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Friday, May 29, 2015

हम कहां भाग कर जाएं


मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सब कुशल होंगे। पत्र लिखने का तरीका ज़रा पुराना है पर बात नई है। मुझे इस बात की खुशी है कि आप शिद्दत से अख़बार पढ़ते हैं और न्यूज़ चैनल देखते हैं। लोकतंत्र में सटीक जानकारी ही हम सबको बेहतर नागरिक बनाती है और चुनाव के वक्त मतदाता। नागरिक और मतदाता में फर्क होता है। मतदाता आप मतदान के दौरान ही होते हैं लेकिन नागरिक आप हर समय होते हैं। पत्र लिखने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि क्या आपके साथ भी वैसा ही हो रहा है, जैसा मेरे साथ हो रहा है। मेरा मतलब है कि क्या हम और आप सेम टू सेम फील कर रहे हैं।

क्या आप भी मेरी तरह अख़बारों और चैनलों से घबराए हुए हैं। सरकार के एक साल पूरे हुए हैं, लेकिन हमारे तो नहीं हुए हैं। इस एक साल पर इतना कुछ छप रहा है और टीवी पर दिखाया जा रहा है, उन सबको देखने-पढ़ने में ही दस साल निकल जाएंगे। पिछले दस दिनों से सरकार का एक साल चल रहा है और यही रवैया रहा तो मैं आपको सतर्क कर देता हूं कि दो दिन बाद यानी बुधवार से सरकार का दूसरा साल शुरू हो रहा है। दूसरे साल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्या-क्या चुनौतियां होंगी, इन चुनौतियों में दस बड़ी चुनौतियां क्या होंगी, दस-दस के हिसाब से विदेश नीति से लेकर अर्थ नीति को लेकर उनकी चुनौतियां क्या होंगी। उन सभी चुनौतियों की पहले साल की चुनौतियों से तुलना भी की जाएगी। तैयार रहिए हमारी आपकी भी चुनौतियां कम नहीं हैं।

ख़ैर जब दूसरा साल आएगा तब आएगा, लेकिन यह पहला साल पूरा हुआ है उसके चक्कर में हम पूरे हुए जा रहे हैं। लगता है सरकार और मीडिया हर नागरिक को पकड़ कर उपलब्धियां-नाकामियां बताने की ज़िद पर आ गए हैं। विपक्ष लगता है कि हर उपलब्धियों को खारिज करने पर आमादा है। जैसे सोसायटी कल्चर में बर्थ-डे पर होता है कि आपने गिफ्ट दिया नहीं कि उधर से रिटर्न गिफ्ट थमा दिया गया। जैसे ही सरकार प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है, विपक्ष का भी होने लगता है। हम एक हाथ में केक और एक हाथ में गिफ्ट लिए हिलते-डुलते रह जाते हैं।

आज सुबह दही लेने गया तो लगा कि दुकानदार भी प्रेस काॉन्फ्रेंस के अंदाज़ पर महंगाई पर बोल रहा है, बगल की दुकान से टिंडे वाला खंडन किए जा रहा है। हर आदमी में मुझे दो आदमी नज़र आ रहे हैं। एक दावा करने वाला और एक खंडन करने वाला। अभी तो प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियों का स्टॉक शुरू ही हुआ है। सुना है सरकार और बीजेपी 200 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाली है। 200 रैलियां की जाएंगी और इससे भी बच गए तो आप उन 5,000 सभाओं से तो बच ही नहीं सकते, जो सरकार के एक साल पूरे होने पर की जाने वाली हैं। इससे अच्छा था कि एक अध्यादेश लाकर हर नागरिक को कम से कम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस, एक सभा या एक बड़ी रैली में शामिल होना अनिवार्य कर देती। न्यूज़ चैनलों में तो प्रवक्ता और जानकार डेरा डालकर बैठ गए हैं। आप चैनल भले बदल लीजिए, लेकिन इन प्रवक्ताओं और जानकारों को नहीं बदल सकते। ये सर्वव्यापी हो गए हैं।

विपक्ष भी डाल-डाल तो पात-पात टाइप करने लगा है। विपक्ष वालों को कहीं जाना भी नहीं पड़ रहा है। सरकार घूम घूम कर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है, रैली कर रही है और ये हैं कि एक ही जगह से रोज़ उन दावों का खंडन कर देते हैं। जितना सरकार बोल रही है, उतना ये भी बोल रहे हैं। दोनों के बयान से सारे दावे और खंडन आपस में लड़-मर कर ढेर हो जा रहे हैं। और हम हैं कि वहीं गब्बू की तरह खड़े रोने लगते हैं कि अभी-अभी तो इस पर यकीन किया था और अभी-अभी फलाने ने यकीन तोड़ दिया। प्लीज़ यहां यकीन को खिलौना न समझें।

हम बहुत परेशान हैं। परेशान न होते तो आपको ख़त न लिखते। हमको बुझाता ही नहीं है कि कौन सा दावा जीता और कौन सा खंडन हारा। कोई ट्राइब्यूनल तो होना चाहिए, जहां सही गलत का फैसला हो। मंत्री को सुनकर लगता है कि वाह सरकार ने क्या-क्या कमाल कर दिया है। विपक्ष को सुनकर लगता है कि अरे वाह, जो बोला झूठ ही बोला है। ऐसे कैसे होगा। कुछ तो सही होगा और कुछ तो गलत होगा, लेकिन जो भी सही होगा वह गलत ही होगा या जो भी गलत है, वही सही है इससे तो मेरी आंतों में चक्कर आने लगे हैं।

मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों, आप कैसे झेल रहे हैं। अपना घर छोड़कर पड़ोसी के घर जाता हूं तो वहां भी वही अख़बार मिलता है। वही चैनल चल रहा होता है। इन लोगों ने तो हमें इम्तहान के दिनों की याद दिला दी है। दोनों हमें पकड़-पकड़ कर रटा रहे हैं। कितना याद रखें भाई। डर लगता है कि कहीं सरकार बहादुर ने टेस्ट ले लिया तो क्या होगा। भाई लोगों ने हम पाठकों और दर्शकों के लिए इतना मैटिरियल ठेल दिया है कि शिंकारा टॉनिक पीकर और च्यवनप्राश खाकर भी स्मरण शक्ति का बंटाधारा होने से कोई नहीं बचा सकता है।

सालगिरह सरकार की है और लाउडस्पीकर पड़ोसी झेल रहा है। हम किसी के जश्न में खलल क्यों डालें। सोचते हैं कि मना लेने दो भाई बस हमारी एक अर्ज़ी स्वीकार कर लें। हम इतना लेख नहीं पढ़ सकते हैं। इतना भाषण नहीं सुन सकते हैं। इतना प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं झेल सकते हैं। इतना मंत्रियों का इंटरव्यू नहीं झेल सकते। हमारी तरफ से आप भी प्रधानमंत्री मोदी से कहिये। हमने उनका हमेशा भला चाहा है, वह भी हमारा भला चाहें। वह टीवी वाले और अख़बार वालों को मना करें। अपनी पार्टी से भी कहें कि बस भाई बस। 5,000 सभाएं और 200 प्रेस कॉन्फ्रेंस। लोगों को रटवा-रटवा कर मार दोगे क्या।

हम दुआ करते हैं कि प्रधानमंत्री जी पांच साल पूरे करें और झमाझाम काम करें, लेकिन पहले साल पर ये हाल है तो मुझे डर है कि कहीं किसी ने यह सुझा दिया कि दूसरे साल पर सब दुगना होगा तो क्या होगा। यानी 400 प्रेस कॉन्फ्रेंस, 10,000 सभाएं। तीसरे साल पर 600 प्रेस कॉन्फ्रेंस और 15,000 सभाएं। हमारी उम्र भी तो हर साल बढ़ेगी। सोचिए हम पर क्या बीतेगी। हम कहां भाग कर जाएंगे।

मेरे प्यारे दर्शकों और पाठकों, एक ही बात को बार-बार सुनकर, अलग-अलग श्रीमुख से एक ही बात सुनकर मेरे दिमाग के हार्ड-डिस्क की कैपेसिटी कम हो गई है। ऐसा लगता है कि भारत में सालगिरह सेना तैयार हो गई है। एक सेना पक्ष में लिखती है और दूसरी विपक्ष में। कुछ संतुलन के लिए भी लिखते हैं। अच्छा है कि सरकार का सख्त इम्तहान हो रहा है, लेकिन उस इम्तहान का बोझ हम जैसे ग़रीब पाठकों और दर्शकों पर क्यों डाला जा रहा है।

अगर आपको भी ऐसा लगता है तो प्रधानमंत्री जी से गुज़ारिश कीजिए, लेकिन बधाई ज़रूर दीजिएगा। हमारी सरकार है ख़ूब काम करे। ख़ूब हिसाब हो लेकिन इतना भी बेहिसाब न हो कि हमारा ही हिसाब हो जाए। सोचा अपनी इस व्यथा को आपसे बांटू। भूल-चूक लेनी-देनी माफ़।

आपका
रवीश कुमार

Wednesday, June 04, 2014

मीडिया तुम्हारी जात क्या है बॉस ?


religion-of-indian-mediaमीडिया की जात क्या है? क्या मीडिया की भी कोई जाति होती है?यदि नहीं तो मीडिया में दलितों (पिछड़े-मुस्लिम-महिला) के मुद्दे क्यों नहीं सार्थकता से उठते? हाशिये पर खड़े समाज पर मीडिया क्यों ध्यान नहीं देता ? भुत-प्रेत,  राखी-मीका,  जुली-मटुकनाथ पर पैकेज बनाने वाला मीडिया क्यों दलितों की अनदेखी करता है? जो सरोकारों के साथ चलने का दावा करते हैं उनके प्रयास भी महज रस्म अदायगी क्यों होते हैं?

क्या बाजारवाद के इस दौर में महज इसलिए दलितों की खबरों को जगह नहीं मिलती है क्योकिं उनके सरोकार मध्यवर्गीय विज्ञापन देने वाली कंपनियों के सरोकारों से मेल नहीं खाती? तो क्या बाजारवाद के इस दौर में मीडिया “समाचार वही जो व्यापार बढ़ाये” के मुनाफे के तहत काम करता है? क्या भारतीय मीडिया नवपूंजीवाद के लाभ-हानि के दवाब के तहत काम करता है? यह सभी मीडिया के लिए भले सही न हो परन्तु भूमंडलीकरण के इस दौर में लोकतांत्रिक आग्रह कमजोर हुएं है. इसी का परिणाम है की मीडिया मिशन से कमीशन की तरफ छलांग लगा चुका है.

लोगों से सवाल पूछने वाला मीडिया समूह खुद सवालों के घेरे में आ गया है. क्यों नहीं दलितों के प्रति भारतीय मीडिया का रवैया अभी भी बदला है? न किसी सफाई कर्मचारी की मौत को लेकर सवाल उठाये जातें हैं और न ही कोई पैकेज बनाएं जातें है?क्यों नहीं दलितों के प्रति  हिंसा और बलात्कार की घटना पर्याप्त ध्यान खीच पाती हैं? क्यों नहीं आदिवासी महिलायों की खबरें जगह पाती है? क्यों नहीं मुस्लिमों की बेगुनाह रिहाई खबर बन पाती है? भारतीय मीडिया क्यों नहीं दलितों-पीड़ितों-शोषितों की तरफ अपने आप को खड़ा पाता है?

सीएनएन-आईआबीएन-7 के वरीय समाचार संपादक आकाश,  दलितों की भारतीय मीडिया में उपेक्षा के प्रश्न पर कहतें है- “आरक्षण की सहायता से कार्यपालिका,  न्यायपालिका और विधायिका में दलित तो आये परन्तु आज भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के चौथे खंभे में दलितों की संख्या नगण्य है” इस कथन के समर्थन में कई आंकड़े भी हैं जो इसकी पुष्टि करते हैं.

आजादी के इतने बर्षो के बाद भी दलित वर्ग मीडिया से लगभग गायब है.

मीडिया में जाति की हिस्सेदारी पर बहस खड़ा करना इस लेख का मतलब नही है.  मूल प्रश्न यह है कि मीडिया में दलितों के मुद्दे को जगह क्यों नहीं दी जाती? खैरलांजी घटना इसका उदहारण है जिसको भारतीय मीडिया ने शुरू में कवर नहीं किया था.

प्रसंगवश

1. हरियाणा के हिसार जिले स्थित भागाणा में 23 मार्च को 15-18 वर्ष की अगवा की गई चार मासूम लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की गई. घटना के बाद न्याय की मांग लेकर पीडितायें अपने परिजनों और गावं के 90 दलित परिवारों के साथ जंतर-मंतर पर धरणा दे रहें हैं. यह मुख्यधारा की मीडिया के लिए कोई खबर नहीं है.

2. नागपुर में दलित को जिन्दा जला दिया जाता है और यह मुख्यधारा की मीडिया में खबर नहीं बन पाती है.

3. आतंकवादी बमविस्फोट के झूठे आरोप में दस बरस की सजा काट कर बाहर निकले बेगुनाह मुस्लिमों की तरफ से कोई भी मीडिया समूह सवाल नहीं खड़े करता है.

4. दलित महिलायों को शोषण का शिकार बनना पड़ता है पर वो खबर नहीं बनती. आदिवासी लड़कियां गायब होती हैं, यह खबर नहीं बनती. क्यों ‘सभी के लिए न्याय’ ‘कुछ के लिए अथाह मुनाफे’ के आगे  बेबस नजर आता है? क्या इसके पीछे सिर्फ बाजार का अर्थशास्त्र है या समाजशास्त्र भी है?

सवाल उठता है की क्या मीडिया में इनके मुद्दे कोई मायने नहीं रखतें? क्या मीडिया की कोई जबाबदेही नहीं है? क्या पूंजी और बाजार अब मीडिया के सरोकारों और मिशन को संचालित करेगा? क्या अब मीडिया में सरोकारों को कमीशन से परखा जायेगा. तब किसी भी समाचार को लिखा/प्रसारित किया जाएगा.

छोटे-छोटे और गैरजरूरी मुद्दों को तानने वाला मीडिया अब तक भगाणा के मुद्दों पर खामोश क्यों है? दलित हिंसा पर अब तक क्यों नहीं कोई पैकेज बनती दिख रही है? क्यों नहीं अक्षरधाम बम विस्फोट के बेगुनाह सजायाफ्ता आरोपिय के समर्थन में कोई उसके बेगुनाही की कीमत का हिसाब मांग रहा है?

लोकतंत्र,   विकास और न्याय के पक्ष में मीडिया कब खड़ा होगा?

~मुकेश कुमार

Saturday, July 28, 2012

इंडिया टुडे की कवर स्टोरी पर चंद बातें



9/11और 26/11 के बाद कुछ बातें पूरी तरह साफ़ हो गईं कि सारी दुनिया में मुसलमानों को सिर उठा कर नहीं जीने देना है और उनकी दिफ़ा में जो बोले उस की ज़िंदगी ख़राब कर देना है, वो भी इस तरह कि कोई और हिम्मत ना कर सके, मुसलमान मौरिदे इल्ज़ाम ठराए जाते रहेंगे तो हमेशा जूते के नीचे रहेंगे, अपने हक़ की बात तो दूर इल्ज़ामात से निजात पाने के लिए ही एड़ियां रगड़ते रहेंगे हमारे क़दमों में पड़े रहेंगे। मैं चाहता था सच सामने आए असल दहशतगर्द बेनकाब हों, बेगुनाह जेल की सलाखों से बाहर आएं, ये होने लगा तो जैसे मुस्लिम दुश्मनों के सिर पर क़यामत टूट पड़ी, अज़ीज़ बर्नी को रोको वो लिखने ना पाए, वो बोलने ना पाए, इसे मुल्क दुश्मन साबित कर दो, अपने मसाइल में उलझा कर रख दो, तमाम इख़्तियारात छीन लो, किसी को क़रीब मत आने दो, बिलकुल तन्हा कर दो, जो लिखा आज तक इस में आग लगा दो, ज़ाया कर दो ताकि आने वाली नस्लें पढ़ ना पाएं, सब सिर जोड़ कर बैठो, आपसी सियासी दुश्मनी भुला दो, इसके ख़िलाफ़ एक हो जाओ, इसे जीते जी मार डालो, हमारी सियासत के लिए इस का ख़त्म होना ज़रूरी है। मुसलमान हमारे ग़ुलाम बने रहें, हमें वोट दे कर अपनी गु़लामी पर मोहर लगाते रहें, कोई मुस्लिम लीडरशिप की बात करे तो उसे देश के गद्दार, पाकिस्तानी, अलैहदगी पसंद कहो।
सियासी हिमायत, मीडिया का सपोर्ट ये साबित करने के लिए काफ़ी है। क़ौम के ग़द्दार उनके ज़र ख़रीद ग़ुलाम, उन की हाँ मैं हाँ मिलाने के लिए उनके पीछे मुट्ठी भर मुसलमान हमेशा खड़े रहेंगे, तो क्या इन हथकंडों से सच बदल जाएगा, तारीख़ बदल जाएगी, ज़िंदा क़ौम हमेशा के लिए ग़ुलाम बन जाएगी। नहीं, कभी नहीं, ख़ुद को देश भक्त कहने वाले आरएसएस का एक भी सदस्य अपनी असल ज़िंदगी में मुझ से बेहतर हिंदुस्तानी ख़ुद को साबित कर दे तो बड़ी से बड़ी सज़ा के लिए तैय्यार, पर तुम झूटे इल्ज़ामात से क़ौम को ज़लील करते हो, ये नामंज़ूर, मेरी ज़िंदगी में ये नहीं हो सकता।
26/11 के हवाले से इंडिया टुडे के 16जुलाई के इश्यू में कवर स्टोरी दी सिक्रेट प्लाट टू ब्लेम इंडिया में मुझे मेरे मज़ामीन को, ए आर अन्तुले साहब, और दिग्विजय सिंह जी का हवाला दिया गया है। अन्तुले साहब ने अपने अल्फ़ाज़ को अपनी ग़लती तस्लीम कर लिया, दिग्विजय सिंह जी ने ख़ामोश रहने का फ़ैसला कर लिया, पर मैं अपने लिखे मज़ामीन के एक एक लफ़्ज़ पर क़ायम हूँ। हमारी खु़फ़िया तंज़ीमों की रिपोर्ट के मुताबिक़ और तमाम सबूतों की रौशनी में मैं पाकिस्तान को ज़िम्मेदार मानता हूँ लेकिन इससे शहीद हेमंत करकरे की तफ़तीश को रद्दी की टोकरी में नहीं फेंका जा सकता है, मैंने सवाल उठाए उन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। आरएसएस को जांच में बेदाग़ साबित हुए बगै़र, क्लीनचिट नहीं दी जा सकती। ये आरएसएस की नहीं देश की आबरू का सवाल है और देश की अस्मत के सामने आरएसएस कया है, जिन्हें अज़ीज़ बर्नी के लिखने से तकलीफ़ है वो असीमानंद का क़ुबूल नामा पढ़ लें। सीआईए, मोसाद और आरएसएस का गठजोड़ शहीद हेमंत करकरे की जांच का नतीजा है, मेरे दिमाग़ की उपज नहीं है, इस पर बात ना करना, कौन सा राष़्ट्रा हित है, ये राष़्ट्र नेता जानें, मेरे जैसा हिंदुस्तानी ना समझता है ना समझना चाहता है। अज़ीज़ बर्नी की रगों से वीर अबदुल हमीद के ख़ून की उम्मीद की जा सकती है , पुरोहित या उपाध्याय के ख़ून की नहीं, चुप हूँ यार अपनी मर्ज़ी से, पिंजरे में क़ैद हूँ गूंगा नहीं हूँ, पैरों में बेड़ियां नहीं हैं। मुझे मत बताओ किस ने क्या गुनाह क़बूल किया और क्या बयान दिया है। इस सिस्टम ने दिल्ली के मोहम्मद आमिर से भी सारे गुनाह क़बूल करा लिए थे, फिर उसने ख़त लिखा मुझे तिहाड़ जेल से, मैंने सच बेनकाब करने का अज़्म किया, अल्लाह का करम है वो बाइज़्ज़त बरी हुआ। ठीक है मुझे सज़ा मिली कोई बात नहीं। आमिर जैसे बहुत से बेगुनाह आज़ाद तो हुए।
कोई बात नहीं, शेर अभी माँद में है, आपकी दुआएं साथ रहीं और खुदा चाहेगा तो फिर निकलेगा बाहर और रखेगा सच सामने। महात्मा गांधी के लिए ज़मीन तंग कर दी गई थी अंग्रेज़ों के ज़रीए, फिर उन्होंने हिंदूस्तान की आज़ादी की जंग जारी रखी साऊथ अफ़्रीक़ा में, हो सकता है मुझे भी वतन छोड़ना पड़े लेकिन ये सिलसिला रुकेगा नहीं। ज़रूरत पड़ी तो तारीख़ को फिर दुहराया जाएगा, हम आज़ाद हिंदुस्तान में पैदा हुए मुसलमान हैं हमें ग़ुलाम बनाया जाय, ये हो नहीं सकता, 10-20 या 100-50 कुर्सी के भूखे ख़रीदे जा सकते हैं, 24करोड़ हिंदुस्तानी मुसलमान नहीं। आप इस तादाद पर भी सवाल करेंगे, मुसलमान तो 12करोड़ हैं, ये 24करोड़ क्यों लिख रहा है, करूंगा इस मौज़ू पर भी बात, अभी तो इंडिया टुडे के ज़रीया उठाए गए सवालों का जवाब देना है। वो सब मज़ामीन हैं मेरे पास। फेसबुक के रीडर की अदालत में एक एक कर सब को पेश कर देना है, फिर पूछना है बताओ देश हित किया है, क्या ग़लत लिखा मैंने , हाँ आरएसएस हित का ध्यान नहीं रखा ये ज़रूर किया मैंने लेकिन राष़्ट्र हित मेरे लिए कल भी बहुत अहम था आज भी बहुत अहम है और कल भी अहम रहेगा।

Monday, July 23, 2012

धीरे-धीरे सुलग रही है राजधानी, अकबराबादी मस्जिद पर पहुंचे 12 हजार लोग



जामा मस्जिद स्थित सुभाष मैदान पर अब भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। एनएमसीडी द्वारा सुभाष मैदान को सील किए जाने के बाद से ही पुलिस और एक समुदाय के लोगो के बीच रुक-रुक कर झड़प जारी है।

सुभाष मैदान के अंदर सीआरपीएफ और बाहर दिल्ली पुलिस व सीआरपीएफ के जवानों की भारी संख्या के बाद भी दोपहर 2.20 बजे फिर आधा दर्जन युवक दीवार को फांद कर विवादित परिसर में प्रवेश करने में कामयाब रहे। लेकिन अंदर सुरक्षा में तैनात केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बलों के जवानों ने उन युवकों को खदेड़ कर तुरंत बाहर कर दिया।

इसके बाद वहां लोगो ने पुलिस के विरोध में नारेबाजी शुरू कर दी। अब भी बड़ी संख्या में दूर-दूर से लोग मस्जिद देखने के लिए आ रहे हैं और वे मेट्रो द्वारा लगाए गए चादरों के छेद या ग्रिलों, आस-पास के घरों पर चढ़कर अंदर की एक झलक देखने का प्रयास कर रहे हैं जिसे रोकने पर पुलिस को पसीने छूट रहे हैं।

मौके पर एक प्रत्यक्षदर्शी नवाबुद्दीन (58)और रफीक उल्ला (22)ने बताया कि शनिवार को जामा मस्जिद की नमाज के बाद तराबी शुरू होते ही यहां पर लगभग 10 से 12 हजार लोगों की भीड़ एकत्रित हो गई थी। भीड़ सुरक्षा कर्मियों को धकियाते हुए सुभाष मैदान के अंदर घुस गई।

इसके बाद पुलिस बल का प्रयोग करते हुए भीड़ को विवादित परिसर से बाहर निकाल दिया। इसी बीच और काफी संख्या में भीड़ जमा हो गई और पुलिस, एमसीडी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए बसों के शीशे तोड़ दिए, बसों में आग लगाने की कोशिश की। पुलिस ने फिर भीड़ बल प्रयोग करते हुए लगभग एक दर्जन आंसू गैस के गोले छोड़कर स्थिति पर काबू किया।

सुभाष मैदान पर सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं हैं इसी कारण कुछ असामाजिक तत्व सील परिसर में घुसकर कानून को तोड़ रहे हैं। सुभाष मैदान सील कर पुलिस के हवाले किए जाने के बाद सारी जिम्मेदारी पुलिस की है। -योगेन्द्र चांदोलिया, स्थायी समिति अध्यक्ष

कुछ असमाजिक तत्व है जो दंगा करवाने के लिए परिसर में घुसने का प्रयास कर रहे हैं। मामला कोर्ट में है और कोर्ट का जो भी आदेश है वह हम सभी को मानना चाहिए। -शोएब इकबाल, विधायक 

Thursday, May 03, 2012

समाज को आईना दिखाती रिपोर्ट


हाल में यूनीसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 22 फीसदी लड़कियां कम उम्र में ही मां बन जाती हैं और 43 फीसदी पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बच्चे कमज़ोर और एनीमिया से ग्रसित हैं. इन क्षेत्रों के 48 प्रतिशत बच्चों का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में बहुत कम है. यूनिसेफ द्वारा चिल्ड्रन इन अर्बन वर्ल्ड नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी ग़रीबों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां गंभीर बीमारियों का स्तर गांव की तुलना में अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार शहरों में रहने वालों की संख्या तक़रीबन 37 करोड़ है. इनमें अधिकतर संख्या गांव से पलायन करने वालों की है. इन शहरों में हर तीन में से एक व्यक्ति नाले अथवा रेलवे लाइन के किनारे रहता है.
देश के बड़े शहरों में कुल मिलाकर क़रीब पचास हज़ार ऐसी बस्तियां हैं, जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. ऐसी बस्तियों में रहने वाले बच्चों में बीमारियां अधिक होती हैं, क्योंकि न तो उन्हें उचित वातावरण मिल पाता है और न ही सही ढंग से इनका लालन-पालन होता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में कम उम्र के बच्चों की मौतों में 20 प्रतिशत भारत में होती है और इनमें सबसे अधिक अल्पसंख्यक तथा दलित समुदाय प्रभावित हैं. रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि सरकार ने जिस तरह से ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए योजनाएं चला रखी हैं, वैसी ही योजनाएं शहरों में रहने वाले ग़रीब बच्चों के लिए भी शुरू की जानी चाहिए. दुनिया भर में बच्चों के विकास के लिए कार्य करने वाली इस संस्था ने अपनी रिपोर्ट के माध्यम से भारतीय समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया है, जो सराहनीय है.
हिंदुस्तान सदियों से एक ऐसा देश रहा है, जो अपनी सांस्कृतिक विरासत और उन्नत सामाजिक चेतना के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, जहां महिलाओं और बच्चों को भगवान का दर्जा दिया जाता है. ऐसे में यदि यूनिसेफ हमें यह आईना दिखाता है तो यूं ही नहीं बल्कि इसके पीछे कुछ न कुछ वास्तविकता होगी. जिस देश में आज भी नारी की देवी के रूप में पूजा की जाती है, उसी देश की राजधानी में बलात्कार, अत्याचार और खुलेआम सेक्स के बाज़ार चलाए जाते हैं. शायद ही कोई ऐसा दिन होता है, जब समाचार पत्रों में किसी महिला के साथ गैंगरेप या शोषण की कोई खबर प्रकाशित नहीं होती है. जब देश की राजधानी का यह हाल है तो छोटे शहरों और क़स्बों की स्थिति क्या होती होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है. क्योंकि इन सभी जगहों पर या तो मीडिया की पहुंच नहीं होती है अथवा समाज में बदनामी के डर से लोग मामले पर चुप्पी साध लेते हैं. यदि किसी ने हिम्मत दिखाकर शोषण और अत्याचार के खिला़फ आवाज़ बुलंद करने की कोशिश की और थाने में रिपोर्ट लिखानी चाही तो थानेदार साहब अपनी रिपोटेशन बचाने के लिए एफआईआर दर्ज करने से बचने की कोशिश करते हैं. कभी-कभी स्वयं अभिभावक सामाजिक प्रतिष्ठता के नाम पर अपनी बेटी को मार डालने से भी नहीं हिचकते हैं. इसकी ताज़ा मिसाल हाल में घटित हुई मेरठ की घटना है, जहां पिछले माह राजमिस्त्री का काम करने वाले एक पिता ने अपनी दो जवान बेटियों की गर्दन रेत कर स़िर्फ इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि उसे इन दोनों के चाल-चलन पर शक था और इसके कारण उसे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठता गिरती नज़र आ रही थी. अपनी इस करतूत पर उसे ज़रा भी अ़फसोस नहीं था. दिल्ली से सटे हरियाणा में आए दिन खाप पंचायत के फैसले नारी शोषण की कहानी बयां करते हैं, जहां ज़बरदस्ती पति-पत्नी को भाई-बहन साबित कर दिया जाता है.
यदि देश के नौनिहालों विशेषकर जन्म लेनी वाली बच्चियों की बात करें तो आज भी हमारा समाज लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों को तरजीह देता है. दिल्ली की फलक और बंगलुरू की आ़फरीन इसकी मिसाल है, जिन्होंने ज़िंदगी की परिभाषा को समझने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया. दोनों का क़सूर सिर्फ इतना था कि वे लड़कियां थीं. फलक को उसकी मां पर पिता द्वारा किए गए ज़ुल्म और फिर महिला व्यापार का धंधा चलाने वालों ने मौत के मुंह तक धकेला, तो वहीं तीन माह की आ़फरीन को स्वयं उसके पिता ने पटक-पटक कर स़िर्फ इसलिए मार डाला, क्योंकि उसे लड़की नहीं लड़का चाहिए था. दूसरा उदाहरण बिहार के दरभंगा शहर का है, जहां एक नामी अस्पताल के बग़ल के कूड़ेदान में एक नवजात बच्ची को फेंक दिया गया और कुत्ते उसे नोंच-नोंच कर खा गए. इस दौरान किसी ने भी पुलिस को बुलाने का कष्ट नहीं किया और न ही यह खबर मीडिया में बहस का विषय बनी, क्योंकि मामला दिल्ली अथवा इसके आसपास घटित नहीं हुआ था. शायद समाज को भी इस प्रकार की आदत सी हो गई है, जो इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जगह इसे दिनचर्या मान चुका है.
ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जो यह साबित करते हैं कि यहां कथनी और करनी में एक बड़ा अंतर है. हम नारी को देवी के रूप में सम्मान देने की बात तो करते हैं, परंतु उसे समान दर्जा नहीं देना चाहते हैं. हम बच्चों को भगवान का रूप तो मानते हैं, परंतु उनका ख्याल नहीं रखना चाहते हैं. यूनिसेफ की रिपोर्ट हमें कहीं न कहीं इसका आईना ही दिखाती है. इतनी सारी योजनाएं चलाई जा रही हैं. इसके बावजूद कुपोषित बच्चों के प्रतिशत में संतोषजनक गिरावट क्यों नहीं आ रही है? जब हमारे देश में बाल विवाह क़ानून लागू है, फिर कैसे बच्चियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है? यह सवाल भी हमारे बीच से उठा है तो जवाब भी हमारे बीच मौजूद है. शायद इसका सीधा जवाब यही है कि जब तक समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक इस तरह के आंकड़े हमें शर्मिंदा करते रहेंगे.

Thursday, December 29, 2011

ई-मेल का खेल


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दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के धर्म निरपेक्ष होने के दावे उस समय खोखले दिखाई पड़ते हैं जब मुसलमानों की देश भक्ति को शक की निगाहों से देखा जाता है। देश में जब भी आतंकवादी धमाके होते हैं तो मुसलमानों को शक की निगाहों से देखा जाता है। इस मामले में मुसलमानों को लपेटने में मीडिया की अहम भूमिका होती है। क्योंकि मामले को इतना लपेटकर पेश किया जाता है कि मुस्लिम चेहरों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। आप के सामने लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ माना जाने वाले मीडिया की कुछ तस्वीर पेश करते हैं-
7 सितम्बर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट को इस तरह से पेश किया किया जैसे कि सिर्फ एक समुदाय विशेष को टारगेट किया जा रहा है। धमाके के जाँच में जुटी जाँच एजेंसियों को कोई सबूत मिले बगैर ही हमलावरों का स्कैच जारी कर दिया गया। मुस्लिम नामों वाले संगठनों का हौव्वा खड़ा किया गया। जाँच के नाम पर मुसलमानों को परेशान किया गया। इस आतंकवादी घटना को अंजाम देने की जिम्मेदारी वाला ई मेल आतंकवादी संगठन हूजी की तरफ से आया, ऐसा बताया गया। बाद में पता चला कि यह ई मेल जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ से आया था। दिल्ली बम ब्लास्ट के आरोप में दो मुस्लिम छात्रों को गिरफ्तार किया गया। ई मेल की वास्तविकता को जाँचे वगैर पुलिस और मीडिया द्वारा इस ब्लास्ट का संबंध हूजी से जोड़ दिया गया। लेकिन कई सवालों को दबा दिया गया। मसलन यह कि विस्फोट हूजी ने अंजाम दिया तो उसने अपना नाम ग़लत क्यों लिखा। क्या इसके सदस्य इतने कायर हैं कि अपने संगठन का नाम नहीं लिख सकते। इससे पहले कई और धमाकों को लेकर भी हूजी पर आरोप लगते रहे हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट मामले में दूसरा ईमेल गुजरात के अहमदाबाद से आया बताया गया। इसमें मनु नाम के एक हिन्दू युवक का नाम सामने आया। ख़बरों के अनुसार अमरीकी जाँच एजेंसी एफ.बी.आई ने इस मामले में सईद-अल-हवरी का नाम चुना। इसमें बताया गया कि गुजरात के कई शहर आतंकवादियों के निशाने पर हैं। इस युवक के बारे में न तो किसी मीडियाकर्मी ने मामले को उठाया और न ही प्रशासन ने।
कल्पना कीजिए कि मनु या शनि शुक्ला के अलावा अगर कोई मुसलमान होता तो मीडिया का रवैया कैसा होता, इस ख़़बर को कई नज़रों से देखा जाता। किश्तवाड़ में पकड़े गए दो नौजवान जो मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिनकी उम्र 18 साल से कम है उन पर आरोप लगाए गए कि इंटरनेट के माध्यम से धमकी भरा ईमेल भेजा। लेकिन ख़बरों में उनके नाबालिग होने का जिक्र नहीं किया गया। अंग्रेजी के एक बड़े अखबार ने 15 सितम्बर के प्रकाशन में कश्मीर और पश्चिम से इंडियन मुजाहिदीन और हूजी ईमेल के हवाले से गिरफ़्तारी की ख़बर प्रकाशित की। दोनों ख़बरों में शनि शुक्ला वाली खबर इस तरह है कि मजाक में ईमेल भेजने के सिलसिले में युवक को गिरफ्तार किए जाने की खबर दी गई थी।
तीसरा ईमेल जिसके बारे में कहा जाता है कि इंडियन मुजाहिदीन ने भेजा है जो छोटू मिनानी (chotoominani5@gmail.com) के नाम से भेजा गया है। इसके बारे में जाँच इस नतीजे पर पहुँची है कि इसे पश्चिमी बंगाल और झारखंड की सीमा पर स्थित पाकोड़ नामक स्थान से भेजा गया था। कोलकाता पुलिस ने शनि शुक्ला को इस मामले में गिरफ्तार किया जिसकी उम्र 14 साल है। अखबारों में उसके नाबालिग होने की खबर को महत्व दिया गया।
उल्लेखनीय है कि इंडियन मुजाहिदीन के नाम से भेजे गए उक्त ईमेल का सन्देश पिछले सभी ईमेल संदेशों से भिन्न था। इस मेल में कहा गया था कि दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट हमने किया था न कि हूजी और न ही अन्य किसी ने। इस ईमेल में साफ लिखा गया था कि हमने जानबूझकर बुधवार का दिन चुना क्योंकि इसी दिन कोर्ट में जनहित याचिकाओं की सुनवाई होती है, जिसकी वजह से कोर्ट में अधिक भीड़ होती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट के जाँच के मामले में नया मोड़ उस समय आया जब चश्मदीद गवाह ने यह खुलासा किया कि बम एक कोरियर पैकेट में सफेद कपड़े में लपेट कर रखा गया था। फिलहाल सरकारी अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। पुलिस और मीडिया ने मुसलमानों की छवि को खराब निश्चित रूप से किया है जिसकी वजह से एक टोपी और दाढ़ी वाले आदमी को शक भरी नजरों से देखा जाता है।
हालाँकि आतंकवादी हमले को हम किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। आतंकवाद का न कोई चेहरा, न कोई मजहब होता है। इसे रोकने के लिए जायज कदम उठाने चाहिए। आतंकवाद की आड़ में किसी विशेष वर्ग को टारगेट बनाने के बजाए लोगों को आपस में जोड़ने की बात करनी चाहिए। जिससे कि लोगों में भाई-चारा व प्रेम बना रहे और मुल्क में शांति कायम रहे।

मो.09540147251

Tuesday, December 13, 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग ३


मुम्बई सीरियल धमाकों के तुरन्त बाद मीडिया में आने वाली खबरों की शुरुआत पुणे और वाराणसी की घटना के बाद वाले समाचारों से भिन्न नहीं थी। हालाँकि इस बार इंडियन मुजाहिदीन का ईमेल भी नहीं था। 13 जुलाई की शाम को लगातार बारिश के कारण जाँच में कई प्रकार की बाधाएँ थीं। अफवाहों के कारण यातायात बाधित होने की आशंका से स्थानीय प्रशासन ने थोड़े समय के लिए मोबाइल नेटवर्क जाम कर दिया था। धमाके के बाद से समाचार पत्रों के प्रकाशन में दो से तीन घण्टे का समय भी बाकी था। शायद इतने कम समय में जाँचदल के घटना स्थल पर पहुँचने पर कोई निश्चित जानकारी हासिल कर पाना भी संभव नहीं हो पाता। यदि कोई सुराग हाथ आ भी जाता तो यह तय कर पाने के लिए समय नहीं था कि जाँच हित में उसे सार्वजनिक किया जाए अथवा नहीं। केन्द्रीय गृहमंत्री ने धमाकों से पूर्व किसी भी खुफिया जानकारी के होने से साफ इंकार किया था। ऐसे में अगले ही दिन कई समाचार पत्रों में इस समाचार से खुफिया एजेंसी (आई0बी0) की भूमिका एक बार फिर संदेह के घेरे में आती है। ‘‘धमाकों से दहली मुम्बई’’ ’......इन हमलों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तोयबा का हाथ होने की आशंका है’ (दैनिक जागरण 14 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘मुम्बई में आतंकी हमला’’ .....विस्फोटों के पीछे इंडियन मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तोयबा का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है....’’ (हिन्दुस्तान 14 जुलाई पृष्ठ-1) यही नहीं अगले दिनों के समाचार पत्रों में देश के कई क्षेत्रों के कथित इंडियन मुजाहिदीन माड्यूल्स पर यकीन की हद तक शक जाहिर करने वाले समाचार खुफिया एजेंसियों के हवाले से प्रकाशित होते रहे। इन समाचारों के शीर्षकों से ही उनके प्रायोजित होने का संदेह होता है। ‘‘आई0एम0 माड्यूल्स की तलाश में आजमगढ़ में छापे’’ ‘‘ जाँच एजेंसियाँ खाली हाथ’’ कहीं आत्मघाती हमला तो नहीं’’ (हिन्दुस्तान 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘आई0एम0 के भटकल ग्रुप का हाथ’’ ‘‘मानव बम इस्तेमाल भी जाँच के घेरे में’’ जाँच एजेंसियाँ खाली हाथ’’ (दैनिक जागरण 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘ब्लास्ट का यूपी कनेक्शन तलाश रही ए0टी0एस0’’ (दैनिक जागरण 15 जुलाई पृष्ठ-13) ‘‘शक की सुई आत्मघाती हमलावर पर’’ (अमर उजाला 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘पुलिस की जाँच दायरे में हैं कई आतंकी संगठन’’ (अमर उजाला 15 जुलाई पृष्ठ-13) एक ही दिन के अखबार के इन समाचार शीर्षकों से स्पष्ट होता है कि उन्हें कोई अज्ञात शक्ति नियंत्रित कर रही है। वह शक्ति यह तय कर चुकी है कि इन धमाकों का आरोप इंडियन मुजाहिदीन पर ही डालना है और वह लगातार एक-एक चीज़ की निगरानी भी कर रही है। मुम्बई के झाबेरी बाजार में आत्मघाती हमला होने के समाचार लगभग सभी समाचार पत्रांे में 15 जुलाई को छपे तो 16 जुलाई को ‘‘धमाकों के पीछे हो सकता है कोई नया संगठन’’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में कहा गया.... जाँच अधिकारियों का मानना है कि पिछले कुछ महीनों में आन्ध्र प्रदेश और केरल से कुछ कम उम्र मुस्लिम युवकों के फिदाईन संगठन में शामिल होने की खुफिया एजेंसियों ने जानकारी दी थी।’’ (अमर उजाला 16 जुलाई पृष्ठ-13) पहले फिदाईन हमले की आशंका जताने वाला समाचार और अगले दिन खुफिया एजेंसियों के हवाले से आने वाली इस खबर को जोड़कर देखा जाए तो साफ तौर पर यह लगता है कि आत्मघाती हमला साबित होने की सूरत में भी यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि जाँच की जो दिशा पहले तय की जा चुकी है उस पर कोई आँच न आने पाए। लगभग एक सप्ताह तक चलने वाले इस अभियान में इंडियन मुजाहिदीन के भूत को सिर पर उठाए खुफिया एजेंसियाँ देश भर में भ्रमण करती रहीं। कभी कोलकाता से तार जोड़ने का समाचार छपा तो कभी वाराणसी विस्फोट से। कई जगहों से पूछताछ और मुस्लिम युवकों को हिरासत में लेकर यातना देने के समाचार भी आए। फैज उसमानी की मुम्बई क्राइम ब्रांच द्वारा पूछताछ के दौरान टार्चर किए जाने से मृत्यु भी हो गई। जेलों में बंद धमाकों के आरोपियों से भी पूछताछ की गई। इस पूरी कवायद से देश भर में दो बड़े समुदायों के बीच भय और संदेह का वातावरण निर्मित होने में अवश्य मदद मिली परन्तु तीन महीने बाद भी गुत्थी नहीं सुलझ सकी। जाँच के गलत दिशा में जाने का यह एक और सुबूत है।
पुणे और वाराणसी धमाकों के बाद बगैर किसी ठोस सुराग के इंडियन मुजाहिदीन और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया बाजी को लेकर मानवाधिकार संगठनों और सभ्य समाज ने कड़ी आपत्ति जताई थी। शायद इसी वजह से मुम्बई सीरियल धमाकों के बाद केन्द्रीय गृह मंत्री, गृह सचिव और स्वयं मुम्बई ए0टी0एस0 चीफ ने लगातार यह बात दोहराई कि ऐसा कोई सुराग नहीं मिला है जिससे स्पष्ट रूप से किसी संगठन या व्यक्ति पर उँगली उठाई जाए। फिर भी धमाकों के बाद इंडियन मुजाहिदीन और उसके नाम पर मुसलमानों के खिलाफ पहले से भी ज्यादा आक्रामक मीडिया अभियान पर सीधे इंटेलीजेंस ब्यूरो पर उँगली उठ रही है। आई0बी0 पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह भगवा आतंकवाद पर परदा डालने और अपनी नाकामियों से जनता का ध्यान हटाने के लिए मीडिया को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

समाप्त
मो. 09455571488

Thursday, December 08, 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग २


 
भगवा आतंकवाद से परदा उठते ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कर्नल पुरोहित एण्ड कम्पनी की गिरफ्तारी के साथ-साथ उनके द्वारा कराए गए बम धमाकों का आरोप मुसलमान युवकों पर मढ़ने की साजिश का पर्दा भी फाश हो गया। आतंकवाद के नाम पर अब चलने वाली एक तरफा बहस को एक और रुख मिल गया। खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे। विशेष रूप से समझौता एक्सप्रेस धमाके को लेकर इन्टेलीजेंस ब्यूरो (आई0बी0) पर प्रत्यक्ष रूप से टिप्पणियाँ होने लगीं। 26/11 के मुम्बई पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के दौरान भगवा आतंकवाद का खुलासा करने वाले तत्कालीन मुम्बई ए0टी0एस0 चीफ हेमन्त करकरे संदिग्ध परिस्थितियों में शहीद हो गए। उसके बाद देश में होने वाली सभी आतंकी घटनाओं के पश्चात खुफिया एवं अन्य बेनामी सूत्रों के हवाले से सघन मीडिया अभियान की शुरुआत हो गई। खास बात यह कि साध्वी और उसके साथियों की गिरफ्तारी के बाद मुम्बई ए0टी0एस0 की कहानी से ज्यादा रुचि मीडिया ने उन समाचारों में दिखाई जिनमें उन गिरफ्तारियों का विरोध किया गया था। आतंकवाद को लेकर संघ परिवार के तेवर बदल गए। हेमंत करकरे को धमकियाँ मिलने लगीं। परन्तु इस विषय पर एक दो खबरों के अपवाद को छोड़ दें तो कोई मीडिया अभियान नहीं चला। पुलिस रिमाण्ड के दौरान साध्वी पर बल प्रयोग को लेकर अडवाणी जी नाराज हो गए तो प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार उन्हें मनाने उनके निवास तक गए। जो शक्तियाँ आतंकवाद के मामले में सरकार के नरम रवैये की कटु आलोचक थीं व्यक्ति और संगठन का नाम बदलते ही पुलिस के तौर तरीके में उन्हें इतनी सख्ती नजर आई कि बिलबिला उठे। भगवा आतंकवाद के खुलासे से उत्पन्न नई परिस्थितियों को बदलने और पुरानी हालत बहाल करने के लिए यह सभी शक्तियाँ एक जुट प्रयास में लग गईं। जिसके नतीजे में अगले धमाके से ही शक्तिशाली मीडिया अभियान की शुरुआत भी हो गई।

13.02.2010 का पुणे जर्मन बेकरी धमाका हो या 07.12.2010 का शीतला घाट, वाराणसी विस्फोट, 13.07.11 का मुम्बई सीरियल ब्लास्ट हो या 13.09.11 की दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर की घटना, इन सभी वारदातों के बाद खुफिया सूत्रों के हवाले से मीडिया में लगातार आने वाले समाचारों में भगवा आतंकवाद से जनता का ध्यान हटाकर जेहादी आतंकवाद को पूरी तरह फिर से स्थापित करने के प्रयासों की झलक साफ दिखाई देती है।

पुणे धमाके के तुरन्त बाद इंडियन मुजाहिदीन और उसके पाकिस्तानी कनेक्शन की खबरें अलग-अलग सूत्रों से आना शुरू हो र्गइं। घटना को अंजाम देने वाले माड्यूल्स के तार कभी पुणे और मुम्बई से जुड़े बताए गए तो कभी उत्तर प्रदेश और भटकल से। अभी कडि़याँ जुड़ भी नहीं पा रही थीं कि जल्दबाजी में भटकल के एक युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले कि ए0टी0एस0 उसके दोषी होने का प्रथम दृष्टया कोई सुबूत दे पाती उसने अपनी बेगुनाही अदालत में साबित कर दी। शीतला घाट वाराणसी के धमाके के पश्चात खुफिया एजेंसियों ने एक बार फिर शक की सुई इंडियन मुजाहिदीन की तरफ घुमाई। इस बार आई0एम0 का कथित आजमगढ़ माड्यूल निशाने पर रहा। कुछ मुस्लिम युवकों के नाम भी उछाले गए। इस घटना को अंजाम देने वाले सूत्रधारों के बारे में खुफिया एजेंसियों (आई0बी0 तथा रा) के हवाले से कभी यह खबर आई कि वे शारजाह में हैं तो कभी पाकिस्तान में। जाहिर सी बात है कि शीतला घाट पर फटने वाले बम को उतनी दूर से उछाला नहीं जा सकता था। इसके लिए यहाँ पर कुछ लोगों की मौजूदगी आवश्यक थी। ऐसी स्थिति में इन सम्पर्क सूत्रों तक पहुँचे बगैर सूत्रधारों तक पहुँचने की थ्योरी कितनी हास्यास्पद और दुर्भावना पूर्ण है। लगभग एक साल बीत जाने के बाद भी अब तक जाँच में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। इससे जाहिर होता है कि जाँच की दिशा ही गलत थी और इसकी जिम्मेदारी खुफिया एवं जाँच एजेंसियों पर ही जाती है। समाचार माध्यमों पर खुफिया एजेंसियों का कितना नियंत्रण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुम्बई धमाकों के बाद पिछले विस्फोटों को अंजाम देने वाले संगठनों की जो सूची समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है उसमें पुणे और वाराणसी धमाकों के सामने इंडियन मुजाहिदीन का नाम अंकित है। हालाँकि उनको अभी हल नहीं किया जा सका है।

क्रमश:


मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग १


दिल्ली से प्रकाशित होने वाले उर्दू समाचार पत्र ‘सहरोजा दावत’ में सुप्रीम कोर्ट के वकील एन0डी0 पंचोली से बातचीत पर आधारित एक लेख ‘‘मीडिया इन्टेलीजेन्स के जेरे कन्ट्रोल (अधीन)’’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है ‘‘ इस वक्त सरकारों ने अवाम (जनता) को गुमराह करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। यही नहीं उस पर इन्टेलीजेन्स का भी कंट्रोल है। खुफिया संस्थाएँ (एजेंसियाँ) जिस तरह की खबरें चाहती हैं मीडिया उसी तरह की खबरें उसी अंदाज में पेश करता है। इससे अवाम की ताकत घटी है और यह जमहूरियत (लोकतंत्र) के लिए बड़ा खतरा है। क्योंकि जो बातें आनी चाहिए वे नहीं आती हैं और जो आ रही हैं उन्हें तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।’’ विद्वान अधिवक्ता, माओवाद और आतंकवाद समेत देश की आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष चुनौतियों तथा सरकार एवं खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर चर्चा कर रहे थे। आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए खुफिया एवं जाँच एजेंसियाँ पिछले कुछ सालों से लगातार सवालों के घेरे में रही हैं। इन्टेलीजेन्स ब्यूरो (आई0बी0) समेत पूरे खुफिया तंत्र पर साम्प्रदायिक आधार पर मुसलमानों के प्रति भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाने का आरोप भी लगता रहा है। हर आतंकी वारदात के बारे में खुफिया एजेंसियों और उनके बेनामी सूत्रों के हवाले से प्रकाशित होने वाले समाचार श्रृंखलाओं से इन आरोपों को बल मिलता है तो जाँच एजेंसियों की कार्यशैली इसे और गंभीर बना देती है।

जहाँ तक आतंकी वारदातों के पश्चात खुफिया एजेंसियों और विभिन्न सूत्रों के हवाले से आने वाले समाचारों, सुर, दिशा, आक्रामकता और कुछ मामलों में निष्तेजता का प्रश्न है वह परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा है। भगवा आतंकवाद के सामने आने से पहले किसी घटना को अंजाम देने वाले सम्भावित संगठनों या व्यक्तियों के नामों को लेकर सूत्रों के हवाले से छपने वाले समाचार बहुत कम देखने को मिलते थे। घटना के तुरन्त बाद लश्कर, हूजी, या हिजबुल जैसे संगठनों के साथ सिमी का नाम जोड़ दिया जाता है। शुरुआती दौर में गिरफ्तार होने वाले कथित आतंकियों में कुछ कश्मीरियों के साथ उत्तर, मध्य या दक्षिण भारत के कुछ मुसलमानों के नाम शामिल हुआ करते थे। कश्मीर के अलगाववादी आन्दोलन और इन घटनाओं में कश्मीरियों के नाम शामिल होने के कारण जेहादी आतंकवाद तथा उससे मुसलमानों के जुड़ाव को आम स्वीकार्यता प्राप्त हो गई थी। इसलिए किसी मीडिया ट्रायल या अभियान की आवश्यकता ही नहीं रह जाती थी। आतंकवाद से मुक्ति दिलाने के नाम पर फर्जी इनकाउन्टरों का भी एक दौर आया। कई मामलों में सच्चाई मीडिया तक पहुँची भी परन्तु वह कोई खबर नहीं बन पाई। आजमगढ़ से हकीम तारिक और जौनपुर से मौलाना खालिद को क्रमशः 12 और 16 दिसम्बर को उठा लिया गया। जब उन्हें किसी अदालत में पेश नहीं किया गया तो फर्जी इनकाउन्टर में मार दिए जाने की आशंका को लेकर आन्दोलन शुरू हो गया। आतंकवाद के नाम पर होने वाली नाइंसाफियों के खिलाफ भारत का यह पहला भरपूर आंदोलन था। अन्ततः इन दोनों को 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से हथियार तथा गोला बारूद के साथ हूजी के खूँखार आतंकी के तौर पर गिरफ्तार दिखाया गया। अब तक जो समाचार पत्र उनके अपहरण और तलाश की खबरें छाप रहे थे अचानक उन्हें कट्टर धार्मिक, हूजी एरिया कमाण्डर और आतंकवादी लिखने लगे। पूर्व की खबरों के बिल्कुल उलट पुलिस की कहानी को वैधता प्रदान करने वाले समाचारों से खुफिया एवं जाँच एजेंसियों का मीडिया पर अंकुश का पता चलता है। उन दोनों की गिरफ्तारी की सत्यता जानने के लिए गठित जस्टिस निमेष कमीशन की जाँच के तीन साल से भी अधिक समय से लंबित होने में भी इन एजेंसियों की भूमिका है। बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ पर काफी बहस हो चुकी है और यह सिलसिला अब भी जारी है। परन्तु एक बात बहुत यकीन के साथ कही जा सकती है कि यदि जेहादी आतंकवाद को आम स्वीकार्यता प्राप्त नहीं होती और मीडिया पर इन एजेंसियों की इतनी मजबूत पकड़ न होती तो देश की राजधानी में, दिन के उजाले में दो मासूमों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या न होती।

Sunday, December 04, 2011

क्यों न हो मीडिया भी लोकपाल के दायरे में?


 
टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने मीडिया को लोकपाल से बाहर रखने की वकालत की है। वहीं वे स्वीकारते भी हैं कि तमाम सामाजिक संस्थाओं और मीडिया में भ्रष्टाचार है। नई दिल्ली में पत्रकारों को संबोधित करते उन्होंने मीडिया का पक्ष लिया। साथ ही प्रेस काउंसिल को भी सवालों के घेरे में लाने का प्रयास किया और कहा कि यह सक्षम संस्था है। फिर भी अगर काम नहीं चल रहा है तो उसके लिए अलग से कानून बनाया जा सकता है।
एक ओर वे स्वीकारते हैं कि हर ओर भ्रष्टाचार कायम है और इसके घेरे में मीडिया भी शामिल है ऐसे में उनकी यह सोच पल्ले नहीं पड़ती कि लोकपाल के घेरे से मीडिया को बाहर क्यों रखा जाये? मीडिया के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार की कलई खुल चुकी है। ऐसे में आज जरूरी है कि इस पर विमर्श हो? सवाल यह नहीं कि लोकपाल से बाहर हो? मीडिया के अंदर भ्रष्टाचार स्वीकार है तो फिर ऐसे में श्री केजरीवाल जी का बयान बेमानी लगती है? प्रयास होने चाहिये कि इसे साफ सुथरा और पारदर्शी बनाया जाये। जो भरोसा टूटा है उसे वापस कायम किया जाये?
मीडिया के चरित्र को लेकर अभी बवाल मचा हुआ है। बयानों को लेकर कोहराम है। उंगलियां दोनों ओर उठ रही हैं। यह तब हुआ जब उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश और फिलहाल प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू ने भारतीय मीडिया की कुछ खामियों को सामने लाया है। मार्कडेय मानते है कि हमारा मीडिया फासिस्ट है इसपर नजर रखना जरूरी है। उनकी राय में, ‘भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा खासतौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया जनता के हितों को पूरा नहीं करता, वास्तव में इनमें से कुछ यकीनन जनविरोधी है। भारतीय मीडिया में दोष हैं। जिन्हें मैं रेखांकित करना चाहता हूँ। मीडिया अक्सर लोगों का ध्यान वास्तविक मुद्दों की ओर से अ-वास्तविक मुद्दों की ओर भटकाता है। मीडिया अक्सर लोगों को विभाजित करता है।'
श्री काटजू के स्टेटमेंट पर विशेष कर इलेक्ट्रानिक मीडिया में बौखलाहट देखी गयी। देखा जाय तो श्री काटजू ने उन्हीं चीजों की तरफ इशारा किया है, जो मीडिया को भ्रष्टाचार में लवरेज करने से परहेज नहीं करता, बल्कि सुनिश्चित करता है। एक दौर था जब पत्रकारिता की बागडोर वैसे पत्रकारों के हाथ में थी जो इसे मिशन के तौर पर अपनाये हुए थे, वे आज इतिहास के पन्नों में कैद हैं। वहीं आज के दौर में पत्रकारिता की बागडोर उन लोगों के हाथ में पहुंच रहा है जिन्हें पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं बस उनका ‘मुनाफा’ होना चाहिये। ऐसे में उनसे स्वस्थ पत्रकारिता की उम्मीद की आ सकती है? वरिष्ठ पत्रकार अमलेंदु उपाध्याय कहते है,‘‘क्या यह सही नहीं है कि अब मीडिया के क्षेत्र में बिल्डर, चिट फण्ड कंपनियां और तस्कर उतर रहे हैं। ज्यादा समय कहां बीता है जब मध्य प्रदेश के ग्वालियर में तीस से ज्यादा चिट फण्ड कंपनियों को प्रशासन ने सील किया और मजे की बात यह है कि इनमें से अधिकांश चिट फण्डिए अखबार भी निकाल रहे थे और उनके न्यूज चैनल भी हैं! तो क्या अब पत्रकारिता का पाठ गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबूराव पराड़कर, राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी से न पढ़कर इन चिटफण्डियों और तस्करों से पढ़ना पड़ेगा?''
मीडिया में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं। हंगामा तब बरपा जब मीडिया के बड़े ‘जनाब’ भ्रष्टाचार में फंसे पाये गये। और यह हुआ नीरा राडिया प्रकरण से। इसने भारतीय मीडिया के उस परत को खोला जो दिखता नहीं था। मीडिया के चश्में के ऊपर जमा हुआ ‘भ्रष्टाचार’ नजर जरूर आ रहा था। छोटे या बड़े स्तर पर मीडिया में भ्रष्टाचार इंगित करता है कि पत्रकारिता खतरे में हैं? हालांकि इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि, पत्रकारों की बड़ी जमात आज भी पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रही है। लेकिन, जो दाग मीडिया के उपर लग चुका है या फिर जो कथित मीडिया में भ्रष्टाचार व्याप्त है वह भविष्य के लिए खतरनाक है।
यह सच है कि नीरा राडिया प्रकरण ने भारतीय मीडिया की चूलें हिला दी। मीडिया के शिखर पर बैठे सफेदपोशों को नंगा कर दिया। जनप्रहरी सवालों के घेरे में आ गये। मुद्दे अपनी जगह पर है। लेकिन, जो दाग मीडिया पर लग चुका है, वो जग जाहिर है। राडिया कांड ने पत्रकारों को मजाक का पात्र बना दिया है। मीडिया विशेषज्ञ, वर्तिका नंदा कहती है,‘‘ राडिया कांड के बाद पत्रकारों से पूछा जाता है क्यों भाई मीडिया से आये हो या राडिया से और वह एक छोटा सा मजाक मीडिया के ताजा हाल पर बेहतरीन टिप्पणी बन जाता है। पत्रकारिता को पूरी तरह से उत्पादन बनाते ही जनतंत्र में पत्रकारिता का मूल मकसद कहीं पानी में घुल सा जाता है और धीरे-धीरे जनता का विश्‍वास खो जाता है’’।
भ्रष्टाचार को लेकर हालांकि अक्सर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन छोटे स्तर पर। छोटे-बडे़ शहरों, जिलों एवं कस्बों में मीडिया की चाकरी बिना किसी अच्छे मासिक तनख्वाह पर काम करने वाले पत्रकारों पर हमेशा से पैसे लेकर खबर छापने या फिर खबर के नाम पर दलाली के आरोप लगते रहते हैं। खुले आम कहा जाता है कि पत्रकारों को खिलाओ-पिलाओ-कुछ थमाओ और खबर छपवा लो। जैसे पत्रकार, पत्रकार न हो कोई दलाल हो? मीडिया की गोष्ठियों में, मीडिया के दिग्गज गला फाड़ कर, मीडिया में दलाली करने वाले या खबर के नाम पर पैसा उगाही करने वाले पत्रकारों पर हल्ला बोलते रहते हैं। स्वाभाविक है, हो हल्ला तो होगा ही? नीरा राडिया, विकीलिक्स, पेड न्यूज, सीडी काण्ड, स्टिंग के नाम पर ब्लैकमेल सहित कई ऐसे ढेरों मामले पड़े हैं, जिसने मीडिया को बेहद ही अविश्‍वासी नजरिये से देखने पर मजबूर कर दिया। प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी ने जब मीडिया के अंदर पैसे लेकर खबर छापने यानी पेड न्यूज की खिलाफत करनी शुरू की थी तो मीडिया दो खेमे में बंट गयी। आरोप-प्रत्यारोप की गूँज सुनाई पड़ने लगी थी। आज एक बार फिर मीडिया सवालों के घेरे में आया है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है।
देश भर में घूम घूम कर प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने और खबर बेचने वालों के खिलाफ झंडा उठाया था तो पत्रकारों का एक तबका पेड न्यूज के खिलाफ गोलबंद हुआ तो दूसरी ओर मीडिया हाउसों के मालिकों के हां-में-हां मिलाते पत्रकार, विरोधियों पर हल्ला बोलने से नहीं चूके। खैर, यह उनकी मजबूरी रही होगी? तेजी से मीडिया के बदलते हालातों के बीच पत्रकारिता के एथिक्स और मापदण्डों पर बात करना बेमानी-सी प्रतीत होने लगी है। लोकतंत्र पर नजर रखने वाला मीडिया, धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के जबड़े में पहुंच गया है। हालांकि, इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि, मीडिया की आड़ में दलाली करने एवं खबरों को बेचने जैसे भ्रष्ट तरीके के खिलाफ मीडिया ने सवाल उठाये।
प्रभाष जोशी ने जिस खतरे से अगाह किया था, वह साफ दिखने लगा है। मीडिया में भ्रष्टचार, पत्रकारिता की सेहत के लिए अच्छी नहीं है। इससे सिद्धांत का, खतरे में पड़ जाना तय है। इस खतरे पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए चर्चित पत्रकार मार्क टुली ने वर्ष 2007 में एक बातचीत में  कहा था, ‘‘अगर पत्रकारिता को बचाना है तो पत्रकारिता के पुराने सिद्धांत के अनुसार काम करना पड़ेगा। प्लांटेड स्टोरी नहीं छापनी होगी। किसी भी समस्या के उत्पन्न होने पर एकता बनाकर साथ-साथ लड़ना होगा। अगर आज के पत्रकार अपनी जिम्मेदारी को सही रूप में समझ लें तो निश्चित रूप से पत्रकारिता की गुणवत्‍ता बढ़ेगी इसके साथ ही मैं एक चीज और विशेष रूप से कहना चाहूंगा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया को अपने में ही सुधार लाने की आवश्यकता है अगर वे इसी प्रकार की खबरें प्रसारित करते रहे तो भविष्य में खबर की विश्वसनीयता बनाये रखना मुश्किल हो जायेगा।''
यकीनी तौर पर मौजूदा भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर है। ऐसे में गणतंत्र के प्रहरी मीडिया का भ्रष्टाचार के आगोश में आ जाने पर विषय चिंतनीय प्रतीत होता है। सवाल भ्रष्ट होते पत्र और पत्रकारों का है। जो छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक है। वजह जो भी हो, इसके फैलाव पर अकुंश की जरूरत है। छोटे स्तर पर पत्रकारों के भ्रष्ट होने के पीछे सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक शोषण प्रतीत होता है। छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में 15 सौ रुपये के मासिक पर पत्रकारों से 10 से 12 घंटे काम लिया जाता है। उपर से प्रबंधन की मर्जी, जब जी चाहे नौकरी पर रखे, या निकाल दें। भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह है। वेतन के मामले में कलम के सिपाहियों का हाल, सरकारी आदेशपालों से भी बुरा है। ऐसे में यह चिंतनीय विषय है कि एक जिले, कस्बा या ब्लाक का पत्रकार, अपनी जिंदगी, पानी और हवा पी कर तो नहीं गुजारेगा? वहीं पर कई छोटे-मंझोले मीडिया हाउसों में कार्यरत पत्रकारों को तो कभी निश्चित तारीख पर तनख्वाह तक नहीं मिलती है। सेंटीमीटर या कालम के हिसाब से भुगतान पर काम करने वाले पत्रकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है? उपर से मीडिया हाउस का विज्ञापन लाने और अखबार की बिक्री को बढ़ाने का दबाव। विरोध करने पर निकाल दिया जाता है। आज पत्रकारों से मिशन नहीं दलाली या फिर अखबार चैनल के लिए पैसा उगाही कराये जाने पर दबाव डाला जाता है।
पत्रकार कुमार सौवीर के साथ ऐसा ही कुछ हुआ, उन्होंने अपनी आपबीती, भडास4मीडियाडाटकाम पर डाली और पेड न्यूज के लिए चैनल ने जिस तरह दबाव बनाया उसका खुलासा किया, जो मीडिया के लिए शर्मनाक है।  पत्रकारों को भ्रष्ट बनाने में मीडिया हाउस जिम्मेवार हैं। एक स्ट्रिंगर को प्रति समाचार 10 रु. देते हैं, चाहे खबर एक कालम की हो या चार कालमों की। सुपर स्ट्रिंगर को प्रति माह दो से तीन हजार पर रखा जाता है। छोटे मंझोले समाचार पत्र तो, कस्बा और छोटे जगहों पर कार्यरत पत्रकारों को एक पैसा भुगतान तक नहीं करते। हां उनके समाचार जरूर छप जाते हैं। ऐसे में उन पत्रकारों का आर्थिक शोषण और साथ ही साथ उन्हें विज्ञापन लाने को कहा जाता है, जिस पर कमीशन दिया जाता है। जबकि अखबार के मुख्य कार्यालयों में कार्यरत स्ट्रिंगर और सुपर स्ट्रिंगर को तीन हजार से 14 हजार रुपये प्रतिमाह दिये जाते हैं। संपादक/प्रबंधक तनख्वाह तय करते हैं। अमूमन हर अखबार, कस्बा या छोटे शहरों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि रख लेते हैं, उसे खबर के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। बल्कि वह जो विज्ञापन लाता है, उस पर उसे कमीशन दिया जाता है। अखबार के संपादक/प्रबंधक जानते हैं कि वह बेगार पत्रकार अखबार के नाम पर अपनी दुकान चलायेगा। जो उसकी मजबूरी बन जाती है। आखिर दिन भर अखबार के लिये बेगार करेगा तो खायेगा क्या? हालात यह है कि पैसा मिले या न मिले किसी मीडिया हाउस से जुड़ने के लिए पत्रकारों की लम्बी कतार है। बिना पैसे और विज्ञापन के कमीशन पर काम करने वाले पत्रकार मौजूद हैं? इसके पीछे के कारण को मीडिया में सब जानते है, लेकिन इस परिपाटी को खत्म करने के लिए, किसी भी स्तर पर प्रयास नहीं दिखता।
खबरों का चयन सम्पादकों के हाथों होते हुए आज विज्ञापन प्रबंधन के हाथों में चला गया है। अखबार हो या चैनल अपने को चलाने के लिए, बाजार में बने रहने के लिए, खबरों को बेचने का काम बड़े सफाई से करते आ रहे हैं। तभी तो, चर्चित पत्रकार प्रभात जोशी ने खबरों को बेचे जाने और मीडिया में बढ़ती दलाली को लेकर देश भर में व्याख्यान देकर आलेख लिखकर पत्रकारिता व्यवसायी को बचाने की पुरजोर कोशिश की थी। इसी कड़ी में प्रभाष जोशी ने पटना में एक व्याख्यान के दौरान कहा था-‘‘पत्रकारिता के अंदर आज जो कुछ हो रहा है वह मेरे लिए खतरे की घंटी है। पत्रकारिता किसी मुनाफे या खुशी के लिए नहीं बल्कि पत्रकारिता लोकतंत्र में साधारण नागरिक के लिए एक वह हथियार है जिसके जरिए वह अपने तीन स्तम्भों न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालक की निगरानी करता है। अगर पत्रकारिता नष्ट होगी तो हमारे समाज से हमारे लोकतंत्र में निगरानी रखने का तंत्र समाप्त हो जायेगा। आज पत्रकारिता पर कोड़े बरसाता हूं या धिक्‍कारता हूं तो वह मेरी पीठ पर ही पड़ता है।''
मीडिया में भ्रष्टाचार से इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ खड़ा हुआ है। शर्मसार मीडिया को इस झटके से उबरने में समय लगेगा। मीडिया के उपर दाग लग चुका है। सवाल है कैसे छूटेगा यह...? इन सब में सिद्धांत की पत्रकारिता को चोट लगी है। खतरनाक है इसके दूरगामी प्रभाव। प्रोफेसर बृज किशोर कुठियाला की माने तो, ‘‘भ्रष्टाचार की छोटी-मोटी घटना तो अब सामाचार ही नहीं बनती कार्यपालिक, न्यायपालिका और खबरपालिका सभी में भ्रष्ट व्यवहार की दुर्गंध जनमानस तक पहुंच रही है। यह तो वह कहानियां है जो खुल गयी, परंतु उनके खुलने से मन में एक और डर उत्पन्न होता है कि जो खुला नहीं वह कितना विराट और भयंकर होगा। अंग्रेजी शब्दावली का प्रयोग करें तो जितना खुला वह तो टिप आफ द आईस वर्ग है।''
पत्रकारिता को भ्रष्टाचार के खतरे से बाहर लाना होगा। इसके नकारात्मक भूमिका पर सवाल उठे रहे हैं। बहस/चर्चा/विमर्श जारी है। जरूरत है पत्रकारिता के जनकों ने जो सपना देखा है उसे यों मरने नहीं दिया जाये। लांमबद/गोलबंद होने का समय आ चुका है। ऐसे में सवाल उठता है क्यों न हो मीडिया भी लोकपाल के दायरे में?