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Monday, December 08, 2014

लाख रुपए की बात कही है साध्वी जी ने


जब अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट से पूछा गया कि वो निकारागुआ के तानाशाह अनास्तासियो समोज़ा की इतनी खुलकर हिमायत क्यों करते हैं तो उन्होंने कहा, "हाँ, वे हरामज़ादे हैं पर वो हमारे हरामज़ादे हैं."
साध्वी निरंजन ज्योति, भारत, केंद्रीय राज्य मंत्री

अब अगर साध्वी निरंजन ज्योति रूज़वेल्ट नहीं हैं तो इसमें उनका क्या कसूर. रूज़वेल्ट ने तो माफ़ी भी नहीं माँगी थी.
साध्वी जी ने तो यह कहने पर माफ़ी भी माँग ली कि "अब आपको यह तय करना है कि रामज़ादों को चुनेंगे कि......को."
मगर क्षमा चाहने के बाद भी पढ़े-लिखे लोग बेचारी साध्वी के पीछे लठ लिए घूम रहे हैं, ये कैसा अन्याय है?
अगर फूड प्रोसेसिंग का मंत्री भी फूड फॉर थॉट नहीं उगल सकता तो फिर कद्दू का मंत्री.
बयान का इनाम:

वैसे सलाम है आप सबकी बुद्धि को. अगर गुजरात का कोई शहरवासी 2002 के दंगों पर अफ़सोस करते हुए ये कहे कि अगर कार के पहिए के नीचे कोई पिल्ला भी आ जाए तो दुख तो होता है तो आप उसे प्रधानमंत्री चुन लेते हो.
अगर मुज़फ़्फ़रनगर के दंगों के संदर्भ में अमित शाह जैसा पढ़ा-लिखा शहरी बाबू ये कहे कि ये सम्मान और बदले की भावना का मामला है तो नफ़रत फैलाने के जुर्म में चुनाव आयोग की तरफ़ से चुनावी भाषणों पर पाबंदी के बाद भी सत्ता चलाने वाली पार्टी अमित जी को अपना प्रधान बना लेती है.
अगर कोई आदरणीय गिरिराज सिंह ये कहे कि जो मोदी का विरोधी है वो गद्दार है उसे भारत छोड़ के पाकिस्तान में बस जाना चाहिए तो इनाम में उसे कोई केंद्रीय मंत्रालय थमा दिया जाता है.
साध्वी पर ग़ुस्सा:
आप शहरवासियों का ग़ुस्सा बस गाँव की एक बेचारी साध्वी निरंजन ज्योति पर ही क्यों निकलता है?
जिन लोगों में वो दिन-रात उठती-बैठती हैं, उन्हें जो कुछ जितना भी सिखाया-पढ़ाया गया है और जो नज़रिया बताया गया है उसी का तो वो पालन कर रही हैं.
अगर आप लोगों का कुम्हार पर वश नहीं चल रहा है तो गदहे के कान क्यों मरोड़ते हैं?
पाकिस्तानियों का दिल

आपसे ज़्यादा खुले दिल के लोग तो पाकिस्तान में हैं.
इमरान ख़ान भरे जलसे में नवाज़ शरीफ़ को चोर और जरदारी को लुटेरा कहते हैं. मौलाना फ़जलुर्रहमान इमरान ख़ान को यहूदी एजेंट और जरदारी इमरान ख़ान को एजेंसियों का आदमी कहते हैं.
यहाँ कोई भी खुलकर किसी को गद्दार और देशद्रोही कह सकता है, उसे मुसलमान मानने से इनकार कर सकता है. पर मजाल है किसी के माथे पर शिकन आ जाए.
और आप हैं कि ख़ुद को विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी कहते हैं लेकिन लोकतंत्र के इस बुनियादी नियम को भी नहीं समझते कि जो आदमी के मन में है वही ज़बान पर भी होना चाहिए. अगर इतनी भी आज़ादी न हो तो कैसा लोकतंत्र.
प्रार्थना:
भाइयों मेरी इतनी सी प्रार्थना है कि निरंजन ज्योति के मामले में ऐसे उतावले न बनिए.
अगले चुनाव तक वो भी शहरी नियमों से परिचित हो जाएंगी और जब वो ये कहेंगी कि आपको बिना ह के रामज़ादों और ह वाले रामज़ादों में से किसी एक का चुनाव करना है तो फिर आप समेत हर कोई ताली बजाकर कहेगा कि वाह! क्या लाख रुपए की बात कही है साध्वी जी ने...
-वुसतुल्लाह ख़ान

Thursday, September 12, 2013

सपा की राजनीती धर्मनिरपेक्ष या धर्मसापेक्ष


मुजफ्फरनगर जल रहा है. शामली और सुल्तानपुर के दंगों की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि दिल्ली से 120 किलोमीटर दूर बसा उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर जल उठा. वजह थी एक लड़की से छेड़छाड़ पर दो समुदायों का आमने-सामने आ जाना.
uttar-pradesh-police
समाजवादी पार्टी की धर्मनिरपेक्ष सरकार के डेढ़ वर्ष के अल्प कार्यकाल का यह 13वां बड़ा दंगा था. वैसे समाजवाद की अवधारणा को परे छोड़ धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़कर अखिलेश सरकार की सत्ता में 40 से अधिक दंगे यह तो दर्शाते ही हैं कि उत्तर प्रदेश वाकई धर्मनिरपेक्षता का सापेक्ष उदाहरण पेश कर रहा है.

एक हफ्ते पहले मुजफ्फरनगर में फैली दंगे की आग एक पत्रकार समेत 28 लोगों को लील चुकी है. दंगे की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहरी इलाके को छोड़कर आसपास के गांवों में भी सेना तथा आरएसी को मोर्चा संभालना पड़ रहा है. यहां तक कि उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी पुलिस प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के आदेश हैं.

राजनीति में अपेक्षाकृत कम अनुभवी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब दंगे की विभीषिका को समझने और संभालने में नाकाम रहे, तो मुलायम सिंह को आगे आकर मोर्चा संभालना पड़ा. हालांकि स्थिति अभी भी जस की तस है और दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश देने पड़े हैं. 15 मार्च 2012 को जब अखिलेश ने सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी, तो कमोबेश सभी राजनीतिक विश्लेषकों का यह अनुमान था कि अखिलेश अपनी सोच और ताजगी से सपा पर लगा वह दाग तो धो ही देंगे जिसमें यह कहा जाता रहा है कि सपा सरकार के कार्यकाल में गुंडागर्दी और यादववाद को बढ़ावा मिलता है.

सूबे की जनता ने भले ही मायावती के कुशासन से त्रस्त होकर सपा को सत्ता सौंपी हो, किन्तु उसे ज़रा भी भान नहीं था कि इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं. लोकसभा चुनाव को अब अधिक समय नहीं बचा है. सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंजाम देने में लगे हैं; ऐसे में प्रदेश के छोटे-बड़े संवेदनशील शहरों में दंगे होना किसी दूरगामी रणनीति का पड़ाव तो नहीं हैं?

भाजपा की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का मुखिया बनाकर संघ ने यह संकेत देने की कोशिश की कि अब हिंदुत्व की राजनीति को एक बार फिर से जीवित किया जाएगा. इसी रणनीति के तहत मोदी ने भी अपने ख़ास सिपहसालार अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया, ताकि हिंदुत्व की बुझती लौ तथा बहुसंख्यक समुदाय की आस्था को शाह दोबारा भड़का सकें.

उनका अयोध्या जाना और राममंदिर के पक्ष में बोलना, चौरासी कोसी यात्रा का असमय ऐलान और उस पर हुई राजनीति काफी हद तक संघ और मोदी के मन मुताबिक़ ही थी. फिर जहां तक सपा की बात है तो सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में 18 फीसद से अधिक वोट बैंक मुस्लिमों के पास है, जो सपा और कांग्रेस दोनों में बंटा हुआ है. यदि आगामी लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को सूबे में सपना परचम फहराना है, तो उसे किसी एक समुदाय का थोक वोट बैंक चाहिए.

फिलहाल सूबे में जो स्थिति है, उसे देखकर तो ऐसा जान पड़ता है कि वोटों के ध्रुवीकरण की जद्दोजहद में सपा-भाजपा में परदे के पीछे कोई बड़ा खेल हुआ है. इस वर्ष मार्च में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की तारीफ में कसीदे गढ़े थे. यहां तक कि उन्होंने लीक से हटकर लगे हाथ समाजवाद और राष्ट्रवाद के लिए समान पहलुओं को भी बताया. उन्होंने समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की एक समान विचारधारा को भी साथ आने के संकेत के तहत सार्वजनिक किया.

सीमा सुरक्षा, देशभक्ति और भाषा के मसले पर निश्चित रूप से लोहिया का समाजवाद और गोलवरकर का राष्ट्रवाद बहुत अलग नहीं है, लेकिन आज के दौर में लोहिया के समाजवाद और गोलवरकर के राष्ट्रवाद की अहमियत है ही कितनी? फिर लोहिया के समाजवाद की जितनी धज्जियां मुलायम सिंह ने उड़ाई हैं, उतनी किसी ने नहीं. ठीक उसी तरह भाजपा को भी राष्ट्रवाद तभी याद आता है जब उसका वोट बैंक उससे छिटक रहा हो.

मुलायम और राजनाथ; कमोबेश दोनों का राजनीतिक उत्थान अयोध्या से हुआ है. एक हिन्दुओं का रहनुमा बना, तो दूसरा मुस्लिमों का चहेता. दोनों का अपना निश्चित वोट बैंक है और दोनों की राजनीतिक शैली भी भिन्न है. ऐसे में इस दोस्ती का कुछ तो अंजाम होगा और शायद वह इस रूप में प्रकट भी हो रहा है. राजनाथ की तारीफ से मुलायम उनके कितना नजदीक पहुंचे यह तो पता नहीं, किन्तु राजनाथ का दिल मुलायम के प्रति ज़रूर पिघला होगा.

राजनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे संघ को भी अपने दरवाजे पर नतमस्तक करवा सकते हैं और सूबे में भाजपा की दुर्गति भी उन्हीं की कारगुजारियों से हुई है. हो सकता है इस लिहाज से दोनों बड़े नेताओं की अघोषित गुटबाजी का नतीजा सूबे का आम आदमी दंगों की विभीषिका के रूप में भुगत रहा हो? चूंकि दंगों को राजनीतिक पृष्ठभूमि ही भड़काती है, लिहाजा इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाला समय उत्तर प्रदेश की जनता के लिए दुष्कर होने वाला है.

वोट बैंक की राजनीति के तहत ही सपा सरकार ने आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल को हटाया और अब इस वोट बैंक की राजनीति उसकी अक्षमताओं को उजागर कर रही है. वरना मुजफ्फरनगर का प्रशासन तिल का ताड़ बनता हुआ नहीं देखता रहता. यह निश्चित रूप से प्रशासन और सरकार की नाकामी और राजनीति का विद्रूप रूप है.

इन विपरीत परिस्थितियों में अखिलेश के युवा कांधों पर जिम्मेदारियों का जो बोझ पड़ा है, वह संकेत दे रहा है कि राजनीति में युवा होना ही मायने नहीं रखता बल्कि राज करने की नीति का भान भी होना चाहिए. ऐसा लगता था कि अखिलेश को अपने पिता मुलायम सिंह की राजनीतिक समझ का लाभ मिलेगा, मगर हुआ इसका उल्टा. मुलायम को दिल्ली रास आई और अखिलेश पर आजम खान व रामगोपाल यादव हावी हो गए.

चूंकि बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश का नाम ही हर सफलता-विफलता के लिए जिम्मेदार होता, अतः मंत्रियों से लेकर सपा के वर्तमान कर्णधारों तक की कथित सफलता व सही मायनों में विफलता का ठीकरा अखिलेश के ही सर फूटा. अखिलेश लाख सफाई देते फिरें कि स्थितियां सामान्य होने में अभी वक़्त लगेगा, किन्तु वे यह तो तय करें कि इन स्थितियों को ठीक कौन करेगा? क्या आजम खान, रामगोपाल यादव तथा मुलायम सिंह की तिगडी अखिलेश को अपनी छाया से मुक्ति देगी, ताकि वे अपनी ऊर्जा का सही मायनों में दोहन कर सूबे के विकास के प्रति गंभीर हों?

अखिलेश पर राजनीति से इतर पारिवारिक दबाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है. पूरवर्ती सपा शासन की तुलना उनकी सरकार से होना ही अखिलेश का सर-दर्द बढ़ा रहा है. फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा का विधानसभा वाला चमत्कारिक प्रदर्शन दोहराने की जिम्मेदारी भी अखिलेश पर है. मुलायम कितने भी अनुभवी हों, मगर राजनीति में एक सीमा होती है और मुलायम भी उस सीमा को नहीं लांघ सकते.

स्मरणशक्ति खोते जा रहे मुलायम को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने का अघोषित जिम्मा भी अखिलेश सरकार की सफलता से सुनिश्चित होगा. यानी अखिलेश के लिए अभी चुनौतियों का मैदान सामने है और यदि वे इनसे पार नहीं पा सके तो यह उनकी और मुलायम की राजनीतिक हार होगी. फिर यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि धरतीपुत्र का पुत्र कहीं हवा-हवाई नेता की राह पर तो अग्रसर नहीं है. ऐसा हुआ तो राजनीति में व्याप्त इस सोच को भी आघात लगेगा कि युवा ही राजनीति में बदलाव ला सकते हैं.

अखिलेश को जनता ने सुनहरा मौका दिया है कि वे पूरवर्ती शासन के पाप धोते हुए सूबे को विकास पथ पर अग्रसर करें और ऐसा न कर पाने के एवज में उनकी भद पिटना तय है जिसका परिणाम 2014 में तो दिखेगा ही, भावी विधानसभा चुनावों में भी उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.

यह वक़्त निश्चित रूप से अखिलेश के लिए अग्निपरीक्षा का है, जिसमें तपकर ही वे मिसाल कायम कर सकते हैं वरना उनकी गिनती भी उन्हीं नेता पुत्रों में होगी जो राजनीति में पैराशूट के ज़रिये उतारे जाते हैं. अखिलेश को अब खुद के निर्णय को परिपक्वता के पैमाने पर तौलकर सूबे में शांति कायम करने की पहल करना होगी, वरना आज मुजफ्फरनगर जल रहा है और यही हाल रहा तो देश के सबसे बड़े सूबे को जलने से कोई नहीं रोक पायेगा?

~सिद्धार्थ शंकर गौतम

Tuesday, September 10, 2013

त्वरित कार्रवाई से टल सकता था दंगा


जब भी कहीं दंगे की चिनगारी भड़कती है, या यों कहें कि वह पहली घटना घटती है जो बाद में बड़े दंगे का कारण बन सकती है, उसी समय प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए। दंगों और इन्हें भड़काने वाले तत्वों के मामले में सरकार के लिए सबसे सही नीति यही होती है कि वह इन्हें बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी, यानी शून्य सहिष्णुता की नीति। लेकिन ताजा मामले में शायद यह नहीं हुआ। घटना के बाद विरोध-प्रदर्शनों को जारी रखने की इजाजत एक बड़ी भूल साबित हुई। इसी कारण से अफवाहों का बाजार गरम हुआ और फर्जी वीडियो के प्रसार की बात भी सामने आई। यहां पर एक और बात जोड़ी जानी चाहिए कि जिस तरह दंगों का पहला कारण धर्म-जाति-संप्रदाय के आधार पर सामाजिक विभाजन है, तो दूसरा कारण प्रशासनिक ढांचे का राजनीतिकरण होना है। अक्सर स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था यह देखती है कि दंगे को रोकने से उनके राजनीतिक आका को नुकसान तो नहीं हो रहा है। इससे प्रशासनिक सुस्ती आती है और दंगा शुरुआती चरण से आगे बढ़ जाता है।
पुलिस व जिला प्रशासन, दोनों अपने कर्तव्य निभाने की जगह राजनीतिक आदेशों का पालन करने लगते हैं, जहां से उन्हें पदोन्नति और गैर-अनुचित लाभों की इच्छा रहती है। इसलिए भारतीय पुलिस व्यवस्था एक गैर-पेशेवर संस्था बनती जा रही है। इसकी आशंका कम ही रहती है कि स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी मौके की गंभीरता को भांप न पाएं। कई बार दंगों के बाद यह कहा जाता है कि खुफिया एजेंसी को सांप्रदायिक दंगों के भड़कने की जानकारी पहले से ही थी। खुफिया विभागों के पास इस काम के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है। वे स्थानीय पुलिस-प्रशासन की रिपोर्ट, तमाम ब्योरों को देख और माहौल भांपकर अंदेशा जताते हैं, जिनकी राज्य प्रशासन अनदेखी कर देता है। इसलिए भी सांप्रदायिक दंगे की खुफिया रिपोर्ट मिल जाने के बाद कोई फायदा नहीं होता।

सांप्रदायिक हिंसा की सूरत में स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन, स्थानीय एजेंसियां और राज्य प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन ऐसे मौकों पर अक्सर राजनीतिक तबका दंगों को सुलझाने की बजाय हवा देता है। और यही वह गलती है, जहां से सांप्रदायिक हिंसा का स्वरूप बिगड़ने लगता है और एक सीमा के बाद इस पर किसी का बस नहीं रह जाता। अंतत: चिनगारी भड़काने वाले हाथ खुद झुलसने लगते हैं। इस समय जब 2014 का आम चुनाव सामने है, सांप्रदायिक दंगा एक और भी ज्यादा खतरनाक खबर बन जाता है। और अभी तक जो ब्योरा आया है, उससे तो यही लगता है कि दो लोगों के बीच के निजी झगड़े को सांप्रदायिक रूप दिया गया। अब इससे मुजफ्फरनगर के अलावा कई अन्य जिले भी प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे मौकों पर जरूरी होता है कि सरकार त्वरित कदम उठाए और विपक्षी दल संयमित व्यवहार करें। तभी संकट को टाला जा सकता है।

अब तो ऐसे मामलों में सोशल मीडिया की भूमिका पर भी नजर रखनी जरूरी है। दंगों के शुरुआती चरण में अक्सर सरकारें यह दलील देती है कि अधिकतम पुलिस बल के इस्तेमाल से सांप्रदायिक माहौल और तेजी से बिगड़ सकती है। बेशक यह एक तत्व हो सकता है। लेकिन इसकी आड़ में सांप्रदायिक-संवेदनशील क्षेत्र को कानूनविहीन कर देना कतई जायज कदम नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार के लिखित दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन हो, तो राज्यों में सांप्रदायिक दंगों की नौबत ही नहीं आएगी। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रलय के ‘सांप्रदायिक सद्भाव पर दिशा-निर्देश’ को अपने आपमें विस्तृत और संपूर्ण माना जाता है। इसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में उपद्रवियों को रोकने के लिए राज्य सरकार तुरंत अधिकतम बल का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन राज्य सरकारें अक्सर ऐसा नहीं करती है। दिशा-निर्देश की प्रस्तावना में ही लिखा है कि ‘सांप्रदायिक सद्भाव कायम रखना और सांप्रदायिक हिंसा या दंगे को रोकना व इस तरह की किसी भी गड़बड़ी में पहले जैसी व्यवस्था को बहाल करने के लिए कदम उठाना तथा प्रभावित लोगों को सुरक्षा व राहत पहुंचाना राज्य सरकारों की पहली जिम्मेदारी है।’ इसके बाद ‘सुरक्षात्मक उपायों’ और ‘प्रशासनिक उपायों’ का विवरण है।

सांप्रदायिक दंगे को नियंत्रित करने से अधिक महत्वपूर्ण है, उसे होने ही न देना। और इस बारे में केंद्र सरकार का निर्देश है कि जिला प्रशासन नियमित अंतराल पर जिले में सांप्रदायिक स्थिति का आकलन करे और उसका पूरा ब्योरा तैयार रखे। साथ ही, वह सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाकों की पहचान करे, और उस क्षेत्र की आबादी, संदेह के कारणों, विवाद की वजहों और अतीत की घटनाओं का विस्तृत लेखा-जोखा बनाए। हर पुलिस थाने के पास ताजा ब्योरा जरूर हो। थाने के वरिष्ठ पुलिसकर्मियों की नजर इन संवेदनशील इलाकों पर लगातार बनी रहनी चाहिए। अगर थोड़ी भी जरूरत हो, तो अलग से चौकी बने और अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाए। ऐसे कई उपाय इसमें गिनाए गए हैं। इसके अलावा, प्रशासनिक उपायों में इस बात पर विशेष जोर है कि राज्य और जिला, दोनों स्तर पर विशेष संकट प्रबंधन योजना होनी चाहिए। ‘पर्सनल पॉलिसी’ में यह उल्लेख है कि संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस बलों की नियुक्ति वहां के सामाजिक ढांचे के अनुरूप हो, जिससे उनकी विश्वसनीयता बनी रहे और यह हर तबके को लोगों के बीच भरोसे को बनाने में मददगार हो।

आज हम जिस तरह की ‘जटिल व्यवस्था’ में रह रहे हैं, उसमें कभी-कभार कोई छोटी आपराधिक घटना भी भयंकर रूप ले सकती हैं। व्यवस्था की इस जटिलता का कारण हमारी मानसिक स्थिति भी हो सकती है और सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक स्थिति भी। इन घटनाओं के भयावह हो जाने के कई कारण होते हैं। कभी साधारण-सी घटनाएं सामाजिक सद्भाव का माहौल बिगड़ने से जटिल बन जाती हैं, तो कभी ऐसी पेचीदा घटनाओं के पीछे कोई साजिश होती है। ऐसी घटनाओं की पहचान और उनके बीच वर्गीकरण करना स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी का दायित्व होता है। राज्य-प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह उस बड़ी घटना पर तुरंत काबू पाए, ताकि जान-माल का नुकसान न के बराबर हो। अगर आपराधिक घटनाएं सांप्रदायिक दंगे का रूप लेती है, तो उसका सबसे बड़ा कारण है कि वह समाज जाति-धर्म-संप्रदाय के आधार पर बंटा हुआ है। भारतीय समाज में जाति-धर्म-संप्रदाय के स्तर पर विभाजन बहुत पुराना है और इस आधार पर अतीत में दंगे हुए हैं। लेकिन जिस तरह का सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक विकास आज के दौर में हुआ है, उसमें तमाम तरह के व्यापक सुधार हुए हैं और ऐसे में, किसी भी सांप्रदायिक दंगे के भड़कने का मतलब यह होता है कि घटना प्रशासनिक विफलता का परिणाम है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

~वेद मारवाह, पूर्व निदेशक, नेशनल सिक्युरिटी गार्ड

Wednesday, June 12, 2013

मेरी इनकम्प्लीट फैमिली...

 
जिस तरह भारत में ज़िंदा रहने के लिए विवाह करना जितना अनिवार्य है, ठीक उसी प्रकार विवाह होने के उपरान्त बच्चा पैदा करना उतना ही अनिवार्य है. आपको कोई कुंवारा रहने नहीं देगा और शादी के बाद बिना बच्चे के जीने नहीं देगा.
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इधर पिछले कुछ वर्षों से समाज में दो तरह के लोग आपसे टकराते हैं, एक वे हैं जो पहली संतान के विषय में बेधड़क होकर कहते हैं ' पहला बच्चा कोई भी हो चलेगा.' कोई भी से मतलब यह न निकाला जाए कि चूहा, बिल्ली या कोई भी जानवर पैदा हो जाए और ये उसे अपना लेंगे. कोई भी का मतलब यहाँ लड़की से होता है. ये बहुत बड़े दिल वाले होते हैं. ऐसे लोगों की वजह से ही शायद संसार में लड़कियों का जन्म हो पाता है.
दूसरे वे लोग हैं जो ज़िंदगी में किसी भी प्रकार का रिस्क नहीं लेते. ' पहला तो लड़का ही होना चाहिए, दूसरा चाहे कोई भी हो जाए.' यहाँ भी कोई भी का मतलब कीड़ा-मकौड़ा, पक्षी या जानवर नहीं बल्कि लडकी से ही है. ऐसे लोग शुरू में भले ही परेशान हो लें, लेकिन बाद में स्वयं को सुखी महसूस करते हैं.
ये दूसरी तरह के लोग बड़े ही स्मार्ट किस्म के होते हैं. इधर स्त्री ने गर्भधारण किया नहीं, उधर अल्ट्रासाउंड सेंटरों की खोज में आकाश -पाताल एक कर देते हैं. इन सेंटरों में, जहाँ बाहर से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है 'गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण करना कानूनन अपराध है' और अन्दर सब जगह अलिखित रूप से लिखा रहता है 'यहाँ ये अपराध इत्ते रुपयों में खुशी-खुशी किया जाता है'.
अगर आपकी पहली लडकी है और आप दूसरी संतान की इच्छा रखती हैं और कई साल बाद दोबारा गर्भधारण करतीं हैं तो समाज में बड़ी ही विचित्र परिस्थितियाँ जन्म लेने लगती हैं. आपसे मिलने आने वाली आपकी हर मित्र, रिश्तेदार या किसी भी पड़ोसी महिला को जाने किस गुप्त विधि से यह पता होता है कि आपके गर्भ में निश्चित रूप से लड़का है. सिर्फ आपको ही नहीं पता होता बाकी सबको पता होता है. कह सकते हैं 'जाने तो बस एक गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है.’ आप उन्हें कितना ही यकीन दिलाने की कोशिश करें कि वाकई आपको बच्चे का लिंग नहीं पता या आपने डॉक्टर पूछने की ज़रुरत ही नहीं समझी है, उन्हें किसी भी सूरत में यकीन नहीं होता है. आपकी हर कोशिश को काटने के यन्त्र इनके पास मौजूद रहते हैं.
वे फ़ौरन पूछती हैं ‘अल्ट्रासाउंड नहीं करवाया क्या?' आप कहेंगी ‘सात या आठ बार करवाया है’ ,'तब झूठ क्यूँ बोल रही हो कि नहीं पता’ अगर आप कहती हैं ‘वह तो बस बच्चे की ग्रोथ जानने के लिए डॉक्टर ने करवाए थे.’ किसी भी सूरत में वे इस बात को नहीं मानतीं कि अल्ट्रासाउंड गर्भ में पल रहे शिशु का विकास देखने के लिए भी किया जाता है. वे चुनौती देने लगतीं हैं ‘हम भी देख लेंगे जब लड़का होगा, अभी देखो कितनी एक्टिंग कर रही है, जैसे की हमें कुछ पता नहीं. इतने साल बाद क्यों याद आई दूसरे बच्चे की.’ कैसी आश्चर्य की बात है कि वे आपसे ज्यादा बेसब्री से आपके होने वाले बच्चे का इंतज़ार करने लगतीं हैं कि लड़का हो और वे आपसे खुलेआम कह सकें ‘हमने तो पहले ही कहा था, ऐसा कौन बेवकूफ होगा जिसकी पहली लडकी हो और उसने दूसरे बच्चे का लिंग नहीं पता किया हो.’
तब आपको अपने आसपास के अनेक लोग याद आने लग जाते हैं, जिनकी पहली संतान लड़की है और जो साल में दो-तीन बार प्राइवेट नर्सिंग होम्स के चक्कर काटते हैं और शिकायत करते हैं’ बहुत परेशान हैं, पता नहीं क्या हो गया, दूसरा बच्चा नहीं हो रहा, कितना ही इलाज करा लिया’ अगर आप उन्हें किसी इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट का पता बताती हैं तो वे आपकी बात पर बिलकुल ध्यान नहीं देते हैं. यह बाद में पता चलता है कि दरअसल इलाज से उनका मतलब गर्भपात से और दूसरे बच्चे से उनका मतलब सिर्फ और सिर्फ लड़के से होता है, जो न जाने कितनी गर्भपात के बाद भी पैदा होने का नाम ही नहीं लेता.
धर्मसंकट शायद इसे ही कहते हैं कि परिवार भी छोटा रखना है और फैमिली भी कम्प्लीट होनी चाहिए. ये वही पहले प्रकार के लोग होते हैं जो कहते थे ‘पहला कुछ भी चलेगा.’ अब ये लोग अपने पुराने निर्णय पर पछताते और हाथ मलते हैं कि काश! पहली बार में ही लिंग का पता कर लिया होता.
इधर आपके पेट का आकार बढ़ने लगता है और उधर आपके आसपास समाज में मौजूद कई तरह की चलती-फिरती अल्ट्रासाउंड मशीनें सक्रिय होने लगती हैं. कोई आपके पेट का आकार देखकर लड़का पैदा होने की भविष्यवाणी करेगी तो कोई चेहरे की रंगत देखकर. कोई आपसे कैटवॉक करवाके आपके चलने के अंदाज़ से जान लेती है तो कोई पहली लड़की के सिर के बालों के बीचोंबीच में पड़ने वाले भंवर को देखकर अनुमान लगा लेती है. एक आध मशीनें तो इतनी ज्यादा बेतकल्लुफ हो जाती हैं कि आपकी नाभि का आकार तक देख लेती हैं, उनके अनुसार इसके संकुचन की दिशा से एकदम सटीक अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
गौर करने वाली बात ये होती है कि सारी की सारी भविष्यवाणियाँ सिर्फ लड़के के लिए होती हैं. मौसम वैज्ञानिकों ने शायद इस बाद का अध्ययन नहीं किया होगा कि लड़का होने का भी एक मौसम होता है जिसके द्वारा ये मशीनें आने वाले बच्चे के लिंग का पूर्वानुमान कर लेती हैं. खट्टा या मीठा खाने की इच्छा उगलवाकर हर दूसरी औरत भविष्यवक्ता होने का दावा पेश कर देती है.
अगर इन मशीनों के सामने आपके मुंह से निकल गया ‘लडकी भी तो हो सकती है’ फ़ौरन आपके मुंह पर हाथ रख दिया जाएगा ‘शुभ-शुभ बोलते हैं. ऐसा नहीं कहते. कहते हैं दिन भर के चौबीस घंटे में से एक बार माँ सरस्वती जुबान पर बैठती है, अतः इन दिनों हमेशा शुभ-शुभ बोलना चाहिए.’ माँ सरस्वती! आप सब सुनतीं हैं न?
जैसे-जैसे आपके दिन बढ़ते जाते हैं आपकी शुभचिंतक महिलाएं, जो आपकी बेहद करीबी होती हैं, जिन्हें आप तर्क के द्वारा नहीं हरा सकती हैं, आपके घर में तरह-तरह के श्लोक, भांति-भांति के भगवानों की स्तुति, चालीस प्रकार की चालीसाएँ, सैकड़ों प्रकार के सहस्त्रनामों की फोटोकॉपी पहुँचाने में जुट जाते हैं. इन सब का एक ही निचोड़ होता है कि इन सबके द्वारा आपको अवश्य ही पुत्ररत्न प्राप्त होगा. आपके सिरहाने मन्त्र चिपका दिए जाते हैं, ताकि आप सुबह-शाम, दिन-रात उक्त मन्त्र का जाप करते रहें.
ऐसे बाबाओं के पते जिनके आशीर्वाद से सिर्फ लड़का ही होता है, आपके हाथ में छोटी सी पुर्ची बनाकर थमा दिए जाते हैं. गंडे, ताबीज लौकेट से अलमारियां भरने लगती हैं. इनके भोलेपन पर तरस भी आता है. अगर आप कह बैठेंगी कि ‘बच्चे का लिंग तो कब के बन चुका होगा अब क्या फायदा इन्हें जापने का.’ तब भी ये हार नहीं मानतीं और कहती हैं ‘चमत्कार भी तो कोई चीज़ होती है.’ इस चमत्कार को वाकई नमस्कार करने का मन करता है.
कभी-कभी आप सोचने लग जाती हैं कि शायद लोग झूठ बोलते हैं या दुनिया की सारी रिसर्चें फर्जी होती होंगी, जो ये कहती हैं कि बच्चा गर्भ में सब कुछ सुनता है, महसूस करता है. इतनी साजिशों को जानने के बाद तो कोई भी लडकी भगवान को अर्जी देकर गर्भ में ही अपना लिंग परिवर्तन करवा ले। इतने षड्यंत्र इसी पृथ्वी पर रचे जातीं हैं ताकि दूसरी लडकी पैदा न हो पाए, उस पर भी लडकियां पैदा हो ही जाती हैं. लड़कियों के अन्दर वाकई बहुत जिजीविषा होती है.
अगर आपकी डॉक्टर से आपकी आत्मीयता स्थापित हो गयी गई है, जो कि पर्याप्त महँगा इलाज करवाने की मजबूरी के कारण हो ही जाती है, तो वह भी आपको हिंट देने से पीछे नहीं हटेगी. तीसरे महीने के अल्ट्रासाउंड के बाद वह हँसते-हँसते कह ही देती है ‘लड़का भी ज़रूरी है आजकल. करिश्मा कपूर को देख लो, इतने साल बाद हुआ न बेटा.’ इसी तरह से दो-तीन और अभिनेत्रियों के नाम वह आपके सामने रखती है. वह चाहती है कि आप बच्चे का लिंग पूछे और वह अपनी फीस बताए. आप नहीं पूछतीं तो वह मन मसोसकर चुप हो जाती है.
अनुमानों की बारिश के जीभर के बरसने के बाद आपका नौ महीने का समय पूरा हो जाता है. अस्पताल जाने की तैयारियां पूरी कर ली जातीं हैं. एक बार फिर आपके द्वारा लगाई गयी अटैची को दोबारा खोल कर रखे गए कपड़ों के आधार पर बच्चे का लिंग जानने की अंतिम कोशिश की जाती है. अगर आप आधे कपडे लड़के के रखती हैं, और आधे लड़कियों के, तो ही इनके दिल को तसल्ली होती है कि वाकई आप सच बोल रही थीं. फिर अस्पताल जाने तक सांत्वना देने का अनवरत क्रम चलता रहता है ‘सब अच्छा होगा, देखना पक्का लड़का ही होगा.’
ऑपरेशन की टेबल पर ले जाने से पाहिले आपका चेकअप डॉक्टर की असिस्टेंट द्वारा किया जाता है. वह पूछती है ‘पहला बच्चा क्या है?’ आप उत्तर देती हैं ‘बेटी है' फिर उसका जवाब आता है ’एक लडकी है, दूसरा लड़का हो जाता तो फैमिली कम्प्लीट हो जाती’ उसी डॉक्टरजिसके यहाँ घुसते ही बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ टंगा रहता है ‘आप जिस डॉक्टर से परामर्श के लिए कतार में बैठे हैं वह भी किसी की बेटी है, अतः गर्भस्थ शिशु लड़का है या लडकी यह पूछने से पहले सोचें.’
आपके ताबूत में आख़िरी कील तब लगती है जब डॉक्टर द्वारा आपका पेट चीर के बच्चे को बाहर निकाला जाता है और बताया जाता है ‘बधाई हो, लक्ष्मी आई है.’ फिर तुरंत दूसरा प्रश्न गोली की तरह छूटता है ‘पहला बच्चा क्या है आपका?’ आप एनस्थीसिया का इंजेक्शन लगा होने के कारण अर्धनिद्रा में होती हैं और धीमे से कहतीं हैं ’ बेटी है’ वो सुनती हैं ‘बेटा है’ और सुनकर कहती हैं ‘एक बेटा और एक बेटी हो गए। चलो फैमिली कम्प्लीट हो गयी.’
कम्प्लीट सुनते ही आपकी सुप्त हो गयी चेतना वापिस आ जाती है. आप कहतीं हैं ‘बेटी है पहली’ वो तुरंत बात पलट देती हैं ‘कोई बात नहीं, आजकल तो लड़का-लड़की सब बराबर हैं, फिर भी अगर इच्छा होगी तो दो साल बाद आ जाना.’ यह सुनते ही वापिस आई हुई चेतना फिर से लुप्त हो जाती है.
ऑपरेशन के बाद आपको कमरे में शिफ्ट किया जाता है. आपके साथ मौजूद घरवालों को कोई बधाई का एक शब्द तक नहीं कहता. आपके पति द्वारा तैयार किये गए सौ-सौ के नोट जेब में ही फड़फड़ाते रह जाते हैं. अस्पताल का कोई भी कर्मचारी शगुन नहीं मांगने आता. सफाई करने वाली बेहद गरीब औरत भी इतनी स्वाभिमानी निकलती है कि आपके घर में दूसरी लड़की होने के बोझ को जानकार आपसे एक पैसा भी नहीं मांगती.
वहीँ दूसरी और आपके बगल के कमरे में लड़का हुआ होता है और वहां मांगने वालों का तांता लगा हुआ होता है. अस्पताल के सभी कर्मचारी वहां से वसूली करके आते हैं. इधर आपके द्वारा सबसे महंगी दुकान से मंगवाई गयी मिठाइयां पड़े-पड़े सूख जाती हैं. ऐसा लगता है जैसे पूरा अस्पताल एकाएक डायबिटीज़ की गिरफ्त में आ गया हो. पेट की ताज़ा-ताज़ा सिलाई से उठने वाला दर्द पीड़ा नहीं देता, लेकिन अब दिल पर लगे हुए घाव एकाएक टीस देने लगते हैं. आपको लगता है जैसे ज़माना फिर से सौ बरस पीछे चला गया.
आप घर आती हैं. अब तक सबको खबर हो चुकी होती है. लोग आने लगते हैं. बधाई के शब्द सांत्वना की चाशनी में लपेटकर आपके सामने परोसे जाते हैं. बहाने-बहाने से आपकी आँखों में झांका जाता हैं कि कहीं से तो शायद एक कतरा दुःख का गिरे तो वे लपक लें और अपने सांत्वना के शब्द जो उन्होंने बीते कई दिनों से सहेज रखें हैं, आपके सामने उगल दें. आपके कंधे पर अपना हाथ रखकर दुःख प्रकट करें. अगर आप ऐसा कुछ भी नहीं करतीं तब भी वे रह नहीं पातीं, बैचैन होकर अपने दिल की बात कह ही डालतीं हैं, ‘कोई बात नहीं, अगली बार लड़का हो जाएगा, अभी कौन सी उम्र चली गयी है. तीन ऑपरेशन तो आजकल साधारण बात हैं.’
आप अगर कह दें ‘तीसरी बार कि क्या गारंटी है ‘लड़का ही होगा’ वे कहती हैं ‘नहीं अबकी ज़रूर लड़का होगा.’ ऐसे कई उदाहरण आपके सामने फिर से प्रस्तुत किये जाते हैं, जिसमे तीसरी बार में जाकर लड़का हुआ. इस दृढ़ विश्वास पर कौन न कुर्बान हो जाए.
आपके गले में बहादुरी का तमगा पहनाया जाता है. आप हिम्मती ठहराई जाती हैं. हकीकत में देखा जाए तो आप बहुत कमज़ोर किस्म की होतीं हैं. ह्रदय बहुत नाज़ुक होता है. गलत काम पर करने पर ऊपरवाले से डरती हैं. हिम्मती तो वे होतीं हैं जो साल में दो बार गर्भपात करवाती हैं, शरीर पर इतना ज़ुल्म सहती हैं, और चूं भी नहीं करतीं. कर्म प्रधान होने के कारण न भाग्य से और न ही भगवान से डरती हैं.
घर में ऐसी कई महिलाएं कई दिनों तक आती रहती हैं, आप इन्हें चाय पिलाती हैं और ये आपको लड़के की अनिवार्यता के विषय में लेक्चर पिलाती हैं. इनमें से कई महिलाएं एक ही शहर में अपने सास और ससुर से अलग घर लेकर रहती हैं. कई के सास-ससुर बुढापे में अपना खाना आप ही बनाते हैं. इकलौते लड़के हालचाल पूछने तक नहीं जाते. लड़का न हो पाने की सांत्वना तो वह भी देती है, जो रोज़ मौका ढूंढती है और पहला मौक़ा लगते ही सास-ससुर से अलग हो जाना चाहती है.
सबसे ज्यादा अफ़सोस तब होता है जब वह भी आपको पुत्र के ज़रूरी होने की बात कहती है, जिसका खुद का लड़का साल में छह महीने मानसिक अस्पताल में भर्ती रहता है. जब घर में रहता है उसे आए-दिन मारता रहता है. पति बीस साल पहले घर छोड़कर चला गया था, जिंदा भी है या मर गया उसे नहीं मालूम, लेकिन वह उसके नाम के सिन्दूर से मांग भरना एक दिन भी नहीं छोड़ती है.
इसके कई दिन बाद तक कई तरह के रहस्योद्घाटन आपके सामने होते रहते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं- दूसरी लड़की होने का मतलब है आपका पढ़ा-लिखा होना बेकार है. पढ़े-लिखे लोग ऐसी गलती नहीं करते. अब भुगतो सारी ज़िंदगी दूसरी लड़की को. आपसे तो अच्छे कम पढ़े-लिखे लोग होते हैं. धिक्कार है आपकी डिग्रियों को. इनको पहली फुर्सत में आग लगा देनी चाहिए.
दूसरी लड़की पूर्वजों के अभिशाप की वजह से होती है. अगर आपने अपने अपने माँ-बाप की इच्छा के विरूद्ध विवाह किया है तो भगवान् आपको दंडस्वरूप दो लड़कियां देता है.
लड़कों की उत्पत्ति अनिवार्य रूप से जबकि लड़कियों की उत्पत्ति अपने कन्यादान के शौक को पूरा करने के लिए होनी चाहिए. जो कन्यादान करता है वह अपनी सारी ज़िंदगी किसी भी भिखारी या मांगने वाले को कुछ भी न दे तो भी चलेगा. ऊपरवाला उसे कोई सजा नहीं देता, क्योंकि वह भविष्य में कन्यादान नाम का महादान करेगा.
बाज़ार में सुन्दर-सुन्दर कपडे सिर्फ़ लड़कियों के लिए मिलते हैं, इसलिए एक लड़की तो होनी ही चाहिए. बाज़ार में लड़कियों के डिज़ाईनर कपडे नहीं मिलते, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हालत कितनी खराब होती. लड़कियां भाई को राखी बाँधने के काम आती हैं. अच्छा हुआ कि भारतवर्ष में रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है. सोचिये, अगर भारतवर्ष त्योहारों का देश न होता तो कितनी बुरी दशा होती लिंगानुपात की.
अगर पहली लड़की हो तो दूसरी बार भगवान् पर भूलकर भी भरोसा नहीं करना चाहिए. हाँ, लिंग परीक्षण करवाने के उपरान्त गर्भपात सही-सलामत हो जाए, इसके लिए भगवान् को हाथ ज़रूर जोड़कर जाना चाहिए.फैमिली हर हाल में कम्प्लीट होनी चाहिए, इसके लिए गर्भपातों की संख्या याद करना बंद कर देना चहिए.
'कम्प्लीट फैमिली' का मतलब सिर्फ चार लोग माँ, बाप एक लड़का एक लड़की होता है. कम्प्लीट फैमिली में दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ या कहें कि किसी भी प्रकार का कोई रिश्ता नहीं आता. इस लेख की प्रेरणास्रोत, मेरी दूसरी बेटी पूरे दो साल की हो गयी है. उसे जीभर के आशीर्वाद और शुभकामनाएँ दीजिये.

लेखिका : शेफाली पांडे पेशे से शिक्षक हैं.

Sunday, February 24, 2013

फिर फंसेगे बेगुनाह… फिर मरेंगे आम लोग… फिर बंटेगा वीरता चक्र…


हैदराबाद में धमाके हुए हैं और तफतीश भी शुरू हो चुकी है. वही पुराना, बासी, पैबंद-दार और घीसा-पीटा जांच का फार्मूला एक बार फिर से दोहराया जाएगा. शुरूआत हो चुकी है… पढ़ते जाईए… देखते जाईए और समझते जाईए…
BeyondHeadlines
1- पुलिस को आनन फानन में वह बाजार पता चल जाएगा जहां से साइकिल खरीदी गई थी. (ये अलग बात है कि साइकिल की न तो कोई आर सी होती है, नहीं लाइसेंस प्लेट और नहीं चालक का कोई लाइसेंस.)
2- गजब तो ये कि साइकिल की दुकान वाले को साइकिल खरीदने वाले का चेहरा भी हू ब हू याद होगा. चाहे साइकिल महीनो पहले ही क्यों न खरीदी गई हो. वो आतंकियों का स्केच भी हू ब हू तैयार करा देगा और यह स्केच किसी कुख्यात आतंकी चेहरे से मिलता जुलता भी होगा. (ये अलग बात है कि हम जिस दुकान से पानी की बोतल या अखबार खरीदते हैं, उस दुकानदार का चेहरा भी हमें शायद ही याद रहता हो.)
3- अब सुरक्षा एजेंसियां आनन फानन में छापा मारेंगी. संदेहास्पद लोग पकड़े जाएंगे. उनके पास ये चीजें जरूर बरामद होंगी- उर्दू का एक अखबार, पाकिस्तान का झंडा, इंडियन मुजाहिदीन या सिमी का साहित्य, पाकिस्तान मेड असलहा, विदेशी करेंसी… (मानो आतंक के आका आतंकियों को हर ब्लास्ट से पहले एक विशेष प्रकार की किट से लैस कर के भेजते हैं. ब्लास्ट की जगह अलग हो सकती है. ब्लास्ट का समय अलग हो सकता है, मगर ये किट जिसे सुरक्षा एजेंसियां बरामद करती हैं, हमेशा एक सी होती है. कभी नहीं बदलती.)
4- इतना नहीं पुलिस को आनन-फानन में माड्यूल का भी पता चल जाएगा. ये माड्यूल इन्हीं में से एक होगा. पुणे बेकरी ब्लास्ट. मुंबई झावेरी बाजार ब्लास्ट. यूपी संकटमोचन मंदिर ब्लास्ट. जयपुर जौहरी बाजार ब्लास्ट, दिल्ली सीपी-गफ्फार मार्केट धमाके…. माड्यूल का पता धमाके में इस्तेमाल की गई चीजों से चलेगा. जैसे साइकिल, बाल रिंग, शार्पनेल, टाइमर आदि और इसी से साबित हो जाएगा कि धमाके सिमी ने किए हैं, हूजी ने या फिर इंडियन मुजाहिदीन ने ( ऐसा लगता है कि जैसे कापीराइट एक्ट के तहत हर आतंकी संगठन ने अपने अपने धमाकों में इस्तेमाल होने की जाने वाली चीजों का रजिस्ट्रेशन करा लिया हो और एक आतंकी संगठन कानूनन दूसरे आतंकी संगठन के माड्यूल में इस्तेमाल की गई चीजों का इस्तेमाल नहीं कर सकता, नहीं तो शायद पटियाला कोर्ट दिल्ली में कापीराइट एक्ट के तहत इस मामले में दावा भी दायर किया जा सकता है.)
5- ब्लास्ट कोई भी हो, कहीं भी हो, कैसा भी हो, खुफिया एजेंसियों के सूत्रों से मास्टर माइंड का नाम आधे घंटे के भीतर ही फ्लैश होना शुरु हो जाएगा और वो इन्हीं में से कोई एक होगा. रियाज भटकल. इकबाल भटकल. यासीन भटकल… अहमद सिद्धी बप्पा उर्फ शाहरूख उर्फ यासीन अहमद. इलियास कश्मीरी. हाफिज सइद. लखवी… (मानो ये मास्टर माइंड कारनामे को अंजाम देते ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को फोन कर रिपोर्ट करते हों कि सरकार काम हो गया, अब आप नाम आगे बढ़ा सकते हैं.)
6- ब्लास्ट के 24 घंटों के भीतर ही इन जगहों पर छापे जरूर पडेंगे. आजमगढ़- उत्तर प्रदेश… दरभंगा- बिहार… नांदेड़ और बीड़- महाराष्ट्र. संदिग्ध आतंकी या तो इन्हीं जगहों से बरामद होंगे या उनका लिंक इन्हीं जगहों से मिलेगा. (मानो यूपीएससी की वेबसाइट पर “अपकमिंग वैकेंसी” के कॉलम में योग्य उम्मीदवारों की एक सूची लगी हो और उनमें इनका नाम दिया गया हो.)
गृहमंत्री महोदय, कृपया ध्यान दें- एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर हमारी सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों की इसी दिमागी मौज मस्ती के चलते, असली आतंकी तो पकड़ में आते ही नहीं, हां गरीब कमजोर बेगुनाहों को जेलों में ठूंसकर हर साल 26 जनवरी को वीरता पुरुस्कार जरूर हथिया लिए जाते हैं, नहीं तो अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद किसी की कूवत नहीं हो पाई कि सार्वजनिक जगहों पर एक छुरछुरी भी फोड़ सके.
Abhishek Upadhayay for beyondheadlines 

Monday, November 12, 2012

क्या ‘हिन्दू‘ हमारी पहचान और राष्ट्रीयता है?



Omपिछले कुछ दशकों में सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्र में धार्मिक पहचान, एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है। साम्प्रदायिक और कट्टरतावादी राजनीति के उदय से ‘हम कौन हैं‘-इस प्रश्न के कई नितांत घातक व स्पष्ट तौर पर निहित राजनैतिक स्वार्थों को साधने वाले उत्तर, जनता के मन में बैठा दिए गए हैं और इनसे समाज विभाजित हुआ है। हाल में (सितम्बर, 2012) आर.एस.एस सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि ‘‘जब हम ‘हिन्दू‘ शब्द का उपयोग करते हैं तो हमारा अर्थ होता है संपूर्ण भारतीय समाज, जिसमें हिन्दू, मुसलमान और ईसाई सभी शामिल हैं। ‘हिन्दू‘ शब्द हमारी पहचान और राष्ट्रीयता है।‘‘ क्या यह मान्यता सभी भारतीयों को स्वीकार्य होगी? इस मान्यता के दो पहलू हैं-पहला धार्मिक और दूसरा राजनैतिक-राष्ट्रीय।
क्या हम सब भारतीय हिन्दू हैं, जैसा कि भागवत साहब ने फरमाया है। यह सही है कि हिन्दू शब्द का इस्तेमाल आठवीं सदी में शुरू हुआ जब पश्चिम (ईरान-ईराक से) दिशा से आने वालों ने इस शब्द को गढ़ा। वे सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों को सिन्धू कहने लगे। चूंकि उनकी भाषा में ‘ह‘ अक्सर ‘स‘ के स्थान पर प्रयुक्त होता था इसलिए सिन्धू शब्द “हिन्दू” में बदल गया। अतः शुरूआती दौर में हिन्दू शब्द का भौगोलिक अर्थ था। बाद में अनेक धार्मिक परंपराओं जिनमें ब्राहम्णवाद, नाथ, तंत्र, सिद्ध व भक्ति शामिल हैं, के मानने वाले हिन्दू कहलाने लगे और हिन्दू शब्द इन विभिन्न धार्मिक परंपराओं के मानने वालों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। आज भी दुनिया के कुछ हिस्सों में हिन्दू शब्द को भौगोलिक संदर्भ में लिया जाता है परंतु भारत और विश्व के अधिकांश देशों में हिन्दू अब एक धर्म विशेष का नाम बन गया है।
हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत अछूतों के साथ किए जाने वाले पशुवत व्यवहार से दुःखी होकर अम्बेडकर ने कहा था कि ‘‘मैं हिन्दू पैदा हुआ था क्योंकि वह मेरे हाथ में नहीं था, परंतु मैं हिन्दू के रूप में नहीं मरूंगा‘‘। उन्होंने हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया। जैसे-जैसे देश में भारतीय राष्ट्रीयता की भावना जागृत होना शुरू हुई, साम्प्रदायिक राजनीति ने अपने पंख फैलाने शुरू कर दिए। सामंतवादी वर्ग और राजा-महाराजा एकजुट हो गए और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीयता के प्रति अपने विरोध को धार्मिक रंग देने की किशिश शुरू कर दी। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की जगह इन सामंती तत्वों और राजा-महाराजाओं ने मुस्लिम राष्ट्रीयता और हिन्दू राष्ट्रीयता की बातें करना प्रारंभ कर दिया। सन् 1888 में गठित युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन से ही धार्मिक राष्ट्रीयता में आस्था रखने वाले विभिन्न संगठन जन्मे। इस संस्था के संस्थापकों में ढाका के नवाब और कशी के राजा प्रमुख थे। बाद में कुछ मध्यमवर्गीय, पढे़ लिखे लोग भी इस संस्था से जुड़ गए। युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन ही वह संगठन था जिसने मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को जन्म दिया।
चूंकि इस्लाम, पैगम्बर पर आधारित धर्म था इसलिए उसकी पुनर्व्याख्या की आवश्यकता नहीं थी। परंतु हिन्दू धर्म, विभिन्न धार्मिक परंपराओं का मिलाजुला स्वरूप था इसलिए उसे हिन्दू धार्मिक राष्ट्रवाद का आधार बनाने के लिए नए सिरे से व्याख्यित किए जाने की आवश्यकता थी। सावरकर ने हिन्दू धर्म को परिभाषित करते हुए कहा कि जिन लोगों की पुण्यभू और पितृभू  भारतवर्ष में है, वे सब हिन्दू हैं। यह हिन्दू की राजनैतिक परिभाषा थी क्योंकि सावरकर, हिन्दू राष्ट्रवाद के झंडाबरदार थे और वे इस राष्ट्रवाद से मुसलमानों और ईसाईयों को अलग रखना चाहते थे। सावरकर की हिन्दुओं की इस परिभाषा में जैन, बौद्ध और सिक्ख भी शामिल थे जिन्हें हिन्दू धर्म के विभिन्न पंथ बता दिया गया। इन धर्मों के मानने वालों को यह स्वीकार्य नहीं था। वे अपने-अपने धर्मों की अलग पहचान कायम रखने के इच्छुक थे और हिन्दू धर्म का हिस्सा बनना नहीं चाहते थे।
अतः यह कहना, जैसा कि भागवत कह रहे हैं, कि सभी बौद्ध, जैन, सिक्ख, भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई हिन्दू हैं, सत्य से परे है। यह एक तरह से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हिन्दू पहचान और हिन्दू कर्मकाण्ड लादने की कोशिश है। कुछ इसी तरह की बात लगभग दो दशक पहले तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कही थी। उन्होंने कहा था कि हम सब हिन्दू हैं- मुसलमान महमदिया हिन्दू हैं, ईसाई क्रिस्ट हिन्दू हैं इत्यादि।
आजादी के आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता की दो अवधारणाएं सामने आईं। एक थी भारतीय राष्ट्रीयता, जिसकी आधारशिला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों ने रखी थी। यह राष्ट्रीयता दुनिया के सबसे बड़े जनांदोलन-भारतीय स्वतंत्रता संग्राम- की नींव बनी। राष्ट्रीयता की इस अवधारणा में धर्म व्यक्तिगत मसला था जबकि राष्ट्रीयता का संबंध एक विशेष भौगोलिक सीमा के अंदर रहने वाले लोगों से था। अधिकांश भारतीयों ने राष्ट्रीयता की इसी परिभाषा को स्वीकार किया और स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी की। स्वाधीनता संग्राम का उदेश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति तो था ही उसने जातिगत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी आवाज उठाई और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में आस्था प्रकट की। यही मूल्य आगे चलकर हमारे संविधान का हिस्सा बने। दूसरी राष्ट्रीयता थी धार्मिक राष्ट्रीयता, जिसे जमींदार और सामंती वर्ग ने पोषित किया और आगे चलकर जो दो समानांतर राष्ट्रीयताओं में बंट गई। इन दोनों समानांतर राष्ट्रीयताओं के लगभग एक से सिद्धांत थे। ये थीं हिन्दू राष्ट्रीयता (हिन्दू महासभा व आरएसएस) और मुस्लिम राष्ट्रीयता (मुस्लिम लीग)। ये दोनों राष्ट्रीयताएं न केवल आजादी के आंदोलन से दूर रहीं बल्कि उन्होंने इस आंदोलन को कमजोर करने की भरसक कोशिश की। वे “ “हमारी महान परंपराएं“ और “हमारा महान धर्म“ के नाम पर जातिगत और लैंगिक भेदभाव को बनाए रखने की कोशिश करती रहीं। ये दोनों धार्मिक राष्ट्रीयताएं अपने इतिहास को पुरातनकाल से जोड़ती रहीं। मुस्लिम लीग का कहना था कि मोहम्मद बिन कासिम के सिंध में अपना राज्य स्थापित करने के समय से ही मुस्लिम अलग राष्ट्र हैं। जबकि हिन्दू राष्ट्रवादी यह दावा करते थे कि हिन्दू, अनादिकाल से एक राष्ट्र हैं।
राष्ट्रीयता को प्राचीन इतिहास से जोड़ना, तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। राष्ट्रीयता की अवधारणा का विकास ही पिछली दो-तीन सदियों में हुआ है जब राजाओं के साम्राज्य बिखरने लगे और औद्योगिकरण और षिक्षा से लोगों की सोच में बदलाव आया। राजसी काल के पहले का समाज एकदम अलग था और उसे किसी भी स्थिति में राष्ट्र नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रीयता की ये दोनों धार्मिक अवधारणाएं अपने-अपने धर्मों के राजाओं का महिमामंडन करती हैं और अन्य धर्मों के राजाओं का दानवीकरण। वे यह भूल जाती हैं कि संपूर्ण राजतंत्रीय व्यवस्था ही शोषण व सामाजिक ऊँच-नीच पर आधारित है।
स्वाधीनता संग्राम के समय से ही दोनों धार्मिक राष्ट्रीयताएं इतर धर्मों के लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानती थीं। पाकिस्तान में मुस्लिम राष्ट्रवाद के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और भारत में भी हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के परवान चढ़ने के साथ ही, अल्पसंख्यकों के बुरे दिन आ गए लगते हैं। हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म पर्यायवाची नहीं हैं। हिन्दुत्व को मोटे तौर पर हम राजनैतिक इस्लाम का हिन्दू संस्करण मान सकते हैं। हिन्दुत्व एक तरह का ‘राजनैतिक हिन्दू धर्म‘ है। आर.एस.एस-हिन्दुत्व के सबसे प्रमुख विचारक एम.एस.गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘व्ही आर अवर नेशनहुड डिफांइड‘ में कहा है कि ईसाईयों और मुसलमानों को हिन्दुओं के अधीन रहना होगा वरना उन्हें कोई नागरिक अधिकार नहीं मिलेंगे। दुर्भाग्यवश, भारत में साम्प्रदायिक हिंसा में तेजी से हुई बढ़ोत्तरी के साथ गोलवलकर की यह इच्छा कुछ हद तक पूरी होती दिखती है।
यह कहना कि हम सब हिन्दू हैं, धार्मिक अल्पसंख्यकों को दबाकर रखने का राजनैतिक षड़यंत्र है और ऐसा कहने वाले जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच के रखवाले हैं। ऊँचनीच और असमानता, धर्म-आधारित सभी राजनैतिक विचारधाराओं का आवष्यक अंग होती है। हिन्दू धर्म को सभी भारतीयों की राष्ट्रीयता और पहचान से जोड़ना, भारतीय राष्ट्रवाद, स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों और भारतीय संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है। भागवत तो केवल आरएसएस के उस राजनैतिक एजेन्डे को स्वर दे रहे हैं जिसका उदेश्य प्रजातंत्र का गला घोंटना और पीछे के रास्ते से गोलवलकर के सपने को साकार करने की कोशिश करना है। यह कहना कि सभी भारतीय हिन्दू हैं तो शुरूआत भर है। इसके बाद अल्पसंख्यकों से अपेक्षा की जावेगी कि वे हिन्दू कर्मकाण्ड अपनाएं, हिन्दू धर्मग्रंथों को पवित्र मानें और हिन्दू देवी-देवताओं की आराधना करें। अतः यह मानना एक भूल होगी कि सभी भारतीय हिन्दू हैं, यह कहकर भागवत किसी उदारता का परिचय दे रहे हैं। वे तो हिन्दू पहचान को धार्मिक अल्पसंख्यकों पर लादना चाहते हैं। हिन्दू सारे भारतीयों की पहचान न थी, न है और न हो सकती है। वह केवल हिन्दुओं की धार्मिक पहचान है और ‘हिन्दू‘ कोई राष्ट्रीयता नहीं है। हम सबकी राष्ट्रीयता भारतीय है और हमारी अलग-अलग धार्मिक पहचानें हैं।

 -राम पुनियानी

Tuesday, October 30, 2012

फैज़ाबाद में हुए दंगे की ज़िम्मेदारी अखिलेश यादव को लेनी चाहिए



उत्तर प्रदेश में जब सरयू नदी के किनारे ठंडी हवा बह रही थी उसी वक़्त फिज़ा में ज़हर घोलने की साजिश रची जा रही थी और फिर कुछ लम्हों के बाद शहर के भीतर चौक में इंसान एक दूसरे के खून के प्यासे बने बैठे थे। फैजाबाद का चौक इलाका आतंक और उन्माद के हाथों फंस कर बुरी तरह जख्मी हो चूका था, यहाँ के रहने वाले गुफ़रान सिद्दीकी का कहना है की अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के वक़्त जब पूरा देश दंगो की चपेट में था तब भी हमारा शहर सुरक्षित था, फिर जाने कैसे ये दिन देखना पड़ा। हमारी ही आँखों के सामने इबादतगाह के भीतर तोड़ फोड़ की गयी, दुकानों और दफ्तर को जलाया गया, खुदा खैर करे हम उनके हाथ नही आये वरना वो हमे भी 'मोदी का गुजरात' बना देते।

फैजाबाद गंगा-जमुनी तहज़ीब का बेहतरीन नमूना है। यहाँ पर दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को जाने वाले जुलूस के ऊपर चौक वाली मस्जिद से पुष्प वर्षा की जाती रही है और ये सिलसिला इस बार दंगाइयों ने तोड़ दिया। फैजाबाद के साकेत पी.जी. कालेज के प्रोफ़ेसर अनिल कुमार सिंह का कहना है की दंगाई जैसे किसी ख़ास तरह की प्लानिंग के तहत मैदान में उतरे थे उनके सामने शिकार बनी बैठी बहुत सी चीज़े थी पर उन्होंने सिर्फ अल्पसंख्यकों की दुकानों को ही निशाना बनाया। इस दौरान पुलिस का कहीं अता-पता भी नही था। यूपी में हो रहे दंगो में पुलिस की निष्क्रियता कई सवाल खड़े करती है, ऐसे सवाल जिसमे खुद युवा और सोशलिस्ट मुख्यमंत्री भी फंसते हुए नज़र आते हैं।

उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के ऊपर लगातार हमले किये जा रहे हैं। प्रतापगढ़ की घटना किसी से छुपी नही । ऐसे में फैजाबाद की हिंसा न सिर्फ घाव हरे करेगी बल्कि राज्य सरकार पर से भरोसा भी उठा देगी। फैजाबाद और यूपी के अन्य दंगा पीड़ित शहरों के लोग भय में जीने को मजबूर हैं। यदि हालात ऐसे ही रहे तो इसका सियासी फायदा लेने के लिए राजनैतिक दलों में होड़ मच सकती है और फिर दंगे रोकने और करवाने का श्रेय लेने वालों की कतार लगने के बाद की स्थिति और भी विस्फोटक हो सकती है। ये सिर्फ एक पत्रकार के नाते मेरी बाते नही हैं बल्कि हर उस व्यक्ति की मनोदशा है जिसने धर्मं निरपेक्षिता के नाम पर अपना वोट दिया था ताकि राज्य में विकास को गति मिले और आपसी सौहार्द का सिलसिला कायम हो सके। लेकिन दंगो और प्रशासनिक लापरवाही ने उत्तर प्रदेश के लोगों में वर्तमान अखिलेश यादव सरकार के प्रति गुस्से और विरोध की ज्वाला भड़का दी है। यदि सरकार को इन बातों से कोई लगाव नहीं है कि उसकी जनता किस हाल में जीने को मजबूर है तो ऐसी सरकार या पार्टी के लोगों को अपने ‘घोषणा पत्र’ को फाड़ देने चाहिए।

देश के सबसे बड़े सूबे में सपा की सरकार है और सरकार को बने हुए छ माह से ऊपर हो चुके हैं। 'बचपन की गलतियों' का वक़्त भी बीत चूका है। जब इतने से कम वक़्त में सरकार साहिब का ये हाल है तो अभी पूरे 4 साल छ महीने बचे हुए हैं। यदि दंगों की गिनती की जाए और फिर सरकार के बाकी बचे वक़्त से उसका गुणा किया जाए तो ये संख्या हैरान कर देने वाली लगती है और इस हैरानी के पीछे प्रशासनिक अधकचरेपन से कहीं अधिक युवा मुख्यमंत्री की नीतियाँ हैं जिनमे आम आदमी की सुरक्षा के लिए किसी भी तरह का प्रबंध नही किया गया है और न ही सांप्रदायिक शक्तियों पर लगाम लगाने के लिए उचित उपाय। उत्तर प्रदेश को गुजरात बनने से बचा लीजिये अखिलेश यादव जी या फिर ‘नुक्कड़ और चौराहों’ पर किये अपने वादों की लिस्ट को फाड़ दीजिये क्योकि प्रदेश के मुखिया होने के नाते आपकी जवाबदेही बनती है, किसी विपक्ष की नही।