिक्र रहें, आपका यश किसी ना किसी रुप में सुरक्षित रहेगा.
आपका
एक भक्त
साभार: परसाई रचनावली-4