Thursday, November 29, 2012

फिलस्तीन की पीड़ा


इजराइल एक ऐसा देश है जिसे मिथक से उठा कर जमीन पर बसाया गया है। वह एक ऐसा देश भी है जो फिलस्तीनी जनता की मूल भूमि को हड़प कर स्थापित किया गया है। इस तरह आधुनिक विश्व इतिहास में इजराइल का निर्माण अमेरिका और ब्रिटेन के साम्राज्यवादी कुचक्रों से लगातार हारती और निराश होती अरब जनता का भी इतिहास है।
महेंद्र मिश्र की पुस्तक 'फिलस्तीन और अरब-इस्रायल संघर्ष' इजराइल के निर्माण और उसमें निहित फिलस्तीन समुदाय के अंतहीन विस्थापन को पुख्ता साक्ष्यों के साथ कविता जैसी मार्मिकता के साथ बयान करती है। शीर्षक की साफगोई के बावजूद पाठकों को शुरू में यह भ्रम-सा होता है कि यह किताब शायद अरब की हालिया घटनाओं का विश्लेषण है। लेकिन जैसे-जैसे हम इस पुस्तक में अध्याय-दर-अध्याय आगे बढ़ते जाते हैं तो यह कुहासा एक रूपक का अर्थ ग्रहण करने लगता है जिससे बाहर आकर हमारे सामने एक अप्रत्याशित उद्घाटन होता है कि दरअसल जिसे हम सिर्फ फिलस्तीन और इजराइल का संघर्ष समझते रहे हैं, उसे समूचे अरब विश्व के अंतर्गंुफित इतिहास से जुदा करके नहीं समझा जा सकता। तथ्यगत सूचनाओं, बेलाग विश्लेषण और भू-राजनीतिक मसलों की अचूक समझ के अलावा इस किताब को केवल इस आधार पर भी महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है कि इससे गुजरते हुए पाठक के भीतर यह समझ जगती जाती है कि आधुनिक विश्व की ज्यादातर विभीषिकाएं किस तरह साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की संकर कोख से निकलती हैं और वे उस तरह इकहरी और साफ  नहीं होतीं जिस तरह बयान की जाती हैं।
एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में इजराइल की औपचारिक स्थापना 1948 में मानी जाती है, लेकिन उसका विचार और उसे लेकर यहूदियों की राजनीतिक लामबंदी लगभग छह दशक पहले शुरू हो गई थी। इस आंदोलन की बुनियादी धारणा यह थी कि फिलस्तीन यहूदियों का देश है और इस नाते उन्हें वहां वापस लौटने और राज्य स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए। शुद्ध यहूदी राष्ट्र के इस विचार को सार्वजनिक कल्पना में रोपित करने का काम थियोडोर हर्ज्ल जैसे लोगों ने किया। 'द ज्यूइश स्टेट' नामक अपनी पुस्तक में थियोडोर ने इजराइल की योजना को मूर्त रूप दिया और दुनिया भर में बिखरे यहूदियों के बीच इजराइल के सपने को इस तरह प्रचारित किया कि अगर यहूदी संगठित हो जाएं तो उनकी कल्पना का देश फिलस्तीन में बसाया जा सकता है। इसे प्रचार का असर कहिए कि 1914 में पहला महायुद्ध शुरू होते-होते फिलस्तीन में यहूदियों की संख्या पचासी हजार हो गई थी। इन आप्रवासी यहूदियों ने दूरस्थ और अनुपस्थित सामंतों से जमीन खरीद कर उस पर काम करने वाले किसानों को बेदखल करना शुरू कर दिया। फिलस्तीन अरबों और आप्रवासी यहूदियों के बीच स्थायी संघर्ष की शुरुआत या दूसरे शब्दों में, मूलवासियों और संगठित घुसपैठियों की जंग यहीं से शुरू हुई।
इजराइल राष्ट्र के विचार को महायुद्ध के दौरान लगातार तराशा जाता रहा। 1917 की बाल्फोर घोषणा के तहत ब्रिटेन ने एक तरह से यहूदी नेतृत्व की फिलस्तीन में यहूदियों के स्वराष्ट्र बसाने की मांग का अनुमोदन कर दिया। युद्ध की समाप्ति पर जब साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा मध्यपूर्व का बंटवारा किया गया तो फिलस्तीन ब्रिटेन के नियंत्रण में आ गया। तब से लेकर दूसरे विश्वयुद्ध तक इस क्षेत्र में यहूदियों की एक के बाद दूसरी खेप लगातार आती गर्इं।
गौर करें कि बाल्फोर घोषणा में यहूदियों के स्वराष्ट्र की मांग का समर्थन करते हुए यह भरोसा भी दिया गया था कि इस संभावित देश में क्षेत्र की गैर-यहूदी जनता के नागरिक और धार्मिक अधिकारों को अक्षुण्ण रखा जाएगा। लेकिन 1920 से लेकर इजराइल की औपचारिक स्थापना तक का पूरा काल फिलस्तीनी जनता और इजराइल के निर्माताओं के बीच मुसलसल टकराव का इतिहास रहा है। यरुशलम और जाफा के दंगों से शुरू हुआ यह सिलसिला साल-दर-साल पहले से ज्यादा उग्र और भयावह होता गया। उदाहरण के लिए 1936 से 1939 के बीच हुए विद्रोह में जहां ब्रिटिश सेना और यहूदी पक्ष के केवल साढ़े पांच सौ सैनिकों की जान गई, वहीं अरब खेमे के पांच हजार लड़ाके मारे गए, इससे तीन गुना लोग घायल हुए और सैकड़ों लोगों को फांसी दी गई।
इजराइल और अरब देशों के टकराव में यह बात अलग से याद रखी जानी चाहिए कि जानमाल की तबाही के मामले में इजराइल और अरब जनता का अनुपात मोटा-मोटी एक और सौ के बीच बैठता है। और मजे की बात यह है कि इजराइल अपनी हमलावर कार्रवाइयों को हमेशा आत्मरक्षा में उठाया गया कदम बताता रहा है।
अंध और आक्रामक राष्ट्रवाद के सिद्धांतों पर खड़े किए गए इस नकली देश ने सिर्फ फिलस्तीन को, बल्कि समूचे अरब क्षेत्र को स्थायी सन्निपात में धकेल दिया है। मसलन, 1948 में जैसे ही इजराइल की स्वतंत्र देश के रूप में घोषणा की गई तो उसके तत्काल बाद इजराइल और अरब जगत के बीच युद्ध छिड़ गया जिसमें मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और अन्य अरब देश शामिल हुए। दूसरा युद्ध 1956 में शुरू हुआ जो मुख्यत: मिस्र के खिलाफ लड़ा गया। इसमें एक तरफ इजराइल, इंग्लैंड और फ्रांस थे तो दूसरी तरफ अकेला मिस्र! इसी तरह 1967 के इजराइल-अरब युद्ध में मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक के अलावा सऊदी अरब, मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, सूडान, लीबिया और पीएलओ ने भी भाग लिया। इन सारे युद्धों में अरब देशों की हार के साथ यह तथ्य भी गौरतलब है कि इजराइल की तुलना में अरब देशों का नुकसान कई गुना ज्यादा रहा। इजराइल ने इसी युद्ध में गाजापट्टी, पश्चिमी तट और गोलन पहाड़ियों पर कब्जा किया था। यह भूभाग आज तक इजराइल के कब्जे में है। और वह खासतौर पर उन क्षेत्रों में लगातार यहूदी बस्तियां बसाता जा रहा है जहां मुख्यत: फिलस्तीनी जनता रहती आई है।
पुस्तक से पता चलता है कि 1973 के अंतिम अरब-इजराइल युद्ध के बाद फिलस्तीन समस्या को सुलझाने के लिए 1993 का ओस्लो समझौता, सन 2000 का कैंप डेविड शिखर सम्मलेन और 2002 में यूरोपीय संघ, रूस, संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका द्वारा प्रस्तावित शांति मसविदे जैसी कितनी ही शांति वार्ताएं हो चुकी हैं, लेकिन फिलस्तीन की जनता आज भी इजराइल की सैनिक घेरेबंदी में ही जी रही है। पश्चिमी तट और गाजा में इजराइल का नियंत्रण एक औपनिवेशिक घेरे की तरह है जिसमें फिलस्तीनी समाज और उसकी अर्थव्यवस्था एक धीमी मगर तयशुदा मौत की तरफ बढ़ रहे हैं। यहां गरीबी का स्तर सत्तर से अस्सी फीसद हो चुका है और बेकारी इस कदर फैल चुकी है कि फिलस्तीनी जनता का बड़ा हिस्सा दान के भोजन पर गुजर कर रहा है। 
फिलस्तीनी जनता का जो हिस्सा इजराइल में रह गया है उसकी हैसियत दोयम दर्जे के नागरिक की भी नहीं है। आवास, शिक्षा और संसाधन के लिहाज से वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक अमानवीय स्थिति में जीता आ रहा है। और जो लोग इस अंतहीन अपमान को सह नहीं सके वे लेबनान, जॉर्डन, सीरिया या पश्चिमी देशों में शरणार्थियों का जीवन बिता रहे हैं। इन देशों के लोग अब उन्हें बोझ मानते हैं। इस तरह इजराइल की आक्रामक मौजूदगी ने फिलस्तीन के साथ पूरे अरब जगत को स्थायी अस्थिरता का शिकार बना दिया है।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने इजराइल के निर्माण के पीछे खड़ी और उसके अस्तित्व को अभयदान देने वाली  नव-उपनिवेशवादी तिकड़मों को जरूरी विस्तार देते हुए इस बात का भी खयाल रखा है कि परोक्ष ब्योरों से कथ्य बोझिल न हो जाए। पुस्तक पढ़ते हुए पाठक लेखक की विषयगत समझ और विद्वत्ता के अलावा उनकी न्यायपूर्ण पक्षधरता से भी मुतासिर होंगे। वे फिलस्तीन के अतिवादी संगठनों की हिंसा को जायज नहीं ठहराते, लेकिन साथ ही यह भी बताते चलते हैं कि इजराइल हिंसा और उत्पीड़न को नृशंसता के किस स्तर पर ले जा चुका है। लेखक हिंसा के इस पारस्परिक असंतुलन को लक्षित करते हुए आग्रह करते हैं कि हमास के एक रॉकेट हमले के बदले इजराइल जब टैंकों और युद्धक विमानों का इस्तेमाल करता है तो हिंसा के इन दो रूपों में फर्क किया जाना चाहिए।। कहना न होगा कि फिलस्तीन लड़ाकों की हिंसा कमजोर और व्यथित की हिंसा होती है, जबकि इजराइल की हिंसा हमेशा एक आततायी सत्ता की व्यवस्थित हिंसा। इसे लेखक की गहन राजनीतिक दृष्टि का निदर्शन ही कहा जाएगा कि वे सिर्फ यह बता कर नहीं रह जाते कि इजराइल और अरब देशों के अंतहीन युद्धों में कितने लोग हताहत हुए, बल्कि बात को कुछ इस तरह रखते हैं कि अमेरिका और यूरोप के साम्राज्यवादी देश नंगे दिखने लगते हैं।
हिंदी में ऐसी किताब का लिखा जाना इस बात का सबूत माना जा सकता है कि इस भाषा में साहित्य के अलावा भी मौलिक और स्तरीय लेखन किया जाता है। वैसे अगर संदर्भ ग्रंथों की सूची के साथ पुस्तक में अनुक्रमणिका भी दे दी जाती तो उसे सामान्य पाठकों के अलावा शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी बनाया जा सकता था।
नरेश गोस्वामी
फिलस्तीन और अरब-इस्रायल संघर्ष: महेंद्र मिश्र; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 450 रुपए।

Monday, November 12, 2012

क्या ‘हिन्दू‘ हमारी पहचान और राष्ट्रीयता है?



Omपिछले कुछ दशकों में सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्र में धार्मिक पहचान, एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है। साम्प्रदायिक और कट्टरतावादी राजनीति के उदय से ‘हम कौन हैं‘-इस प्रश्न के कई नितांत घातक व स्पष्ट तौर पर निहित राजनैतिक स्वार्थों को साधने वाले उत्तर, जनता के मन में बैठा दिए गए हैं और इनसे समाज विभाजित हुआ है। हाल में (सितम्बर, 2012) आर.एस.एस सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि ‘‘जब हम ‘हिन्दू‘ शब्द का उपयोग करते हैं तो हमारा अर्थ होता है संपूर्ण भारतीय समाज, जिसमें हिन्दू, मुसलमान और ईसाई सभी शामिल हैं। ‘हिन्दू‘ शब्द हमारी पहचान और राष्ट्रीयता है।‘‘ क्या यह मान्यता सभी भारतीयों को स्वीकार्य होगी? इस मान्यता के दो पहलू हैं-पहला धार्मिक और दूसरा राजनैतिक-राष्ट्रीय।
क्या हम सब भारतीय हिन्दू हैं, जैसा कि भागवत साहब ने फरमाया है। यह सही है कि हिन्दू शब्द का इस्तेमाल आठवीं सदी में शुरू हुआ जब पश्चिम (ईरान-ईराक से) दिशा से आने वालों ने इस शब्द को गढ़ा। वे सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों को सिन्धू कहने लगे। चूंकि उनकी भाषा में ‘ह‘ अक्सर ‘स‘ के स्थान पर प्रयुक्त होता था इसलिए सिन्धू शब्द “हिन्दू” में बदल गया। अतः शुरूआती दौर में हिन्दू शब्द का भौगोलिक अर्थ था। बाद में अनेक धार्मिक परंपराओं जिनमें ब्राहम्णवाद, नाथ, तंत्र, सिद्ध व भक्ति शामिल हैं, के मानने वाले हिन्दू कहलाने लगे और हिन्दू शब्द इन विभिन्न धार्मिक परंपराओं के मानने वालों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। आज भी दुनिया के कुछ हिस्सों में हिन्दू शब्द को भौगोलिक संदर्भ में लिया जाता है परंतु भारत और विश्व के अधिकांश देशों में हिन्दू अब एक धर्म विशेष का नाम बन गया है।
हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत अछूतों के साथ किए जाने वाले पशुवत व्यवहार से दुःखी होकर अम्बेडकर ने कहा था कि ‘‘मैं हिन्दू पैदा हुआ था क्योंकि वह मेरे हाथ में नहीं था, परंतु मैं हिन्दू के रूप में नहीं मरूंगा‘‘। उन्होंने हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया। जैसे-जैसे देश में भारतीय राष्ट्रीयता की भावना जागृत होना शुरू हुई, साम्प्रदायिक राजनीति ने अपने पंख फैलाने शुरू कर दिए। सामंतवादी वर्ग और राजा-महाराजा एकजुट हो गए और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीयता के प्रति अपने विरोध को धार्मिक रंग देने की किशिश शुरू कर दी। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की जगह इन सामंती तत्वों और राजा-महाराजाओं ने मुस्लिम राष्ट्रीयता और हिन्दू राष्ट्रीयता की बातें करना प्रारंभ कर दिया। सन् 1888 में गठित युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन से ही धार्मिक राष्ट्रीयता में आस्था रखने वाले विभिन्न संगठन जन्मे। इस संस्था के संस्थापकों में ढाका के नवाब और कशी के राजा प्रमुख थे। बाद में कुछ मध्यमवर्गीय, पढे़ लिखे लोग भी इस संस्था से जुड़ गए। युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन ही वह संगठन था जिसने मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को जन्म दिया।
चूंकि इस्लाम, पैगम्बर पर आधारित धर्म था इसलिए उसकी पुनर्व्याख्या की आवश्यकता नहीं थी। परंतु हिन्दू धर्म, विभिन्न धार्मिक परंपराओं का मिलाजुला स्वरूप था इसलिए उसे हिन्दू धार्मिक राष्ट्रवाद का आधार बनाने के लिए नए सिरे से व्याख्यित किए जाने की आवश्यकता थी। सावरकर ने हिन्दू धर्म को परिभाषित करते हुए कहा कि जिन लोगों की पुण्यभू और पितृभू  भारतवर्ष में है, वे सब हिन्दू हैं। यह हिन्दू की राजनैतिक परिभाषा थी क्योंकि सावरकर, हिन्दू राष्ट्रवाद के झंडाबरदार थे और वे इस राष्ट्रवाद से मुसलमानों और ईसाईयों को अलग रखना चाहते थे। सावरकर की हिन्दुओं की इस परिभाषा में जैन, बौद्ध और सिक्ख भी शामिल थे जिन्हें हिन्दू धर्म के विभिन्न पंथ बता दिया गया। इन धर्मों के मानने वालों को यह स्वीकार्य नहीं था। वे अपने-अपने धर्मों की अलग पहचान कायम रखने के इच्छुक थे और हिन्दू धर्म का हिस्सा बनना नहीं चाहते थे।
अतः यह कहना, जैसा कि भागवत कह रहे हैं, कि सभी बौद्ध, जैन, सिक्ख, भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई हिन्दू हैं, सत्य से परे है। यह एक तरह से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हिन्दू पहचान और हिन्दू कर्मकाण्ड लादने की कोशिश है। कुछ इसी तरह की बात लगभग दो दशक पहले तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कही थी। उन्होंने कहा था कि हम सब हिन्दू हैं- मुसलमान महमदिया हिन्दू हैं, ईसाई क्रिस्ट हिन्दू हैं इत्यादि।
आजादी के आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता की दो अवधारणाएं सामने आईं। एक थी भारतीय राष्ट्रीयता, जिसकी आधारशिला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों ने रखी थी। यह राष्ट्रीयता दुनिया के सबसे बड़े जनांदोलन-भारतीय स्वतंत्रता संग्राम- की नींव बनी। राष्ट्रीयता की इस अवधारणा में धर्म व्यक्तिगत मसला था जबकि राष्ट्रीयता का संबंध एक विशेष भौगोलिक सीमा के अंदर रहने वाले लोगों से था। अधिकांश भारतीयों ने राष्ट्रीयता की इसी परिभाषा को स्वीकार किया और स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी की। स्वाधीनता संग्राम का उदेश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति तो था ही उसने जातिगत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी आवाज उठाई और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में आस्था प्रकट की। यही मूल्य आगे चलकर हमारे संविधान का हिस्सा बने। दूसरी राष्ट्रीयता थी धार्मिक राष्ट्रीयता, जिसे जमींदार और सामंती वर्ग ने पोषित किया और आगे चलकर जो दो समानांतर राष्ट्रीयताओं में बंट गई। इन दोनों समानांतर राष्ट्रीयताओं के लगभग एक से सिद्धांत थे। ये थीं हिन्दू राष्ट्रीयता (हिन्दू महासभा व आरएसएस) और मुस्लिम राष्ट्रीयता (मुस्लिम लीग)। ये दोनों राष्ट्रीयताएं न केवल आजादी के आंदोलन से दूर रहीं बल्कि उन्होंने इस आंदोलन को कमजोर करने की भरसक कोशिश की। वे “ “हमारी महान परंपराएं“ और “हमारा महान धर्म“ के नाम पर जातिगत और लैंगिक भेदभाव को बनाए रखने की कोशिश करती रहीं। ये दोनों धार्मिक राष्ट्रीयताएं अपने इतिहास को पुरातनकाल से जोड़ती रहीं। मुस्लिम लीग का कहना था कि मोहम्मद बिन कासिम के सिंध में अपना राज्य स्थापित करने के समय से ही मुस्लिम अलग राष्ट्र हैं। जबकि हिन्दू राष्ट्रवादी यह दावा करते थे कि हिन्दू, अनादिकाल से एक राष्ट्र हैं।
राष्ट्रीयता को प्राचीन इतिहास से जोड़ना, तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। राष्ट्रीयता की अवधारणा का विकास ही पिछली दो-तीन सदियों में हुआ है जब राजाओं के साम्राज्य बिखरने लगे और औद्योगिकरण और षिक्षा से लोगों की सोच में बदलाव आया। राजसी काल के पहले का समाज एकदम अलग था और उसे किसी भी स्थिति में राष्ट्र नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रीयता की ये दोनों धार्मिक अवधारणाएं अपने-अपने धर्मों के राजाओं का महिमामंडन करती हैं और अन्य धर्मों के राजाओं का दानवीकरण। वे यह भूल जाती हैं कि संपूर्ण राजतंत्रीय व्यवस्था ही शोषण व सामाजिक ऊँच-नीच पर आधारित है।
स्वाधीनता संग्राम के समय से ही दोनों धार्मिक राष्ट्रीयताएं इतर धर्मों के लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानती थीं। पाकिस्तान में मुस्लिम राष्ट्रवाद के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और भारत में भी हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के परवान चढ़ने के साथ ही, अल्पसंख्यकों के बुरे दिन आ गए लगते हैं। हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म पर्यायवाची नहीं हैं। हिन्दुत्व को मोटे तौर पर हम राजनैतिक इस्लाम का हिन्दू संस्करण मान सकते हैं। हिन्दुत्व एक तरह का ‘राजनैतिक हिन्दू धर्म‘ है। आर.एस.एस-हिन्दुत्व के सबसे प्रमुख विचारक एम.एस.गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘व्ही आर अवर नेशनहुड डिफांइड‘ में कहा है कि ईसाईयों और मुसलमानों को हिन्दुओं के अधीन रहना होगा वरना उन्हें कोई नागरिक अधिकार नहीं मिलेंगे। दुर्भाग्यवश, भारत में साम्प्रदायिक हिंसा में तेजी से हुई बढ़ोत्तरी के साथ गोलवलकर की यह इच्छा कुछ हद तक पूरी होती दिखती है।
यह कहना कि हम सब हिन्दू हैं, धार्मिक अल्पसंख्यकों को दबाकर रखने का राजनैतिक षड़यंत्र है और ऐसा कहने वाले जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच के रखवाले हैं। ऊँचनीच और असमानता, धर्म-आधारित सभी राजनैतिक विचारधाराओं का आवष्यक अंग होती है। हिन्दू धर्म को सभी भारतीयों की राष्ट्रीयता और पहचान से जोड़ना, भारतीय राष्ट्रवाद, स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों और भारतीय संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है। भागवत तो केवल आरएसएस के उस राजनैतिक एजेन्डे को स्वर दे रहे हैं जिसका उदेश्य प्रजातंत्र का गला घोंटना और पीछे के रास्ते से गोलवलकर के सपने को साकार करने की कोशिश करना है। यह कहना कि सभी भारतीय हिन्दू हैं तो शुरूआत भर है। इसके बाद अल्पसंख्यकों से अपेक्षा की जावेगी कि वे हिन्दू कर्मकाण्ड अपनाएं, हिन्दू धर्मग्रंथों को पवित्र मानें और हिन्दू देवी-देवताओं की आराधना करें। अतः यह मानना एक भूल होगी कि सभी भारतीय हिन्दू हैं, यह कहकर भागवत किसी उदारता का परिचय दे रहे हैं। वे तो हिन्दू पहचान को धार्मिक अल्पसंख्यकों पर लादना चाहते हैं। हिन्दू सारे भारतीयों की पहचान न थी, न है और न हो सकती है। वह केवल हिन्दुओं की धार्मिक पहचान है और ‘हिन्दू‘ कोई राष्ट्रीयता नहीं है। हम सबकी राष्ट्रीयता भारतीय है और हमारी अलग-अलग धार्मिक पहचानें हैं।

 -राम पुनियानी

इस्लाम को कलंकित करने वाला फरमान



ऐसा लगता है कि आजकल इस्लाम को बदनाम करने का ठेका स़िर्फ मुसलमानों ने ले रखा है. न स़िर्फ दुनिया के तमाम देशों, बल्कि भारत से भी अक्सर ऐसे समाचार मिलते रहते हैं, जिनसे इस्लाम बदनाम होता है और मुसलमानों का सिर नीचा होता है. कभी बेतुके फतवे इस्लामी तौहीन का कारण बनते हैं तो कभी तालिबानी पंचायती फरमान. पिछले दिनों ऐसी ही एक शर्मनाक ख़बर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर ज़िले से मिली, जिसके अनुसार, वहां के सलेमपुर की एक मुस्लिम पंचायत ने गांव के एक बुज़ुर्ग दंपत्ति का सामाजिक बहिष्कार करने की घोषणा की है. बताया जाता है कि लगभग 1000 की मुस्लिम आबादी वाले इस गांव में मोइनुद्दीन एवं मरियम नामक एक ग़रीब बुज़र्ग दंपत्ति अपने झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में रहते हैं और टॉफी, नमक एवं बिस्कुट जैसी सस्ती चीज़ें बेचकर जीवनयापन करते हैं. इनकी ग़रीबी का आलम यह है कि ये अपने चंद मवेशियों के लिए घास-चारा और ईंधन के लिए लकड़ी आदि दूरदराज़ के खेतों से इकट्ठा करते हैं. इनके रहन-सहन से ही इनकी आर्थिक हैसियत का आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
इसी गांव के मुसलमानों ने अपनी एक मुस्लिम पंचायत अर्थात अंजुमन बना रखी है. गांव में एक मदरसा निर्माणाधीन है, जिसके लिए स्थानीय एवं बाहरी लोगों से चंदा इकट्ठा किया जा रहा है. अंजुमन द्वारा मोइनुद्दीन एवं मरियम से भी मदरसे के चंदे के रूप में पांच सौ रुपये की मांग की गई. इस ग़रीब दंपत्ति ने अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र चंदा देने में असमर्थता व्यक्त कर दी. बस फिर क्या था, मोइनुद्दीन तो इस पंचायत की नज़र में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया. अंजुमन ने मोइनुद्दीन के सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की घोषणा कर दी. उसकी ख़स्ताहाल झोपड़ी के बाहर एक बोर्ड लगा दिया गया कि गांव का कोई भी व्यक्ति मोइनुद्दीन की दुकान से कोई सामान नहीं ख़रीदेगा, कोई उससे किसी प्रकार का बर्ताव, व्यवहार एवं वास्ता नहीं रखेगा. यदि किसी ने अंजुमन के आदेश का उल्लंघन किया तो उसे 500 रुपये बतौर ज़ुर्माना अदा करने होंगे. तालिबानी फरमान का अंत यहीं नहीं हुआ, बल्कि इन तथाकथित इस्लामी ठेकेदारों ने इस दंपत्ति को अपने खेतों में शौच के लिए जाने पर भी पाबंदी लगा दी. यह आदेश भी जारी कर दिया गया कि मरणोपरांत इस परिवार के किसी व्यक्ति को स्थानीय क़ब्रिस्तान में दफन भी नहीं किया जाएगा. पंचायत के फरमान के बाद इस परिवार को अपनी दो व़क्त की रोटी जुटा पाने में भी दिक्कत पेश आ रही है. गांव की मुस्लिम पंचायत इसकी बदहाली और भुखमरी पर स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रही है, वहीं दूसरी तऱफ पड़ोस के एक गांव का सिख परिवार मानवता का प्रदर्शन करते हुए इसे दो व़क्त की रोटी मुहैया करा रहा है.
यह तो था इन तथाकथित इस्लामपरस्तों का तालिबानी फरमान, जो इन्होंने यह सोचकर जारी किया कि शायद ये तुगलकी सोच वाले मुसलमान इस्लाम पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं, परंतु आइए देखें कि इस्लाम दरअसल इन हालात में क्या सीख देता है. मैं अपने बचपन से कुछ इस्लामी शिक्षाएं वास्तविक इस्लामी दानिश्वरों से सुनता आया हूं. ऐसी ही एक इस्लामी तालीम थी कि पहले घर में चिराग़ जलाओ, फिर मस्जिद में. इस कहावत का अर्थ क्या है? यही न कि अपनी पारिवारिक ज़रूरतों से अगर पैसे बचें तो फिर अपने ख़ुदा की राह में ख़र्च करें. यह तो क़तई नहीं कि आप ख़ुद या आपके पड़ोसी भूखे रहें और आप मस्जिद या मदरसे के निर्माण कार्य के लिए चंदा देते फिरें. जो लोग इस्लाम में वाजिब कहे जाने वाले हज के नियम से वाक़ि़फ हैं, वह यह भलीभांति जानते हैं कि अगर आप क़र्ज़दार हैं और हज कर रहे हैं, तो वह भी जायज़ नहीं है. यहां तक कि अगर आप पर अपने बेटों एवं बेटियों की शादी का ज़िम्मा बाक़ी है तो पहले इन पारिवारिक ज़रूरतों को पूरा करने के बाद ही हज किया जा सकता है. अगर आप आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं तो फिर कभी भी हज कर सकते हैं. इसी तरह लगभग सभी इस्लामी कार्यकलापों के लिए यह बताया गया है कि हमेशा चादर के भीतर ही पैर फैलाना है. यहां तक कि फिज़ूलख़र्ची को भी इस्लाम में गुनाह क़रार दिया गया है. अपने को आर्थिक परेशानी में डालकर धर्म पर पैसे ख़र्च करना इस्लाम हरगिज़ नहीं सिखाता. मगर तालिबानी सोच रखने वाले कुछ मुसलमानों ने अपने गढ़े हुए इस्लाम के अंतर्गत फरमान जारी करके दो ग़रीब मुसलमानों को रोजी-रोटी से वंचित कर दिया. वहीं एक सिख परिवार वास्तविक मानवीय इस्लामी एवं सिख धर्म की शिक्षाओं का पालन करते हुए इन्हें दो व़क्त की रोटी मुहैया कराता रहा. क्या यही है इन तालिबानों का इस्लाम? क्या ऐसे फरमान इस्लाम धर्म की वास्तविक शिक्षाओं के अंतर्गत जारी किए जाने वाले फरमान कहे जा सकते हैं?
यह ग़ैर इस्लामी फरमान जारी करने के बाद पंचायत के प्रमुख का कहना था कि यह परिवार नमाज़ नहीं पढ़ता, हमारे चंदे में, ख़ुशी और गम में, हमारे धार्मिक कामों में शरीक नहीं होता, लिहाज़ा गांव के लोग इससे अपना वास्ता क्यों रखें? सवाल यह है कि मान लिया जाए कि वह परिवार यदि किसी धार्मिक आयोजन या नमाज़-रोज़े में उनके साथ शरीक नहीं होता तो भी किसी को इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि वह ज़ोर-ज़बरदस्ती करके उसके विरुद्ध कोई ऐसा फरमान जारी करे. किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों में शिरकत करना या न करना किसी भी व्यक्ति का अति व्यक्तिगत मामला है. यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कार्यकलापों में हिस्सा लेता है तो वह उसके पुण्य का भागीदार होगा. इसी प्रकार शरीक न होने अथवा नमाज़ आदि अदा न करने पर पाप का भागीदार भी स़िर्फ वही होगा. धर्म प्रचारक या मुल्ला-मौलवी उसे अपनी बात प्यार-मोहब्बत से समझा सकते हैं, लेकिन उसका सामाजिक बहिष्कार करना, उसे आर्थिक संकट में डालना या उसके विरुद्ध कोई तालिबानी फरमान जारी करना पूरी तरह ग़ैर इस्लामी, ग़ैर इंसानी और अधार्मिक है.
दरअसल आज ऐसे तालिबानी सोच रखने वाले मुसलमानों एवं कठमुल्लाओं ने इस्लाम धर्म को बदनाम कर दिया है. चाहे वह अ़फग़ानिस्तान के बामियान प्रांत में महात्मा बुद्ध जैसे विश्व शांति के दूत समझे जाने वाले महापुरुष की मूर्ति को तोप के गोलों से ध्वस्त करने जैसी कायरतापूर्ण कार्रवाई हो या पाकिस्तान में मस्जिदों, दरगाहों एवं धार्मिक जुलूसों में शिरकत करने वाले शांतिप्रिय लोगों की बड़ी संख्या में जान लेना या भारत में कभी बेतुके फतवे जारी करना, सलेमपुर गांव जैसा फरमान सुनाया जाना आदि कृत्य शर्मनाक, इस्लाम विरोधी और मानवता विरोधी ही नहीं, बल्कि इस्लाम धर्म की प्रतिष्ठा पर धब्बा लगाने वाले भी हैं. यह कैसी विडंबना है कि उस गांव के तथाकथित मुसलमान एक मुस्लिम परिवार को भूखा-परेशान देखकर ख़ुश हो रहे हैं, जबकि एक सिख परिवार उस परेशानहाल मुस्लिम परिवार की भूख और परेशानियां सहन नहीं कर पा रहा और यथासंभव मदद कर रहा है. क्या संदेश देती हैं हमें ऐसी घटनाएं? क्या ऐसे फरमानों से इस्लाम का नाम रोशन हो रहा है? यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जिस मदरसे की बुनियाद में ऐसे तालिबानी फरमान शामिल हों, उन मदरसों से भविष्य में निकलने वाले बच्चों की मज़हबी तालीम क्या हो सकती है और आगे चलकर वही तालीम क्या गुल खिलाएगी, इस बात का बड़ी सहजता से अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इन कट्टरपंथी तालिबानी सोच के मुसलमानों को उस सिख परिवार से प्रेरणा लेनी चाहिए, जो उनके द्वारा भुखमरी की कगार पर पहुंचाए गए मुस्लिम परिवार को रोटी मुहैया करा रहा है. आज भी देश में हज़ारों ऐसी मिसालें मिलेंगी, जिनमें हिंदू, मुस्लिम एवं सिख समुदाय के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. कहीं हिंदू नमाज़ पढ़ते हैं, कहीं रोज़ा रखते हैं, कहीं मोहर्रम में ताज़ियादारी करते हैं तो कहीं पीरों-फकीरों की दरगाहों की मुहा़फिज़त करते हैं. इन ग़ैर मुस्लिमों का इस्लामी गतिविधियों की ओर झुकाव की वजह स़िर्फ उदारवादी इस्लामी शिक्षाएं हैं, न कि कट्टरपंथी तालिबानी फरमान.
सलेमपुर की घटना से एक बात और ज़ाहिर होती है कि जब इन मुसलमानों का रवैया अपने ही समुदाय के एक परिवार के साथ ऐसा है तो फिर दूसरे समुदाय के प्रति इनसे प्रेम-सद्भाव से पेश आने की उम्मीद कैसी की जा सकती है. प्रभावित परिवार आज इस स्थिति में पहुंच गया है कि बुज़ुर्ग महिला मरियम ने यहां तक कह दिया कि अब हम इनके आगे न झुक सकते हैं, न कुछ मांग सकते हैं, बल्कि हमें ग़ैर मुस्लिमों के आगे झुकने और उनसे मांगने में कोई हर्ज नहीं है. कितना बेहतर होता, यदि यही पंचायत अथवा अंजुमन ग़रीबों को आत्मनिर्भर बनाने, उनकी रोज़ी-रोटी और शिक्षा आदि सुनिश्चित करने को तवज्जो देती. बजाय इसके वह लोगों से ज़ोर-ज़बरदस्ती करके चंदा वसूलने और न देने पर उनका सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार करने जैसा अधार्मिक कृत्य अंजाम दे रही है. ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे अज्ञानी कठमुल्लाओं से इस्लाम धर्म को कलंकित होने से बचाया जाए. क्या ऐसे तुगलकी और तालिबानी फरमान ग़ैर मुस्लिमों को अपनी ओर आकर्षित कर सकेंगे, जिनसे मुस्लिम समुदाय का ही कोई परिवार रुसवा और बेज़ार हो जाए. जो इस्लाम सभी धर्मों एवं समुदायों, यहां तक कि पेड़-पौधों के साथ भी मानवता और सद्भाव से पेश आने की बात करता हो, वह किसी को भूखे रहने के लिए मजबूर करने की तालीम कैसे दे सकता है. इस्लाम में सूदखोरी हराम क्यों क़रार दी गई है? इसीलिए कि किसी व्यक्ति पर नाजायज़ आर्थिक बोझ न पड़े. इस्लाम में दिनोंदिन बढ़ती जा रही ऐसे लोगों की घुसपैठ रोकनी होगी. ऐसे फरमान जारी करने वालों के ख़िला़फ भी सख्त कार्रवाई किए जाने की ज़रूरत है, जैसा सलेमपुर के उस ग़रीब दंपत्ति के साथ वहां की अंजुमन ने किया. यह ग़ैर इस्लामी और अमानवीय है, इसकी जितनी भी घोर निंदा की जाए, कम है.
तनवीर जाफरी

Saturday, November 10, 2012

दंगों में कौन मरता है, कौन उन्हें शुरू करता है...??



विभूति नारायण राय ने अपने एक लेख “दंगों में कौन मरता है, कौन उन्हें शुरू करता है” में स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि साम्प्रदायिक दंगों के बारे में सोचते समय भारत में बहुसंख्यक समुदाय से तथ्यों को ओझल रखा जाता हैं और ऐसा करने वालों का मन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहता है। आम हिन्दू यह मान कर चलता है कि दंगों की शुरूआत मुसलमान करतें हैं और उनमें मरने वालों में ज्यादा हिन्दू होतें हैं। पर दंगों की शुरूआत के बारे में बहस की गुंजायश है। लेकिन मरने वालों की तादाद के बारे में तो कतई नहीं। आमतौर पर मरने वालों में न सिर्फ मुसलमानों की संख्या लगभग हर दंगे में ज्यादा होती है। बल्कि आधे से ज्यादा दंगों में तो यह संख्या 90 प्रतिशत से भी अधिक होती है।
दंगों की शुरूआत कौन करता है। इस मुद्दे पर बात करने के पहले यदि हम मरने वालों की संख्या की पडताल करना उचित होगा। 1960 के बाद हमारे देश में जो साम्प्रदायिक दंगे हुयें हैं। उनका चरित्र सन् 1947 के आसपास हुए विभाजन से सम्बन्धित दंगों के चरित्र से भिन्न हैं। 1960 तक विभाजन से उत्पन्न कारण लगभग समाप्त हो चुके थे और तत्कालीन पूर्वी एंव पश्चिम पाकिस्तान से भागकर आने वाले हिन्दुओं के मुंह से सुनी हुई ज्यादतियों की प्रतिक्रिया में होने वाले कुछ दंगों को छोड दें। तो लगभग अधिकतर दंगों के कारण विभाजन की स्मृति से एकदम परे हटकर रहे हैं। विभाजन के फौरन बाद क्षीण हुये मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों के पुनर्संगठित होने और राजनीतिक हितों के लिये दंगे कराने की बढती प्रवृत्ति के कारण अधिकतर दंगे हुए हैं।
यदि सरकारी आंकडों का विशलेण किया जाए तो यह प्रकट होता है कि सभी दंगों में मारे गये लोगों में तीन चौथाई मुसलमान होतें हैं। नष्ट हुई सम्पति में भी लगभग 75 प्रतिशत से अधिक मुसलमानों की होती है। यही नहीं, दंगों के लिये गिरफ्तार किये जाने वाले लोगों में भी मुसलमानों की ही संख्या ज्यादा होती है। यदि हम बडे-बडे पांच-छः दंगों में मारे गए लोगों की संख्या की पडताल करें। तो सारी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है।
1960 के बाद का सबसे बडा दंगा अहमदाबाद में हुआ। राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति जगमोहन रेड्डी वाले जाँच आयोग ने अहमदाबाद के दंगों के बारे में जो आंकडे दिये। उनके मुताबिक इस दंगे में 6742 मकान और दुकान जलाई गयीं। इनमें सिर्फ 671 हिन्दुओं की थीं बाकी 6071 मुसलमानों की नष्ट हुई। कुल सम्पत्ति का मूल्य 42324068 रुपये था। जिसमें हिन्दू सम्पत्ति 7585845 रु. की थी और मुस्लिम सम्पत्ति 34738224 रुपये की। 512 मृतकों में 24 हिन्दू थे और 413 मुसलमान । बाकी 75 की शिनाख्त नहीं हो सकी थी।
इसके बाद का सबसे बडा दंगा 1970 में भिवंडी में हुआ। इसमें 78 लोग मारे गये। इनमें 17 हिन्दू थे और 59 मुसलमान। बाकी दो की शिनाख्त नहीं हो सकी। भिवंडी दंगे की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति डी. वी. मेडन जांच आयोग के सामने जो बयान दिये गये। उनसे यह प्रकट हुआ कि इस दंगे में 6 मुसलमान औरतों के साथ बलात्कार हुआ। जबकि एक भी हिन्दू औरत बलात्कार की शिकार नहीं हुई। भिवंडी के दंगों के परिणामस्वरूप हुये जलगांव के दंगे में 43 लोग मारे गये, जिनमें एक हिन्दू और बाकी के 42 मुसलमान। नष्ट हुयी कुल सम्पत्ति में 3390977 रुपये मूल्य की सम्पत्ति मुसलमानों की थी और सिर्फ 83725 रुपये मूल्य की हिन्दुओं की।
1967 में रांची-हटिया और नौशेरा में हुये दंगों में मृतकों की कुल संख्या 184 थी। जिनमें 164 मुसलमान और तो 19 हिन्दू, एक की शिनाख्त नहीं हो सकी। जिन दंगों का ऊपर जिक्र आया है, वे 1960 के बाद के भारत के भयंकरतम दंगों में हैं। इसके अलावा जमशेदपुर, अलीगढ, वाराणसी और बंबई जैसे शहरों में भी दंगे हुयें हैं। इन दंगों में भी कमोबेश उपर वाली स्थिति ही रही। शायद ही कोई ऐसा दंगा हुआ होगा, जिसमें मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान न रहें हों। नष्ट हुई सम्पत्ति में भी लगभग यही अनुपात रहा।
सबसे ज्यादा अजीब बात यह है कि लगभग हर दंगे में पुलिस के हाथों गिरफ्तार होने वालों में भी मुसलमानों की ही संख्या अधिक रहती है. मुसलमानों के ही अधिक घरों की तलाशियां भी होतीं हैं। पुलिस भी बहुसंख्यक समुदाय की तरह यह सोचती है कि दंगों के लिये जिम्मेदार मुसलमान हैं। लिहाजा वह यह मानती प्रतीत होती है कि दंगों पर तभी नियंत्रण पाया जा सकता है जब मुसलमानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाएगी। लेकिन इसके बावजूद बहुसंख्यक समुदाय की यह धारणा, कि दंगों में मरने वालों में अधिकतर हिन्दू होतें हैं।
यह धारणा इतनी गहरी है कि तमाम सरकारी आंकडों के बावजूद आम हिन्दू इस बात को नहीं मानता कि वास्तव में दंगों में हिन्दू ज्यादा आक्रामक होतें हैं। इसको न मानने की बात को अगर गहराई से देखा जाय तो पता चलेगा कि इसके पीछे बचपन की वो धारणाएं काम करतीं हैं। जो बचपन से हर हिन्दू घर में बच्चे को यह सिखाया जाता है कि मुसलमान क्रूर होतें हैं और वे किसी की भी जान लेने में नहीं हिचकते। इसके विपरीत हिन्दू तो बडे क़ोमल हृदय का होता है और उसके लिये चींटी की भी जान लेना मुश्किल होता है।
अक्सर आम हिन्दू आपको यह कहते हुए मिलेगा कि अरे साहब ! हिन्दू घर में तो आपको सब्जी काटने की छूरी के अलावा कोई हथियार नहीं मिलेगा। आम हिन्दू का मानना है। कि आमतौर पर मुसलमान अपने घरों में हथियारों का जखीरा रखतें हैं। यही वजह है कि आम हिन्दू को दंगों में मरने वालों के सरकारी आंकडे भी अविश्वसनीय लगतें हैं। दूसरी ओर कोई भी सरकार आंकडों को इस ढंग से पेश करना नही चाहेगी। जिससे आम लोगों के बीच मे यह धारणा बने कि देश में अल्पसंख्यक असुरक्षित है।

Monday, November 05, 2012

विशेष राज्य के दर्जे की लड़ाई नहीं, जनता को मुद्दे से भटकना है नीतीश बाबू


"

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए,
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए..."
दुष्यंत सिर्फ ये चंद पंक्तियाँ लिख कर लोगों के जहन में बदलाव की आग जला गए, पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इतनी भव्य रैली का आयोजन कर भी सिर्फ हंगामा खड़ा करने में कामयाब हो सके. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले ये हम सभी चाहते हैं, लेकिन क्या सिर्फ हंगामा खड़ा कर इस मकसद को पाया जा सकता है. नहीं.... कदापि नहीं.
नीतीश इसे मुद्दा बना राजनीति कर रहे हैं. कहीं ये तीर निशाने पर लग जाए और आगामी चुनाव में फिर एक बड़ी जीत. नीतीश बताएंगे कि अधिकार रैली के नाम पर कितने पैसे पार्टी फंड में जमा हुए. एक उदाहरण देता हूँ, मुज़फ्फ़रपुर सेन्ट्रल जेल में सजा काट रहे जेडीयू के पूर्व बाहुबली विधायक मुन्ना शुक्ला अधिकार रैली के लिए पार्टी को चंदा देने के एवज में वैशाली जिले के एक निजी कॉलेज संचालक से सात करोड़ की रंगदारी मांगी. शुरूआती जांच में इसे सही पाया गया. इसकी पुष्टि खुद एडीजी गुप्तेश्वर पाण्डेय कर चुके हैं. ऐसे कई उदाहरण हैं कि किस तरह से अरबों रूपए पार्टी फंड में चुनावी तैयारी के लिए जमा किये गए. इस चक्कर एक बड़ा सच सामने आ गया. सुशासन की पोल खुल गई. फंड के नाम पर जिस तरह से धन की उगाही हुई ये आम आदमी की नींद हराम करने के लिए काफी है. ये लालू राज के उस वाकये की याद दिलाता है जब लाठी रैली के लिए सुभाष और साधू यादव के गुंडे शोरुम से नई गाड़ियाँ और व्यापारियों से रंगदारी मांग नया चलन शुरू किया था. 
रैली को सफल बनाने के लिए पार्टी की तरफ से नौ विशेष रेलगाड़ियों को किराए पर लिया गया था. साथ ही सैकड़ों बसों के ज़रिए लोगों को रैली में लाने और वापस भेजने की मुफ्त सुविधा उपलब्ध भी कराई गई थी. बड़े-बड़े होर्डिंग, बैनर और पोस्टर से पटना शहर के तमाम प्रमुख हिस्सों को इस क़दर पाट दिया गया था, जैसे दल को अवैध अतिक्रमण की खुली छूट प्राप्त हो. इतना ही नहीं, रैली में आने वालों के मनोरंजन के लिए जदयू विधायकों और दल से जुड़े मंत्रियों के सरकारी आवासों पर नाच-गाने की भी पुख्ता व्यवस्था थी.
दरअसल ये विशेष राज्य के दर्जे की लड़ाई नहीं, पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश भर है. इस रैली का मकसद कार्यकर्ता में जोश भरना, एक जुट करना और विपक्ष को उसकी औकात बताना है. भीड़ जमा करें, पैसे जमा करें यही टास्क विधायकों, जिला अध्यक्षों और संगठन के कर्ताधर्ता को दिया गया था. मुर्गा, मछली और मटन बिरियानी का भोज, मुफ्त की पिकनिक, सैर सपाटा.. ऐसी ही सोच वाले लोग जमा हुए थे अधिकार रैली में. जिन्हें ये नहीं पता कि हमारे देश के प्रधानमंत्री कौन हैं, जो ये नहीं जानते कि बिहार के मुख्यमंत्री कौन हैं. जिन्हें ये नहीं पता कि बिहार देश है या राज्य या जिला. ऐसे ही लोग आते हैं इस रैली में. भीड़ में शामिल 70 फीसदी लोग ये नहीं जानते कि वो पटना क्या करने आये हैं. उन्हें नहीं पता क्या होता है विशेष राज्य. ये ऐसे ही लोग हैं जो नादानी में पैसे लेकर वोट देते हैं. जो डर या किसी दवाब में आ कर वोट देते हैं. इनकी अपनी सोच नहीं होती. ऐसे लोग इशारों पर चलते हैं. फिर नीतीश किस मकसद को पूरा करने के लिए ऐसी भीड़ जमा करते हैं.  
ये सत्ता का दंभ है. नीतीश ये दिखाना चाहते हैं कि मेरे एक इशारे पर क्या हो सकता है. वो ये साबित करना चाहते हैं कि विशेष राज्य के मुद्दे पर वो चुनाव जीत सकते हैं, या जो बड़ी पार्टी बिहार को ये तमगा देगी राज्य में जीत उसी की होगी. लेकिन ये महज एक चुनावी हथकंडा भर है. राजनीतिक रूप से बिहार को विशेष दर्जा मिल भी सकता है लेकिन तकनीकी रूप से शायद कभी नहीं. क्यूंकि राज्य इसके लिए जरूरी नियम फुलफील नहीं करता है.  
न्यूज़ चैनलों पर लाइव कवरेज, अख़बारों की अघोषित सहमती, इंटरनेट पर टेलीकास्ट... ये सब इतनी खूबसूरती से मैनेज किया गया था कि कोई भी साधारण सोच का आदमी नीतीश कुमार के झांसे में आ जायेगा. ये त्रासदी भी है कि लोग अक्सर ऐसी बात के लिए भीड़ बन जाते हैं जो शायद मुमकिन नहीं है.
अगर ऐसी रैली नीतीश शिक्षा में जागरूकता फ़ैलाने के लिए करते या महिलाओं के उत्थान के लिए करते. गांव गांव से लोगों को बुलाते, भीड़ जमा करते और शिक्षा की अहमियत को समझाते तो कोई बात होती. तब लगता सुशासन बाबू अपना काम कर रहे हैं. पर ऐसी बेतुका बातों के लिए अनपढ़, कमअक्ल, निर्दोष ग्रामीणों का नैतिक शोषण करना निहायत ही ओछी राजनीति है. अधिकार रैली शुद्ध रूप से राजनीतिक आयोजन है. इससे किसी भी रूप से विकास की खुशबू नहीं आती. केवल सत्ता में टिके रहने जैसी लालच की बू आती है. पैसे बनाने की बू आती है. धिक्कार है ऐसी रैली पर जिसका मकसद ही झूठा है.
ऐसी रैलियों में ताली इशारों पर बजती हैं. मंच पर जगह पाने के लिए नेताओं की आपस में लड़ाई होती है. भीड़ में हंगामा होता है. भाषण देने के लिए बड़े छोटे नेताओं में होड़ लगी रहती है. फिर कैसे ऐसी रैली से बिहार की आवाज़ को मजबूती मिलेगी. सत्तासीन दल के इस भव्य रैली का एक बड़ा मकसद है बड़ी पार्टियों को प्रभाव में लेना. ताकि वो इस मुद्दे को अपनी चुनावी घोषणा पत्र में जगह दे. उन्हें ये एहसास दिलाना कि इस सहमती के बगैर आप चुनाव नहीं जीत सकते. लेकिन नीतीश को ये याद रखना चाहिए कि बिहार में मुद्दे की नहीं जाति की राजनीति होती है. इसलिए इस आयोजन का बड़ी पार्टियों पर कोई असर होगा मुश्किल लगता है. नीतीश का दूसरा मकसद, जनता को उसके मुद्दे से भटका कर नकली सोच देना है. पर वो भूल रहे है कि ऐसे आयोजन का असर सिर्फ 24 घंटे ही रहता है. लोग ऐसी बातें जल्दी भूल जाते हैं. रोटी खाते वक़्त, सड़क पर चलते वक़्त और ढिबरी की रौशनी में पढाई करते वक़्त सरकार की खूबी और खामी समझ आती है. और यही वो चीज़ है जो रोज 24/7 लोग याद करते हैं.

Saturday, November 03, 2012

काजी या जिस्म के सौदे का दलाल....!



हैदराबाद: कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की आड़ में होता है जिस्म का सौदा
हैदराबाद। एक ऐसे बाजार में जहां इंसानी मूल्य और मासूमियत बिकती है। शादी के पवित्र बंधन के नाम पर गरीब लड़कियों को फांसा जाता है, उनकी अस्मत और सपनों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। ये एक ऐसा बाजार है जिसमें अमीरों की खातिर 6-8 महीने के लिए बीवियां पैदा की जा रही हैं। निकाह करवाया जाता है और उसी वक्त धोखे से तलाकनामा भी तैयार हो जाता है। लड़कियों को भनक तक नहीं लगती कि कॉन्ट्रैक्ट मैरिज के नाम से ये रिश्ता सिर्फ उनके जिस्म के इस्तेमाल के लिए बन रहा है, दरअसल ये निकाह नहीं है बल्कि नर्क है।

निजाम के जमाने में अपनी शान-शौकत और तहजीब के लिए मशहूर पुराना हैदराबाद। एक अरसे से अरब के शेखों की आरामगाह के बतौर बदनाम हैदराबाद जहां शेख आते और ग़ुरबत में जीती नाबालिग लड़कियों को साथ ले जाते, कानून ने सख्ती की, तो शेखों के दौरे घटने लगे, लेकिन पैदा हो गए नए दलाल, शिकार वही था। सिर्फ जाल बदल गया। पाक रिश्तों पर मोहर लगाने वाला शब्द ‘निकाह’ यानि शादी का कानूनन तरीका, लेकिन उसे इस मंडी ने नया नाम दिया ‘कॉन्ट्रेक्ट मैरिज’ यानि ग्राहकों की जरूरत और मर्जी तक चलने वाली शादी।

खास बात ये कि अपनी जिंदगी के सुनहरे तार बुन रही कुंवारी लड़की को अक्सर भनक तक नहीं लगती कि कुछ महीने या शायद साल तक बेगम बनने के बाद उसे तलाक देकर गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया जाएगा।
ये हकीकत नर्क से भी बदतर है, जहां गढ़े जाते हैं, बुने जाते हैं कागजी निकाह और निकाह के कानूनी रास्ते से पेश किए जाते हैं सेक्स स्लेव। पुराने हैदराबाद इलाके में काजी मोहम्मद अजमतुल्लाह शाह सूफी जाफरी मिले। उनको हमने मकसद बताया तो उन्होंने फौरन कॉन्ट्रेक्ट मैरिज के लिए हामी भर दी। काजी के मुताबिक वो शादी करवा देगा। काजी के राजी होते ही जब लड़कियों और उनके घर वालों से मिलने की इच्छा जताई गई तो वो इसके लिए भी तैयार हो गया।
जब कॉन्ट्रेक्ट मैरिज पर आने वाले खर्च की बात की तो काजी ने धंधे का रिवाज बताया। काजी ने मेहर की रकम की बात बताई। अनमैरिड बच्ची रही तो 4 लाख- 5 लाख। काजी ने बताया कि असल में घरवालों को कभी पता नहीं चलता कि उनकी बेटी की शादी सिर्फ 6 से 8 महीने की मेहमान है यही नहीं तलाक के बाद भी उन्हें ये कभी पता नहीं चलेगा। इसका इंतजाम किया जाता है। इसके बाद काजी ने लड़कियों की रेटलिस्ट पेश की।
काजी ने बताया कि अनमैरिड के लिए 5 लाख, अगर शादीशुदा हो तो रेट 3 लाख हो जाएगा। बच्चे वाली एक लाख में मिल जाएगी। फिर उसी शाम काजी ने पुराने हैदराबाद के एक घर में बुलाया। 9 मासूम लड़कियों की नुमाइश की गई। ये इस मंडी का सबसे खौफनाक पल था-मंडी में बिक रही थीं वो लड़कियां जिन्हें ये तक पता नहीं था कि निकाह के कुछ वक्त बाद उन्हें दूध की मख्खी की तरह निकाल फेंका जाएगा। दलाल उन्हें लेकर आया था। हमने कोई भी लड़की पसंद न आने का बहाना बनाया ताकि हम इस मंडी से बाहर निकल कर खुली हवा में सांस ले सकें। दलालों ने एक और लड़की दिखाने की बात कही और दावा किया कि वो हमें जरूर पसंद आएगी। हम उससे भी मिले और जल्द जवाब देने की बात कह कर बाहर निकल गए।
काजी ने हमारे सामने करीब 10 लड़कियों की नुमाइश कराई। मगर हमारे कहने के बावजूद किसी भी लड़की के घरवालों से नहीं मिलवाया। काजी ने कहा कि घरवालों को बस ये बताया जाता है की उनकी लाडली का ब्याह मुल्क से बाहर करवाया जा रहा है।