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Saturday, February 13, 2016

एक बार फिर से पूरे देश ने देख लिया मीडिया आरएसएस की मिलीभगत को

 आरएसएस की मीडिया और जनता का जेएनयू
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में कथित तौर पर अफज़ल गुरु की शहादत दिवस मनाने और कश्मीर की आज़ादी के लिए भारत की बर्बादी के नारे लगाने वाले छात्रों के एक गुट के बहाने देश की मीडिया जनवादी रुख वाले छात्रों को जिस तरह से परेशान कर रही है उससे यह साबित होता है की पत्रकारिता अब सच और ईमानदार का साथी के बजाए सत्ता और कट्टरता के पुजारियों की हो गई है. 
इण्डिया न्यूज़ के दीपक चौरसिया तथा ज़ी न्यूज़ के रोहित सरदाना ने जेएनयू मुद्दे को लेकर जैसा रुख अख्तियार किया है वह साफ़ तौर पर यह दर्शाता है की इन दोनों चैनलों के मालिक और उसके एंकर-रिपोर्टर पूरी तरह से नागपुर के इशारों पर काम कर रहे हैं.

रोहित सरदाना के साथ पैनल डिस्कसन में दिल्ली विवि के छात्र उमर खालिद एवं दीपक चौरसिया के साथ बहस में शामिल जवाहर लाल नेहरु विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष कनैह्या कुमार से इन दोनों एंकर ने जैसा व्यवहार किया बिलकुल वैसा व्यवहार एबीवीपी के गुंडे किया करते हैं. 

हैदराबाद विवि के दलित रिसर्च स्कालर डॉ रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या में शामिल एबीवीपी, केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, स्मृति ईरानी की आज तक गिरफ्तारी नहीं हुई परन्तु जेएनयू में सांस्कृतिक संध्या आयोजित करने के अपराध में दिल्ली पुलिस ने छात्रसंघ अध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया. 

इस गिरफ्तारी के लिए रोहित सरदाना और दीपक चौरसिया लगातार दबाव बनाए हुए थे. पैनल डिस्कसन जिसे घेर कर प्रताड़ित करना कहना ज्यादा ठीक रहेगा में रोहित सरदाना और दीपक चौरसिया ने उमर खालिद और कन्हैया कुमार पर देशद्रोही और आतंकी का समर्थक तक कहा जबकि दोनों छात्र नेताओं ने देशद्रोह से इंकार किया और उस छात्र समूह जिसने जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी की थी की निंदा की. 

निंदा के साथ उनके कुछ बुनियादी सवाल भी थे जिसे सुनने की हिम्मत वर्तमान में मीडिया के पास नहीं. कन्हैया को बिल्कुल जान से मार देने को उतावले दीपक चौरसिया ने जब कन्हैया को कश्मीरी पंडित के मामले में उलझा कर निरुत्तर करना चाहा तो उसने दो गुने तर्क से चौरसिया को चुप करा दिया, कन्हैया को जब चौरसिया ने मकबूल भट्ट की हिंसक वारदातों में लपेटना चाहा और कहा तब आप पैदा भी नहीं हुए थे तो कन्हैया ने चौरसिया को बोला देश जब आज़ाद हुआ था तब आप नहीं पैदा हुए थे इसका अर्थ यह नहीं है की आप देश की आजादी पर बात नहीं कर सकते. 

एबीवीपी के छात्र नेता के उकसाने पर दीपक चौरसिया ने कन्हैया से भारत माता की जय बोलने के लिए डांटते हुए कहा तो कन्हैया ने भारत की तमाम माताओं, पिताओं, बहनों, मजदूरों, दलितों, मुसलमनों की जय कर दी तो दीपक हत्थे से उखड़ गए.
  
जिंदल प्रकरण में जिस चैनल का मालिक जमानत लिया हो, जिसका एंकर तिहाड़ जेल में दिन रात गुजार चुका हो उस जी न्यूज़ के एंकर रोहित सरदाना से उमर खालिद की मुठभेड़ होती है. सरदाना कहते हैं, पांच सौ करोड़ रुपये की सब्सिडी सरकार देती है जेएनयू को, आप मुफ्त की रोटी तोड़ने जाते हैं, आतंकियों का समर्थन करते हैं तो उमर खालिद ने कहा वह टैक्स सिर्फ आपका नहीं है. वह टैक्स हमारा भी है. क्या कभी आपने सवाल किया कि आर एस एस जिस तरह से संसाधनों पर कब्ज़ा कर रही है, हमारे टैक्स का इस्तेमाल गुंडागर्दी और कट्टरता फैलाने के लिए कर रही है उससे सवाल किया जाएगा तो हम भी जवाब देने को तैयार हैं. 

अफज़ल गुरु की न्यायिक हत्या पर उमर खालिद से लेकर कन्हैया कुमार तक ने जजमेंट को कोट किया कि सबूत तो कुछ नहीं है पर देश की सामूहिक भावना इनकी फांसी पर आ कर रूकती है इसलिए फांसी ज़रूरी हो जाती है. बगैर सबूत किसी को फांसी पर लटका देंगे और सवाल उठेगा तो देशद्रोही कह देंगे. 

आज देश की मीडिया में दीपक चौरसिया और रोहित सरदाना जैसे तमाम पत्रकार और एंकर आरएसएस की ब्राह्मणवादी विचारधारा जिसमें दलितों/पिछड़ों/मुसलमानों/औरतों के लिए कोई जगह नहीं है के लिए जनवाद के पेड़ जेएनयू को काट देना चाहते हैं. इतनी हताशा और पागलपन टीवी पर करोड़ो दर्शक देख रहे हैं. जेएनयू और दिल्ली विवि के जनवादी छात्र नेताओं से टीवी स्टूडियो भरा पड़ा है ,पहली बार ऐसी बहसें सुनने और देखने को मिल रही हैं जिसमे भारतीय टेलीविजन न्यूज़ का चेहरा पूरी तरह से सामने आया है. 

ज़ी न्यूज़ के मालिक सुभाष चन्द्र हिसार से भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी रहे और चुनाव हार गए. दीपक चौरसिया और रोहित सरदाना का देशप्रेम एक विचारधारा विशेष की सीमाओं तक जा कर दम तोड़ देता है. आर एस एस की शाबाशी पा कर हिन्दू महासभा ने गणतंत्र दिवस को काला दिवस मनाया, न तो रोहित सरदाना और न ही दीपक चौरसिया ने सवाल उठाये. 

बीजेपी और एबीवीपी की विचारधारा से मेल खाते हुए लोग नाथूराम गोडसे की उस पिस्टल की पूजा करते हैं जिससे महात्मा गांधी की हत्या हुई, न तो इण्डिया न्यूज़ को देशद्रोह दिखा और न ही ज़ी न्यूज़ को. 

तो क्या लगता है, दर्शक इतनी मूर्ख है की वह आपकी एजेंडा सेटिंग के झांसे में आ जाएगा, हरगिज़ नहीं. इसका जीता जागता उदहारण है फेसबुक के फ्री बेसिक पर रोक. फेसबुक ने लोगों को कई तरह से बरगलाने की कोशिश की परन्तु जागरूक जनता ने उसके प्रपंच को पहचाना और अंत में जो फेसबुक नरेंद्र मोदी के साथ भारत के शान में कसीदे पढ़ रहा था उसी ने कह दिया की अंग्रेज होते भारत के मालिक तो फेसबुक का फ्री बेसिक प्लान यहाँ लागू हो जाता. इस बयान के बाद आपत्ति जताई गयी तो सम्बंधित अधिकारी को इस्तीफा देना पड़ा.

भारतीय मीडिया में ऊँची जाति के पुरुष बैठे हुए हैं. उनका एकसूत्रीय एजेंडा है देश रोहित वेमुला की शहादत को भूल जाए और पूरा मसला उस पाकिस्तान और कश्मीर के इर्द गिर्द आ सिमटे जिस पाकिस्तान में नरेंद्र मोदी बिरयानी खाने गए और जिस कश्मीर में अलगाववादियों के समर्थन में रहने वाली पीडीपी के साथ आर एस एस ने सरकार बनाई.

जेएनयू का जनवाद एक बार फिर से पूरे देश ने देख लिया और देख लिया इलेक्ट्रानिक मीडिया के उन एंकरों को भी जिनकी सुबह और शाम दिल्ली में आरएसएस दफ्तर झंडेवालान में गुजरती है.
-मोहम्मद अनस

Sunday, December 06, 2015

समाज पाखंडी होगा, तो तमाम संस्थाएं भी पाखंडी ही होंगी

Friday, July 31, 2015

याकूब हमारा हीरो नहीं राज्य प्रायोजित दंगों के खिलाफ एक प्रतीक है - अनस


याकूब हमारा हीरो नहीं राज्य प्रायोजित दंगों के खिलाफ एक प्रतीक है याकूब मेमन के बहाने सोशल मीडिया पर पिछले तीन चार दिनों से तर्क कुतर्क गाली गलौच का जो दौर चल रहा है उसके बीच में मुझे फेसबुक ने 24 घंटे के लिए ब्लाक कर दिया. अब न तो मैं अपने फेसबुक वाल पर कुछ लिख सकता हूँ न तो किसी दूसरे के लिखे का जवाब दे सकता हूँ.

मैंने परसों अपनी एक पोस्ट में लिखा था की ‘याकूब मेमन हमारे दिलों में जिंदा रहेगा, वह अन्याय के खिलाफ प्रतीक के तौर पर पहचाना जाएगा.’ जब मैंने यह लिखा था तब मैंने यह बिलकुल नहीं लिखा था कि ‘मुसलमान याकूब मेमन को मुसलमानों के खिलाफ हो रहे सरकारी अत्याचार के विरूद्ध प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दिया जाए.’ लेकिन मुझमें खोज खोज कर फिरकापरस्ती तलाश करने वाले लोगों ने यह समझा कि 900 लोगों की सरकारी ह्त्या के बदले के स्वरुप किये गए बम ब्लास्ट में मैं याकूब मेमन को मुसलमानों का हीरो बनाना चाहता हूँ.

कोई मुसलमान अपने ऊपर हुए अत्याचार और नाइंसाफी की लड़ाई लड़ने के बाद फूलन देवी जैसी स्वीकार्यता क्यों नहीं प्राप्त कर पाता. क्यों किसी मुसलमान को उसके कौम के भरोसे और सहारे छोड़ दिया जाता है. एपीजे अब्दुल कलाम की विरासत पर सबने अपना हक़ जताया तो याकूब मेमन और उसके परिवार के लोगों द्वारा लिए गए प्रतिशोध के पक्ष में हम क्यों नहीं खड़े हुए?

मुझे पता है यह बेहद बचकाना सवाल है क्योंकि याकूब और उसके परिवार ने 250 से ज्यादा लोगों की जान ली थी, हो सकता है जो लोग मारे गए उनमें से कुछ दंगों में शामिल रहे हों लेकिन ऐसे बहुत रहे होंगे जो मासूम और बेकसूर थे. इनकी हत्याओं और बम्बई ब्लास्ट को कभी भी जस्टिफाय नहीं किया जा सकता. लेकिन, अहम पहलू इसमें यह आता है कि बम ब्लास्ट न होता तो बम्बई में अब तक कितने दंगे हो चुके होते ? श्री कृष्ण जांच कमीशन भी यह कहता है कि ब्लास्ट के बाद सरकार और प्रशासन के अलावा राजनीतिक गुंडागर्दी जो मुसलमानों के खिलाफ हुआ करती थी उसमें कमी आई है. उसने यह नहीं लिखा है कि हिन्दुओं और मुसलमानों में दूरियां बढ़ी है. क्या आप उन्हें हिन्दू मानते हैं जिन्होंने बेवजह गरीब मुसलमानों,औरतों,बुजुर्गों और बच्चों को जिंदा जला डाला. क्या आप उन्हें अपने जैसा मानते हैं? अगर नहीं तो फिर हिन्दू बनाम मुसलमान क्यों बना रहे हैं मुद्दे को. क्रूरतम हिंसा की हदे लांघने वालों की इतनी फ़िक्र क्यों कर रहे हैं? कहीं सरकार और राजनीतिक पार्टियाँ आपको मोहरा तो नहीं बना रही है याकूब मामलें में, शायद बना चुकी हैं.

याकूब और उसके परिवार ने बंबई को पहले तबाह नहीं किया था,उन पर शिव सेना और अन्य राजनीतिक दलों ने यह तबाही थोपी थी. मुख्यधारा की मीडिया और विमर्श करने वालों के बीच से बंबई दंगे नदारद हैं, बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद देश भर में सुनियोजित मुस्लिम नरसंहार पर कोई चर्चा नहीं हो रही है. न्यायपालिका को आश्वासन दे कर उसका भरोसा तोड़ा गया था, कहा तो यह भी जाता है कि बाबरी विध्वंस के वक्त पूरा देश एक तरफ था और मुसलमान एवं वामपंथी एक तरफ. क्या बहुजन और क्या सवर्ण, हर किसी के भीतर मुसलमानों के खिलाफ नफरत भर दी गई थी और फिर धीरे धीरे जिन लोगों ने बाबरी गिराई और कत्लेआम किये उनकी सच्चाई सामने आने लगी तो लोग खुद ही उनका साथ छोड़ कर भागने लगे. लेकिन नहीं बदला हाल मुसलमानों पर अत्याचार का. राजनीतिक रूप से उन्हें डिबार कर दिया गया है वरना क्यों न कोई पार्टी या राज्य अपने स्तर से राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के हत्यारे को बचाने के जैसा कोई बिल याकूब मेमन के लिए भी पास करती.

हर मोर्चे पर अकेले मुसलामानों के लिए लोग कहते हैं की उनका तुष्टिकरण होता है, उन्हें ज्यादा अवसर दिए जाते हैं, वो हिंसक होते हैं, इनका धर्म भारत देश को ख़त्म कर देगा. बताइए, हर रोज़ पिटते हैं मुसलमान और उन्ही का डर भी दिखाया जाता है. कहीं और होता है दुनिया में ऐसा ? दंगें हों तो उसमे मारे जाते हैं,दंगे के बाद बर्बादी में रहते हैं. जो दंगों से बच गए वे कई तरह के भेदभाव और शक से गुजरते हैं. ये भी कोई जीना है महराज? भारत के मुसलमान तो बहुत पीछे हैं हिंसा और अराजकता में, सरकारों द्वारा उनका दमन किया गया है कि वे कभी सोच भी नहीं पाते की खून का बदला खून से ले लें. मेमन परिवार ने लिया और उसकी सज़ा भोग ली. 

जो भी मुसलमान प्रायोजित हिंसा के खिलाफ कभी हिंसक होना चाहेगा उसे मैं पहले से बता दूं की ऐसा वह कभी नहीं करेगा क्योंकि उसके बाद उसे न तो हिन्दुओं की तरह राजनीतिक शाबाशी मिलेगी और न तो अदालत से जमानत. हिंसा के रास्ते पर गया मुसलमान, भारतीय कानून के लिए सबसे आसान मुजरिम होगा जिसके गले में सुबह के सात बजे फांसी का फंदा डाल दिया जाएगा. इसलिए किसी भी तरह की हिंसा हो, दंगा हो,फर्जी मुठभेड़ हो खुद के हाथ पैर बाँध, मुंह सिल एक किनारे बैठ जाने में ही भलाई है क्योंकि आप के लिए प्रतिशोध स्वरुप या फिर आत्मरक्षा जैसे शब्द प्रतिबंधित हैं और होने भी चाहिए. प्रतिशोध सिर्फ नक्सली ले सकते हैं और उन्हें जस्टिफाय करने वाले ब्राह्मण वामपंथी,आपकी हिंसा पर सैकड़ों सवाल एवं लानत भेजने को बैठे हुए हैं.
एक अच्छी और प्यारी सोसायटी में इन बकवास और बुरे शब्दों या क्रियाओं का भला क्या काम? आप पिटते रहिए, समाज की रंगाई पोताई चलती रहेगी जिस रोज़ आपने पीटने वाले को पीटा उस रोज़ आप समाज के लिए सबसे बड़े ‘थ्रेट’ के तौर पर पहचाने जाएंगे.

सरकार की मिलीभगत से सुनियोजित दंगों से खुद का बचाव करना भी यदि अपराध है तो याकूब मेमन इस दुनिया का सबसे दुर्दांत और खूंख्वार इंसान था जिसका मर जाना ही सबसे अच्छी बात है. न्यायपालिका में पूरा यकीन जताते हुए मैं सुप्रीम कोर्ट के जज अनिल आर दवे साहब के उस कथन से सहमत हूँ जिसे उन्होंने मनुस्मृति से निकाला था कि, ‘राजा यदि आँखें लाल करके सजा नहीं देगा तो पूरा पाप राजा पर आएगा.’ लोकतंत्र बचा ही कहाँ है? राजतंत्र है तो फैसले भी उसी तरह से आएंगे.

दवे साहब वहीँ हैं जिन्होंने कहा था यदि मैं तानाशाह होता तो पहली कक्षा से बच्चों को गीता पढ़वाता. खैर, याकूब मर गया क्योंकि उसे मरना था. उसने उस अपराध में शायद हिस्सेदारी निभाई थी जिसे अंजाम उसके भाई ने दिया था. हम उसे किस रूप में याद रखें यह हमारे विवेक पर निर्भर करने से अधिक परिस्थितियों पर निर्भर ज्यादा करती हैं. बहुसंख्यक चेतना को संतुष्ट करने के लिए या फिर यूं कहें किसी मुसलमान की सस्ती जान से बहे खून से बहुसंख्यक आबादी की प्यास बुझाने के लिए कोई भी फैसला न्यायलय लेता है तो मैं उसके समर्थन में रहूँगा. इस देश में अन्याय रत्ती भर नहीं होता जिन्हें ऐसा लगता है वे सब याकूब मेमन को सुनियोजित सरकारी दंगों के विरोध का प्रतीक मान लें या फिर पाकिस्तान चले जाए. देशद्रोशी कहीं के.

इस हिंसा प्रतिहिंसा के बीच मैं याक़ूब के उस पहलू को उसके साथ दफ्न करने की अपील सबसे करना चाहता हूं जिसमें बंबई ब्लॉस्ट और उसमें मारे गए बेकसूर लोगों का जिक्र आता है। मैं याक़ूब मेमन के साथ उसके उस पक्ष को फांसी पर लटका देने की सलाह सबको देता हूं जिसकी वजह से उसने और उसके परिवार ने बंबई में ब्लास्ट करवाए। और मैं उस याकूब को जिंदा रखने की अपील करता हूं जिसने अपने दोस्त चेतन मेहता के साथ ‘मेहता एंड मेमन’ नाम से फर्म की शुरूआत की थी। उस मेमन को बचाए रखने को कहूंगा जिसने जेल में रहते हुए डबल एम ए किया और उस मेमन को बचाए रखने की पूरी कोशिश करूंगा जिसने भारत और भारतीय कानून में पूरा भरोसा जताते हुए अपने परिवार के साथ पाकिस्तान से वापस मातृभूमि तक चला आया। आप उसके बुरे पहलुओं को हीरों कभी न बनाना, अपराधी तो वह था ही, हमें अपराध से घृणा होनी चाहिए अपराधी से नहीं। इन सबके अतिरिक्त मैं फांसी जैसे मनुकालीन सज़ा पर रोक की मांग करता हूं। साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित समेत उनके लिए भी जिनके ऊपर गुजरात रचने की साजिश का आरोप है। मेमन मेरा हीरो नहीं, उसके हीरोइज्म को मुझ पर मत थोपिए।

Tuesday, July 15, 2014

पहले गोडसे को नकारा - अब वैदिक को


महात्मा गाँधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने नाथूराम गोडसे से अपने संबंधों से इनकार कर दिया था  और तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को माफीनामा लिख कर अपने संगठन के ऊपर से प्रतिबन्ध हटवाया था कि वह सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करेगा राजनीति से उसका सम्बन्ध नहीं रहेगा. प्रतिबन्ध हटने के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने "गाँधी वध क्यों" किताब को अपने स्टालों से बेचना प्रारंभ कर दिया था और गाँधी वध को सही ठहराने का प्रयास आज भी जारी है. वध शब्द का अर्थ अच्छे कृत्य के रूप में लिखा जाता है जबकि गाँधी की हत्या की गयी थी.

आज जब डॉ वेद प्रताप वैदिक ने जाकर हाफिज सईद से मुलाकात की और फिर कश्मीर को स्वतन्त्र मुल्क घोषित करने की वकालत की और पाकिस्तान के न्यूज चैनल डॉन न्यूज को दिए वैदिक का इंटरव्यू भी सामने आ गया, जिसमें एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि अगर भारत और पाकिस्तान राजी हों तो कश्मीर की आजादी में कोई हर्ज नहीं है। अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अगर दोनों तरफ के कश्मीरी तैयार हो और दोनों देश भी तैयार हो तो आजाद कश्मीर बनाने में कोई बुराई नहीं है। वैदिक ने आगे कहा कि गुलाम कश्मीर और आज़ाद कश्मीर से दोनों से सेना हटनी चाहिए, दोनों की एक विधानसभा हो, एक मुख्यमंत्री हो, एक गवर्नर होयही बात अमरीका व सी आई ए  भी चाहता है ,तो आरएसएस से बीजेपी में गए राम माधव ने भी साफ किया है कि वैदिक संघ से नहीं जुड़े हैं। संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने भी सफाई देते हुए कहा कि वैदिक हमारे साथ जुड़े नहीं हैं। इन बातों से संघ की गिरगिट जैसी चालों का पर्दाफाश होता है. जबकि वास्तविकता ये है कि डॉ वेद प्रताप वैदिक बीजेपी सरकार बनवाने के लिए कार्य कर रहे थे. डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने कहा है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में उनका भी योगदान है।

संघ कभी भी नेहरु या गाँधी के योगदान को नहीं मानता है और आजादी के बाद से ही नेहरु और गाँधी की चरित्र हत्या सम्बंधित समाचार, आलेख प्रकाशित करता रहता है और जब जरूरत होती है तो उसी गाँधी और नेहरु की कसम भी खाता है. संघ का प्रेरणा श्रोत्र हिटलर और मुसोलिनी है और वर्तमान में सबसे प्रिय राष्ट्र इजराइल व अमेरिका है. आज संघी ताकतें खामोश हैं अगर हाफिज सईद से किसी अन्य व्यक्ति ने मुलाकात कर ली होती तो देशद्रोही का प्रमाणपत्र यह लोग जारी कर रहे होते और कश्मीर पर आये हुए डॉ वैदिक के साक्षात्कार को लेकर पूरे देश में पुतला दहन कर रहे होते. आज उनकी असली सूरत दिखाई दे रही है. आजादी की लड़ाई में एक भी संघी जेल नहीं गया था. उसके बाद भी सबसे बड़े देशप्रेमी व देशभक्त का प्रमाणपत्र स्वयं के लिए जारी करते रहते हैं और दुसरे लोगों को देशद्रोही बात-बात में कहना इनकी आदत का एक हिस्सा है.

रंगा सियार शेर नहीं हो सकता है  लेकिन शेर बनने की कोशिश जरूर करता है.
-रणधीर सिंह 'सुमन' 

Thursday, August 15, 2013

एक 'देशद्रोही' ने कैसे मनाया स्‍वतंत्रता दिवस (Independence Day)


यह लेख आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लिखा गया था। लेकिन यह आज भी उतना ही सही है जितना तब था और शायद तब तक रहेगा जब तक हालात नहीं बदलते। 
नीरेंद्र नागर 
कितना अच्छा दिन है आज। हम अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति के साठ साल का जश्न मना रहे हैं। लाल किले से लेकर स्कूल-कॉलेजों में और मुहल्लों से लेकर अपार्टमेंटों तक में तिरंगा फहराया जा रहा हैबच्चों में मिठाइयां बांटी जा रही हैं। मेरे अपार्टमेंट में भी देशभक्ति से भरे गाने बज रहे हैं और मैंने उस शोर से बचने के लिए अपने फ्लैट के सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं। मैं नीचे झंडा फहराने के कार्यक्रम में भी नहीं जा रहा जहां अपार्टमेंट के सारे लोग प्रेज़िडेंट साहब और लोकल नेताजी का भाषण सुनने के लिए जमा हो रहे हैं। मैं इस छुट्टी का आनंद लेते हुए घर में बैठा बेटी के साथ टॉम ऐंड जेरी देख रहा हूं। 
आप मुझे देशद्रोही कह सकते हैं। कह सकते हैं कि मुझे देश से प्यार नहीं है। मुझपर जूते-चप्पल फेंक सकते हैं। कोई ज़्यादा ही देशभक्त मुझपर पाकिस्तानी होने का आरोप भी लगा सकता है। 
मैं मानता हूं कि मेरा यह काम शर्मनाक हैलेकिन मैं क्या करूं..?? मैं जानता हूं कि जब मैं नीचे जाऊंगा और लोगों को बड़ी-बड़ी देशभक्तिपूर्ण बातें बोलते हुए देखूंगा तो मुझसे रहा नहीं जाएगा। वहां हमारे लोकल एमएलए होंगे जिनके भ्रष्टाचार के किस्से उनकी विशाल कोठी और बाहर लगीं चार-पांच कारें खोलती हैंवह हमारे बच्चों को गांधीजी के त्याग और बलिदान की बात बताएंगे। वहां हमारे सेक्रेटरी साहब होंगे जिन्होंने मकान बनते समय लाखों का घपला किया और आज तक जबरदस्ती सेक्रेटरी बने हुए हैंवह देश के लिए कुर्बानी देनेवाले शहीदों की याद में आंसू बहाएंगे। वहां अपार्टमेंट के वे तमाम सदस्य होंगे जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एक्स्ट्रा कमरे बनवा लिए हैंऔर कॉमन जगह दखल कर ली हैऐसे भी कई होंगे जिन्होंने बिजली के मीटर रुकवा दिए हैं। ये सारे लोग वहां तालियां बजाएंगे कि आज हम आज़ाद हैं। 

क्या करूं अगर मुझे ऐसे लोगों को देशभक्ति की बात करते देख गुस्सा आ जाता है। इसलिए मैंने फैसला कर लिया है कि मैं वहां जाऊं ही नहीं। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं उनसे बच नहीं पाऊंगा। ये सारे लोग आज आज़ादी का जश्न मनाने के बाद कल शहर की सड़कों पर निकलेंगे और हर गलीहर चौराहेहर दफ्तरहर रेस्तरां में होंगे। मैं उनसे बचकर कहां जाऊंगा..?? 

कल 16 अगस्त को जब मैं ऑफिस के लिए निकलूंगा और देखूंगा कि टंकी में तेल नहीं है तो मेरी पहली चिंता यही होगी कि तेल कहां से भराऊंक्योंकि ज़्यादातर पेट्रोल पंपों में मिलावटी तेल मिलता है (पेट्रोल पंप का वह मालिक भी आज आज़ादी का जश्न मना रहा होगाअगर वह खुद नेता होगा तो शायद भाषण भी दे रहा होगा)। खैरअपने एक विश्वसनीय पेट्रोल पंप तक मेरी गाड़ी चल ही जाएगीइस भरोसे के साथ मैं आगे बढ़ूंगा और चौराहे की लाल बत्ती पर रुकूंगा। रुकते ही सुनूंगा मेरे पीछे वाली गाड़ी का हॉर्न, जिसका ड्राइवर इसलिए मुझपर बिगड़ रहा होगा कि मैं लाल बत्ती पर क्यों रुक रहा हूं। मेरे आसपास की सारी गाड़ियांरिक्शेबस सब लाल बत्ती को अनदेखा करते हुए आगे बढ़ जाएंगेक्योंकि चौराहे पर कोई पुलिसवाला नहीं है। मैं एक देशद्रोही नागरिक जो आज आज़ादी के समारोह में नहीं जा रहाकल उस चौराहे पर भी अकेला पड़ जाऊंगाजबकि सारे देशभक्त अपनी मंज़िल की ओर बढ़ जाएंगे। 

अगले चौराहे पर पुलिसवाला मौजूद होगाइसलिए कुछ गाड़ियां लाल बत्ती पर रुकेंगी। लेकिन बसवाला नहीं। उसे पुलिसवाले का डर नहींक्योंकि या तो वह खुद उसी पुलिसवाले को हफ्ता देता हैया फिर बस का मालिक खुद पुलिसवाला हैया कोई नेता है। नेताओंपुलिसवालों और पैसेवालों के लिए इस आज़ाद देश में कानून न मानने की आज़ादी है। मैं देखूंगा कि मेरे बराबर में ही एक देशभक्त पुलिसवाला बिना हेल्मेट लगाए बाइक पर सवार हैलेकिन मैं उसे टोकने का खतरा नहीं मोल ले सकताक्योंकि वह किसी भी बहाने मुझे रोक सकता हैमेरी पिटाई कर सकता हैमुझे गिरफ्तार कर सकता है। आप मुझे बचाने के लिए भी नहीं आएंगे क्योंकि मैं ठहरा देशद्रोही जो आज आज़ादी का जश्न मनाने के बजाय कार्टून चैनल देख रहा है। 

आगे चलते हुए मैं उन इलाकों से गुज़रूंगा जहां लोगों ने सड़कों पर घर बना दिए हैंलेकिन उन घरों को तोड़ने की हिम्मत किसी को नहीं हैक्योंकि वे वोट देते हैं। वोट बेचकर वे सड़क को घेर लेने की आज़ादी खरीदते हैंऔर वोट खरीदकर ये एमएलए-एमपी विधानसभा और संसद में पहुंचते हैं जहां एक तरफ उन्हें कानून बनाने का कानूनी अधिकार मिल जाता हैदूसरी तरफ कानून तोड़ने का गैरकानूनी अधिकार भी। कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता। इसलिए वे अपने वोटरों से कहते हैंरूल्स आर फॉर फूल्स। मैं भी कानून तोड़ता हूंतुम भी तोड़ो। मस्त रहोबस मुझे वोट देते रहोमैं तुम्हें बचाता रहूंगा। 

इसको कहते हैं लोकतंत्र। लोग अपने वोट की ताकत से नाजायज़ अधिकार खरीदते हैंअपनी आज़ादी खरीदते हैं - कानून तोड़ने की आज़ादी। यह तो मेरे जैसा देशद्रोही ही है जो लोकतंत्र का महत्व नहीं समझ रहाजिसने अपने फ्लैट में एक इंच भी इधर-उधर नहीं कियाऔर उसी तंग दायरे में सिमटा रहाजबकि देशभक्तों ने कमरेमंजिलें सब बना दीं सिर्फ इस लोकतंत्र के बल पर। आज उसी लोकतांत्रिक देश की आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लोक और सत्ता के इस गठजोड़ को और मज़बूती देने के लिए जगह-जगह ऐसे ही कानूनतोड़क लोग अपने कानूनतोड़क नेता को बुला रहे है। 

जनता के ये सेवक आज अपने-अपने इलाकों में तिरंगा फहराएंगे। एक एमएलए-एमपी और बीसियों जगह से आमंत्रण। लेकिन देशसेवा का व्रत लिया है तो जाना ही होगा। आखिरकार जब भाषण देते-देते थक जाएंगे तो रात को किसी बड़े व्यापारी-इंडस्ट्रियलिस्ट के सौजन्य से सुरा-सुंदरी का सहारा लेकर अपनी थकान मिटाएंगे। यह तो मेरे जैसे देशद्रोही ही होंगे जो अपने फ्लैट में दुबके बैठे है और जो रात को दाल-रोटी-सब्जी खाकर सो जाएंगे। 

नीचे देशभक्ति के गाने बंद हो गए हैंभाषण शुरू हो चुके हैं। जय हिंद के नारे लग रहे हैं। मेरा मन भी करता है कि यहीं से सहीमैं भी इस नारे में साथ दूं। दरवाज़ा खोलकर बालकनी में जाता हूं। नीचे खड़े लोगों के चेहरे देखता हूं। चौंक जाता हूंअरेयह मैं क्या सुन रहा हूंऊपर से हर कोई जय हिंद बोल रहा हैलेकिन मुझे उनके दिल से निकलती यही आवाज़ सुनाई दे रही है - मेरी मर्ज़ी। मैं लाइन तोड़ आगे बढ़ जाऊंमेरी मर्जी। मैं रिश्वत दे जमीन हथियाऊंमेरी मर्ज़ी। मैं हर कानून को लात दिखाऊंमेरी मर्ज़ी... 

मैं बालकनी का दरवाज़ा बंद कर वापस कमरे में आ गया हूं। ड्रॉइंग रूम में बेटी ने टीवी के ऊपर प्लास्टिक का छोटा-सा झंडा लगा रखा है। मैं उसके सामने खड़ा हो जाता हूं। झंडे को चूमता हूंऔर बोलने की कोशिश करता हूं - जय हिंद। लेकिन आवाज़ भर्रा जाती है। खुद को बहुत ही अकेला पाता हूं। सोचता हूंक्या और भी लोग होंगे मेरी तरह जो आज अकेले में आज़ादी का यह त्यौहार मना रहे होंगे। वे लोग जो इस भीड़ का हिस्सा बनने से खुद को बचाये रख पाए होंगे..?? वे लोग जो अपने फायदे के लिए इस देश के कानून को रौंदने में विश्वास नहीं करते..?? वे लोग जो रिश्वत या ताकत के बल पर दूसरों का हक नहीं छीनते..??