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Monday, November 12, 2012

इस्लाम को कलंकित करने वाला फरमान



ऐसा लगता है कि आजकल इस्लाम को बदनाम करने का ठेका स़िर्फ मुसलमानों ने ले रखा है. न स़िर्फ दुनिया के तमाम देशों, बल्कि भारत से भी अक्सर ऐसे समाचार मिलते रहते हैं, जिनसे इस्लाम बदनाम होता है और मुसलमानों का सिर नीचा होता है. कभी बेतुके फतवे इस्लामी तौहीन का कारण बनते हैं तो कभी तालिबानी पंचायती फरमान. पिछले दिनों ऐसी ही एक शर्मनाक ख़बर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर ज़िले से मिली, जिसके अनुसार, वहां के सलेमपुर की एक मुस्लिम पंचायत ने गांव के एक बुज़ुर्ग दंपत्ति का सामाजिक बहिष्कार करने की घोषणा की है. बताया जाता है कि लगभग 1000 की मुस्लिम आबादी वाले इस गांव में मोइनुद्दीन एवं मरियम नामक एक ग़रीब बुज़र्ग दंपत्ति अपने झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में रहते हैं और टॉफी, नमक एवं बिस्कुट जैसी सस्ती चीज़ें बेचकर जीवनयापन करते हैं. इनकी ग़रीबी का आलम यह है कि ये अपने चंद मवेशियों के लिए घास-चारा और ईंधन के लिए लकड़ी आदि दूरदराज़ के खेतों से इकट्ठा करते हैं. इनके रहन-सहन से ही इनकी आर्थिक हैसियत का आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
इसी गांव के मुसलमानों ने अपनी एक मुस्लिम पंचायत अर्थात अंजुमन बना रखी है. गांव में एक मदरसा निर्माणाधीन है, जिसके लिए स्थानीय एवं बाहरी लोगों से चंदा इकट्ठा किया जा रहा है. अंजुमन द्वारा मोइनुद्दीन एवं मरियम से भी मदरसे के चंदे के रूप में पांच सौ रुपये की मांग की गई. इस ग़रीब दंपत्ति ने अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र चंदा देने में असमर्थता व्यक्त कर दी. बस फिर क्या था, मोइनुद्दीन तो इस पंचायत की नज़र में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया. अंजुमन ने मोइनुद्दीन के सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की घोषणा कर दी. उसकी ख़स्ताहाल झोपड़ी के बाहर एक बोर्ड लगा दिया गया कि गांव का कोई भी व्यक्ति मोइनुद्दीन की दुकान से कोई सामान नहीं ख़रीदेगा, कोई उससे किसी प्रकार का बर्ताव, व्यवहार एवं वास्ता नहीं रखेगा. यदि किसी ने अंजुमन के आदेश का उल्लंघन किया तो उसे 500 रुपये बतौर ज़ुर्माना अदा करने होंगे. तालिबानी फरमान का अंत यहीं नहीं हुआ, बल्कि इन तथाकथित इस्लामी ठेकेदारों ने इस दंपत्ति को अपने खेतों में शौच के लिए जाने पर भी पाबंदी लगा दी. यह आदेश भी जारी कर दिया गया कि मरणोपरांत इस परिवार के किसी व्यक्ति को स्थानीय क़ब्रिस्तान में दफन भी नहीं किया जाएगा. पंचायत के फरमान के बाद इस परिवार को अपनी दो व़क्त की रोटी जुटा पाने में भी दिक्कत पेश आ रही है. गांव की मुस्लिम पंचायत इसकी बदहाली और भुखमरी पर स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रही है, वहीं दूसरी तऱफ पड़ोस के एक गांव का सिख परिवार मानवता का प्रदर्शन करते हुए इसे दो व़क्त की रोटी मुहैया करा रहा है.
यह तो था इन तथाकथित इस्लामपरस्तों का तालिबानी फरमान, जो इन्होंने यह सोचकर जारी किया कि शायद ये तुगलकी सोच वाले मुसलमान इस्लाम पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं, परंतु आइए देखें कि इस्लाम दरअसल इन हालात में क्या सीख देता है. मैं अपने बचपन से कुछ इस्लामी शिक्षाएं वास्तविक इस्लामी दानिश्वरों से सुनता आया हूं. ऐसी ही एक इस्लामी तालीम थी कि पहले घर में चिराग़ जलाओ, फिर मस्जिद में. इस कहावत का अर्थ क्या है? यही न कि अपनी पारिवारिक ज़रूरतों से अगर पैसे बचें तो फिर अपने ख़ुदा की राह में ख़र्च करें. यह तो क़तई नहीं कि आप ख़ुद या आपके पड़ोसी भूखे रहें और आप मस्जिद या मदरसे के निर्माण कार्य के लिए चंदा देते फिरें. जो लोग इस्लाम में वाजिब कहे जाने वाले हज के नियम से वाक़ि़फ हैं, वह यह भलीभांति जानते हैं कि अगर आप क़र्ज़दार हैं और हज कर रहे हैं, तो वह भी जायज़ नहीं है. यहां तक कि अगर आप पर अपने बेटों एवं बेटियों की शादी का ज़िम्मा बाक़ी है तो पहले इन पारिवारिक ज़रूरतों को पूरा करने के बाद ही हज किया जा सकता है. अगर आप आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं तो फिर कभी भी हज कर सकते हैं. इसी तरह लगभग सभी इस्लामी कार्यकलापों के लिए यह बताया गया है कि हमेशा चादर के भीतर ही पैर फैलाना है. यहां तक कि फिज़ूलख़र्ची को भी इस्लाम में गुनाह क़रार दिया गया है. अपने को आर्थिक परेशानी में डालकर धर्म पर पैसे ख़र्च करना इस्लाम हरगिज़ नहीं सिखाता. मगर तालिबानी सोच रखने वाले कुछ मुसलमानों ने अपने गढ़े हुए इस्लाम के अंतर्गत फरमान जारी करके दो ग़रीब मुसलमानों को रोजी-रोटी से वंचित कर दिया. वहीं एक सिख परिवार वास्तविक मानवीय इस्लामी एवं सिख धर्म की शिक्षाओं का पालन करते हुए इन्हें दो व़क्त की रोटी मुहैया कराता रहा. क्या यही है इन तालिबानों का इस्लाम? क्या ऐसे फरमान इस्लाम धर्म की वास्तविक शिक्षाओं के अंतर्गत जारी किए जाने वाले फरमान कहे जा सकते हैं?
यह ग़ैर इस्लामी फरमान जारी करने के बाद पंचायत के प्रमुख का कहना था कि यह परिवार नमाज़ नहीं पढ़ता, हमारे चंदे में, ख़ुशी और गम में, हमारे धार्मिक कामों में शरीक नहीं होता, लिहाज़ा गांव के लोग इससे अपना वास्ता क्यों रखें? सवाल यह है कि मान लिया जाए कि वह परिवार यदि किसी धार्मिक आयोजन या नमाज़-रोज़े में उनके साथ शरीक नहीं होता तो भी किसी को इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि वह ज़ोर-ज़बरदस्ती करके उसके विरुद्ध कोई ऐसा फरमान जारी करे. किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों में शिरकत करना या न करना किसी भी व्यक्ति का अति व्यक्तिगत मामला है. यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कार्यकलापों में हिस्सा लेता है तो वह उसके पुण्य का भागीदार होगा. इसी प्रकार शरीक न होने अथवा नमाज़ आदि अदा न करने पर पाप का भागीदार भी स़िर्फ वही होगा. धर्म प्रचारक या मुल्ला-मौलवी उसे अपनी बात प्यार-मोहब्बत से समझा सकते हैं, लेकिन उसका सामाजिक बहिष्कार करना, उसे आर्थिक संकट में डालना या उसके विरुद्ध कोई तालिबानी फरमान जारी करना पूरी तरह ग़ैर इस्लामी, ग़ैर इंसानी और अधार्मिक है.
दरअसल आज ऐसे तालिबानी सोच रखने वाले मुसलमानों एवं कठमुल्लाओं ने इस्लाम धर्म को बदनाम कर दिया है. चाहे वह अ़फग़ानिस्तान के बामियान प्रांत में महात्मा बुद्ध जैसे विश्व शांति के दूत समझे जाने वाले महापुरुष की मूर्ति को तोप के गोलों से ध्वस्त करने जैसी कायरतापूर्ण कार्रवाई हो या पाकिस्तान में मस्जिदों, दरगाहों एवं धार्मिक जुलूसों में शिरकत करने वाले शांतिप्रिय लोगों की बड़ी संख्या में जान लेना या भारत में कभी बेतुके फतवे जारी करना, सलेमपुर गांव जैसा फरमान सुनाया जाना आदि कृत्य शर्मनाक, इस्लाम विरोधी और मानवता विरोधी ही नहीं, बल्कि इस्लाम धर्म की प्रतिष्ठा पर धब्बा लगाने वाले भी हैं. यह कैसी विडंबना है कि उस गांव के तथाकथित मुसलमान एक मुस्लिम परिवार को भूखा-परेशान देखकर ख़ुश हो रहे हैं, जबकि एक सिख परिवार उस परेशानहाल मुस्लिम परिवार की भूख और परेशानियां सहन नहीं कर पा रहा और यथासंभव मदद कर रहा है. क्या संदेश देती हैं हमें ऐसी घटनाएं? क्या ऐसे फरमानों से इस्लाम का नाम रोशन हो रहा है? यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जिस मदरसे की बुनियाद में ऐसे तालिबानी फरमान शामिल हों, उन मदरसों से भविष्य में निकलने वाले बच्चों की मज़हबी तालीम क्या हो सकती है और आगे चलकर वही तालीम क्या गुल खिलाएगी, इस बात का बड़ी सहजता से अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इन कट्टरपंथी तालिबानी सोच के मुसलमानों को उस सिख परिवार से प्रेरणा लेनी चाहिए, जो उनके द्वारा भुखमरी की कगार पर पहुंचाए गए मुस्लिम परिवार को रोटी मुहैया करा रहा है. आज भी देश में हज़ारों ऐसी मिसालें मिलेंगी, जिनमें हिंदू, मुस्लिम एवं सिख समुदाय के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. कहीं हिंदू नमाज़ पढ़ते हैं, कहीं रोज़ा रखते हैं, कहीं मोहर्रम में ताज़ियादारी करते हैं तो कहीं पीरों-फकीरों की दरगाहों की मुहा़फिज़त करते हैं. इन ग़ैर मुस्लिमों का इस्लामी गतिविधियों की ओर झुकाव की वजह स़िर्फ उदारवादी इस्लामी शिक्षाएं हैं, न कि कट्टरपंथी तालिबानी फरमान.
सलेमपुर की घटना से एक बात और ज़ाहिर होती है कि जब इन मुसलमानों का रवैया अपने ही समुदाय के एक परिवार के साथ ऐसा है तो फिर दूसरे समुदाय के प्रति इनसे प्रेम-सद्भाव से पेश आने की उम्मीद कैसी की जा सकती है. प्रभावित परिवार आज इस स्थिति में पहुंच गया है कि बुज़ुर्ग महिला मरियम ने यहां तक कह दिया कि अब हम इनके आगे न झुक सकते हैं, न कुछ मांग सकते हैं, बल्कि हमें ग़ैर मुस्लिमों के आगे झुकने और उनसे मांगने में कोई हर्ज नहीं है. कितना बेहतर होता, यदि यही पंचायत अथवा अंजुमन ग़रीबों को आत्मनिर्भर बनाने, उनकी रोज़ी-रोटी और शिक्षा आदि सुनिश्चित करने को तवज्जो देती. बजाय इसके वह लोगों से ज़ोर-ज़बरदस्ती करके चंदा वसूलने और न देने पर उनका सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार करने जैसा अधार्मिक कृत्य अंजाम दे रही है. ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे अज्ञानी कठमुल्लाओं से इस्लाम धर्म को कलंकित होने से बचाया जाए. क्या ऐसे तुगलकी और तालिबानी फरमान ग़ैर मुस्लिमों को अपनी ओर आकर्षित कर सकेंगे, जिनसे मुस्लिम समुदाय का ही कोई परिवार रुसवा और बेज़ार हो जाए. जो इस्लाम सभी धर्मों एवं समुदायों, यहां तक कि पेड़-पौधों के साथ भी मानवता और सद्भाव से पेश आने की बात करता हो, वह किसी को भूखे रहने के लिए मजबूर करने की तालीम कैसे दे सकता है. इस्लाम में सूदखोरी हराम क्यों क़रार दी गई है? इसीलिए कि किसी व्यक्ति पर नाजायज़ आर्थिक बोझ न पड़े. इस्लाम में दिनोंदिन बढ़ती जा रही ऐसे लोगों की घुसपैठ रोकनी होगी. ऐसे फरमान जारी करने वालों के ख़िला़फ भी सख्त कार्रवाई किए जाने की ज़रूरत है, जैसा सलेमपुर के उस ग़रीब दंपत्ति के साथ वहां की अंजुमन ने किया. यह ग़ैर इस्लामी और अमानवीय है, इसकी जितनी भी घोर निंदा की जाए, कम है.
तनवीर जाफरी

Wednesday, May 25, 2011

'अग्निवेश का सिर काट के लाओ, 10 लाख ले के जाओ' - हिंदू महासभा



हिंदू संगठन अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने समाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश के सिर 10 लाख का इनाम रखा है। संगठन का कहना है कि जो भी अग्निवेश का सिर कलम कर लाएगा उसे 10 लाख का इनाम दिया जाएगा।

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तिवारी ने कहा है कि अग्निवेश ने अमरनाथ यात्रा पर टिप्पणी करके विभाजनकारी तत्वों को बढ़ावा दिया है। ऐसे लोगों का यही हश्र होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अन्ना हजारे को ऐसे लोगों से दूर रहने की जरूरत है।

गौरतलब है कि सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने अमरनाथ यात्रा को धर्म के नाम पर धोखा करार दिया था। उनके अनुसार आजादी की मांग करने वाले कश्मीरियों की आवाज को नई दिल्ली दबा रहा है। स्वामी अग्निवेश ने हुर्रियत कान्फ्रेंस के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी से मुलाकात के दौरान यह बात कही। उन्होंने अलगाववादियों के सुर से सुर मिलाते हुए अमरनाथ यात्रा को धार्मिक पाखंडकरार दिया है।

अग्निवेश ने कहा, 'अमरनाथ में बनने वाला शिवलिंग एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसे धर्म से जोड़ा जाना सही नहीं है।' उन्‍होंने कहा, ‘मेरी समझ से बाहर है कि लोग अमरनाथ यात्रा के लिए क्‍यों जाते हैं। यह धर्म के नाम पर धोखा है। मैं इस तरह के धर्म पर यकीन नहीं करता। धर्म वह है जो गरीबों व वंचितों को न्‍याय दिलाए।

स्वामी ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड के पूर्व चेयरमैन राज्यपाल एसके सिन्हा को निशाना बनाते हुए कहा कि ग्लोबल वार्मिंग से शिवलिंग पिघलने के बाद नकली शिवलिंग तैयार करवाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

आपकी राय
स्वामी अग्निवेश की टिप्पणी और हिंदू संगठन के इस फतवे के बारे में आपकी क्या राय है? क्या इस संगठन को इस तरह का बयान दे कर फतवा जारी करना चाहिए?
ध्यान रहे कि टिप्पणी करते समय प्रयोग की गई भाषा के लिए स्वयं आप जिम्मेदार होंगे। यदि आपकी भाषा से किसी को आपत्ति होती है या कोई कानूनी कार्रवाई की जाती है तो उसकी जिम्मेदारी भी पूरी तरह से आपकी होगी।

Monday, February 21, 2011

फतवा है, फरमान नहीं


फतवा सभी पक्षों की बात सुनकर, सबूतों का मूल्यांकन करने के बाद, सुझाव के तौर पर दिया जाना चाहिए -आरिफ मोहम्मद खान

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आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व केंद्रीय मंत्री और इसलामी विद्वान
अरबी में 'फतवे' का अर्थ होता है 'कानूनी सुझाव', लेकिन कालांतर में लोगों ने अपने हितों के मुताबिक इसमें बदलाव और व्याख्या करनी शुरू कर दी, और अंतत: फतवे के प्रति लोगों के मन में यह छवि बना दी गई कि यह एक कानूनी आदेश है जिसे मानना सबकी मजबूरी है. इस काम को मौलानाओं ने कानूनी संस्थाओं के साथ मिलकर योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया. जबकि यह पूरी तरह से फतवे के मूल विचार और इस्लामी मान्यताओं के खिलाफ है.

इतिहास इस बात का गवाह है कि हर दौर में उलेमाओं के कारनामों ने इस्लाम के दामन पर दाग लगाने का काम किया है
इस्लामी कानून भी देश के बाकी दूसरे कानूनों की तरह ही देश के संविधान द्वारा स्थापित कानूनी संस्थाओं द्वारा ही लागू किए जाने चाहिए. इन्हें लागू करने का अधिकार मुल्लाओं और मदरसों के शिक्षकों के हाथ में नहीं होना चाहिए. संभव है कि मदरसों के शिक्षक कानून के अच्छे जानकार हों पर उनके हाथ में राज्य की ताकत नहीं दी जा सकती. हां, सुझाव या राय देने के लिए सभी स्वतंत्र हैं. अपनी मशहूर किताब 'फिक़ उमर' में शाह वलीउल्लाह ने इस तरह के एक दिलचस्प वाकये का जिक्र किया है. यह वाकया पैगंबर मुहम्मद साहब के निकटतम सहयोगी अब्दुल्ला बिन मसूद से जुड़ा है जो उस वक्त कुफ़ा में कुरान की शिक्षाएं देने के लिए नियुक्त थे. उनसे एक आदमी मिलने आया. उसके खिलाफ कुछ फतवे जारी हुए थे और वह उनका निदान चाहता था. जैसे ही खलीफा उमर को इस बात का पता चला उन्होंने अब्दुल्ला को पत्र लिखकर पूछा, 'मैंने सुना है कि आपने लोगों के कानूनी झगड़े भी निपटाने शुरू कर दिए हैं, जबकि आपको इसका अधिकार भी नहीं हैं.' इसी तरह के एक अन्य पत्र में खलीफा उमर ने अबू मूसा अंसारी को साफ शब्दों में बताया, 'कानूनी झगड़ों का निपटारा सिर्फ कानूनी तौर पर स्थापित संस्थाएं करेंगी. इसके अलावा कोई नहीं करेगा.'

उस हद तक फतवे में कोई बुराई नहीं है जब तक वह इस बात को स्पष्ट करते हुए चले कि यह उस व्यक्ति का निजी विचार है और साथ ही यह बात भी साफ होनी चाहिए कि वह व्यक्ति संबंधित मामले का जानकार है. समस्या तब होती है जब फतवा कानूनी आदेश के रूप में धार्मिक चोला ओढ़कर सामने आता है. इस हालत में यह कानून और न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाता है. कुरान ऐसे लोगों की पुरजोर मुजम्मत करता है,
  'उन पर मुसीबत आना तय है जो खुद के शब्द गढ़ते हैं और अपने तुच्छ फायदे के लिए उन्हें अल्लाह के शब्द बताते हैं.' (कुरान 2.79)
फतवों का बेजा इस्तेमाल पहली दफा नहीं हो रहा. पेशेवर मुल्ला-मौलाना हमेशा से ही फतवे का मजाक बनाते आ रहे हैं. अगर आप अरबी साहित्य पर थोड़ी निगाह डालें तो आप पाएंगे कि वहां सबसे ज्यादा बदनाम पद काजी का रहा है. मौलाना आजाद ने अपने एक लेख में लिखा है, 'मुफ्ती की कलम (फतवा जारी करने वाला व्यक्ति) हमेशा से मुसलिम आतताइयों की साझीदार रही है और दोनों ही तमाम ऐसे विद्वान और स्वाभिमानी लोगों के कत्ल में बराबर के जिम्मेदार हैं जिन्होंने इनकी ताकत के आगे सिर झुकाने से इनकार कर दिया.' मौलानाओं के कृत्य के प्रति और भी कठोर नजरिया अपनाते हुए उन्होंने 1946 में एक साक्षात्कार में कहा, 'हमारा इतिहास इस बात का गवाह है कि हर दौर में उलेमाओं के कारनामों ने इस्लाम के ऊपर धब्बा लगाया है.'
फतवे का स्वरूप लोकतांत्रिक बनाने और अंतिम निर्णय में ज्यादा से ज्यादा लोगों के विचारों को शामिल करने के लिए इसमें आम आदमी की भागीदारी इस्लाम के नजरिये से बेहद महत्वपूर्ण है. यहां एक बात साफ तौर पर समझनी होगी कि मूल इस्लाम किसी भी तरह के पंडा-पुजारीवाद का विरोधी है. पैगंबर साहब ने खुद कहा है कि व्यक्ति को बंधनों और रूढ़ियों से आजाद करना होगा क्योंकि उसकी आजादी में सबसे बड़ी बाधा यही है. उन्होंने कहा है, 'ला रहबानियत फी इस्लाम' यानी इस्लाम में पुजारीवाद के लिए कोई स्थान नहीं है.
इस्लाम स्पष्ट शब्दों में हर स्त्री और पुरुष को इजाजत देता है कि वह धर्म के मूल सिद्धांतों की समझ के साथ अपनी सोच और ज्ञान का दायरा बढ़ाए ताकि अपनी जिंदगी से जुड़े मसलों पर वह खुद फैसले ले सके. कुछ मसलों में अगर वह खुद किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाता है तो जानकारों से सलाह ली जा सकती है. पर यहां जोर व्यक्ति के ऊपर ही है. अपने मसलों में मुफ्ती, काजी सब कुछ वह व्यक्ति ही है. किसी तीसरे व्यक्ति को उसके निजी जिंदगी से जुड़े फैसले करने का अधिकार नहीं है.
अकसर फतवे को संस्थागत करने की बात भी चलती है. लेकिन इसकी कोई जरूरत नहीं है. ऐसा करने से देश की न्यायपालिका के समक्ष एक समानांतर न्यायिक तंत्र खड़ा हो जाएगा. यह हमारे संविधान के मूल धर्म निरपेक्ष स्वरूप के खिलाफ है और साथ ही किस हद तक इसका दुरुपयोग हो सकता है इसकी कल्पना नहीं की जा सकती. फतवे को किसी तरह की वैधता प्रदान करने की कोशिश से संविधान द्वारा स्थापित न्यायपालिका के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी जिसकी इजाजत कभी नहीं दी जा सकती. 1864 में देश भर  से काजी दफ्तर की व्यवस्था खत्म करने के बाद से ही उलेमा और मौलाना देश के कानूनों से नाराजगी और विरोध जताते आ रहे हैं. लिहाजा इस तरह का कोई संस्थान खड़ा करना उन्हें दोबारा से न्यायिक ताकत देने जैसा होगा.
यह जरूरी है कि फतवे सभी पक्षों की बात सुनकर, परिस्थितियों और सबूतों का सम्यक मूल्यांकन करने के बाद ही दिए जाएं. पर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा. फतवा एक पक्ष के सवालों के जवाब के रूप में होता है और इसे सुझाव की बजाय बाध्यता के रूप में प्रचारित किया जाता है. अगर यह सिलसिला जारी रहा तो इसके नतीजे बेहद विनाशकारी होंगे. सीधे शब्दों में कहें तो मौजूदा दौर में फतवा व्यक्ति की आजादी और निजता में ही दखल नहीं है बल्कि नृशंस है और आम आदमी को इस नृशंसता से बचाना समय की जरूरत है. 

 (अतुल चौरसिया से बातचीत पर आधारित)