Tuesday, September 10, 2013

त्वरित कार्रवाई से टल सकता था दंगा


जब भी कहीं दंगे की चिनगारी भड़कती है, या यों कहें कि वह पहली घटना घटती है जो बाद में बड़े दंगे का कारण बन सकती है, उसी समय प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए। दंगों और इन्हें भड़काने वाले तत्वों के मामले में सरकार के लिए सबसे सही नीति यही होती है कि वह इन्हें बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी, यानी शून्य सहिष्णुता की नीति। लेकिन ताजा मामले में शायद यह नहीं हुआ। घटना के बाद विरोध-प्रदर्शनों को जारी रखने की इजाजत एक बड़ी भूल साबित हुई। इसी कारण से अफवाहों का बाजार गरम हुआ और फर्जी वीडियो के प्रसार की बात भी सामने आई। यहां पर एक और बात जोड़ी जानी चाहिए कि जिस तरह दंगों का पहला कारण धर्म-जाति-संप्रदाय के आधार पर सामाजिक विभाजन है, तो दूसरा कारण प्रशासनिक ढांचे का राजनीतिकरण होना है। अक्सर स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था यह देखती है कि दंगे को रोकने से उनके राजनीतिक आका को नुकसान तो नहीं हो रहा है। इससे प्रशासनिक सुस्ती आती है और दंगा शुरुआती चरण से आगे बढ़ जाता है।
पुलिस व जिला प्रशासन, दोनों अपने कर्तव्य निभाने की जगह राजनीतिक आदेशों का पालन करने लगते हैं, जहां से उन्हें पदोन्नति और गैर-अनुचित लाभों की इच्छा रहती है। इसलिए भारतीय पुलिस व्यवस्था एक गैर-पेशेवर संस्था बनती जा रही है। इसकी आशंका कम ही रहती है कि स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी मौके की गंभीरता को भांप न पाएं। कई बार दंगों के बाद यह कहा जाता है कि खुफिया एजेंसी को सांप्रदायिक दंगों के भड़कने की जानकारी पहले से ही थी। खुफिया विभागों के पास इस काम के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है। वे स्थानीय पुलिस-प्रशासन की रिपोर्ट, तमाम ब्योरों को देख और माहौल भांपकर अंदेशा जताते हैं, जिनकी राज्य प्रशासन अनदेखी कर देता है। इसलिए भी सांप्रदायिक दंगे की खुफिया रिपोर्ट मिल जाने के बाद कोई फायदा नहीं होता।

सांप्रदायिक हिंसा की सूरत में स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन, स्थानीय एजेंसियां और राज्य प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन ऐसे मौकों पर अक्सर राजनीतिक तबका दंगों को सुलझाने की बजाय हवा देता है। और यही वह गलती है, जहां से सांप्रदायिक हिंसा का स्वरूप बिगड़ने लगता है और एक सीमा के बाद इस पर किसी का बस नहीं रह जाता। अंतत: चिनगारी भड़काने वाले हाथ खुद झुलसने लगते हैं। इस समय जब 2014 का आम चुनाव सामने है, सांप्रदायिक दंगा एक और भी ज्यादा खतरनाक खबर बन जाता है। और अभी तक जो ब्योरा आया है, उससे तो यही लगता है कि दो लोगों के बीच के निजी झगड़े को सांप्रदायिक रूप दिया गया। अब इससे मुजफ्फरनगर के अलावा कई अन्य जिले भी प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे मौकों पर जरूरी होता है कि सरकार त्वरित कदम उठाए और विपक्षी दल संयमित व्यवहार करें। तभी संकट को टाला जा सकता है।

अब तो ऐसे मामलों में सोशल मीडिया की भूमिका पर भी नजर रखनी जरूरी है। दंगों के शुरुआती चरण में अक्सर सरकारें यह दलील देती है कि अधिकतम पुलिस बल के इस्तेमाल से सांप्रदायिक माहौल और तेजी से बिगड़ सकती है। बेशक यह एक तत्व हो सकता है। लेकिन इसकी आड़ में सांप्रदायिक-संवेदनशील क्षेत्र को कानूनविहीन कर देना कतई जायज कदम नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार के लिखित दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन हो, तो राज्यों में सांप्रदायिक दंगों की नौबत ही नहीं आएगी। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रलय के ‘सांप्रदायिक सद्भाव पर दिशा-निर्देश’ को अपने आपमें विस्तृत और संपूर्ण माना जाता है। इसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में उपद्रवियों को रोकने के लिए राज्य सरकार तुरंत अधिकतम बल का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन राज्य सरकारें अक्सर ऐसा नहीं करती है। दिशा-निर्देश की प्रस्तावना में ही लिखा है कि ‘सांप्रदायिक सद्भाव कायम रखना और सांप्रदायिक हिंसा या दंगे को रोकना व इस तरह की किसी भी गड़बड़ी में पहले जैसी व्यवस्था को बहाल करने के लिए कदम उठाना तथा प्रभावित लोगों को सुरक्षा व राहत पहुंचाना राज्य सरकारों की पहली जिम्मेदारी है।’ इसके बाद ‘सुरक्षात्मक उपायों’ और ‘प्रशासनिक उपायों’ का विवरण है।

सांप्रदायिक दंगे को नियंत्रित करने से अधिक महत्वपूर्ण है, उसे होने ही न देना। और इस बारे में केंद्र सरकार का निर्देश है कि जिला प्रशासन नियमित अंतराल पर जिले में सांप्रदायिक स्थिति का आकलन करे और उसका पूरा ब्योरा तैयार रखे। साथ ही, वह सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाकों की पहचान करे, और उस क्षेत्र की आबादी, संदेह के कारणों, विवाद की वजहों और अतीत की घटनाओं का विस्तृत लेखा-जोखा बनाए। हर पुलिस थाने के पास ताजा ब्योरा जरूर हो। थाने के वरिष्ठ पुलिसकर्मियों की नजर इन संवेदनशील इलाकों पर लगातार बनी रहनी चाहिए। अगर थोड़ी भी जरूरत हो, तो अलग से चौकी बने और अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाए। ऐसे कई उपाय इसमें गिनाए गए हैं। इसके अलावा, प्रशासनिक उपायों में इस बात पर विशेष जोर है कि राज्य और जिला, दोनों स्तर पर विशेष संकट प्रबंधन योजना होनी चाहिए। ‘पर्सनल पॉलिसी’ में यह उल्लेख है कि संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस बलों की नियुक्ति वहां के सामाजिक ढांचे के अनुरूप हो, जिससे उनकी विश्वसनीयता बनी रहे और यह हर तबके को लोगों के बीच भरोसे को बनाने में मददगार हो।

आज हम जिस तरह की ‘जटिल व्यवस्था’ में रह रहे हैं, उसमें कभी-कभार कोई छोटी आपराधिक घटना भी भयंकर रूप ले सकती हैं। व्यवस्था की इस जटिलता का कारण हमारी मानसिक स्थिति भी हो सकती है और सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक स्थिति भी। इन घटनाओं के भयावह हो जाने के कई कारण होते हैं। कभी साधारण-सी घटनाएं सामाजिक सद्भाव का माहौल बिगड़ने से जटिल बन जाती हैं, तो कभी ऐसी पेचीदा घटनाओं के पीछे कोई साजिश होती है। ऐसी घटनाओं की पहचान और उनके बीच वर्गीकरण करना स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी का दायित्व होता है। राज्य-प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह उस बड़ी घटना पर तुरंत काबू पाए, ताकि जान-माल का नुकसान न के बराबर हो। अगर आपराधिक घटनाएं सांप्रदायिक दंगे का रूप लेती है, तो उसका सबसे बड़ा कारण है कि वह समाज जाति-धर्म-संप्रदाय के आधार पर बंटा हुआ है। भारतीय समाज में जाति-धर्म-संप्रदाय के स्तर पर विभाजन बहुत पुराना है और इस आधार पर अतीत में दंगे हुए हैं। लेकिन जिस तरह का सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक विकास आज के दौर में हुआ है, उसमें तमाम तरह के व्यापक सुधार हुए हैं और ऐसे में, किसी भी सांप्रदायिक दंगे के भड़कने का मतलब यह होता है कि घटना प्रशासनिक विफलता का परिणाम है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

~वेद मारवाह, पूर्व निदेशक, नेशनल सिक्युरिटी गार्ड

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