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Saturday, April 29, 2017

भारत में तीन तलाक़ 2002 से ही अवैध, फिर अब इसे कौन लाया?

Image result for तीन तलाककई महीने से सुप्रीम कोर्ट में चल रहे तीन तलाक़केस में अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया है, और यह मुद्दा कई तरह के ध्रुवीकरण की वजह बन गया है. दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर झूठे इलज़ाम के साथ ही अफवाहें फैलाने का सिलसिला जारी है, कि आज फैसला आ रहा है, कल फैसला आ रहा है, या फैसला आ गया है.

एक अजब का गैर ज़िम्मेदारी वाला माहौल समाज के लगभग सभी हिस्सों में बन चुका है. सबसे अहम बात यह है कि आम जनता को छोड़ भी दिया जाए लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर टीवी या दूसरे कार्यक्रमों में बोलने वाले विशेषज्ञों के पास ख़ुद जानकारी का अभाव है. वे अप्रासंगिक मुहावरों और वाक्यों का इस्तेमाल तेज़ आवाज़ में करते हुए एक दूसरे के ऊपर अपने विचार थोपने की कोशिश करते हुए अभी तक दिख रहे हैं. ये सब बहुत ही मायूस करने वाला है.

सबसे बड़ी अफवाह है कि कोई मुस्लिम महिला या मुस्लिम महिला संगठन तीन तलाक़ के केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पास गए जोकि पूरी तरह बेबुनियाद है.

सुप्रीम कोर्ट में दो हिन्दू बहनें अपने माँ-बाप की संपत्ति में हिस्सा मांगने के लिए आईं, उन्हें संपत्ति में अधिकार देने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया, और कानून के जानकारों के अनुसार यह फैसला ऐतिहासिक रूप से महिला अधिकारों को लेकर एक प्रतिगामी फैसला था.

इस फैसले को देते हुए सुप्रीम कोर्ट की इसी पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं पर बहुत अत्याचार हो रहा है, इसलिए तीन तलाक़ के बारे में वे सू-मोटो लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका स्थापित करते हैं.

इस केस में सबसे पहले जमियत उलेमा-ए-हिन्द ने एक बहुत ही कमज़ोर एफिडेविट के साथ अपने आपको पक्ष बनाया. बाद में पक्ष बनते हुए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी जमियत के कमज़ोर एफिडेविट की हुबहू नक़ल दाखिल की.

इस केस में मुस्लिम महिला संगठनों के पक्ष बनने से पहले लखनऊ की रहने वाली एक मुस्लिम महिला फराह फैज़ इस केस में पक्ष बनीं, और उन्होंने अपने एफिडेविट में लिखा कि वह श्री मोहन भागवत (आरएसएस) के साथ काम करती हैं, और मांग रखी कि महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लॉ को खत्म किया जाए और यूनिफार्म सिविल कोड लागू किया जाए. मालूम हो कि फराह फैज़ इस केस में यूनिफार्म सिविल कोड की मांग करने वाली अकेली वादी हैं. और उनकी इस मांग के कई महीने बाद केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अलग राष्ट्रीय विधि आयोग को यूनिफार्म सिविल कोड के बाबत ज़िम्मेदारी दी.

इस दौरान एक महत्वपूर्ण घटना यह हुई कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखण्ड की एक पीड़ित मुस्लिम महिला शायरा बानो के केस को तीन तलाक़ के केस में जोड़ दिया.

इस बीच भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन और दूसरे संगठन भी इस केस में एक पक्ष के तौर पर आये. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन के वकील श्री आनंद ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में ही अपना फैसला सुना दिया है, अब इस केस की कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए इस केस में आगे कोई बहस नहीं होनी चाहिए, पर सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी.

भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली ज़किया सोमन और नूरजहाँ सफिया नाज़ पर आरएसएस से जुड़े होने की बेबुनियाद अफवाहें फैलाई गईं, उनकी आस्था और उनकी निजी ज़िन्दगी को बुनियाद बनाते हुए. ज़किया सोमन के बेटे अरस्तू ज़किया को भी नहीं बख्शा गया. जो लोग इन अफवाहों के पीछे हैं, वे ही असल में आरएसएस का काम करते हुए दिख रहे हैं. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन द्वारा की गई रिसर्च पर भले ही हमारे ऐतराज़ हो जिसे वरिष्ठ विधि जानकार प्रोफेसर फैजान मुस्तफ़ा ने अपने लेखों में उजागर किया है. पर ज़किया सोमन और उनके साथियों ने आरएसएस के खिलाफ गुजरात में 2002 नरसंहार के बाद से लगातार मुसलमानों के हक के लिए जो काम किया है उसे फरामोश नहीं किया जा सकता. उनकी पोटा एक्टको हटाने के लिए गुजरात में हुए संघर्षों में अहम भूमिका रही है, यह वही कानून है जिसका गलत इस्तेमाल कर मासूम मुस्लिम नौजवानों की ज़िन्दगी तबाह कर दी गई.

धार्मिक विचारों और निजी ज़िन्दगी से किसी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए, उसकी बुनियाद पर झूठे इलज़ाम लगाना निंदनीय है. आज मुसलमानों के हक और इंसाफ के लिए आवाज़ उठाने वाले बहुत से लोग मुसलमान नहीं हैं, और बहुत से मुसलमान चेहरे जिनसे उम्मीद की जाती है वे अक्सर खामोश रहते हैं. आरएसएस की परिभाषा वाले मुसलमान भी आजकल अपने चेहरे को सियासत में जमाने की खातिर नारे लगाते हुए दिखते हैं, पर उनके इरादे नेक नहीं हैं. इस पर मुसलमानों को गौर करने की ज़रूरत है.

इस केस में इसके उलट कई चीजें इस बात का इशारा कर रहीं हैं कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को गुमराह करते हुए उसी के कुछ मौलवी हज़रात आरएसएस के इशारे पर काम कर रहें हैं. इसका सबसे बड़ा सबूत है अभी कुछ हफ्तों पहले सुप्रीम कोर्ट में इस्लाम और शरियत के नाम पर जमा किया गया एफिडेविट, जिसके समर्थन के लिए इन्हीं कुछ लोगों ने हस्ताक्षर अभियान और साथ ही गाँव, कस्बों, शहरों में जुलुस निकलवाने का काम किया.

इस 68 पन्नों के एफिडेविट में जो बातें कही गई हैं, अगर निष्पक्ष रूप से किसी इस्लामी विद्वान से पूछी जायें, तो वह बतायेंगे कि ये इस्लाम और शरियत के खिलाफ हैं. इसके बारे में जब आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सर्वोच्च नेतृत्व को बताया गया, तब उन्होंने जलसे-जुलुस और हस्ताक्षर अभियान पर रोकथाम की.

आज सुप्रीम कोर्ट में इन विभिन्न धाराओं वाले संगठनों के तर्कों पर गौर करने की ज़रूरत है.

साथ ही यह कहते हुए कि फ़ासीवाद के इस दौर में जब अधिकतर सरकारी प्रतिष्ठानों से शोषित और वंचितों का विश्वास उठता जा रहा है, न्यायपालिका से बहुत-सी शिकायतें होने के बावजूद अभी तक उससे बहुत उम्मीदें बाकी हैं, उसे धूमिल नहीं किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट से पूछना होगा कि जब उन्होंने कई फैसलों में, ख़ासकर शमीम आरा के 2002 केस में जब यह फैसला दे दिया कि न्यायपालिका तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) को अमान्य मानती है और कुरआन में दिए हुए तलाक़ की प्रक्रिया जिसे तलाक़े अहसनकहा जाता है, उसे ही मानेगी. इस फैसले को किसी भी धार्मिक संगठन, या व्यक्ति विशेष ने चुनौती नहीं दी, कोई विरोध नहीं हुआ, और ये कानून बन गया. तब नए सिरे से किसी भी जज द्वारा जनहित याचिका स्थापित करने का क्या औचत्य था?

क़ानूनी तौर पर अभी की मौजूदा बेंच 2002 के शमीम आरा फैसले को पलट कर तीन तलाक़ को सही करार दे ही नहीं सकती तो फिर ये तमाम हंगामा क्यों? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज 2002 के ऐतिहासिक शमीम आरा फैसले के बारे में नहीं जानते हैं?

तीन तलाक़ जब पहले से ही अमान्य है, जिसे तलाक़े बिद्दत कहते हैं और जिसका कुरआन से कोई ताल्लुक नहीं है, जिसे इस्लाम ने भी एक अपराध माना है, तब उस पर इतनी उलझन पैदा करने की ज़रूरत क्यों हुई.

मई 2014 से हिंदोस्तान का मुसलमान एक नए दौर से गुज़र रहा है, और खास तौर पर याकूब मेमन की फाँसी के बाद मुसलमानों का एक नया लोकतान्त्रिक राजनीतिकरण हुआ है, जो मुसलमानों के लिए और देश के लिए बहुत अच्छा संकेत है. आज इस लोकतान्त्रिक राजनीतिकरण को कई तरह से थामने की कोशिशें जारी हैं. आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ लोगों को अपने साथ मिलाकर, आरएसएस ने जिस तरह से हिंदोस्तान के मुसलमानों को, खुद आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को गुमराह करने की कोशिश की है वे अपने आप में इस बात को उजागर कर रही है.

तीन तलाक़ के ऊपर मज़हब का चोगा पहनाकर आम लोगों को बहकाने की बजाये, आज जब हिंदोस्तान में एक तरफ़ा संगठित हिंसा की वजह से मुसलमान औरत, मर्द, बुज़ुर्ग, जवान, बच्चे, बच्चियां, एक खौफ के साये में जी रहे हैं. जिसे पूरा देश इस बात को जानता है. देश का एक बड़ा तबका इसका समर्थन भी करता है और इसे न्यायसंगत मानता है. सुप्रीम कोर्ट से पूछने की ज़रूरत थी कि इस मुस्लिम विरोधी संगठित हिंसा को रोकने के लिए आपने कुछ कदम क्यों नहीं उठाये.

आज के दौर में अमानवीयकरण कितने और चरम पर पहुंचेगा, इसका अंदाज़ा करना अब मुश्किल है. एक कतार है नज़ीरों की. देश की संसद में विराजमान एक माननीय ने जनसभाओं में कहा कि मृत मुस्लिम महिलाओं की कब्र खोदकर उनके शवों के साथ बलात्कार करो. उत्तरप्रदेश में दो जगह इस अपील पर अमल करते हुए एक विचारधारा विशेष के व्यक्तियों ने कब्र खोदी और मृत मुस्लिम महिला के शव के साथ बलात्कार का प्रयास किया, और बाद में इन्हें मानसिक रोगी कह दिया गया, जैसे कि पूरी दुनिया में इस प्रकार के संगठित अपराध करने वाले लोगों के बारे में प्रशासन कहता है. पर संसद, सरकारें और न्यायपालिका खामोश रहीं.

अगर हिंदोस्तानी समाज ये सोच रहा है कि अमानवीयकरण देश में रहने वाले मुसलमानों के खात्में के बाद रुक जाएगा, तो यह एक भयानक भूल है. यह अमानवीयकरण ऐसा दैत्य है कि वह किसी को भी नहीं छोड़ेगा.

आज देश के प्रगतिशील समाज को गहराई से संवेदनशील होकर कुछ चीजों पर गौर करने की ज़रूरत है. महिला विरोधी फ़ासिस्ट दृष्टिकोण और महिला विरोधी रूढ़िवादी दृष्टिकोण में फर्क होता है. दोनों भले ही गलत हैं पर उन्हें एक पैमाने पर रखना न्यायसंगत नहीं.

अधिनायकवादी फ़ासिस्ट दृष्टिकोण देश के बहुसंख्यकवाद पर टिका होता है. अल्पसंख्यक शोषित समाज जब अपने ऊपर एक तरफ़ा हमला महसूस करता है, तब अपनी सोच को सीमित कर, अपने ऊपर रूढ़िवाद की जकड़न को ओढ़ लेता है. और इसे अपनी आन का सवाल बना लेता है. आज इस शोषित समाज से उसकी रूढ़िवादी जकड़न के कारण विरोध और सीधा मुकाबला करने की जगह, उसकी मदद करने की ज़रूरत है ताकि वे रूढ़िवादी जकड़न से मुक्त हों.
 उवेस सुल्तान खान एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

Friday, December 11, 2015

बोलो खरीदोगे ?

Thursday, September 17, 2015

क्या फल और सब्ज़ियाँ खाने वाले पुण्य बटोरते हैं, वे हत्याएं नहीं करते?


शरीर के लिए माँसाहार उत्तम है या शाकाहार? भारतीय परिवेश की ये अन्तहीन बहस है. बहुतों की नज़र में ये फालतू की बहस है. लेकिन कुछ दिनों से छिड़ी भी तो हुई है. हाईकोर्ट तक इसमें कूद चुका है. कोई नहीं जानता कि भारतीय संस्कृति में शाकाहार और माँसाहार को पहली बार कब परिभाषित किया गया? सदियों से पशु-वध, संहार-शिकार और बलि को लेकर सामाजिक चेतना को जगाने की कोशिश होती रही है. लेकिन ज़रा सोचिए कि हमारे पुरखों की दृष्टि भी कितनी संकुचित रही होगी. क्योंकि सारी दुनिया को पहली बार भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस ने बताया था कि वनस्पतियों में भी वैसा ही जीवन और संवेदनाएँ होती हैं, जैसी जन्तु जगत में हैं. बोस ने 10 मई 1901 को वैज्ञानिकों से खचाखच भरे लन्दन स्थित रायल सोसाइटी के सेंट्रल हॉल में ये सिद्ध किया था कि पौधों में भी जीवन के वही लक्षण होते हैं जैसे जन्तुओं में हैं.

इससे पहले वेदान्त संस्कृति ये बता चुकी थी कि ब्रह्मांड की रचना जड़ (Non living) और चेतन (Living) से हुई है. बाद में वैज्ञानिकों ने इसकी आधुनिक परिभाषा तय की. जो साँस नहीं लेते और जिनमें वंश-वृद्धि की प्रक्रिया नहीं है वो जड़ हैं. जैसे पत्थर, मिट्टी, धातु वगैरह. जबकि पूरा प्राणिजगत जन्म-मृत्यु के बाहुपाश में है. इसका अध्ययन जीव विज्ञान (Biology) कहलाया. जन्तु विज्ञान (Zoology) और वनस्पति विज्ञान (Botany) इसकी शीर्ष शाखाएँ हैं. लिहाज़ा, माँसाहार हो या शाकाहार, मनुष्य को अपना पेट भरना है तो उसे जीव ‘हत्या’ तो करनी ही होगी. क्या सब्ज़ियों, फलों और दूध-घी में जीवन नहीं है? क्या जीवन सिर्फ़ माँस-मछली में ही है? क्या जीव-हत्या का पाप सिर्फ़ मुर्गा, बकरा, भेड़, सुअर और भैंसा वग़ैरह खाने वालों को ही लगेगा? क्या सब्ज़ियाँ, फल और दूध के सेवन से ज़िन्दगी गुज़ारने वाले पुण्य बटोरते हैं?

धार्मिक दृष्टि से देखें तो सभी धर्म और उपासना पद्धतियाँ बुनियादी तौर पर मनुष्य को प्रेम (Love), दया (Kindness), करूणा (Compassion), सहिष्णुता (Tolerance) और बन्धुत्व (Brotherhood) का सन्देश देती हैं. कालान्तर में अलग-अलग मतावलम्बियों (Followers) ने अपने-अपने सम्प्रदाय के लिए तरह-तरह के मिथक (Assumptions) गढ़ लिये. बदलते तौर में हरेक बात को धार्मिकता से जोड़ने का चलन आया. देखते-देखते सभी आचार-व्यवहार धार्मिक साँचे में ढाल दिये गये. इससे अन्धविश्वास का जन्म हुआ. जिसे सभी धर्मों के स्वार्थी तत्वों ने जमकर भुनाया. लेकिन जब वैज्ञानिक अविष्कारों ने पाखंडियों को आड़े हाथ लिया तो ‘धर्म’ की दुकान चला रहे लोग तिलमिला पड़े. ऐसा पूरी दुनिया में हुआ. हमेशा हुआ. आगे भी होता रहेगा.

सन् 1514 में जब कॉपरनिकस (Nicolaus Copernicus) ने सिद्ध किया कि ब्रह्मांड का केन्द्र पृथ्वी नहीं है. सूर्य, पृथ्वी के चारों ओर नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर घूमती है. इस बात से उस दौर के धर्माचार्य बौखला गये. उन्होंने पादरियों के परिवार से जुड़े कॉपरनिकस को विधर्मी बताकर सज़ाएँ दीं. इसीलिए दुनिया को उनके ज़्यादातर शोधों का पता उनकी मौत के बाद चला. कॉपरनिकस की दिखायी राह पर चलकर वैज्ञानिक ब्रुनो (Giordano Bruno) ने सन् 1600 में बताया कि ब्रह्मांड में सूर्य जैसे कई सौरमंडल हैं. सूर्य इकलौता नहीं है. इसी तरह दूरबीन के जनक गैलिलियो (Galileo Galilei) ने सन् 1610 में बताया कि बृहस्पति के चार चन्द्रमा हैं. लेकिन कैथोलिक धारणाओं को चुनौती देती ऐसी जानकारियों को वो 1633 तक छिपाये रहे. उनके शोधों की भनक पाकर उन्हें सज़ा मिली कि वो कॉपरनिकस की राह पर नहीं चलेंगे. लेकिन गैलिलियो चोरी-छिपे अपने शोध में लगे रहे. इसकी पोल खुली तो उन्हें क़रीब दस साल की नज़रबन्दी झेलनी पड़ी जो उनकी मौत से ही ख़त्म हुई.
  

साफ़ है कि दुनिया के हरेक समाज का एक तबका कभी नहीं चाहता कि उसके मिथकों को कोई चुनौती दे. ऐसा पाँच सौ साल पहले भी था. आज भी है. हालाँकि, इस दौरान दुनिया कहाँ से कहाँ आ पहुँची! शाकाहार और माँसाहार का द्वन्द तो उससे भी पुराना है. जीव विज्ञान हमें बखूबी समझा चुका है कि प्रकृति ने प्राणिजगत के लिए ऐसी भोजन-शृंखला (Food Chain) बनायी है जिसमें कोई किसी का भोजन है तो कोई किसी और का. किसी को हरियाली चाहिए तो किसी को तरह-तरह के जीव-जन्तु. शिकारी जानवर भूखे मर जाएँगे लेकिन घास नहीं खा सकते. गाय चाहे जितनी भूखी हो ख़रगोश नहीं खा सकती. जो प्राणी दूसरों का भोजन हैं, क़ुदरत ने उनकी वंश-वृद्धि की रफ़्तार ऐसी रखी है, जिससे नस्ल भी बची रहे और भोजन-शृंखला भी क़ायम रहे. कल्पना कीजिए कि आम के एक पेड़ पर जितने फल लगते हैं अगर वो सारे उसकी सन्तान की तरह आम के पेड़ बनने लगे तो कितने आम के पेड़ हो जाएँगे? ऐसा होता तो धरती पर सिर्फ़ आम ही आम के पेड़ होते. ऐसे ही फूलों के परागण का विधान है. कीट-पतंगे न हो तो उनकी वंश-वृद्धि कैसे होगी?

इन्सान गेहूँ इसलिए पैदा करता करता है कि उसे रोटी चाहिए. गाय-भैंस इसलिए पालता है कि उसे दूध चाहिए. इसी तरह से बकरी इसलिए पाली जाती है कि बकरे चाहिए. सूअर इसलिए पाला जाता है कि गोश्त चाहिए. मनुष्य ने न जाने कितने वर्षों के शोध के बाद ये तय किया होगा कि कौन-कौन से जानवर क्यों पालने हैं? किसकी क्या उपयोगिता होगी? गोश्त तो सभी में है. लेकिन पक्षियों में भी मुर्गे को ही क्यों नियमित भोजन के लिए चुना गया होगा? अंडा तो लाखों तरह के प्राणी देते हैं लेकिन सबको अंडों के लिए क्यों नहीं पाला जाता? दूध तो हरेक स्तनधारी में है, लेकिन दूध के लिए गाय-भैंस या ऊँट-याक वगैरह को ही क्यों पाला जाता है? ये सारी बातें तरह-तरह के समाजशास्त्रीय अध्ययन से सदियों में तय हुई होंगी.

बैक्टीरिया-वायरस जैसे अतिसूक्ष्म जीवों का पता क्या हमारे पुरखों को था? साफ़ है कि जब तक वैज्ञानिक तथ्य हमारी आँखों पर पड़ी धुन्ध को साफ़ नहीं कर देते, तब तक हम दकियानूसी भँवर में ही फँसे रहेंगे. इसके लिए किसी इंसान या धर्म में कमी-बेसी ढूँढने से कुछ होगा. फ़र्क़ पड़ेगा तो सिर्फ़ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से. वर्ना ढकोसले की बीमारी अनुवांशिक (Hereditary) ढंग से एक से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहेगी. काफ़ी समय से भारतीय समाज में अलग-अलग ढंग का तुष्टिकरण (Appeasement) दिखायी देता है. तुष्टिकरण का प्रचलित चेहरा सिर्फ़ हज या कैलाश मानसरोवर यात्रा पर मिलने वाली घोषित या अघोषित सब्सिडी ही नहीं है. किसी ख़ास वर्ग को लुभाने के लिए किसी ख़ास दिन सरकारी छुट्टी का एलान कर देना या किसी को रिझाने के लिए किसी पर्व विशेष पर माँस-बिक्री पर रोक लगा देना या सड़कों को तरह-तरह के जुलूसों, शोभायात्राओं वग़ैरह के लिए हर तरह की छूट दे देना – ये सारा भी तुष्टिकरण ही है. कोई भी सियासी या धार्मिक संगठन इससे अछूता नहीं है. सब एक जैसे हैं. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि कभी किसी एक तरह के लोगों का ज़ोर चलता है तो कभी दूसरे का.
  
भारत में धार्मिक आस्थाओं के नाम पर बलि देने की हिन्दू परम्परा कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता. यहाँ तो एक राजा इसलिए अमर हो गया कि उसने शरणागत कबूतर की रक्षा के लिए उसके शिकारी बाज़ को अपने शरीर का माँस देने का रास्ता चुना. क़िस्सों की भरमार है. आप जैसे क़िस्से ढूँढ़ना चाहेंगे, वैसे ही आपको मिलने लगेंगे. हमारे शहरों की किस प्रमुख सड़क पर आपको भटकता हुआ गौवंश नहीं दिखाई देगा? गाय को हमारी धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर पूज्यनीय भले ही बना दिया गया हो, लेकिन उस जैसी बेक़द्री शायद ही भारतीय समाज में किसी और पशु की होती हो. सड़क पर दिखने वाली हरेक गाय कहने को तो बाक़ायदा पालतू है, लेकिन उसके पालनहार उसके साथ कितनी क्रूरता से पेश आते हैं, ये ज़रा सड़कों पर भटक रही उन ‘माताओं’ से पूछिए. उन्हें कूड़े-कचरों में मुँह मारकर पॉलीथीन की थैलियों समेत सड़े-गले को खाकर अपना पेट पालना पड़ता है. गायों का बुढ़ापा जितना कष्टकारी जीवन शायद ही किसी और प्राणी का होता हो. पता नहीं, हमारे धार्मिक ठेकेदारों को दुनिया के इस सबसे निरीह प्राणी पर कब तरस आएगा?

हमारे धार्मिक और सियासी नेता, चिन्तक, विचारक और विद्वान सामाजिक चेतना को लेकर किस सीमा तक ढोंग कर सकते हैं, इसका क़यास तक कोई नहीं लगा सकता. आज माँसाहार, पशु-वध जैसे विषयों को लेकर ऐसी बेचैनी दिखायी जा रही है, मानो यही देश की सबसे बड़ी चुनौती है. अफ़सोस की बात ये है कि सारी बहस से वैज्ञानिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण नदारद है. ख़्वाहिश ये नहीं है कि हम अपनी विकृतियों को दूर करें. तमन्ना तो ये है कि कैसे हम दस-बीस सदी पीछे चले जाएँ! जीवन्त समाज में तार्किक बहस ज़रूर होनी चाहिए. लेकिन इस नज़रिये के साथ कि हम उनकी बातों को भी समझें-बूझें जो हमसे अलग सोचते हैं. बहस का मक़सद विषय को गहराई से समझने का होना चाहिए, न कि कटुता बढ़ने का.
मुकेश कुमार सिंह

Thursday, August 15, 2013

एक 'देशद्रोही' ने कैसे मनाया स्‍वतंत्रता दिवस (Independence Day)


यह लेख आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लिखा गया था। लेकिन यह आज भी उतना ही सही है जितना तब था और शायद तब तक रहेगा जब तक हालात नहीं बदलते। 
नीरेंद्र नागर 
कितना अच्छा दिन है आज। हम अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति के साठ साल का जश्न मना रहे हैं। लाल किले से लेकर स्कूल-कॉलेजों में और मुहल्लों से लेकर अपार्टमेंटों तक में तिरंगा फहराया जा रहा हैबच्चों में मिठाइयां बांटी जा रही हैं। मेरे अपार्टमेंट में भी देशभक्ति से भरे गाने बज रहे हैं और मैंने उस शोर से बचने के लिए अपने फ्लैट के सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं। मैं नीचे झंडा फहराने के कार्यक्रम में भी नहीं जा रहा जहां अपार्टमेंट के सारे लोग प्रेज़िडेंट साहब और लोकल नेताजी का भाषण सुनने के लिए जमा हो रहे हैं। मैं इस छुट्टी का आनंद लेते हुए घर में बैठा बेटी के साथ टॉम ऐंड जेरी देख रहा हूं। 
आप मुझे देशद्रोही कह सकते हैं। कह सकते हैं कि मुझे देश से प्यार नहीं है। मुझपर जूते-चप्पल फेंक सकते हैं। कोई ज़्यादा ही देशभक्त मुझपर पाकिस्तानी होने का आरोप भी लगा सकता है। 
मैं मानता हूं कि मेरा यह काम शर्मनाक हैलेकिन मैं क्या करूं..?? मैं जानता हूं कि जब मैं नीचे जाऊंगा और लोगों को बड़ी-बड़ी देशभक्तिपूर्ण बातें बोलते हुए देखूंगा तो मुझसे रहा नहीं जाएगा। वहां हमारे लोकल एमएलए होंगे जिनके भ्रष्टाचार के किस्से उनकी विशाल कोठी और बाहर लगीं चार-पांच कारें खोलती हैंवह हमारे बच्चों को गांधीजी के त्याग और बलिदान की बात बताएंगे। वहां हमारे सेक्रेटरी साहब होंगे जिन्होंने मकान बनते समय लाखों का घपला किया और आज तक जबरदस्ती सेक्रेटरी बने हुए हैंवह देश के लिए कुर्बानी देनेवाले शहीदों की याद में आंसू बहाएंगे। वहां अपार्टमेंट के वे तमाम सदस्य होंगे जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एक्स्ट्रा कमरे बनवा लिए हैंऔर कॉमन जगह दखल कर ली हैऐसे भी कई होंगे जिन्होंने बिजली के मीटर रुकवा दिए हैं। ये सारे लोग वहां तालियां बजाएंगे कि आज हम आज़ाद हैं। 

क्या करूं अगर मुझे ऐसे लोगों को देशभक्ति की बात करते देख गुस्सा आ जाता है। इसलिए मैंने फैसला कर लिया है कि मैं वहां जाऊं ही नहीं। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं उनसे बच नहीं पाऊंगा। ये सारे लोग आज आज़ादी का जश्न मनाने के बाद कल शहर की सड़कों पर निकलेंगे और हर गलीहर चौराहेहर दफ्तरहर रेस्तरां में होंगे। मैं उनसे बचकर कहां जाऊंगा..?? 

कल 16 अगस्त को जब मैं ऑफिस के लिए निकलूंगा और देखूंगा कि टंकी में तेल नहीं है तो मेरी पहली चिंता यही होगी कि तेल कहां से भराऊंक्योंकि ज़्यादातर पेट्रोल पंपों में मिलावटी तेल मिलता है (पेट्रोल पंप का वह मालिक भी आज आज़ादी का जश्न मना रहा होगाअगर वह खुद नेता होगा तो शायद भाषण भी दे रहा होगा)। खैरअपने एक विश्वसनीय पेट्रोल पंप तक मेरी गाड़ी चल ही जाएगीइस भरोसे के साथ मैं आगे बढ़ूंगा और चौराहे की लाल बत्ती पर रुकूंगा। रुकते ही सुनूंगा मेरे पीछे वाली गाड़ी का हॉर्न, जिसका ड्राइवर इसलिए मुझपर बिगड़ रहा होगा कि मैं लाल बत्ती पर क्यों रुक रहा हूं। मेरे आसपास की सारी गाड़ियांरिक्शेबस सब लाल बत्ती को अनदेखा करते हुए आगे बढ़ जाएंगेक्योंकि चौराहे पर कोई पुलिसवाला नहीं है। मैं एक देशद्रोही नागरिक जो आज आज़ादी के समारोह में नहीं जा रहाकल उस चौराहे पर भी अकेला पड़ जाऊंगाजबकि सारे देशभक्त अपनी मंज़िल की ओर बढ़ जाएंगे। 

अगले चौराहे पर पुलिसवाला मौजूद होगाइसलिए कुछ गाड़ियां लाल बत्ती पर रुकेंगी। लेकिन बसवाला नहीं। उसे पुलिसवाले का डर नहींक्योंकि या तो वह खुद उसी पुलिसवाले को हफ्ता देता हैया फिर बस का मालिक खुद पुलिसवाला हैया कोई नेता है। नेताओंपुलिसवालों और पैसेवालों के लिए इस आज़ाद देश में कानून न मानने की आज़ादी है। मैं देखूंगा कि मेरे बराबर में ही एक देशभक्त पुलिसवाला बिना हेल्मेट लगाए बाइक पर सवार हैलेकिन मैं उसे टोकने का खतरा नहीं मोल ले सकताक्योंकि वह किसी भी बहाने मुझे रोक सकता हैमेरी पिटाई कर सकता हैमुझे गिरफ्तार कर सकता है। आप मुझे बचाने के लिए भी नहीं आएंगे क्योंकि मैं ठहरा देशद्रोही जो आज आज़ादी का जश्न मनाने के बजाय कार्टून चैनल देख रहा है। 

आगे चलते हुए मैं उन इलाकों से गुज़रूंगा जहां लोगों ने सड़कों पर घर बना दिए हैंलेकिन उन घरों को तोड़ने की हिम्मत किसी को नहीं हैक्योंकि वे वोट देते हैं। वोट बेचकर वे सड़क को घेर लेने की आज़ादी खरीदते हैंऔर वोट खरीदकर ये एमएलए-एमपी विधानसभा और संसद में पहुंचते हैं जहां एक तरफ उन्हें कानून बनाने का कानूनी अधिकार मिल जाता हैदूसरी तरफ कानून तोड़ने का गैरकानूनी अधिकार भी। कोई उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता। इसलिए वे अपने वोटरों से कहते हैंरूल्स आर फॉर फूल्स। मैं भी कानून तोड़ता हूंतुम भी तोड़ो। मस्त रहोबस मुझे वोट देते रहोमैं तुम्हें बचाता रहूंगा। 

इसको कहते हैं लोकतंत्र। लोग अपने वोट की ताकत से नाजायज़ अधिकार खरीदते हैंअपनी आज़ादी खरीदते हैं - कानून तोड़ने की आज़ादी। यह तो मेरे जैसा देशद्रोही ही है जो लोकतंत्र का महत्व नहीं समझ रहाजिसने अपने फ्लैट में एक इंच भी इधर-उधर नहीं कियाऔर उसी तंग दायरे में सिमटा रहाजबकि देशभक्तों ने कमरेमंजिलें सब बना दीं सिर्फ इस लोकतंत्र के बल पर। आज उसी लोकतांत्रिक देश की आज़ादी की 60वीं सालगिरह पर लोक और सत्ता के इस गठजोड़ को और मज़बूती देने के लिए जगह-जगह ऐसे ही कानूनतोड़क लोग अपने कानूनतोड़क नेता को बुला रहे है। 

जनता के ये सेवक आज अपने-अपने इलाकों में तिरंगा फहराएंगे। एक एमएलए-एमपी और बीसियों जगह से आमंत्रण। लेकिन देशसेवा का व्रत लिया है तो जाना ही होगा। आखिरकार जब भाषण देते-देते थक जाएंगे तो रात को किसी बड़े व्यापारी-इंडस्ट्रियलिस्ट के सौजन्य से सुरा-सुंदरी का सहारा लेकर अपनी थकान मिटाएंगे। यह तो मेरे जैसे देशद्रोही ही होंगे जो अपने फ्लैट में दुबके बैठे है और जो रात को दाल-रोटी-सब्जी खाकर सो जाएंगे। 

नीचे देशभक्ति के गाने बंद हो गए हैंभाषण शुरू हो चुके हैं। जय हिंद के नारे लग रहे हैं। मेरा मन भी करता है कि यहीं से सहीमैं भी इस नारे में साथ दूं। दरवाज़ा खोलकर बालकनी में जाता हूं। नीचे खड़े लोगों के चेहरे देखता हूं। चौंक जाता हूंअरेयह मैं क्या सुन रहा हूंऊपर से हर कोई जय हिंद बोल रहा हैलेकिन मुझे उनके दिल से निकलती यही आवाज़ सुनाई दे रही है - मेरी मर्ज़ी। मैं लाइन तोड़ आगे बढ़ जाऊंमेरी मर्जी। मैं रिश्वत दे जमीन हथियाऊंमेरी मर्ज़ी। मैं हर कानून को लात दिखाऊंमेरी मर्ज़ी... 

मैं बालकनी का दरवाज़ा बंद कर वापस कमरे में आ गया हूं। ड्रॉइंग रूम में बेटी ने टीवी के ऊपर प्लास्टिक का छोटा-सा झंडा लगा रखा है। मैं उसके सामने खड़ा हो जाता हूं। झंडे को चूमता हूंऔर बोलने की कोशिश करता हूं - जय हिंद। लेकिन आवाज़ भर्रा जाती है। खुद को बहुत ही अकेला पाता हूं। सोचता हूंक्या और भी लोग होंगे मेरी तरह जो आज अकेले में आज़ादी का यह त्यौहार मना रहे होंगे। वे लोग जो इस भीड़ का हिस्सा बनने से खुद को बचाये रख पाए होंगे..?? वे लोग जो अपने फायदे के लिए इस देश के कानून को रौंदने में विश्वास नहीं करते..?? वे लोग जो रिश्वत या ताकत के बल पर दूसरों का हक नहीं छीनते..??