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Thursday, August 20, 2015

दाभोलकर जैसों को मरना ही चाहिए!



 16वीं सदी में जब गैलीलियो ने कॉपरनिकस की उस थिअरी का समर्थन किया था कि बाकी ग्रह और सूरज धरती का चक्कर नहीं लगाते बल्कि धरती सूरज के चक्कर लगाती है, तब धर्म के ठेकेदारों ने उनका जीना मुहाल कर दिया था। उस वक्त बेहद शक्तिशाली रहे चर्च ने उन्हें कई तरह से सताया था। आज 21वीं सदी में जब इंसान ने साइंस के बूते इतनी तरक्की कर ली है, तब भी लगता है कि शायद हालात में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। अभी भी धर्म की सनक में लोग इतने अंधे बने हुए हैं कि उससे जुड़ी बातों को तर्क की कसौटी पर कसने वाले लोगों को गाहे-बगाहे धर्म के बद्दिमाग ठेकेदारों के हमले झेलने ही पड़ते हैं।

जादू-टोना, चमत्कार जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ 25 साल से लगातार जागरूकता अभियान चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में हुई हत्या इसी बात की तरफ इशारा करती है। ऐसे हमलों से साबित होता है कि आज भी धर्म और आस्था से जुड़े सवालों को तर्क से परे रखने की बेतुकी धरणा ने समाज को मजबूती से जकड़ा हुआ है। और ऐसा सिर्फ भारत में नहीं है बल्कि दुनिया के हर कोने में सभ्यता के विकास को मुंह चिढ़ाते ऐसे उदाहरण मौजूद हैं।

आपको आयरलैंड में भारतीय मूल की डेंटिस्ट सविता हलप्पनवार की दर्दनाक मौत तो याद होगी ही? नहीं याद है तो चलिए आपकी मेमरी को ताजा कर देते हैं। सविता की कोख में जो गर्भ विकसित हो रहा था, उसे किसी गंभीर जटिलता के कारण गर्भपात कराने की स्थिति पैदा हो गई। 31 साल की सविता को गैलवे के अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन डॉक्टरों ने गर्भपात नहीं किया और इसके लिए हवाला दिया कि कैथलिक ईसाई देश होने के कारण वहां जीवित भ्रूण का गर्भपात नहीं किया जा सकता। इसके बाद दर्द से तड़पती सविता की मौत हो गई। यह मामला बताने का मेरा मकसद यही बताना है कि धर्म के नाम पर आज भी किस तरह से लोगों को जान गंवानी पड़ रही है।

आप सोच रहे होंगे कि मैं इसमें बार-बार धर्म को क्यों घसीट रहा हूं, तो आपको बता दूं कि आस्था और अंधविश्वास के बीच जो बेहद महीन लकीर है उसी की वजह से समाज में ऐसे लोगों के धंधे फल-फूल रहे हैं जो खुद को पंडित, पुरोहित, मौलवी, पादरी जैसे मुखौटों के जरिए लोगों को छल रहे हैं। और जैसा कि कई देशों के समाज में आस्था को हर तर्क और सवालों से परे रखा जाता है, तो इसी के सहारे ही ऐसे वाहियात किस्म के लोग बाबाओं के रूप में खुद को स्थापित कर पाते हैं। फिर ये तो जाहिर है कि ऐसे लोग उन लोगों को बिलकुल पसंद नहीं करेंगे जो तर्क और विज्ञान के आधार पर उन पर सवाल खड़े करें।

यही गलती डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने भी की। वह सवाल बहुत करते थे और जैसे-जैसे उनके सवालों का दायरा बढ़ रहा था, लोगों ने भी उनके साथ मिल कर ऐसे पाखंडियों से सवाल पूछने शुरू कर दिए थे। और तो और, उनकी कोशिशों के कारण देश में अपनी तरह का ऐसा पहला कानून बनने की भी बात उठने लगी, जिससे इन धर्म के ठेकेदारों का धंधा मंद पड़ सकता है। इसलिए उनकी आवाज को ही बंद कर दिया गया। लेकिन ये लोग भूल गए कि किसी की आवाज बंद कर देने भर से उन विचारों को नहीं मिटाया जा सकता जिसे करोड़ों की संख्या में तर्कशील लोगों का समर्थन मिल रहा हो।

वैसे भी इंसानों का इतिहास खुद इस बात का गवाह रहा है कि दुनिया के हर कोने में ऐसी आवाज बुलंद करने वालों को ऐसे मक्कारों का सामना करना पड़ा है और सदियों से चले आ रहे इस आंदोलन में कई लोगों को शहादत भी देनी पड़ी है। साइंस और धर्म के बीच सबसे बड़ा फर्क यही है कि जीवन में साइंस नहीं था तब इसमें धर्म ही था। आज भी हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि धर्म और इस जैसी मान्यताओं को जहां प्राइवेट लाइफ तक सीमित होना चाहिए, लेकिन इसके उलट ये मान्यताएं पब्लिक लाइफ पर हावी होती हैं। तभी तो आज सरकारें लोगों की बुनियादी जरूरतों से कहीं ज्यादा ध्यान धार्मिक यात्राओं और आयोजनों पर रखती हैं।

अब बात करें उस अंधविश्वास विरोधी कानून की जिसके लिए डॉ. दाभोलकर इतने साल से संघर्ष कर रहे थे। इसमें कोई शक नहीं कि यह देश में अपनी तरह का पहला कानून होगा और उन मक्कारों पर काफी हद तक नकेल कसी जा सकेगी जो धर्म की आड़ में ऐसे घिनौने काम करते हैं। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरा यह मानना है कि सिर्फ इस तरह के कानून से समाज में काफी गहराई तक घुसी हुई इस बुराई को खत्म करना बड़ा मुश्किल है। इसके लिए हमें अपने एजुकेशन सिस्टम से लेकर सरकारी नीतियों में कई बदलाव करने की जरूरत है, जिससे समाज में फैले अंधविश्वासों को जड़ से उखाड़ फेंका जा सके।

इसमें मीडिया और सिनेमा को भी बड़ा रोल निभाना होगा, क्योंकि न्यूज चैनलों में जिस तरह से बे सिर-पैर की बातें करने वाले बाबाओं को प्रमोट किया जा रहा है और सिनेमा जिस तरह से डायन और भूत जैसी वाहियात बातों का महिमामंडन कर रहा है, उससे लोग प्रभावित जरूर होते हैं।

हमारे संविधान के आर्टिकल 51 A(h) में भी यह कहा गया है कि देश के नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे मानवता के लिए साइंटिफिक माहौल बनाने में भूमिका निभाएं। अब समय आ गया है कि इसी साइंटिफिक माहौल को मजबूती देने के लिए ऐसे कानून और नीतियों में बड़े पैमाने पर सुधार किया जाए, वरना इसी तरह रोज अखबारों में डायन बता कर मारे जाने, धर्म के नाम पर मारकाट और बाबाओं द्वारा मासूमों के रेप की खबरों के आने का सिलसिला जारी रहेगा। और जारी रहेंगी इनके खिलाफ उठने वाली आवाजों के शांत करने की कोशिशें।

Thursday, January 08, 2015

pk से आखिर कौन डरा हुआ है?


हिंदू संगठनों के विरोध और अपनी रिकॉर्ड कमाई के चलते फिल्मकार राजकुमार हिरानी की फिल्म 'पीके' आज सुर्खियों में है। संगठनों का आरोप है कि यह फिल्म हिंदू धर्म का मजाक उड़ाती है और 'लव जिहाद' को बढ़ावा देती है। लेकिन विवादों, विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद समाज के बड़े तबके को यह फिल्म पंसद आ रही है और यह बड़ा तबका किसी और का नहीं बल्कि हिंदुओं का है। सवाल है कि समाज के इस बड़े तबके को जब यह फिल्म पसंद आ रही है तो इसका विरोध करने वाले लोग कौन हैं। ये वही लोग हैं जो धर्म और अंधविश्वास की आड़ में अपनी दुकानें सदियों से चलाते आए हैं। हिरानी ने अपनी फिल्म के जरिए इन्हीं लोगों को अपने निशाने पर लिया है। 'पीके' धर्म और आस्था पर चोट नहीं करती बल्कि आडंबरों एवं कर्मकांडों की उस अंध परिपाटी को निशाने पर लेती है जो मनुष्य को सदियों से धर्म से दूर करती आई है।


धर्म और आस्था के प्रति मनुष्य की जड़ें बहुत गहरी होती हैं और इनकी आलोचना करना जोखिम भरा काम होता है। अपनी फिल्म के माध्यम से हिरानी ने लोगों की सामाजिक चेतना को झकझोरने की कोशिश की है। 'पीके' की भूमिका में आमिर खान ने आस्था और मान्यता से जुड़ीं बातों को बड़ी सहजता से उठाया है। मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर और गुरुद्वारे के व्रत, नेम-नियम, अनुष्ठान एवं विधान से हम सभी परिचित हैं। विभिन्न मतों से संबंध रखने वाले ज्यादातर लोगों को भी आस्था और अंधविश्वास के बीच फर्क पता होता है। लेकिन समाज अपनी आस्था के चलते धर्म की आड़ में फैलाए जा रहे अंधविश्वास के प्रति सवाल करने से हिचकता है। लेकिन 'पीके' सवाल करता है। 'पीके' दूसरी दुनिया का है। उसे भगवान, धर्म, धार्मिक मान्यताओं और आस्थाओं के बारे में कुछ भी पता नहीं है। वह इस समाज का नहीं है। अपना 'रिमोट' पाने के लिए वह सभी धर्मों के पूजा-अनुष्ठान की विधियों से गुजरता है। कहीं से मदद नहीं मिलने पर वह बहुत 'फ्रस्टेट' होता है और इसके बाद वह सवाल करता है।

'पीके' फिल्म का प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब 'लव जिहाद', धर्मांतरण के मुद्दे चर्चा में हैं और स्वयंभू बाबाओं के कारनामों से लोगों की आस्थाओं पर चोट पहुंची है। आमिर खान जैसा 'पर्फेक्शनिस्ट' अभिनेता जब अपनी फिल्म के जरिए जब मुद्दों से टकराता है तो उसका संदेश दूर तक जाता है। ऐसा नहीं है कि धर्म केंद्रित यह पहली फिल्म है। इससे पहले भी धर्म, आस्था पर सवाल करने वाली फिल्में बनी हैं लेकिन उन फिल्मों में उतनी सहजता से इस 'गोले' की आडंबरों को नहीं उठाया गया है जितनी सहजता से 'पीके' उन्हें बेनकाब करती है।

दूसरा, आमिर आज के समय के बड़े 'कम्यूनिकेटर्स' में से एक हैं। वह जो बात कहते हैं वह बात समाज में असर पैदा करती है। उनकी फिल्मों में एक संदेश होता है। 'पीके' का संदेश साफ है। यह संदेश लोगों को पसंद आया है और आ रहा है। कमाई के लिहाज से फिल्म का तीन सौ करोड़ रुपए को पार कर जाना फिल्म की स्वीकार्यता को दर्शाता है। केवल एक धर्म के लोगों द्वारा देखे जाने से कोई फिल्म इतनी कमाई नहीं कर सकती। जाहिर है कि यह फिल्म सभी मजहब के लोगों को पंसद आई है।

फिल्मों के सेंसर बोर्ड से पारित हो जाने के बाद उसे थिएटर से उतारे जाने की बात बेमानी है। धार्मिक भावनाएं आहत होना ही फिल्मों की प्रस्तुति का सर्टिफिकेट बन जाएगा तो शायद ही कोई फिल्म रिलीज हो पाएगी क्योंकि किसी न किसी चीज को लेकर हर कोई व्यक्ति संवेदनशील होता है। 'पीके' का विरोध करने वाले लोग कौन हैं उन्हें आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं। और शायद वे भी जानते होंगे जो इसका विरोध कर रहे हैं। 

~आलोक कुमार राव

Thursday, September 12, 2013

सपा की राजनीती धर्मनिरपेक्ष या धर्मसापेक्ष


मुजफ्फरनगर जल रहा है. शामली और सुल्तानपुर के दंगों की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि दिल्ली से 120 किलोमीटर दूर बसा उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर जल उठा. वजह थी एक लड़की से छेड़छाड़ पर दो समुदायों का आमने-सामने आ जाना.
uttar-pradesh-police
समाजवादी पार्टी की धर्मनिरपेक्ष सरकार के डेढ़ वर्ष के अल्प कार्यकाल का यह 13वां बड़ा दंगा था. वैसे समाजवाद की अवधारणा को परे छोड़ धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़कर अखिलेश सरकार की सत्ता में 40 से अधिक दंगे यह तो दर्शाते ही हैं कि उत्तर प्रदेश वाकई धर्मनिरपेक्षता का सापेक्ष उदाहरण पेश कर रहा है.

एक हफ्ते पहले मुजफ्फरनगर में फैली दंगे की आग एक पत्रकार समेत 28 लोगों को लील चुकी है. दंगे की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहरी इलाके को छोड़कर आसपास के गांवों में भी सेना तथा आरएसी को मोर्चा संभालना पड़ रहा है. यहां तक कि उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी पुलिस प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के आदेश हैं.

राजनीति में अपेक्षाकृत कम अनुभवी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब दंगे की विभीषिका को समझने और संभालने में नाकाम रहे, तो मुलायम सिंह को आगे आकर मोर्चा संभालना पड़ा. हालांकि स्थिति अभी भी जस की तस है और दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश देने पड़े हैं. 15 मार्च 2012 को जब अखिलेश ने सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी, तो कमोबेश सभी राजनीतिक विश्लेषकों का यह अनुमान था कि अखिलेश अपनी सोच और ताजगी से सपा पर लगा वह दाग तो धो ही देंगे जिसमें यह कहा जाता रहा है कि सपा सरकार के कार्यकाल में गुंडागर्दी और यादववाद को बढ़ावा मिलता है.

सूबे की जनता ने भले ही मायावती के कुशासन से त्रस्त होकर सपा को सत्ता सौंपी हो, किन्तु उसे ज़रा भी भान नहीं था कि इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं. लोकसभा चुनाव को अब अधिक समय नहीं बचा है. सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियों को अंजाम देने में लगे हैं; ऐसे में प्रदेश के छोटे-बड़े संवेदनशील शहरों में दंगे होना किसी दूरगामी रणनीति का पड़ाव तो नहीं हैं?

भाजपा की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का मुखिया बनाकर संघ ने यह संकेत देने की कोशिश की कि अब हिंदुत्व की राजनीति को एक बार फिर से जीवित किया जाएगा. इसी रणनीति के तहत मोदी ने भी अपने ख़ास सिपहसालार अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया, ताकि हिंदुत्व की बुझती लौ तथा बहुसंख्यक समुदाय की आस्था को शाह दोबारा भड़का सकें.

उनका अयोध्या जाना और राममंदिर के पक्ष में बोलना, चौरासी कोसी यात्रा का असमय ऐलान और उस पर हुई राजनीति काफी हद तक संघ और मोदी के मन मुताबिक़ ही थी. फिर जहां तक सपा की बात है तो सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में 18 फीसद से अधिक वोट बैंक मुस्लिमों के पास है, जो सपा और कांग्रेस दोनों में बंटा हुआ है. यदि आगामी लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को सूबे में सपना परचम फहराना है, तो उसे किसी एक समुदाय का थोक वोट बैंक चाहिए.

फिलहाल सूबे में जो स्थिति है, उसे देखकर तो ऐसा जान पड़ता है कि वोटों के ध्रुवीकरण की जद्दोजहद में सपा-भाजपा में परदे के पीछे कोई बड़ा खेल हुआ है. इस वर्ष मार्च में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की तारीफ में कसीदे गढ़े थे. यहां तक कि उन्होंने लीक से हटकर लगे हाथ समाजवाद और राष्ट्रवाद के लिए समान पहलुओं को भी बताया. उन्होंने समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की एक समान विचारधारा को भी साथ आने के संकेत के तहत सार्वजनिक किया.

सीमा सुरक्षा, देशभक्ति और भाषा के मसले पर निश्चित रूप से लोहिया का समाजवाद और गोलवरकर का राष्ट्रवाद बहुत अलग नहीं है, लेकिन आज के दौर में लोहिया के समाजवाद और गोलवरकर के राष्ट्रवाद की अहमियत है ही कितनी? फिर लोहिया के समाजवाद की जितनी धज्जियां मुलायम सिंह ने उड़ाई हैं, उतनी किसी ने नहीं. ठीक उसी तरह भाजपा को भी राष्ट्रवाद तभी याद आता है जब उसका वोट बैंक उससे छिटक रहा हो.

मुलायम और राजनाथ; कमोबेश दोनों का राजनीतिक उत्थान अयोध्या से हुआ है. एक हिन्दुओं का रहनुमा बना, तो दूसरा मुस्लिमों का चहेता. दोनों का अपना निश्चित वोट बैंक है और दोनों की राजनीतिक शैली भी भिन्न है. ऐसे में इस दोस्ती का कुछ तो अंजाम होगा और शायद वह इस रूप में प्रकट भी हो रहा है. राजनाथ की तारीफ से मुलायम उनके कितना नजदीक पहुंचे यह तो पता नहीं, किन्तु राजनाथ का दिल मुलायम के प्रति ज़रूर पिघला होगा.

राजनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे संघ को भी अपने दरवाजे पर नतमस्तक करवा सकते हैं और सूबे में भाजपा की दुर्गति भी उन्हीं की कारगुजारियों से हुई है. हो सकता है इस लिहाज से दोनों बड़े नेताओं की अघोषित गुटबाजी का नतीजा सूबे का आम आदमी दंगों की विभीषिका के रूप में भुगत रहा हो? चूंकि दंगों को राजनीतिक पृष्ठभूमि ही भड़काती है, लिहाजा इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाला समय उत्तर प्रदेश की जनता के लिए दुष्कर होने वाला है.

वोट बैंक की राजनीति के तहत ही सपा सरकार ने आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल को हटाया और अब इस वोट बैंक की राजनीति उसकी अक्षमताओं को उजागर कर रही है. वरना मुजफ्फरनगर का प्रशासन तिल का ताड़ बनता हुआ नहीं देखता रहता. यह निश्चित रूप से प्रशासन और सरकार की नाकामी और राजनीति का विद्रूप रूप है.

इन विपरीत परिस्थितियों में अखिलेश के युवा कांधों पर जिम्मेदारियों का जो बोझ पड़ा है, वह संकेत दे रहा है कि राजनीति में युवा होना ही मायने नहीं रखता बल्कि राज करने की नीति का भान भी होना चाहिए. ऐसा लगता था कि अखिलेश को अपने पिता मुलायम सिंह की राजनीतिक समझ का लाभ मिलेगा, मगर हुआ इसका उल्टा. मुलायम को दिल्ली रास आई और अखिलेश पर आजम खान व रामगोपाल यादव हावी हो गए.

चूंकि बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश का नाम ही हर सफलता-विफलता के लिए जिम्मेदार होता, अतः मंत्रियों से लेकर सपा के वर्तमान कर्णधारों तक की कथित सफलता व सही मायनों में विफलता का ठीकरा अखिलेश के ही सर फूटा. अखिलेश लाख सफाई देते फिरें कि स्थितियां सामान्य होने में अभी वक़्त लगेगा, किन्तु वे यह तो तय करें कि इन स्थितियों को ठीक कौन करेगा? क्या आजम खान, रामगोपाल यादव तथा मुलायम सिंह की तिगडी अखिलेश को अपनी छाया से मुक्ति देगी, ताकि वे अपनी ऊर्जा का सही मायनों में दोहन कर सूबे के विकास के प्रति गंभीर हों?

अखिलेश पर राजनीति से इतर पारिवारिक दबाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है. पूरवर्ती सपा शासन की तुलना उनकी सरकार से होना ही अखिलेश का सर-दर्द बढ़ा रहा है. फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा का विधानसभा वाला चमत्कारिक प्रदर्शन दोहराने की जिम्मेदारी भी अखिलेश पर है. मुलायम कितने भी अनुभवी हों, मगर राजनीति में एक सीमा होती है और मुलायम भी उस सीमा को नहीं लांघ सकते.

स्मरणशक्ति खोते जा रहे मुलायम को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने का अघोषित जिम्मा भी अखिलेश सरकार की सफलता से सुनिश्चित होगा. यानी अखिलेश के लिए अभी चुनौतियों का मैदान सामने है और यदि वे इनसे पार नहीं पा सके तो यह उनकी और मुलायम की राजनीतिक हार होगी. फिर यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि धरतीपुत्र का पुत्र कहीं हवा-हवाई नेता की राह पर तो अग्रसर नहीं है. ऐसा हुआ तो राजनीति में व्याप्त इस सोच को भी आघात लगेगा कि युवा ही राजनीति में बदलाव ला सकते हैं.

अखिलेश को जनता ने सुनहरा मौका दिया है कि वे पूरवर्ती शासन के पाप धोते हुए सूबे को विकास पथ पर अग्रसर करें और ऐसा न कर पाने के एवज में उनकी भद पिटना तय है जिसका परिणाम 2014 में तो दिखेगा ही, भावी विधानसभा चुनावों में भी उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.

यह वक़्त निश्चित रूप से अखिलेश के लिए अग्निपरीक्षा का है, जिसमें तपकर ही वे मिसाल कायम कर सकते हैं वरना उनकी गिनती भी उन्हीं नेता पुत्रों में होगी जो राजनीति में पैराशूट के ज़रिये उतारे जाते हैं. अखिलेश को अब खुद के निर्णय को परिपक्वता के पैमाने पर तौलकर सूबे में शांति कायम करने की पहल करना होगी, वरना आज मुजफ्फरनगर जल रहा है और यही हाल रहा तो देश के सबसे बड़े सूबे को जलने से कोई नहीं रोक पायेगा?

~सिद्धार्थ शंकर गौतम

Tuesday, September 10, 2013

त्वरित कार्रवाई से टल सकता था दंगा


जब भी कहीं दंगे की चिनगारी भड़कती है, या यों कहें कि वह पहली घटना घटती है जो बाद में बड़े दंगे का कारण बन सकती है, उसी समय प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए। दंगों और इन्हें भड़काने वाले तत्वों के मामले में सरकार के लिए सबसे सही नीति यही होती है कि वह इन्हें बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी, यानी शून्य सहिष्णुता की नीति। लेकिन ताजा मामले में शायद यह नहीं हुआ। घटना के बाद विरोध-प्रदर्शनों को जारी रखने की इजाजत एक बड़ी भूल साबित हुई। इसी कारण से अफवाहों का बाजार गरम हुआ और फर्जी वीडियो के प्रसार की बात भी सामने आई। यहां पर एक और बात जोड़ी जानी चाहिए कि जिस तरह दंगों का पहला कारण धर्म-जाति-संप्रदाय के आधार पर सामाजिक विभाजन है, तो दूसरा कारण प्रशासनिक ढांचे का राजनीतिकरण होना है। अक्सर स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था यह देखती है कि दंगे को रोकने से उनके राजनीतिक आका को नुकसान तो नहीं हो रहा है। इससे प्रशासनिक सुस्ती आती है और दंगा शुरुआती चरण से आगे बढ़ जाता है।
पुलिस व जिला प्रशासन, दोनों अपने कर्तव्य निभाने की जगह राजनीतिक आदेशों का पालन करने लगते हैं, जहां से उन्हें पदोन्नति और गैर-अनुचित लाभों की इच्छा रहती है। इसलिए भारतीय पुलिस व्यवस्था एक गैर-पेशेवर संस्था बनती जा रही है। इसकी आशंका कम ही रहती है कि स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी मौके की गंभीरता को भांप न पाएं। कई बार दंगों के बाद यह कहा जाता है कि खुफिया एजेंसी को सांप्रदायिक दंगों के भड़कने की जानकारी पहले से ही थी। खुफिया विभागों के पास इस काम के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है। वे स्थानीय पुलिस-प्रशासन की रिपोर्ट, तमाम ब्योरों को देख और माहौल भांपकर अंदेशा जताते हैं, जिनकी राज्य प्रशासन अनदेखी कर देता है। इसलिए भी सांप्रदायिक दंगे की खुफिया रिपोर्ट मिल जाने के बाद कोई फायदा नहीं होता।

सांप्रदायिक हिंसा की सूरत में स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन, स्थानीय एजेंसियां और राज्य प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन ऐसे मौकों पर अक्सर राजनीतिक तबका दंगों को सुलझाने की बजाय हवा देता है। और यही वह गलती है, जहां से सांप्रदायिक हिंसा का स्वरूप बिगड़ने लगता है और एक सीमा के बाद इस पर किसी का बस नहीं रह जाता। अंतत: चिनगारी भड़काने वाले हाथ खुद झुलसने लगते हैं। इस समय जब 2014 का आम चुनाव सामने है, सांप्रदायिक दंगा एक और भी ज्यादा खतरनाक खबर बन जाता है। और अभी तक जो ब्योरा आया है, उससे तो यही लगता है कि दो लोगों के बीच के निजी झगड़े को सांप्रदायिक रूप दिया गया। अब इससे मुजफ्फरनगर के अलावा कई अन्य जिले भी प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे मौकों पर जरूरी होता है कि सरकार त्वरित कदम उठाए और विपक्षी दल संयमित व्यवहार करें। तभी संकट को टाला जा सकता है।

अब तो ऐसे मामलों में सोशल मीडिया की भूमिका पर भी नजर रखनी जरूरी है। दंगों के शुरुआती चरण में अक्सर सरकारें यह दलील देती है कि अधिकतम पुलिस बल के इस्तेमाल से सांप्रदायिक माहौल और तेजी से बिगड़ सकती है। बेशक यह एक तत्व हो सकता है। लेकिन इसकी आड़ में सांप्रदायिक-संवेदनशील क्षेत्र को कानूनविहीन कर देना कतई जायज कदम नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार के लिखित दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन हो, तो राज्यों में सांप्रदायिक दंगों की नौबत ही नहीं आएगी। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रलय के ‘सांप्रदायिक सद्भाव पर दिशा-निर्देश’ को अपने आपमें विस्तृत और संपूर्ण माना जाता है। इसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में उपद्रवियों को रोकने के लिए राज्य सरकार तुरंत अधिकतम बल का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन राज्य सरकारें अक्सर ऐसा नहीं करती है। दिशा-निर्देश की प्रस्तावना में ही लिखा है कि ‘सांप्रदायिक सद्भाव कायम रखना और सांप्रदायिक हिंसा या दंगे को रोकना व इस तरह की किसी भी गड़बड़ी में पहले जैसी व्यवस्था को बहाल करने के लिए कदम उठाना तथा प्रभावित लोगों को सुरक्षा व राहत पहुंचाना राज्य सरकारों की पहली जिम्मेदारी है।’ इसके बाद ‘सुरक्षात्मक उपायों’ और ‘प्रशासनिक उपायों’ का विवरण है।

सांप्रदायिक दंगे को नियंत्रित करने से अधिक महत्वपूर्ण है, उसे होने ही न देना। और इस बारे में केंद्र सरकार का निर्देश है कि जिला प्रशासन नियमित अंतराल पर जिले में सांप्रदायिक स्थिति का आकलन करे और उसका पूरा ब्योरा तैयार रखे। साथ ही, वह सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इलाकों की पहचान करे, और उस क्षेत्र की आबादी, संदेह के कारणों, विवाद की वजहों और अतीत की घटनाओं का विस्तृत लेखा-जोखा बनाए। हर पुलिस थाने के पास ताजा ब्योरा जरूर हो। थाने के वरिष्ठ पुलिसकर्मियों की नजर इन संवेदनशील इलाकों पर लगातार बनी रहनी चाहिए। अगर थोड़ी भी जरूरत हो, तो अलग से चौकी बने और अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाए। ऐसे कई उपाय इसमें गिनाए गए हैं। इसके अलावा, प्रशासनिक उपायों में इस बात पर विशेष जोर है कि राज्य और जिला, दोनों स्तर पर विशेष संकट प्रबंधन योजना होनी चाहिए। ‘पर्सनल पॉलिसी’ में यह उल्लेख है कि संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस बलों की नियुक्ति वहां के सामाजिक ढांचे के अनुरूप हो, जिससे उनकी विश्वसनीयता बनी रहे और यह हर तबके को लोगों के बीच भरोसे को बनाने में मददगार हो।

आज हम जिस तरह की ‘जटिल व्यवस्था’ में रह रहे हैं, उसमें कभी-कभार कोई छोटी आपराधिक घटना भी भयंकर रूप ले सकती हैं। व्यवस्था की इस जटिलता का कारण हमारी मानसिक स्थिति भी हो सकती है और सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक स्थिति भी। इन घटनाओं के भयावह हो जाने के कई कारण होते हैं। कभी साधारण-सी घटनाएं सामाजिक सद्भाव का माहौल बिगड़ने से जटिल बन जाती हैं, तो कभी ऐसी पेचीदा घटनाओं के पीछे कोई साजिश होती है। ऐसी घटनाओं की पहचान और उनके बीच वर्गीकरण करना स्थानीय पुलिस, जिला प्रशासन और स्थानीय खुफिया एजेंसी का दायित्व होता है। राज्य-प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह उस बड़ी घटना पर तुरंत काबू पाए, ताकि जान-माल का नुकसान न के बराबर हो। अगर आपराधिक घटनाएं सांप्रदायिक दंगे का रूप लेती है, तो उसका सबसे बड़ा कारण है कि वह समाज जाति-धर्म-संप्रदाय के आधार पर बंटा हुआ है। भारतीय समाज में जाति-धर्म-संप्रदाय के स्तर पर विभाजन बहुत पुराना है और इस आधार पर अतीत में दंगे हुए हैं। लेकिन जिस तरह का सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक विकास आज के दौर में हुआ है, उसमें तमाम तरह के व्यापक सुधार हुए हैं और ऐसे में, किसी भी सांप्रदायिक दंगे के भड़कने का मतलब यह होता है कि घटना प्रशासनिक विफलता का परिणाम है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

~वेद मारवाह, पूर्व निदेशक, नेशनल सिक्युरिटी गार्ड