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Saturday, April 29, 2017

भारत में तीन तलाक़ 2002 से ही अवैध, फिर अब इसे कौन लाया?

Image result for तीन तलाककई महीने से सुप्रीम कोर्ट में चल रहे तीन तलाक़केस में अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया है, और यह मुद्दा कई तरह के ध्रुवीकरण की वजह बन गया है. दूसरी तरफ़ सोशल मीडिया पर झूठे इलज़ाम के साथ ही अफवाहें फैलाने का सिलसिला जारी है, कि आज फैसला आ रहा है, कल फैसला आ रहा है, या फैसला आ गया है.

एक अजब का गैर ज़िम्मेदारी वाला माहौल समाज के लगभग सभी हिस्सों में बन चुका है. सबसे अहम बात यह है कि आम जनता को छोड़ भी दिया जाए लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर टीवी या दूसरे कार्यक्रमों में बोलने वाले विशेषज्ञों के पास ख़ुद जानकारी का अभाव है. वे अप्रासंगिक मुहावरों और वाक्यों का इस्तेमाल तेज़ आवाज़ में करते हुए एक दूसरे के ऊपर अपने विचार थोपने की कोशिश करते हुए अभी तक दिख रहे हैं. ये सब बहुत ही मायूस करने वाला है.

सबसे बड़ी अफवाह है कि कोई मुस्लिम महिला या मुस्लिम महिला संगठन तीन तलाक़ के केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पास गए जोकि पूरी तरह बेबुनियाद है.

सुप्रीम कोर्ट में दो हिन्दू बहनें अपने माँ-बाप की संपत्ति में हिस्सा मांगने के लिए आईं, उन्हें संपत्ति में अधिकार देने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया, और कानून के जानकारों के अनुसार यह फैसला ऐतिहासिक रूप से महिला अधिकारों को लेकर एक प्रतिगामी फैसला था.

इस फैसले को देते हुए सुप्रीम कोर्ट की इसी पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं पर बहुत अत्याचार हो रहा है, इसलिए तीन तलाक़ के बारे में वे सू-मोटो लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका स्थापित करते हैं.

इस केस में सबसे पहले जमियत उलेमा-ए-हिन्द ने एक बहुत ही कमज़ोर एफिडेविट के साथ अपने आपको पक्ष बनाया. बाद में पक्ष बनते हुए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी जमियत के कमज़ोर एफिडेविट की हुबहू नक़ल दाखिल की.

इस केस में मुस्लिम महिला संगठनों के पक्ष बनने से पहले लखनऊ की रहने वाली एक मुस्लिम महिला फराह फैज़ इस केस में पक्ष बनीं, और उन्होंने अपने एफिडेविट में लिखा कि वह श्री मोहन भागवत (आरएसएस) के साथ काम करती हैं, और मांग रखी कि महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लॉ को खत्म किया जाए और यूनिफार्म सिविल कोड लागू किया जाए. मालूम हो कि फराह फैज़ इस केस में यूनिफार्म सिविल कोड की मांग करने वाली अकेली वादी हैं. और उनकी इस मांग के कई महीने बाद केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अलग राष्ट्रीय विधि आयोग को यूनिफार्म सिविल कोड के बाबत ज़िम्मेदारी दी.

इस दौरान एक महत्वपूर्ण घटना यह हुई कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखण्ड की एक पीड़ित मुस्लिम महिला शायरा बानो के केस को तीन तलाक़ के केस में जोड़ दिया.

इस बीच भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन और दूसरे संगठन भी इस केस में एक पक्ष के तौर पर आये. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन के वकील श्री आनंद ग्रोवर ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में ही अपना फैसला सुना दिया है, अब इस केस की कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए इस केस में आगे कोई बहस नहीं होनी चाहिए, पर सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी.

भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली ज़किया सोमन और नूरजहाँ सफिया नाज़ पर आरएसएस से जुड़े होने की बेबुनियाद अफवाहें फैलाई गईं, उनकी आस्था और उनकी निजी ज़िन्दगी को बुनियाद बनाते हुए. ज़किया सोमन के बेटे अरस्तू ज़किया को भी नहीं बख्शा गया. जो लोग इन अफवाहों के पीछे हैं, वे ही असल में आरएसएस का काम करते हुए दिख रहे हैं. भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन द्वारा की गई रिसर्च पर भले ही हमारे ऐतराज़ हो जिसे वरिष्ठ विधि जानकार प्रोफेसर फैजान मुस्तफ़ा ने अपने लेखों में उजागर किया है. पर ज़किया सोमन और उनके साथियों ने आरएसएस के खिलाफ गुजरात में 2002 नरसंहार के बाद से लगातार मुसलमानों के हक के लिए जो काम किया है उसे फरामोश नहीं किया जा सकता. उनकी पोटा एक्टको हटाने के लिए गुजरात में हुए संघर्षों में अहम भूमिका रही है, यह वही कानून है जिसका गलत इस्तेमाल कर मासूम मुस्लिम नौजवानों की ज़िन्दगी तबाह कर दी गई.

धार्मिक विचारों और निजी ज़िन्दगी से किसी को कोई मतलब नहीं होना चाहिए, उसकी बुनियाद पर झूठे इलज़ाम लगाना निंदनीय है. आज मुसलमानों के हक और इंसाफ के लिए आवाज़ उठाने वाले बहुत से लोग मुसलमान नहीं हैं, और बहुत से मुसलमान चेहरे जिनसे उम्मीद की जाती है वे अक्सर खामोश रहते हैं. आरएसएस की परिभाषा वाले मुसलमान भी आजकल अपने चेहरे को सियासत में जमाने की खातिर नारे लगाते हुए दिखते हैं, पर उनके इरादे नेक नहीं हैं. इस पर मुसलमानों को गौर करने की ज़रूरत है.

इस केस में इसके उलट कई चीजें इस बात का इशारा कर रहीं हैं कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को गुमराह करते हुए उसी के कुछ मौलवी हज़रात आरएसएस के इशारे पर काम कर रहें हैं. इसका सबसे बड़ा सबूत है अभी कुछ हफ्तों पहले सुप्रीम कोर्ट में इस्लाम और शरियत के नाम पर जमा किया गया एफिडेविट, जिसके समर्थन के लिए इन्हीं कुछ लोगों ने हस्ताक्षर अभियान और साथ ही गाँव, कस्बों, शहरों में जुलुस निकलवाने का काम किया.

इस 68 पन्नों के एफिडेविट में जो बातें कही गई हैं, अगर निष्पक्ष रूप से किसी इस्लामी विद्वान से पूछी जायें, तो वह बतायेंगे कि ये इस्लाम और शरियत के खिलाफ हैं. इसके बारे में जब आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सर्वोच्च नेतृत्व को बताया गया, तब उन्होंने जलसे-जुलुस और हस्ताक्षर अभियान पर रोकथाम की.

आज सुप्रीम कोर्ट में इन विभिन्न धाराओं वाले संगठनों के तर्कों पर गौर करने की ज़रूरत है.

साथ ही यह कहते हुए कि फ़ासीवाद के इस दौर में जब अधिकतर सरकारी प्रतिष्ठानों से शोषित और वंचितों का विश्वास उठता जा रहा है, न्यायपालिका से बहुत-सी शिकायतें होने के बावजूद अभी तक उससे बहुत उम्मीदें बाकी हैं, उसे धूमिल नहीं किया जाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट से पूछना होगा कि जब उन्होंने कई फैसलों में, ख़ासकर शमीम आरा के 2002 केस में जब यह फैसला दे दिया कि न्यायपालिका तीन तलाक़ (एक समय में एक साथ) को अमान्य मानती है और कुरआन में दिए हुए तलाक़ की प्रक्रिया जिसे तलाक़े अहसनकहा जाता है, उसे ही मानेगी. इस फैसले को किसी भी धार्मिक संगठन, या व्यक्ति विशेष ने चुनौती नहीं दी, कोई विरोध नहीं हुआ, और ये कानून बन गया. तब नए सिरे से किसी भी जज द्वारा जनहित याचिका स्थापित करने का क्या औचत्य था?

क़ानूनी तौर पर अभी की मौजूदा बेंच 2002 के शमीम आरा फैसले को पलट कर तीन तलाक़ को सही करार दे ही नहीं सकती तो फिर ये तमाम हंगामा क्यों? क्या सुप्रीम कोर्ट के जज 2002 के ऐतिहासिक शमीम आरा फैसले के बारे में नहीं जानते हैं?

तीन तलाक़ जब पहले से ही अमान्य है, जिसे तलाक़े बिद्दत कहते हैं और जिसका कुरआन से कोई ताल्लुक नहीं है, जिसे इस्लाम ने भी एक अपराध माना है, तब उस पर इतनी उलझन पैदा करने की ज़रूरत क्यों हुई.

मई 2014 से हिंदोस्तान का मुसलमान एक नए दौर से गुज़र रहा है, और खास तौर पर याकूब मेमन की फाँसी के बाद मुसलमानों का एक नया लोकतान्त्रिक राजनीतिकरण हुआ है, जो मुसलमानों के लिए और देश के लिए बहुत अच्छा संकेत है. आज इस लोकतान्त्रिक राजनीतिकरण को कई तरह से थामने की कोशिशें जारी हैं. आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ लोगों को अपने साथ मिलाकर, आरएसएस ने जिस तरह से हिंदोस्तान के मुसलमानों को, खुद आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को गुमराह करने की कोशिश की है वे अपने आप में इस बात को उजागर कर रही है.

तीन तलाक़ के ऊपर मज़हब का चोगा पहनाकर आम लोगों को बहकाने की बजाये, आज जब हिंदोस्तान में एक तरफ़ा संगठित हिंसा की वजह से मुसलमान औरत, मर्द, बुज़ुर्ग, जवान, बच्चे, बच्चियां, एक खौफ के साये में जी रहे हैं. जिसे पूरा देश इस बात को जानता है. देश का एक बड़ा तबका इसका समर्थन भी करता है और इसे न्यायसंगत मानता है. सुप्रीम कोर्ट से पूछने की ज़रूरत थी कि इस मुस्लिम विरोधी संगठित हिंसा को रोकने के लिए आपने कुछ कदम क्यों नहीं उठाये.

आज के दौर में अमानवीयकरण कितने और चरम पर पहुंचेगा, इसका अंदाज़ा करना अब मुश्किल है. एक कतार है नज़ीरों की. देश की संसद में विराजमान एक माननीय ने जनसभाओं में कहा कि मृत मुस्लिम महिलाओं की कब्र खोदकर उनके शवों के साथ बलात्कार करो. उत्तरप्रदेश में दो जगह इस अपील पर अमल करते हुए एक विचारधारा विशेष के व्यक्तियों ने कब्र खोदी और मृत मुस्लिम महिला के शव के साथ बलात्कार का प्रयास किया, और बाद में इन्हें मानसिक रोगी कह दिया गया, जैसे कि पूरी दुनिया में इस प्रकार के संगठित अपराध करने वाले लोगों के बारे में प्रशासन कहता है. पर संसद, सरकारें और न्यायपालिका खामोश रहीं.

अगर हिंदोस्तानी समाज ये सोच रहा है कि अमानवीयकरण देश में रहने वाले मुसलमानों के खात्में के बाद रुक जाएगा, तो यह एक भयानक भूल है. यह अमानवीयकरण ऐसा दैत्य है कि वह किसी को भी नहीं छोड़ेगा.

आज देश के प्रगतिशील समाज को गहराई से संवेदनशील होकर कुछ चीजों पर गौर करने की ज़रूरत है. महिला विरोधी फ़ासिस्ट दृष्टिकोण और महिला विरोधी रूढ़िवादी दृष्टिकोण में फर्क होता है. दोनों भले ही गलत हैं पर उन्हें एक पैमाने पर रखना न्यायसंगत नहीं.

अधिनायकवादी फ़ासिस्ट दृष्टिकोण देश के बहुसंख्यकवाद पर टिका होता है. अल्पसंख्यक शोषित समाज जब अपने ऊपर एक तरफ़ा हमला महसूस करता है, तब अपनी सोच को सीमित कर, अपने ऊपर रूढ़िवाद की जकड़न को ओढ़ लेता है. और इसे अपनी आन का सवाल बना लेता है. आज इस शोषित समाज से उसकी रूढ़िवादी जकड़न के कारण विरोध और सीधा मुकाबला करने की जगह, उसकी मदद करने की ज़रूरत है ताकि वे रूढ़िवादी जकड़न से मुक्त हों.
 उवेस सुल्तान खान एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं

Thursday, April 27, 2017

भारत के इस वीभत्स चेहरे का ज़िम्मेदार कौन है ?

जम्मू मे उस अधमरे बुज़ुर्ग मुसलमान की तस्वीर ज़हन को नोच रही है।
उसके परिवार की उन दो महिलाओं की चीखें अगर तुम्हे विचलित नही कर रही, 
तो आत्मा मर चुकी है तुम्हारी। 

कुछ ऐसा ही अखलाक के साथ हुआ होगा। 
कुछ ऐसी ही बेरहमी पहलू खान के साथ देखी थी हमने। 
पुलिस कितनी न्यायसंगत है, इसका प्रमाण इस बात से मिलता है
कि पहलू खान और जम्मू, दोनो मामलों मे पीढ़ित के खिलाफ
भी केस दर्ज कर दिया गया। बेशर्मी देखिए जम्मू पुलिस की। 

कहते हैं कि गडरियों को वन विभाग के साथ साथ
डिप्टी कमिश्नर की भी इजाज़त की ज़रूरत होती है, 
बल्कि खुद अतिरिक्त डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि 
अगर मवेशियो को किसी वाहन मे ले जाया जा रहा हो, 
तब ही डिप्टी कमिश्नर की अनुमति की ज़रूरत पड़ती है। 

सवाल ये नहीं। 
तस्वीर आपके सामने है। 
बेबस कौन था। 
बेरहमी किसके साथ हो रही थी। 
यही किया गया था पहलू खान के रिश्तेदारों के साथ। 
हमलावरों के साथ साथ उनपर भी केस दर्ज कर दिया गया। 
न्याय की खातिर ? 
संतुलन की खातिर ? 
वो तो बिगड़ चुका है। 

भारत का संतुलन बिगड़ चुका है। 
क्योंकि ये चीखें प्रधानमंत्री मोदी को सुनाई नही पड़ती। 
हां कभी कभी, दंडवत मीडिया से अक्सर ये खबरें आ जाती हैं कि 
मोदीजी इन घटनाओं से बेहद विचलित हैं
और उसमे भी प्रधानसेवकजी इस बात का खास ख़याल रखते हैं कि 
आसपास कोई चुनाव तो नही है? 

मैने कुछ दिनो पहले कहा था कि 
जो श्मशान और कब्रिस्तान की बातें करते हैं 
उनकी विरासत सिर्फ राख हो सकती है। 
ग़लत कहा था मैने ? 
बोलो? 
दादरी, अलवर और जम्मू से होते हुए 
ये तो अब दिल्ली के कालकाजी आ गए? 
याद है ना? 
वहां भी सही दस्तावेज़ होने के बावजूद 
आशू, रिज़वान और कामिल पर केस दर्ज कर दिया गया। 
जानवरों पर अत्याचार का केस। 

शुक्र है पुलिस ने यही केस हमलावरों पर नही किया। 
क्योंकि गौभक्ति करने वाले इन गुण्डों के लिए 
कामिल, आशू और रिज़वान जानवर ही तो हैं? 
क्योंकि यहां तो गाय का मामला भी नहीं था? 
यहां तो भैंसें लाई जा रही थीं? 
जिसके काटने पर कोई कानूनी रोक नही है। 

एनडीटीवी की राधिका बोर्डिया वहां मौजूद थीं। 
उनके द्वारा शूट किये गए विडियो मे वो तीन अधमरे ज़मीन पर पड़े हुए हैं 
और पुलिस उनके खिलाफ केस दर्ज करती सुनाई पड़ती है। 
वाह! क्या प्राथमिकता है। 
कोई औरत ये भी कहती है, अरे मत मारो इन्हे।
एक और आवाज़ आती है, ये तो समाज का गुस्सा है। 

मीडिया जो योगी योगी कर रहा है 
क्या सहारनपुर और आगरा की तस्वीरें 
कानून व्यवस्था के चरमरा जाने का प्रमाण नही है ? 

कोई बताएगा, भारत के इस वीभत्स चेहरे का कौन ज़िम्मेदार है? 
और ये सब करके क्या हासिल कर लोगे तुम? 
दरअसल मेरे लिए ये तमाम मामले निजी हैं। 
और आप सबके लिए होने चाहिए। 
क्योंकि मुझे डर है कि जब मेरे बच्चे बड़े होंगे, 
तो वो कैसे समाज और देश की बागडोर संभाल रहे होंगे। 
किस सोच मे पल रहे हैं हमारे बच्चे। 
क्या संस्कारी मां बाप उन्हे दूसरे धर्म के लोगों के लिए 
नफरत और हिकारत के माहौल मे बड़ा कर रहे हैं ? 
-अभिसार शर्मा

Friday, February 05, 2016

गंगाजल, साधू यादव, लोकतंत्र की हत्या, संघ व उच्चतम न्यायालय का मूकदर्शक बना रहना

फिल्म "गंगाजल" में तेजपुर के एसपी अमित कुमार अपने इंस्पेक्टर बच्चा यादव से तमाम केस को दिखाते हुए कहते हैं कि "यह ऐसे तमाम केस जो तुम्हें दिये गये तुमने अपनी इमानदारी और दिन रात की मेहनत और लगन से काम करके इन पर फाइनल रिपोर्ट लगाई और मुजरिमों को अदालत से सज़ा दिलवाई पर जैसे ही "साधू यादव" से संबंधित इन फाईलों की ओर मैं देखता हूँ तो सोचता हूँ कि तुम्हारी इमानदारी और मेहनत को क्या हो जाता है"।

यही सवाल कल मेरे दिमाग में तब गूँजा जब उच्चतम न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन के विरुद्ध सुनवाई पर टिप्पणी करते हुए कही कि "लोकतंत्र की हत्या हो रही है तो हम मूक दर्शक बन कर नहीं रह सकते" उच्चतम न्यायालय का यह व्यवहार बिल्कुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह था। क्युँकि जब मुसलमानों से संबंधित विषयों पर इसी तरह "लोकतंत्र की हत्या" होती है तो उच्चतम न्यायालय "मूक दर्शक" बन कर सदैव रहा है । आजादी से आजतक कोई एक मामले पर ऐसा फैसला जो देश के मुसलमानों के हक में उच्चतम न्यायालय ने दिया हो मुझे याद नहीं आता, फैसला तो छोड़िए एक टिप्पणी भी हक में आई हो मुझे याद नहीं पड़ती ।

इसी उच्चतम न्यायालय ने "बाबरी मस्जिद" के मामले में यथास्थिति रखने के अपने आदेश, 6 दिसम्बर के पूर्व बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए कल्याण सिंह से लिए "शपथपत्र", संसद को विश्वास में लेने कि "बाबरी मस्जिद" की सुरक्षा की जाएगी, जैसे तमाम संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रयासों को ध्वस्त करते हुए "बाबरी मस्जिद" उसी कल्याण सिंह ने ध्वस्त करा दी और लोकतंत्र की हत्या कर दी तब "उच्चतम न्यायालय" अपने ही आदेश की अवमानना पर "मूकदर्शक" बना रहा और बहुत किया तो लोकतंत्र के उस हत्यारे को मात्र "24 घंटे" की पिकनिक मनाने के लिए जेल भेजती है जो 6 दिसम्बर की घटना पर गर्व करता रहा है बार बार करता रहा है। 

गर्व किस बात का ? उच्चतम न्यायालय के आदेश, शपथपत्र, संसद और संविधान की हत्या पर गर्व, और उच्चतम न्यायालय मूक दर्शक बनकर बैठा रहता है, बिलकुल इंस्पेक्टर बच्चा यादव की तरह जो साधू यादव और उसके पुत्र से संबंधित अपराधों पर चुप्पी साध लेता है ।

मुसलमानों से संबंधित तमाम विषयों पर तमाम न्यायिक जाँच आयोग भारत की ही सरकारों ने बनाए जिसके मुखिया मुसलमान नहीं थे, जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग, जस्टिस सच्चर आयोग, जस्टिस  काटजू आयोग, जस्टिस श्रीकृष्णा आयोग तथा जस्टिस लिब्राहन आयोग इत्यादि इत्यादि आयोग जो कि मुसलमानों से संबंधित मामले और उनके हक, बर्बादी, तबाही, खूनखराबे तथा हक माँगते इन आयोग की रिपोर्ट की वही सरकारें चिता जला देती हैं जिनका उन्होंने ही गठन किया होता है पर उच्चतम न्यायालय सरकार से यह नहीं पूछती कि जब कार्यवाही करना नहीं तो ऐसे ईमानदार पूर्व न्यायाधीशों को आयोग का प्रमुख बनाकर उनका अपमान क्यों किया जाता है ? 
परन्तु यही उच्चतम न्यायालय क्रिकेट के सुधार के लिए बनी जस्टिस लोढ़ा कमेटी की आज से एक महीने पहले आई रिपोर्ट को लागू करने के लिए आदेश पर आदेश सुनाती है तो हैरानी होती है कि उपरोक्त आयोग की रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को क्यूँ नहीं दिखते ? या देख कर भी उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनी रहती है ?

लिब्राहन आयोग ने अपनी जाँच में 68 लोगों को दोषी पाया जिन्होंने "बाबरी मस्जिद" को ध्वस्त करने की साजिश रची और ध्वस्त करके "लोकतंत्र" की हत्या की परन्तु 24 वर्ष बाद भी यही उच्चतम न्यायालय "बच्चा यादव" की तरह मूक दर्शक आजतक बना हुआ है जबकि उन 68 दोषियों में कितने तो बिना सज़ा पाए तिरंगे में लपेट कर राजकीय सम्मान के साथ दुनिया से विदा हो गये और उनकी मृत्यु पर "राजकीय शोक" तक मनाया गया ।

क्यों "मूकदर्शक" बन जाती है "उच्चतम न्यायालय" गुजरात के 3000 बेगुनाह लोगों की हत्या पर और उस समय के राज्य के मुखिया जिन पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी और 3000 हत्याएँ बताती हैं कि वह अपनी जिम्मेदारी में विफल हुए, उनके अनेकों अनेक अप्रत्यक्ष और सांकेतिक बयान बताते हैं कि 3000 हत्याएँ उनके ही अप्रत्यक्ष आदेश पर हुईं, तो क्यों "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनकर "क्लीनचिट" पर "क्लीनचिट" देता चला जाता है ? राज्य के मुखिया के रूप में क्या वह इन हत्याओं के जिम्मेदार नहीं ?

गर्भवती महिलाओं के पेट चीरकर अजन्मे शिशु निकाल लिए जाते हैं, उस शिशु को त्रिशूल में गोद कर झंडे की तरह लहराया जाता है तो उच्चतम न्यायालय "मूकदर्शक" बनकर चुप अजन्मे रहा ? गोधरा कांड हो या गुजरात दंगे के लगभग सभी सजायाफ्ता मुजरिमों को जिनको फाँसी पर लटका कर एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए था उनमें गुजरात दंगों के लगभग सभी दोषी "माया कोडनानी तथा बाबू बजरंगी" समेत सबके सब किसी ना किसी आधार पर बाहर घूम रहे हैं, क्यों ? 
और गोधरा के दोषी ऐसी ही घटनाओं के कारण जेल में सड़ रहे हैं क्यों ? उच्चतम न्यायालय क्यों "मूकदर्शक" बनकर बैठ जाती है ? 

हाशिमपुरा में 40 मुसलमानों को पीएसी के जवान भूनकर नहर में फेक देते हैं और लगभग 30 वर्ष मुकदमा चलने के बाद उनको बाईज्जत बरी कर दिया जाता है, हाशिमपुरा हत्याकांड की फाईलों को गायब कर दिया जाता है और "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बनी रहती है तो यह भी सवाल नहीं करती कि यदि आरोपी निर्दोष हैं तो 40 लोगों की हत्या करने वाले कौन थे कहाँ हैं ?

कभी "सिमी" तो कभी "इंडियन मुजाहिदीन" जैसे छद्म संगठन जिसका कोई आस्तित्व ही नहीं तो कभी अलकायदा और अब "आइएस" के नाम पर सरकार जब चाहे मुसलमानों को उठाकर आतंकवादी बता देती है और जेलों में ठूसकर देश को अपनी चाकचौबंद व्यवस्था होने का एहसास दिलाती है, 10-10 वर्ष 15-15 वर्ष बाद यह जेल में ज़िन्दगी बर्बाद करके यही "सिमी" "इंडियन मुजाहिदीन" "अलकायदा" और अब "आइएस" के आतंकवादी बिना सबूतों के आधार पर बाईज्जत रिहा हो जाते हैं तो भी "उच्चतम न्यायालय" मूकदर्शक बन कर बैठी रहती है और एक सवाल नहीं पूछती कि सबके सब आतंकवादियों के विरुद्ध सबूत क्यों नहीं हैं और सबूत नहीं है तो किस आधार पर 10-15 वर्ष जेलों में बंद किये जाते रहे हैं, किस आधार पर उनपर आतंकवादी का टैग गिरफ्तार करते ही लगा दिया जाता है।

महाराष्ट्र के हेमंत करकरे ने संघ के लोगों को 12 आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के सबूत इकट्ठा करके लोगों को गिरफ्तार किया और "सिमी" पर ऐसे ही आरोपों से प्रतिबंध तो लग गया पर "संघ" देश पर शासन कर रहा है और उच्चतम न्यायालय उसी इंस्पेक्टर "बच्चा यादव" की तरह चुप है तो क्यों चुप है ? उच्चतम न्यायालय तो इस देश के लोकतंत्र और न्याय का प्रहरी है ? तो देश के एक वर्ग के साथ ही होता अन्याय उस प्रहरी को क्यों नहीं दिखता ? और दिखता है तो देखकर भी "मूकदर्शक" क्यों बना बैठा रहता है ? बच्चा यादव की तरह।

उसी "गंगाजल" फिल्म में आगे इंस्पेक्टर बच्चा यादव "साधू यादव" के विरुद्ध कार्यवाही करता है तो उसकी आँख फोड़कर हत्या कर दी जाती है । कहीं उच्चतम न्यायालय को यही डर तो नहीं ? जो साधू यादव ( संघ ) के विरुद्ध कार्यवाही से रोक तो नहीं रहा ? कहीं साधू यादव का डर उच्चतम न्यायालय को मुसलमानों से संबंधित मामलों में मूकदर्शक बनने को बाध्य तो नहीं कर रहा है ? या उच्चतम न्यायालय में सब साधु यादव के लोग ही बैठे हैं ?

Friday, December 18, 2015

महीनों से भुखमरी का शिकार है ‘अल क़ायदा आतंकी’ का परिवार

Wednesday, October 28, 2015

माता करे पुकार, क्यों छिपे हो बिहार