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Sunday, January 10, 2016

देश सोया है, चलो इतिहास लिखें

‘बाजीराव-मस्तानी’ में इतिहास के साथ बलात्कार और मंत्र-मुग्ध दर्शक! समझ नहीं आ रहा कि देश में डंके की चोट पर इतिहास को कैसे तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है? बिल्कुल समझ नहीं आ रहा। ग़लती संजय लीला भंसाली की नहीं है। अंधेर नगरी है, कोई पूछने वाला तो है नहीं। जिसका जो जी चाहे लिखे, जैसी श्रद्धा और जैसी स्वार्थी ज़रुरत हो, वैसे इतिहास लिख दो। देश सोया है, सेंसर बोर्ड जाहिल है, इतिहासविद और जो कोई भी सरकारी, ग़ैर-सरकारी संस्थान हैं वे अपने एहसास-ए-कमतरी में इस क़दर डूबे हैं कि चूं भी नहीं कर सकते।
बाजीराव को नाचता देख कर कहीं शायद कुछ लोगों ने सिर धुना हो पर वो भाड़ में जाएं। कॉलेज की लड़कियां तो पागल हो गयी होंगी और ये पहली बार थोड़े ही हो रहा है। बाजीराव की जो भी असल बहादुरी रही होगी उसे दो संवादों में में दिखा दो। बाक़ी तो देवदास ही बनाना है। पैसा कमाना है। बड़े फ़िल्मकार की तरह नाम पैदा करना है। जो जी में आये करो अभी बताया था न कि देश सोया है, सेंसर बोर्ड जेम्स बॉन्ड को हिंदुस्तानी तहज़ीब सिखाने का देशभक्तिपूर्ण कारनामा अंजाम देने में मग्न है। शिवसेना ग़ुलाम अली को मुंबई आने से रोकने का सामाजिक कर्तव्य निभा कर थकी हुई होगी। बाक़ी ठहरे भक्त और भक्त-सुधारक, तो  वो अपनी सवाली-जवाबी क़व्वाली गाने में इतने व्यस्त हैं कि कहां दीगर मुद्दों पर ध्यान दे पायेंगे। तो फ़िल्म निर्माताओं रास्ता बिल्कुल खाली है। किसी तरह की पुलिस नहीं है, अपनी व्यापारिक गाड़ी जैसी चलानी है, चलायें। दो-चार ऐतिहासिक व्यक्तित्व इस गाड़ी के नीचे कुचल गए तो किसकी मां का क्या जाता है साहब? जनता तो वैसे भी साड़ियां और सेट्स देखने आती है!

‘जोधा-अकबर’ के ज़ख्म अभी तक नहीं भरे हैं। गज़ब की कल्पनाशीलता थी फ़िल्म में भई। हिंदुस्तान के एक अज़ीम शहंशाह को एक उल्लू का पट्ठा दिखाया गया है। वह उद्दात व्यक्तित्व जिसके साम्राज्य की सीमायें अभूतपूर्व दूरियों तक फैली थीं। उसे कितना लीचड़, छोटा बताया गया था। पर ऐश्वर्या के कपड़े क्या खूब थे, ऋतिक की मसल्स क्या चमक रही थीं। जनता फिर कितनी खुश थी। पूरा पैसा वसूल फ़िल्म थी।

और वह शाहरुख़ की ‘अशोका, द ग्रेट’ याद है? पहली बात तो नाम, ‘अशोक’ का नाम अशोका जिस भी बेवकूफ़ी के नाते किया गया हो उसे तो नज़रअंदाज़ हम कर ही देते हैं। ‘संतोषा सिवना’ ने फ़िल्म बनाई। उन्हें सिनेमेटोग्रफी करनी थी सो की। ‘शाहरुखा खाना’ को नाचना था तो वे नाचे। पर फिर वही बात। लेखक को तिलमिलाने की आदत है शायद फिल्मकार होने के नाते बड़े दिग्दर्शकों से ईर्ष्यावश बुरा-भला कह रहे होंगे। इस फिल्म पर भी जनता ने खूब वाह-वाहियां बरसाई थीं। अगर आप यू-ट्यूब पर सम्राट अशोक पर बनी फ़िल्म के अंश देखें तो किसी स्पूफ़ की तरह लगेंगे। इसे कॉमिडी-क्लिप की तरह ही देखा जाना चाहिए। ये बिज़नस आईडिया मैं उन्हें मुफ़्त में दे रहा हूं कि किसी हास्य कलाकार को सूत्रधार बना कर फिर से फिल्म एडिट की जाए और अब इसे एक स्पूफ़ / कॉमिडी की तरह रिलीज़ किया जाए तो देखना कितनी कमाई होती है।

अब कल्पना की नदी जब बह ही निकली है तो मैं सोचता हूं कि क्यों न लगे हाथों रानी लक्ष्मी बाई के बाल-प्रेम पर एक फ़िल्म बनाई जाए और अगर पटकथा कमज़ोर पड़ती है तो लॉर्ड डलहौज़ी की एक गोरी बहन बना दी जाए जो शादीशुदा होते हुए भी अकेलेपन की शिकार है, जिसे रानी झांसी के एक सिपहसालार से प्यार हो जाता है। इस सिपहसालार को रानी अपने भाई की तरह मानती है और अंत में जब रण में रानी का घोड़ा फंसता है तो उसी गोरी का पति अपनी टुकड़ी के साथ रानी को घेरता है। रानी घायल होने के बाद भी उस अंग्रेज़ को मौत के घाट उतारती है और मरने के पहले अपने भाई के हाथ में उसकी गोरी प्रेमिका का हाथ रखती है। जय हिन्द कहती है और इस मृत्युलोक से कूच कर जाती है।

ओफ़्फ़ो क्या क़िस्मत है मेरी। क्या प्लॉट हाथ लगा है, बस भई ये बेमानी लेख लिखना बंद करता हूं और भंसाली के पास जाता हूं। पारखी हैं, समझेंगे। वही मार्गदर्शन देंगे कि दरबार में एक 250 नर्तकों के साथ गाना कैसे डालना है। कैसे रानी की जलकुकड़ी चचेरी बहन का किरदार उकेरना है। कैसे लॉर्ड डलहौज़ी की (गैर-मौजूद) सीक्रेट सेक्स-लाइफ का भांडा फोड़ना है। हां, आप लोग मेरी फ़िल्म देखने ज़रूर आइयेगा!

Sunday, September 27, 2015

क्या अंधविश्वास का विरोध नहीं होना चाहिए?


चूंकि मेरी कोई सुनता नहीं फिर भी मेरा सुझाव है इस देश में एक राष्ट्रीय आस्था आयोग बने और इसका चेयरमैन मुझे बनाया जाए। मैं तभी ज्वॉइन करूंगा जब ब्लैक कैट कमांडो और बुलेट प्रूफ जैकेट भी दिया जाएगा। तभी मैं बिना किसी राग, द्वेष और भय के कंप्यूटर द्वारा प्रमाणित कर पाऊंगा कि कौन सी बात कहने पर किसकी आस्था भंग हुई और किसकी नहीं।

अखबारों और चैनलों में बंगाली और रूहानी बाबा के विज्ञापनों से तो लगता है कि देश को प्रधानमंत्री नहीं, यही चला रहे हैं। इनके विज्ञापनों से समस्याओं की कुछ कैटगरी इस प्रकार है : पति पत्नी अनबन, लव मैरिज, लव मैरेज खोया प्यार, प्यार में धोखा खाए प्रेमी प्रेमिका एक बार ज़रूर संपर्क करें। माता-पिता मनाए भी एक आइटम है और बेटा आपकी बात नहीं मानता है, यह भी एक कैटगरी है। मनचाहा प्यार का समाधान है लेकिन सौतन से छुटकारा दिला देते हैं। किया-कराया भी एक कैटगरी है।

अखबारों के अलावा इनके विज्ञापन बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और बाज़ारों में दिख जाते हैं। ऑटो रिक्शा और माल ढोने वाले टेम्पो के पीछे भी इनका पोस्टर लगा होता है। सार्वजनिक शौचालयों और प्याऊ के ऊपर तो इनका ही पता होता है। ये किसी बंगाली बाबा की वेबसाइट है जो ब्लैक मैजिक का दावा करते हैं। खुद को वशीकरण स्पेशलिस्ट बताने वाले बंगाली बाबा ने अपनी इस साइट पर 17 प्रकार की सेवाओं का ज़िक्र किया है। जैसे जादू टोना, लव प्रॉब्लम और लव वशीकरण। लव वशीकरण इज़ अ पावरफुल टूल टू अचीव द डिज़ायर्ड पर्सन ऑफ च्वाइस। मतलब आप इसके ज़रिये जिसे पसंद करते हैं वो आपको प्यार करने लगेगा। भाग के जाएगा कहां। वशीकरण के बारे में लिखा है कि वशीकरण एक ऐसी टेकनिक है जिसके इस्तमाल से आप एक आदमी को कंट्रोल कर सकते हैं और जैसा चाहे उससे वैसा करवा सकते हैं। दो प्रकार के वशीकरण हैं। वशीकरण फॉर गर्ल और वशीकरण फॉर ब्वॉय। बदला और वीज़ा में भी वशीकरण यूज़ होता है।

महाराष्ट्र में दो साल से ब्लैक मैजिक के खिलाफ कानून है। हमारे तमाम न्यूज़ चैनलों पर सुबह सुबह बताया जाता है कि पीला रूमाल लेकर दफ्तर जायेंगे तो आपका बॉस सैलरी बढ़ा देगा और लाल तकिये पर सोयेंगे तो रुका हुआ काम बन जाएगा। एनडीटीवी इंडिया पर इस तरह का कार्यक्रम नहीं आता है। जो भी इस तरह के अंधविश्वास के खिलाफ बोलता है उसे निशाना क्यों बनाया जाता है।

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी की हत्या कर दी जाती है। नरेंद्र नायक, जोसेफ एडामराकू, जयंत पांडा इन सबको मारा पीटा जाता है। सभी धर्मों के नाम पर बने संगठन अंधविश्वास के खिलाफ किसी भी अभियान को धर्म के खिलाफ बना देते हैं। संविधान के अनुच्छेद 51A(h) में कहा गया है कि सभी नागरिकों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वो वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद, सुधार और जिज्ञासा की भावना का विकास करे। 2011 की जनगणना में 21 लाख लोगों ने खुद को नास्तिक बताया है।

गोवा में हिप्नोथैरपिस्ट कहे जाने वाले डॉक्टर जयंत बालाजी अठावले सनानत संस्था की स्थापना की है, इन्हें देवता या देवदूत भी कहा जाता है जो हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए साधना कर रहे हैं। इसी संस्था के एक सदस्य समीर गायकवाड को पुलिस ने गोविंद पानसरे की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है। सनातन संस्था समीर को निर्दोष मानती है और उसकी पैरवी भी कर रही है।

एनडीटीवी इंडिया के सुनील सिंह और सांतिया डूडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सनातन संस्था ने निखिल वाघले, वरिष्ठ पत्रकार युवराज मोहिते, मराठी दैनिक प्रहार के पत्रकार श्याम सुंदर सोनार को धर्मद्रोही करार दिया है। हमारे सहयोगी श्रीनिवासन जैन ने http://www.ndtv.com/ पर लिखा है कि पुलिस को संकेत मिले हैं कि पत्रकार निखिल वाघले को मारने की योजना थी। संस्था कहती है कि ऐसी कोई हिटलिस्ट नहीं है। हम लोकतांत्रिक संवाद में यकीन करते हैं। संस्था के दो सदस्य 2008 में मुंबई में हुए तीन धमाकों के आरोप में गिरफ्तार किये गए थे। दोनों 'जोधा अकबर' फिल्म और एक मराठी नाटक दिखाये जाने के खिलाफ थे। मुंबई की एक अदालत ने दोनों को दस साल की सज़ा सुनाई लेकिन बाद में वो ज़मानत पर रिहा हो गए। अभी ये मामला चल ही रहा है। अक्टूबर 2009 में गोवा में हुए एक स्कूटर धमाके में मारे गए दो लोग कथित रूप से संस्था के सदस्य बताये गए। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार कृष्ण की प्रतिमा के साथ हुए कथित अपमान का बदला लेने के लिए स्कूटर में विस्फोटक ले जाया जा रहा था। आठ लोगों के खिलाफ चार्जशीट भी हुई जिसमें से तीन फरार हैं। पांच पर्याप्त सबूतों के अभाव में छोड़ दिये गए।

सनातन संस्था की वेबसाइट पर गया तो वहां पर कैसे कपड़े पहनने हैं, बाल कैसे होने चाहिए, त्योहार कैसे मनाए जाएं, यह सब लिखा गया है। आध्यात्म के प्रसार का दावा किया गया है। संस्था ने वेबसाइट पर लंबे बालों वाली महिला का फोटो देते हुए लिखा है कि नारी के लंबे बालों से जो ऊर्जा पैदा होती है उससे पर्यावरण में शक्ति की तरंगें फैल जाती हैं। आजकल की औरतें जो छोटे बाल रखने लगी हैं उसकी वजह से पूरी मानवता नकारात्मकता की तरफ जा रही है। हिन्दू धर्म में कहा गया है कि नारी को लंबे बाल रखने चाहिए। मर्द को छोटे बाल रखने चाहिए। मर्दों के लंबे बालों से जो तरंगे निकलती हैं उससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। सनातन संस्था मानती है कि जो शादियां रजिस्ट्री से होती हैं वो अर्थहीन होती हैं। धार्मिक कर्मकांडों से होने वाली शादी ही सर्वोच्च है। छोटे कपड़े, टाइट जिंस और मल्टी कलर कपड़े नहीं पहनने हैं। काले रंग के कपड़े भी नहीं पहनने चाहिए। वेबसाइट पर बताया गया है कि क्या क्या पहनना है। औरतें ये पहनेंगी और मर्द ये पहनेंगे। इस तरह की बातें आए दिन स्कूल कॉलेज के प्रिंसिपल भी करते रहते हैं।

2011 में महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार को सनातन संस्था पर एक विस्तृत रिपोर्ट भेज कर केंद्र से प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। यूपीए की सरकार ने नहीं किया। मंगलवार को गोवा के बीजेपी के विधायक विष्णु वाग ने हमारे सहयोगी तेजस मेहता से कहा है कि सनातन संस्था एक आतंकवादी समूह है। गोवा सरकार और मोदी सरकार को इसे बैन कर देना चाहिए। विष्णु वाग ने यह भी कहा है कि गोवा सरकार के मंत्री और बीजेपी के सहयोगी दल सनातन संस्था को राजनीतिक संरक्षण दे रहे हैं। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के एक नेता इस संस्था को वित्तीय सहायता दे रहे हैं। सनातन संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी वीरेंद्र मराठे ने मुंबई मिरर अखबार से कहा है कि प्रतिबंध लगाने से क्या होगा। हम बिना नाम के भी काम करते रहेंगे। वीरेंद्र मराठे ने माना कि अपने साधक को सैनिक प्रशिक्षण देते हैं और संविधान में हिन्दू राष्ट्र लिखा जाना चाहिए। यही भी कहा कि महाराष्ट्र में हमारे एक लाख साधक हैं, हम सर्बिया, ऑस्ट्रेलिया और बाकी कई देशों से इंटरनेट से जुड़े हैं। हमारे पास घर-घर जाने वाले मज़बूत प्रचारक हैं। हम हिन्दू राष्ट्र की रक्षा का काम करते रहेंगे।

फिर भारतीय सेना क्या करेगी। आईएसआईस में भर्ती होने के आरोप में कुछ मुस्लिम नौजवान सीरिया जाते हुए पकड़े गए हैं तो कुछ हिन्दू नौजवानों पर हिन्दू राष्ट्र के नाम पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक राजनीति के कारण ऐसे मामलों की ठोस और पेशेवार जांच नहीं हो पाती है। इनके ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई करने में जितना ख़राब रिकॉर्ड बीजेपी का है उससे ज्यादा कांग्रेस का है। कांग्रेस यही सोचती रह जाती है कि ऐक्शन लेंगे तो हिन्दू वोट नाराज़ हो जाएगा और बीजेपी सरकार में ऐसे तमाम संगठन बेलगाम हो जाते हैं यह सोचकर कि हिन्दुओं की सरकार है, कोई कुछ नहीं बोलेगा।

रवीश कुमार

Tuesday, September 01, 2015

दाभोलकर, गोविंद पानसरे और अब एमएम कलबुर्गी


कन्नड़ भाषा के मशहूर साहित्यकार और कर्नाटक विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति एमएम कलबुर्गी की हत्या ने एक बार फिर वैज्ञानिक सोच-समझ रखने वाले लोगों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है। रविवार को सुबह करीब साढ़े आठ बजे हमलावरों में से एक युवक खुद को कलबुर्गी का छात्र बता कर उनके घर में दाखिल हुआ और गोली मार कर फरार हो गया। 

यह समझना मुश्किल नहीं है कि अंधविश्वासों और धार्मिक ठगी के खिलाफ कलबुर्गी की गतिविधियों से किन लोगों या समूहों के हितों को चोट पहुंच रही थी और उनकी हत्या किस मकसद से की या कराई गई होगी। अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने और मूर्ति-पूजा पर सवाल उठाने वाले साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक और शोधकर्ता कलबुर्गी को दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की ओर से लगातार धमकियां मिल रही थीं। पिछले साल ऐसे ही कुछ लोगों ने हिंदुओं की आस्था को आहत करने का आरोप लगा कर कलबुर्गी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी और उपद्रवी तत्त्वों ने उनके घर पर कई बार पत्थरबाजी भी की। इसके बावजूद कलबुर्गी ने इस तरह की हरकतों के बारे में किसी से जिक्र नहीं किया। हालांकि आशंकाओं को भांपते हुए छह महीने पहले उनके दोस्तों ने पुलिस सुरक्षा का इंतजाम करा दिया था। लेकिन एक पखवाड़े पहले ही कलबुर्गी ने पुलिस सुरक्षा हटवा दी। 

वे जिन विचारों के वाहक थे, उसमें शायद उन्हें किसी सुरक्षा या हथियार की जरूरत नहीं लगी होगी। ट्वीट के जरिए हत्या की धमकी देने वाले बजरंग दल के एक कार्यकर्ता को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिक चेतना और प्रगतिशील मूल्यों के वाहकों पर हमले या उनकी हत्या के मामले तेजी से बढ़े हैं। भारत में पिछले दो साल के भीतर यह तीसरी घटना है, जिसमें ऐसे व्यक्ति की हत्या कर दी गई जो अपने स्तर पर समाज में फैले अंधविश्वास पर आधारित धार्मिक मान्यताओं के प्रति लोगों की आंखें खोलने में लगा हुआ था। 

करीब दो साल पहले महाराष्ट्र में अंधविश्वासों और सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार सक्रिय रहे नरेंद्र दाभोलकर और फिर इसी साल फरवरी में गोविंद पानसरे की भी हत्या हो गई। इन हत्याओं के पीछे कौन है, सरकार और उसके संबंधित महकमे आज तक पता नहीं लगा सके। इसके अलावा, बांग्लादेश में अंध-आस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले कई ब्लॉगरों को सरेआम मार डाला गया। जाहिर है, हत्या करने या कराने वाले लोगों या संगठनों को हमेशा इस बात का डर सताता रहता है कि अगर समाज में तार्किकता और वैज्ञानिक सोच का माहौल बन गया तो न सिर्फ पाखंड और धोखाधड़ी के उनके धंधे बंद हो जाएंगे, बल्कि इससे समूचे समाज के सोचने-समझने का ढांचा भी बदल जा सकता है। 

एड्स व कैंसर से भी खतरनाक है ... अंधविश्वास
जनसत्ता

Thursday, August 20, 2015

दाभोलकर जैसों को मरना ही चाहिए!



 16वीं सदी में जब गैलीलियो ने कॉपरनिकस की उस थिअरी का समर्थन किया था कि बाकी ग्रह और सूरज धरती का चक्कर नहीं लगाते बल्कि धरती सूरज के चक्कर लगाती है, तब धर्म के ठेकेदारों ने उनका जीना मुहाल कर दिया था। उस वक्त बेहद शक्तिशाली रहे चर्च ने उन्हें कई तरह से सताया था। आज 21वीं सदी में जब इंसान ने साइंस के बूते इतनी तरक्की कर ली है, तब भी लगता है कि शायद हालात में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। अभी भी धर्म की सनक में लोग इतने अंधे बने हुए हैं कि उससे जुड़ी बातों को तर्क की कसौटी पर कसने वाले लोगों को गाहे-बगाहे धर्म के बद्दिमाग ठेकेदारों के हमले झेलने ही पड़ते हैं।

जादू-टोना, चमत्कार जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ 25 साल से लगातार जागरूकता अभियान चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में हुई हत्या इसी बात की तरफ इशारा करती है। ऐसे हमलों से साबित होता है कि आज भी धर्म और आस्था से जुड़े सवालों को तर्क से परे रखने की बेतुकी धरणा ने समाज को मजबूती से जकड़ा हुआ है। और ऐसा सिर्फ भारत में नहीं है बल्कि दुनिया के हर कोने में सभ्यता के विकास को मुंह चिढ़ाते ऐसे उदाहरण मौजूद हैं।

आपको आयरलैंड में भारतीय मूल की डेंटिस्ट सविता हलप्पनवार की दर्दनाक मौत तो याद होगी ही? नहीं याद है तो चलिए आपकी मेमरी को ताजा कर देते हैं। सविता की कोख में जो गर्भ विकसित हो रहा था, उसे किसी गंभीर जटिलता के कारण गर्भपात कराने की स्थिति पैदा हो गई। 31 साल की सविता को गैलवे के अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन डॉक्टरों ने गर्भपात नहीं किया और इसके लिए हवाला दिया कि कैथलिक ईसाई देश होने के कारण वहां जीवित भ्रूण का गर्भपात नहीं किया जा सकता। इसके बाद दर्द से तड़पती सविता की मौत हो गई। यह मामला बताने का मेरा मकसद यही बताना है कि धर्म के नाम पर आज भी किस तरह से लोगों को जान गंवानी पड़ रही है।

आप सोच रहे होंगे कि मैं इसमें बार-बार धर्म को क्यों घसीट रहा हूं, तो आपको बता दूं कि आस्था और अंधविश्वास के बीच जो बेहद महीन लकीर है उसी की वजह से समाज में ऐसे लोगों के धंधे फल-फूल रहे हैं जो खुद को पंडित, पुरोहित, मौलवी, पादरी जैसे मुखौटों के जरिए लोगों को छल रहे हैं। और जैसा कि कई देशों के समाज में आस्था को हर तर्क और सवालों से परे रखा जाता है, तो इसी के सहारे ही ऐसे वाहियात किस्म के लोग बाबाओं के रूप में खुद को स्थापित कर पाते हैं। फिर ये तो जाहिर है कि ऐसे लोग उन लोगों को बिलकुल पसंद नहीं करेंगे जो तर्क और विज्ञान के आधार पर उन पर सवाल खड़े करें।

यही गलती डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने भी की। वह सवाल बहुत करते थे और जैसे-जैसे उनके सवालों का दायरा बढ़ रहा था, लोगों ने भी उनके साथ मिल कर ऐसे पाखंडियों से सवाल पूछने शुरू कर दिए थे। और तो और, उनकी कोशिशों के कारण देश में अपनी तरह का ऐसा पहला कानून बनने की भी बात उठने लगी, जिससे इन धर्म के ठेकेदारों का धंधा मंद पड़ सकता है। इसलिए उनकी आवाज को ही बंद कर दिया गया। लेकिन ये लोग भूल गए कि किसी की आवाज बंद कर देने भर से उन विचारों को नहीं मिटाया जा सकता जिसे करोड़ों की संख्या में तर्कशील लोगों का समर्थन मिल रहा हो।

वैसे भी इंसानों का इतिहास खुद इस बात का गवाह रहा है कि दुनिया के हर कोने में ऐसी आवाज बुलंद करने वालों को ऐसे मक्कारों का सामना करना पड़ा है और सदियों से चले आ रहे इस आंदोलन में कई लोगों को शहादत भी देनी पड़ी है। साइंस और धर्म के बीच सबसे बड़ा फर्क यही है कि जीवन में साइंस नहीं था तब इसमें धर्म ही था। आज भी हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि धर्म और इस जैसी मान्यताओं को जहां प्राइवेट लाइफ तक सीमित होना चाहिए, लेकिन इसके उलट ये मान्यताएं पब्लिक लाइफ पर हावी होती हैं। तभी तो आज सरकारें लोगों की बुनियादी जरूरतों से कहीं ज्यादा ध्यान धार्मिक यात्राओं और आयोजनों पर रखती हैं।

अब बात करें उस अंधविश्वास विरोधी कानून की जिसके लिए डॉ. दाभोलकर इतने साल से संघर्ष कर रहे थे। इसमें कोई शक नहीं कि यह देश में अपनी तरह का पहला कानून होगा और उन मक्कारों पर काफी हद तक नकेल कसी जा सकेगी जो धर्म की आड़ में ऐसे घिनौने काम करते हैं। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरा यह मानना है कि सिर्फ इस तरह के कानून से समाज में काफी गहराई तक घुसी हुई इस बुराई को खत्म करना बड़ा मुश्किल है। इसके लिए हमें अपने एजुकेशन सिस्टम से लेकर सरकारी नीतियों में कई बदलाव करने की जरूरत है, जिससे समाज में फैले अंधविश्वासों को जड़ से उखाड़ फेंका जा सके।

इसमें मीडिया और सिनेमा को भी बड़ा रोल निभाना होगा, क्योंकि न्यूज चैनलों में जिस तरह से बे सिर-पैर की बातें करने वाले बाबाओं को प्रमोट किया जा रहा है और सिनेमा जिस तरह से डायन और भूत जैसी वाहियात बातों का महिमामंडन कर रहा है, उससे लोग प्रभावित जरूर होते हैं।

हमारे संविधान के आर्टिकल 51 A(h) में भी यह कहा गया है कि देश के नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे मानवता के लिए साइंटिफिक माहौल बनाने में भूमिका निभाएं। अब समय आ गया है कि इसी साइंटिफिक माहौल को मजबूती देने के लिए ऐसे कानून और नीतियों में बड़े पैमाने पर सुधार किया जाए, वरना इसी तरह रोज अखबारों में डायन बता कर मारे जाने, धर्म के नाम पर मारकाट और बाबाओं द्वारा मासूमों के रेप की खबरों के आने का सिलसिला जारी रहेगा। और जारी रहेंगी इनके खिलाफ उठने वाली आवाजों के शांत करने की कोशिशें।

Thursday, January 08, 2015

pk से आखिर कौन डरा हुआ है?


हिंदू संगठनों के विरोध और अपनी रिकॉर्ड कमाई के चलते फिल्मकार राजकुमार हिरानी की फिल्म 'पीके' आज सुर्खियों में है। संगठनों का आरोप है कि यह फिल्म हिंदू धर्म का मजाक उड़ाती है और 'लव जिहाद' को बढ़ावा देती है। लेकिन विवादों, विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद समाज के बड़े तबके को यह फिल्म पंसद आ रही है और यह बड़ा तबका किसी और का नहीं बल्कि हिंदुओं का है। सवाल है कि समाज के इस बड़े तबके को जब यह फिल्म पसंद आ रही है तो इसका विरोध करने वाले लोग कौन हैं। ये वही लोग हैं जो धर्म और अंधविश्वास की आड़ में अपनी दुकानें सदियों से चलाते आए हैं। हिरानी ने अपनी फिल्म के जरिए इन्हीं लोगों को अपने निशाने पर लिया है। 'पीके' धर्म और आस्था पर चोट नहीं करती बल्कि आडंबरों एवं कर्मकांडों की उस अंध परिपाटी को निशाने पर लेती है जो मनुष्य को सदियों से धर्म से दूर करती आई है।


धर्म और आस्था के प्रति मनुष्य की जड़ें बहुत गहरी होती हैं और इनकी आलोचना करना जोखिम भरा काम होता है। अपनी फिल्म के माध्यम से हिरानी ने लोगों की सामाजिक चेतना को झकझोरने की कोशिश की है। 'पीके' की भूमिका में आमिर खान ने आस्था और मान्यता से जुड़ीं बातों को बड़ी सहजता से उठाया है। मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर और गुरुद्वारे के व्रत, नेम-नियम, अनुष्ठान एवं विधान से हम सभी परिचित हैं। विभिन्न मतों से संबंध रखने वाले ज्यादातर लोगों को भी आस्था और अंधविश्वास के बीच फर्क पता होता है। लेकिन समाज अपनी आस्था के चलते धर्म की आड़ में फैलाए जा रहे अंधविश्वास के प्रति सवाल करने से हिचकता है। लेकिन 'पीके' सवाल करता है। 'पीके' दूसरी दुनिया का है। उसे भगवान, धर्म, धार्मिक मान्यताओं और आस्थाओं के बारे में कुछ भी पता नहीं है। वह इस समाज का नहीं है। अपना 'रिमोट' पाने के लिए वह सभी धर्मों के पूजा-अनुष्ठान की विधियों से गुजरता है। कहीं से मदद नहीं मिलने पर वह बहुत 'फ्रस्टेट' होता है और इसके बाद वह सवाल करता है।

'पीके' फिल्म का प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब 'लव जिहाद', धर्मांतरण के मुद्दे चर्चा में हैं और स्वयंभू बाबाओं के कारनामों से लोगों की आस्थाओं पर चोट पहुंची है। आमिर खान जैसा 'पर्फेक्शनिस्ट' अभिनेता जब अपनी फिल्म के जरिए जब मुद्दों से टकराता है तो उसका संदेश दूर तक जाता है। ऐसा नहीं है कि धर्म केंद्रित यह पहली फिल्म है। इससे पहले भी धर्म, आस्था पर सवाल करने वाली फिल्में बनी हैं लेकिन उन फिल्मों में उतनी सहजता से इस 'गोले' की आडंबरों को नहीं उठाया गया है जितनी सहजता से 'पीके' उन्हें बेनकाब करती है।

दूसरा, आमिर आज के समय के बड़े 'कम्यूनिकेटर्स' में से एक हैं। वह जो बात कहते हैं वह बात समाज में असर पैदा करती है। उनकी फिल्मों में एक संदेश होता है। 'पीके' का संदेश साफ है। यह संदेश लोगों को पसंद आया है और आ रहा है। कमाई के लिहाज से फिल्म का तीन सौ करोड़ रुपए को पार कर जाना फिल्म की स्वीकार्यता को दर्शाता है। केवल एक धर्म के लोगों द्वारा देखे जाने से कोई फिल्म इतनी कमाई नहीं कर सकती। जाहिर है कि यह फिल्म सभी मजहब के लोगों को पंसद आई है।

फिल्मों के सेंसर बोर्ड से पारित हो जाने के बाद उसे थिएटर से उतारे जाने की बात बेमानी है। धार्मिक भावनाएं आहत होना ही फिल्मों की प्रस्तुति का सर्टिफिकेट बन जाएगा तो शायद ही कोई फिल्म रिलीज हो पाएगी क्योंकि किसी न किसी चीज को लेकर हर कोई व्यक्ति संवेदनशील होता है। 'पीके' का विरोध करने वाले लोग कौन हैं उन्हें आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं। और शायद वे भी जानते होंगे जो इसका विरोध कर रहे हैं। 

~आलोक कुमार राव

Tuesday, December 09, 2014

कर्नाटक के राजस्व मंत्री सतीश जर्कीहोली ने अंधविश्वास के विरुद्ध साथियों सहित श्मशान में गुजारी एक रात


आजादी के 67 वर्ष बाद आज भी देश में बड़ी संख्या में लोग अंधविश्वासों के शिकार होकर भूत-प्रेत तथा जादू-टोने के चक्कर में उलझे हुए हैं। इसी कारण बहुत से लोग रात को कब्रिस्तानों अथवा श्मशानघाट में जाना या उनके निकट से गुजरना अच्छा नहीं समझते।

एक अंधविश्वास यह भी है कि नदियों में बहाए जाने वाले दीपक आत्माओं को श्मशान तक आने का रास्ता दिखाते हैं। जादू-टोना करने वाले वहां तरह-तरह के अनुष्ठान करते रहते हैं। अंधविश्वासी लोग बुरी शक्तियों से बचाव के नाम पर या गड़ा धन आदि प्राप्त करने के लिए भी तरह-तरह के अनुष्ठान ऐसे लोगों से श्मशानघाटों आदि में करवाते रहते हैं।

आम लोग तो अंधविश्वासों के कारण दिन के समय भी श्मशानघाट पर जाने से संकोच करते हैं लेकिन ये लोग रात के समय भी वहां चैन की बांसुरी बजाते हैं। इन तथाकथित जादू-टोना करने वालों की ‘साधनाओं’ में काले मुर्गे की बलि चढ़ाकर मांस-मदिरा का प्रसाद चढ़ाना और निर्वस्त्र होकर ‘शव साधना’ करना आदि शामिल होता है।

लोगों के मन से इसी अंधविश्वास के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने के लिए कर्नाटक के राजस्व मंत्री सतीश जर्कीहोली ने 6 दिसम्बर की रात अपने सैंकड़ों साथियों के साथ बेलगावी के श्मशान ‘वैकुंठ धाम’ में बिताई। यहां 24 शवदाह स्थल हैं। यहां उन सब लोगों ने रात का खाना भी खाया।

कर्नाटक विधानसभा में अंधविश्वास निरोधक विधेयक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सतीश जर्कीहोली ने कहा ‘‘यहां रात बिता कर पहले तो मैं इस गलतफहमी को तोडऩा चाहता था कि श्मशान जैसी जगहों पर भूत रहते हैं और दूसरी बात यह कि मैं इससे जुड़ा भय समाप्त करना चाहता हूं क्योंकि वास्तव में श्मशानघाट पवित्र स्थान होता है। सत्ता में न रहने के बाद भी मैं अंधविश्वासों के विरुद्ध अपना मिशन जारी रखूंगा।’’

सतीश जर्कीहोली ने यह भी कहा ‘‘यदि लोग अंधविश्वासों का मुकाबला नहीं करेंगे तो तथाकथित पिछड़े वर्गों तथा अनपढ़ लोगों को कभी भी न्याय नहीं मिल पाएगा। बिल गेट्स विश्व के सर्वाधिक  अमीर व्यक्तियों में से एक हैं परंतु वह पूजा नहीं करते और मैं भी नहीं करता, हालांकि मेरा 600 करोड़ रुपए वार्षिक का व्यवसाय है।’’

जादू-टोने के संबंध में विडम्बना यह है कि सिर्फ अनपढ़ और आम लोग ही नहीं बल्कि स्वयं को पढ़े-लिखे और बुुद्धिजीवी कहने वाले तथा राजनीतिज्ञ और फिल्म जगत से जुड़े लोग भी अंधविश्वासों को मानने वालों में शामिल हैं।

अंधविश्वासी राजनीतिज्ञों में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येद्दियुरप्पा का नाम उल्लेखनीय है जो अपनी ‘शत्रु दुष्टआत्माओं के नाश’ के लिए फर्श पर कई-कई रात निर्वस्त्र सोने के अलावा गधे आदि की बलि भी देते रहे हैं।

बड़ी संख्या में लोगों की भावनाएं इतनी मजबूत है कि अंधविश्वासों के विरुद्ध अभियान चलाने वाले महाराष्ट्र के समाजसेवी नरेंद्र दाभोलकर की अगस्त 2013 में उनके विरोधियों ने पुणे में गोली मारकर हत्या कर दी थी जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली परम्पराओं पर रोक लगाने संबंधी विधेयक पारित करने के लिए मजबूर हुई है जो नरेंद्र दाभोलकर के 25 वर्षों के अनथक प्रयासों का ही परिणाम है।

सतीश जर्कीहोली का यह प्रयास भूत-प्रेतों के अस्तित्व के संबंध में व्याप्त जनभ्रांतियां दूर करने की दिशा में एक अच्छा पग है। जिस तरह महाराष्ट्र सरकार ने ‘अंधविश्वास निरोधक विधेयक’ पारित किया है उसी प्रकार कर्नाटक व अन्य राज्यों की सरकारों को भी ऐसे विधेयक पारित करने चाहिएं ताकि भोले-भाले लोगों को ऐसे ढोंगी लोगों के छल-प्रपंच में फंसने और अपना शोषण कराने से बचाया जा सके।