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Saturday, February 07, 2015

धार्मिक असहिष्णुता पर पीएम मोदी को अपनी ‘गहरी चुप्पी’ तोड़ने की जरूरत : NEW-YORK-TIMES


अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने आज अपने संपादकीय में कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धार्मिक असहिष्णुता के मुद्दे पर अपनी ‘गहरी चुप्पी’ तोड़ने की जरूरत है। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कल कहा था कि भारत में धार्मिक ‘असहिष्णुता’ से महात्मा गांधी स्तब्ध हो गए होते।

इस टिप्पणी के बाद अखबार के संपादकीय बोर्ड ने ‘मोदी की खतरनाक चुप्पी’ शीषर्क से लिखे गए संपादकीय में कहा है, भारत के धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा के बारे में बोलने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्या चाहिए?उसके अनुसार, ‘श्रीमान मोदी को धार्मिक असहिष्णुता के मुद्दे पर अपनी गहरी चुप्पी तोड़ने की जरूरत है।’
संपादकीय में लिखा है, ईसाइयों के प्रार्थना स्थलों पर हो रहे हमलों पर, भारत के सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व और उनकी सुरक्षा करने के लिए चुने गए व्यक्ति की ओर से कोई ‘प्रतिक्रिया नहीं’ आई और ना ही प्रधानमंत्री ने ईसाइयों और मुसलमानों के हिन्दुत्व में ‘धर्मांतरण’ पर कुछ कहा।
इस संपादकीय के अनुसार, ‘इस तरह बढ़ रही धार्मिक असहिष्णुता पर श्रीमान मोदी की लगातार चुप्पी यह प्रभाव छोड़ती है कि वह हिन्दू राष्ट्रवाद के इन तत्वों को या तो नियंत्रित नहीं कर सकते या फिर करना नहीं चाहते।’
न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकीय में कहा गया है, ‘मोदी ने भारत के विकास के लिए महत्वाकांक्षी एजेंडे का वादा किया है, लेकिन जैसा कि राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले माह नई दिल्ली में दिए गए अपने भाषण में कहा ‘भारत उस वक्त तक सफल रहेगा, जब तक वह धार्मिक आस्था के आधार पर बंट नहीं जाता।’ ओबामा ने कल कहा था कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में सभी धर्मों के लोगों को जिस प्रकार के असहिष्णु कृत्यों का सामना करना पड़ रहा है, उससे महात्मा गांधी स्तब्ध रह गए होते।
ओबामा की यह टिप्पणी आने से एक दिन पहले ही व्हाइट हाउस ने इस बात को खारिज कर दिया था कि नई दिल्ली में 27 जनवरी को ओबामा के भाषण में आया धार्मिक सहिष्णुता का मुद्दा भाजपा पर अप्रत्यक्ष निशाना था।
वाशिंगटन में हाई-प्रोफाइल ‘नेशनल प्रेयर ब्रेकफास्ट’ के दौरान अपनी टिप्पणी में ओबामा ने कहा, ‘मिशेल और मैं भारत से वापस लौटे हैं..अतुलनीय, सुंदर देश, भव्य विविधताओं से भरा हुआ, लेकिन वहां पिछले कुछ वर्षों में कई मौकों पर दूसरे धर्म के अन्य लोगों ने सिर्फ अपनी विरासत और आस्था के कारण सभी धर्मों के लोगों को निशाना बनाया है। इस असहिष्णु व्यवहार से महात्मा गांधी स्तब्ध रह गए होते।’
हाल ही में भारत से लौटे अमेरिकी राष्ट्रपति पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न धर्मों के खिलाफ हुई हिंसा का संदर्भ दे रहे थे। बराक ओबामा ने हालांकि किसी धर्म विशेष का नाम नहीं लिया और कहा कि हिंसा किसी एक समूह या धर्म से नहीं जुड़ी है।

Wednesday, June 04, 2014

मीडिया तुम्हारी जात क्या है बॉस ?


religion-of-indian-mediaमीडिया की जात क्या है? क्या मीडिया की भी कोई जाति होती है?यदि नहीं तो मीडिया में दलितों (पिछड़े-मुस्लिम-महिला) के मुद्दे क्यों नहीं सार्थकता से उठते? हाशिये पर खड़े समाज पर मीडिया क्यों ध्यान नहीं देता ? भुत-प्रेत,  राखी-मीका,  जुली-मटुकनाथ पर पैकेज बनाने वाला मीडिया क्यों दलितों की अनदेखी करता है? जो सरोकारों के साथ चलने का दावा करते हैं उनके प्रयास भी महज रस्म अदायगी क्यों होते हैं?

क्या बाजारवाद के इस दौर में महज इसलिए दलितों की खबरों को जगह नहीं मिलती है क्योकिं उनके सरोकार मध्यवर्गीय विज्ञापन देने वाली कंपनियों के सरोकारों से मेल नहीं खाती? तो क्या बाजारवाद के इस दौर में मीडिया “समाचार वही जो व्यापार बढ़ाये” के मुनाफे के तहत काम करता है? क्या भारतीय मीडिया नवपूंजीवाद के लाभ-हानि के दवाब के तहत काम करता है? यह सभी मीडिया के लिए भले सही न हो परन्तु भूमंडलीकरण के इस दौर में लोकतांत्रिक आग्रह कमजोर हुएं है. इसी का परिणाम है की मीडिया मिशन से कमीशन की तरफ छलांग लगा चुका है.

लोगों से सवाल पूछने वाला मीडिया समूह खुद सवालों के घेरे में आ गया है. क्यों नहीं दलितों के प्रति भारतीय मीडिया का रवैया अभी भी बदला है? न किसी सफाई कर्मचारी की मौत को लेकर सवाल उठाये जातें हैं और न ही कोई पैकेज बनाएं जातें है?क्यों नहीं दलितों के प्रति  हिंसा और बलात्कार की घटना पर्याप्त ध्यान खीच पाती हैं? क्यों नहीं आदिवासी महिलायों की खबरें जगह पाती है? क्यों नहीं मुस्लिमों की बेगुनाह रिहाई खबर बन पाती है? भारतीय मीडिया क्यों नहीं दलितों-पीड़ितों-शोषितों की तरफ अपने आप को खड़ा पाता है?

सीएनएन-आईआबीएन-7 के वरीय समाचार संपादक आकाश,  दलितों की भारतीय मीडिया में उपेक्षा के प्रश्न पर कहतें है- “आरक्षण की सहायता से कार्यपालिका,  न्यायपालिका और विधायिका में दलित तो आये परन्तु आज भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के चौथे खंभे में दलितों की संख्या नगण्य है” इस कथन के समर्थन में कई आंकड़े भी हैं जो इसकी पुष्टि करते हैं.

आजादी के इतने बर्षो के बाद भी दलित वर्ग मीडिया से लगभग गायब है.

मीडिया में जाति की हिस्सेदारी पर बहस खड़ा करना इस लेख का मतलब नही है.  मूल प्रश्न यह है कि मीडिया में दलितों के मुद्दे को जगह क्यों नहीं दी जाती? खैरलांजी घटना इसका उदहारण है जिसको भारतीय मीडिया ने शुरू में कवर नहीं किया था.

प्रसंगवश

1. हरियाणा के हिसार जिले स्थित भागाणा में 23 मार्च को 15-18 वर्ष की अगवा की गई चार मासूम लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की गई. घटना के बाद न्याय की मांग लेकर पीडितायें अपने परिजनों और गावं के 90 दलित परिवारों के साथ जंतर-मंतर पर धरणा दे रहें हैं. यह मुख्यधारा की मीडिया के लिए कोई खबर नहीं है.

2. नागपुर में दलित को जिन्दा जला दिया जाता है और यह मुख्यधारा की मीडिया में खबर नहीं बन पाती है.

3. आतंकवादी बमविस्फोट के झूठे आरोप में दस बरस की सजा काट कर बाहर निकले बेगुनाह मुस्लिमों की तरफ से कोई भी मीडिया समूह सवाल नहीं खड़े करता है.

4. दलित महिलायों को शोषण का शिकार बनना पड़ता है पर वो खबर नहीं बनती. आदिवासी लड़कियां गायब होती हैं, यह खबर नहीं बनती. क्यों ‘सभी के लिए न्याय’ ‘कुछ के लिए अथाह मुनाफे’ के आगे  बेबस नजर आता है? क्या इसके पीछे सिर्फ बाजार का अर्थशास्त्र है या समाजशास्त्र भी है?

सवाल उठता है की क्या मीडिया में इनके मुद्दे कोई मायने नहीं रखतें? क्या मीडिया की कोई जबाबदेही नहीं है? क्या पूंजी और बाजार अब मीडिया के सरोकारों और मिशन को संचालित करेगा? क्या अब मीडिया में सरोकारों को कमीशन से परखा जायेगा. तब किसी भी समाचार को लिखा/प्रसारित किया जाएगा.

छोटे-छोटे और गैरजरूरी मुद्दों को तानने वाला मीडिया अब तक भगाणा के मुद्दों पर खामोश क्यों है? दलित हिंसा पर अब तक क्यों नहीं कोई पैकेज बनती दिख रही है? क्यों नहीं अक्षरधाम बम विस्फोट के बेगुनाह सजायाफ्ता आरोपिय के समर्थन में कोई उसके बेगुनाही की कीमत का हिसाब मांग रहा है?

लोकतंत्र,   विकास और न्याय के पक्ष में मीडिया कब खड़ा होगा?

~मुकेश कुमार

Friday, January 04, 2013

बारा रबीअव्वल – गम या खुशी?



बर्रा सगीर (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश) मे हर साल 12 रबीअव्वल को बड़ी धूम-धाम से रसूल अकरम सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का यौम ए विलादत मनाया जाता हैं, जगह-जगह जुलूस निकलते हैं, गली-गली चरागा होता हैं, खाने-पकाने का भी खूब इन्तज़ाम होता हैं और ये सब एक जश्न की सूरत मे हर साल नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत बड़े ही एहतमाम के साथ करती हैं| और इस जश्न को ईद मिलादुन्नबी कहा जाता हैं|

इसमे कोई शक नही के ये तमाम काम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की अकीदत और मोहब्बत मे होते हैं लेकिन काबिले गौर बात ये हैं के हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के साथ किस तरह की मोहब्बत रखनी चाहिए और हमे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने इस बारे मे क्या हुक्म दिया हैं| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये हैं कि हम साल मे एक बार उनके विलादत का जश्न मना ले तो क्या हमने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत क हक अदा कर दिया या नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब ये के हम उनके लाये हुए इस दीन ए इस्लाम को अपनी ज़िन्दगी का आईना बना ले?

अगर हम नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के विलादत के जश्न को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत का नाम दे तो ज़ाहिर और साबित तौर पर हम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा अरबाअ को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की इस अकीदत और मोहब्बत से बेगाना पायेगें क्योकि जश्न विलादत का ये एह्तमाम सहाबा, ताबाईन, तबाताबाईन और अईम्मा मे से किसी ने भी नही किया न किसी ने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के बाद इसका हुक्म दिया| अगर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत का मतलब उनके लाये हुये दीन की पैरवी करना हैं तो आज हम दीन ए इस्लाम से बेगाने हैं क्योकि दीन ए इस्लाम को सहाबा के बाद अगर किसी ने समझा हैं तो ताबाईन और तबाताबाईन हैं लिहाज़ा हम जिस काम को आज दीन समझ कर कर रहे हैं उसका दीन ए इस्लाम से कोई वास्ता नही और इस लिहाज़ से हम गुनाह की ज़द मे हैं|

कोई इन्सान नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत और दीन ए इस्लाम का हक तब तक नही अदा कर सकता जब तक वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के लाये इस दीन की पैरवी न करे और उसे अमली तौर पर न करे| जैसा के सहाबा, ताबाईन और तबाताबाईन ने किया तो फ़िर सोचने की बात ये हैं के क्या जश्न ए मिलादुन्नबी से हमारा कोई वस्ता हैं या नही?

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

दीन मे अपनी तरफ़ से इजाफ़ा मरदूद और नाकाबिले कबूल हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

मज़ीद फ़रमाया के –

दीन मे इज़ाफ़ाशुदा काम (बिदअत) मरदूद ही नही बल्कि गुमराही हैं जो जहन्नम मे ले जाने वाली हैं| (बुखारी व मुस्लिम)

ईदमिलदुन्नबी मनाने से पहले ये तय करना ज़रूरी हैं नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत कब हुई? और आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने वफ़ात कब पाई क्योकि आज जिस तारिख पर ये जश्न होता हैं उसी दिन आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात भी हुई और विलादत भी हुई| लिहाज़ा आज मआशरे मे जिस दिन जश्न होता हैं वो विलादत और वफ़ात दोनो का ही दिन हैं|

इस बारे मे तमाम तारीख लिखने वालो और सीरत लिखने वालो का इस बारे मे इत्तेफ़ाक हैं के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पीर(सोमवार) को हुई| और बारे मे आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की एक हदीस मौजूद हैं|

हज़रत अबू कतादा रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से पीर(सोमवार) के बारे मे पूछा गया तो आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – ये वो दिन हैं जिस दिन मैं पैदा हुआ और इसी दिन मैं मबऊस हुआ या मुझ पर वह्यी नाज़िल की गयी| (मुस्लिम)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि0 से रिवायत हैं के – नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम पीर(सोमवार) के दिन पैदा हुये और पीर(सोमवार) के दिन नबूअत का ऐलान किया| और पीर(सोमवार) के दिन ही वफ़ात पाई और पीर(सोमवार) के दिन नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम मक्का से मदीना की तरफ़ हिजरत के लिये रवाना हुये और पीर(सोमवार) के दिन ही मदीना पहुंचे और पीर(सोमवार) के दिन हुजरे असवद को उठाया| (हदायक अल नवार)

इन हदीसो की रोशनी मे साबित हैं की नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने पीर(सोमवार) के दिन विलादत पाई| अब रहा सवाल तारीख विलादत तो इस बारे मे खुद नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से तो कोई रिवायत नही अलबत्ता मशहूर मुफ़स्सिर और तारीखदान इब्ने कसीर रह0 ने अपनी तारिख अलबदायाह व अलनहायाह मे लिखा हैं के जमहूर अहले इल्म का इत्तेफ़ाक ये हैं आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम माहे रबीअव्वल मे पैदा हुये लेकिन ये के आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस माह के अव्वल, आखीर या किस तारिख को पैदा हुये? इस बारे मे तारिखदान और सीरत निगारो के कयी अलग-अलग राय हैं किसी ने 2 रबीअव्वल, किसी ने 8 रबीअव्वल, किसी ने 10 रबीअव्वल, किसी ने 12 रबीअव्वल , किसी ने 17 रबीअव्वल और किसी ने 18 रबीअव्वल और किसी ने 22 रबीअव्वल कहा हैं और इनमे से दो राय सबसे ज़्यादा बाएतबार हैं एक 8 और दूसरी 12 की| इमाम हमीदी ने इब्ने हज़म से 8 रबीअव्वल ही नकल किया हैं और कयी दूसरे अईम्मा ने इसी बात की तायद की हैं| इमाम तिबरानी और इमाम इब्ने खलदून ने 12 रबीअव्वल की तायद की हैं| और इमाम इब्ने जोज़ी ने अल वफ़ाबा हवालल मुस्तफ़ा मे 10 रबीअव्वल की तायद की हैं| जबकि माज़ी के दो करीबी अज़ीम सीरत निगारो मे अल्लामा काज़ी सुलेमान मन्सूरपुरी ने अपनी किताब रहमतुल्लिल आलामीन मे और अल्लामा सिबली ने सिरतुन्नबी मे 9 रबीअव्वल (20 अप्रेल 571 ईसवी) को तहकीक जदीद सही तारीख करार दिया हैं|

तारीख विलादत और मज़ीद बहस का मौअज़ू हैं जिसमे अलग-अलग उल्मा, अईम्मा, और तारिखनिगारो के कौल मौजूद हैं| बहरहाल सही तारीख का किसी को अन्दाज़ा नही| हालाकि तारीख वफ़ात का दिन 12 रबीअव्वल ये बिल्कुल सही हैं जो बारावफ़ात के नाम से आज तक मौजूद हैं| तो वफ़ात रसूल पर ये खुशीया नही| यही वो तारिख हैं जिस रोज़ हज़रत फ़ातिमा रज़ि0 यतीम हुई| यही वो तारीख हैं जिस रोज़ उम्मुल मोमिनीन बेवा हुई| गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर आज किसी बेवा या यतीम के सामने उसके बाप या शौहर के मरने का जश्न मनाया जाये तो ये बात नाकाबिले बर्दाश्त कही जायेगी तो फ़िर नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात पर जश्न क्यो?

दूसरे खुशी मनाने का ये अन्दाज़ जो माआशरे मे चला आ रहा हैं क्या वो सही हैं? क्या इसकी कोई गुन्जाइश भी दीन मे हैं? खुशी के मौके पर जुलूस निकालना, चिरागा करना, ढोल बजाना क्या दीन ए इस्लाम मे हैं क्या सहाबा ने किसी खुशी के मौके पर ये सब किया| यकीनन नही किया| जैसे के दीन ए इस्लाम मे दो ईद के मौके पर नमाज़ पढने और तकबीर व तहलीक ही का हुक्म दिया तो ईद मिलादुन्नबी के मौके पर ये सब खुराफ़ात कैसे की जा रही हैं| जैसा के तमाम दुनिया मे 25 दिसम्बर को ईसा अलै0 की विलादत का जश्न मनाया जाता हैं और खुराफ़ात होती हैं जैसे नाच-गाना, शराबनोशी वगैराह ठीक उसी तरह हम उनकी मुशाबहत करते हैं और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत का जश्न मनाते हैं हालाकि ना ईसाईयो को अल्लाह ने ईसा अलै0 की विलादत मनाने का हुक्म दिया ना ही उनकी किताब इन्जील मे इस बारे मे कही हुक्म हैं| लिहाज़ा हम उनकी नकल करते हैं और किसी कौम की मुशाबहत करने के बारे मे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया-

जिसने किसी कौम की मुशाबहत इख्तयार करी वो इन्ही मे से समझा जायेगा| (अबू दाऊद)

बहरहाल जिस एतबार से भी देखा जाये जश्न मिलादुन्नबी की कोई शरयी हैसियत नही| ये मोहब्बत रसूल के नाम पर एक खोखला अकीदा हैं क्योकि मुसल्मानो के लिये यौमे विलादत से ज़्यादा अहम रिसालत हैं जिसके तहत अल्लाह ने इन्सान को अंधेरे से निकाल कर उजियाले की राह दिखाई| यौमे रिसालत से ही इन्सान को तौहीद मिली जिससे इन्सान को अपनी दुनिया और आखिरत की ज़िन्दगी सुधारने का मौका मिला|

अगर यौम ए विलादत को किसी मुसलमान को खुशी हैं तो यकीनन हर मुसल्मान को ये खुशी होनी चाहिए| लिहाज़ा मसला खुशी का नही बल्कि इज़हारे खुशी का हैं जिसकी बुनियाद पर मुसलमानो मे एक बिदाआत का रिवाज हैं| क्या इस बेबुनियाद इज़हारे खुशी को करके ही ये साबित होता हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत हैं जबकि सहाबा रज़ि0 ने अगर इसको नही किया तो नाऊज़ोबिल्लाह वो नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत नही करते थे और उनसे नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की शान मे ये अमल छूट गया|

जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम से मोहब्बत करने वाली असल जमात सिर्फ़ और सिर्फ़ सहाबा रज़ि0 की थी जिन्होने अपने अमल और किरदार से नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मोहब्बत को साबित किया और इस उम्मत मुस्लिमा के लिये एक सबक दिया| आज मुसल्मान इस काम को जिस तरह कर रहा हैं नाऊज़ोबिल्लाह क्या अल्लाह ने अपने दीन को मुकम्मल नही किया जो आज लोग ये ईदमिलादुन्नबी मनाकर इसे पूरा कर रहे हैं| जबकि अल्लाह फ़रमाता हैं –

आज मैने दीन को तुम्हारे लिये मुकम्मल कर दिया| ( सूरह माईदा सूरह नं0 5 आयत नं0 3)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया –

हज़रत अबदुल्लाह बिन उमर रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया – अल्लाह ने कोई नबी नही मबऊस फ़रमाया, मगर इसका ये फ़रीज़ा था के वो अपनी उम्मत को हर वो खैर का काम बताये जो अल्लाह ने इसे सिखाया था, और उम्मत को हर वो शर से डराये जो अल्लाह ने इसको तालिम दी थी| (मुस्लिम)

क्या अल्लाह के इस हुक्म और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस फ़रमान को पढने के बाद भी कोई ये कहेगा के दीन आज ईदमिलादुन्नबी मना कर पूरा हो रहा हैं| वो भी उस वक्त जब उसे खुद उसके पास इस बात का सबूत न हो के विलादत की असल तारिख क्या हैं जैसा के उपर गुज़रा के 12 रबीअव्वल वफ़ात नबी की तारीख हैं तो मुसलमान आज वफ़ात पर खुशी मनाते हैं|

आज नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की विलादत पर जश्न मनाने वाले एक तरफ़ तो तमाम नबी और बुज़ुर्गो को एक तरफ़ तो जिन्दा तसलीम करते हैं दूसरी तरफ़ अगर सचमुच नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम जिन्दा हैं तो सहाबा से नबी की शान मे एक अमल छूट गया| जबकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम ने 23 साल अपनी दावत तब्लीग जारी रखी उस लिहाज़ से सहाबा को 23 बार ये मौका मिला बावजूद इसके उन्होने नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम की मौजूदगी मे ये जश्ने विलादत क्यो न मनाया| नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इरशाद हैं-

तमाम ज़मानो मे बेहतरीन ज़माना मेरा ज़माना हैं, फ़िर इन लोगो क जो इसके बाद वाले हैं और फ़िर इन लोगो क जो इन के बाद वाले हैं| (मुस्लिम)

इस हदीस से ये साबित होता हैं के नबी के बाद सहाबा का और सहाबा के बाद ताबाईन का ज़माना बेहतर हैं लिहाज़ा 12 रबीअव्वल को नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का जश्न विलादत इन तीन ज़मानो मे से किसी भी एक आदमी से भी साबित हैं लिहाज़ा अगर आज मुसलमान इस अमल को नबी की विलादत का जश्न समझ कर रहा हैं तो यकीनन गुमराही मे हैं|

जश्ने विलादत को लेकर एक और बातिल अकायद हैं के नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम इस महफ़िल मे हाज़िर होते हैं और इसीलिये लोग नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम के इस्तक्बाल मे खड़े हो जाते और नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम को सलाम व खुशामदीन और मरहबा कहते हैं| ये एक ऐसा बातिल और जिहालत भरा अकीदा हैं क्योकि नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मुबारक से कयामत से पहले नही निकलेगें और न किसी इन्सान से मिलेगें और न किसी मजलिस मे हाज़िर होगें बल्कि आप सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम अपनी कब्र मे कयामत कायम होने तक मुकिम रहेगें| जैसा के अल्लाह कुरान मे फ़रमाता हैं-

इसके बाद फ़िर तुम सब यकिनन मर जाने वाअले हो, फ़िर कयामत के दिन बिलाशुबहा तुम सब उठाये जाओगे| (सूरह मोमिनून सूरह नं0 23 आयत नं0 15-16)

नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम का इर्शाद हैं –

कयामत के दिन सबसे पहले मैं कब्र से उठूगां, और मैं ही सबसे पहले शफ़ाअत करूगां और सबसे पहले मेरी ही शफ़ाअत कुबूल होगी| (मुस्लिम)

कुरान और हदीस की रोशनी मे ये पता चलता हैं की तमाम इन्सान और अंबिया सिर्फ़ कयामत के रोज़ ही उठेगें उससे पहले नही| और इस बारे मे तमाम उल्मा का इजमा हैं और इस बारे मे कोई इख्तलाफ़ नही|

गौर फ़िक्र की बात ये हैं के अगर विलादत नबवी जश्न का मसला अगर अल्लाह और उसके रसूल के नज़दीक पंसदीदा अमल होता तो वो शरियत बन जाती जबकी ऐसा नही हैं क्योकि जश्न मिलादुन्नबी किसी एक सहाबा या ताबाईन से साबित ही नही और जो चीज़ नबी सल्लल लाहो अलैहे वसल्लम या सहाबा या खुल्फ़ाए राशीदीन या ताबाईन से साबित नही उसकी कोई शरई हैसियत नही बल्कि वो बिदात हैं|

Wednesday, October 24, 2012

अछूत समस्‍या से छूटने के लिए धर्म खोज रहे थे अंबेडकर



सन 1936 के आसपास, सिक्ख धर्म के प्रति अंबेडकर का आकर्षण हमें पहली बार दिखलाई देता है। यह आकर्षण अकारण नहीं था। सिक्ख धर्म भारतीय था और समानता में विश्वास रखता था। और अंबेडकर के लिए ये दोनों बातें महत्वपूर्ण थीं। अंबेडकर को इस बात का एहसास था कि हिंदू धर्म के “काफी नजदीक” होने के कारण, सिक्ख धर्म अपनाने से उन हिंदुओं में भी अलगाव का भाव पैदा नहीं होगा, जो कि यह मानते हैं कि धर्मपरिवर्तन से विदेशी धर्मों की ताकत बढ़ेगी। सन 1936 में अंबेडकर, हिंदू महासभा के अखिल भारतीय अध्यक्ष डाक्टर मुंजे से मिले और उन्हें इस संबंध में अपना एक विचारों पर आधारित एक वक्तव्य सौंपा। बाद में यह वक्तव्य, एमआर जयकर, एमसी राजा व अन्यों को भी सौंपा गया। यह दिलचस्प है कि जहां डाक्टर मुंजे ने कुछ शर्तों के साथ अपनी सहमति दे दी, वहीं गांधी ने सिक्ख धर्म अपनाने के इरादे की कड़े शब्दों में निंदा की।

अप्रैल 1936 में अंबेडकर अमृतसर पहुंचे, जहां उन्होंने सिक्ख मिशन द्वारा अमृतसर में आयोजित सम्मेलन में भाग लिया। उन्होंने कई भीड़ भरी सभाओं को संबोधित किया। उन्होंने सम्मेलन में कहा कि हिंदू धर्म त्यागने का निर्णय तो ले लिया है, परंतु अभी यह तय नहीं किया है कि वे कौन सा धर्म अपनाएगें। इस सम्मेलन में उनका भाग लेना, “जात-पात तोड़क मंडल” को नागवार गुजरा। मंडल ने उन्हें लाहौर में आयोजित अपने सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था, परंतु आयोजक चाहते थे कि वे अपने भाषण से वेदों की निंदा करने वाले कुछ हिस्से हटा दें। अंबेडकर ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और भाषण को “जाति का विनाश” शीर्षक से स्वयं ही प्रकाशित करवा दिया। इस भाषण में, एक स्थान पर वे कहते हैं, “सिक्खों की राजनीतिक क्रांति के पहले, गुरु नानक के नेतृत्व में, धार्मिक व सामाजिक क्रांति हुई थी।” महाराष्ट्र के “सुधारवादी” भक्ति आंदोलन के विपरीत वे सिक्ख धर्म को क्रांतिकारी मानते थे। अंबेडकर का तर्क यह था कि सामाजिक व राजनीतिक क्रांति से पहले, मस्तिष्क की मुक्ति, दिमागी आजादी जरूरी हैः “राजनीतिक क्रांति हमेशा सामाजिक व धार्मिक क्रांति के बाद ही आती है”।

उस समय, सिक्ख धर्म को चुनने के पीछे के कारण बताने वाला उनका वक्तव्य दिलचस्प है। “शुद्धतः हिंदुओं के दृष्टिकोण से अगर देखें तो ईसाइयत, इस्लाम व सिक्ख धर्मों में से सर्वश्रेष्ठ कौन सा है? स्पष्टतः सिक्ख धर्म। अगर दमित वर्ग, मुसलमान या ईसाई बनते हैं तो वे न केवल हिंदू धर्म छोड़ेंगे बल्कि हिंदू संस्कृति को भी त्यागेंगे। दूसरी ओर, अगर वे सिक्ख धर्म का वरण करते हैं तो कम से कम हिंदू संस्कृति में तो वे बने रहेंगे। यह हिंदुओं के लिए अपने-आप में बड़ा लाभ है। इस्लाम या ईसाई धर्म कुबूल करने से, दमित वर्गों का अराष्ट्रीयकरण हो जावेगा। अगर वो इस्लाम अपनाते हैं तो मुसलमानों की संख्या दोगुनी हो जाएगी और देश में मुसलमानों का प्रभुत्व कायम होने का खतरा उत्पन्न हो जावेगा। दूसरी ओर, अगर वे ईसाई धर्म को अपनाएंगे तो उसके ब्रिटेन की भारत पर पकड़ और मजबूत होगी।”

उस दौर में बहस का एक विषय यह भी था कि क्या सिक्ख (या कोई और) धर्म अपनाने वालों को पूना पैक्ट या अन्य कानूनों के तहत अनुसूचित जाति के रूप में उन्हें मिलने वाले अधिकार मिलेंगे। मुंजे का कहना था कि सिक्ख धर्म अपनाने वालों को ये अधिकार मिलते रहेंगे।

अंततः, 18 सितंबर 1936 को अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के एक समूह को सिक्ख धर्म का अध्ययन करने के लिए अमृतसर के सिक्ख मिशन में भेजा। वे लोग वहां अपने जोरदार स्वागत से इतने अभिभूत हो गये कि – अपने मूल उद्देश्य को भुलाकर – सिक्ख धर्म अपना लिया। उसके बाद उनके क्या हाल बने, यह कोई नहीं जानता।

सन 1939 में बैसाखी के दिन, अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ अमृतसर में अखिल भारतीय सिक्ख मिशन सम्मलेन में हिस्सेदारी की। वे सब पगड़ियां बांधे हुए थे। अंबेडकर ने अपने एक भतीजे को अमृत चख कर खालसा सिक्ख बनने की इजाजत भी दी।

बाद में, अंबेडकर और सिक्ख नेता मास्टर तारा सिंह के बीच मतभेद पैदा हो गये। तारा सिंह, निस्‍संदेह, अंबेडकर के राजनीतिक प्रभाव से भयभीत थे। उन्हें डर था कि अगर बहुत बड़ी संख्या में अछूत सिक्ख बन गये तो वे मूल सिक्खों पर हावी हो जाएंगे और अंबेडकर, सिक्ख पंथ के नेता बन जाएंगे। यहां तक कि, एक बार अंबेडकर को 25 हजार रुपये देने का वायदा किया गया परंतु वे रुपये अंबेडकर तक नहीं पहुंचे बल्कि तारा सिंह के अनुयायी, मास्टर सुजान सिंह सरहाली को सौंप दिए गये।

इस प्रकार, अपने जीवन के मध्यकाल में अंबेडकर का सिक्खों और उनके नेताओं से मेल-मिलाप बढ़ा और वे सिक्ख धर्म की ओर आकर्षित भी हुए। यह जानना महत्वपूर्ण है कि अंततः उन्होंने सिक्ख धर्म से मुख क्यों मोड़ लिया।

निस्‍संदेह, इसका एक कारण तो यह था कि अंबेडकर इस तथ्य से अनजान नहीं थे कि सिक्ख धर्म में भी अछूत प्रथा है। यद्यपि, सिद्धांत में सिक्ख धर्म समानता में विश्वास करता था तथापि दलित सिक्खों को – जिन्हें मजहबी सिक्ख या ‘रविदासी’ कहा जाता था – अलग-थलग रखा जाता था। इस प्रकार, सिक्ख धर्म में भी एक प्रकार का भेदभाव था। सामाजिक स्तर पर, पंजाब के अधिकांश दलित सिक्ख भूमिहीन थे और वे प्रभुत्वशाली जाट सिक्खों के अधीन, कृषि श्रमिक के रूप में काम करने के लिए बाध्य थे।

असल में, जिन कारणों से अंबेडकर सिक्ख धर्म की ओर आकर्षित हुए थे, उन्हीं कारणों से उनका उससे मोहभंग हो गया। अगर सिक्ख धर्म “हिंदू संस्कृति का हिस्सा” था, तो उसे अपनाने में क्या लाभ था? जातिप्रथा से ग्रस्त “हिंदू संस्कृति’ पूरे सिक्ख समाज पर हावी रहती। सिक्ख धर्म के अंदर भी दलित, अछूत ही बने रहते – पगड़ी पहने हुए अछूत।

अंबेडकर को लगने लगा के बौद्ध धर्म इस मामले में भिन्न है। सिक्ख धर्म की ही तरह वह “विदेशी” नहीं बल्कि भारतीय है और सिक्ख धर्म की ही तरह, वह न तो देश को विभाजित करेगा, न मुसलमानों का प्रभुत्व कायम करेगा और न ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के हाथ मजबूत करेगा।

बौद्ध धर्म में शायद एक तरह की तार्किकता थी, जिसका सिक्ख धर्म में अभाव था। अंबेडकर, बुद्ध द्वारा इस बात पर बार-बार जोर दिये जाने से बहुत प्रभावित थे कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने अनुभव और तार्किकता के आधार पर, अपने निर्णय स्वयं लेने चाहिए – अप्‍प दीपो भवs (अपना प्रकाश स्वयं बनो)। इस तरह, अंबेडकर का, सिक्ख धर्म की तुलना में, बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षण अधिक शक्तिशाली और स्थायी साबित हुआ। यद्यपि बौद्ध धर्म उतना सामुदायिक समर्थन नहीं दे सकता था जितना कि सिक्ख धर्म परंतु बौद्ध धर्म को अंबेडकर, दलितों की आध्यात्मिक और नैतिक जरूरतों के हिसाब से, नये कलेवर में ढाल सकते थे। सिक्खों का धार्मिक ढांचा पहले से मौजूद था और अंबेडकर चाहे कितने भी प्रभावशाली और बड़े नेता होते, उन्हें उस ढांचे के अधीन रहकर ही काम करना होता।

इस तरह, अंततः, अंबेडकर और उनके लाखों अनुयायियों के स्वयं के लिए उपयुक्त धर्म की तलाश बौद्ध धर्म पर समाप्त हुई और सिक्ख धर्म पीछे छूट गया।

Sunday, September 23, 2012

इस्लाम के दानवीकरण का दुष्चक्र



हम एक अजीब-से दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर विज्ञान, तकनीक और तार्किक सोच ने हमें मानवता की बेहतरी के लिए अनेक भौतिक और बौद्धिक उपाय दिए हैं वहीं हमारी दुनिया ने इन दिनों भड़काऊ बातें कहने का फैशन सा बन गया है। साहित्य और विशेषकर फिल्मों के जरिए एक धर्म विशेष – इस्लाम -का दानवीयकरण करने के प्रयास हो रहे हैं। मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा स्वयं को आतंकित और असुरक्षित महसूस कर रहा है और अपने धर्म के अपमान के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस भी जारी है परन्तु यह समझना मुश्किल है कि अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग हमेशा एक धर्म विशेष को अपमानित करने और उसका दानवीयकरण करने के लिए ही क्यों किया जाता है।

इन दिनों (सितम्बर 2012) दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अमेरिकी दूतावासों के सामने विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में हिंसा भी हुई है जिसमें राजदूत क्रिस स्टिवेंस सहित चार अमेरिकी राजनयिक बेन्गाजी में मारे गये हैं। कई देशो ने गूगल, जो कि यूट्यूब का मालिक है, से कहा है कि यूट्यूब से यह उत्तेजक और अपमानजनक विडियो क्लिप हटा दी जाए। अमेरीका अब तक “अभिव्यक्ति की आजादी” के नारे पर अटका हुआ है और  बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी देश की सड़कों पर अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं।

यह विडियो क्लिप लगभग 14 मिनट लम्बी है और एक फीचर फिल्म का हिस्सा है, जिसके निर्माता अमेरिका में रहने वाले एक ईसाई नकोला बेसीले हैं। फिल्म में इस्लाम का जम कर अपमान किया गया है। दाढ़ी वाले आधुनिक मुसलमानों की भीड़ को ईसाईयों पर हमला करते दिखाया गया है। फिल्म अपने दर्शकों को अतीत में भी ले जाती है जहां पैगंबर मोहम्मद के जीवनवृत्त को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म मे बताया गया है कि पैगंबर साहब का व्यक्तित्व व सोच, अत्यंत नकारात्मक और आक्रामक थी। इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नही है और इसे बनाने वालों के इरादे भी संदिग्ध हैं। मुसलमानों के एक तबके ने इस फिल्म पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले मे सभी मुसलमानों की प्रतिक्रिया एक सी नही रही है। कुछ धर्मगुरूओं ने मुसलमानो से धैर्य बनाये रखने के लिए कहा है। इन लोगों का कहना है कि इस्लाम शांति का धर्म है और इसलिए किसी भी प्रकार के हिंसक विरोध प्रदर्शन नही होने चाहिए। कुत्सित इरादों से बनाई गई इस घटिया फिल्म का सबसे अच्छा जवाब दिया है मुसलमानो के एक समूह ने, जो कि अमन के संदेशवाहक, पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर लिखी गई किताबें बांट रहे हैं।

पिछले कुछ सालों से पश्चिमी देशों और यहां भारत में भी, इस्लाम का दानवीकरण करने की परंपरा सी बन गई है। हम सब को वह डैनिश कार्टून याद है जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छुपाए एक आतंकवादी के रूप में दिखाया गया था। फ्लोरिडा के एक पास्टर ने यह घोषणा की थी कि चूंकि कुरान हिंसा सिखाती है इसलिए वे उसे सार्वजनिक रूप से जलाएंगे। अफगानिस्तान में कुछ अमेरिकी सैनिको ने भी यह कह कर कुरान की प्रतियां जलाईं थीं कि उनमें आतंकवादियों के कुछ गुप्त संदेश लिखे हुए हैं।

इस्लाम और मुसलमानों के दानवीकरण में हम एक प्रकार की योजना और एजेंडा देख सकते हैं। ये कार्टून और फिल्में, दरअसल, उस राजनैतिक प्रक्रिया की उपज हैं, जिसका उद्देश्य पश्चिम एशिया में तेल के कुओं पर कब्जा करना है। इरान में अमेरिका के पिट्ठू रज़ा पहलवी को हटा कर अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के बाद से ही, अमेरिका “इस्लाम-नया खतरा” का नारा बुलंद करता आ रहा है।  अमेरिका ने ही पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए ताकि मुस्लिम युवकों को अलकायदा और तालिबान के झंडे तले अफगानिस्तान पर काबिज़ सोवियत सेना से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इससे हालात और बिगड़े। इन मदरसों में काफिर और जिहाद जैसे शब्दो का अर्थ तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता था ताकि मुस्लिम युवको को धर्म के नाम पर हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद, अमेरिकी मीडिया ने बड़ी चालाकी से “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द गढ़ लिया। इस शब्द का अन्य देशों का मीडिया भी इस्तेमाल करने लगा और धीरे धीरे यह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। यह पूरा घटनाक्रम एक साम्राज्यवादी ताकत द्वारा अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए धर्म के दुरूपयोग का उदाहरण है। दरअसल, इस्लाम का दानवीकरण, अमेरिकी नीति का भाग है। इसके पीछे अमेरिका अपने असली उद्देश्य – अर्थात तेल संसाधनो पर कब्जा – को छिपाना चाहता है। नोयम चोमोस्की ने एक शब्द गढ़ा था “सहमति का उत्पादन”। अमेरिका ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द को इसलिए गढ़ा ताकि उसके, अफगानिस्तान और ईराक पर सैनिक आक्रमण करने के लिए “सहमति का उत्पादन” किया जा सके।

अमेरिका की इस नीति से दो अलग-अलग प्रक्रियाएं शुरू हुई हैं। एक ओर इस्लाम के खिलाफ घृणा फैलाने के अभियान ने हालिया फिल्म, डेनिश कार्टून और पास्टर द्वारा कुरान को जलाने जैसी घटनाओं को जन्म दिया है। अमेरिकी प्रचार को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए अमेरिका ने “सभ्यताओं का टकराव” के सिद्धांत का अविष्कार किया है। इस सिद्धांत के अनुसार, आधुनिक विश्व इतिहास, पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यताओं के विकसित पश्चिमी सभ्यताओं पर आक्रमण का इतिहास है। इसी तोड़ी-मरोड़ी हुई सोच और विचारधारा का इस्तेमाल पश्चिम एशिया मे अमेरिकी एजेंडे को लागू करने के लिए किया जाता है। इस सबसे पूरे विश्व के मुसलमानों की सोच में अंतर आया है। कुछ मुसलमान यह मानने लगे हैं कि अफगानिस्तान व इराक पर अमेरीकी हमले के बाद, वे इस दुनिया में सुरक्षित नहीं रह गये हैं। भारत में संघ परिवार की राजनीति ने इस समस्या को नया आयाम दिया। संघ ने राममंदिर का मुद्दा उठाकर मुसलमानो को कटघरे में खड़ा कर दिया। भारतीय मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को यह लगने लगा कि उसे आतंकित किया जा रहा है और सब ओर से घेर लिया गया है। इस परिस्थिति में पहचान से जुडे़ मुद्दो को लेकर मुसलमानों को एक करना आसान हो गया। जब भी कोई समुदाय स्वयं को हर तरफ से घिरा हुआ पाता है तब उसे उत्तेजित करना और किसी भी आक्रामक धार्मिक अभियान का हिस्सा बनाना, आसान हो जाता है।

यह एक तरह का दुष्चक्र है जिसमें इस्लाम का डर एक ओर है और घुटन महसूस कर रहा  आतंकित मुस्लिम समाज दूसरी ओर। इन परिस्थितियों में वे मुस्लिम धर्मगुरू ही समुदाय की प्रेरणा के स्त्रोत हो सकते हैं जो  शांति की बात कर रहे हैं। जो मुसलमान पैगम्बर मोहम्मद के जीवन पर आधारित पुस्तकें बांट रहे हैं, वे बधाई के हकदार है समुदाय की प्रतिक्रिया इसी प्रकार की होना चाहिए। अमेरिका के साम्राज्यवादी इरादों और उसके भारी भरकम प्रचार तंत्र से कैसे निपटा जाए, जिनके जरिए अमेरिका दुनिया के कई इलाकों में गड़बडियां फैला रहा है? क्या इस पर किसी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है?

जिन दिनो कोफी अन्नान संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव थे, एक उच्चस्तरीय समिति ने एक रपट तैयार की थी जिसका शीर्षक था “सभ्यताओं का गठजोड़”। परन्तु इस्लाम को बदनाम करने के अभियान की तुलना में इस रपट को समुचित प्रचार न मिल सका। अब समय आ गया है कि मानवता, उन मानवीय मूल्यों को अपनाए जो हमारी सभ्यता में सदियों के विचार-विनिमय के आधार पर उभरे हैं – उन मूल्यों को, जिनके कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सभी के लिए मूल मानवाधिकारों के घोषणापत्र जारी किये हैं और जिनके कारण “सभ्यताओं के गठजोड़” जैसी रपटें बनती हैं।

मुसलमानों का एक तबका ऐसा भी है जो अनुचित ढंग से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। दरअसल जो लोग या ताकतें इस्लाम के दानवीकरण और इस तरह की फिल्मों के निर्माण के पीछे हैं, वही कुछ मुसलमानों की हिंसक कार्यवाहियों के लिए भी जिम्मेदार हैं। क्या हम संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में पुनर्जीवित नही कर सकते जो यह सुनिश्चित करे कि विभिन्न राष्ट्रों और उनके मीडिया का आचार- व्यवहार ऐसा हो जिससे प्रजातंत्र और मानवीय गरिमा में अभिवृद्धि हो? क्या पूरा विश्व दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति के आक्रामक तेवरों से निपटने के लिए आगे नहीं आ सकता? अगर ऐसा हुआ तो इस तरह की फिल्मों पर हिंसक प्रतिक्रिया नहीं होगी। बल्कि शायद दूसरों के धर्म को अपमानित करने के प्रयासों ,में भी कमी आयेगी। अगर कुछ लोग इस तरह की फिल्म बनांएगे तो कुछ वैसी फिल्मे भी बनेंगी जो पैगंबर मोहम्मद के दुनिया को शांति के संदेश पर आधारित होंगी।

अंत में, हमें अभिव्यक्ति की आजादी को तो कायम रखना होगा। परन्तु इसकी कुछ सीमाएं भी तय करनी होंगी। हमे विरोध व्यक्त करने के ऐसे तरीकों का विकास करना होगा जिनसे उन्माद के स्थान पर मर्यादित व तार्किक ढंग से विरोध दर्ज कराया जा सके।

राम पुनियानी (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण: अमरीश हरदेनिया)
(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् २००७ के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

Sunday, March 25, 2012

ऐसे बनेगी मुसलमानों की तकदीर

"दुनिया की चौथाई आबादी होने के बाद भी आज मुसलमान वैज्ञानिक-तकनीकी तौर पर पिछड़े हैं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं और आर्थिक रूप से बहुत ग़रीब ऐसा क्यों है? विश्व के सकल घरेलू उत्पाद, जो 60 ट्रिलियन डॉलर है, में मुसलमानों की भागीदारी केवल 3 ट्रिलियन डॉलर है, जो फ्रांस जैसे छोटे देश, जिसकी जनसंख्या 70 मिलियन है, से भी कम है और जापान के सकल घरेलू उत्पाद की आधी है तथा अमेरिकाजिसकी जनसंख्या 300 मिलियन है, के सकल घरेलू उत्पाद का पांचवां हिस्सा है. ऐसा क्यों है?"
अमेरिका स्थित पिऊ रिसर्च सेंटर की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में एक बिलियन और 570 मिलियन मुसलमान हैं. मतलब दुनिया का हर चौथा आदमी मुसलमान है. क्या इस रिपोर्ट में कुछ ऐसा है, जिस पर खुश हुआ जा सके? मेरे हिसाब से तो नहीं. अलबत्ता मुसलमानों के लिए यह एक विचारणीय बात है और उन्हें इस पर चिंतन करना चाहिए. दुनिया की चौथाई आबादी होने के बाद भी आज मुसलमान वैज्ञानिक-तकनीकी तौर पर पिछड़े हैं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं और आर्थिक रूप से बहुत ग़रीब. ऐसा क्यों है? विश्व के सकल घरेलू उत्पाद, जो 60 ट्रिलियन डॉलर है, में मुसलमानों की भागीदारी केवल 3 ट्रिलियन डॉलर है, जो फ्रांस जैसे छोटे देश, जिसकी जनसंख्या 70 मिलियन है, से भी कम है और जापान के सकल घरेलू उत्पाद की आधी है तथा अमेरिका, जिसकी जनसंख्या 300 मिलियन है, के सकल घरेलू उत्पाद का पांचवां हिस्सा है. ऐसा क्यों है? यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि विश्व की 35 फ़ीसदी जनसंख्या ईसाई है, लेकिन यही 35 फ़ीसदी लोग विश्व की 70 फ़ीसदी धन-संपत्ति के मालिक हैं.

मानव विकास सूचकांक यानी एचडीआई में भी यदि कुछ तेल निर्यात करने वाले देशों को छोड़ दिया जाए तो बाक़ी सभी मुसलमान देश बहुत नीचे आते हैं. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी मुसलमान देश बहुत पीछे हैं. विज्ञान के क्षेत्र में बस पांच सौ शोध प्रबंध यानी पीएचडी जमा होते हैं. यह संख्या अकेले इंग्लैंड में तीन हज़ार है. 1901 से लेकर 2008 तक लगभग पांच सौ नोबल पुरस्कारों में से यहूदियों को 140 बार यह पुरस्कार पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो लगभग 25 फ़ीसदी है, जबकि यहूदियों कि जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की केवल 0.2 फ़ीसदी है. इसके विपरीत आज तक मात्र एक मुसलमान को यह पुरस्कार पाने का अवसर मिला है. (एक और भी था, लेकिन पाकिस्तान ने उसे ग़ैर मुसलमान घोषित कर दिया) मतलब यह कि मुसलमानों की इस पुरस्कार में भागीदारी 0.2 फ़ीसदी है. यानी विज्ञान के क्षेत्र में मुसलमानों का योगदान नगण्य है. एक और नकारात्मक तथ्य निकल कर आया शंघाई विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के आधार पर. इसमें विश्व के चार सौ सबसे बढ़िया विश्वविद्यालयों की एक सूची है और इस्लामी देशों का एक भी विश्वविद्यालय इस सूची में नहीं है. यह बड़ी दु:खद बात है, क्योंकि सातवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक दुनिया के सबसे बड़े और आलिम विश्वविद्यालय मुस्लिम देशों में स्थित थे. कोरडोबा, बग़दाद और काइरो इस्लामिक तालीम के नामचीन केंद्र थे.

विज्ञान के जाने-माने इतिहासकार जिलेस्पी ने ऐसे 130 महान वैज्ञानिकों एवं और प्रौद्योगिक विशेषज्ञों की सूची बनाई है, जिनका मध्य युग में बहुत बड़ा योगदान था. इनमें से 120 ऐसे थे, जो मुसलमान देशों से थे और केवल चार यूरोप से थे. क्या यह तथ्य खुद में इतना अर्थपूर्ण नहीं कि मुसलमान अपने भूत को विवेचित करें, अपने आज को ईमानदारी से देखें और अपने भविष्य की तार्किक रूप से कल्पना करें. मैं मुसलमानों की इस आबादी के बारे में कुछ और रोचक तथ्य बता सकता हूं, जो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किए गए शोधों पर आधारित हैं. आज की प्रजनन रफ़्तार से मुसलमानों की जनसंख्या अगले 50सालों में दोगुनी हो जाएगी. तब मुसलमान संख्या में ईसाइयों से अधिक हो जाएंगे, जिनकी जनसंख्या भी दोगुनी होगी. मतलब यह कि मुसलमानों की समस्याएं और बढ़ जाएंगी. आज की बेरोज़गारी और आर्थिक ग़रीबी, जो मुस्लिम समाज और मुस्लिम देशों में व्याप्त है, वह ज़ाहिर तौर पर और बढ़ेगी. अगले पचास सालों में अगर मुस्लिम जनसंख्या बढ़कर दोगुनी हो गई तो मुसलमान और ईसाई देशों के बीच आर्थिक विकास की दूरी और बढ़ेगी. प्रश्न फिर यह उठता है कि इस शताब्दी या आने वाली सदी में विश्व पर किसकी सार्वभौमिकता और प्रभुसत्ता रहेगी, पांच फीसदी संसाधन वाले मुसलमानों की या 70 फीसदी संसाधन वाले ईसाइयों की?

मुसलमानों को यह याद रखने की ज़रूरत है कि आज के वैज्ञानिक विकास से परिभाषित विश्व में किसी भी देश की इज़्ज़त और शक्ति उसकी जनसंख्या पर आधारित नहीं है. आज के विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ही शक्ति, इज़्ज़त और संसाधनों की गारंटी है. ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां अधिक जनसंख्या के साथ आर्थिक पिछड़ापन और कम सामरिक सामर्थ्य है. यहूदी देश इजराइल को देखिए, इतना छोटा देश पूरे अरब पर हावी रहता है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह एक आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से समृद्ध देश है, जिसके सामने पिछड़ेपन के शिकार अरब देशों को झुकना पड़ता है, हार मान लेनी पड़ती है. एक तरफ वे मुसलमान हैं, जो आज पश्चिमी देशों में रहते हैं और अपनी समृद्धि से खुश हैं. जबकि वहीं वे मुसलमान भी हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य देशों के वाशिंदे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं. यूरोप में रहने वाले 20 मिलियन मुसलमानों का सकल घरेलू उत्पाद पूरे भारतीय महाद्वीप के 500 मिलियन मुसलमानों से अधिक है.
निस्सीम हसन एक ख्याति प्राप्त इस्लामिक विद्वान हैं. वह कहते हैं कि मुसलमानों में ज्ञानार्जन की घटती प्रवृत्ति ही उनके आर्थिक और राजनीतिक पतन का मुख्य कारण है. हमने सदियों से मानवता का नेतृत्व छोड़ दिया है. हम लकीर के फ़कीर बनकर रह गए हैं. महातिर मोहम्मद, जो मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री हैं, ने मुसलमानों को सही सलाह दी. उन्होंने ओआईसी की मीटिंग में कहा कि मुसलमानों को अपनी रूढ़िवादिता छोड़कर नए समय में नई पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि सामाजिक परिस्थितियां अब बदल चुकी हैं. यह याद रखने की बात है कि आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के बीच जब मुसलमान स्पेन पर राज करते थे, तब स्पेन की आमदनी बाक़ी सारे यूरोप से अधिक थी. ऐसा इसलिए था, क्योंकि स्पेन तब उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था. आज स्थिति उलट-पुलट हो गई है. आज ईसाई स्पेन का सकल घरेलू उत्पादन विश्व के बारह तेल निर्यात करने वाले मुस्लिम देशों से कहीं अधिक है. मुस्लिम शासन के दौरान सभी देशों का इतना ही अच्छा हाल था. बग़दाद, डमास्कस, काहिरा एवं त्रिपोली अपनी वैज्ञानिक दूरदृष्टि के लिए विख्यात थे. इन मध्ययुगीन शताब्दियों में मुस्लिम देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक रूप से बहुत विकसित माना जाता था. इसके विपरीत डोनाल्ड कैम्बेल (सर्जन-फ्रांस) के अनुसार, जब मुस्लिम देशों में विज्ञान की आंधी चल रही थी, तब यूरोप अंधकार में जी रहा था. जब इस्लाम का उद्भव हो रहा था और वह संसार पर हावी हो रहा था, तब मुसलमानों की जनसंख्या बमुश्किल 10 फीसदी थी.

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कहा था कि यह सारी स्थिति सोलहवीं शताब्दी से बदलने लगी. इस समय मुस्लिम समाज निष्क्रिय हो गया और यूरोपीय अंधकार को अपनाने लगा. वहीं दूसरी ओर ईसाई जनता मुस्लिम विज्ञान की ओर उन्मुख हो रही थी. ऐसे में वही हुआ, जिसका डर था. वह मुसलमान समाज, जिसने पूरी दुनिया को आठ सौ सालों तक अपना मुरीद बनाए रखा, उभरते हुए यूरोप के सामने झुक गया. इस संदर्भ में मौलाना अबुल हसन अली नदवी, जो एक बहुत बड़े इस्लामविद्‌ थे, का कथन बहुत प्रासंगिक है कि सोलहवीं शताब्दी के बाद मुसलमानों ने तर्क और विज्ञान को छोड़ दिया. इसलिए इस समाज में कोई महान व्यक्तित्व नहीं उभर पाया और मुसलमान अपनी परंपरागत जीवनशैली में बंधकर रह गए. कुछ समय पहले सैमुअल हंटिंग्टन ने पश्चिम और मुस्लिम देशों के बीच के विवाद को दो सभ्यताओं का विवाद कहा था. यह बिल्कुल ग़लत बात है. यह विवाद अमीर और ग़रीब देशों का है, अमीर मनमानी करना चाहते हैं और ग़रीब पिस रहे हैं.

दुनिया के ग़रीब देशों को समझ लेना चाहिए कि अमीर देशों से बिन बात के झगड़ों से उनकी ही हानि होगी और वह भी तब, जब यह झगड़ा धर्म के नाम पर हो. ग़रीब देशों (मुस्लिम या ग़ैर मुस्लिम) की भलाई विश्व शांति में ही अधिक है. मुस्लिम समाज की भलाई का एक ही रास्ता है कि वह यूरोप के पुनर्जागरण जैसे वैज्ञानिक रास्ते पर चले और वह भी आज के यूरोप से तेज़ रफ़्तार में. सबसे पहले मुसलमानों को अपने मन से कट्टरपंथ और चरमपंथ को उखाड़ फेंकना होगा और सच्चे इस्लाम के तहत भाईचारे और सहिष्णुता को अपनाना होगा. पश्चिम के विरोध और पश्चिमी देशों के वीसा और ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद में बहुत बड़ा विरोधाभास है. कुछ अरब देशों के शासकों की सराहना करनी होगी, क्योंकि हाल में उन्होंने विश्व के धर्मों में आपसी तालमेल को बढ़ावा देने के लिए जो क़दम उठाए हैं, वे निश्चय ही दूरगामी हैं. एक कांफ्रेंस के दौरान सऊदी अरब के राजा अब्दुल्लाह ने कहा कि इस्लाम को चरमपंथ से दूर रहना होगा. कुछ मुसलमानों ने कट्टरपंथ की आड़ में सच्चे इस्लाम पर बट्टा लगाया है. हमें पूरी दुनिया को बताना होगा कि इस्लाम मानवता की आवाज़ है, सहिष्णुता की पुकार है और मेलजोल का हिमायती.

आज मुसलमानों को खोखले शब्दों और आश्वासनों की ज़रूरत नहीं है. उन्हें धार्मिक असहिष्णुता की भी दरकार नहीं है. अब समय आ गया है कि मुस्लिम देश पश्चिम के देशों के साथ ज़िम्मेदाराना बातचीत के रास्ते पर आएं. उन्हें बराक ओबामा द्वारा काहिरा में दिए गए बयान का आदर करना चाहिए, जिसमें उन्होंने मुस्लिम देशों को पश्चिमी देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विश्व शांति के लिए काम करने का न्योता दिया. ओबामा के हाथ और मज़बूत करने चाहिए, यही आज समय की मांग है. आज मुस्लिम देशों को ओबामा के साथ कदम से क़दम मिलाकर चलने की ज़रूरत है.