इसी गांव
के मुसलमानों ने अपनी एक मुस्लिम पंचायत अर्थात अंजुमन बना रखी है. गांव में एक
मदरसा निर्माणाधीन है, जिसके लिए स्थानीय एवं बाहरी लोगों से चंदा इकट्ठा किया जा रहा है. अंजुमन
द्वारा मोइनुद्दीन एवं मरियम से भी मदरसे के चंदे के रूप में पांच सौ रुपये की
मांग की गई. इस ग़रीब दंपत्ति ने अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र चंदा देने में
असमर्थता व्यक्त कर दी. बस फिर क्या था, मोइनुद्दीन तो इस
पंचायत की नज़र में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया. अंजुमन ने मोइनुद्दीन के
सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार की घोषणा कर दी. उसकी ख़स्ताहाल झोपड़ी के बाहर एक बोर्ड
लगा दिया गया कि गांव का कोई भी व्यक्ति मोइनुद्दीन की दुकान से कोई सामान नहीं
ख़रीदेगा, कोई उससे किसी प्रकार का बर्ताव, व्यवहार एवं वास्ता नहीं रखेगा. यदि किसी ने अंजुमन के आदेश का उल्लंघन
किया तो उसे 500 रुपये बतौर ज़ुर्माना अदा करने होंगे. तालिबानी फरमान का अंत यहीं
नहीं हुआ, बल्कि इन तथाकथित इस्लामी ठेकेदारों ने इस दंपत्ति
को अपने खेतों में शौच के लिए जाने पर भी पाबंदी लगा दी. यह आदेश भी जारी कर दिया
गया कि मरणोपरांत इस परिवार के किसी व्यक्ति को स्थानीय क़ब्रिस्तान में दफन भी
नहीं किया जाएगा. पंचायत के फरमान के बाद इस परिवार को अपनी दो व़क्त की रोटी जुटा
पाने में भी दिक्कत पेश आ रही है. गांव की मुस्लिम पंचायत इसकी बदहाली और भुखमरी
पर स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रही है, वहीं दूसरी तऱफ
पड़ोस के एक गांव का सिख परिवार मानवता का प्रदर्शन करते हुए इसे दो व़क्त की रोटी
मुहैया करा रहा है.
यह तो था
इन तथाकथित इस्लामपरस्तों का तालिबानी फरमान, जो इन्होंने यह सोचकर जारी किया कि शायद ये तुगलकी
सोच वाले मुसलमान इस्लाम पर बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं, परंतु
आइए देखें कि इस्लाम दरअसल इन हालात में क्या सीख देता है. मैं अपने बचपन से कुछ
इस्लामी शिक्षाएं वास्तविक इस्लामी दानिश्वरों से सुनता आया हूं. ऐसी ही एक
इस्लामी तालीम थी कि पहले घर में चिराग़ जलाओ, फिर मस्जिद
में. इस कहावत का अर्थ क्या है? यही न कि अपनी पारिवारिक
ज़रूरतों से अगर पैसे बचें तो फिर अपने ख़ुदा की राह में ख़र्च करें. यह तो क़तई नहीं
कि आप ख़ुद या आपके पड़ोसी भूखे रहें और आप मस्जिद या मदरसे के निर्माण कार्य के लिए
चंदा देते फिरें. जो लोग इस्लाम में वाजिब कहे जाने वाले हज के नियम से वाक़ि़फ हैं,
वह यह भलीभांति जानते हैं कि अगर आप क़र्ज़दार हैं और हज कर रहे हैं,
तो वह भी जायज़ नहीं है. यहां तक कि अगर आप पर अपने बेटों एवं बेटियों
की शादी का ज़िम्मा बाक़ी है तो पहले इन पारिवारिक ज़रूरतों को पूरा करने के बाद ही
हज किया जा सकता है. अगर आप आर्थिक रूप से सुदृढ़ हैं तो फिर कभी भी हज कर सकते
हैं. इसी तरह लगभग सभी इस्लामी कार्यकलापों के लिए यह बताया गया है कि हमेशा चादर
के भीतर ही पैर फैलाना है. यहां तक कि फिज़ूलख़र्ची को भी इस्लाम में गुनाह क़रार
दिया गया है. अपने को आर्थिक परेशानी में डालकर धर्म पर पैसे ख़र्च करना इस्लाम
हरगिज़ नहीं सिखाता. मगर तालिबानी सोच रखने वाले कुछ मुसलमानों ने अपने गढ़े हुए
इस्लाम के अंतर्गत फरमान जारी करके दो ग़रीब मुसलमानों को रोजी-रोटी से वंचित कर
दिया. वहीं एक सिख परिवार वास्तविक मानवीय इस्लामी एवं सिख धर्म की शिक्षाओं का
पालन करते हुए इन्हें दो व़क्त की रोटी मुहैया कराता रहा. क्या यही है इन
तालिबानों का इस्लाम? क्या ऐसे फरमान इस्लाम धर्म की
वास्तविक शिक्षाओं के अंतर्गत जारी किए जाने वाले फरमान कहे जा सकते हैं?
यह ग़ैर
इस्लामी फरमान जारी करने के बाद पंचायत के प्रमुख का कहना था कि यह परिवार नमाज़
नहीं पढ़ता, हमारे
चंदे में, ख़ुशी और गम में, हमारे
धार्मिक कामों में शरीक नहीं होता, लिहाज़ा गांव के लोग इससे
अपना वास्ता क्यों रखें? सवाल यह है कि मान लिया जाए कि वह
परिवार यदि किसी धार्मिक आयोजन या नमाज़-रोज़े में उनके साथ शरीक नहीं होता तो भी
किसी को इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि वह ज़ोर-ज़बरदस्ती करके उसके विरुद्ध कोई
ऐसा फरमान जारी करे. किसी प्रकार की धार्मिक गतिविधियों में शिरकत करना या न करना
किसी भी व्यक्ति का अति व्यक्तिगत मामला है. यदि कोई व्यक्ति धार्मिक कार्यकलापों
में हिस्सा लेता है तो वह उसके पुण्य का भागीदार होगा. इसी प्रकार शरीक न होने
अथवा नमाज़ आदि अदा न करने पर पाप का भागीदार भी स़िर्फ वही होगा. धर्म प्रचारक या
मुल्ला-मौलवी उसे अपनी बात प्यार-मोहब्बत से समझा सकते हैं, लेकिन
उसका सामाजिक बहिष्कार करना, उसे आर्थिक संकट में डालना या
उसके विरुद्ध कोई तालिबानी फरमान जारी करना पूरी तरह ग़ैर इस्लामी, ग़ैर इंसानी और अधार्मिक है.
दरअसल आज
ऐसे तालिबानी सोच रखने वाले मुसलमानों एवं कठमुल्लाओं ने इस्लाम धर्म को बदनाम कर
दिया है. चाहे वह अ़फग़ानिस्तान के बामियान प्रांत में महात्मा बुद्ध जैसे विश्व
शांति के दूत समझे जाने वाले महापुरुष की मूर्ति को तोप के गोलों से ध्वस्त करने
जैसी कायरतापूर्ण कार्रवाई हो या पाकिस्तान में मस्जिदों, दरगाहों एवं धार्मिक
जुलूसों में शिरकत करने वाले शांतिप्रिय लोगों की बड़ी संख्या में जान लेना या भारत
में कभी बेतुके फतवे जारी करना, सलेमपुर गांव जैसा फरमान
सुनाया जाना आदि कृत्य शर्मनाक, इस्लाम विरोधी और मानवता
विरोधी ही नहीं, बल्कि इस्लाम धर्म की प्रतिष्ठा पर धब्बा
लगाने वाले भी हैं. यह कैसी विडंबना है कि उस गांव के तथाकथित मुसलमान एक मुस्लिम
परिवार को भूखा-परेशान देखकर ख़ुश हो रहे हैं, जबकि एक सिख
परिवार उस परेशानहाल मुस्लिम परिवार की भूख और परेशानियां सहन नहीं कर पा रहा और
यथासंभव मदद कर रहा है. क्या संदेश देती हैं हमें ऐसी घटनाएं? क्या ऐसे फरमानों से इस्लाम का नाम रोशन हो रहा है? यहां
एक सवाल यह भी उठता है कि जिस मदरसे की बुनियाद में ऐसे तालिबानी फरमान शामिल हों,
उन मदरसों से भविष्य में निकलने वाले बच्चों की मज़हबी तालीम क्या हो
सकती है और आगे चलकर वही तालीम क्या गुल खिलाएगी, इस बात का
बड़ी सहजता से अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इन कट्टरपंथी तालिबानी सोच के मुसलमानों को
उस सिख परिवार से प्रेरणा लेनी चाहिए, जो उनके द्वारा भुखमरी
की कगार पर पहुंचाए गए मुस्लिम परिवार को रोटी मुहैया करा रहा है. आज भी देश में
हज़ारों ऐसी मिसालें मिलेंगी, जिनमें हिंदू, मुस्लिम एवं सिख समुदाय के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. कहीं हिंदू
नमाज़ पढ़ते हैं, कहीं रोज़ा रखते हैं, कहीं
मोहर्रम में ताज़ियादारी करते हैं तो कहीं पीरों-फकीरों की दरगाहों की मुहा़फिज़त
करते हैं. इन ग़ैर मुस्लिमों का इस्लामी गतिविधियों की ओर झुकाव की वजह स़िर्फ
उदारवादी इस्लामी शिक्षाएं हैं, न कि कट्टरपंथी तालिबानी
फरमान.
सलेमपुर
की घटना से एक बात और ज़ाहिर होती है कि जब इन मुसलमानों का रवैया अपने ही समुदाय
के एक परिवार के साथ ऐसा है तो फिर दूसरे समुदाय के प्रति इनसे प्रेम-सद्भाव से
पेश आने की उम्मीद कैसी की जा सकती है. प्रभावित परिवार आज इस स्थिति में पहुंच
गया है कि बुज़ुर्ग महिला मरियम ने यहां तक कह दिया कि अब हम इनके आगे न झुक सकते
हैं, न कुछ मांग सकते हैं,
बल्कि हमें ग़ैर मुस्लिमों के आगे झुकने और उनसे मांगने में कोई हर्ज
नहीं है. कितना बेहतर होता, यदि यही पंचायत अथवा अंजुमन
ग़रीबों को आत्मनिर्भर बनाने, उनकी रोज़ी-रोटी और शिक्षा आदि
सुनिश्चित करने को तवज्जो देती. बजाय इसके वह लोगों से ज़ोर-ज़बरदस्ती करके चंदा
वसूलने और न देने पर उनका सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार करने जैसा अधार्मिक कृत्य अंजाम
दे रही है. ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे अज्ञानी कठमुल्लाओं से इस्लाम धर्म को
कलंकित होने से बचाया जाए. क्या ऐसे तुगलकी और तालिबानी फरमान ग़ैर मुस्लिमों को
अपनी ओर आकर्षित कर सकेंगे, जिनसे मुस्लिम समुदाय का ही कोई
परिवार रुसवा और बेज़ार हो जाए. जो इस्लाम सभी धर्मों एवं समुदायों, यहां तक कि पेड़-पौधों के साथ भी मानवता और सद्भाव से पेश आने की बात करता
हो, वह किसी को भूखे रहने के लिए मजबूर करने की तालीम कैसे
दे सकता है. इस्लाम में सूदखोरी हराम क्यों क़रार दी गई है? इसीलिए
कि किसी व्यक्ति पर नाजायज़ आर्थिक बोझ न पड़े. इस्लाम में दिनोंदिन बढ़ती जा रही ऐसे
लोगों की घुसपैठ रोकनी होगी. ऐसे फरमान जारी करने वालों के ख़िला़फ भी सख्त
कार्रवाई किए जाने की ज़रूरत है, जैसा सलेमपुर के उस ग़रीब
दंपत्ति के साथ वहां की अंजुमन ने किया. यह ग़ैर इस्लामी और अमानवीय है, इसकी जितनी भी घोर निंदा की जाए, कम है.
तनवीर जाफरी