Showing posts with label रवीश कुमार. Show all posts
Showing posts with label रवीश कुमार. Show all posts

Thursday, October 01, 2015

आप दादरी की भीड़ से अलग हैं या उसका हिस्सा: रवीश कुमार


दादरी: इतना सब कुछ सामान्य कैसे हो सकता है? बिसाहड़ा गांव की सड़क ऐसी लग रही थी जैसे कुछ नहीं हुआ हो और जो हुआ है वो ग़लत नहीं है। दो दिन पहले सैंकड़ों की संख्या में भीड़ किसी को घर से खींच कर मार दे। मारने से पहले उसे घर के आख़िरी कोने तक दौड़ा ले जाए। दरवाज़ा इस तरह तोड़ दे कि उसका एक पल्ला एकदम से अलग होने के बजाए बीच से दरक कर फट जाए। सिलाई मशीन तोड़ दे। सिलाई मशीन का इस्तेमाल मारने में करे। ऊपर के कमरे की खिड़की पर लगी ग्रि‍ल तोड़ दे। उस भीड़ में सिर्फ वहशी और हिंसक लोग नहीं थे बल्कि ताक़तवर और ग़ुस्से वाले भी रहे होंगे। खिड़की की मुड़ चुकी ग्रि‍ल बता रही थी कि किसी की आंख में ग़ुस्से का खून इतना उतर आया होगा कि उसने दांतों से लोहे की जाली चबा ली होगी। भारी भरकम पलंग के नीचे दबी ईंटें निकाल ली गई थी।


कमरे का ख़ूनी मंज़र बता रहा था कि मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या में शामिल भीड़ के भीतर किस हद तक नफरत भर गई होगी। इतना ग़ुस्सा और वहशीपना क्या सिर्फ इस अफवाह पर सवार हो गया होगा कि अख़लाक़ ने कथित रूप से गाय का मांस खाया है। यूपी में गौ मांस प्रतिबंधित है लेकिन उस कानून में यह कहां लिखा है कि मामला पकड़ा जाएगा तो लोग मौके पर ही आरोपी को मार देंगे। आए दिन स्थानीय अखबारों में हम पढ़ते रहते हैं कि भीड़ ने गाय की आशंका में ट्रक घेर लिया। यह काम तो पुलिस का है। पुलिस कभी भी कानून हाथ में लेने वाली ऐसी भीड़ पर कार्रवाई नहीं करती।

बिसाहड़ा गांव के इतिहास में सांप्रदायिक तनाव की कोई घटना नहीं है। गांव में कोई हिस्ट्री शीटर बदमाश भी नहीं है। मोहम्मद अख़लाक़ और उनके भाई का घर हिन्दू राजपूतों के घरों से घिरा हुआ है। यह बताता है कि सबका रिश्ता बेहतर रहा होगा। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि एक अफवाह पर उसे और उसके बेटे को घर से खींच कर मारा गया। ईंट से सिर कुचल दिया गया। बेटा अस्पताल में जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा है। उसकी हालत बेहद गंभीर है।

हर जगह वही कहानी है जिससे हमारा हिन्दुस्तान कभी भी जल उठता है। लाउडस्पीकर से ऐलान हुआ। व्हाट्सऐप से किसी गाय के कटने का वीडियो आ गया। एक बछिया ग़ायब हो गई। लोग ग़ुस्से में आ गए। फिर कहीं मांस का टुकड़ा मिलता है। कभी मंदिर के सामने तो कभी मस्जिद के सामने कोई फेंक जाता है। इन बातों पर कितने दंगे हो गए। कितने लोग मार दिए गए। हिन्दू भी मारे गए और मुस्लिम भी। हम सब इन बातों को जानते हैं फिर भी इन्हीं बातों को लेकर हिंसक कैसे हो जाते हैं। हमारे भीतर इतनी हिंसा कौन पैदा कर देता है।

दादरी दिल्ली से बिल्कुल सटा हुआ है। बिसाहड़ा गांव साफ सुथरा लगता है। ऐसे गांव में हत्या के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा ये बात मुझे बेचैन कर रही है। आस पास के लोग कैसे किसी की सामूहिक हत्या की बात पचा सकते हैं। शर्म और बेचैनी से वे परेशान क्यों नहीं दिखे? भीड़ बनने और हत्यारी भीड़ बनने के ख़िलाफ़ चीख़ते चिल्लाते कोई नहीं दिखा। जब मैं पहुंचा तो गांव नौजवानों से ख़ाली हो चुका था।

लोग बता रहे थे कि लाउडस्पीकर से ऐलान होने के कुछ ही देर बाद हज़ारों लोग आ गए। मगर वो कौन थे यह कोई नहीं बता रहा। सब एक दूसरे को बचाने में लगे हैं। यह सवाल पूछने पर कि वो चार लोग कौन थे सब चुप हो जाते हैं। यह सवाल पूछने पर उन चार पांच लड़कों को कोई जानता नहीं था तो उनके कहने पर इतनी भीड़ कैसे आ गई, सब चुप हो जाते हैं। अब सब अपने लड़कों को बीमार बता रहे हैं। दूसरे गांव से लोग आ गए। हज़ारों लोग एक गली में तो समा नहीं सकते। गांव भर में फैल गए होंगे। तब भी किसी ने उन्हें नहीं देखा। जो पकड़े गए हैं उन्हें निर्दोष बताया जा रहा है।


जांच और अदालत के फ़ैसले के बाद ही किसी को दोषी माना जाना चाहिए लेकिन हिंसा के बाद जिस तरह से पूरा गांव सामान्य हो गया है उससे लगता नहीं कि पुलिस कभी उस भीड़ को बेनक़ाब कर पाएगी। वैसे पुलिस कब कर पाई है। मांस गाय का था या बकरी का फ़ोरेंसिक जांच से पता चल भी गया तो क्या होगा। जनता की भीड़ तो फ़ैसला सुना चुकी है। अख़लाक़ को कुचल कुचल कर मार चुकी है। अख़लाक़ की दुलारी बेटी अपनी आंखों के सामने बाप के मारे जाने का मंज़र कैसे भूल सकती है। उसकी बूढ़ी मां की आंखों पर भी लोगों ने मारा है। चोट के गहरे निशान हैं।

दादरी की घटना किसी विदेश यात्रा की शोहरत या चुनावी रैलियों की तुकबंदी में गुम हो जाएगी। लेकिन जो सोच सकते हैं उन्हें सोचना चाहिए। ऐसा क्या हो गया है कि हम आज के नौजवानों को समझा नहीं पा रहे हैं। बुज़ुर्ग कहते हैं कि गौ मांस था तब भी सजा देने का काम पुलिस का था। नौजवान सीधे भावना के सवाल पर आ जाते हैं। वे जिस तरह से भावना की बात पर रिएक्ट करते हैं उससे साफ पता चलता है कि यह किसी तैयारी का नतीजा है। किसी ने उनके दिमाग़ में ज़हर भर दिया है। वे प्रधानमंत्री की बात को भी अनसुना कर रहे हैं कि सांप्रदायिकता ज़हर है।

मेरे साथ सेल्फी खिंचाने आया प्रशांत जल्दी ही तैश में आ गया। ख़ूबसूरत नौजवान और पेशे से इंजीनियर। प्रशांत ने छूटते ही कहा कि किसी को किसी की भावना से खेलने का हक नहीं है। हमारे सहयोगी रवीश रंजन ने टोकते हुए कहा कि मां बाप से तो लोग ठीक से बात नहीं करते और भावना के सवाल पर किसी को मार देते हैं। अच्छा लड़का लगा प्रशांत पर लगा कि उसे इस मौत पर कोई अफ़सोस नहीं है। उल्टा कहने लगा कि जब बंटवारा हो गया था कि हिन्दू यहां रहेंगे और मुस्लिम पाकिस्तान में तो गांधी और नेहरू ने मुसलमानों को भारत में क्यों रोका। इस बात से मैं सहम गया। ये वो बात है जिससे सांप्रदायिकता की कड़ाही में छौंक पड़ती है।

प्रशांत के साथ खूब गरमा गरम बहस हुई लेकिन मैं हार गया। हम जैसे लोग लगातार हार रहे हैं। प्रशांत को मैं नहीं समझा पाया। यही गुज़ारिश कर लौट आया कि एक बार अपने विचारों पर दोबारा सोचना। थोड़ी और किताबें पढ़ लो लेकिन वो निश्चित सा लगा कि जो जानता है वही सही है। वही अंतिम है। आख़िर प्रशांत को किसने ये सब बातें बताईं होंगी? क्या सोमवार रात की भीड़ से बहुत पहले इन नौजवानों के बीच कोई और आया होगा? इतिहास की आधू अधूरी किताबें और बातें लेकर? वो कौन लोग हैं जो प्रशांत जैसे नौजवानों को ऐसे लोगों के बहकावे में आने के लिए अकेला छोड़ गए? खुद किसी विदेशी विश्वविद्यालय में भारत के इतिहास पर अपनी फटीचर पीएचडी जमा करने और वाहवाही लूटने चले गए।

हम समझ नहीं रहे हैं। हम समझा नहीं पा रहे हैं। देश के गांवों में चिंगारी फैल चुकी है। इतिहास की अधकचरी समझ लिये नौजवान मेरे साथ सेल्फी तो खींचा ले रहे हैं लेकिन मेरी इतनी सी बात मानने के लिए तैयार नहीं है कि वो हिंसक विचारों को छोड़ दें। हमारी राजनीति मौकापरस्तों और बुज़दिलों की जमात है। दादरी मोहम्मद अख़लाक़ की मौत कवर करने गया था। लौटते वक्त पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि एक और लाश के साथ लौट रहा हूं।

Sunday, September 27, 2015

क्या अंधविश्वास का विरोध नहीं होना चाहिए?


चूंकि मेरी कोई सुनता नहीं फिर भी मेरा सुझाव है इस देश में एक राष्ट्रीय आस्था आयोग बने और इसका चेयरमैन मुझे बनाया जाए। मैं तभी ज्वॉइन करूंगा जब ब्लैक कैट कमांडो और बुलेट प्रूफ जैकेट भी दिया जाएगा। तभी मैं बिना किसी राग, द्वेष और भय के कंप्यूटर द्वारा प्रमाणित कर पाऊंगा कि कौन सी बात कहने पर किसकी आस्था भंग हुई और किसकी नहीं।

अखबारों और चैनलों में बंगाली और रूहानी बाबा के विज्ञापनों से तो लगता है कि देश को प्रधानमंत्री नहीं, यही चला रहे हैं। इनके विज्ञापनों से समस्याओं की कुछ कैटगरी इस प्रकार है : पति पत्नी अनबन, लव मैरिज, लव मैरेज खोया प्यार, प्यार में धोखा खाए प्रेमी प्रेमिका एक बार ज़रूर संपर्क करें। माता-पिता मनाए भी एक आइटम है और बेटा आपकी बात नहीं मानता है, यह भी एक कैटगरी है। मनचाहा प्यार का समाधान है लेकिन सौतन से छुटकारा दिला देते हैं। किया-कराया भी एक कैटगरी है।

अखबारों के अलावा इनके विज्ञापन बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और बाज़ारों में दिख जाते हैं। ऑटो रिक्शा और माल ढोने वाले टेम्पो के पीछे भी इनका पोस्टर लगा होता है। सार्वजनिक शौचालयों और प्याऊ के ऊपर तो इनका ही पता होता है। ये किसी बंगाली बाबा की वेबसाइट है जो ब्लैक मैजिक का दावा करते हैं। खुद को वशीकरण स्पेशलिस्ट बताने वाले बंगाली बाबा ने अपनी इस साइट पर 17 प्रकार की सेवाओं का ज़िक्र किया है। जैसे जादू टोना, लव प्रॉब्लम और लव वशीकरण। लव वशीकरण इज़ अ पावरफुल टूल टू अचीव द डिज़ायर्ड पर्सन ऑफ च्वाइस। मतलब आप इसके ज़रिये जिसे पसंद करते हैं वो आपको प्यार करने लगेगा। भाग के जाएगा कहां। वशीकरण के बारे में लिखा है कि वशीकरण एक ऐसी टेकनिक है जिसके इस्तमाल से आप एक आदमी को कंट्रोल कर सकते हैं और जैसा चाहे उससे वैसा करवा सकते हैं। दो प्रकार के वशीकरण हैं। वशीकरण फॉर गर्ल और वशीकरण फॉर ब्वॉय। बदला और वीज़ा में भी वशीकरण यूज़ होता है।

महाराष्ट्र में दो साल से ब्लैक मैजिक के खिलाफ कानून है। हमारे तमाम न्यूज़ चैनलों पर सुबह सुबह बताया जाता है कि पीला रूमाल लेकर दफ्तर जायेंगे तो आपका बॉस सैलरी बढ़ा देगा और लाल तकिये पर सोयेंगे तो रुका हुआ काम बन जाएगा। एनडीटीवी इंडिया पर इस तरह का कार्यक्रम नहीं आता है। जो भी इस तरह के अंधविश्वास के खिलाफ बोलता है उसे निशाना क्यों बनाया जाता है।

नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी की हत्या कर दी जाती है। नरेंद्र नायक, जोसेफ एडामराकू, जयंत पांडा इन सबको मारा पीटा जाता है। सभी धर्मों के नाम पर बने संगठन अंधविश्वास के खिलाफ किसी भी अभियान को धर्म के खिलाफ बना देते हैं। संविधान के अनुच्छेद 51A(h) में कहा गया है कि सभी नागरिकों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वो वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद, सुधार और जिज्ञासा की भावना का विकास करे। 2011 की जनगणना में 21 लाख लोगों ने खुद को नास्तिक बताया है।

गोवा में हिप्नोथैरपिस्ट कहे जाने वाले डॉक्टर जयंत बालाजी अठावले सनानत संस्था की स्थापना की है, इन्हें देवता या देवदूत भी कहा जाता है जो हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए साधना कर रहे हैं। इसी संस्था के एक सदस्य समीर गायकवाड को पुलिस ने गोविंद पानसरे की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है। सनातन संस्था समीर को निर्दोष मानती है और उसकी पैरवी भी कर रही है।

एनडीटीवी इंडिया के सुनील सिंह और सांतिया डूडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सनातन संस्था ने निखिल वाघले, वरिष्ठ पत्रकार युवराज मोहिते, मराठी दैनिक प्रहार के पत्रकार श्याम सुंदर सोनार को धर्मद्रोही करार दिया है। हमारे सहयोगी श्रीनिवासन जैन ने http://www.ndtv.com/ पर लिखा है कि पुलिस को संकेत मिले हैं कि पत्रकार निखिल वाघले को मारने की योजना थी। संस्था कहती है कि ऐसी कोई हिटलिस्ट नहीं है। हम लोकतांत्रिक संवाद में यकीन करते हैं। संस्था के दो सदस्य 2008 में मुंबई में हुए तीन धमाकों के आरोप में गिरफ्तार किये गए थे। दोनों 'जोधा अकबर' फिल्म और एक मराठी नाटक दिखाये जाने के खिलाफ थे। मुंबई की एक अदालत ने दोनों को दस साल की सज़ा सुनाई लेकिन बाद में वो ज़मानत पर रिहा हो गए। अभी ये मामला चल ही रहा है। अक्टूबर 2009 में गोवा में हुए एक स्कूटर धमाके में मारे गए दो लोग कथित रूप से संस्था के सदस्य बताये गए। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार कृष्ण की प्रतिमा के साथ हुए कथित अपमान का बदला लेने के लिए स्कूटर में विस्फोटक ले जाया जा रहा था। आठ लोगों के खिलाफ चार्जशीट भी हुई जिसमें से तीन फरार हैं। पांच पर्याप्त सबूतों के अभाव में छोड़ दिये गए।

सनातन संस्था की वेबसाइट पर गया तो वहां पर कैसे कपड़े पहनने हैं, बाल कैसे होने चाहिए, त्योहार कैसे मनाए जाएं, यह सब लिखा गया है। आध्यात्म के प्रसार का दावा किया गया है। संस्था ने वेबसाइट पर लंबे बालों वाली महिला का फोटो देते हुए लिखा है कि नारी के लंबे बालों से जो ऊर्जा पैदा होती है उससे पर्यावरण में शक्ति की तरंगें फैल जाती हैं। आजकल की औरतें जो छोटे बाल रखने लगी हैं उसकी वजह से पूरी मानवता नकारात्मकता की तरफ जा रही है। हिन्दू धर्म में कहा गया है कि नारी को लंबे बाल रखने चाहिए। मर्द को छोटे बाल रखने चाहिए। मर्दों के लंबे बालों से जो तरंगे निकलती हैं उससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। सनातन संस्था मानती है कि जो शादियां रजिस्ट्री से होती हैं वो अर्थहीन होती हैं। धार्मिक कर्मकांडों से होने वाली शादी ही सर्वोच्च है। छोटे कपड़े, टाइट जिंस और मल्टी कलर कपड़े नहीं पहनने हैं। काले रंग के कपड़े भी नहीं पहनने चाहिए। वेबसाइट पर बताया गया है कि क्या क्या पहनना है। औरतें ये पहनेंगी और मर्द ये पहनेंगे। इस तरह की बातें आए दिन स्कूल कॉलेज के प्रिंसिपल भी करते रहते हैं।

2011 में महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार को सनातन संस्था पर एक विस्तृत रिपोर्ट भेज कर केंद्र से प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। यूपीए की सरकार ने नहीं किया। मंगलवार को गोवा के बीजेपी के विधायक विष्णु वाग ने हमारे सहयोगी तेजस मेहता से कहा है कि सनातन संस्था एक आतंकवादी समूह है। गोवा सरकार और मोदी सरकार को इसे बैन कर देना चाहिए। विष्णु वाग ने यह भी कहा है कि गोवा सरकार के मंत्री और बीजेपी के सहयोगी दल सनातन संस्था को राजनीतिक संरक्षण दे रहे हैं। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के एक नेता इस संस्था को वित्तीय सहायता दे रहे हैं। सनातन संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी वीरेंद्र मराठे ने मुंबई मिरर अखबार से कहा है कि प्रतिबंध लगाने से क्या होगा। हम बिना नाम के भी काम करते रहेंगे। वीरेंद्र मराठे ने माना कि अपने साधक को सैनिक प्रशिक्षण देते हैं और संविधान में हिन्दू राष्ट्र लिखा जाना चाहिए। यही भी कहा कि महाराष्ट्र में हमारे एक लाख साधक हैं, हम सर्बिया, ऑस्ट्रेलिया और बाकी कई देशों से इंटरनेट से जुड़े हैं। हमारे पास घर-घर जाने वाले मज़बूत प्रचारक हैं। हम हिन्दू राष्ट्र की रक्षा का काम करते रहेंगे।

फिर भारतीय सेना क्या करेगी। आईएसआईस में भर्ती होने के आरोप में कुछ मुस्लिम नौजवान सीरिया जाते हुए पकड़े गए हैं तो कुछ हिन्दू नौजवानों पर हिन्दू राष्ट्र के नाम पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लग रहे हैं। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक राजनीति के कारण ऐसे मामलों की ठोस और पेशेवार जांच नहीं हो पाती है। इनके ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई करने में जितना ख़राब रिकॉर्ड बीजेपी का है उससे ज्यादा कांग्रेस का है। कांग्रेस यही सोचती रह जाती है कि ऐक्शन लेंगे तो हिन्दू वोट नाराज़ हो जाएगा और बीजेपी सरकार में ऐसे तमाम संगठन बेलगाम हो जाते हैं यह सोचकर कि हिन्दुओं की सरकार है, कोई कुछ नहीं बोलेगा।

रवीश कुमार

Saturday, September 19, 2015

मेरा सवाल आपसे हैं, आपसे पूछ रहा हूँ.…


दोस्तों,
मैं 2013 से इस बारे में लिख रहा हूँ । अपने टीवी शो में बोल रहा हूँ । इस प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता रहता हूँ । मैंने सोचा था अब इस विषय पर नहीं लिखूँगा । आज आप सबके फोन आए तो लगा कि मैं अपनी बात फिर से रखूँ । मेरे ब्लाग क़स्बा की उतनी हैसियत नहीं है कि वो हर किसी के पास पहुँच जाए इसलिए हो सके तो आप मेरी बात आगे बढ़ा दीजियेगा । मैं अपनी बात का पर्चा छपवाऊँगा और आम लोगों में बाटूँगा । आप जानते हैं कि मैंने फेसबुक बंद कर दिया है । ट्वीटर पर लिखना बंद कर दिया है ।

मेरे कई दर्शकों ने सलाह दी कि आनलाइन गुंडागर्दी को दिल पर मत लीजिये । यह सब चलता रहता है । यह आपके सेलिब्रेटी होने की क़ीमत है । मैं सेलिब्रिटी नहीं हूँ और हूँ भी तो यह कब तय हो गया कि मुझे अनाप शनाप गाली खाली खानी पड़ेगी । मेरे परिवार और बच्चों तक को गाली दी जाएगी । मुझे क्यों गालियाँ और अनाप-शनाप आरोप बर्दाश्त करने चाहिए ? जब मैं कमज़ोर लोगों की तकलीफ़ बर्दाश्त नहीं कर सकता, तो अपने साथ हो रही इस नाइंसाफी को क्यों बर्दाश्त करूँ । मुझे लगता है कि इस आनलाइन गुंडाराज के ख़िलाफ़ मुझे भी बोलना चाहिए और आपको भी । पूरी दुनिया में ऑनलाइन बुली यानी गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ हो रहा है, भारत में क्यों चुप्पी है ?

मुझे पता है कि इसका निशाना राजनेताओं और प्रवक्ताओं को भी बनना पड़ता है । प्रवक्ताओं ने इसे क्यों मंज़ूरी दी है ? पत्रकारों को ख़ासकर कई महिला पत्रकारों को गालियाँ दी गईं । ये कौन सा समाज है जो गालियों के गुंडाराज को स्वीकार कर रहा है । बीते दौर की गुंडागर्दी और इस गुंडागर्दी में क्या अंतर है ? मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कौन शिकार हो रहा है ? सोशल मीडिया में आए दिन किसी का भी चरित्र हनन हो रहा है ? कहीं से कोई कुछ भी बोल दे रहा है । वो क्या यूं ही हो जाता है । क्या यह संगठित काम नहीं है ।

आनलाइन गुंडाराज राजनीतिक संस्कृति की देन है । अब यह तमाम दलों की रणनीति का हिस्सा हो गया है लेकिन अफवाह फैलाना और बिना किसी तथ्य के किसी को बदनाम करना ये कब से मान्य हो गया । एक बात समझ लीजिये इस गुंडाराज को बढ़ावा देने में भले ही कई दल शामिल हैं और दलों के बनाए हुए असंख्य संगठन यह काम कर रहे हैं लेकिन मामला बराबरी का नहीं है । इसमें गुंडई उसकी चल रही है जिसकी ताकत ज्यादा है और जिसकी सत्ता पर पकड़ है । यह सारा मामला संसाधनों का है।

यह एक भयावह संस्कृति पसरती जा रही है और जिसे मोटी चमड़ी वाला मध्यमवर्ग, जिसकी सत्ता से साँठ गाँठ है , सहन कर रहा है और दूसरों को सहने की सलाह देता है । इस खेल ने सत्ता का काम आसान कर दिया है । इस ग्लोबल जगत में सरकार पर आँच न आए इसलिए गुमनाम संगठन या दलों के आनलाइन मीडिया सेल के इशारे पर यह काम हो रहा है । ऐसे पेश किया जाता है जैसे समाज शामिल है । किसी के पक्ष और विपक्ष में ट्रेंड कराना भी राजनीतिक गुंडई है ।

लिखने बोलने वाले लोग और कई लड़कियाँ शिकायत करती हैं कि वो गालियों के डर से नहीं लिखतीं । कई लोग डरने लगे हैं । लड़कियों को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसी भाषा और प्रतीकों के दम पर मर्द उन्हें इस जगह से भी बेदख़ल कर देना चाहते हैं । अगर ये जारी रहा तो मेरी दोस्तों आप जिस पद पर जितनी बार पहली महिला बन जाओ लेकिन इस बेदख़ली से आपको वहीं पहुँचा दिया जाएगा जहाँ से आप चली थीं । सोशल मीडिया रचनात्मक, अनौपचारिक और मौजमस्ती की जगह है , यहाँ नेताओं ने घुस कर विरोधियों को खोजना पहचानना शुरू कर दिया है । बचाइये इस सोशल मीडिया को ।

लोकतंत्र के नाम पर सोशल मीडिया के पब्लिक स्पेस में माँ बहन की गालियाँ दी जा रही हैं । इन नेताओं ने ऐसा क्या कर दिया है कि सब चुप हैं । गली मोहल्लों के गुंडों से परेशान लड़कियाँ और महिलाएँ जो इस मुल्क का भविष्य हैं, आनलाइन गुंडागर्दी क्यों सहन कर रही हैं ? क्या हमारे नौजवान लड़के अपने आस -पास पनप रही ऐसी संस्कृति के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेंगे ? वे क्यों चुप हैं ? जो कमज़ोर है उसके लिए इस संस्कृति में कहाँ जगह बचेगी ?

यह एक रणनीति है । तर्क या तथ्य की गुज़ाइश खतम कर दो और धारणा बनाओ, बदनाम करो । प्रचार और प्रोपेगैंडा से धारणा बना दो । हम एक ऐसी जानलेवा भीड़ को मान्यता दे रहे हैं जिसकी चपेट में बारी बारी से सब आने वाले हैं । आप इसके ख़तरों को समझना चाहते हैं तो अमरीका की मोनिका लेविंस्की के अनुभव को इंटरनेट से निकाल कर पढ़ लीजिएगा । आनलाइन बुली कुछ और नहीं सिर्फ गुंडाराज है । क्या हम जवाबदेही से बहस का माहौल नहीं बना सकते ।

मीडिया में समस्या है । वो समस्या व्यक्ति की है और संस्था की भी । आप व्यक्ति को गाली देकर संस्था के सवाल को नकार नहीं सकते । उन सवाले के जवाब पत्रकार के पास नहीं हैं । वो कब तक देता रहेगा । लोग फिर क्यों उस कारोपोरेट के ख़िलाफ़ चुप रहते हैं जिनके हाथ में मीडिया है और जो नेता के साथ बैठकर विकास बन जाता है और उसके मीडिया में काम करने वाला पत्रकार दलाल हो गया ? ये किस तराज़ू पर तौल रहे हो भाई । तंत्र देखो, व्यक्ति नहीं ।

मैंने पहले भी कहा है कि इस सवाल पर खुल कर बहस हो । वे कौन से पत्रकार हैं जो राज्यसभा और विधान परिषद के सदस्य बने और अख़बार और चैनल भी चलाते हैं ? वे कौन से पत्रकार हैं जो दो दलों में शामिल होने के बीच भी संपादक बन जाते हैं ? ये कैसे स्वीकृत हो जाते हैं ? मीडिया पर राजनीतिक नियंत्रण आपके लिए मुद्दा क्यों नहीं है ? ऐसे लोगों के साथ तो नेता मंत्री खूब नज़र आते हैं तब ये गाली देने वाले गुंडे किधर देख रहे होते हैं । पार्टियाँ बतायें कि उनके भीतर कितने पत्रकार शामिल हैं ? पत्रकारिता में संकट है तो उसके लिए दो चार को गाली देने से क्या होगा ।

मेरे काम का भी हिसाब कीजिये । निकालिये मेरी एक एक रिपोर्टिंग और उसकी आडिट कीजिए । मैं नालियों और गलियों के किनारे कांग्रेस या बीजेपी के फ़ायदे नुक़सान के लिए नहीं गया । लोगों के लिए गया । चैनल चैनल बदलकर अपने होने की क़ीमत नहीं वसूली । काम ही किया । जितना कर सकता था किया । मुझे सफाई नहीं देनी है । मुझे आपका पक्ष जानना है ?

मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे कोई यह लिखे कि वो मेरी लाद फाड़ देना चाहता है । मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है कि मैं गाली सुनूँ और आप या समाज सुनने सहने की सलाह दें । आप उनसे लड़िये जो गुंडाराज की सेना तैयार कर रहे हैं । मेरे बारे में अनगिनत अफ़वाहें फैलाई गईं हैं । आप मेरी नहीं अपनी चिन्ता करें क्योंकि अब बारी आपकी है । आप सरकारों का हिसाब कीजिये कि आपके राज में बोलने की कितनी आज़ादी है और प्रेस भांड जैसा क्यों हो गया है ?

यह मज़ाक़ का मसला नहीं है । मैं जानना चाहता हूँ कि समाज का पक्ष क्या है ? मैं आम लोगों से पूछने जा रहा हूँ कि आप इसके ख़िलाफ़ बोलेंगे या नहीं ? आप मीडिया के आज़ाद स्पेस के लिए बोलेंगे या नहीं ? आप किसी पत्रकार के लिए आगे आएँगे या नहीं ? अगर नहीं तो मैं युवा पत्रकारों से अपील करता हूँ कि वे इस समाज के लिए आवाज़ उठाना छोड़ दें । यह समाज उस भीड़ से मिल गया है । यह किसी भी दिन आपकी बदनामी से लेकर हत्या में शामिल हो सकता है ? पत्रकारों ने हर क़ीमत पर समाज के लिए लड़ाई लड़ी है, बहुत कमियाँ रही हैं और बहुतों ने इसकी क़ीमत भी वसूली लेकिन मैं देखना चाहता हूँ कि समाज आगे आता है या नहीं ।

अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब मैंने खुलेआम दर्शकों से एक बात कही थी । आज के बाद से आप नागरिक बन जाइये । अब आप मतदाता नहीं है । अपनी चुनी हुई सरकार को लेकर सख्त हो जाइये । तटस्थ हो जाइये और किसी का फैन मत बनिये । क्योंकि फैन लोकतंत्र का नया गुंडा है जो विरोध और असहमति की आवाज़ को दबाने के खेल में साझीदार बनता है।

आपका
रवीश कुमार 

Tuesday, July 28, 2015

सब कुछ टू-इन-वन रेडियो जैसा है, मन किया तो हम देशभक्त, मन किया तो आप देशद्रोही: रवीश कुमार



आज सुबह व्हॉट्सऐप, मैसेंजर और ट्विटर पर कुछ लोगों ने एक प्लेट भेजा, जिस पर मेरा भी नाम लिखा है। मेरे अलावा कई और लोगों के नाम लिखे हैं। इस संदर्भ में लिखा गया है कि हम लोग उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी की माफी के लिए राष्ट्रपति को लिखा है। अव्वल तो मैंने ऐसी कोई चिट्ठी नहीं लिखी है और लिखी भी होती तो मैं नहीं मानता, यह कोई देशद्रोह है। मगर वे लोग कौन हैं, जो किसी के बारे में देशद्रोही होने की अफवाह फैला देते हैं। ऐसा करते हुए वे कौन सी अदालत, कानून और देश का सम्मान कर रहे होते हैं। क्या अफवाह फैलाना भी देशभक्ति है।

किसी को इन देशभक्तों का भी पता लगाना चाहिए। ये देश के लिए कौन-सा काम करते हैं। इनका नागरिक आचरण क्या है। आम तौर पर ये लोग किसी पार्टी के भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालते रहते हैं। ऑनलाइन दुनिया में एक दल के लिए लड़ते रहते हैं। कई दलों के पास अब ऐसी ऑनलाइन सेना हो गई है। इनकी प्रोफाइल दल विशेष की पहचान चिह्नों से सजी होती हैं। किसी में नारे होते हैं तो किसी में नेता तो किसी में धार्मिक प्रतीक। क्या हमारे लोकतंत्र ने इन्हें ठेका दे रखा है कि वे देशद्रोहियों की पहचान करें, उनकी टाइमलाइन पर हमला कर आतंकित करने का प्रयास करें।

सार्वजनिक जीवन में तरह-तरह के सवाल करने से हमारी नागरिकता निखरती है। क्यों ज़रूरी हो कि सारे एक ही तरह से सोचें। क्या कोई अलग सोच रखे तो उसके खिलाफ अफवाह फैलाई जाए और आक्रामक लफ़्ज़ों का इस्तेमाल हो। अब आप पाठकों को इसके खिलाफ बोलना चाहिए। अगर आपको यह सामान्य लगता है तो समस्या आपके साथ भी है और इसके शिकार आप भी होंगे। एक दिन आपके खिलाफ भी व्हॉट्सऐप पर संदेश घूमेगा और ज़हर फैलेगा, क्योंकि इस खेल के नियम वही तय करते हैं, जो किसी दल के समर्थक होते हैं, जिनके पास संसाधन और कुतर्क होते हैं। पत्रकार निखिल वाघले ने ट्वीट भी किया है, "अब इस देश में कोई बात कहनी हो तो लोगों की भीड़ के साथ ही कहनी पड़ेगी, वर्ना दूसरी भीड़ कुचल देगी..." आप सामान्य पाठकों को सोचना चाहिए। आप जब भी कहेंगे, अकेले ही होंगे।

पूरी दुनिया में ऑनलाइन गुंडागर्दी एक खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। ये वे लोग हैं, जो स्कूलों में 'बुली' बनकर आपके मासूम बच्चों को जीवन भर के लिए आतंकित कर देते हैं, मोहल्ले के चौक पर खड़े होकर किसी लड़की के बाहर निकलने की तमाम संभावनाओं को खत्म करते रहते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने का भय दिखाकर ब्लैकमेल करते हैं। आपने 'मसान' फिल्म में देखा ही होगा कि कैसे वह क्रूर थानेदार फोन से रिकॉर्ड कर देवी और उसके बाप की ज़िन्दगी को खत्म कर देता है। उससे पहले देवी के प्रेमी दोस्त को मौके पर ही मार देता है। यह प्रवृत्ति हत्यारों की है, इसलिए सतर्क रहिए।

बेशक आप किसी भी पार्टी को पसंद करते हों, लेकिन उसके भीतर भी तो सही-गलत को लेकर बहस होती है। चार नेताओं की अलग-अलग लाइनें होती हैं, इसलिए आपको इस प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए। याद रखिएगा, इनका गैंग बढ़ेगा तो एक दिन आप भी फंसेंगे। इसलिए अगर आपकी टाइमलाइन पर आपका कोई भी दोस्त ऐसा कर रहा हो तो उसे चेता दीजिए। उससे नाता तोड़ लीजिए। अपनी पार्टी के नेता को लिखिए कि यह समर्थक रहेगा तो हम आपके समर्थक नहीं रह पाएंगे। क्या आप वैसी पार्टी का समर्थन करना चाहेंगे, जहां इस तरह के ऑनलाइन गुंडे हों। सवाल करना मुखालफत नहीं है। हर दल में ऐसे गुंडे भर गए हैं। इसके कारण ऑनलाइन की दुनिया अब नागरिकों की दुनिया रह ही नहीं जाएगी।

ऑनलाइन गुंडागर्दी सिर्फ फांसी, धर्म या किसी नेता के प्रति भक्ति के संदर्भ में नहीं होती है। फिल्म कलाकार अनुष्का शर्मा ने ट्वीट किया है कि वह ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें करने वाले या किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान करने वालों को ब्लॉक कर देंगी। मोनिका लेविंस्की का टेड पर दिया गया भाषण भी एक बार उठाकर पढ़ लीजिए। मोनिका लेविंस्की ऑनलाइन गुंडागर्दी के खिलाफ काम कर ही लंदन की एक संस्था से जुड़ गई हैं। उनका प्रण है कि अब वह किसी और को इस गुंडागर्दी का शिकार नहीं होने देंगी। फेसबुक पर पूर्व संपादक शंभुनाथ शुक्ल के पेज पर जाकर देखिए। आए दिन वह ऐसी प्रवृत्ति से परेशान होते हैं और इनसे लड़ने की प्रतिज्ञा करते रहते हैं। कुछ भी खुलकर लिखना मुश्किल हो गया है। अब आपको समझ आ ही गया होगा कि संतुलन और 'is equal to' कुछ और नहीं, बल्कि चुप कराने की तरकीब है। आप बोलेंगे तो हम भी आपके बारे में बोलेंगे। क्या किसी भी नागरिक समाज को यह मंज़ूर होना चाहिए।

इन तत्वों को नज़रअंदाज़ करने की सलाह बिल्कुल ऐसी है कि आप इन गुंडों को स्वीकार कर लीजिए। ध्यान मत दीजिए। सवाल है कि ध्यान क्यों न दें। प्रधानमंत्री के नाम पर भक्ति करने वालों का उत्पात कई लोगों ने झेला है। प्रधानमंत्री को लेकर जब यह सब शुरू हुआ तो वह इस ख़तरे को समझ गए। बाकायदा सार्वजनिक चेतावनी दी, लेकिन बाद में यह भी खुलासा हुआ कि जिन लोगों को बुलाकर यह चेतावनी दी, उनमें से कई लोग खुद ऐसा काम करते हैं। इसीलिए मैंने कहा कि अपने आसपास के ऐसे मित्रों या अनुचरों पर निगाह रखिए, जो ऑनलाइन गुंडागर्दी करता है। ये लोग सार्वजनिक जीवन के शिष्टाचार को तोड़ रहे हैं।

मौजूदा संदर्भ याकूब मेमन की फांसी की सज़ा के विरोध का है। जब तक सज़ा के खिलाफ तमाम कानूनी विकल्प हैं, उनका इस्तेमाल देशद्रोह कैसे हो गया। सवाल उठाने और समीक्षा की मांग करने वाले में तो हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी हैं। अदालत ने तो नहीं कहा कि कोई ऐसा कर देशद्रोह का काम कर रहे हैं। अगर इस मामले में अदालत का फैसला ही सर्वोच्च होता तो फिर राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के प्रावधान क्यों होते। क्या ये लोग संविधान निर्माताओं को भी देशद्रोही घोषित कर देंगे।

याकूब मेमन का मामला आते ही वे लोग, जो व्यापमं से लेकर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ऑनलाइन दुनिया से भागे हुए थे, लौट आए हैं। खुद धर्म की आड़ लेते हैं और दूसरे को धर्म के नाम पर डराते हैं, क्योंकि अंतिम नैतिक बल इन्हें धर्म से ही मिलता है। वे उस सामूहिकता का नाजायज़ लाभ उठाते हैं, जो धर्म के नाम पर अपने आप बन जाती है या जिसके बन जाने का मिथक होता है। फिल्मों में आपने दादा टाइप के कई किरदार देखें होंगे, जो सौ नाजायज़ काम करेगा, लेकिन भक्ति भी करेगा। इससे वह समाज में मान्यता हासिल करने का कमज़ोर प्रयास करता है। अगर ऑनलाइन गुंडागर्दी करने वालों की चली तो पूरा देश देशद्रोही हो जाएगा।

यह भी सही है कि कुछ लोगों ने याकूब मेमन के मामले को धार्मिकता से जोड़कर काफी नुकसान किया है, गलत काम किया है। फांसी के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि फैसले का संबंध धर्म से नहीं है। लेकिन क्या इस बात का वे लोग खुराक की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, जो हमेशा इसी फिराक में रहते हैं कि कोई चारा मिले नहीं कि उसकी चर्चा शहर भर में फैला दो। क्या आपने इन्हें यह कहते सुना कि वे धर्म से जोड़ने का विरोध तो करते हैं, मगर फांसी की सज़ा का भी विरोध करते हैं। याकूब का मामला मुसलमान होने का मामला ही नहीं हैं। पुनर्विचार एक संवैधानिक अधिकार है। नए तथ्य आते हैं तो उसे नए सिरे से देखने का विवेक और अधिकार अदालत के पास है।

90 देशों में फांसी की सज़ा का प्रावधान नहीं हैं। क्या वहां यह तय करते हुए आतंकवाद और जघन्य अपराधों का मामला नहीं आया होगा। बर्बरता के आधार पर फांसी की सज़ा का करोड़ों लोग विरोध करते हैं। आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। हमने कई आतंकवादियों को फांसी पर लटकाया है, पर क्या उससे आतंकवाद ख़त्म हो गया। सज़ा का कौन-सा मकसद पूरा हुआ। क्या इंसाफ का यही अंतिम मकसद है, जिसे लेकर राष्ट्रभक्ति उमड़ आती है। इनके हमलों से जो परिवार बर्बाद हुए, उनके लिए ये ऑनलाइन देशभक्त क्या करते हैं। कोई पार्टी वाला जाता है उनका हाल पूछने।

फांसी से आतंकवाद खत्म होता तो आज दुनिया से आतंकवाद मिट गया होता। आतंकवाद क्यों और कैसे पनपता है, उसे लेकर भोले मत बनिए। उन क्रूर राजनीतिक सच्चाइयों का सामना कीजिए। अगर इसका कारण धर्म होता और फांसी से हल हो जाता तो गुरुदासपुर आतंकी हमला ही न होता। उनके हमले से धार्मिक मकसद नहीं, राजनीतिक मकसद ही पूरा होता होगा। धर्म तो खुराक है, ताकि एक खास किस्म की झूठी सामूहिक चेतना भड़काई जा सके। जो लोग इस बहस में कूदे हैं, उनकी सोच और समझ धार्मिक पहचान से आगे नहीं जाती है। वे कब पाकिस्तान को आतंकी बता देते हैं और कब उससे हाथ मिलाकर कूटनीतिक इतिहास रच देते हैं, ऐसा लगता है कि सब कुछ टू-इन-वन रेडियो जैसा है। मन किया तो कैसेट बजाया, मन किया तो रेडियो। मन किया तो हम देशभक्त, मन किया तो आप देशद्रोही।



Wednesday, June 17, 2015

रामपुर, रामायण और रज़ा लाइब्रेरी-रवीश कुमार



रामपुर, रामायण और रज़ा लाइब्रेरीअर्से से रज़ा लाइब्रेरी की इस इमारत को देखने की हसरत थी। उत्तर प्रदेश के रामपुर से इतनी बार गुज़रा, मगर इस खूबसूरत इमारत को बाहर और भीतर से देखने का मौका नहीं मिला। लाइब्रेरी देखने का पुराना शौक है। कोलकाता की नेशनल लाइब्रेरी भी इसी तरह शाम के वक्त झांक आया था, जब वहां कोई नहीं था। 1836 में बनी थी कोलकाता पब्लिक लाइब्रेरी, 1891 में इम्पीरियल लाइब्रेरी बनी और फिर लार्ड कर्ज़न ने दोनों को मिलाकर 1903 में इम्पीरियल लाइब्रेरी बनाई। आज़ादी के बाद 1953 में यह नेशनल लाइब्रेरी के नाम से हिन्दुस्तान की जनता को समर्पित कर दी गई।

रज़ा लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मुझे कोलकाता का ही ख़्याल आया। लाइब्रेरी के सहयोगी काफी रोचक तरीके से बता रहे थे कि देखिए सीढ़ियों, दरवाज़े और दीवारों पर वर्मा की टीक लकड़ियां लगी हैं। 1774 में रामपुर के नवाब फ़ैज़ुल्ला ख़ान ने इसकी बुनियाद रखी थी। नवाबों की अपनी एक लाइब्रेरी हुआ करती थी, जिसे कुतुबनामा कहा जाता है। एक बार 'रवीश की रिपोर्ट' के लिए रिसर्च करते वक्त पश्चिमी यूपी के इलाकों में फोन करने लगा, तो पता चला कि बहुत-सी लाइब्रेरी कब की खत्म हो चुकी हैं। बाहर के मुल्कों के ख़रीदार औने-पौने दामों पर किताबें ले जा चुके हैं। वह रिपोर्ट तो नहीं बन सकी, लेकिन रज़ा लाइब्रेरी देखने की हूक बाकी रह गई।



इटालियन मार्बल से बनी इन मूर्तियों की उम्र सौ साल से ज़्यादा हो चुकी है। काश इस गलियारे की तरह रामपुर की राजनीतिक विरासत भी शानदार और सौम्य होती। रामपुर के ही हैं आज़म ख़ान और मुख़्तार अब्बास नक़वी, लेकिन उनकी सियासी ज़ुबान पर इस लाइब्रेरी का ज़रा भी असर नहीं दिखता है। यहां आकर लगा कि शहर ने भी इस लाइब्रेरी को छोड़ दिया है। वहां जवानियां नहीं दिखीं। कुछ लोग मिले, जो लाइब्रेरी के लिए अपनी विरासत को देखने आए थे। कुछ थके हुए नौजवान अख़बार पढ़ते मिले। बताया गया कि यहां इज़राइल, अमेरिका से काफी विद्वान आते हैं, भारत से कम ही आते हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रज़ा लाइब्रेरी की ख़ूबी मालूम हैं। उन्होंने अपनी दो-दो विदेश यात्राओं के लिए यहां से विरासती किताबों के नमूने मंगवाए हैं। रज़ा लाइब्रेरी भारत सरकार के तहत एक स्वायत्त संस्था है।


अलग-अलग दौर में लाइब्रेरी के लिए कमरे से लेकर इमारतें बनती रहीं। इस तस्वीर में आप हामिद हॉल देख रहे हैं। इसकी भव्यता आपसे सवाल पूछने लगती है कि बताओ, अभी तक कहां थे। नवाब मोहम्मद सईद ख़ान ने लाइब्रेरी के लिए अलग डिपार्टमेंट ही बनवाया था। 1857 की क्रांति के समय अंग्रेज़ों ने लाइब्रेरी को काफी नुकसान पहुंचाया, फिर भी लाइब्रेरी खड़ी हो गई। इस हामिद हॉल में म्यूज़ियम है, लेकिन जब यह हॉल बना था, तब यहां नवाब हामिद अली की कोर्ट लगा करती थी। इस हाल में औरतों को ऊपर से देखने के लिए बाल्कनी बनी हुई हैं। 1905 में रज़ा लाइब्रेरी इस इमारत में आ गई और तब से यहीं है। इस हॉल में शैंडिलियर की एशिया में हस्ती है और इसमे लगा फिलिप्स बल्ब सौ साल से फ्यूज़ नहीं हुआ है।

रामपुर की राजनीति बदल रही है। आज़म ख़ान ने काफी कुछ सुधार किया है। रामपुर को चमका रहे हैं। दबी और अपुष्ट ज़ुबान में सुनने को मिला कि आज़म ख़ान को नवाबों के दौर से दुश्मनी है। वह लाइब्रेरी के कॉम्प्लेक्स के बाहर बने बुलंद दरवाज़ों को ढहा सकते हैं। अजमेरी गेट और कश्मीरी गेट जैसे बने गेट नहीं रहेंगे तो लाइब्रेरी की इस इमारत की भव्यता कंगाल हो जाएगी।


इस कॉलम को ग़ौर से देखिए। सबसे नीचे मस्जिद है, फिर चर्च, उसके ऊपर गुरुद्वारे का झरोखा और सबसे ऊपर मंदिर। फ्रांसीसी वास्तुकार राइट ने इस कॉलम की कल्पना की थी। ज़ाहिर है नवाबों की सहमति भी रही होगी। यह इमारत हिन्दुस्तान के सेकुलर होने के तसव्वुर की एक अच्छी मिसाल हो सकती है। कितने झगड़े बंद करवा सकती है। इन सब छोटे-छोटे किस्सों से सेकुलर हिन्दुस्तान बनने की प्रक्रिया आज भी जारी है। मज़हबी तकरारों के अनगिनत ख़ूनी क़िस्सों के बीच ये छोटे-छोटे किस्से सुकून देने वाले हैं।


रज़ा लाइब्रेरी में अनेक भाषाओं और लिपियों की 17,000 पांडुलिपियां हैं। मक्का की लाइब्रेरी की भी पांडुलिपि है, तो सत्रहवीं सदी की रामायण की पांडुलिपि है। सातवीं सदी का लिखा हुआ क़ुरान है। स्वर्ण जड़ित क़ुरान और रामायण हैं यहां। सत्रहवीं सदी की वाल्मीकि रामायण तो देखने लायक है। रज़ा लाइब्रेरी ने इस रामायण को ऐसे संभालकर रखा है, जैसे राम ही इस लाइब्रेरी के देवता हों। इमारत में घुसते ही पहली बात यही बताई जाती है कि हमारे पास एक खास वाल्मीकि रामायण है।


अकबर के समय रामायण का फारसी में अनुवाद कराया गया था। एक रामायण जयपुर में है। रज़ा लाइब्रेरी में भी फारसी में एक रामायण है। प्रो. शाह अब्दुस्सलाम और डाक्टर वकारुल हसल सिद्दीकी ने फारसी से हिन्दी में अनुवाद किया है। इस रामायण को देखना ख़ुद को तीन सदी पीछे ले जाने जैसा था। मुग़ल शैली में 258 प्रसंगों के चित्र बनाए गए हैं। उन तस्वीरों में राम, सीता और रावण आज के ज़माने से बिल्कुल अलग दिखते हैं। इस तस्वीर में रामायण के दस सिरों के ऊपर एक गधा भी है।


रज़ा लाइब्रेरी के पास जो रामायण है, उसका अनुवाद 1713 में सुमेर चन्द ने संस्कृत से फारसी में किया था। सुमेर चन्द ने मुगल शासक फ़र्रुखसियर के शासनकाल में लिखा था। इसे सोने के पानी तथा कीमती पत्थरों के रंगो से गुलबूटे और नक्शो-निगार से लौह (पन्ने का ऊपरी भाग) सजाई गई है। अब देखिए, संस्कृत से फ़ारसी में अनुवाद एक हिन्दू करता है और फ़ारसी से हिन्दी में अनुवाद दो मुस्लिम करते हैं। वक़ारुल हसन अपने अनुवाद को पुस्तक के रूप में देख भी नहीं सके। उनका देहांत हो गया। संसार की किसी भी भाषा में लिखित रामायण में इतनी बड़ी संख्या में रंगीन तस्वीरें नहीं हैं।

"बिस्मिल्लाह-अर्रहमान-अर्रहीम - सारी प्रशंसा उस ईश्वर के लिए ही है, जो मेरा पथप्रदर्शक है और कृपापात्र होना भी उसी को शोभनीय है... उस वहदूद लाशरीक (अद्वितीय, ईश्वर) के उपकार के बाद मैं यह रामायण लिख रहा हूं... यद्यपि पृथ्वी पर तीन रामायण पाई जाती हैं, परन्तु श्रीराम की मनोनुकूल रामायण यही है..."

रामायण की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है। चार हज़ार रुपये में आप इस रामायण को ख़रीद सकते हैं। काफी भारी है वैसे। इसकी तस्वीरों पर ही अलग से किताब हो सकती है। राम-लक्ष्मण और सीता मुग़ल शैली के राजसी परिधानों में नज़र आते हैं। खासकर पगड़ी या टोपी बिल्कुल ही मुग़लिया दौर की हैं। कुछ तस्वीरों में हाथ में धनुष की जगह तलवार है। ऋषि-मुनियों के बीच के श्रीराम धोती और जनेऊ में नज़र आते हैं। विश्वामित्र, श्रीराम और राजा दशरथ का एक चित्र है, जिसमें बर्तनों में हीरे जड़े हैं। यह रामायण बेहद संग्रहणीय है। रामपुर के पास एक ऐसा रामायण है, जिसकी कथा अभी ठीक से नहीं कही गई है... कही जानी चाहिए।

हमारी सरकारें पर्यटन के विज्ञापनों में धार्मिक स्थलों और महलों को ही दिखाती हैं। लाइब्रेरी और म्यूज़ियम का ज़िक्र तक नहीं आता। बाहर के मुल्कों में म्यूज़ियम का दर्शन करना सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन माना जाता है। लाइब्रेरी के सहयोगी काफी मददगार हैं। शुक्रवार को छोड़ रज़ा लाइब्रेरी सभी दिन खुली रहती है।

मुझे उम्मीद है कि पर्यटन पर ज़ोर देने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर भी विचार करेंगे। कम से कम अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की इस विरासत का प्रचार तो कर ही सकते हैं। किसने रोका है कि वह केंद्र की लाइब्रेरी का प्रचार नहीं कर सकते। इतिहास तो उनके राज्य का ही है। रामपुर की छुरी और आज़म ख़ान के तंज बयानों को सब जानते हैं, रज़ा लाइब्रेरी का रामायण कहा जाएगा तो समाज को कहीं ज्यादा लाभ होगा।