Showing posts with label आई.बी. Show all posts
Showing posts with label आई.बी. Show all posts

Friday, July 31, 2015

याकूब हमारा हीरो नहीं राज्य प्रायोजित दंगों के खिलाफ एक प्रतीक है - अनस


याकूब हमारा हीरो नहीं राज्य प्रायोजित दंगों के खिलाफ एक प्रतीक है याकूब मेमन के बहाने सोशल मीडिया पर पिछले तीन चार दिनों से तर्क कुतर्क गाली गलौच का जो दौर चल रहा है उसके बीच में मुझे फेसबुक ने 24 घंटे के लिए ब्लाक कर दिया. अब न तो मैं अपने फेसबुक वाल पर कुछ लिख सकता हूँ न तो किसी दूसरे के लिखे का जवाब दे सकता हूँ.

मैंने परसों अपनी एक पोस्ट में लिखा था की ‘याकूब मेमन हमारे दिलों में जिंदा रहेगा, वह अन्याय के खिलाफ प्रतीक के तौर पर पहचाना जाएगा.’ जब मैंने यह लिखा था तब मैंने यह बिलकुल नहीं लिखा था कि ‘मुसलमान याकूब मेमन को मुसलमानों के खिलाफ हो रहे सरकारी अत्याचार के विरूद्ध प्रतीक के तौर पर स्थापित कर दिया जाए.’ लेकिन मुझमें खोज खोज कर फिरकापरस्ती तलाश करने वाले लोगों ने यह समझा कि 900 लोगों की सरकारी ह्त्या के बदले के स्वरुप किये गए बम ब्लास्ट में मैं याकूब मेमन को मुसलमानों का हीरो बनाना चाहता हूँ.

कोई मुसलमान अपने ऊपर हुए अत्याचार और नाइंसाफी की लड़ाई लड़ने के बाद फूलन देवी जैसी स्वीकार्यता क्यों नहीं प्राप्त कर पाता. क्यों किसी मुसलमान को उसके कौम के भरोसे और सहारे छोड़ दिया जाता है. एपीजे अब्दुल कलाम की विरासत पर सबने अपना हक़ जताया तो याकूब मेमन और उसके परिवार के लोगों द्वारा लिए गए प्रतिशोध के पक्ष में हम क्यों नहीं खड़े हुए?

मुझे पता है यह बेहद बचकाना सवाल है क्योंकि याकूब और उसके परिवार ने 250 से ज्यादा लोगों की जान ली थी, हो सकता है जो लोग मारे गए उनमें से कुछ दंगों में शामिल रहे हों लेकिन ऐसे बहुत रहे होंगे जो मासूम और बेकसूर थे. इनकी हत्याओं और बम्बई ब्लास्ट को कभी भी जस्टिफाय नहीं किया जा सकता. लेकिन, अहम पहलू इसमें यह आता है कि बम ब्लास्ट न होता तो बम्बई में अब तक कितने दंगे हो चुके होते ? श्री कृष्ण जांच कमीशन भी यह कहता है कि ब्लास्ट के बाद सरकार और प्रशासन के अलावा राजनीतिक गुंडागर्दी जो मुसलमानों के खिलाफ हुआ करती थी उसमें कमी आई है. उसने यह नहीं लिखा है कि हिन्दुओं और मुसलमानों में दूरियां बढ़ी है. क्या आप उन्हें हिन्दू मानते हैं जिन्होंने बेवजह गरीब मुसलमानों,औरतों,बुजुर्गों और बच्चों को जिंदा जला डाला. क्या आप उन्हें अपने जैसा मानते हैं? अगर नहीं तो फिर हिन्दू बनाम मुसलमान क्यों बना रहे हैं मुद्दे को. क्रूरतम हिंसा की हदे लांघने वालों की इतनी फ़िक्र क्यों कर रहे हैं? कहीं सरकार और राजनीतिक पार्टियाँ आपको मोहरा तो नहीं बना रही है याकूब मामलें में, शायद बना चुकी हैं.

याकूब और उसके परिवार ने बंबई को पहले तबाह नहीं किया था,उन पर शिव सेना और अन्य राजनीतिक दलों ने यह तबाही थोपी थी. मुख्यधारा की मीडिया और विमर्श करने वालों के बीच से बंबई दंगे नदारद हैं, बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद देश भर में सुनियोजित मुस्लिम नरसंहार पर कोई चर्चा नहीं हो रही है. न्यायपालिका को आश्वासन दे कर उसका भरोसा तोड़ा गया था, कहा तो यह भी जाता है कि बाबरी विध्वंस के वक्त पूरा देश एक तरफ था और मुसलमान एवं वामपंथी एक तरफ. क्या बहुजन और क्या सवर्ण, हर किसी के भीतर मुसलमानों के खिलाफ नफरत भर दी गई थी और फिर धीरे धीरे जिन लोगों ने बाबरी गिराई और कत्लेआम किये उनकी सच्चाई सामने आने लगी तो लोग खुद ही उनका साथ छोड़ कर भागने लगे. लेकिन नहीं बदला हाल मुसलमानों पर अत्याचार का. राजनीतिक रूप से उन्हें डिबार कर दिया गया है वरना क्यों न कोई पार्टी या राज्य अपने स्तर से राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के हत्यारे को बचाने के जैसा कोई बिल याकूब मेमन के लिए भी पास करती.

हर मोर्चे पर अकेले मुसलामानों के लिए लोग कहते हैं की उनका तुष्टिकरण होता है, उन्हें ज्यादा अवसर दिए जाते हैं, वो हिंसक होते हैं, इनका धर्म भारत देश को ख़त्म कर देगा. बताइए, हर रोज़ पिटते हैं मुसलमान और उन्ही का डर भी दिखाया जाता है. कहीं और होता है दुनिया में ऐसा ? दंगें हों तो उसमे मारे जाते हैं,दंगे के बाद बर्बादी में रहते हैं. जो दंगों से बच गए वे कई तरह के भेदभाव और शक से गुजरते हैं. ये भी कोई जीना है महराज? भारत के मुसलमान तो बहुत पीछे हैं हिंसा और अराजकता में, सरकारों द्वारा उनका दमन किया गया है कि वे कभी सोच भी नहीं पाते की खून का बदला खून से ले लें. मेमन परिवार ने लिया और उसकी सज़ा भोग ली. 

जो भी मुसलमान प्रायोजित हिंसा के खिलाफ कभी हिंसक होना चाहेगा उसे मैं पहले से बता दूं की ऐसा वह कभी नहीं करेगा क्योंकि उसके बाद उसे न तो हिन्दुओं की तरह राजनीतिक शाबाशी मिलेगी और न तो अदालत से जमानत. हिंसा के रास्ते पर गया मुसलमान, भारतीय कानून के लिए सबसे आसान मुजरिम होगा जिसके गले में सुबह के सात बजे फांसी का फंदा डाल दिया जाएगा. इसलिए किसी भी तरह की हिंसा हो, दंगा हो,फर्जी मुठभेड़ हो खुद के हाथ पैर बाँध, मुंह सिल एक किनारे बैठ जाने में ही भलाई है क्योंकि आप के लिए प्रतिशोध स्वरुप या फिर आत्मरक्षा जैसे शब्द प्रतिबंधित हैं और होने भी चाहिए. प्रतिशोध सिर्फ नक्सली ले सकते हैं और उन्हें जस्टिफाय करने वाले ब्राह्मण वामपंथी,आपकी हिंसा पर सैकड़ों सवाल एवं लानत भेजने को बैठे हुए हैं.
एक अच्छी और प्यारी सोसायटी में इन बकवास और बुरे शब्दों या क्रियाओं का भला क्या काम? आप पिटते रहिए, समाज की रंगाई पोताई चलती रहेगी जिस रोज़ आपने पीटने वाले को पीटा उस रोज़ आप समाज के लिए सबसे बड़े ‘थ्रेट’ के तौर पर पहचाने जाएंगे.

सरकार की मिलीभगत से सुनियोजित दंगों से खुद का बचाव करना भी यदि अपराध है तो याकूब मेमन इस दुनिया का सबसे दुर्दांत और खूंख्वार इंसान था जिसका मर जाना ही सबसे अच्छी बात है. न्यायपालिका में पूरा यकीन जताते हुए मैं सुप्रीम कोर्ट के जज अनिल आर दवे साहब के उस कथन से सहमत हूँ जिसे उन्होंने मनुस्मृति से निकाला था कि, ‘राजा यदि आँखें लाल करके सजा नहीं देगा तो पूरा पाप राजा पर आएगा.’ लोकतंत्र बचा ही कहाँ है? राजतंत्र है तो फैसले भी उसी तरह से आएंगे.

दवे साहब वहीँ हैं जिन्होंने कहा था यदि मैं तानाशाह होता तो पहली कक्षा से बच्चों को गीता पढ़वाता. खैर, याकूब मर गया क्योंकि उसे मरना था. उसने उस अपराध में शायद हिस्सेदारी निभाई थी जिसे अंजाम उसके भाई ने दिया था. हम उसे किस रूप में याद रखें यह हमारे विवेक पर निर्भर करने से अधिक परिस्थितियों पर निर्भर ज्यादा करती हैं. बहुसंख्यक चेतना को संतुष्ट करने के लिए या फिर यूं कहें किसी मुसलमान की सस्ती जान से बहे खून से बहुसंख्यक आबादी की प्यास बुझाने के लिए कोई भी फैसला न्यायलय लेता है तो मैं उसके समर्थन में रहूँगा. इस देश में अन्याय रत्ती भर नहीं होता जिन्हें ऐसा लगता है वे सब याकूब मेमन को सुनियोजित सरकारी दंगों के विरोध का प्रतीक मान लें या फिर पाकिस्तान चले जाए. देशद्रोशी कहीं के.

इस हिंसा प्रतिहिंसा के बीच मैं याक़ूब के उस पहलू को उसके साथ दफ्न करने की अपील सबसे करना चाहता हूं जिसमें बंबई ब्लॉस्ट और उसमें मारे गए बेकसूर लोगों का जिक्र आता है। मैं याक़ूब मेमन के साथ उसके उस पक्ष को फांसी पर लटका देने की सलाह सबको देता हूं जिसकी वजह से उसने और उसके परिवार ने बंबई में ब्लास्ट करवाए। और मैं उस याकूब को जिंदा रखने की अपील करता हूं जिसने अपने दोस्त चेतन मेहता के साथ ‘मेहता एंड मेमन’ नाम से फर्म की शुरूआत की थी। उस मेमन को बचाए रखने को कहूंगा जिसने जेल में रहते हुए डबल एम ए किया और उस मेमन को बचाए रखने की पूरी कोशिश करूंगा जिसने भारत और भारतीय कानून में पूरा भरोसा जताते हुए अपने परिवार के साथ पाकिस्तान से वापस मातृभूमि तक चला आया। आप उसके बुरे पहलुओं को हीरों कभी न बनाना, अपराधी तो वह था ही, हमें अपराध से घृणा होनी चाहिए अपराधी से नहीं। इन सबके अतिरिक्त मैं फांसी जैसे मनुकालीन सज़ा पर रोक की मांग करता हूं। साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित समेत उनके लिए भी जिनके ऊपर गुजरात रचने की साजिश का आरोप है। मेमन मेरा हीरो नहीं, उसके हीरोइज्म को मुझ पर मत थोपिए।

Sunday, February 24, 2013

फिर फंसेगे बेगुनाह… फिर मरेंगे आम लोग… फिर बंटेगा वीरता चक्र…


हैदराबाद में धमाके हुए हैं और तफतीश भी शुरू हो चुकी है. वही पुराना, बासी, पैबंद-दार और घीसा-पीटा जांच का फार्मूला एक बार फिर से दोहराया जाएगा. शुरूआत हो चुकी है… पढ़ते जाईए… देखते जाईए और समझते जाईए…
BeyondHeadlines
1- पुलिस को आनन फानन में वह बाजार पता चल जाएगा जहां से साइकिल खरीदी गई थी. (ये अलग बात है कि साइकिल की न तो कोई आर सी होती है, नहीं लाइसेंस प्लेट और नहीं चालक का कोई लाइसेंस.)
2- गजब तो ये कि साइकिल की दुकान वाले को साइकिल खरीदने वाले का चेहरा भी हू ब हू याद होगा. चाहे साइकिल महीनो पहले ही क्यों न खरीदी गई हो. वो आतंकियों का स्केच भी हू ब हू तैयार करा देगा और यह स्केच किसी कुख्यात आतंकी चेहरे से मिलता जुलता भी होगा. (ये अलग बात है कि हम जिस दुकान से पानी की बोतल या अखबार खरीदते हैं, उस दुकानदार का चेहरा भी हमें शायद ही याद रहता हो.)
3- अब सुरक्षा एजेंसियां आनन फानन में छापा मारेंगी. संदेहास्पद लोग पकड़े जाएंगे. उनके पास ये चीजें जरूर बरामद होंगी- उर्दू का एक अखबार, पाकिस्तान का झंडा, इंडियन मुजाहिदीन या सिमी का साहित्य, पाकिस्तान मेड असलहा, विदेशी करेंसी… (मानो आतंक के आका आतंकियों को हर ब्लास्ट से पहले एक विशेष प्रकार की किट से लैस कर के भेजते हैं. ब्लास्ट की जगह अलग हो सकती है. ब्लास्ट का समय अलग हो सकता है, मगर ये किट जिसे सुरक्षा एजेंसियां बरामद करती हैं, हमेशा एक सी होती है. कभी नहीं बदलती.)
4- इतना नहीं पुलिस को आनन-फानन में माड्यूल का भी पता चल जाएगा. ये माड्यूल इन्हीं में से एक होगा. पुणे बेकरी ब्लास्ट. मुंबई झावेरी बाजार ब्लास्ट. यूपी संकटमोचन मंदिर ब्लास्ट. जयपुर जौहरी बाजार ब्लास्ट, दिल्ली सीपी-गफ्फार मार्केट धमाके…. माड्यूल का पता धमाके में इस्तेमाल की गई चीजों से चलेगा. जैसे साइकिल, बाल रिंग, शार्पनेल, टाइमर आदि और इसी से साबित हो जाएगा कि धमाके सिमी ने किए हैं, हूजी ने या फिर इंडियन मुजाहिदीन ने ( ऐसा लगता है कि जैसे कापीराइट एक्ट के तहत हर आतंकी संगठन ने अपने अपने धमाकों में इस्तेमाल होने की जाने वाली चीजों का रजिस्ट्रेशन करा लिया हो और एक आतंकी संगठन कानूनन दूसरे आतंकी संगठन के माड्यूल में इस्तेमाल की गई चीजों का इस्तेमाल नहीं कर सकता, नहीं तो शायद पटियाला कोर्ट दिल्ली में कापीराइट एक्ट के तहत इस मामले में दावा भी दायर किया जा सकता है.)
5- ब्लास्ट कोई भी हो, कहीं भी हो, कैसा भी हो, खुफिया एजेंसियों के सूत्रों से मास्टर माइंड का नाम आधे घंटे के भीतर ही फ्लैश होना शुरु हो जाएगा और वो इन्हीं में से कोई एक होगा. रियाज भटकल. इकबाल भटकल. यासीन भटकल… अहमद सिद्धी बप्पा उर्फ शाहरूख उर्फ यासीन अहमद. इलियास कश्मीरी. हाफिज सइद. लखवी… (मानो ये मास्टर माइंड कारनामे को अंजाम देते ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को फोन कर रिपोर्ट करते हों कि सरकार काम हो गया, अब आप नाम आगे बढ़ा सकते हैं.)
6- ब्लास्ट के 24 घंटों के भीतर ही इन जगहों पर छापे जरूर पडेंगे. आजमगढ़- उत्तर प्रदेश… दरभंगा- बिहार… नांदेड़ और बीड़- महाराष्ट्र. संदिग्ध आतंकी या तो इन्हीं जगहों से बरामद होंगे या उनका लिंक इन्हीं जगहों से मिलेगा. (मानो यूपीएससी की वेबसाइट पर “अपकमिंग वैकेंसी” के कॉलम में योग्य उम्मीदवारों की एक सूची लगी हो और उनमें इनका नाम दिया गया हो.)
गृहमंत्री महोदय, कृपया ध्यान दें- एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर हमारी सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों की इसी दिमागी मौज मस्ती के चलते, असली आतंकी तो पकड़ में आते ही नहीं, हां गरीब कमजोर बेगुनाहों को जेलों में ठूंसकर हर साल 26 जनवरी को वीरता पुरुस्कार जरूर हथिया लिए जाते हैं, नहीं तो अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद किसी की कूवत नहीं हो पाई कि सार्वजनिक जगहों पर एक छुरछुरी भी फोड़ सके.
Abhishek Upadhayay for beyondheadlines 

Saturday, October 20, 2012

एक ‘आतंकवादी’ का दावत-ए-वलीमा…



जिस उम्र में नौजवान जिंदगी की रंगीनियों से रू-ब-रू हो रहे होते हैं, उस उम्र में वो सलाखों के पीछे कैद अपने ख्वाबों को फ़ना होते देख रहा था. अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन उसने जेल की सलाखों के पीछे काट दिए. मैं आमिर की बात कर रहा हूं, वो आमिर नहीं जो आपके ज़ेहन में सितारा बनके बसता है, जो आपको हंसाता-गुदगुदाता है, बल्कि वो आमिर जिसकी दास्तान आपकी आंखों को नम कर देगी और जिसकी हकीक़त कई सख्त सवाल आपके ज़ेहन में छोड़ जाएगी.
आमिर 18 साल की उम्र में एक दिन मां के लिए दवा लाने घर से निकला और लौट कर नहीं आया. लौटकर आई तो उसके आतंकवादी होने की ख़बर…. भारत में जन्मा, पला-बढ़ा, खेला-कूदा आमिर चंद दिनों में ही पाकिस्तानी हो गया. आमिर पर बम धमाके करने, आतंकी साजिश रचने और देश के खिलाफ़ युद्ध करने जैसे संगीन आरोप लगे. 18 साल की उम्र में आमिर 19 मामले में उलझा हुआ था.
उसकी जिंदगी शुरू होने से पहले ही एक लंबी कानूनी जंग शुरू हो गई थी. 1998 में शुरु हुई यह जंग 2012 तक चली और अंततः फरवरी 2012 में कानून की देवी ने उसे बेगुनाह क़रार दिया. जेल में सिर्फ 14 साल ही नहीं बीते बल्कि आमिर के ख्वाब भी बीत गए. वो जब जेल से निकला तो उसके अब्बू का इंतकाल हो चुका था. मां ममता के बोझ में ही दब सी गई थी. सब कुछ फना होने के बाद भी अगर कुछ बाकी बचा था तो वो था देश की कानून व्यवस्था में भरोसा…
जेल में कटे 14 साल आमिर की जिंदगी का स्याह पहलू हैं. आज मैं उसकी जिंदगी के खूबसूरत पहलू की झलक आपको दिखाना चाहता हूं. आमिर ने बीते सप्ताह ही शादी की. मैं उसकी दावत-ए-वलीमा में शामिल हुआ. आमिर ने गुजारिश की थी कि मैं दावत में ज़रूर पहुंचूं और मैं वक्त से पहले ही अपने खास दोस्त व बड़े भाई अख़लाक़ अहमद के साथ पुरानी दिल्ली के आज़ाद मार्केट के हसीन महल पहुंच गया.
हम पहुंचे ही थे कि पुलिस की गाड़ी वहां आकर रूकी. जैसे ही पुलिसवालें बाहर निकले इंसानी हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले एक सिपाही ने हंसते-हंसते पूछ लिया कि आप क्यों आए हो? पुलिस वाले ने भी हंसते हुए कहा कि बस ऐसे ही आमिर मियां की खैरियत जानने आए थे, पूछने आए थे कि उन्हें हमारी कोई ज़रूरत तो नहीं है.
धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगी कई बड़े चेहरे नज़र आने लगे. ये तमाम बड़े लोग सिर्फ आमिर को ढूंढ रहे थे. कुछ देर बाद आमिर सेलीब्रेटी की तरह हसीन महल में दाखिल हुआ, मीडिया के कैमरों की फ्लैशें चमकने लगी. लोग आमिर को गले लगाने के लिए बेताब लोगों ने उसे घेर लिया.
भारत के इतिहास में किसी ‘आतंकवादी’ की दावत-ए-वलीमा का शायद ये पहला मौका था जब इतनी बड़ी तादाद में खास-व-आम लोग पहुंचे हों. बहुतों के नाम तो मैं भी नहीं जानता, हां बड़े-बड़े समारोहों में उन्हें देखा-सुना ज़रूर है.  जिनके नाम मुझे याद हैं उनमें प्रख्यात लेखिका अरूधंती राय, पूर्व कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान, राज्यसभा सांसद मो. अदीब, लोजपा के राष्ट्रीय सचिव अब्दुल खालिक, पत्रकार अज़ीज़ बरनी, सईद नक़वी (और भी कई पत्रकार), सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, लेनिन रघूवंशी, मनीषा सेठी, इलाके के विधायक मिस्टर जैन  व ओखला के विधायक आसिफ मुहम्मद खान शामिल थे.
बड़े-बड़े लोग इस दावत की शान बड़ा हो रहे थे और आमिर इसके महताब थे. मसरूफियत के बीच आमिर ने हमारी मुलाकात पत्रकार इंद्रानी सेन गुप्ता से कराई. दावत में शामिल होकर इंद्रानी ने आमिर की खुशी बढ़ा दी थी. अपनी खुशी को चेहरे पर नुमाया करते हुए आमिर ने कहा, इन्होंने हमारी बहुत सी खबरें लिखी हैं. इन्हें पुलिस ने धमकिया भी दी लेकिन ये बेखौफ होकर सच लिखती रही. आमिर के मुंह से इंद्रानी की तारीफ सुनकर मुझे खुशी हुई क्योंकि आमतौर पर पुलिसिया जुल्म के सताए मुसलमान मेनस्ट्रीम मीडिया के पत्रकारों को ज्यादातर कोसते ही हैं.
आमिर की बेगुनाही की सबसे पहली ख़बर समाचार वेबसाईट twocircles.net पर आई थी जिसे रिपोर्टर मो. अली ने लिखा था. मो. अली अब ‘द हिंदू’ में काम कर रहे हैं. अली भी मेहमानों में शामिल थे. उनके चेहरे पर भी एक चमक थी. अली ने इस बात पर खुशी जाहिर की कि उनकी रिपोर्ट के बाद उनके अन्य पत्रकारों को भी आमिर के बारे में पता चला और उसकी बेगुनाही पर खबरें मीडिया में आने लगीं.
आमिर जेल में था और अपनी सफाई में कुछ नहीं लिख सकता था. मीडिया ने बिना आमिर की बात सुने उसकी पहचान पाकिस्तानी के तौर पर पुख्ता कर दी थी. उसे आतंकी, देश का दुश्मन, बेगुनाहों का हत्यारा और न जाने क्या-क्या कहा गया.
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि मीडिया द्वारा ही उसकी बेगुनाही के बारे में खुलकर लिखने के कारण उसका केस मज़बूत हुआ और आज वो जेल से बाहर है और अपने वलीमे की दावत दे रहा है.
दावत में हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के सहाफी ए.एन शिबली भी थे. उन्होंने भी आमिर की बेगुनाही पर अपने अख़बार में खूब लिखा था और मुसलमानों की मिल्ली तंजीमों पर भी आमिर की मदद न करने पर सवाल खड़े किए थे. मीडिया में खिंचाई होने के बाद एक-दो मिल्ली तंजीमों ने आमिर की मदद भी की. अपनी लाज बचाने के लिए ही सही लेकिन मिल्ली तन्जीमों ने कम से कम आमिर की मदद तो की. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी था कि जिन मिल्ली तंज़ीमों के लोगों ने कोई मदद नहीं की, अब उन्हीं मिल्ली तन्जीमों से जुड़े लोग आमिर की दावत-ए-वलीमा में शामिल होकर उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए उतावले थे.
लेनिन रघुवंशी भी इस दावत का हिस्सा थे. यह वही शख्स हैं जिन्होंने आमिर को ‘जन मित्र पुरस्कार’ देकर सम्मानित किया था. उनकी संस्था ने आमिर को न सिर्फ पुरस्कार दिया बल्कि आर्थिक तौर पर भी उसकी मदद की. वो कहते हैं कि आमिर ने दोबारा मज़बूती से अपनी जिंदगी को शुरू किया है. तमाम मुश्किलों के बावजूद वो जिंदगी को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है और 14 साल जेल में काटने के बाद अब वो बेगुनाहों के हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए ज़हनी तौर पर पूरी तरह तैयार है. एपीसीआर के अखलाक़ साहब भी काफी खुश थे. इनकी संस्था ने भी आमिर की अच्छी-खासी आर्थिक मदद की थी.
दावत-ए-वलीमा में आमिर इंसानी हुकूक की लड़ाई लड़ने वाले बड़े नामों से घिरा था. वो अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करते हुए खुश था. उसे इस बात की भी खुशी थी कि इस मौके पर उसके मुहल्ले के वो लोग और वो रिश्तेदार भी साथ खड़े थे जिन्होंने कभी उनसे आंखे फेर ली थी. ये वही लोग थे जो कभी उसके परिजनों से बात तक नहीं करते थे. आमिर ने अपनी जिंदगी की नई शुरुआत कर दी है. उसकी ख्वाहिश देश व समाजहित में काम करने की है. देश की कानून व्यवस्था में उसे मज़बूत भरोसा है.
अपनी जिंदगी के 14 साल जेल में काटने के बाद, बेुनाही से जंग लड़ते हुए अपने पिता को खो देने के बाद, अपनी मां के मानसिक रूप से कमजोर हो जाने के बाद भी आमिर का इरादा मज़बूत है. वो दोबारा जिंदगी को जीना चाहता है. अंधेरी सुरंग से गुज़र कर आमिर की जिंदगी की गाड़ी दोबारा पटरी पर आ चुकी है. वो वक्त की रफ्तार के साथ आगे बढ़ने की ख्वाहिश रखता है.
लेकिन आमिर की जिंदगी का ये खूबसूरत पहलू उन स्याह सवालों का जवाब अब भी तलाश रहा है जिन्हें हमारी सुरक्षा एजेंसियों ने पैदा किया है. आतंकवाद के नाम पर न जाने कितने बेगुनाह आमिर अपनी जिंदगी के बेशकीमती लम्हों को जेलों में जाया कर देते हैं. सालों तक जुल्म व सितम सहने के बाद जब वो जेलों से रिहा होते हैं तो हमारा समाज उन्हें स्वीकार नहीं पाता.
जब किसी नौजवान को आतंकी बनाकर पेश किया जाता है तो अख़बार अपनी काली स्याही से उसकी किस्मत लिख देते हैं. बड़े-बड़े लफ्जों में लिखा जाता है कि आतंकी गिरफ्तार हुआ. लेकिन जब वही नौजवान बेगुनाह साबित होकर जेल से बाहर आता है तो सिंगल कालम ख़बर भी उसके लिए नहीं लिखी जाती. यह हमारे देश की बिडंबना ही है कि जब राहुल गांधी पर झूठा मामला दर्ज होता है तो देश का मीडिया चिल्ला-चिल्लाकर झूठ की पोल खोलता है. जब कोर्ट उन्हें बेगुनाह करार देता है तो पूरा दिन ख़बर छाई रहती है. विशेष लेख लिखे जाते हैं. लेकिन जब एक बेगुनाह 14 साल जेल में काटने के बाद दोबारा जिंदगी शुरु करने की कोशिश करता है तब कानून में दोबारा उसका विश्वास पैदा करने के लिए दो शब्द भी नहीं लिखे जाते.
वैसे क्या आप उन गुजरात, हैदराबाद, जयपुर और औरंगाबाद में रिहा हुए बेगुनाहों के नाम जानते हैं? क्या आपने कभी सोचा कि उन पर क्या बीती और क्यों बीती? अगर आपने नहीं सोचा तो अब सोचिए. बेगुनाहों के लिए अपनी आवाज़ मज़बूत कीजिए. अगर आप अब खामोश रहे तो कोई और आमिर कल के अख़बार में पाकिस्तानी आतंकवादी बन जाएगा.

Tuesday, October 16, 2012

इंडयन मुजाहिदीन जैसे संगठनों को खुद आईबी संचालित कर रही है



आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों के रिहाई मंच ने हैदराबाद के अब्दुल रज्जाक मसूद द्वारा खुफिया एजेंसियों द्वारा उन पर मुख़बीर बनने का दबाव डालने के चलते की गई आत्महत्या का जिम्मेदार खुफिया एजेंसियों को ठहराते हुए हैदराबाद के खुफिया अधिकारियों पर हत्या का मुक़दमा चलाने की मांग की है.
लाटूश रोड स्थित मंच के कार्यालय पर आयोजित बैठक में पूर्व पुलिस महानिरिक्षक एसआर दारापुरी ने कहा कि ऐसा लगता है कि आतंकवाद से निपटने के नाम पर कांग्रेस सरकार ने खुफिया एजेंसियों को मुसलमानों को खत्म करने की खुली छूट दे दी है. क्योंकि मसूद की आत्महत्या कोई पहली घटना नहीं है. इससे पहले पूछताछ के नाम पर मुम्बई में फैज़ उस्मानी और क़तील सिद्दीकी की यरवदा जेल में हुई हत्या में भी खुफिया एजेंसियों की भूमिका संदिग्ध रही है. जिस पर जांच की मांग के बावजूद सरकार ने आपराधिक खामोशी अख्तियार की हुई है.
उन्होंने इन घटनाओं को खुफिया एजेंसियों द्वारा लोकतंत्र को अगवा कर लेने का उदाहरण बताते हुये कहा कि भारतीय खुफिया एजेंसियां अब देश की जनता द्वारा चुनी गई सरकारों के बजाय मोसाद और सीआईए से सीधेव संचालित होने लगी हैं. जिसकी सबसे ताजा मिसाल सउदी अरब से दरभंगा बिहार निवासी इंजीनियर फसीह महमूद का भारतीय खुफिया एजेंसियों द्वारा गैर कानूनी ढंग से अगवा किया जाना है. जिसकी जानकारी गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय को नहीं थी.
पुलिस के रिटार्यड वरिष्ठ अधिकारी ने सरकार पर खुफिया एजेंसियों और एटीएस अधिकारियों को ट्रेनिंग के नाम पर इज़राइल और अमरीका भेजने का आरोप लगाते हुये कहा कि दुनिया के ये दो सबसे बडे आतंकी देश भारतीय अधिकारियों को मुस्लिम विरोधी संस्थागत हिंसा की ट्रेनिंग दे रहे हैं, जिसका परिणाम अब्दुल रज्जाक मसूद और क़तील सिद्दीकी की हत्याएं हैं.
रिहाई मंच के संयोजक एडवोकेट मो0 शुऐब ने कहा कि खुफिया एजेंसियों पर लगातार निर्दोंष मुसलमानों को उत्पीडि़त करने का आरोप लग रहा है यहां तक कि इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच में भी सीबीआई ने खुफिया एजेंसियों को जांच के दायरे में लाया है, बावजूद इसके मुसलमानों के खिलाफ़ खुफिया एजेंसियों के साम्प्रदायिक हमले जारी हैं.
मो0 शुऐब ने कचहरी विस्फोटों के आरोप में बंद तारिक कासमी द्वारा पिछले दिनों जिला जेल लखनऊ से भेजे गये पत्र जिसमें आतंकवाद के नाम पर कैद मुस्लिम यूवकों के खुफिया एजेंसियों द्वारा उत्पीडन और उसके परिणाम स्वरूप उनमें आत्महत्या की बढ़ती प्रवित्ति का जिक्र करते हुये कहा कि अगर अब्दुल रज्जाक की तरह लखनऊ की जेल में भी कोई घटना होती है तो इसकी जिम्मेदार सपा सरकार और खुफिया एजेंसियां होंगी.
उन्होंने आगे कहा कि एक तरफ तो मुलायम सिंह मुसलमानों को सपा को सरकार में पहुंचाने का श्रेय देते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ इस सरकार का सांप्रदायिक चरित्र यह है कि वो निमेष आयोग की रिपोर्ट को महीनों से दबाए हुए है और जेल में बंद लड़को का उत्पीड़न कर रही है और सात महीने के सपा कार्यकाल में आठ बड़े दंगे हो चुके हैं.
शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने कहा कि अब्दुल रज्जाक के सुसाइड नोट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि खुफिया एजेंसियां किस हद तक मुसलमानों के खिलाफ षडयंत्र रच रही हैं और उन्हें अपना मुखबिर बना रही हैं. ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है विभिन्न आतंकी घटनाओं में आईबी के अधिकारियों की भूमिका पर जांच हो. क्योंकि जिनको वो आतंकी बता कर फंसाती हैं उन्हें ही बाद में उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर उनको अपना मुखबिर बनाने की कोशिश करती हैं. जैसा कि पहले भी संसद पर हुए हमले के आरोपी अफ़ज़ल गुरू और दिल्ली के मआरिफ क़मर और इरशाद अली के मामले में खुलासा हुआ है.
उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की घटनाओं से यह संदेह और पुष्ट हो जाता है कि इंडयन मुजाहिदीन जैसे संगठनों को खुद आईबी संचालित कर रही है और देश में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दे रही हैं.

Monday, October 01, 2012

तीन किताबों ने न जाने कितने आतंकवादी बना दिए?



प्रांत दर प्रांत और शहर दर शहर, पुलिस बेकसूरों को भी आतंकवादी बता कर सजा कटवाती रही. एक में तो कईयों को छ: साल सजा कटवा चुकने के बाद पता चला कि गुनाह तो किन्हीं और ने ही किया था ! हिंदुस्तान में लोगों को आतंकवादी साबित करने पे तुली पुलिस का एक सच ये भी है.

अप्रैल, 2006. मध्यप्रदेश में खंडवा तनावग्रस्त था. ईद से पहले कुछ घटनाएं घटी थीं. पुलिस ने अब्दुल हफीज़ कुरैशी की दो बेटियों बीस साल की आसिया और तेईस साल की रफिया को पकड़ा. सबूत के तौर पर उसने उन दोनों से 2004 में हिंदी में छपी पत्रिका, तहरीके मिल्लत की तीन प्रतियां ज़ब्त कीं. इस पत्रिका को भेजी पांच सौ रूपये की राशि की एक रसीद भी. दोनों को आतंकवादी साबित करने के लिए ये सबूत थे. पुलिस के मुताबिक़ एक पत्रिका के कवर पे आसिया ने अपना नाम हाथ से लिखा हुआ था. दो पे, हाथ से ही, रफ़िया ने अपना. बाद में पुलिस ने कोटा, राजस्थान से पत्रिका के मालिक, संपादक एम.ए. नईम को भी गिरफ्तार कर लिया. पत्रिका बंद हो चुकी थी.

लेकिन इस पत्रिका को रखने के जुर्म में लोगों का 2001 में प्रतिबंधित हो चुकी सिमी का सदस्य होना बंद नहीं हुआ. जुलाई, 2006 को मुंबई की एक लोकल ट्रेन में हुए धमाकों के लिए जिम्मेवार बताए गए मोहम्मद फ़ैसल अताउर रहमान शेख, ज़मीर लतीफुर रहमान शेख और डा. तनवीर अहमद अंसारी को भी इसी पत्रिका की तीन प्रतियां मिलने की वजह से प्रतिबंधित संगठन सिमी का सदस्य माना और बताया गया.

जुलाई 2006 में मुंबई की एक अदालत को दिए हलफनामे में रहीमतुल्ला सैय्यद ने कहा कि दानिश रियाज़ शौकत अली शेख नाम के एक आतंकवादी से उसे तहरीके मिल्लत की एक पत्रिका मिली थी. अगस्त 2006 में मुंबई पुलिस के एक ए.एस.आई. रहीमतुल्ला इनायत सैय्यद ने कोर्ट को दिए हलफनामे में 30 को पकड़े गए मोहम्मद नजीब अब्दुल राशिद शौकत अली शेख को आतंकवादी बताया. इसी पत्रिका की एक प्रति मिलने के आधार पर.

13 अगस्त, 2006 को कंदिवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले में पकड़े गए मोहम्मद नजीब अब्दुल राशिद और उस के साथियों को भी पुलिस इसी पत्रिका की कुछ प्रतियां मिलने के आधार पर आतंकवादी और प्रतिबंधित संगठन सिमी के सदस्य बताया था.

8 सितम्बर, 2006 को मालेगांव के बड़ा कब्रिस्तान इलाके में कुछ फ़साद हो गए. इन में 37 लोग मारे गए, सौ ज़ख़्मी हुए. पुलिस ने आज़ाद नगर थाने में मामला दर्ज किया. पुलिस ने नूर उल हुदा नाम के एक मजदूर को पकड़ा. उस के मुताबिक़ उस ने उस के घर पे छापा मार के तहरीके मिल्लत की एक प्रति बरामद की. 19 सितम्बर को इस मामले की तफ्तीश एटीएस को सौंप दी गई. एटीएस ने नूर उल हुदा की निशानदेही पर आठ और आतंकवादियों को पकड़ने के साथ दावा किया कि उसने मालेगांव ब्लास्ट केस सुलझा लिया है. लेकिन असीमानंद के इकबालिया बयान से पता चला कि वो बम धमाके नूर उल हुदा और उस के साथियों ने किये ही नहीं थे. उन सब को ज़मानत मिल गई. ये अलग बात है कि तब तक ये नौ के नौ लोग छ: छ: साल की सजा काट चुके थे. उस अपराध के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं था.

19 सितम्बर 2008 को मध्य प्रदेश पुलिस ने मिसरोद रेलवे स्टेशन से जबलपुर के एक 29 वर्षीय नौजवान मोहम्मद अली को पकड़ा बताया. दावा किया कि उस से भी 'तहरीके मिल्लत' मिली. थानेदार चंदन सिंह सुरामा ने अपनी रपट में इसी आधार पर उसे भी सिमी का सदस्य और आतंकवादी माना. सुरामा के मुताबिक़ उसे मोहम्मद अली के झोले से पत्रिका को दी पांच सौ रूपये की राशि की रसीद भी मिली.

उधर, रफ़िया और आसिया के भाई इनामुर्रहमान को राजस्थान पुलिस ने उठा लिया. ये कह के उसका जयपुर के धमाकों में हाथ है. उस के और उसकी दोनों बहनों समेत कुल 14 लोग इस आरोप में पकड़े गए. इन सब पे इस पत्रिका को पढने और पढ़ाने का इलज़ाम था. बाद में इन 14 में से 11 को ज़मानत पे छोड़ दिया गया.

हैरानी और दुःख की बात ये है कि अलग अलग प्रांत और शहरों की अलग अलग वारदातों में इन जिन तमाम लोगों को पुलिस ने जिस पत्रिका 'तहरीके मिल्लत' की प्रतियां मिलने की वजह से आतंकवादी बताया उस की हरेक के पास वही तीन प्रतियां थीं जो शुरू में आसिया और रफिया के पास से मिली थीं और जिन में से एक के कवर पेज पे आसिया ने अपने हाथ से अपना और बाकी दो पे रफ़िया ने अपने हाथ से अपना नाम लिखा हुआ था. पांच सौ रूपये वाली रसीद भी वही एक थी. अलग अलग प्रांतों की पुलिस ने बेकसूरों को भी आतंकवादी बता के जेल में भिजवा देने के लिए इस पत्रिका की इन्हीं तीन प्रतियों का इस्तेमाल किया. जिन का नाम ही रख दिया गया था, 'तहरीके मिल्लत आसिया'.

Thursday, September 27, 2012

Don’t give terror tag to innocent minority people: Supreme Court



Ensure that no innocent has the feeling of sufferance only because ‘my name is Khan, but I am not a terrorist,’ Bench tells Police
Police must ensure that no innocent person has the feeling of sufferance only because “my name is Khan, but I am not a terrorist,” a Bench of Justices H.L. Dattu and C.K. Prasad said on Wednesday. File photo
No innocent person should be branded a terrorist and put behind bars simply because he belongs to a minority community, the Supreme Court has told the Gujarat Police.

Police must ensure that no innocent person has the feeling of sufferance only because “my name is Khan, but I am not a terrorist,” a Bench of Justices H.L. Dattu and C.K. Prasad said on Wednesday.

It ordered the acquittal of 11 persons, arrested under the Terrorist and Disruptive Activities (Prevention) Act and other laws, and convicted for allegedly planning to create communal violence during the Jagannath Puri Yatra in Ahmedabad in 1994.

“We emphasise and deem it necessary to repeat that the gravity of the evil to the community from terrorism can never furnish an adequate reason for invading personal liberty, except in accordance with the procedure established by the Constitution and the law,” the Bench said.

Being an anti-terrorist law, the TADA’s provisions could not be liberally construed, the Bench said. “The District Superintendent of Police and the Inspector-General and all others entrusted with operating the law must not do anything which allows its misuse and abuse and [must] ensure that no innocent person has the feeling of sufferance only because ‘My name is Khan, but I am not a terrorist’.”

Writing the judgment, Justice Prasad said: “We appreciate the anxiety of the police officers entrusted with preventing terrorism and the difficulty faced by them. Terrorism is a crime far serious in nature, graver in impact and highly dangerous in consequence. It can put the nation in shock, create fear and panic and disrupt communal peace and harmony. This task becomes more difficult when it is done by organised groups with outside support.”

‘Means more important’
But in the country of the Mahatma, the “means are more important than the end. Invoking the TADA without following the safeguards, resulting in acquittal, gives an opportunity to many and also to the enemies of the country to propagate that it has been misused and abused.” In this case, Ashraf Khan and 10 others, who were convicted under the TADA, the Arms Act and the IPC were aggrieved that no prior approval of the SP, as mandated under the provisions, was obtained before their arrest and recording of statements.

Appeal allowed
Allowing their appeals against a Gujarat TADA court order, the Bench said: “From a plain reading of the provision, it is evident that no information about the commission of an offence shall be recorded by the police without the prior approval of the District Superintendent of Police. An Act which is harsh, containing stringent provisions and prescribing a procedure substantially departing from the prevalent ordinary procedural law, cannot be construed liberally. For ensuring rule of law its strict adherence has to be ensured.”

The Bench said: “In view of our finding that their conviction is vitiated on account of non-compliance with the mandatory requirement of prior approval under Section 20-A(1) of the TADA, the confessions recorded cannot be looked into to establish the guilt under the aforesaid Acts. Hence, the conviction of the accused under Sections 7 and 25(1A) of the Arms Act and 4, 5 and 6 of the Explosive Substances Act cannot also be allowed to stand.”

Wednesday, September 26, 2012

खुफिया एजेंसियों की साम्प्रदायिकता का मुहतोड़ जवाब देना होगा



हाल ही में छतीसगढ़ में 14 लोगों को माओवादी बता कर गोलियों से छलनी कर दिया गया. थोड़ा पीछे जाएं तो गुजरात में इशरत जहां का वो फर्जी इनकाउंटर याद कीजिए… सिर्फ यही दो घटनाएं नहीं, बल्कि देश भर में फर्जी इनकाउंटर हो रहे हैं. कहीं आदिवासियों को माओवादी कहकर मारा जा रहा है तो कहीं मुसलमानों को आतंकी कह कर गोलियों से भूना जा रहा है.
 
ठीक चार साल पहले दिल्ली के बटला हाउस में भी ऐसे ही मुस्लिम युवकों को पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ा था. वही बटला हाउस ‘इनकाउंटर’ जिसको कांग्रेस के ही महासचिव दिग्विजय सिंह ने फर्जी इनकाउंटर बताया है. लेकिन इस इनकाउंटर के बाद भी पूरे देश से निर्दोष मुसलमान नौजवानों को पुलिस द्वारा पकड़ा जाना बंद नहीं हुआ है.
सिर्फ आजमगढ़ से सात नौजवानों को गायब कर दिया गया तो वहीं बिहार के दरभंगा से लगातार नौजवानों को पकड़ा जा रहा है. यहां तक कि एक नौजवान कतील सिद्दिकी की पूणे जेल में हत्या भी कर दी गयी. वहीं भारतीय खुफिया एजेंसियों ने दरभंगा बिहार के रहने वाले इंजीनियर फसीह महमूद को सउदी अरब के उनके घर से उनकी पत्नी निकहत परवीन के सामने से उठा लिया. जिन पर कोई तार्किक आरोप तक भारत सरकार नहीं लगा पायी है. बावजूद इसके भारत सरकार उनकी पत्नी को फसीह महमूद से मिलने तक नहीं दे रही है. इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ में सीबीआई ने आईबी की भूमिका को जांच के दायरे में लाने का काम किया.
सरकार या कहें कि खुफिया एजेंसियों का सबसे दुखद और दमनकारी चेहरा उस समय सामने आता है जब इन फर्जी गिरफ्तारियों का विरोध कर रहे पत्रकार एसएमए काज़मी को आतंकी कहकर पकड़ लिया जाता है.
इसी तरह हाल ही में इन सवालों को लेकर काम कर रहे मानवाधिकार संगठन आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों का रिहाई मंच की ओर से बटला हाउस फर्जी मुठभेड़ की चौथी बरसी पर लखनऊ के यूपी प्रेस क्लब में आयोजित कांग्रेस-सपा और खुफिया एजेंसियों की साम्प्रदायिकता के खिलाफ सम्मेलन को पुलिसिया दबाव बना के विफल करने की कोशिश की गई. हालांकि अपने नापाक मंसूबे में वे कामयाब नहीं हो पाएं. लेकिन फिर भी सवाल उठना लाजिमी है कि जिस कार्यक्रम के बारे में लगभग सभी अखबार, मुख्यमंत्री से लेकर तमाम बड़े अफसर और नेताओं को पहले से जानकारी भेजी जाती हो, जो कार्यक्रम सार्वजनिक जगह यूपी प्रेस क्लब में हो रहा हो वहां इतनी संख्या में पुलिस की तैनाती की क्यों ज़रुरत आन पड़ी.
पुलिस को जवाब देने की ज़रुरत है कि आखिर ऐसी कौन सी आफ़त आन पड़ी कि एक पूरी तरह से अहिसंक और शहर के सम्मानित बुद्धिजिवियों की उपस्थिति वाले इस कार्यक्रम में पुलिसिया पहरा बिठाना पड़ा. पुलिसिया पहरा न सिर्फ प्रेस क्लब के भीतर था बल्कि क्लब के आसपास और सामने वाले पार्क में भी भारी संख्या में पुलिस मौजूद थी. कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए लोगों को ये पुलिस वाले ऐसे देख रहे थे मानों कितने बड़े गुनहगार हैं यह सब…
इसी कार्यक्रम में एक प्रस्ताव भी पास किया गया, जिसमें कहा गया कि खुफिया एजेंसियों के द्वारा सामाजिक और राजनीतिक संगठनों पर दी जा रही रिपोर्ट को आरटीआई के दायरे में लाया जाय. इस स्थिति में ये बहुत हास्यास्पद स्थिति है कि खुफिया विभाग के साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ किये जा रहे सम्मेलन में खुद खुफिया विभाग के लोग मौजूद थे और फिर यही लोग सरकार को इस कार्यक्रम की रिपोर्ट भी सौपेंगे. ऐसे में उस रिपोर्ट की निष्पक्षता पर कितना विश्वास किया जा सकता है.
दरअसल ये पूरा मामला सत्ता के टेकओवर का है. आज स्थिति ये है कि देश की सत्ता को खुफिया विभाग वालों ने टेकओवर कर रखा है. देश के खुफिया विभाग को कोई जनतांत्रिक सरकार नहीं चलाती बल्कि ये सीआईए, मोसाद और इन्टरपोल से सीधे संचालित होने लगीं हैं और सुरक्षा संबंधी आन्तरिक नीतियों को वैसे ही नियंत्रित करने लगीं हैं जैसे देशी-विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियां हमारी आर्थिक नीतियां नियंत्रित करती हैं. जिसका नजारा बार-बार हम कोडनकुलम, छतीसगढ़, झारखण्ड से लेकर नर्मदा घाटी में देख सकते हैं.
तब यह मांग उठना जायज ही है कि इन खुफिया एजेंसियों को मिलने वाले आर्थिक लाभ की भी जांच होनी चाहिए. भारतीय मीडिया भले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को व्यव्सथा बिगाड़ू चरित्र का बताती हो. सच्चाई ये है कि खुद भारतीय खुफिया एजेंसियां भी उसी चरित्र की हैं. इन्हीं के दबाव में देशद्रोह जैसे काले कानून को हटाने का साहस कोई भी सरकार नहीं कर पायी है.
लेकिन कुछ है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, कि चाहे लाख कोशिश कर लो दबाने की हमें… सम्मेलन के आरम्भ में ही रिहाई मंच के राजीव यादव ने पुलिस के सामने ही उन्हें ललकारने के तेवर के साथ जब खुफिया एजेंसियों और पुलिस विभाग को बेनकाब करना शुरु किया तो सम्मेलन कक्ष में मौजूद पुलिस वाले बगले झांकने लगे और थोड़ी देर में ही कक्ष से बाहर खिसक लिये.
फिर भी ये सवाल मौजूं-ए-बहस है कि क्या हम सच में एक फासिस्ट और हिटलरशाही वाले लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं?

Friday, September 21, 2012

पुलिस और सांप्रदायिक दंगे


प्रथम दृष्टया, यह अत्यंत घिसापिटा विषय लगता है। सांप्रदायिक फसादों के दौरान और उनके बाद व पहले, पुलिस की भूमिका के बारे में पूर्व से ही हम सब बहुत-कुछ जानते हैं। हाल में, राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में, प्रधानमंत्री ने देश में सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जाहिर की थी। इस सम्मेलन में गुप्तचर सेवाओं के अधिकारियों ने भी भाग लिया था। स्पष्टतः, जब देश के प्रधानमंत्री किसी समस्या पर चिंता व्यक्त करते हैं तब उसे हम सभी को गंभीरता से लेना चाहिए।
इस वर्ष के पहले चार महीनों के दौरान देश में साम्प्रदायिक हिंसा की कोई वारदात नहीं हुई और मुझे लगने लगा कि दंगा-मुक्त वर्ष का मेरा सपना पूरा होने जा रहा है। परंतु मेरा यह स्वप्न जल्दी ही टूट गया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में दंगे भड़क उठे। देश के अन्य हिस्सों में भी सांप्रदायिक हिंसा हुई। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से वहाँ सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। इससे एक बार फिर यह जाहिर हुआ है कि दंगों के पीछे राजनैतिक मंतव्य होते हैं और धर्म का इनसे कोई लेनादेना नहीं होता। राजनैतिक उद्देश्यों से धार्मिक पूर्वाग्रह फैलाए जाते हैं।
दंगो के मामलों में पुलिस की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पुलिस को गुप्तचर सूचनाएं इकट्ठा करनी होती हैं, शरारती तत्वों की पहचान कर उन्हें पहले से गिरफ्तार करना होता है, हिंसा शुरू हो जाने की स्थिति में उसे रोकना होता है और दंगे समाप्त हो जाने के बाद, दंगाइयों को कानूनी तंत्र के जरिए ऐसी सजा दिलवानी होती है ताकि वे आगे से हिंसा करने की हिम्मत न कर सकें। पुलिस की दंगो के दौरान भूमिका के मेरे कई दशकों के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि इस वर्ष हुए दंगों में भी पुलिस के व्यवहार में तनिक भी परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ।
यह आश्चर्यजनक है कि उत्तरप्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बावजूद, उत्तरप्रदेश पुलिस के व्यवहार में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया है। हम सबको अपेक्षा थी कि मुलायम सिंह, जो कि मुख्यतः मुसलमानो के समर्थन से सत्ता में आए हैं, पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लावेंगे। परंतु हम सबको निराशा ही हाथ लगी। अगर मुलायम सिंह ने पुलिस की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव लाने की कोशिश की भी है तो पुलिस पर उसका कोई असर नहीं दिखलाई पड़ रहा है। पुलिस ने खुलकर दंगाईयों का साथ दिया। ऐसा लग रहा था मानों सत्ता में आने के तुरंत बाद, मुलायम सिंह सरकार को बदनाम करने का षडयंत्र अंजाम दिया जा रहा हो।
मैं इस निष्कर्ष पर भी पहुँचा कि शासन चाहे किसी भी पार्टी का क्यों न हो, पुलिस का व्यवहार एक सा ही बना रहता है। पुलिसकर्मियों के दिमागों में इतना जहर भर दिया गया है कि तुलनात्मक रूप से अधिक धर्मनिरपेक्ष सरकार के अधीन भी वे वैसा ही व्यवहार करते रहते हैं। परन्तु फिर, हमारे सामने बिहार और पश्चिम बंगाल के उदाहरण भी हैं, जहां लालू प्रसाद यादव और ज्योति बसु व बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली सरकारों के कार्यकाल में, क्रमशः 15 और 30 वर्षों तक कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। बिहार और पश्चिम बंगाल में क्रमशः नितिश कुमार और ममता बेनर्जी के नेतृत्व में भी साम्प्रदायिक अमन कायम है।
शायद मुलायम सिंह यादव का व्यक्तित्व उतना मजबूत और चमत्कारिक नही है जितना कि बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों का। यह साफ है कि किसी भी निश्चित नतीजे पर पहुंचने के लिए अत्यन्त गहराई से अध्ययन किये जाने की जरूरत है। प्राथमिक तौर पर हम केवल यही कह सकते हैं कि पुलिस उन मुख्यमंत्रियों की सुनती हैं जो शक्तिशाली होते है और पुलिस का इस्तेमाल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए नही करते। इन मुख्यमंत्रियों के कम से कम कुछ सिद्धांत होते हैं और वे पुलिस तक सही संदेश पहुंचाने में सफल होते हंै।
यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि क्या संपूर्ण पुलिस तंत्र का सांप्रदायिकीकरण हो गया है  या केवल निचले और मध्यम श्रेणी के पुलिस अधिकारी इस रोग से ग्रस्त हैं। एक बार, हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में एक संगोष्ठी के दौरान, मैने यह मत व्यक्त किया कि पुलिस के उच्च अधिकारी, निचले और मध्यम स्तर के अधिकारियों की तुलना में कम साम्प्रदायिक और जातिवादी हैं। एक वरिष्ठ आई.पी.एस अधिकारी, जो कि मेरी ही तरह अकादमी में व्याख्यान देने आये थे, ने मुझसे असहमती जताते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिकारी तो अपने मातहतों से कहीं ज्यादा फिरकापरस्त और जातिवादी हैं। मैने इस पर सिर्फ यही कहा कि आई.पी.एस. अधिकारी होने के नाते वे शायद मुझसे बेहतर जानते हैं।
मेरा स्वयं का अनुभव यह है कि पुलिस के उच्च अधिकारी वर्ग में दोनो तरह के लोग होते हैं- कुछ घोर साम्प्रदायिक तो कुछ पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष। गुजरात इन दोनो तरह के अधिकारियों का अच्छा उदाहरण है। वहां ऐसे आईपीएस अधिकारी थे जिन्होंने मुख्यमंत्री के आगे घुटने टेक दिये और उनके सभी जायज-नाजायज आदेशों को शिरोधार्य किया। कुछ अधिकारी ऐसे भी थे जो नहीं झुके, जिन्होंने अवैधानिक आदेश मानने से इंकार कर दिया और जबरदस्त दबाव के बाद भी जो अपने मत पर दृढ़ रहे। मैने इनमें से दूसरी श्रेणी के अधिकारियों के साथ कई बार कार्यक्रमों में शिरकत की है।
ऐसा भी नही हैं कि वे सब अधिकारी दलित थे। उनमें से कुछ ब्राम्हण सहित अन्य उच्च जातियों के भी थे और कुछ निचली जातियों के। मैं ऐसे दो आईपीएस अधिकारियों को जानता हूँ जो भाई-भाई हैं, एक ऊँची जाति से आते हैं, पुलिस महानिदेशक के दर्जे के हैं और  जिनकी धर्मनिरपेक्षता किसी भी संदेह के परे हैं। वे अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध बने रहे और उन्होंने बड़े साहस से साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं का मुकाबला किया।
यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के अधिकारी एक अपवाद हैं और मेरे पास इस तर्क का कोई जवाब भी नही है। परन्तु मैंने ऐसे कई अन्य अधिकारी भी देखे हैं। हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आयोजित एक कार्यशाला में पूरे देश से आये प्रोबेशनर आईपीएस अधिकारियों को साम्प्रदायिक दंगो और उन्हें रोकने में पुलिस की भूमिका पर केस स्टडी प्रस्तुत करनी थी। इस कार्यशाला में प्रोफेसर राम पुनियानी और मैं निर्णायक मंडल में थे। कई आईपीएस अधिकारियों का प्रस्तुतिकरण इतना अच्छा था कि मैंने प्रोफेसर पुनियानी से मजाक में कहा कि अब हम लोगों को इस क्षेत्र से सन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि युवा पुलिस अधिकारी पहले से ही धर्मनिरपेक्षता के प्रति इतने प्रतिबद्ध है कि उन्हें किसी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता नही है।
यद्यपि यह सच है परन्तु पूरा सच नही। और शायद आने वाले लम्बे समय तक यह पूरा सच नही बन सकेगा। हर धर्मनिरपेक्ष अधिकारी के पीछे विभिन्न स्तरों के अनेक साम्प्रदायिक अधिकारी होते हैं। उनकी जातिवादी और साम्प्रदायिक सोच साफ झलकती है। मैंने बम्बई (1992-93), मेरठ (1987), गुजरात (1985, 2002) व भिवन्डी (1984) दंगो में पुलिस की इस पुर्वाग्रहपूर्ण सोच का अनुभव किया है।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि पूर्वाग्रहग्रस्त अधिकांश अधिकारी निचले दर्जे के थे परन्तु शीर्ष स्तर पर भी, कुछ अपवादों को छोड़ कर, हालात बहुत भिन्न नही थे। मुम्बई में निचले स्तर के अधिकांश पुलिसकर्मी मराठी सामना पढ़ते हैं और मुसलमानों के बारे में सामना की ही भाषा में बात करते हैं। फिर भला हम उनसे कैसे यह उम्मीद करें कि वे उत्तेजना फैलाने वाले लेखन के लिए सामना के विरूद्ध कार्यवाही करेंगे। मुम्बई दंगो के समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नायक का रवैया देखिए। जब मुम्बई के गणमान्य नागरिकों का एक
प्रतिनिधिमंडल उनसे मिला और दंगों को रोकने का आग्रह किया तो उनका जवाब था कि “आप लोग बाल ठाकरे से मिल लें क्यों कि वे ही दंगा भड़का रहे हैं”। साफ तौर पर श्री नायक ने अपने अधिकार, ठाकरे के पास गिरवी रख दिये थे। इतने कमजोर मुख्यमंत्री से हम कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वह दंगों को रोकेगा। यह शर्मनाक है कि महाराष्ट्र सहित कई अन्य स्थानों पर जो पुलिस अधिकारी दंगों पर नियंत्रण पाने में असफल रहे और जिनकी दंगा जांच आयोगो ने कड़ी निंदा की, उन्हें सजा मिलना तो दूर, उनकी पदोन्नति कर दी गई।
उदाहरणार्थ, सन् 1970 के भिवन्डी-जलगाँव दंगों की जांच के लिए नियुक्त मादोन आयोग ने अपनी रपट में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की जमकर खिंचाई करते हुए कहा था कि उन्होंने निर्दोषों को गिरफ्तार किया और दोषियों को बख्शा। परन्तु इसके बाद भी उन्हें एक के बाद एक पदोन्नतियां मिलती गईं और अंततः वे महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुये। एक अन्य उदाहरण मुम्बई पुलिस के एक संयुक्त आयुक्त का है जिन्होंने आठ मदरसा छात्रों को दंगाई बताकर गोली मार दी थी। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी जांच रपट में इस अधिकारी की इस भूल की कड़े शब्दों में निंदा की थी परन्तु उन्हें शिवसेना सरकार के कार्यकाल मंे मुम्बई का पुलिस आयुक्त बना दिया गया। उनकी सेवानिवृति के बाद, एक अदालत ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया परन्तु वे दिल का दौरा पड़ने का बहाना लेकर एक अस्पताल में भर्ती हो गए और वहीं रहते हुए उन्होंने एक अदालत से जमानत ले ली। इस प्रकार वे एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए।
इस तरह के तो कई उदाहरण हैं। परन्तु हाल में मुम्बई में ही इसका ठीक विपरीत उदाहरण सामने आया। मुम्बई के पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक ने हिंसा पर उतारू भीड़ को नियंत्रित करने में अनुकरणीय साहस और योग्यता दिखाई। वे पचास हजार लोगो की उत्तेजित भीड़ को चुपचाप अपने घर जाने के लिए प्रेरित कर सके। इसके लिए वे ईनाम के हकदार थे परन्तु इसके उलट राज ठाकरे के दबाव में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने उनका तबादला सड़क परिवहन के महानिदेशक के पद पर कर दिया। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पटनायक के खिलाफ कार्यवाही की मांग करते हुए लगभग 45 हजार लोगों का जुलूस निकाला था।
राज ठाकरे अब तक मुसलमानों के खिलाफ चुप्पी बनाए हुए थे और यहां तक कि कुछ मामलों में वे मुसलमानों का समर्थन भी कर रहे थे। परन्तु अब शायद सन् 2014 के चुनाव के परिपेक्ष्य में उनका दृष्टिकोण बदल गया है और वे हिन्दुत्व कार्ड खेलने पर आमादा हैं। पटनायक को हटाने की मांग को लेकर विशाल रैली निकालने के पीछे उनका उद्देश्य एक पत्थर से दो पक्षियों का शिकार करना था। पहला यह कि इससे वे शिवसेना के नजदीक आ गये और शिवसेना के साथ सन् 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी के गठबंधन की संभावना बढ़ गई। दूसरे, उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति में अपना दबदबा कायम किया। परन्तु इस राजनैतिक खेल में एक अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की बली चढ़ गई, जिन्होंने एक गम्भीर स्थिति से सफलतापूर्वक मुकाबला किया था।
शायद यही कारण है कि कार्यशालाओं के दौरान कई पुलिस अधिकारी मुझसे कहते हैं कि वे इस मामले मंे कुछ खास नहीं कर सकते क्योंकि वे तो राजनीतिज्ञों के मोहरे भर है। इस बात में दम है। गुजरात में कई पुलिस अधिकारियों ने राजनैतिक दबाव का मुकाबला करने की कोशिश की परन्तु असफल रहे। अलबत्ता, हमेशा ऐसा नहीं होता। पुलिस अधिकारियों की सोच में पूर्वाग्रह बिल्कुल साफ नजर आते हैं। इस सोच को खत्म करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों तक के पाठ्यक्रमों में आमूलचूल परिवर्तन लाने होगें। हमे हमारे पुलिसकर्मियों को धर्मनिरपेक्ष बनाना होगा।
यह भी जरूरी है कि अहमदाबाद के नरोदा पाटिया मामले में जिस तरह का निर्णय आया है वैसे ही निर्णय आगे भी सुनाए जाते रहें। एक पूर्व मंत्री को दंगे भड़काने के आरोप में 28 साल के कारावास की सजा से वे राजनेता हतोत्साहित होंगे जो अपने मतदाताओं के साम्प्रदायिक तबके का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करते हैं। इस मामले में न्यायाधीश ज्योत्सना याज्ञनिक बधाई की पात्र हैं।