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Thursday, April 27, 2017

भारत के इस वीभत्स चेहरे का ज़िम्मेदार कौन है ?

जम्मू मे उस अधमरे बुज़ुर्ग मुसलमान की तस्वीर ज़हन को नोच रही है।
उसके परिवार की उन दो महिलाओं की चीखें अगर तुम्हे विचलित नही कर रही, 
तो आत्मा मर चुकी है तुम्हारी। 

कुछ ऐसा ही अखलाक के साथ हुआ होगा। 
कुछ ऐसी ही बेरहमी पहलू खान के साथ देखी थी हमने। 
पुलिस कितनी न्यायसंगत है, इसका प्रमाण इस बात से मिलता है
कि पहलू खान और जम्मू, दोनो मामलों मे पीढ़ित के खिलाफ
भी केस दर्ज कर दिया गया। बेशर्मी देखिए जम्मू पुलिस की। 

कहते हैं कि गडरियों को वन विभाग के साथ साथ
डिप्टी कमिश्नर की भी इजाज़त की ज़रूरत होती है, 
बल्कि खुद अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि 
अगर मवेशियो को किसी वाहन मे ले जाया जा रहा हो, 
तब ही डिप्टी कमिश्नर की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है। 

सवाल ये नहीं। 
तस्वीर आपके सामने है। 
बेबस कौन था। 
बेरहमी किसके साथ हो रही थी। 
यही किया गया था पहलू खान के रिश्तेदारों के साथ। 
हमलावरों के साथ साथ उनपर भी केस दर्ज कर दिया गया। 
न्याय की खातिर ? 
संतुलन की खातिर ? 
वो तो बिगड़ चुका है। 

भारत का संतुलन बिगड़ चुका है। 
क्योंकि ये चीखें प्रधानमंत्री मोदी को सुनाई नही पड़ती। 
हां कभी कभी, दंडवत मीडिया से अक्सर ये खबरें आ जाती हैं कि 
मोदीजी इन घटनाओं से बेहद विचलित हैं
और उसमे भी प्रधानसेवकजी इस बात का खास ख़याल रखते हैं कि 
आसपास कोई चुनाव तो नही है? 

मैने कुछ दिनो पहले कहा था कि 
जो श्मशान और कब्रिस्तान की बातें करते हैं 
उनकी विरासत सिर्फ राख हो सकती है। 
ग़लत कहा था मैने ? 
बोलो? 
दादरी, अलवर और जम्मू से होते हुए 
ये तो अब दिल्ली के कालकाजी आ गए? 
याद है ना? 
वहां भी सही दस्तावेज़ होने के बावजूद 
आशू, रिज़वान और कामिल पर केस दर्ज कर दिया गया। 
जानवरों पर अत्याचार का केस। 

शुक्र है पुलिस ने यही केस हमलावरों पर नही किया। 
क्योंकि गौभक्ति करने वाले इन गुण्डों के लिए 
कामिल, आशू और रिज़वान जानवर ही तो हैं? 
क्योंकि यहां तो गाय का मामला भी नहीं था? 
यहां तो भैंसें लाई जा रही थीं? 
जिसके काटने पर कोई कानूनी रोक नही है। 

एनडीटीवी की राधिका बोर्डिया वहां मौजूद थीं। 
उनके द्वारा शूट किये गए विडियो मे वो तीन अधमरे ज़मीन पर पड़े हुए हैं 
और पुलिस उनके खिलाफ केस दर्ज करती सुनाई पड़ती है। 
वाह! क्या प्राथमिकता है। 
कोई औरत ये भी कहती है, अरे मत मारो इन्हे।
एक और आवाज़ आती है, ये तो समाज का गुस्सा है। 

मीडिया जो योगी योगी कर रहा है 
क्या सहारनपुर और आगरा की तस्वीरें 
कानून व्यवस्था के चरमरा जाने का प्रमाण नही है ? 

कोई बताएगा, भारत के इस वीभत्स चेहरे का कौन ज़िम्मेदार है? 
और ये सब करके क्या हासिल कर लोगे तुम? 
दरअसल मेरे लिए ये तमाम मामले निजी हैं। 
और आप सबके लिए होने चाहिए। 
क्योंकि मुझे डर है कि जब मेरे बच्चे बड़े होंगे, 
तो वो कैसे समाज और देश की बागडोर संभाल रहे होंगे। 
किस सोच मे पल रहे हैं हमारे बच्चे। 
क्या संस्कारी मां बाप उन्हे दूसरे धर्म के लोगों के लिए 
नफरत और हिकारत के माहौल मे बड़ा कर रहे हैं ? 
-अभिसार शर्मा

Saturday, February 20, 2016

इतिहास के पन्नो को पलटेंगे तो मौजूदा वक्त इतिहास पर भारी पड़ता नजर आयेगा

मोदी जी, इस बार पीएम नहीं देश फेल होगा

दो दिन बाद संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। जिस पर संसद की ही नहीं बल्कि अब देश की नजर होगी आखिर मोदी सरकार की किन उपलब्धियों का जिक्र राष्ट्रपति करते हैं और किन मुद्दों पर चिंता जताते हैं । क्योंकि पहली बार जाति या धर्म से इतर राष्ट्रवाद ही राजनीतिक बिसात पर मोहरा बनता दिख रहा है । और पहली बार आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फूलते हाथ पांव हर किसी को दिखायी भी दे रहे है। साथ ही  संघ परिवार के भीतर भी मोदी के विकास मंत्र को लेकर कसमसाहट पैदा हो चली है। यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर के तेवर 2016 के बजट सत्र के दौरान कैसे बुखार में बदल रहे है यह किसी से छुपा नहीं है ।
कारपोरेट सेक्टर के पास काम नहीं है ।
औघोगिक सेक्टर में उत्पादन सबसे निचले स्तर पर है ।
निर्यात सबसे नीचे है। किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य तो दूर बर्बाद फसल के नुकसान की भरपाई भी नहीं मिल पा रही है ।
नये रोजगार तो दूर पुराने कामगारों के सामने भी संकट मंडराने लगा है ।
कोयला खनन से जुड़े हजारों हजार मजदूरों को काम के लाले पड़ चुके हैं ।
कोर सेक्टर ही बैठा जा रहा है तो संघ परिवार के भीतर भी यह सवाल बडा होने लगा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने विकास मंत्र के आसरे संघ के जिस स्वदेशी तंत्र को ही हाशिये पर ढकेला और जब स्वयंसेवकों के पास आम जनता के बीच जाने पर सवाल ज्यादा उठ रहे हैं और जवाब नहीं है तो फिर उसकी राजनीतिक सक्रियता का मतलब ही क्या निकला।

दरअसल मोदी ही नहीं बल्कि उससे पहले मनमोहन सिंह के कार्यकाल से ही राजनीतिक सत्ता में सिमटते हर संस्थान के सारे अधिकार महसूस किये जा रहे थे । यानी संसाधनों का खत्म होना या राजनीतिक सत्ता के निर्देश पर काम करने वाले हालात मनमोहन सिंह के दौर में CBI से लेकर CVC और चुनाव आयोग से लेकर UGC तक पर लगे । लेकिन मोदी के दौर में संकेत की भाषा ही खत्म हुई और राजनीतिक सत्ता की सीधी दखलंदाजी ने इस सवाल को बड़ा कर दिया कि अगर चुनी हुई सत्ता का नजरिया ही लोकतंत्र है तो फिर लोकतंत्र के चार खम्भों के बारे में सोचना भी बेमानी है । इसलिये तमाम उल्झे हालातो के बीच जब संसद सत्र भी शुरु हो रहा है तो यह खतरा तो है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के वक्त ही विपक्ष बायकाट ना कर दें । और सड़क पर भगवा ब्रिगेड ही यह सवाल ना उठाने लगे कि नेहरु माडल पर चलते हुये ही अगर मोदी सरकार पूंजी के आसरे विकास की सोच रही है तो फिर इस काम के लिये किसी प्रचारक के पीएम बनने का लाभ क्या है। यह काम तो कारपोरेट सेक्टर भी आसानी से कर सकता है । और सही मायने में यही काम तो मनमोहन सिंह बतौर पीएम से ज्यादा बतौर सीईओ दस बरस तक करते रहे । यानी पेट का सवाल। भूख का सवाल । रोजगार का सवाल । किसान का सवाल । हिन्दुत्व का सवाल । हिन्दुत्व को राष्ट्र से आगे जिन्दगी जीने के नजरिये से जोड़ने का सवाल ।

मानव संसाधन को विकास से जोड़ कर आदर्श गांव बनाने की सोच क्यों गायब है यह सवाल संघ परिवार के तमाम संगठनो के बीच तो अब उठने ही लगे है। किसान संघ किसान के मुद्दे पर चुप है । मजदूर संघ कुछ कह नहीं सकता । तोगडिया तो विहिप के बैनर तले राजस्थान में किसानों के बीच काम कर रहे है । यानी मोदी सरकार के सामने अगर  एक तरफ संसद के भीतर सरकार चल रही है यह दिखाने-बताने का संकट है तो संसद के बाहर संघ परिवार को जबाब देना है कि जिन मुद्दों को 2014 लोकसभा चुनाव के वक्त उठाया वह सिर्फ राजनीतिक नारे नहीं थे । असर मोदी सरकार के इस उलझन का ही है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी अब संघ के राजनीतिक संगठन के तौर पर सक्रिय ऐसे वक्त हुये जब संसद शुरु होने वाली है। यानी टकराव सीधा नजर आना चाहिये इसे संघ परिवार समझ चुका है । इसलिये पीएम बनने के बाद मोदी के ट्रांसफरमेशन को वह बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है । और  ध्यान दे तो संघ की राष्ट्रभक्ति की ट्रेनिंग का ही असर रहा कि नरेन्द्र मोदी ने 2014 के चुनाव में राइट-सेन्टर की लाइन ली । पाकिस्तान को ना बख्शने का अंदाज था । किसान-जवान को साथ लेकर देश को आगे बढाने की सोच भी थी । कारपोरेट और औघोगिक घरानों की टैक्स चोरी या सरकारी रियायत को बंद कर आम जनता या कहे गरीब भारत को राहत देने की भी बात थी । यानी संघ परिवार के समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सोच के साथ देशभक्ति का जुनून मोदी के हर भाषण में भरा हुआ था । लेकिन बीते दो बरसो में राइट-सेन्टर की जगह कैपिटल राइट की लाइन पकड़ी और पूंजी की चकाचौंध तले अनमोल भारत को बनाने की जो सोच प्रधानमंत्री मोदी ने अपनायी उसमे सीमा पर जवान ज्यादा मरे । घर में किसान के ज्यादा खुदकुशी की । नवाज शरीफ से यारी ने कट्टर राष्ट्रवाद को दरकिनार कर संघ की हिन्दू राष्ट्र की थ्योरी पर सीधा हमला भी कर दिया । लेकिन इसी प्रक्रिया में स्वयंसेवकों की एक नयी टीम ने हर संस्धान पर कब्जा शुरु भी किया और मोदी सरकार ने मान भी लिया कि संघ परिवार उसके हर फैसले पर साथ खड़ा हो जायेगी क्योंकि मानव संसाधन मंत्रालय से लेकर रक्षा मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय से लेकर कृषि मंत्रालय और सामाजिक न्याय मंत्रालय में संघ के करीबी या साथ खडे उन स्वयंसेवकों को नियुक्ति मिल गई जिनके जुबा पर हेडगेवार-गोलवरकर से लेकर मोहन भागवत का गुणगान तो था लेकिन संघ की समझ नहीं थी । संघ के सरोकार नहीं थे ।

विश्वविद्यालयों की कतार से लेकर कमोवेश हर संसाधन में संघ की चापलूसी करते हुये बड़ी खेप नियुक्त हो गई जो मोदी के विकास तंत्र में फिट बैठती नहीं थी और संघ के स्वयंसेवक होकर काम कर नहीं सकती थी । फिर हर नीति । हर फैसले । हर नारे के साथ प्रधानमंत्री मोदी का नाम चेहरा जुड़ा । तो मंत्रियों से लेकर नौकरशाह का चेहरा भी गायब हुआ और समझ भी ।

पीएम मोदी सक्रिय है तो पीएमओ सक्रिय हुआ । पीएमो सक्रिय हुआ तो सचिव सक्रिय हुये । सचिव सक्रिय हुये तो मंत्री पर काम का दबाब बना । लेकिन सारे हालात घूम-फिरकर प्रदानमंत्री मोदी की सक्रियता पर ही जा टिके। जिन्हे 365 दिन में से सौ दिन देश में अलग अलग कार्यक्रमों में व्यस्त रखना नौकरशाही बखूबी जानती है। फिर विदेशी यात्रा से मिली वाहवाही 30 से 40 दिन व्यस्त रखती ही है । तो देश के सवाल जो असल तंत्र में ही जंग लगा रहे है और जिस तंत्र के जरीये अपनी योजनाओं को लागू कराने के लिये सरकार की जरुरत है वह भी संकट में आ गये तो उन्हें पटरी पर लायेगा कौन ।

मसलन एक तरफ सरकारी बैक तो दूसरी तरफ बैक कर्ज ना लौटाने वाले औघोगिक संस्थानों का उपयोग । यानी जो गुस्सा देशभक्ति के भाव में या देशद्रोह कहकर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर जेएनयू तक में निकल रहा है । उसको देखने का नजरिया चाह कर भी छात्रों के साथ नहीं जुड़ेगा । यानी यह सवाल नहीं उटेगा कि छात्रो के सामने संकट पढाई के बाद रोजगार का है । बेहतर बढाई ना मिल पाने का है । शिक्षा में ही 17 फिसदी कम करने का है । शिक्षा मंत्री की सीमित समझ का है । रोजगार दफ्तरों में पड़े सवा करोड आवेदनों का है । साठ फिसदी कालेज प्रोफेसरो को अंतराष्ट्रीय मानक के हिसाब से वेतन ना मिलने का है । सवाल राजनीतिक तौर पर ही उठेंगे । यानी हैदराबाद यूनिवर्सिटी के आईने में दलित का सवाल सियासी वोट बैक तलाशेगा । तो जेएनयू के जरीये लेफ्ट को देशद्रोही करारते हुये बंगाल और केरल में राजनीतिक जमीन तलाशने का सवाल उठेंगे । या फिर यह मान कर चला जायेगा कि अगर धर्म के साथ राष्ट्रवाद का छौक लग गया तो राजनीतिक तौर पर कितनी बडी सफलता बीजेपी को मिल सकती है । और चूंकि राजनीतिक सत्ता में ही सारी ताकत या कहे सिस्टम का हर पूर्जा समाया हुआ बनाया जा रहा है तो विपक्षी राजनीतिक दल हो या सड़क पर नारे लगाते हजारों छात्र या तमाशे की तर्ज पर देश के हालात को देखती आम जनता । हर जहन में रास्ता राजनीतिक ही होगा ।

इससे इतर कोई वैकल्पिक सोच उभर सकती है या सोच पैदा कैसे की जाये यह सवाल 2014 के एतिहासिक जनादेश के आगे सोचेगा नहीं । और दिमाग 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले दिनो की गिनती करने लगेगा । यानी सवाल यह नहीं है कि संघ परिवार अब सक्रिय हो रहा है कि मोदी फेल होते है तो वह फेल ना दिखायी दे । या फिर कांग्रेस हो या अन्य क्षेत्रिय राजनीतिक दल इनकी पहल भी हर मुद्दे का साथ राजनीतिक लाभ को देखते हुये ही नजर आयेगी । हालात इसलिये गंभीर है क्योकि संसद का बजट सत्र ही नहीं बल्कि बीतते वक्त के साथ संसद भी राजनीतिक बिसात पर प्यादा बनेगी और लोकतंत्र के चारो पाये भी राजनीतिक मोहरा बनकर ही काम करेंगे।  इस त्रासदी के राजनीतिक विकल्प खोजने की जरुरत है इससे अब मुंह चुराया भी नहीं जा सकती । क्योंकि इतिहास के पन्नो को पलटेंगे तो मौजूदा वक्त इतिहास पर भारी पड़ता नजर आयेगा और राजद्रोह भी सियासत के लिये राजनीतिक हथियार बनकर ही उभरेगा । क्योंकि इसी दौर में अंरुधति से लेकर विनायक सेन और असीम त्रिवेदी से लेकर उदय कुमार तक पर देशद्रोह के आरोप लगे । पिछले दिनो हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के आरोप लगे । और अब कन्हैया कुमार पर ।

लेकिन उंची अदालत में कोई मामला पहले भी टिक नहीं पाया लेकिन राजनीति खूब हुई । जबिक आजादी के बाद महात्मा गांधी से लेकर नेहरु तक ने राजद्रोह यानी आईपीसी के सेक्शन 124 ए को खत्म करने की खुली वकालत यह कहकर की अंग्रेजों की जरुरत राजद्रोह हो सकती है । लेकिन आजाद भारत में देश के नागरिको पर कैसे राजद्रोह लगाया जा सकता है । बावजूद इसके संसद की सहमति कभी बनी नहीं । यानी देश की संसदीय राजनीति 360 डिग्री में घुम कर उन्ही सवालों के दायरे में जा फंसा है जो सवाल देश के सामने देश को संभालने के लिये आजादी के बाद थे । और इसी कडी 2014 के जनादेश को एक एतिहासिक मोड माना गया ।  इसलिये मौजूदा दौर के हालात में अगर मोदी फेल होते है तो सिर्फ एक पीएम का फेल होना भर इतिहास के पन्नो में दर्ज नहीं होगा बल्कि देश फेल हुआ । दर्ज यह होगा । और यह रास्ता 2019 के चुनाव का इंतजार नहीं करेगा।

-पुण्य प्रसून बाजपेयी

Thursday, February 18, 2016

देश में चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है, ऐसा पक्षपात क्यों, और कैसे ??

 महात्मा गांधी ने अक्तूबर, 1931 में डा. बीआर अंबेडकर के बारे में कहा था, “उनके पास नाराज़ होने, कटु होने की तमाम वजहें हैं. वे हमारा सिर नहीं फोड़ रहे हैं तो ये उनका आत्म संयम है.”

इस बयान से ज़ाहिर है कि अंबेडकर और उनके समुदाय के साथ हुए अत्याचारों की पृष्ठभूमि में उनके द्वारा कटु शब्दों के इस्तेमाल को महात्मा गांधी ग़लत नहीं मानते थे.
बहरहाल, मैं अभी सतारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ एक दूसरे विश्वविद्यालय में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बारे में सोच रहा हूं.
दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफ़ज़ल गुरू की बरसी के मौक़े पर हुई विरोध सभा के मुद्दे पर कुछ छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज कराया गया है.
देशद्रोह “वह अपराध है जिसके तहत कुछ कहने, लिखने और कुछ अन्य काम करने से सरकार की अवज्ञा करने को प्रोत्साहन मिलता है.’’

पूर्वी दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के सांसद महेश गिरी ने इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराई है. उन्होंने अपनी लिखित शिकायत में इन छात्रों को संविधान विरोधी और देशद्रोही तत्व कहा है.

गिरी ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भी ख़त लिखकर, “इस तरह के शर्मनाक और भारत विरोधी गतिविधियों के दोबारा नहीं होने देने के लिए अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की अपील की थी.”

यह हैदराबाद में हुई घटना को दुहराने जैसा लग रहा है, जहां बीजेपी ने याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर सख़्त कार्रवाई की थी. इस मामले का दुखद पहलू ये रहा है कि एक छात्र ने आत्महत्या कर ली.

हालांकि जेएनयू ने कहा कि उसने इस विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और उसने मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है.

लेकिन इस कमेटी में प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. छात्र संघों का कहना है कि जांच कमेटी में उपेक्षित और हाशिए पर रहे समुदायों का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया है.

मेरे ख़्याल से भारतीय जनता पार्टी के सामने इस मामले में विकल्प था, छात्रों पर आरोप लगाने के बदले, उसे इस मुद्दे को समझने की कोशिश करनी चाहिए, जो सीधे जाति से जुड़ा पहलू है.

हैदराबाद में याक़ूब मेमन की फांसी के ख़िलाफ़ दलित क्यों विरोध प्रदर्शन कर रहे थे? जेएनयू में मुस्लिमों पर इतना ध्यान क्यों है?

जब भी किसी कमेटी से जांच कराने की बात होती है तो छात्र हाशिए पर रहे समुदायों के प्रतिनिधियों की बात क्यों करते हैं? हक़ीक़त यही है कि भारत में दलितों और मुस्लिमों को ही सबसे ज़्यादा फांसी की सज़ा दी गई है.

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक़, मृत्युदंड पाने वालों में कुल 75 फ़ीसदी और चरमपंथ को लेकर दी गई फांसी में 93.5 फ़ीसदी सज़ा दलितों और मुस्लिमों को मिली है. ऐसे में पक्षपात का मुद्दा उभरता है.

मालेगांव धमाकों का उदाहरण देते हुए कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि अगर चरमपंथी गतिविधियों में सवर्ण हिंदुओं के शामिल होने का मामला हो तो सरकार सख़्ती नहीं दिखाती है.

बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी देने की जल्दी नहीं है. राजीव गांधी के हत्यारों की सज़ा कम कर उसे उम्रक़ैद में तब्दील कर दिया गया है.

इन लोगों को भी चरमपंथ का दोषी पाया गया था. लेकिन सबको समान क़ानून से कहां आंका जा रहा है?

इन सबमें मायाबेन कोडनानी को छोड़ ही दें, जिन्हें 95 गुजरातियों की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था, लेकिन वे जेल में भी नहीं हैं.

दूसरा मुद्दा आर्थिक है.
दलित और मुस्लिम ग़रीब लोग हैं. अदालत में सुनवाई के दौरान अफ़ज़ल गुरु को लगभग नहीं के बराबर क़ानूनी प्रतिनिधित्व मिल पाया था.

इन वास्तविकताओं को देखते हुए, इसमें बहुत अचरज नहीं होना चाहिए कि दलित, मुस्लिम और उनके समर्थक सरकार का विरोध कर रहे हैं. उन्हें नाराज़ होने का पूरा हक़ है.
सवर्ण इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि हर भारतीय को इस भ्रम में जीना चाहिए कि हम एक पूर्ण समाज हैं और हर किसी को इसके सामने झुकना चाहिए.

हिंदुत्व मध्यम वर्ग और उच्च वर्गों के लिए मसला है. यह आरक्षण से घृणा करता है क्योंकि उसे लगता है कि यह उनको मिल रही सुविधाओं में अतिक्रमण है.

यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण को पसंद नहीं करता और इस मुद्दे पर संघ के बयानों के चलते चुनावों में बीजेपी मुश्किल में आई थी.

प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया भी विपक्ष पर झूठ गढ़ने का आरोप रहा है. लेकिन ज़मीनी सच्चाई बिलकुल साफ़ है.

दलित अपनी आवाज़ उठा रहे हैं और अपने हक़ के लिए खड़े हो रहे हैं. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. अगर उनकी भाषा में असंयम हो तो भी उन्हें अपराधी की तरह से नहीं देखा जा सकता.

सरकार के लिए अहम ये है कि उनसे जुड़े, उनकी बात सुने, उनके तर्क सुने, केवल उनके नारों पर नहीं जाए.

लेख की शुरुआत में मैंने गांधी जी की बुद्धिमता का उदाहरण दिया है. उसकी तुलना हिंदुत्व के नेताओं की पहले हैदाराबाद और फिर दिल्ली में की गई कार्रवाई से करके देखिए.

हमें इस मामले पर परिपक्व समझ दिखाना चाहिए, जब तक सरकार इस दिशा में कोशिश करती भी नहीं दिखेगी तब तक हमें इस बात पर अचरज नहीं होना चाहिए कि अब तक दबे और पीड़ित रहे लोग सरकार की अवज्ञा के लिए प्रोत्साहित करने वाले काम करते रहेंगे.

Saturday, February 13, 2016

एक बार फिर से पूरे देश ने देख लिया मीडिया आरएसएस की मिलीभगत को

 आरएसएस की मीडिया और जनता का जेएनयू
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में कथित तौर पर अफज़ल गुरु की शहादत दिवस मनाने और कश्मीर की आज़ादी के लिए भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले छात्रों के एक गुट के बहाने देश की मीडिया जनवादी रुख वाले छात्रों को जिस तरह से परेशान कर रही है उससे यह साबित होता है की पत्रकारिता अब सच और ईमानदार का साथी के बजाए सत्ता और कट्टरता के पुजारियों की हो गई है. 
इण्डिया न्यूज़ के दीपक चौरसिया तथा ज़ी न्यूज़ के रोहित सरदाना ने जेएनयू मुद्दे को लेकर जैसा रुख अख्तियार किया है वह साफ़ तौर पर यह दर्शाता है की इन दोनों चैनलों के मालिक और उसके एंकर-रिपोर्टर पूरी तरह से नागपुर के इशारों पर काम कर रहे हैं.

रोहित सरदाना के साथ पैनल डिस्कसन में दिल्ली विवि के छात्र उमर खालिद एवं दीपक चौरसिया के साथ बहस में शामिल जवाहर लाल नेहरु विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष कनैह्या कुमार से इन दोनों एंकर ने जैसा व्यवहार किया बिलकुल वैसा व्यवहार एबीवीपी के गुंडे किया करते हैं. 

हैदराबाद विवि के दलित रिसर्च स्कालर डॉ रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या में शामिल एबीवीपी, केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, स्मृति ईरानी की आज तक गिरफ्तारी नहीं हुई परन्तु जेएनयू में सांस्कृतिक संध्या आयोजित करने के अपराध में दिल्ली पुलिस ने छात्रसंघ अध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया. 

इस गिरफ्तारी के लिए रोहित सरदाना और दीपक चौरसिया लगातार दबाव बनाए हुए थे. पैनल डिस्कसन जिसे घेर कर प्रताड़ित करना कहना ज्यादा ठीक रहेगा में रोहित सरदाना और दीपक चौरसिया ने उमर खालिद और कन्हैया कुमार पर देशद्रोही और आतंकी का समर्थक तक कहा जबकि दोनों छात्र नेताओं ने देशद्रोह से इंकार किया और उस छात्र समूह जिसने जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी की थी की निंदा की. 

निंदा के साथ उनके कुछ बुनियादी सवाल भी थे जिसे सुनने की हिम्मत वर्तमान में मीडिया के पास नहीं. कन्हैया को बिल्कुल जान से मार देने को उतावले दीपक चौरसिया ने जब कन्हैया को कश्मीरी पंडित के मामले में उलझा कर निरुत्तर करना चाहा तो उसने दो गुने तर्क से चौरसिया को चुप करा दिया, कन्हैया को जब चौरसिया ने मकबूल भट्ट की हिंसक वारदातों में लपेटना चाहा और कहा तब आप पैदा भी नहीं हुए थे तो कन्हैया ने चौरसिया को बोला देश जब आज़ाद हुआ था तब आप नहीं पैदा हुए थे इसका अर्थ यह नहीं है की आप देश की आजादी पर बात नहीं कर सकते. 

एबीवीपी के छात्र नेता के उकसाने पर दीपक चौरसिया ने कन्हैया से भारत माता की जय बोलने के लिए डांटते हुए कहा तो कन्हैया ने भारत की तमाम माताओं, पिताओं, बहनों, मजदूरों, दलितों, मुसलमनों की जय कर दी तो दीपक हत्थे से उखड़ गए.
  
जिंदल प्रकरण में जिस चैनल का मालिक जमानत लिया हो, जिसका एंकर तिहाड़ जेल में दिन रात गुजार चुका हो उस जी न्यूज़ के एंकर रोहित सरदाना से उमर खालिद की मुठभेड़ होती है. सरदाना कहते हैं, पांच सौ करोड़ रुपये की सब्सिडी सरकार देती है जेएनयू को, आप मुफ्त की रोटी तोड़ने जाते हैं, आतंकियों का समर्थन करते हैं तो उमर खालिद ने कहा वह टैक्स सिर्फ आपका नहीं है. वह टैक्स हमारा भी है. क्या कभी आपने सवाल किया कि आर एस एस जिस तरह से संसाधनों पर कब्ज़ा कर रही है, हमारे टैक्स का इस्तेमाल गुंडागर्दी और कट्टरता फैलाने के लिए कर रही है उससे सवाल किया जाएगा तो हम भी जवाब देने को तैयार हैं. 

अफज़ल गुरु की न्यायिक हत्या पर उमर खालिद से लेकर कन्हैया कुमार तक ने जजमेंट को कोट किया कि सबूत तो कुछ नहीं है पर देश की सामूहिक भावना इनकी फांसी पर आ कर रूकती है इसलिए फांसी ज़रूरी हो जाती है. बगैर सबूत किसी को फांसी पर लटका देंगे और सवाल उठेगा तो देशद्रोही कह देंगे. 

आज देश की मीडिया में दीपक चौरसिया और रोहित सरदाना जैसे तमाम पत्रकार और एंकर आरएसएस की ब्राह्मणवादी विचारधारा जिसमें दलितों/पिछड़ों/मुसलमानों/औरतों के लिए कोई जगह नहीं है के लिए जनवाद के पेड़ जेएनयू को काट देना चाहते हैं. इतनी हताशा और पागलपन टीवी पर करोड़ो दर्शक देख रहे हैं. जेएनयू और दिल्ली विवि के जनवादी छात्र नेताओं से टीवी स्टूडियो भरा पड़ा है ,पहली बार ऐसी बहसें सुनने और देखने को मिल रही हैं जिसमे भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा पूरी तरह से सामने आया है. 

ज़ी न्यूज़ के मालिक सुभाष चन्द्र हिसार से भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी रहे और चुनाव हार गए. दीपक चौरसिया और रोहित सरदाना का देशप्रेम एक विचारधारा विशेष की सीमाओं तक जा कर दम तोड़ देता है. आर एस एस की शाबाशी पा कर हिन्दू महासभा ने गणतंत्र दिवस को काला दिवस मनाया, न तो रोहित सरदाना और न ही दीपक चौरसिया ने सवाल उठाये. 

बीजेपी और एबीवीपी की विचारधारा से मेल खाते हुए लोग नाथूराम गोडसे की उस पिस्टल की पूजा करते हैं जिससे महात्मा गांधी की हत्या हुई, न तो इण्डिया न्यूज़ को देशद्रोह दिखा और न ही ज़ी न्यूज़ को. 

तो क्या लगता है, दर्शक इतनी मूर्ख है की वह आपकी एजेंडा सेटिंग के झांसे में आ जाएगा, हरगिज़ नहीं. इसका जीता जागता उदहारण है फेसबुक के फ्री बेसिक पर रोक. फेसबुक ने लोगों को कई तरह से बरगलाने की कोशिश की परन्तु जागरूक जनता ने उसके प्रपंच को पहचाना और अंत में जो फेसबुक नरेंद्र मोदी के साथ भारत के शान में कसीदे पढ़ रहा था उसी ने कह दिया की अंग्रेज होते भारत के मालिक तो फेसबुक का फ्री बेसिक प्लान यहाँ लागू हो जाता. इस बयान के बाद आपत्ति जताई गयी तो सम्बंधित अधिकारी को इस्तीफा देना पड़ा.

भारतीय मीडिया में ऊँची जाति के पुरुष बैठे हुए हैं. उनका एकसूत्रीय एजेंडा है देश रोहित वेमुला की शहादत को भूल जाए और पूरा मसला उस पाकिस्तान और कश्मीर के इर्द गिर्द आ सिमटे जिस पाकिस्तान में नरेंद्र मोदी बिरयानी खाने गए और जिस कश्मीर में अलगाववादियों के समर्थन में रहने वाली पीडीपी के साथ आर एस एस ने सरकार बनाई.

जेएनयू का जनवाद एक बार फिर से पूरे देश ने देख लिया और देख लिया इलेक्ट्रानिक मीडिया के उन एंकरों को भी जिनकी सुबह और शाम दिल्ली में आरएसएस दफ्तर झंडेवालान में गुजरती है.
-मोहम्मद अनस